Sandhi in Hindi – संधि की परिभाषा, भेद, उदाहरण और नियम

संधि की परिभाषा(Defination of joining word)

दो वर्णों के मेल से जो विकार परिवर्तन उत्पन्न होता है। उसे संधि कहते है। इन वर्णों में स्वर और व्यंजन दोनों को शामिल किया गया है।

—जब दो शब्दों का उच्चारण एक साथ किया जाता है तो पहले शब्द की अंतिम ध्वनि तथा दूसरे शब्द की पहली ध्वनि एक दूसरे के निकट आ जाती है। जिसके परिणामस्वरूप इन ध्वनियों के उच्चारण में कुछ परिवर्तन हो जाता है। यह परिवर्तन कभी तो पहले शब्दों की अंतिम ध्वनि में होता है। तो कभी दूसरे शब्द की पहली ध्वनि में और कभी दोनों ही ध्वनियॉ में जैसे :-

1- पहले शब्द की अंतिम ध्वनि में परिवर्तन

  • दिक़्+ गज- दिग्गज — —-(क्+ग )के मेल के परिणामस्वरूप ‘क’ का परिवर्तन ‘ग‘में हुआ है।
  • उत् + मेष– उन्मेष ——(त्+ म) के मेल के परिणामस्वरूप ‘त्’ का परिवर्तन ‘न‘में हुआ है।

2. – दूसरे शब्द की पहली ध्वनि में परिवर्तन

  • अभि + सेक – अभिषेक——- (ष्+न्) के मेल के परिणामस्वरूप ‘न्’का परिवर्तन ‘ण्‘ में हुआ है
  • तृष्+ ना – तृष्णा ———– (ष्+ न्) के मेल के परिणामस्वरूप ‘न्’ का परिवर्तन ‘ण्‘ में हुआ है।

3.- दोनों शब्दों की दोनों ध्वनियों में परिवर्तन

  • नर+ इंदु्र – नरेंद्र – (अ+इ) के मेल से दोनों ध्वनियों का ’ए’ में परिवर्तन हुआ है।
  • उत्+ हार -उद्धार –( त् + ह्) के मेल से दोनों ध्वनियों का परिवर्तन ’ध’ में हुआ है।

अर्थात हम कह सकते है कि– उपर्युक्त शब्दों में पहले शब्द के अंतिम वर्ण का दूसरे शब्द के पहले वर्ण में मेल हुआ है इसी मेल के कारण विकार परिवर्तन भी हुआ है। वर्णों के पारस्पारिक मेल से जो विकार परिवर्तन उत्पन्न होता है। उसे संधि कहा जाता है।

संधि का अर्थ(Meaning of joining word)

संधि का अर्थ है- “मेल या जोड ।”यह दो शब्दों के जोड से बना है। “सम+ धि”

संधि का शाब्दिक अर्थअन्य शब्दों में जैसे -“योग, समझौता, सयोंग, मिलाना, जोडना” आदि वाक्य से भी जाना जा सकता है।

व्याकरण में संधि का अर्थः

जब दो वर्णों के परस्पर मेल से जो विकार उत्पन्न होता है। या भाषा में दो ध्वनियॉं जब आपस में मिलती है तो उसे संधि कहते है।
सरल शब्दों में कह सकते है कि– “दो शब्दों का उच्चारण एक साथ करते समय दोनों शब्दों की निकटम ध्वनियों के बीच होने वाले परिवर्तन को संधि कहते है।

दूसरे शब्दों में – जब दो समीपवर्ती वर्णों या अ़क्षरों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है। वह संधि कहलाता है।

जैसे-

  1. हिमालय शब्द“हिम+ आलय “से मिलकर बना है। अर्थात यहॉ हिम के अिंतम वर्ण आ की संधि “अ+आ” हुई है। और इस प्रकार हिमालय शब्द बना।
  2. परोपकार शब्द” पर+ उपकार” से मिलकर बना है अर्थात यहॉ पर के अंतिम वर्ण ‘अ‘ की संधि” ऐ+अ” हुई है।और परोपकार शब्द बना
  3. गायक शब्द” गै+ अक” से मिलकर बना है। अर्थात यहॉ “गै “के अंतिम वर्ण “ऐ” के साथ ’अक’ के प्रथम वर्ण अ की संधि “ऐ+ अ” हुई है। और गायक शब्द बना।
  4. गणेश शब्द “गण +ईश” से मिलकर बना है। अर्थात यहॉ गण के अंतिम वर्ण “अ” के साथ ईश के प्रथम वर्ण” ई” की संधि “अ+ई” हुई है।

नोट:-

  • संधि के लिए दोनों वर्णों का निकट होना आवश्यक है। क्योंकि दूरवर्ती शब्दों या वर्णों में संधि नहीं हो सकती है।
  • संधि करने के लिए दोनों शब्द एक ही भाषा का होना चाहिए।
  • आजकल सुविधा के लिए पंचमाक्षर के स्थान पर प्रायः अनुस्वार का ही प्रयोग किया जाता है।

संधि विच्छेद:-

संधि दो ध्वनियों के परस्पर मेल का परिणाम है। यदि संधि की प्रकिया को उलट दें अर्थात दो ध्वनियॉ के मेल से बनी ध्वनि को तोडकर उसे संधि से पहले की मूल स्थिति में ले आएॅ तो इसे संधि विच्छेद कहते है।

उदहारण के लिए

यदि सत् व मार्ग के मेल से बने – सन्मार्ग शब्द उसे -सत+मार्ग की मूल स्थिति में लाया जाता है। तो यह संधि विच्छेद का उदहारण होगा।

संधि विच्छेद किसे कहते है।

संधि किए हुए शब्द को अलग-अलग मूल रूप में लिखने को संधि विच्छेद कहते है।

सरल शब्दों में -संधियुक्त शब्दों को अलग- अलग करना संधि विच्छेद कहलाता है।

उदहारण के लिए

  • वृक्षारोपण -वृक्ष+ रोपण
  • देव्यालय –देवी+आलय
  • सूर्योदय —सूर्य+उदय
  • अधिकांश– अधिक+अंश
  • प्रत्यंग – प्रति+अंग

याद रखने योग्य बातें

  1. संधि सदैव दो वर्णों के मेल से होती है। शब्दों के मेल से नहीं।
  2. संधि केवल तत्सम शब्दों में ही होती है। जैसे -विद्या+आलय -विद्यालय।
  3. संधि सजातीय और विजातीय दोनों प्रकार के वर्णों में हो सकती है।

जैसे-

  • स्वर+स्वर
  • स्वर+   व्यंजन
  • व्यंजन+ व्यंजन

संधि के भेद

संधि के प्रमुख तीन भेद है।

  1. स्वर संधि (100) -स्वरों का मेल
  2. व्यंजन संधि (80)- व्यंजन और स्वर/व्यंजन का मेल
  3. विसर्ग संधि (60)- विसर्ग और स्वर/व्यंजन का मेल

स्वर संधि

दो स्वरों के परस्पर मेल होने से एक स्वर अथवा दोनों स्वरों में होने वाला परिवर्तन स्वर संधि कहलाता है।

सरल शब्दों में-अ से अः तक से सम्बंधित संधि को स्वर कहते है।

उदहारण के लिए

  • राम+अवज्ञा- रामवज्ञा – (अ+अ)-आ
  • राम+अवतार- रामवतार-(अ+अ)
  • नील+आकाश-नीलाआकाश – (अ-आ)-आ
  • नगर +धीश-नगराधीश -(अ+आ) -आ
  • हरि+ईश -हरिश- (इ+ई)-ई
  • शची+इंद्र-शचींद्र- (ई+इ)-ई
  • रजनी+ईश-रजनीश- (ई+ई)-ई
  • महा+ईश-महेश-(आ+ई)-ए
  • सु+आगत-स्वागत(उ+आ)-वा
  • महा+उत्सव -महोत्सव
  • नि+उन -न्यून
  • सप्त+ऋषि- सप्तर्षि
  • अनु+इति – अन्विति
  • मातृ+ आज्ञा- मात्राज्ञा

स्वर संधि के भेद-

स्वर संधि के पॉच भेद है।

  1. दीर्घ संधि-(बडी मात्रा आ,ई,ऊ)
  2. गुण संधि(-ऐ या ओ की एक मात्रा)
  3. वृ़द्ध संधि-(एैया औ की दो मात्रा)
  4. यण संधि-(य, र, ल, व आधा शब्द आए)
  5. अयादि संधि-(य,व से पहले पूरा वर्ण आए)

दीर्घ संधि

जब हस्व अथवा दीर्घ स्वरदअ’इ’उ केबाद क्रमश: हस्व या दीर्घ अ’इ’उ, हों तो दोनों स्थान पर दीर्घ स्वर आ,ई,ऊ हो जाते है।
सरल शब्दों में— जब हस्व अ/इ/उ अथवा दीर्घ आ/ई/ऊ स्वरों के बाद हस्व या दीर्घ समान स्वर आते है। तो दोनों मिलकर दीर्घ हो जाते हैं और क्रमश: आ/ई/ऊ में बदल जाते है। इसे दीर्घ संधि कहते है।

जैसे

  • नदी+ईश——नदीश
  • अति+इव——अतीव

नियम —1

अ+अ—आ

  1. कृष्ण+ अवतार—कृष्णावतार
  2. मत+अनुसार —मतानुसार
  3. पर+आधीन —पराधीन
  4. परम+अणु—परमाणु
  5. स्व+अर्थ—सवार्थ्
  6. शरण+अर्थी—शरणार्थी

नियम —2

अ+आ —आ

  1. हिम+आलय—हिमालय
  2. न्याय+आलय—न्यायालय
  3. शरण+आगत—शरणागत
  4. स+आनंद —सानंद

नियम —3

आ+अ —आ

  1. दीक्षा+ अंत दींक्षात
  2. शिक्षा+अर्थी — ​शिक्षार्थी
  3. सीमा+अंत— सीमांत
  4. यथा+अर्थ— यथार्थ
  5. रेखा+अंकित— रेखांकित
  6. शिव+आलय— शिवालय

नियम —4

आ+आ—आ

  • दिवा+आकर —दिवाकर
  • दया+आनंद—दयानंद
  • वार्ता आलाप—वार्तालाप
  • महा +आशय— महाशय

नियम —5

इ+इ—ई

  • कवि+इंद्र —कवींद्र
  • अति+इव—अतीव
  • अभि+इष्ट —अभीष्ट
  • रवि+इच्छा—रवीच्छा
  • मुनि+इंद्र— मुनींद्र
  • हरि+इच्छा हरीच्छा
  • मुनि+ईश्वर—मुनीश्वर

नियम —6

इ+ई—ई

  • प्रति+ईशा—प्रतीक्षा
  • परी+ईशा—परीक्षा
  • हरि+ईश— हरीश
  • गिरि+ईश— गिरीश
  • कपि+ईश—कपीश
  • मुनि+ईश—मुनीश

नियम —7

ई+इ—ई

  • शची+इंद्र —शचीद्रं
  • पत्नी+इच्छा—पत्नीइच्छा
  • मही+इंद्र— महींद्र
  • सती+इच्छा—सतीच्छा
  • योगी + इंद्र— योगींद्र
  • नारी+ इच्छा— नारीच्छा

नियम —8

ई+ई— ई

  • जानकी+ईश — जानकीश
  • रजनी+ईश— रजनीश
  • सती+ईश— सतीश
  • नदी+ईश —नदीश

नियम —10

उ+उ— उ

  • सु +उक्ति —— सूक्ति
  • लघु +उत्तर— लघूत्तर
  • गुरू+ उपदेश —गुरूपदेश
  • बहु + उद्देश्य —बहुद्देश्य

नियम —11

उ+ऊ—ऊ

  • सिंधु+उर्मि— सिंधूर्मि
  • विधु+उर्जा—विधूजा
  • लघु+उर्मि— लघूर्मि
  • मधु+उष्मा— मधूष्मा

नियम —12

ऊ+ ऊ—— ऊ

  • भू+ ऊर्जा—— भूर्जा
  • वधू+ ऊर्मि—— वधूर्मि
  • भू+ ऊधर्व—— भूधर्व 

नियम —13

ऊ+उ – ऊ

  • वधू + उत्सव—वधूत्सव
  • भू+ उत्सर्ग— भूत्सर्ग
  • भू+उद्वार— भ़ूद्धार

पहचान करने का तरीका

ट्रिक —1

  • —दीर्घ का अर्थ होता है। —बडा—(मतलब बडी मात्रा का होना।)
  • दीर्घ संधि में (आ’ई’ू) की मात्रा वाक्य के बीच में देखनी पडती है।

उदहारण के लिए
मुख्याध्यापक,हरीश ,भानूदय आदि।

  • मुख्याध्यापक में’या’ —शब्द के बीच में बडी ‘आ’की मात्रा का प्रयोग किया है।
  • हरीश में ‘री’ — में बीच में बडी’ई’ की मात्रा का प्रयोग किया है।
  • भानूदय में नू — में बीच में बडी ‘ू’ की मात्रा का प्रयोग किया गया है।

सरल शब्दों में —”आ’ई’ू” की मात्रा वाक्य के बीच में देखनी है।

 ट्रिक —2

  • अ,आ की मात्रा प्रथम में हो ।
  • इ,ई की मात्रा द्वितीय में हो ।
  • ए,ऐ,ओ,औ’ की मात्रा तृतीया में हो इस ट्रिक के द्वारा हम दीर्घ संधि की पहचान का सकते है।

गुण संधि —

जब शब्द का गुण तथा उसके स्वर का रूप बढ़ जाता है। तो उसे गुण संधि कहते है।

सरल शब्दों में —अ/आ स्वरों के बाद हस्व/दीर्घ ‘इ ‘उ’ या ‘ऋ’ हो तो दोनों के स्थान पर क्रमश: ‘ए”ओ ‘तथा ‘अर्’ हो जाता है।

दूसरें शब्दों में—जब अ/आ स्वरों के बाद इ/ई आने पर उ/उ आने पर ‘ओ तथा ऋ’ आने पर अर्” जाता है। तो वहॉ गुण संधि कहलाती है।

यहॉ हम गुण संधि को कुछ उदहारण और नियम के द्वारा समझ सकते है।

नियम —1

गुण संधि में ‘अ+इ—ए’ बन जाता है।

  • स्व+इच्छा— स्वेच्छा
  • नर+इंद्र—नरेंद्र
  • योग+इंद्र— योगेंद्र
  • वीर+इंद्र—वीरेंद्र

नियम —2

‘अ+ई—ए’ बन जाता है।

  • सोम+ईश —सोमेश
  • गण+ईश—गणेश
  • दिन+ईश—दिनेश
  • सुर+ईश—सुरेश

नियम —3

आ+इ—ए बन जाता है।

  • यथा+इष्ट—यथेष्ट
  • महा+इंद्र—महेंद्र
  • रमा+इंद्र रमेंद्र
  • राजा+इंद्र—राजेंद्र

नियम—4

आ+ई—ए” बन जाता है।

  • रमा+ईश —रमेश
  • लंका+ईश —लकेंश
  • उमा+ईश —उमेश
  • महा+ईश्वर—महेश्वर

 

नियम —5

अ+उ—ओ” बन जाता है।

  • वीर+उचित—वीरोचित
  • लोक+उक्ति— लोकोक्ति
  • सर्व+उत्तम— सर्वोतम
  • हित+उपदेश ​—हितोपदेश
  • भाग्य+उदय—भाग्योदय
  • पर+उपकार—परोपकार

नियम—6

अ+ऊ— ओ”

  • नव+ऊढा—नवोढा
  • सागर +ऊर्मि—सागरोर्मि
  • सूर्य+ऊर्जा— सूर्योर्जा?
  • भाव+ऊर्मि—भावेर्मि

नियम—7

आ+उ—ओ

  • महा+उत्सव— महोत्सव
  • महा+उदय—महोदय
  • गंगा+उदक—गंगोदक
  • महा+उदय—महोदय

नियम—8

आ+ऊ—ओ

  • गंगा+ऊर्मि—गंगोर्मि
  • दिवा+ऊष्मा—दिवोष्मा
  • यमुना+ऊर्मि—यमुनोर्मि
  • सरिता+ऊर्मि—सरितोर्मि

नियम—9

अ+ऋ— अर्

  • देव+ऋषि— देवर्षि
  • ब्रहम्+ऋषि—ब्रहमर्षि
  • सप्त+ऋर्षि— सप्तऋर्षि

नियम—10

आ+ऋ— अर्

  • महा+ऋर्षि—महार्षि
  • राजा+ऋर्षि— राजर्षि
  • वर्षा+ऋतु—वर्षार्तु

पहचान करने का तरीका

—ट्रिक—

  • केवल ‘ऐ और ओ’ की एक ही मात्रा का प्रयोग किया जाता है।े
  • और ो की मात्रा बीच में देखनी है। और
  • र्र की मात्रा का प्रयोग किया जाता है।

वृद्वि संधि —

जहॉं पर दो वर्णों के मिलने से कोई नया वर्ण बनता है। वहॉं विसर्ग संधि होती है।

सरल शब्दों में—यदि अ/आ के बाद ए या ऐ हो तो दोनों के स्थान पर ऐ’,ओ,या औ,हो तो दोनों के स्थान पर औ हो जाता है,जैसे
एकैक,महौज सदैव,हितौषि आदि।

विशेष

  • जिसमें एै,औ की दो—दो मात्रा लगी हो उसे वृद्वि संधि कहते है।
  • अ/आ के बाद ए/ऐ हो तो दोनों मिलकर ऐ हो जाते है।

नियम—1

अ+ए—ऐ

  • एक+एक— एकैक
  • लोक+एषणा—लोकेषणा
  • जीव+एषणा—जीवैषणा

नियम —2

आ+ए —ऐ

  • सदा+एव—सदैव
  • तथा+एव—तथैव
  • यथा+एव—यथैव

नियम—3

अ+ऐ— ऐ

  • मत+ऐक्य —मतैक्य
  • राज+ऐश्वर्य—राजैश्वर्य
  • देव+ऐश्वर्य—देवैश्वर्य

नियम —4

आ+ऐ —ऐ

  • राजा+ऐश्वर्य— राजैश्वर्य
  • माता+ऐश्वर्य—मातैश्वर्य
  • महा+ऐश्वर्य—महैश्वर्य

नियम—5

अ+ओ—औ

  • परम+ओज—परमौज
  • जल+ओेघ—जलौघ
  • दंत+ओष्ट— दंतौष्ट

नियम—6

अ+औ—औ

  • वीर+औदार्य— वीरौदार्य
  • वन+औषध— वनौषध
  • देव+औषधि— देवौषधि

नियम—7

आ+ओ—औ

  • महा+ओजस्वी— महौजस्वी
  • महा+ओषधि—महौषधि
  • महा+ ओज—महौज

नियम—8

आ+औ—औ

  • महा+औदार्य —महौदार्य
  • महा+औत्सुक्य—महौत्सुक्य
  • महा+औषध—महौषध

यण संधि

यदि इ,ई,उ,उ,ऋ के बाद कोई अन्य स्वर आ जाए, तो इ,ई के स्थान पर य,उ,उ के स्थान पर व तथा ऋ के स्थान पर र् हो जाता है। तो वह यण संधि कहलाती है।

दूसरे शब्दों में— इ/ई/उ/उ तथा ऋ के बाद इनसे भिन्न् कोई स्वर आता है। तो इसके स्थान पर य,र,व हो जाता है। तो वह ऋण संधि कहलाती है।

सरल शब्दों में — य,र,व के पहले आधा शब्द आए तो वहॉ यण संधि आती है।

उदहारण के लिए

  • इत्यादि, प्रत्येक, स्वागतम, देव्यपूर्ण आदि।

यण संधि को कुछ नियम  के द्वारा समझते है।

नियम —1

इ+अ — य

  • यदि+ अपि—यद्यपि
  • अति+अल्प —अत्यल्प
  • अति+ अधिक —अत्यधिक
  • अति+अंत—अत्यंत

नियम—2

इ+आ—या

  • वि+आकुल—​व्याकुल
  • वि+आपक—व्यापक
  • अति+आवश्यक—अत्यावश्यक
  • इति+आदि—इत्यादि

नियम—3

ई+अ—य

  • वाणी+अर्पण—वाण्यर्पण
  • देवी+अर्पण—देव्यपर्ण
  • नदी+अर्पण—नद्यर्पण

नियम—4

  • ई+आ—या
  • देवी+अराधना—देव्याराधना
  • नदी+आगमन—नद्यागमन
  • देवी+आलय—देव्यालय
  • सखी+आगमन—सख्यागमन

नियम—5

इ+उ—यु

  • अभि+उदय—अभ्युदय
  • उपरि+उक्त—उपर्युक्त
  • अति+उतम—अत्युत्तम

नियम—6

इ+ऊ—यू

  • वि+ऊह—व्यूह
  • नि+ऊन—न्यून
  • प्रति+ऊष—प्रत्यूष

नियम—7
इ+ए—ये

  • प्रति+एक—प्रत्येक
  • अधि+एता—अध्येता
  • अधि+एषण—अध्येषणा

नियम—8

इ+ऐ— यै

  • देवी+ ऐश्वर्य— देव्यैश्वर्य
  • नदी+ ऐश्वर्य—नद्यैश्वर्य
  • सखी+ ऐश्वर्य—सख्यैश्वर्य

नियम —9

उ+अ—व

  • अनु+अय— अन्वय
  • सु+अल्प—स्वल्प
  • मधु+अरि—मध्वरि

नियम —10

उ+आ—वा

  • सु+आगतम—स्वागतम
  • मधु+आलय—मध्वालय
  • गुरू+आदेश—गुर्वादेश

नियम —11

ऊ+आ—वा

  • वधू+आदेश —वध्वादेश
  • वधू+आज्ञा— वध्वाज्ञा
  • मेरू+आरोही—मेर्वारोही

नियम—12

उ+इ—वि

  • अति+इति— अन्विति
  • अनु+इत—अन्वित
  • अनु+इच्छा—अन्विच्छा

नियम—13

उ+ई—वि

  • अनु+ईक्षण—अन्वीक्षण
  • अनू+ ईक्षक— अन्वीक्षक
  • अनु+ईषा— अन्वीषा

नियम—14

उ+ए—वे

  • अनु+एषण—अन्वेषण
  • अनु+ऐषक—अन्वेषक
  • प्रभु+एषणा— प्रभ्वेषण

नियम—15

ऋ+ अ—र्

  • पितृ+ अनुमति— पित्रनुमति
  • मातृ+अंश—मात्रंश
  • पितृ+अर्थम— पित्रर्थम्

नियम—16

ऋ+आ— रा

  • पितृ+आज्ञा—पित्राज्ञा
  • मातृ+आदेश—मात्रादेश
  • मातृ+आनंद— मात्रानंद

नियम—17

ऋ+उ— रू

  • पितृ+उपदेश— पित्रुपदेश
  • मातृ+ उपदेश— मात्रपदेश

अयादि संधि

यदि ए,ऐ,ओ,औ,के बाद कोई अन्य स्वर आ जाए,तो ए के स्थान पर अय’ ऐ के स्थान पर आय ओ के स्थान पर अव् तथा औ ​के स्थान पर आव् हो जाता है। उसे अयादि संधि कहते है।

दूसरें शब्दों में— जब ए/ऐ तथा ओ/औ के बाद भिन्न् स्वर आने पर क्रमश: अय,आय,अव,तथा आव हो जाता है। तो वहॉ अयादि संधि होती है।

सरल शब्दों में — य,व से पहले पूरा वर्ण हो तो अयादि संधि होती है।

उदहारण के लिए——-पवन, गायक,भावना आदि अयादि संधि के उदहारण है।

अयादि संधि को कुछ नियम  के द्वारा समझते है।

नियम —1

ए+अ— अय्

  • ने+अन— नयन
  • चे+अन— चयन
  • शे+अन— शयन

नियम—2

ऐ+अ— आय्

  • गै+अक— गायक
  • नै+अक—नायक
  • गै+अन—गायन

नियम—3

ओ+अ— अव

  • हो+अन— हवन
  • पो+अन—पवन
  • भो+अन—भवन

नियम—4

औ+अ—आव्

  • पौ+अन—पावन
  • पौ+अक—पावक
  • रो+अण— रावण

नियम —5

ओ+ई—अवि

  • पो+इत्र— पवित्र
  • भो+इष्य — भविष्य

नियम —6
औ+इ— आवि

  • नौ+इक—नाविक

नियम—7
औ+उ— आवु

  • भौ+उक—भावुक

पहचान करने की ट्रिक

  • अय,आय,अव,आव,बनने पर अयादि संधि हो जाती है। और ऐ,एै,ओ,औ की मात्रा आने पर अयादि संधि होती है।
  • अधिकतर शब्द तीन अक्षर के होते है।
    जैसे— गायक,पावन,शयन, भवन,पावन आदि है।

व्यंजन संधि

जब एक व्यंजन दूसरे व्यंजन से मिलता है। और शब्दों में परिवर्तन आता है। उसे व्यंजन संधि कहते है।

अन्य शब्दों में —किसी व्यंजन के बाद कोई स्वर अथवा व्यंजन आने पर जो परिवर्तन होता है। वह व्यंजन संधि कहते है।

सरल शब्दों में—— किसी भी व्यंजन से स्वर और व्यंजन का,और व्यंजन का व्यंजन से मेल होने पर उसमें जो परिवर्तन होता है। उसे व्यंजन संधि कहते है।
जैसे—

  • जगत्+ अंबा— जगदंबा ——(त्+अ—द)——व्यंजन+ स्वर
  • सत्+भावना— सद्भावना—— (त्+भ्—द्भ)——व्यंजन+—व्यंजन
  • अनु+छेद——अनुच्छेद———(उ+छ— च्छ)— स्वर+—व्यंजन

व्यंजन संधि के प्रकार

व्यंजन संधि में होने वाला मेल तीन प्रकार का है।

व्यंजन और स्वर का मेल

  • जगत्+ईश— जगदीश——— त्+ई——दी —व्यंजन’त्’+ स्वर ‘ई’
  • वाक्+ ईश—— वागीश— ——क्+ई गी—— व्यंजन’क्’+ स्वर ‘ई’

स्वर और व्यंजन का मेल

  • आ+ छादन —आच्छादान आ+छ——च्छ —स्वर’आ’+ व्यंजन ‘छ’
  • स्व+छंद— स्वच्छंद ———— अ+छ——— च्छ——स्वर’अ’+व्यंजन’छ’

व्यंजन और व्यंजन का मेल

  • सम् +गत—— संगत ——म्+ग म्ग् ——व्यंजन’म’+व्यंजन’ग’
  • सत्+जन——सज्ज्न— त्+ज्——ज्ज् ———व्यंजन”त+व्यंजन’ज’

व्यंजन संधि के प्रमुख नियम

व्यजंन संधि बनाने के कुछ नियम इस प्रकार है।

नियम—1—— वर्ग के प्रथम वर्ण का उसी वर्ण के तीसरे वर्ण में परिवर्तन का नियम

वर्ग के पहले व्यंजन अर्थात क,च,ट,त,प के बाद यदि कोई स्वर वर्ग का तीसरा या चौथा व्यंजन ग/घ्,ज/झ,ड/ढ,तथा ब्/भ अथवा य,र,ल,व,ह आए तो वर्ग का पहला व्यंजन अपने ही वर्ग के तीसरे व्यंजन
(क——ग)
(च——ज)
(ट——ड)
(त——द,)तथा
(प——ब) में बदल जाता है।

उदहारण के लिए

क् का ग होना

  • दिक+विजय— दिग्विजय
  • वाक्+जाल — वाग्जाल
  • वाक्+ईश— वागीश
  • वाक्+दत्त— वाग्दत्त
  • दिक्+अंबर— दिगंबर
  • दिक्+अंत— दिगंत

च का ज होना

  • अच्+ अंता —अजंता
  • अच्+ आदि—— अजादि

ट का ड होना

  • षट्+ आनन—— षडानन
  • षट्+ दर्शन—— षड्दर्शन

त का द होना

  • तत्+ भव —— तद्भव
  • सत+धर्म— सद्धर्म
  • उत्+हार —— उद्धार

प का ब होना

  • अप्+ ज—— अब्ज्

नियम—2—— वर्ग के पहले व्यंजन का पॉंचवे व्यंजन में परिवर्तन

वर्ग के पहले व्यंजन के बाद यदि कोई नासिक्य व्यंजन आता है। तो पहला व्यंजन अपने ही वर्ग के नासिक्य व्यंजन ड,ञ,ण, म में बदल जाता है।

उदहारण के लि
क का ड होना

  • वाक+मय—— वाड;मय
  • दिक+नाद—— दिड्नाद

ट् का ण् होना

  • षट्+मास—— षण्मास
  • षट+ मुख — षण्मुख

त का न होना

  • उत्+मत्त्— उन्मत्त
  • सत+ मार्ग — सन्मार्ग
  • सत+मति—— सन्मति
  • जगत्+नाथ—— जगन्नथ

नियम —3 त संबंधी विशेष नियम

क—त् व्यंजन के बाद यदि च/छ हों तो त् का च् हो जाता है।

  • सत+चरित्र— सच्चरित्र
  • उत् +चारण— उच्चारण
  • तत्+ छाया— तच्छाया

जब त् के बाद ज या झ आए तो त् का ज हो जाता है।

  • जगत+जननी— जगज्जननी
  • तत्+ जनित—— तज्जनित
  • उत्+झटिका—— उज्झटिका
  • तत्+ टीका—— तट्टीय
  • वृहत+ टीका — वृहट्टीका

जब त् के बाद ड या ढ आए तो त् का ड् हो जाता है।

  • उत्+डयन — उड्डयन
  • तत्+डमरू—— तड्डमरू

जब त् के बाद ल आए तो त् का ल् हो जाता है।

  • उत्+लेख— उल्लेख
  • तत्+ लीन— तल्लीन
  • उत्+लास — उल्लास

जब त् के बाद ह आए तो त् का द और ह का ध हो जाता है।

  • उत+ हत— उद्धत
  • उत+हरण —उद्धरण
  • उत्+हार— उद्धार

तब त के बाद श आए तो त् का च,और श् का छ् हो जाता है। जैसे;—

  • सत्+शास्त्र—— सच्छ़ास्त्र
  • उत्+श्वास— उच्छवास
  • उत्+ शिष्ट— उच्छिष्ट

घ.— ‘म’ संबंधी नियम
यदि म के बाद क,च,ट,त,प आए तो म् के स्थान पर उसी वर्ग का पॉंचवा वर्ण अनुसार ( ं )
हो जाता है।
—— म का ड्.

  • सम्+गति— संगति
  • सम् +कल्प— सकंल्प
  • सम्+गम— संगम
  • सम्+चय———संचय
  • सम्+जय— संजय

म+का न्

  • सम+तोष—— संतोष
  • सम्+ देह—— संदेह
  • सम्+ध्या———संध्या

म् का म्

  • सम्+ पूर्ण—— संपूर्ण
  • सम्+भावना—— संभावना
  • सम्+ भाषण —— संभाषण

यदि म् के बाद य,र, ल,व, श,ष,स,ह आए तो म् का सदैव अनुस्वार ( ं ) ही हो जाता है।

  • सम्+रक्षक——संरक्षक
  • सम्+ हार—— संहार
  • सम्+ स्मरण——संस्मरण

म् का अनुस्वार

  • सम्+ वाद———— संवाद
  • सम्+सार————— संसार
  • सम्+ रक्षण—— संरक्षण
  • सम्+ योग —— संयोग
  • सम्+लग्न ————संलग्न
  • सम्+ शय——— संशय

‘छ’ संबंधी नियम

जब किसी स्वर के बाद ‘छ’ वर्ण आए तो ‘छ’ से पहले च् आ जाता है। जैसे——

  • परि+छेद—— परिच्छेद
  • अनु+छेद—— अनुच्छेद
  • वि+छेद—— विच्छेद
  • तरू+छाया—— तरूच्छाया
  • स्व+छंद———— स्वच्छंद
  • आ+छादन——— आच्छादान

न का ण में परिवर्तन
यदि ऋ (स्वर) ‘र/ष (व्यंजन)के बाद किसी शब्द में किसी भी स्थान पर ‘न्’व्यंजन आता है।
तो वह ण् में बदल जाता है। जैसे

  • परि+ मान—— परिमाण
  • पूर्+न ——— पूर्ण
  • राम+ अयन——— रामायण
  • भूष+ अन——— भूषण
  • प्र+ मान—— प्रमाण
  • हर+ न —— हरण
  • ऋ+न —— ऋण
  • परि+ नाम—— परिणाम

—–यह नियम उस समय लागू नहीं होता जब ‘ऋ,’र, और ष् के बाद तथा ‘न्’ के बीच ‘च —वर्ग ‘ट—वर्ग ,त—वर्ग का कोई व्यंजन या श्/स् व्यंजन आ रहा हो जैसे ——
अर्जुन, दर्शन,अर्चना,रतन,पर्यटन आदि।

स का ष में परिवर्तन—–
यदि ‘स’ से पहले अ/आ के अलावा कोई भी स्वर आ जाता है तो स् का परिवर्तन ष् में हो जाता है।

  • अभि+सेक—— अभिषेक
  • + सुप्ति—— सुषुप्ति
  • वि+ सम—— विषम
  • नि+सिद्ध— निषिद्ध

अनुस्वार संबंधी संधि नियम

अनुस्वार का उच्चारण उसी व्यंजन के वर्ग के नासिक्य के रूप में किया जाता है। अर्थात क—वर्ग के व्यंजन के पहले अनुस्वार का उच्चारण ड़ के रूप में च—वर्ग के व्यंजनों के पहले ञ के रूप में ट—वर्ग के व्यंजनों के पहले ण् के रूप में त्— वर्ग के व्यंजनों के पहले ‘न’ के रूप में तथा प— वर्ग के व्यंजनों के पहले म् के रूप में किया जाता है। संस्कृत में इसे इसलिए पंचम वर्ग से लिखा जाता है। जैसे——

  • सं/सम्+ गीत —— संड़्गीत/संगीत
  • सं/सम्+पत्ति् ——— सम्पत्ति/संपत्ति्

विशेष

  1. शब्द के अंत में अनुस्वार हमेशा ‘म्’ व्यंजन के रूप में बोला जाता है। अत:
  2. अनुस्वार को बिंदु तथा ‘म’ से (सं/सम्) दोनों तरह से लिखकर दिखाया जा सकता है। —
  3.  अनुस्वार का उच्चरण चाहे किसी भी नासिक्य व्यंजन से हो उसे बिंदु से ही लिखे जाने का प्रावधान है। जैसे—— संगीत,संकट,संयम,संडास,संचय, संरचना,संलाप, संवाद, आदि।
  4. अनुस्वार के बाद यदि’म’ व्यंजन आता है। तो म व्यंजन द्वित्व हो जाता है। जैसे—
  • सं/सम्+ मोहन—— सम्मोहन
  • सं/सम्+मुख—— सम्मुख
  • सं/सम्+मान—— सम्मान
  • सं/सम्+मिलित—— सम्मिलित

3.विसर्ग संधि:-

जहॉं पर शब्दों को जोडने से विसर्ग का ‘र’ बन जाता है या फिर उसका कोई और रूप बनता है। उसे विसर्ग संधि कहते है।

सरल शब्दों में—— विसर्ग के बाद स्वर और व्यंजन आने से जो परिवर्तन होता है। उसे विसर्ग संधि कहते है।
जैसे :—

  • नि+मुल—— निर्मूल
  • दु:+उपयोग—— दुरूप्रयोग
  • पुन:+वास—— पुर्नवास
  • नि+भय—— निर्भय
  • नि:+आशा— निराशा

विसर्ग संधि के नियम —

1—— विसर्ग का श,ष,स में परिवर्तन
यदि विसर्ग के बाद च/छ व्यंजन आते हों तो विसर्ग का ‘श’ में ट्/ठ् व्यंजन हों तो ष में तथा त/थ व्यंजन हों तो में परिवर्तन हो जाता है।
उदहारण के लिए

  • नि:+चल—— निश्चल
  • नि:+छल—— निश्छल\
  • मन:+ ताप —— मनस्ताप
  • नि:+तार——— निस्तार
  • नम:+ ते—— नमस्ते
  • नि:+ चय—— निश्चय
  • धनु:+टंकार——— धनुष्टांर
  • नि:+फल——— निष्फल

2———विसर्ग में कोई परिवर्तन न होना

यदि विसर्ग से पहले अ/आ के अलावा कोई भी स्वर आए और बाद में श,ष,स में से कोई व्यंजन आए तो विसर्ग या तो यथावत बना रहता है। या अपने आगे वाले व्यंजन में बदल जाता है।
उदहारण के लिए

  •  नि:+ सकोंच—— नि:सकोंच/निरस्संकोच
  • नि:+सदेह—— नि:सदेंह/निस्संदेह
  • दु:+साहस—— दु:साहस/दुस्साहस
  • नि:++संग—— नि:संग/निस्संग
  • नि:+संतान—— नि:+संग/निस्संतान

4—— यदि विसर्ग के बाद क/ख या प/फ् व्यंजन आते है। तो विसर्ग में कोई परिवर्तन नही होता है। जैसे:—

  • रज:+कण——— रज:कण
  • प्रात:+काल——— प्रात:काल
  • अत:+करण—— अतं:करण
  • पय:+पान——— पय:पान

अपवाद—1:— नम:+कार—— नमस्कार
अपवाद—2:— पुर:+कार—— पुरस्कार

5— यदि विसर्ग से पहले इ अथवा उ स्वर और बाद में क,ख,ट,उ,प,फ हो तो विसर्ग का ष् हो जाता है। जैसे

  • दु:+ परिणाम—— दुष्परिणाम
  • धनु:+टंकार —— धनुष्टंकार
  • नि:+ पाप——— निष्पाप
  • दु:+कर्म ——— दुष्कर्म
  • नि:+फल——— निष्फल
  • नि:+ काम—— निष्काम
  • नि:+प्राण——— निष्प्राण
  • चतु:+पद——— चतुष्पद
  • नि:+ठुर———— निष्ठुर
  • नि:+कलंक—— निष्कंलक
  • दु:+प्रकृति——— दुष्प्रकृति

6———यदि विसर्ग से पहले अ और बाद में भी अ आए या किसी वर्ग के तीसरे ,चौथे,और पॉंचवें वर्ण में से कोई वर्ण अथवा य,र,ल,व,ह में से कोई भी व्यंजन आए तो विसर्ग का ओ हो जाता है।
उदहारण के लिए

  • विसर्ग+ग——— तम:+गुण— तमोगुण ,,रज:+गुण —— रजोगुण
  • विसर्ग+ब——— मन:+बल—— मनोबल ,, तप+ बल —— तपोबल
  • विसर्ग+ध——— पय:+धर—— पयोधर
  • विसर्ग+द——— यश:+दा———यशोदा
  • विसर्ग+भ——— अध+भाग ——अधोभाग
  • विसर्ग+र——— मन:+रजन—— मनोरंजन
  • विसर्ग+व——— मनो:+विनोद—— मनोविनोद
  • विसर्ग+य——— मन:+योग——— मनोयोग

अपवाद:—— पुन: एव अंत में विसर्ग ​का र् हो जाता है।

  • पुन:+मुद्रण—— पुनमुद्र्ण
  • पुन:+जन्म—— पुनर्जन्म
  • अंत:+धान—— अंतर्धान
  • अंत:+अग्नि—— अंतरग्नि

7——— विसर्ग का र में परिवर्तन हो जाता है।

विसर्ग से पहले यदि अ/आ स्वर के अलावा कोई भी स्वर हो और बाद में कोई भी स्वर या वर्ग का तीसरा, चौथा, पॉंचवॉं व्यंजन अथवा य,र,ल,व,ह में से कोई भी व्यंजन आए तो विसर्ग का परिवर्तन ‘र’ में हो जाता है।
 उदहारण के लिए

  • दु:+वासना—— दुर्वासना
  • अंत+गत——— अंतर्गत
  • नि:+यात—— निर्यात
  • नि:+विघ्न—— निर्विघ्न
  • नि:+भय—— निर्भय
  • दु:+लभ—— दुर्लभ
  • नि:+धन—— निर्धन
  • नि:+मल—— निर्मल

8——विसर्ग का लोप तथा पूर्व स्वर दीर्घ
​विसर्ग से पहले यदि अ/आ स्वर के अलावा कोई भी स्वर हो और बाद में ‘र’व्यंजन आ रहा हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है। तथा उसके पहले आने वाला स्वर दीर्घ हो जाता है।
उदहारण के लिए

  • नि:+रस—— नीरस
  • नि:+रव—— नीरव
  • नि:+रोग—— नीरोग
  • नि:+रज—— नीरज

विशेष:——

  • यदि विसर्ग के बाद च,छ अथवा श आए तो विसर्ग का श् हो जाता है।
  • यदि विसर्ग के बाद त,थ अथवा स व्यंजन आए तो विसर्ग का स् हो जाता है।

हिंदी की प्रमुख संधियॉं

हिंदी में संधि के अपने कोई नियम नहीं है। लेकिन हिंदी में संस्कृत की संधि के नियम ही लागू होते है। फिर भी बोलते समय प्रवाह कुछ संधियॉं होते है। जिनके लिए विद्ववानों ने कुछ नियम विकसित किए है। जो इस प्रकार है।

1.स्वर का होना आ का अ हो जाना

  • कान+कटा—— ——कनकटा
  • ठाकुर+आइन——— ठकुराइन
  • लडका+पन—— ———लड़कपन
  • हाथ+कड़ी—— ————हथकड़ी
  • फूल+वाडी ——————फुलवाडी
  • आधा+खिला—————— अधफिला

2. स्वर का लोप

  • पानी+ घट—— पनघट
  • बकरा+ईद—— बकरीद
  • कटोरा+दान—— कटोरदान

3.व्यंजन का लोप होना

  • उस +ही——— उसी
  • सह +ही ——सही
  • इस+ही—— इसी

4.प्रत्यय के योग से संधि होना

  • ऊपर+उक्त——उपरोक्त
  • लुट+एरा———लुटेरा
  • लोहा+आर— लुहार
  • सोना+आर—— सुहार

5. हस्व स्वर का दीर्घ होना तथा किसी पद का लोप भी होना

  • दीन+नाथ——— दीनानाथ
  • मूसल+धार——— मूसलाधार
  • उत्तर+खंड——— उत्तराखंड

6.इ/ई के स्थान पर ‘इय’ हो जाता है।

  • शक्ति +आॅं—— शक्तियॉं
  • देवी+आॅं——— देवियॉं

7. ह का म
जब,कब,तब,सब,आदि शब्दों के पीछे ही आने पर ‘ही’ के ह का म हो जाता है।

  • जब +ही—— जभी
  • कब+ही——— कभी
  • तब+ही ———तभी
  • सब+ ही —— सभी

8.’ह’ का लोप
कभी— कभी कुछ शब्दों की संधि होने पर किसी एक ध्वनि का लोप हो जाता है,
जैसे ‘ही’ में ह् में का लोप हो जाता है। जैसे——

  • यह + ही—— यही
  • किस + ही—— किस
  • वह + ही—— वही
  • उस + ही—— उसी

कभी —कभी दोनों ध्वनियों में लोप हो जाता है। पहले शब्द से ‘आ’ स्वर का तथा दूसरे से ह् व्यंजन का लोप हो जाता है,और अनुनासिक दूसरे स्वर पर पॅंहुच जाती है।

  • वहॉं +ही—————वहीं
  • कहॉं +ही—— कहीं
  • यहॉं +ही—————यहीं
  • जहॉं +ही————जहीं

प्रत्यय की परिभाषा, अर्थ,भेद,पहचान,एंवम् उदाहरण(Pratyay in Hindi)

प्रत्यय की परिभाषा ( Definition of Suffix)

उपसर्गों की तरह प्रत्यय भी भाषा के लघुत्तम,अर्थवान तथा बद्ध रूप में होते है, जिसमें उपसर्ग तथा प्रत्यय दोनों का प्रकार्य भी एक समान होता है। और दोनों ही नए—नए शब्दों का निर्माण में अपनी—अपनी प्रमुख भूमिका निभाते है। दोनों में अतंर केवल इस बात को लेकर है कि उपसर्ग शब्दों के प्रारम्भ में लगते हैं, तथा प्रत्यय शब्दों के अंत में लगते है। नए शब्दों की रचना में प्रत्यय अहम भूमिका निभाते है। ये शब्दों के पीछे लगते है।
उदहारण के लिए :—

  • मुख + डा—— मुखडा
  • सोना + आर——सुनार
  • + वान— धनवान
  • गरीब + ई —— गरीबी
  • सॉंप + एरा— सपेरा
  • तॉंगा + वाला— तॉंगेवाला

अत: कहने का तात्पर्य है कि- प्रत्यय भाषा के वे लघुत्तम, अर्थवान तथा  बद्ध रूप हैं -जो किसी शब्द के अंत में लगकर नए—नए शब्दों की रचना करतें है,वे प्रत्यय कहलाते है।

प्रत्यय का अर्थ(Meaning of suffix)

ऐसे शब्दांश जो किसी शब्द के अंत मेें लगकर उसके अर्थ में नया रूप देते हैं,वह प्रतयय कहलाते है।

सरल शब्दों में—): प्रत्यय उन शब्दों को कहते हैं जो शब्दांश किसी शब्द के अन्त में जुड़कर उसके अर्थ तथा भाव में परिवर्तन या विशेषता ला देते है। उन्हें प्रत्यय कहते है।

दूसरे शब्दों में —): प्रत्यय दो शब्दों से मिलकर बना होता है – प्रति +अय। प्रति का अर्थ होता है ‘ साथ में ,पर बाद में और अय का अर्थ होता है ‘ चलने वाला ‘
अत: प्रत्यय का अर्थ होता है– “साथ में पर बाद में चलने वाला।” जिन शब्दों का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता वे किसी शब्द के पीछे लगकर उसके अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं।
अर्थात “शब्द निर्माण के लिए शब्दों के अंत में जो शब्दांश जोड़े जाते हैं वही प्रत्यय कहलाते हैं”।

जैसे——

  • तैर + आक—— तैराक
  • + आर———लुहार
  • लकड़ +हारा———लकडहारा
  • थाल + ई————— थाली

इन शब्दों में” तैर,लोहा,लकड,और थाल” मूल शब्द है। इनके अंत में क्रमश:” आक,आर,हारा,और ई “शब्दांश जोडे गए हैं। मूल शब्दों के अंत में शब्दांश जोडने से क्रमश: “तैराक,लुहार,लकडहारा,थाली” शब्दों की रचना हुई है।

“आक,आर,हारा,और ई” ऐसे शब्दांश हैं- जो मूल शब्दों के अंत में जुडकर उनके अर्थ में परिवर्तन ला देते है। व्याकरण में ये शब्दांश प्रत्यय कहलाते है। अत: जो शब्दांश शब्दों के अंत में विशेषता या परिवर्तन ला देते हैं, वे प्रत्यय कहलाते हैं।

विशेष/ ध्यान देने योग्य बातें

प्रत्यय सदैव रूढ शब्दों अथवा धातु के अतं में जोडे जाते है। जैसे-

  • पठ + अक= पाठक
  • शक + ति= शक्ति
  • पाठक, शक्ति, ——’पठ’ और ‘शक’ धातुओं से क्रमशः ‘अक’ एवं ‘ति’ प्रत्यय लगाने पर नए शब्दों का निर्माण हुआ हैं।
  • प्रत्यय का अपना अर्थ नहीं होता और न ही इनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व होता है। जिनकेकारण स्वतंत्र रूप में इनका प्रयोग किया जा सकता है।
  • प्रत्यय अविकारी शब्दांश होते हैं जो शब्दों के बाद में जोड़े जाते है। और उसमें परिवतन किया जा सकता है।

प्रत्यय के जुडने से शब्द के अर्थ में परिवर्तन या विशेषता उत्पन्न होती है। जैसे—

  • बड़ा +आई = बडाई
  • टिक +आऊ = टिकाऊ
  • बिक +आऊ = बिकाऊ
  • होन +हार = होनहार
  • लेन +दार = लेनदार
  • घट + इया = घटिया
  • गाडी +वाला = गाड़ीवाला
  • कभी कभी प्रत्यय लगाने से अर्थ में कोई बदलाव नहीं होता है। तथा प्रत्यय लगने पर शब्द में संधि नहीं होती बल्कि अंतिम वर्ण में मिलने वाले प्रत्यय में स्वर की मात्रा लग जाएगी लेकिन व्यंजन होने पर वह यथावत रहता है

प्रत्ययों के भेद/प्रकार

प्रत्यय विभिन्न् शब्दों के अंत में जुडकर नए शब्दों का निर्माण करते है। लेकिन प्रत्यय किस प्रकार के शब्दों के साथ लग कर आते है, इस आधार पर प्रत्ययों के तीन भेद किए गए है।

  •  संस्कृत के प्रत्यय
  •  हिंदी के प्रत्यय
    विदेशी भाषा के प्रत्यय

संस्कृत के प्रत्यय:— जो प्रत्यय व्याकरण में मूल शब्दों और मूल धातुओं से जोड़े जाते हैं वे संस्कृत के प्रत्यय कहलाते हैं।
जैसे :–

  • – आगत,विगत,कृत ।
  • ति – प्रीति, शक्ति, भक्ति आदि
  • या- मृगया, विद्या

संस्कृत प्रत्यय के प्रकार :-

  1. कृत् प्रत्यय (कृदन्त) (Agentive)
  2.  तद्धित प्रत्यय (Nominal)

(1) कृत् प्रत्यय(Agentive):- क्रिया शब्दों के साथ जो प्रत्यय जुडतें हैं वे कृत प्रत्यय कहलाते है।

सरल शब्दों में— वे प्रत्यय जो क्रिया के मूल रूप धातु  के साथ जुडकर संज्ञा,विशेषण आदि नए शब्दों का निर्माण करते है। वे कृत प्रत्यय कहलाते हैं।

अर्थात कहने का तात्पर्य है कि——क्रिया या धातु के अन्त में प्रयुक्त होने वाले प्रत्ययों को ‘कृत्’ प्रत्यय कहते है और उनके मेल से बने शब्द को ‘कृदन्त’ कहते है।

दूसरे शब्दो में- वे प्रत्यय जो क्रिया के मूल रूप यानी धातु (root word) में जोड़े जाते है, कृत् प्रत्यय कहलाते है।

जैसे-

  • लिख् + अक =लेखक।
  • बिछ+ औना — बिछौना
  • पढ+ आकू — पढ़ाकू
  • चु + आव— चुनाव
  • पालन + हारा—— पालनहारा

यहाँ अक,औना,आकू,आव, हारा कृत् प्रत्यय है तथा लेखक,बिछ,पढ,चु, पालन कृदंत शब्द है।टेबल बनानी है

कृत् प्रत्यय के उदहारण

  • अक —— गायक,लेखक, पाठक, नायक, गायक
  • ता———  नेता,अभिनेता,विक्रेता
  • उक ——इच्छुक, भिक्षुक, भावुक इच्छ्, भिक्ष

कृत प्रत्यय क्रिया शब्दों में लगकर अलग—अलग प्रकार्य करने वाले संज्ञा/ विशेषण शब्द बनाते है। इस आधार पर कृत प्रत्ययों के निम्नलिखित प्रकार्य है।

  • क्रिया को करने वाला
  • क्रिया का कर्म
  • क्रिया का परिणाम
  • क्रिया करने का साधन
  • क्रिया करने के योग्य होना

 

संस्कृत के कृत प्रत्यय

मूल शब्द प्रत्ययउदाहरण
मोह, झाड़, पठ, भक्षअनमोहन, झाड़न, पठन, भक्षण
सुन, लड़, चढ़ ,सिल, पढ़,आईसुनाई, लड़ाई, चढ़ाई,सिलाई, पढ़ाई,
लेख्, पाठ्, कृ, गै , धाव,सहाय,पालअकलेखक, पाठक, कारक, गायक,धावक, सहायक, पालक
पाल्, सह्, ने, चर्अनपालन, सहन, नयन, चरण
घट्, तुल्, वंद्, विद्अनाघटना, तुलना, वन्दना, वेदना
मान्, रम्, दृश्, पूज्, श्रु अनीयमाननीय, रमणीय, दर्शनीय, पूजनीय, श्रवणीय
थक, चढ़, पठआनथकान, चढ़ान, पठान
सज, लिख, मिल थक बुनआवटबुनावट सजावट, लिखावट, मिलावट,थकावट
बह, , खिंच, बच,छल, दिख, चढ़आव खिंचाव, बचाव, बहाव, छलावा, दिखावा, चढ़ावा
सूख, भूल, जाग, पूज, इष्, भिक्ष्सूखा, भूला, जागा, पूजा, इच्छा, भिक्षा
उड़, मिल, दौड़आनउड़ान, मिलान, दौड़ान
हर, गिर, दशरथ, मालाहरि, गिरि, दाशरथि, माली
हँस, बोल, घुड़, रेत, फाँस, त्यज्हँसी, बोली, घुड़की, रेती, फाँसी,त्यागी
झूल, ठेल, घेर, भूलझूला, ठेला, घेरा, भूला
छल, जड़, बढ़, घट , जड़इयाछलिया, जड़िया, बढ़िया, घटिया
पठ, व्यथा, फल, पुष्पइतपठित, व्यथित, फलित, पुष्पित
चर्, पो, खन्इत्रचरित्र, पवित्र, खनित्र
झाड़, आड़, उतार
झाड़ू, आड़ू, उतारू
बंध, बेल, झाड़ बंधन, बेलन, झाड़न,
अड़, मर, सड़ इयलअड़ियल, मरियल, सड़ियल
औटीकसकसौटी
इच्छ्, भिक्ष्उक इच्छुक, भिक्षुक
चढ़, रख, लूट, खेवऐया चढ़ैया, रखैया, लुटैया, खेवैया
रख, बच, डाँट\गा, खावैयारखैया, बचैया, डटैया, गवैया, खवैया
आ, जा, बह, मर, गा ताआता, जाता, बहता, मरता, गाता
चट, धौंक, मथनी चटनी, धौंकनी, मथनी
चिल्ला, गुर्रा, घबराआहटचिल्लाहट, गुर्राहट, घबराहट

संस्कृत से बने कृत्- प्रत्यय  के भिन्न -भिन्न शब्द है।

कृत्- प्रत्ययधातुउदहारण
तव्य (संस्कृत)कृ
कर्तव्य
यत्(संस्कृत)दादेय
वैया (हिंदी)खेना-खेखेवैया
अना (संस्कृत) विद्
वेदना
आ (संस्कृत) इश्इच्छ्
यत् (संस्कृत) दा देय
य (संस्कृत)दा देय
अनीय (संस्कृत) दृश्दर्शनीय
य (संस्कृत)पूज् पूज्य

कृत्-प्रत्यय में क्रिया को करने वाले  भिन्न -भिन्न शब्द है।

मूल शब्द/क्रियाप्रत्ययउदहारण
देना, आना,पढ़नावाला देनेवाला, आनेवाला, पढ़नेवाला
होना, रखना, खेवनाहारहोनहार, रखनहार, खेवनहार
छलनाइयाछलिया

कृत्-प्रत्यय में धातु रूप से बने  भिन्न -भिन्न शब्द है।

कृत्-प्रत्यय/मूल शब्दधातु रूपउदहारण
पढ़, लिख, बेल, गा ना पढ़ना, लिखना, बेलना, गाना,छलना
अ, प्री, शक्, भजतिअति, प्रीति, शक्ति, भक्ति
जा, खातेजाते, खाते
अन्य, सर्व, अस्त्रअन्यत्र, सर्वत्र, अस्त्र
क्रंद, वंद, मंद, खिद्, बेल, ले क्रंदन, वंदन, मंदन, खिन्न, बेलन, लेन
गद्, पद्, कृ, गद्य, पद्य, कृत्य, पाण्डित्य, पाश्चात्य, दंत्य, ओष्ठ्य पंडित, (पश्चात्, दंत्, ओष्ठ्)
मृग, विद्यामृगया, विद्या
दा, धादाम, धाम
गेरू गेरू
अक
कृ कारक
अननीनयन

कृत्-प्रत्यय में धातु के साथ विशेषण शब्दों का प्रयोग

कृत्-प्रत्यय /मूल शब्दधातु रूपविशेषण/उदहारण
क्त
भूभूत
मान विद्विद्यमान
आकू
पढ़, लड़,पढ़ाकू, लड़ाकू
क्त(ण) जृ
जीर्ण
क्त मद्मत्त
क्त(न) खिद् खित्र
एरा
लूट, कामलुटेरा, कमेरा
इयल
सड़, अड़, मर सड़ियल, अड़ियल, मरियल
डाका, खा, चाल डाकू, खाऊ, चालू
अनीय (संस्कृत)
दृश्दर्शनीय
य (संस्कृत)दा
देय
य (संस्कृत) पूज् पूज्य
आड़ी (हिंदी)खेल, कब, आगे, पीछेखिलाड़ी, कबाड़ी, अगाड़ी, पिछाड़ी
आलू/आलुझगड़ा, दया, कृपाझगड़ालू, दयालु, कृपालु
आऊ (हिंदी) चल, बिक, टिकचलाऊ, बिकाऊ, टिकाऊ
आका (हिंदी)लड़, धम, कड़ लड़ाका, धमाका, कड़ाका
अनीयपठ, पूज,शोचपठनीय ,पूजनीय ,शोचनीय ।

हिंदी रूप/रचना के आधार पर ‘कृत् प्रत्यय’ के दो भेद है-

  1. विकारी कृत् प्रत्यय
  2. अविकारी कृत् प्रत्यय

(1)विकारी कृत् प्रत्यय:)- वे कृत् प्रत्यय जिसमें संज्ञा या विशेषण के शुद्ध रूप बनते है। तो वह विकारी कृत प्रत्यय कहलाते हैं ।
अर्थात कहने का तात्पर्य है कि— कृत प्रत्यय में शुद्ध संज्ञा तथा विशेषण बने होते हैं इसलिए इसे विकारी कृत प्रत्यय कहते हैं ।

विकारी कृत् प्रत्यय केचार भेद होते है-

  1. क्रियार्थक संज्ञा
  2. कर्तृवाचक संज्ञा
  3. वर्तमानकालिक कृदन्त
  4. भूतकालिक कृदन्त

क्रियार्थक संज्ञा-

जो संज्ञा क्रिया के मूल रूप में होती है तथा क्रिया को अर्थ प्रदान करती है वह  क्रियार्थक संज्ञा होती है।अर्थात संज्ञा की क्रिया में ‘को का ‘अर्थ बताने वाला वह शब्द जो क्रिया के रूप में उपस्थित होते हुए भी संज्ञा का अर्थ देता है वह  क्रियार्थक संज्ञा कहलाती है।

कर्तृवाचक संज्ञा-

-ऐसे प्रत्यय जिनके जुड़ने पर क्रिया के कार्य करने वाले का बोध हो उसे कर्तृवाचक संज्ञा कहते हैं।

वर्तमानकालिक कृदन्त-

कोई भी व्यक्ति जब पहले एक कार्य को करते को हुए दूसरे कार्य को भी साथ में करता है, तो उस समय में पहले वाली की गई क्रिया को वर्तमानकालिक कृदन्त कहते हैं।

भूतकालिक कृदन्त-

सामान्य भूतकालिक क्रिया को हुआ, हुए, हुई आदि शब्दों को जोड़ने से भूतकालिक कृदन्त बनता है।

(2) अविकारी कृत् प्रत्यय-

ऐसे अविकारी कृत्-प्रत्यय जिनसे क्रियामूलक विशेषण या अव्यय के रूप बनते हैं। उन्हें अविकारी कृत प्रत्यय कहते हैं । हिन्दी क्रियापदों के अन्त में कृत्-प्रत्ययों के योग से निम्नलिखित कृदन्त प्रत्यय है।

कृत प्रत्यय के भेद :-

  • कर्तृवाचक कृत प्रत्यय
  • कर्मवाचक कृत प्रत्यय
  • करणवाचक कृत प्रत्यय
  • भाववाचक कृत प्रत्यय
  • विशेषणवाचक कृत प्रत्यय
  • क्रियावाचक कृत प्रत्यय

1. कर्तृवाचक कृत प्रत्यय :)-

जो शब्द कार्य को करने वाले का अर्थात कर्ता का बोध कराते है।उन्हे कर्तृवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।

सरल शब्दों में:)- जिन प्रत्ययों को लगााने पर बने शब्द से कर्ता का बोध होता है। उसे कर्तृवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।जैसे-

  • रखवाला, रक्षक, लुटेरा, पालनहार,कृपालु , दयालु इत्यादि।

कर्तृवाचक कृत प्रत्यय के अन्य उदहारण

  •  अक = लेखक , नायक , गायक , पाठक
  •  एरा = लुटेरा , बसेरा
  •  ऐया = गवैया , नचैया
  •  ओडा = भगोड़ा
  •  वाला = पढनेवाला , लिखनेवाला , रखवाला
  • अक्कड = भुलक्कड , घुमक्कड़ , पियक्कड़
  • आक = तैराक , लडाक
  •  आलू = झगड़ालू
  •  आकू = लड़ाकू , ,कृपालु , दयालु
  •  आड़ी = खिलाडी , अगाड़ी , अनाड़ी
  • इअल = अडियल , मरियल , सडियल
  • हार = होनहार , राखनहार , पालनहार
  •  ता = दाता , गाता , कर्ता , नेता , भ्राता , पिता , ज्ञाता ।

कर्मवाचक कृत प्रत्यय :-

जो प्रत्यय शब्द किसी के कर्म का बोध कराते है। उन्हें कर्मवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं । अर्थात कर्म का बोध कराने वाले।

सरल शब्दों में —जिस प्रत्यय को लगााने पर कर्म का बोध होता है। वे प्रत्यय कर्मवाचक कृत प्रत्यय कहलाते हैं

जैसे-

  • ओढ़ना, पढ़ना, छलनी, खिलौना, बिछौना इत्यादि।

कर्मवाचक कृत प्रत्यय के अन्य उदहारण

  • औना = बिछौना , खिलौना
  • ना = गाना,बचाना चलना, सूँघना , पढना , खाना
  • नी = सुँघनी ,भरनी करनी सुननी, छलनी
  • गा = गाना गात, गाम, ।

करणवाचक कृत प्रत्यय:-
जिन प्रत्ययों को लगााने पर क्रिया के साधन का बोध होता है। उन्हें करणवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।जैसे :-

  • रेती, फाँसी, झाड़ू, बंधन, मथनी, झाड़न इत्यादि।

करणवाचक कृत प्रत्यय के अन्य उदहारण

  •  आ = भटका , भूला , झूला
  •  ऊ = झाड़ू
  •  ई = रेती , फांसी , भारी , धुलाई
  •  न = बेलन , झाडन , बंधन
  • नी = धौंकनी , करतनी , सुमिरनी , छलनी , फूंकनी , चलनी

भाववाचक कृत प्रत्यय :-
जिन कृत प्रत्ययों के योग से भाववावक संज्ञाओं की रचना होती है। उन्हें भाववाचक कृत प्रत्यय कहते है।

सरल शब्दों में—जो शब्द क्रिया के भाव का बोध कराते है,अर्थात ​ क्रिया से भाववाचक संज्ञा का निर्माण करते है। ऐसे प्रत्यय भाववाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।
जैसे-

  • लड़ाई, लिखाई, मिलावट, सजावट, बनावट, बहाव, चढ़ाव इत्यादि।

भाववाचक कृत प्रत्यय के अन्य उदहारण:

  •  अन = लेखन , पठन , गमन , मनन , मिलन
  •  ति = गति , रति , मति
  •  अ = जय , लेख , विचार , मार , लूट , तोल
  • आवा = भुलावा , छलावा , दिखावा , बुलावा , चढावा
  • आई = कमाई , चढाई , लड़ाई , सिलाई , कटाई , लिखाई
  •  आहट = घबराहट , चिल्लाहट
  •  औती = मनौती , फिरौती , चुनौती , कटौती
  • अंत = भिडंत , गढंत
  •  आवट = सजावट , बनावट , रुकावट , मिलावट
  •  ना = लिखना , पढना
  •  आन = उड़ान , मिलान , उठान , चढ़ान
  • आव = चढ़ाव , घुमाव , कटाव
  • आवट = सजावट , लिखावट , मिलावट

विशेषण वाचक कृत प्रत्यय :-
जिन प्रत्ययों से क्रियापदों में विशेषण शब्द की रचना होती है उसे विशेषण वाचक कृत प्रत्यय कहते है ।
जैसे :-

  •  त = आगत ,विगत ,कृत
  •  तव्य = कर्तव्य ,गन्तव्य
  •  य = नृत्य ,पूज्य , खाघ
  •  अनीय =पठनीय ,पूजनीय ,शोचनीय ।

.
 क्रिया वाचक कृत प्रत्यय:—
जिन प्रत्ययों से क्रियापरक संज्ञा,विशेषण,तथा अव्ययबोधक रखनेवाली क्रिया बनती है,तथा क्रियाओं का निर्माण होता है, उन्हें क्रिया वाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।

अर्थात कहने का तात्पर्य है कि- क्रियावाचक कृत् प्रत्यय में बीते हुए या गुजर रहे समय के बोधक होते हैं।

पहचान

  • ‘आ’ अथवा ‘या’ प्रत्यय को मूल धातु के आगे लगाने से भूतकालिक कृत् प्रत्यय बनते है
  • ता’ प्रत्यय को मूल धातु के आगे लगाने से वर्तमानकालिक कृत् प्रत्यय बनते है। जैसे-

भूतकालिक कृत् प्रत्यय-

  • खा + या= खाया
  • सो+ या— सोया
  • लिख + आ= लिखा
  • पढ़ + आ= पढ़ा

वर्तमानकालिक कृत् प्रत्यय-

  • लिख + ता= लिखता
  • जा + ता= जाता
  • खा + ता= खाता
  • डूब+ता =डूबता
  • बह + ता=बहता
  • चल+ता= चलता
  • जा +कर =,जाकर
  • देख+कर=देखकर

हिंदी के कृत्-प्रत्यय (Primary suffixes)

हिंदी के कृत् या कृदन्त प्रत्यय का वर्णन विभिन्न् प्रकार के शब्दों के द्वारा किया गया है। जिनकी संख्या अगिनत है। जिसमें हिन्दी के कृत—प्रत्ययों को विभिन्न शब्दों के के आधार पर बताया गया है। वर्णन इस प्रकार है

  • अ, अन्त, अक्कड़, आ, आई, आड़ी, आलू, आऊ, अंकू, आक, आका, आकू, आन, आनी, आप, आपा, आव, आवट, आवना, आवा, आस, आहट, इयल, ई, इया, ऊ, एरा, ऐया, ऐत, ओड़ा, औता, औती, औना, औनी, आवनी, औवल, क, का, की, गी, त, ता, ती, न, नी, वन, वाँ, वाला, वैया, सार, हारा, हार, हा इत्यादि।

संस्कृत के प्रत्ययों की तरह हिंदी के प्रत्ययों का भी महत्वपूर्ण योगदान है। हिंदी के कृत्-प्रत्ययों से विभिन्न प्रकार के प्रत्ययों का उल्लेख किया गया है। जिसमें सभी प्रत्ययों के नाम,उनसे सम्बधित उदाहरण तथा प्रत्यय-चिह्नों के साथ उनका वर्णन किया गया है।

  • कर्तृवाचक कृत्-प्रत्यय,
  • कर्मवाचक कृत् प्रत्यय,
  • करणवाचक कृत्-प्रत्यय,
  • भाववाचक कृत्-प्रत्यय
  • विशेषण कृत्–प्रत्यय
  • गुणवाचक कृत्–प्रत्यय

(i)कर्तृवाचक कृत्-प्रत्यय
र्तृवाचक कृत्-प्रत्ययों को बनाने के लिए धातु के अन्त में प्रत्यय शब्दों को लगाकर प्रयोग किया जाता है।

विशेष

  • कर्तृवाचक कृत्-प्रत्यय में आका, आड़ी, आलू, इया, इयल, एरा, ऐत, आकू, अक्कड़,अंकू, आऊ, आक वन, वाला, वैया, सार,हार, हारा आदि प्रत्ययों को लगाकर शब्द बनाए जाते है।

कर्तृवाचक कृत्-प्रत्यय के उदहारण  

प्रत्यय धातु /मूल शब्दउदहारण /कृदंत-रूप
अक्कड़ भूलभूलक्क्ड़
वन
उपउपवन
वाला
सुन
सुननेवाला
सारमिलमिलनसार
वैया खा खवैया
आऊ
बिक बिकाऊ
आक
तैरतैराक
आका
उडउड़ाका
आड़ी
खेल खिलाड़ी
आलू
चाल चालू
इयाघटघटिया
इयल
अड़अड़ियल
इयल
सड स​डियल
ऐत
लड़लड़ैत
ऐया
काटकटैया
ओड़
हँस हँसोड़
ओड़ाभागभगोड़ा
हार
रखराखनहार
हारा रोरोवनहारा

कर्मवाचक कृत्-प्रत्यय

हिंदी में कर्मवाचक कृत्-प्रत्यय बनाने के लिए धातु के अन्त में प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है। इसमें कर्ता के कर्म को प्रधानता दी जाती ​है।

विशेष

कर्मवाचक कृत्-प्रत्यय में ना, नी औना आदि प्रत्ययों को लगाकर शब्द बनाए जाते है।

कर्मवाचक कृत्-प्रत्यय के उदहारण 

प्रत्ययधातु/ मूल शब्द उदहारण/कृदंत-रूप
ना
खेल,चल, पढ़खेलना ,पढना,चलना
नीकाट,छल,चाट ओढकटनी,छलनी, चटनी,ओढ़नी,
औना घिन,खेला, बिछघिनौना,खिलौना,बिछौना

करणवाचक कृत्-प्रत्यय

हिंदी में करणवाचक कृत्-प्रत्यय में धातु के अंत प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है। इसमें कर्ता के कार्य के साधन का बोध होता है। तथा कार्य का रूप साधन माना जाता है।

विशेष

  • करणवाचक कृत्-प्रत्यय बनाने के लिए धातु के साथ में अन्त में आ, आनी, ई, ऊ, औटी, न, ना, नी इत्यादि प्रत्यय लगाए जाते हैं।

करणवाचक कृत्-प्रत्यय के उदाहरण –

प्रत्ययधातु/मूल शब्द उदहारण/कृदंत-रूप

झूल झूला
आनी
मथमथानी

रेत रेती

झाड़ झाड़ू
औटी
कसकसौटी

बेल ,चल
बेलन,चलन
ना
बेल,चल
बेलना,चलना
नीबेल,चल बेलनी, चलनी

भाववाचक कृत्-प्रत्यय

भाववाचक कृत्-प्रत्ययों को बनाने हेतू धातु के अन्त में विभिन्न प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है।

विशेष —

  • जिसमेअन्त,आ,आई,आन,आप,आपा,आव,आवा,आस,आवना,आवनी,आवट,आहट,ई,औता,औती,औवल,औनी,क,की, गी,त,ती,न,नी इत्यादि प्रत्ययों का प्रयोग करके शब्दों का निर्माण किया जाताहै

भाववाचक कृत्-प्रत्यय के उदाहरण –

प्रत्यय
धातु/मूल शब्दउदहारण/कृदंत-रूप
अन्त रट,गढ, भिड
रंटत,गढंत,भिड़न्त आदि।
चल,जल,फेरचला,जला,फेरा आदि।
आईखिल,सुन,लड़खिलाई,सुनाई,लड़ाई आदि।
आनउड,मिल,पहउडान,मिलान,पहचान आदि।
आवसुझ,हिस,खिंचसुझाव,हिसाब,खिंचाव आदि।
आवाबुल,बढ,भूलबुलावा,बढावा,भुलावा आदि।
आसछपस,भडस,निकसछपास,भडास,निकास आदि।
आवनाभय,लुभ,सुह,पा
लुभावना,भयावना,सुहावना पावना आदि।
आवनीभा,पा,चेताव
भा,पा,चेताव चेतावनी, भावनी,पावनी आदि।
आवटसज, लिख,बुन,थकालिखावट,बुनावट,थकावट,सजावट आदि।
आहटचिल्ल,घब,मुस्करा,कुलबुलघबराहट,मुस्कुराहट,कुलबुलाहट,चिल्लाहट आदि।
बोल रोल,थप,खोल,टोलरोली,थपकी,खोली, टोली बोली आदि।
औता समझ इकइकलौता,समझौता आदि।
औती मान,चुन,लिखमनौती,चुनौती,लिखौती आदि।
औनी पहर,ठहर,पीसपहरौनी,ठहरौनी,पिसौनी आदि।
पठ,लेख ,बैठपाठक,लेखक,बैठक आदि।
कीबैठ,डूब,फिर बैठकी डूबकी,फिरकी आदि।
त/ती खप, बच,चढ़,घट,बढखपत,बचत/,चढ़ती,घटती,बढती आदि।
औवलभूल फोड,बुझ,मनभुलौवल,फडौवल,बुझौवल,मनौवल आदि।
न/नी
दे,चाट देन,चटनी आदि।
आप/आपा मिल, पूजमिलाप,पुजापा
भर,सर,भार,सार आदि।

संस्कृत के कृत्-प्रत्यय और भाववाचक संज्ञाएँ

कृत्-प्रत्ययधातु /मूल शब्दभाववाचकसंज्ञाएँ/ उदहारण

कम्काम
अना विद्
वेदना
अना वन्द्
वन्दना

इष्इच्छा
पूज्पूजा
तिशक्
शक्ति
या
मृगमृगया
तृभुज्
भोक्तृ (भोक्ता)
तन्तनु
त्यज् त्यागी

कृत्-प्रत्यय धातु कर्तृवाचक संज्ञाएँ

प्रत्यय धातु/मूल शब्द उदहारण/ संज्ञाएँ
अक
गै , पौगायक,पावक

सृप्सर्प
दिव्
देव
तृदा
दातृ (दाता)

कृकृत्य
प्रह् प्रहार

क्रियावाचक कृत्-प्रत्यय

क्रियाद्योतक कृदन्त-विशेषण बनाने में आ, ता आदि प्रत्ययों का प्रयोग होता है जिसमें संज्ञा के विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते है।

पहचान

  • आ’ अथवा ‘या’ प्रत्यय को मूल धातु के आगे लगाने से भूतकालिक कृत् प्रत्यय बनते है
  • ता’ प्रत्यय को मूल धातु के आगे लगाने से वर्तमानकालिक कृत् प्रत्यय बनते है। जैसे-

क्रियावाचक कृत्-प्रत्यय के दो भेद है-

  • वर्तमानकाल क्रियावाचक कृदन्त-विशेषण
  • भूतकालिक क्रियावाचक कृदन्त-विशेषण।

वर्तमानकालिक विशेषण-

  • प्रत्यय- धातु- ——वर्तमानकालिक विशेषण
  • ता—- बह——– बहता
  • ता—- मर——— मरता
  • ता— गा ———–गाता

भूतकालिक विशेषण-

  • प्रत्यय —-धातु——- भूतकालिक विशेषण
  • आ——- पढ़ ——–पढ़ा
  • आ——- धो———- धोया
  • आ——- गा ———–गाया

2. तद्धित प्रत्यय :-

संज्ञा , सर्वनाम , विशेषण आदि शब्दों के पीछे लगकर जो प्रत्यय शब्द बनाते है। उन शब्दों को तद्धित प्रत्यय कहते हैं तद्धित प्रत्यय से मिलाकर जो शब्द बनते हैं उन्हें तद्धितांत प्रत्यय कहते हैं ।
दूसरे शब्दों में- जो प्रत्यय धातुओं को छोड़कर अन्य शब्दों में लगते है। उन्हें तद्धित प्रत्यय कहते हैं।
जैसे :–

  • देव+त्व— देवत्य
  • लेखक+ईय—लेखकीय
  • सेठ+आनी = सेठानी

देव ,लेखक, सेठ संज्ञा शब्द है। इनके पीछे त्व,कीय,आनी प्रत्यय लगने से नए शब्द देवत्य,लेखकीयऔर सेठानी बने है।
तद्धित प्रत्यय के अन्य उदहारण

  • मूर्ख+ता —मूर्खता​ —(विशेषण +प्रत्यय)
  • मानव+ ता— मानवता —(संज्ञा+ प्रत्यय)
  • अपना + पन = अपनापन —संज्ञा+ प्रत्यय
  • बाल+ पन— बालपन —(संज्ञा+ प्रत्यय)
  • अच्छा + आई = अच्छाई (भाववाचक संज्ञा)
  • एक + ता = एकता  (संज्ञा+ प्रत्यय)
  • लड़का + पन = लडकपन (विशेषण +प्रत्यय)
  • मम + ता = ममता (विशेषण +प्रत्यय)
  • अपना + पन = अपनत्व (भाववाचक संज्ञा)

तद्धित-प्रत्यय के द्वारा निम्नलिखित संज्ञाओं का आपस में रूपांतरण हुआ है।

  • जातिवाचक संज्ञा से भाववाचक संज्ञा बनाना
  • व्यक्ति् वाचक संज्ञा से अन्य संज्ञा बनाना
  • विशेषण से भाववाचक संज्ञा बनाना
  • संज्ञा से विशेषण बनाना

उपसर्ग की तरह तद्धित-प्रत्ययों को भी तीन भागों में बॉंटा गया है।

  • हिंदी के तद्धित-प्रत्यय
  • संस्कृत के तद्धित-प्रत्यय
  • उर्दू-—फारसी के तद्धित-प्रत्यय

ये सभी प्रत्यय हिन्दी शब्दों की रचना में सहायकार हुए है। जिनके द्वारा नए —नए शब्दों का निर्माण हुआ है।इनके उदाहरण नीचे दिये गए है।

हिंदी के तद्धित-प्रत्यय (Nominal suffixes)

हिंदी के तद्धित-प्रत्यय निम्न प्रकार के है। जिसमें संज्ञा ,भाव,संबंध, विशेषणऔरलघुत्तम आदि शब्दों का वर्णन किया गया है।

पहचान

जिनकी पहचान निम्न शब्दों के के द्वारा ​की जा सकती है।

  • आ, आई, ताई, आऊ, आका, आटा, आन, आनी, आयत आर, आरी आरा, आलू, आस आह, इन, ई, ऊ, ए, ऐला एला, ओ, ओट, ओटा औटी, औती, ओला, क, की, जा, टा, टी, त, ता, ती, नी, पन, री, ला, ली, ल, वंत, वाल, वा, स, सरा, सा, हरा, हला, इत्यादि।

हिंदी में तद्धित-प्रत्यय के उदहारण

प्रत्ययमूल शब्दउदहारण
गंद मंद चचंलगंदा,मंदा,चचलाआदि।
आई भला मीठा बडा अनपा पराया पण्डित, ठाकुर, लड़, चतुर, चौड़ा भलाई मिठाई बडाई अनपाई पराई पण्डिताई, ठकुराई, लड़ाई, चतुराई, चौड़ाई आदि।
आकचट,भड़,तड़ सडचटाक,भड़ाक,तड़ाक,सड़ाक आदि।
आइपछताना, जगना ,पछताइ,जगाइ,आदि ।
आनीसेठ, नौकर, मथसेठानी, नौकरानी, मथानीआदि ।
आयतबहुत, पंच, अपनाबहुतायत, पंचायत, अपनायत आदि ।
आर/आरालोहा, सोना, दूध, गाँवलोहार, सुनार, दूधार, गँवार आदि।
आहटचिकना, घबरा, चिल्ल, कड़वा +चिकनाहट, घबराहट, चिल्लाहट, कड़वाहट आदि
इलफेन, कूट, तन्द्र, जटा, पंक, स्वप्न, धूमफेनिल, कुटिल, तन्द्रिल, जटिल, पंकिल, स्वप्निल, धूमिल आदि।
इष्ठकन्, वर्, गुरु, बलकनिष्ठ, वरिष्ठ, गरिष्ठ, बलिष्ठ आदि।
सुन्दर, बोल, पक्ष, खेत, ढोलक, तेल, देहातसुन्दरी, बोली, पक्षी, खेती, ढोलकी, तेली, देहाती आदि।
ईनग्राम, कुलग्रामीण, कुलीन आदि।
इनजोगी, तेली,मालीजोगिन,तेलिन, मालिन आदि।
आइनपण्डित, ठाकुरपण्डिताइन, ठकुराइन आदि ।
ईयभवत्, भारत, पाणिनी, राष्ट्रभवदीय, भारतीय, पाणिनीय, आदि।
धीरा,पीछा,बदला,लेखा,सामना बच्चा, लेखा, लड़का धरे पीछे बदले सामने बच्चे, लेखे, लड़के आदि।
एयअतिथि, अत्रि, कुंती, पुरुष, राधाआतिथेय, आत्रेय, कौंतेय, पौरुषेय, राधेय आदि।
एरा/ऐराअंध,घन,चाचा,फूफा,मच्छ साँप, बहुत, मामा, काँसा, लुटअँधेरा, घनेरा,चचेरा,फूफेरा,मच्छेरा सँपेरा, बहुतेरा, ममेरा, कसेरा, लुटेरा आदि।
ऐल/ऐलाखपरा,गुस्सा,दूध,मूॅछ,विष,फुल, नाक फुलेल, नकेल खपेरा खपरैल,दूधैल,विषैला, आदि।
ऐतडाका, लाठी ,बरछा,भलालाठी डकैत, बरछैत,भालैत लठैत आदि।
ओला आम,खाट, मॉंझ पाट, साँपअमोला,खटोला,मॅंझोटा पटोला, सँपोला आदि।
औतीबाप, ठाकुर, मानबपौती, ठकरौती, मनौती आदि।
धम, चम, बैठ, बाल, दर्श, ढोलधमक, चमक, बैठक, बालक, दर्शक, ढोलक आदि।
का/कीएक,चार,छोटा,बडा ,खट, झटइक्का,चौका,छुब्का,बडका,कनकी,लुटकी,खटका, झटका आदि।
करविशेष, ख़ास
विशेषकर, ख़ासकर आदि।
रंग, संग, खपरंगत, संगत, खपतआदि।
टा काला,चोर,नंगा,रोम,कलूटा,चोटटा,लंगटा,रोंगटा आदि।
जाभ्राता, दो
भतीजा, दूजा आदि।
ड़ा,\ड़ीचाम, बाछा, पंख, टाँगचमड़ा, बछड़ा, पंखड़ी, टँगड़ी आदि।
औटाबिल्ला, काजरबिलौटा, कजरौटा आदि।
पाअपना,बहिन,बूढा,रॉंडअपनापा,बहिनापा,बुढापा,रॅंडापा आदि।
तन
अद्यअद्यतन आदि।
तःअंश, स्वअंशतः, स्वतः आदि।
तीकम, बढ़, चढ़कमती, बढ़ती, चढ़ती आदि।
तर
गुरु, श्रेष्ठगुरुतर, श्रेष्ठतर आदि।
वाल/वालाकेजरी,धारी,प्रयाग,गाडी,धन,पढना,बाजाधारीवाल,केजरीवाल,प्रयागवाल,धनवाला,गाडीवाला,पढनेवाला,बाजावाला आदि।
वॉंपॉंच,सात,आठ,नवपॉंचवा,सातवॉं,आठवॉं,नवॉं आदि।
ला/लीधुंध,नीचे,पीछे,लाड,खाज,टीका,डफ,सूपधुंधला,नीचला,पीछला,लाडली,खुजली,डफली,सुपली आदि।
वन्त/ वन्तीगुण,धन,बल,रूप,शील,फूलगुणवन्त,धनवन्त,बलवन्त रूपवन्ती,शीलवन्ती
,फूलवन्ती आदि।

हिंदी में तद्धित-प्रत्यय के निम्न प्रकार हैं-

  • कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय
  • भाववाचक तद्धित प्रत्यय
  • संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय
  • गणनावाचक तद्धित प्रत्यय
  • गुणवाचक तद्धित प्रत्यय
  • स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय
  • ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय
  • सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय
  • स्त्रीबोधक तद्धित प्रत्यय
  • तारतम्यवाचक तद्धित प्रत्यय
  • पूर्णतावाचक तद्धित प्रत्यय

कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय —

जिन प्रत्ययों के द्वार संज्ञा के कार्य का बोध हों वह प्रत्यय कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते है।

पहचान

कृर्तवाचक संज्ञा बनाने वाले शब्दों की पहचान निम्नलिखित शब्दों से होती है।

  • आर, इया, ई, एरा, हारा, इत्यादि तद्धित-प्रत्यय संज्ञा के अन्त में लगाकर कर्तृवाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-

कृर्तवाचक संज्ञा बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय

तद्धित प्रत्ययसंज्ञाकर्तृवाचक संज्ञाएँ
आरसोना,लोहालुहार सुनार

तमोल,तेलतेली,तमोली
इयामुख,दुख,रसोईमुखिया,दुखिया,रसोईया
हारालकड़ी,पानी,मनिलकरहारा,पनिहारा,मनिहारा
एरा
साँप ,काँसाकसेरा, सँपेरा
वालागाडी,धन,पढना,बाजाधनवाला,गाडीवाला,पढनेवाला,बाजावाला आदि।

भाववाचक तद्धित प्रत्यय-

जिन प्रत्ययों से भाव का बोध हो वह प्रत्यय भाववाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

पहचान

भाववाचक तद्धित प्रत्यय की पहचान निम्न शब्दों के द्वारा की जाती है।

  • आ, आयँध, आई, आन, आयत, आरा, आवट, आस, आहट, ई, एरा, औती, त, ती, पन, पा, स इत्यादि तद्धित-प्रत्ययों को संज्ञा के अन्त में लगाकर भाववाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-

भाववाचक संज्ञा बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणभाववाचक संज्ञाएँ
आईचतुर,बुरा,भला,चतुराई,बुराई,चनुराई आदि।
आनचौड़ा,उडा,सुना,,चौड़ान उडान,सुनान आदि
आयतअपनाअपनायत,
खेत,गरम,नरमगरमी,नरमी,खेती
पनकाला,लड़का,बच्चाबचपन ,लड़कपन,कालापन, अपनापन
त्वदेवता ,मनुष्य , पशु , महा , गुरु , लघु देवत्व , मनुष्यत्व , पशुत्व , महत्व , गुरुत्व , लघुत्व आदि
आसखट , मीठा , भडा +खटास , मिठास , भडास आदि ।
तासुंदर , मूर्ख , मनुष्य , लघु , गुरु , सम , कवि , एक , बन्धु +सुन्दरता , मूर्खता , मनुष्यता , लघुता , गुरुता , समता , कविता , एकता , बन्धुता आदि
हटकड़वा,चिकना चिकनाहट कड़वाहट
इमालाली , महा , अरुण , गरीलालिमा , महिमा , अरुणिमा , गरिमा आदि ।
वट सज्जासजावट आदि ।

रंग रंगत आदि ।
आस
मीठा मिठास आदि
बुलाव , सराफ , चूर बुलावा , सराफा , चूरा आदि ।

संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय-

जिन प्रत्ययों से संबंध का बोध हो वे प्रत्यय संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

पहचान

संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय की पहचान भिन्न भिन्न् प्रकार के शब्दों से की जाती है।

  • आल, हाल, ए, एरा, एल, औती, जा इत्यादि तद्धित-प्रत्ययों को संज्ञा के अन्त में लगाकर सम्बन्धवाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
संबंधवाचक  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणसम्बन्धवाचक संज्ञाएँ
इमस्वर्ण , अंत , रक्तिस्वर्णिम , अंतिम , रक्तिम आदि ।
इल जट , फेन , बोझ , पंकजटिल , फेनिल , बोझिल , पंकिल आदि ।
ग्राम , काम , हास् , भव ग्राम्य , काम्य , हास्य , भव्य आदि ।
ओईनन्दननदोई आदि
आल
ससुरससुराल
हालनाना
ननिहाल
औती
बापबपौती
जा
भाई भतीजा
एरा
मामा ममेरा
एलनाक नकेल
हराइकइकहरा आदि ।
वतपुत्र , मातृपुत्रवत , मातृवत आदि
तर

कठिनकठिनतर आदि ।
मान बुद्धिबुद्धिमान आदि
ईयभारत , प्रान्त , नाटक , भवद भारतीय , प्रांतीय , नाटकीय , भवदीय आदि ।
ऐला विषविषैला आदि ।
इत
फल , पीड़ा , प्रचल , दुःख , मोहफलित , पीड़ित , प्रचलित , दुखित , मोहित आदि ।
ईला रस , रंग , जहररसीला , रंगीला , जहरीला आदि
इकशरीर , नीति , धर्म , अर्थ , लोक , वर्ष , एतिहास शारीरिक , नैतिक , धार्मिक , आर्थिक , लौकिक , वार्षिक , ऐतिहासिक आदि ।
आलु दया , श्रद्धादयालु , श्रद्धालु आदि ।
इया पटना , कलकता , जबलपुर , अमृतसर +पटनिया कलकतिया , जबलपुरिया , अमृतसरिया आदि
लखनऊ , पंजाब , गुजरात , बंगाल , सिंधुलखनवी , पंजाबी , गुजराती , बंगाली , सिंधी आदि ।

गणनावाचक तद्धित प्रत्यय-

जिन प्रत्ययों से संख्या का बोध हो वह प्रत्यय गणनावाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते है।

पहचान

गणनावाचक तद्धित प्रत्यय की पहचान विभिन्न् प्रकार के शब्दों के द्वारा की जाती है।

  • ला, रा, था, वाँ, हरा इत्यादि प्रत्ययों के साथ संज्ञा-पदों के अंत में लगाकर गणनावाचक तद्धितान्त संज्ञाए बनती है।
गणनावाचक  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययमूल शब्द गणनावाचक संज्ञाएँ
ला
पह पहला
रादुस , तीनदूसरा, तीसरा
था
चौ चौथा
वाँ
पांच , सात , दससातवाँ, आठवाँ, दसवाँ,
हरा इक , दु , तिइकहरा,दुहरा, तिहरा
गुनादोदोगुना

विशेषण/गुणवाचक तद्धित प्रत्यय-

जिन प्रत्ययों से गुण का बोध हो वह प्रत्यय गुणवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

पहचान

गुणवाचक तद्धित प्रत्यय की पहचान निम्न प्रकार से की जा सकती है।

  • आ, इत, ई, ईय, ईला, वान इन प्रत्ययों को संज्ञा के अन्त में लगाकर गुणवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
विशेषण वाचक  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययसंज्ञा-विशेषण/ मूल शब्दविशेषण संज्ञाएँ
ठंड, प्यास, भूख
ठंडा, प्यासा, भूखा
इतपुष्प, आनंद, क्रोधपुष्पित, आनंदित, क्रोधित
क्रोध, जंगल, भार क्रोधी, जंगली, भारी
ईयभारत, अनुकरण, रमणभारतीय, अनुकरणीय, रमणीय
ईला चमक, भड़क, रंग
चमकीला, भड़कीला, रंगीला
वानगुण, धन, रूप गुणवान, धनवान, रूपवान

स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय-

जिन प्रत्ययों से स्थान का बोध हों वह प्रत्यय स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

पहचान

स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय की पहचान निम्नलिखित शब्दों के द्वारा की जा सकती है।

  • ई, वाला, इया, तिया इन प्रत्ययों को संज्ञा के अन्त में लगाकर स्थानवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
स्थानवाचक  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्यय मूल शब्द /संज्ञा-विशेषणउदहारण /स्थानवाचक संज्ञाएँ

जर्मन, गुजरात, बंगालजर्मनी, गुजराती, बंगाली
वालादिल्ली, बनारस, सूरतदिल्लीवाला, बनारसवाला, सूरतवाला
इया मुंबई, जयपुर, नागपुरमुंबइया, जयपुरिया, नागपुरिया
तियाकलकत्ता, तिरहुतकलकतिया, तिरहुतिया

ऊनवाचक तद्धित-प्रत्यय-

जिन प्रत्ययों से ऊनवाचक संज्ञाओं से वस्तु की लघुता, प्रियता, हीनता आदि के भाव का पता चलता हैं। ऊनवाचक तद्धित-प्रत्यय कहलाते है।

पहचान

  • ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय की पहचान निम्न शब्दों के द्वारा की जाती है।
  • आ, इया, ई, ओला, क, की, टा, टी, ड़ा, ड़ी, री, ली, वा, सा इन प्रत्ययों के अन्त में संज्ञा को लगाकर ऊनवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
ऊनवाचक बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्यय मूल शब्द /
संज्ञा-विशेषण
ऊनवाचक संज्ञाएँ/उदहारण

ठाकुरठकुरा
इया खाट खटिया
ढोलकढोलकी
ओला
साँपसँपोला
ढोलढोलक
कीकन
कनकी
टा
चोरचोट्टा
टी
बहूबहुटी
ड़ाबाछाबछड़ा
ड़ी टाँग

टँगड़ी
सामरा मरा-सा
रीकोठा कोठरी
ली
टीकाटिकली
वाबच्चाबचवा

सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय-

जिन प्रत्ययों से समता/समानता का बोध हो वह सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

पहचान

  • संज्ञा के अन्त में सा हरा इत्यादि इन प्रत्ययों को लगाकर सादृश्यवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
सादृश्यवाचक  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययसंज्ञा-विशेषण/मूल शब्द
सादृश्यवाचक संज्ञाएँ/उदहारण
सा
लाल, हरालाल-सा, हरा-सा
हरासोनासुनहरा

तद्धितीय विशेषण

  • संज्ञा के अन्त में आ, आना, आर, आल, ई, ईला, उआ, ऊ, एरा, एड़ी, ऐल, ओं, वाला, वी, वाँ, वंत, हर, हरा, हला, हा इत्यादि तद्धित-प्रत्यय लगाकर विशेषण बनते हैं। उदाहरण निम्नलिखित हैं-
तद्धितीय विशेषण  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययसंज्ञा/मूल शब्द
विशेषण/उदहारण

भूखभूखा
आनाहिन्दू
हिन्दुआना
आर

दूधदुधार
देहात
देहाती
आलदयादयाल

बाजार बाजारू
एरा चाचा
चचेरा
एरा मामा
ममेरा
हाभूत भुतहाहरा

स्त्रीवाचक तद्धित प्रत्यय :–

जिन प्रत्ययों को लगाने से स्त्री जाति का बोध हो उसे स्त्रीबोधक तद्धित प्रत्यय कहते हैं

पहचान

संज्ञा,सर्वनाम और विशेषण के साथ लगकर उनके स्त्रीलिंग होने का बोध उत्पन्न हो उन्हें स्त्रीबोधक तद्धित प्रत्यय कहते हैं

 स्त्रीवाचक बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्यय मूल शब्दस्त्रीवाचक/उदहारण
आनी

देवा , जेठ , नौकर + देवरानी , जेठानी , नौकरानी आदि ।
आणी रूद्र , इंद्ररुद्राणी , इन्द्राणी आदि ।
देव , लड़कादेवी , लडकी आदि ।
सुत , प्रिय ,छात्र , अनुजसुता , प्रिया , छात्रा , अनुजा आदि ।
इनधोबी , बाघ , माली धोबिन , बाघिन , मालिन आदि ।
नी
शेर , मोरशेरनी , मोरनी आदि ।
आइन
ठाकुर , मुंशीठकुराइन , मुंशियाइन आदि ।

तारतम्यवाचक तद्धित प्रत्यय :

जो प्रत्यय दो या दो से ज्यादा वस्तुओं की श्रेष्ठता बताने के लिए प्रयोग किए जाते है। उन्हें तारतम्यवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाता है।

तारतम्यवाचक बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय

प्रत्यय मूल शब्द उदहारण
तरअधिक , गुरु , लघुअधिकतर , गुरुतर , लघुतर आदि ।
तमसुंदर , अधिक,, लघुसुन्दरतम , अधिकतम , लघुतम आदि ।
ईय
गर , वर गरिय , वरीय आदि ।
इष्ठ गर , वर , कनगरिष्ठ , वरिष्ठ , कनिष्ठ आदि

पूर्णतावाचक तद्धित प्रत्यय :-

जिन प्रत्ययों से संख्या की पूर्णता का बोध होता है उन्हें पूर्णता वाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं।

पूर्णता वाचक बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय

प्रत्यय मूल शब्दउदहारण
प्रथ , पंच , सप्त , नव , दश प्रथम , पंचम , सप्तम , नवम , दशम आदि ।

चतुर चतुर्थ आदि ।

पष पष्ठ आदि ।
तीय द्वि , तृद्वितीय , तृतीय आदि ।

संस्कृत के तद्धित-प्रत्यय

हिंदी की तरह संस्कृत के तद्धित-प्रत्ययों को भी विभिन्न भागों में व्यक्त किया गया है। जिसमें विभिन्न् शब्दों को मिलाकर उनकी रचना की गई है। ​

पहचान

संस्कृत के तद्धित-प्रत्यय की पहचान निम्न लिखित शब्दों के द्वारा की गई है।

  • अ, अक आयन, इक, इत, ई, ईन, क, अंश, म, तन, त, ता, त्य, त्र, त्व, था, दा, धा, निष्ठ, मान्, मय, मी, य, र, ल, लु, वान्, वी, श, सात् इत्यादि।

जो शब्दांश तद्धित-प्रत्ययों के रूप में प्रयुक्त होते हैं। वे शब्दांश समास के पद रूप में मिलते है। जैसे-

  • अर्थ, अर्थी, आतुर,शाली, हीन आकुल, आढ़य,अतीत, अनुरूप, अनुसार, जन्य, इत्यादि।

अ शब्द रूप में संस्कृत तद्धित-प्रत्यय के उदहारण

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषण तद्धितान्त वाचकउसका संबंध/अर्थ व वाचक
कुरु

कौरवअपत्य
निशानैशगुण, सम्बन्ध
मुनिमौनभाव
अंश
तःअंशतः रीति
आयनरामरामायणस्थान
अंश जन
जनतासमाहर
शिवशौवसंबंध

इ/ई शब्द रूप में संस्कृत तद्धित-प्रत्यय के उदहारण

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणतद्धितान्त वाचकउसका संबंध/अर्थ व ,वाचक

पक्ष पक्षी गुण
इकतर्क
तार्किक जानेवाला
इत पुष्पपुष्पितगुण
ईनकुल
कुलीन गुण

त शब्द रूप में  संस्कृत तद्धित-प्रत्यय के उदहारण

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणतद्धितान्त वाचकउसका संबंध/अर्थ और वाचक
तन
अद्यअद्यतनकाल-सम्बन्ध
त्य

पश्र्चा पाश्र्चात्यसम्बन्ध
त्रअन्यअन्यत्रस्थान
त्व गुरु गुरुत्वभाव
ता जनजनतासमाहार
तः

अंशअंशतः रीति
तालघु
लघुता भाव

म शब्द रूप में  संस्कृत तद्धित-प्रत्यय के उदहारण निम्न है।

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणतद्धितान्त वाचकउसका संबंध/अर्थ और वाचक
मी वाक्वाग्मीकर्तृ
मय काष्ठकाष्ठमय विकार
मान्बुद्धिबुद्धिमान् गुण
मध्यमध्यम गुण
मयजलजलमयव्याप्ति

य,र,ल,व शब्द रूप में  संस्कृत तद्धित-प्रत्यय के उदहारण

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणतद्धितान्त वाचकउसका संबंध/अर्थ / गुण और वाचक
मधुर
माधुर्यभाव

दिति दैत्यअपत्य

ग्रामग्राम्यसम्बन्ध

मधुमधुरगुण
वत्स
वत्सल गुण
लुनिद्रा निद्रालुगुण
वान्
धनधनवान् गुण
वीमाया मायावी गुण

अन्य व्यंजन के साथ संस्कृत तद्धित-प्रत्यय के उदहारण

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणतद्धितान्त वाचकउसका संबंध/अर्थ /गुण और वाचक

रोमरोमेशगुण

कर्क कर्कशस्वभाव
धा
शतशतधाप्रकार
बाल बालक उन 
था
अन्यअन्यथा रीति
निष्ठ कर्म
कर्मनिष्ठ कर्तृ,सम्बन्ध
सात्भस्मभस्मसात्विकार
दासर्वसर्वदाकाल
हिंदी में संस्कृत की तत्सम संज्ञाओं के अन्त में तद्धित-प्रत्यय लगाने से प्रमुख प्रत्ययों का निर्माण होता है।
  • भाव वाचक संज्ञा बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
  • कृर्तवाचक संज्ञा बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
  • पुल्लिग से स्त्रीलिंग  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
  • विशेषण बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
  • क्रिया विशेषण बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
भाव वाचक संज्ञा बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
तद्धित-प्रत्ययमूलशब्द भाव वाचक संज्ञा/उदहारण
इमा –लघु,गुरू,महालालिमा, गरिमा, लघिमा, पूर्णिमा, हरितिमा, मधुरिमा, अणिमा, नीलिमा, महिमा।
त्व –नारी,पुरूष,गुरू,बंधु महत्त्व, लघुत्व, स्त्रीत्व, नेतृत्व, बंधुत्व, व्यक्तित्व, पुरुषत्व, सतीत्व, राजत्व, देवत्व, अपनत्व, नारीत्व, पत्नीत्व, स्वामित्व, निजत्व।
ता –नम्र,आवश्यक,,सुदंर,मानव,शत्रु,मधुर,मित्र,
,
श्रोता, वक्ता, दाता, ज्ञाता, सुंदरता, मधुरता, मानवता, महत्ता, बंधुता,
कृर्तवाचक संज्ञा बनाने वाले शब्द
प्रत्ययमूलशब्दकृर्तवाचक/उदहारण
सुख शास्त्र,अनुभवसुखी शास्त्री अनुभवी
लेख् लिपि पाठलेखिक लिपिक,पाठक
पुल्लिग से स्त्रीलिंग  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययपुल्लिग /मूलशब्दस्त्रीलिंग/उदहारण

प्रिय,बाल,सुत,अनुजप्रिया,बाला,सुता,अनुजा आदि।
पुत्र,बाहम्ण्   
पुत्री,बाहम्णी आदि ।
आनीदेवर , जेठ , नौकर देवरानी , जेठानी , नौकरानी
आदि ।
आइनठाकुर , मुंशीठकुराइन , मुंशियाइन आदि ।
नी शेर , मोरशेरनी , मोरनी आदि ।
इनधोबी , बाघ , मालीधोबिन , बाघिन , मालिन आदि ।
विशेषण बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
तद्धित-प्रत्ययमूलशब्द/संज्ञा विशेषणविशेषण/ उदहारण
इक – धर्म,नगर,परिवार,समाज,सामाजिक, पारिवारिक, धार्मिक,नागरिक,
इत –लिख,कथ,चिंत,खंड, फललिखित, कथित, चिँतित, याचित, खंडित,फलित
इन –सुनार,चमार,माली,मालिक,मालिन, कठिन, बाघिन, मालकिन, मलिन, अधीन, सुनारिन, चमारिन, पुजारिन, कहारिन।
ईय –भारती,जाती,मानवी,राष्ट्रीभारतीय, जातीय, मानवीय, राष्ट्रीय, स्थानीय, भवदीय, पठनीय, पाणिनीय
कर—सुख,दुख,लाभ,हानिचलकर, सुनकर, पीकर, खाकर, उठकर, सोकर, धोकर, जाकर, आकर
तर –अधिक,, कम, कठिन] गुरु]ज्यादाअधिकतर, कमतर, कठिनतर, गुरुतर, ज्यादातर
मान –बुद्धि,मूर्ति,शक्ति,शोभाय,चलायबुद्धिमान, मूर्तिमान, शक्तिमान, शोभायमान, चलायमान
मती – श्री, बुद्धि,ज्ञान,वीर,रूप श्रीमती, बुद्धिमती, ज्ञानमती, वीरमती, रूपमती।
वान – गुण,, कोच,गाड़ी प्रतिभाबाग गुणवान, कोचवान, गाड़ीवान, प्रतिभावान, बागवान, धनवान, पहलवान

क्रिया विशेषण बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
तद्धित-प्रत्ययमूलशब्दक्रिया विशेष
तः –सामान्य,विशेष,मूल, अंश,, अंत,स्व,, प्रा, असामान्यतः, विशेषतः, मूलतः, अंशतः, अंततः, स्वतः, प्रातः, अतः।
पूर्वक – विधि, दृढ़ता,निश्चय, सम्मान,श्रद्धा विधिपूर्वक, दृढ़तापूर्वक, निश्चयपूर्वक, सम्मानपूर्वक, श्रद्धापूर्वक
था –सर्व, अन्यसर्वथा, अन्यथा, चौथा, प्रथा, पृथा, वृथा, कथा, व्यथा।
तया –सामान्यत,, विशेषत,मूलतसामान्यतया, विशेषतया, मूलतया,

संज्ञाओं का रूपांतरण

  • जातिवाचक से भाववाचक
  • व्यक्तिवाचक से अपत्यवाचक
  • विशेषण से भाववाचक संज्ञा
  • संज्ञा से विशेषण-
जातिवाचक से भाववाचक  संज्ञाओं का रूपांतरण– संस्कृत की तत्सम जातिवाचक संज्ञाओं के अन्त में तद्धित प्रत्यय लगाकर भाववाचक संज्ञाएँ बनती हैं।
इसके उदाहरण इस प्रकार है-
तद्धित प्रत्ययसंज्ञा/ मूलशब्दभाववाचक संज्ञा/उदहारण
ताशत्रु
शत्रुता
तावीर वीरता
त्वगुरुगुरुत्व
पण्डित पाण्डित्य
त्वमनुष्य
मनुष्यत्व

मुनिमौन
इमारक्तरक्तिमा

व्यक्तिवाचक से अपत्यवाचक संज्ञाओं का रूपांतरण- अपत्यवाचक संज्ञाएँ किसी नाम के अन्त में तद्धित-प्रत्यय जोड़ने से बनती हैं। अपत्यवाचक संज्ञाओं के कुछ उदाहरण ये हैं-

 

तद्धित-प्रत्यय व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ अपत्यवाचक संज्ञाएँ
तद्धित-प्रत्यय मूलशब्द /व्यक्तिवाचक संज्ञाएँअपत्यवाचक संज्ञाएँ/उदहारण

वसुदेव वासुदेव

कुरु कौरव
पृथा
पार्थ
मनु मानव

पाण्डु
पाण्डव
आयन बदर
बादरायण
एयराधाराधेय
एयकुन्तीकौन्तेय
दितिदैत्य
विशेषण से भाववाचक संज्ञाओं का रूपांतरण-  संस्कृत के तद्धित-प्रत्ययों के मेल से  विशेषण के अन्त में
 लगाकर निम्नलिखित भाववाचक संज्ञाएँ बनाई जाती है।
तद्धित-प्रत्ययमूलशब्द/ विशेषण/उदहारणभाववाचक संज्ञाएँ
ता
बुद्धिमान् ,मूर्ख
बुद्धिमत्ता,मूर्खता
इमा
रक्त ,शुक्लरक्तिमा ,,शुक्लिमा
त्व

लघु ,वीरलघुत्व, वीरत्व

गुरु लघु लाघव,गौरव
ताशिष्टशिष्टता
संज्ञा से विशेषण संज्ञाओं का रूपांतरण- संस्कृत में  संज्ञाओं के अन्त में गुण, भाव या सम्बन्ध के वाचक तद्धित-प्रत्ययों को जोड़कर विशेषण बनाए जाते  हैं। उदाहरणार्थ-
प्रत्ययमूलशब्द /संज्ञा विशेषण/उदहारण

निशानैश


तालु ग्राम,तालव्य, ग्राम्य
इक
मुख , लोकमौखिक,लौकिक
मय, आनन्द ,दया
आनन्दमय, दयामय
इतआनन्द , फलआनन्दित,फलित
इष्ठबल
बलिष्ठ

मुख ,मधुमुखर,मधुर
इम
रक्त रक्तिम
ईनकुल कुलीन
मांसमांसल
निष्ठ कर्मकर्मनिष्ठ
वी मेधामेधावी
इल
तन्द्रा तन्द्रिल
लुतन्द्रा तन्द्रालु

अरबी—फारसी (उर्दू )के तद्धित-प्रत्यय

उर्दू के तद्धित-प्रत्यय जो हिंदी में प्रयुक्त होते है। वे शब्द फारसी, अरबी, और तुर्की भाषा से आए है। जिनका प्रयोग हिंदी के विभिन्न शब्दों में किया जा सकता है।
फारसी तद्धित-प्रत्यय के तीन प्रकार होते है-
  • फारसी तद्धित-प्रत्यय —संज्ञात्मक
  • फारसी तद्धित-प्रत्यय—विशेषणात्मक
  • अरबी तद्धित-प्रत्यय
फारसी तद्धित-प्रत्यय—(संज्ञात्मक)
फारसी तद्धित-प्रत्यय—मूलशब्दसंज्ञात्मक /उदहारण /अर्थ/संबंध/वाचक

सफेद,खराबसफेदा,खराबा भाववाचक
गारमददमददगार, परहेजगार ,
कतृवाचक
ईचा बाग बगीचा स्थितिवाचक
फारसी तद्धित-प्रत्यय—(विशेषणात्मक)
प्रत्ययमूलशब्दउदहारण   अर्थ/संबंध/शब्द
आना मर्द
मर्दानास्वभाव
इन्दाशर्म
शर्मिन्दा संज्ञा
नाक दर्द
दर्दनाक गुण
आसमानआसमानी
विशेषण
ईनाकम
कमीन उनार्थ
ईना माह
महीनासंज्ञा
जादाहरामहरामजादाअपत्य
अरबी फारसी तद्धित-प्रत्यय
प्रत्यय मूलशब्दउदहारण अर्थ/संबंध/वाचक
आनी रूह,मुगल,जिस्म,रूहानी,मुगलानी,जिस्मानी,– जिस्मानी , मर्दानी , बर्फानी , आदि ।विशेषण,—( संबंधवाचक प्रत्यय )
इयतइंसान,हैवान
हैवानियत,इंसानियत आदि । भाव-वाचक
बेग
बेगमआदि । स्त्री-वाचक
दान कलमकलमदानआदि । स्थितिवाचक
आनाजुर्म,दस्त,मस्त,जुर्माना , दस्ताना , मर्दाना ,मस्ताना , आदि ।( भाववाचक , विशेषण वाचक प्रत्यय )
कार – काश्त,शिल्प,दस्त,पेश,सलाह काश्तकार , शिल्पकार , दस्तकार , पेशकार , सलाहकार आदिकरनेवाला –वाचक प्रत्यय )
खोर –
गम, घूस,रिश्वत, हरामगमखोर , घूसखोर , रिश्वतखोर , हरामखोर आदि ।खाने वाला -वाचक प्रत्यय )
मंदअक्ल, जरुरतअक्लमंद , जरुरतमन्द आदि वाला -वाचक प्रत्यय )
गार –मदद,, प,रहेज,याद, , रोज,बेरोजमददगार,गार , मददगार , यादगार , रोजगार , बेरोजगार आदि करनेवाला -विशेषणवाचक प्रत्यय )
गी –जिन्द,, गंद,,, बन्दजिन्दगी , गंदगी , बन्दगी आदि भाववाचक संज्ञा प्रत्यय )
चा – दग, बाग देगचा , बगीचा आदि ।वाला - संज्ञा प्रत्यय)
ची –बगी,इलाय,, , डोल,संदुक बगीची , इलायची , डोलची , संदुकची आदि ।( वाला )वाला -वाचक प्रत्यय )
दान – इत्र,, कलम, पीक इत्रदान , कलमदान , पीकदान आदि ।–
स्थिति वाचक)
दार – ईमान,, कर्ज,,दुकान ईमानदार , कर्जदार दुकानदार , मालदार आदि
वाला -( भाववाचक संज्ञा प्रत्यय )
नाक – खतर, खौफ,दर्द,,शर्म खतरनाक , खौफनाक , दर्दनाक ,शर्मनाक आदि
वाला -भाववाचक)
बान –दर,, बाग, , मेज,दरबान , बागबान , मेजबान आदि
वाला - संज्ञा प्रत्यय)

हिंदी व संस्कृत के प्रत्यय में अंत

  • हिंदी के प्रत्ययों को भी संस्कृत के प्रत्ययों की तरह ही जोड़ा जाता है लेकि
  • इन दोनों में अंतर  है की -संस्कृत में “कृत प्रत्यय और तद्धित प्रत्यय होते हैंलेकिन
  • हिंदी में” तद्भव और देशज प्रत्यय “होते हैं । हिंदी के भी अनेक प्रत्ययों को प्रयोग किया जाता है ।
इतिहास या स्रोत के आधार पर हिन्दी प्रत्ययों को चार वर्गो में विभाजित किया जाता है
  •  तत्सम प्रत्यय
  • तद्भव प्रत्यय
  • देशज प्रत्यय
  • विदेशज प्रत्यय
1).तत्सम प्रत्यय
प्रत्यय उदाहरणअर्थ/संबंध /वाचक
आदरणीया, प्रिया, माननीया, सुता, इच्छा, पूजाभाववाचक संज्ञा-स्त्री प्रत्यय
आनीदेवरानी, भवानी, मेहतरानीस्त्री वाचक
कारपत्रकार, जानकरलिखने या बनाने वाला; वाला
इतयुक्त पल्लवित, पुष्पित, फलित, हर्षितविशेषण वाचक
इकदैनिक, वैज्ञानिक, वैदिक, लौकिक विशेषण व संज्ञा
आलु वाला कृपालु, दयालु, निद्रालु, श्रद्धालु विशेषण वाचक ,
इमागरिमा, नीलिमा, मधुरिमा, महिमाभाववाचक संज्ञा प्रत्यय
स्वार्थ, समूह घटक, ठंडक, शतक, सप्तक वाचक प्रत्यय
अंडज, जलज, पंकज, पिंडज,देशज, विदेशजजन्मा हुआ -संबंध वाचक
जीवी परजीवी, बुद्धिजीवी, लघुजीवी, दीर्घजीवी जीनेवाला--संबंध वाचक
ज्ञ अज्ञ, मर्मज्ञ, विज्ञ, सर्वज्ञ जाननेवाला-जिज्ञासा वाचक
तःमुख्यतया, विशेषतया, सामान्ततयाक्रिया विशेषण प्रत्यय
तरउच्चतर, निम्नतर, सुन्दरतर, श्रेष्ठतरतुलना बोधक प्रत्यय
तम
उच्चतम, निकृष्टतम, महत्तम लघुतमसर्वाधिकता बोधक प्रत्यय
तानवीनता, मधुरता, सुन्दरताभाववाचक संज्ञा प्रत्यय
त्वकृतित्व, ममत्व, महत्व, सतीत्वभाववाचक संज्ञा प्रत्यय
मानउच्चतम, निकृष्टतम, महत्तम, लघुतमविशेषण वाचक प्रत्यय
वान गुणवान, धनवान, बलवान, रूपवानवाला-वाचक प्रत्यय
2).तद्भव प्रत्यय
   
-आजोड़ा, फोड़ा, झगड़ा, रगड़ा
भाववाचक
-आलू झगड़ालू, दयालु
करनेवाला
-आवट कसावट, बनावट, बिनावट, लिखावट, सजावटभाववाचक प्रत्यय
-आस छपास, प्यास, लिखा, निकासइच्छावाचक प्रत्यय
-आहट/-आहतगड़गड़ाहट, घबराहट, चिल्लाहट, भलमनसाहतभाववाचक प्रत्यय
-इनजुलाहिन, ठकुराइन, तेलिन, पुजारिन स्त्री प्रत्यय
-इया चुटिया, चुहिया, डिबिया, कनौजिया, भोजपुरियावाला; लघुत्व, बोधक; स्त्री प्रत्यय
-एराचचेरा, फुफेरा, बहुतेरा, ममेरावाला -संबंध वाचक
-इलाचमकीला, पथरीला, शर्मीलावाला -विशेषण वाचक
-औड़ा/-औड़ी पकौड़ी, सेवड़ा, रेवड़ी लिंगवाचक
-त/-ता चाहत, मिल्लत, आता, खाता, जाता, सोता भाववाचक, कर्मवाचक
-पनछुटपन, बचपन, बड़प्पन, पागलपन भाववाचक प्रत्यय
वालाअपनेवाला, ऊपरवाला, खानेवाला, जानेवाला, लालवाला कर्तृवाचक, विशेषण
आप/आपाअपनापा, पुजापा, बुढ़ापा मिलापभाववाचक प्रत्यय
आर/आरा/आरीकुम्हार, लुहार, चमार, घसियारा, पुजारी, भिखारीकरनेवाला
-अंगड़बतंगड़वाला
-अंतूरटंतू, घुमंतूवाला
-अत
खपत, पढ़त, रंगत, लिखतसंज्ञा प्रत्यय
-आँधबिषांध, सराँधसंज्ञा प्रत्यय
आई कठिनाई, बुराई, सफाई
-
भाववाचक प्रत्यय
-आऊखाऊ, टिकाऊ, पंडिताऊ, -बिकाऊ वाला
3).देशज प्रत्यय
प्रत्ययउदाहरण बोधक/अर्थ
अड़ अंधड़, भुक्खड़स्वार्थिक
-आक खर्राटा, फर्राटा भाववाचक
-इयल अड़ियल, दढ़ियल, सड़ियल वाला
-अक्कड़घुमक्कड़, पियक्कड़, भुलक्कड़वाला
 4).विदेशज प्रत्यय
  •  अरबी-फारसी प्रत्यय
प्रत्यय उदाहरणबोधक/अर्थ
-गार परहेजगार, मददगार, यादगार, रोजगारकरनेवाला
-गी गन्दगी, जिन्दगी, बंदगी भाववाचकसंज्ञा प्रत्यय
-चा/चीदेगचा, बगीचा, इलायची, डोलची, संदूकचीवाला
-दानइत्रदान, कलमदान, पीकदानस्थिति वाचक
-दारईमानदार, कर्जदार, दूकानदार, मालदार वाला
-नाकखतरनाक, खौफनाक, दर्दनाक, शर्मनाकवाला
-बानदरबान, बागबान, मेजबान अज्ञ, मर्मज्ञ, विज्ञ, सर्वज्ञवाला
-मंद अक्लमंद, जरूरतमंदवाला
-आना जुर्माना, दस्ताना, मर्दाना, मस्तानाभाववाचक विशेषण वाचक
-खोर
गमखोर, घूसखोर, रिश्वतखोर, हरामखोरखानेवाला
-कारकाश्तकार, दस्तकार, सलाहकार, पेशकारकरनेवाला
-आनी जिस्मानी, बर्फ़ानी, रूहानीसंबंधवाचक
  • अंग्रेजी प्रत्यय
प्रत्ययउदाहरणबोधक/अर्थ
-इज्म कम्युनिज्म, बुद्धिज्म, सोशलिज्मवाद/मत
-इस्टकम्युनिस्ट, बुद्धिस्ट, सोशलिष्टवादी/व्यक्ति

कारक की परिभाषाअर्थ, प्रकार/भेद,नियम/पहचान(Karak in Hindi)

कारक की परिभाषा(Definition of Case)

कारक के बारे में बहुत सी भ्रातियॉं है। अधिकतर लोगों के लिए कारक का अर्थ है— कि” ने, से ,को, में, पर” आदि परसर्ग चिह्न है, परंतु ध्याान रखिए –परसर्ग या कारक चिह्न स्वंय में कारक नहीं है। बल्कि कारकों को सूचित करने वाले चिह्न है।

अर्थात हम जानते है कि– वाक्य की रचना क्रिया पद तथा एक या एक से अधिक संज्ञा पदों के योग से होती है। वाक्य में आने वाली प्रत्येक उस वाक्य की क्रिया को सम्पन्न कराने में कुछ ना कुछ सहयोग अवश्य देती है। अत: इन सभी संज्ञा पदों का वाक्य की क्रिया के साथ कोई न कोई संबंध जुड जाता है। इस तरह हर संज्ञा का क्रिया के साथ अलग अलग संबंध होता है।
उदहारण के लिए —

  • वाक्य -1 कुली ने रेलगाडी में सूटकेस चढाया।
  • वक्य-2  बच्चे ने पेसिंल से चित्र बनाया।
  • वाक्य-3 मॉं ने नौकर को मिठाई दी।

उपर्युक्त वाक्यों में किसी ना किसी का संबंध एक दूसरे से अवश्य है।

दूसरे शब्दों में – संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) सम्बन्ध सूचित हो, उसे (उस रूप को) ‘कारक’ कहते हैं।

इन दो ‘परिभाषाओं’ का अर्थ- यह हुआ कि संज्ञा या सर्वनाम के आगे जब ‘ने’, ‘को’, ‘से’ आदि विभक्तियाँ लगती हैं, तब उनका रूप ही ‘कारक’ कहलाता है।

तभी वे वाक्य के अन्य शब्दों से सम्बन्ध रखने योग्य ‘पद’ होते है और ‘पद’ की अवस्था में ही वे वाक्य के दूसरे शब्दों से या क्रिया से कोई लगाव रख पाते हैं। ‘ने’, ‘को’, ‘से’ आदि विभित्र विभक्तियाँ विभित्र कारकों की है। इनके लगने पर ही कोई शब्द ‘कारकपद’ बन पाता है और वाक्य में आने योग्य होता है। ‘कारकपद’ या ‘क्रियापद‘ बने बिना कोई शब्द वाक्य में बैठने योग्य नहीं होता।

अन्य शब्दों में- संज्ञा अथवा सर्वनाम को क्रिया से जोड़ने वाले चिह्न अथवा परसर्ग ही कारक कहलाते हैं।इन चिह्नों को कारक चिह्न या परसर्ग कहते है। इन्हें विभक्ति चिह्न भी कहा जाता है।
जैसे-

  • ”रामचन्द्रजी ने खारे जल के समुद्र पर बन्दरों से पुल बँधवा दिया।”

इस वाक्य में ‘रामचन्द्रजी ने’, ‘समुद्र पर’, ‘बन्दरों से’ और ‘पुल’ संज्ञाओं के रूपान्तर है, जिनके द्वारा इन संज्ञाओं का सम्बन्ध ‘बँधवा दिया’ क्रिया के साथ सूचित होता है।
दूसरा उदाहरण-

  • श्रीराम ने रावण को बाण से मारा

इस वाक्य में प्रत्येक शब्द एक-दूसरे से बँधा है और प्रत्येक शब्द का सम्बन्ध किसी न किसी रूप में क्रिया के साथ है।
यहाँ ‘ने’ ‘को’ ‘से’ शब्दों ने वाक्य में आये अनेक शब्दों का सम्बन्ध क्रिया से जोड़ दिया है। यदि ये शब्द न हो तो शब्दों का क्रिया के साथ तथा आपस में कोई सम्बन्ध नहीं होगा। संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया के साथ सम्बन्ध स्थापित करने वाला रूप कारक होता है।

विभक्ति या परसर्ग –

जिन प्रत्ययों की वजह से कारक की स्थिति का बोध होता है, उसे विभक्ति या परसर्ग कहते हैं।–
जैसे

  • पेङ पर फल लगते हैं।

इस वाक्य में पेङ कारकीय पद हैं और ’पर’ कारक सूचक चिन्ह अथवा विभक्ति

अर्थात हम कह सकते है। कि जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम का संबंध क्रिया के साथ स्थापित करते है। उन्हें कारक चिह्न या परसर्ग कहते है। जैसे

  • लडका किताब पढ रहा है।
  • राम ने किताब पढी।
  • राम ने नौकर को बुलाया।
  • राम कलम से लिखता है।
  • राम भाई के लिए कपडे लाया।
  • उसने भाई को पैसे दिए।
  • पत्ता पेड से गिरा।
  • ह कमरे में सो रहा है।

इन वाक्यों में संज्ञाओं का क्रिया से संबंध बताने के लिए कुछ चिह्नों का प्रयोग किया गया है जैसे

  • ने ,को ,से ,के लिए, में आदि।

कारक का अर्थ (Meaning of Case)

किसी वाक्य में प्रयुक्त संज्ञा या सर्वनाम पदों का उस वाक्य की क्रिया से जो संबंध होता है। उसे कारक कहते है।

सरल शब्दों में — वाक्य में जिस शब्द का सम्बंध क्रिया से होता है। उसे कारक कहते है। इन्हे विभक्ति या परसर्ग बाद में जुडने वाले भी कहा जाता है।

दूसरे शब्दों में —कारक का अर्थ होता है –किसी कार्य को करने वाला।

अर्थात जो भी क्रिया को करने में अहम भूमिका निभाता है, वह कारक कहलाता है। ये समान्यत: स्वतंत्र होते है, और संज्ञा या सर्वनाम के साथ प्रयुक्त होते है। हिंदी में परसर्ग प्रत्ययों का विकसित रूप है।

कारक के उदाहरण (Example of case)

  • वह रोज़ सुबह गंगा किनारे जाता है।
  • वह पहाड़ों के बीच में है।
  • नरेश खाना खाता है।
  • सूरज किताब पढता है।

कारक के भेद-(Type of Case)

हिन्दी में कारको की संख्या आठ है-

  1. कर्ता कारक (Nominative case)
  2. कर्म कारक (Accusative case)
  3. करण कारक (Instrument case)
  4. सम्प्रदान कारक(Dative case)
  5. अपादान कारक(Ablative case)
  6. सम्बन्ध कारक (Gentive case)
  7. अधिकरण कारक (Locative case)
  8. संबोधन कारक(Vocative case)

कारक के लक्षण, चिन्ह, और विभक्ति 

क्रमकारक का नाम चिह्न तथा विभक्ति -लक्षण,पहचान/परिभाषाप्रयोग/उदहारण
1कर्ता कारक (Nominative case)ने चिह्न- प्रथमा विभक्तिक्रिया को पूरा करने वालापारूल ने नृत्य किया
पारूल चली गई
2कर्म कारक (Accusative case)को चिह्न-द्वितीया विभक्तिक्रिया को प्रभावित करने वालापारूल ने राधा को पढ़ाया।
पारूल चली गई।
3करण कारक (Instrument case)
से, के द्वारा चिह्न-- तृतीया विभक्ति

क्रिया का साधनपारूल ने चाकू से सब्जी काटी।
उसे पत्र द्वारा सूचना भेजो
4सम्प्रदान कारक(Dative case)
को, के लिए चिह्न--चतुर्थी विभक्तिजिसके लिए काम होगरीबों को वस्त्र दो।
पारूल राधा के लिए गेंद लाई।
5अपादान कारक(Ablative case)
से चिह्न--पंचमी विभक्तिजहाँ पर अलगाव होपारूल कुरसी से उठी।
6सम्बन्ध कारक (Gentive case)
हो का, की, के, रा, री, रे चिह्न--षष्ठी विभक्ति
जहाँ पर पदों में संबंधपारूल की दादी आई।
7अधिकरण कारक (Locative case)
में, पर चिह्न-- सप्तमी विभक्ति
का आधार होनापारूल कार में गई।
पुस्तक मेंज पर है।

8संबोधन कारक(Vocative case) हे, अरे!, हो!चिह्न-- सम्बोधन विभक्ति किसी को पुकारनाहे! भगवान रक्षा करो।
अरे! पारूल तु गाती भी है।

कर्ता कारक

वाक्य की वह संज्ञा या सर्वनाम जो क्रिया को सम्पन्न करने का कार्य करती है या उसकी भोक्ता होती ​है। वह कर्ता कारक में कही जाती है।

दूसरे शब्दों में ——संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया (कार्य) के करने वाले का बोध होता है वह कर्ता’ कारक कहलाता है।

सरल शब्दों में —जो वाक्य में कार्य करता है, उसे कर्ता कहा जाता है। अथार्त वाक्य के जिस रूप से क्रिया को करने वाले का पता चले, उसे कर्ता कहते हैं।

अर्थात  क्रिया का करने वाला ‘कर्ता’ कहलाता है। कर्ता कारक की विभक्ति ‘ने’ होती है।

जैसे-

  • लवकुश खाता है।” इस वाक्य में खाने का काम लवकुश करता है अतः कर्ता लवकुश है ।
  • मनु ने पत्र लिखा।” इस वाक्य क्रिया का करने वाला ‘मनु’ कर्ता है।

कर्ता कारक के अन्य उदाहरण :

  • रामू ने अपने बच्चों को पीटा।
  • समीर जयपुर जा रहा है।
  • नरेश खाना खाता है।
  • विकास ने एक सुन्दर पत्र लिखा।

विशेष-

-कभी-कभी कर्ता कारक में ‘ने’ चिह्न नहीं भी लगता है। जैसे-

  • घोड़ा’ दौड़ता है।
  • नम्रता नहाती है।
  • राधा नाचती है।

–विभक्ति  ने का प्रयोग भूतकाल की क्रिया में किया जाता है। कर्ता स्वतंत्र होता है। कर्ता कारक में ने विभक्ति का लोप भी होता है।

–इस ‘ने’ चिह्न का वर्तमानकाल और भविष्यकाल में प्रयोग नहीं होता है। इसका सकर्मक धातुओं के साथ भूतकाल में प्रयोग होता है।जैसे

  • राम ने रावण को मारा।
  • लड़की स्कूल जाती है।
  • अध्यापक ने विद्यार्थियों को पढ़ाया।

-इसका हिन्दी पर्याय ‘ने’ है। इस ‘ने’ चिह्न का वर्तमानकाल और भविष्यकाल में प्रयोगनहीं होता है। इसका सकर्मक धातुओं के साथ भूतकाल में प्रयोग होता है।

हले वाक्य में– क्रिया का कर्ता राम है। इसमें ‘ने’ कर्ता जताता है। इस वाक्य में मारा’ भूतकाल की क्रिया है। ‘ने’ का प्रयोग प्रायः भूतकाल में होता है।

–दूसरे वाक्य में– वर्तमानकाल की क्रिया का कर्ता लड़की है। इसमें ‘ने’ का प्रयोग नहीं हुआ है।

–तीसरे वाक्य  में– ‘अध्यापक’ कर्ता है, क्योंकि काम करने वाला अध्यापक है

अन्य ध्यान रखने योगय बातें

भूतकाल में अकर्मक क्रिया के कर्ता के साथ भी ने परसर्ग नहीं लगता है। जैसे-

  • वह हँसा।
  • तुम रोये।
  • वो चला आदि।

वर्तमानकाल व भविष्यतकाल की सकर्मक क्रिया के कर्ता के साथ ने परसर्ग का प्रयोग नहीं होता है। जैसे-

  • वह फल खाता है।
  • वह फल खाएगा।

कर्मवाच्य और भाव वाच्य कर्ता के साथ  ‘से’ का प्रयोग भी किया जाता है। जैसे-

  • सीता से पुस्तक पढ़ी गई।
  • रोगी से चला भी नहीं जाता।
  • उससे शब्द लिखा नहीं गया।

 

जो क्रिया अकर्मक होती है। तो उसके साथ विभक्ति चिह्न नहीं लगता ने विभक्ति चिहृन सकर्मक क्रिया के भूतकाल में लगता है।

  • दानिश ने चाकलेट ली।
  • गर्वित ने गुब्बारे खरीदे।
  • राधा ने खाना बनाया।

कर्मवाच्य और भाव वाच्य कर्ता के साथ ‘को’ का प्रयोग- भी किया जाता है। जैसे-

  • बालक को सो जाना चाहिए।
  • राधा को पढ लेना चाहिए।
  • विकास को चले जाना था।

विधि-क्रिया (‘चाहिए’ आदि) और संभाव्य भूत (‘जाना था’, ‘करना चाहिए था’ आदि) में कर्ता ‘को’ के साथ आता है।जैसे

  • राम को जाना चाहिए।
  • राम को जाना था,
  • जाना चाहिए था।

 

विभक्ति-चिह्न  ‘ने’ का प्रयोग कर्ता के साथ निम्न रूपों में करना चाहिए

विभक्ति’ने’ का प्रयोग निम्नलिखित नियमों  में होता है।

अकर्मक क्रिया में सामान्य रूप से ‘ने’ विभक्ति नहीं लगती, लेकिन थूकना,नहाना, छींकना, खाँसना कुछ ऐसी अकर्मक क्रियाएँ है। जिनमें ‘ने’ चिह्न या विभक्ति का प्रयोग अपवादस्वरूप होता है। इन क्रियाओं के बाद कर्म नहीं आता।जैसे-

  • इसने थूका।
  • लता ने छींका।
  • तुमने खाँसा।
  • उसने नहाया।

जब अकर्मक क्रिया सकर्मक क्रिया का रूप धारण कर लेती है।  तब ‘ने’ का प्रयोग होता है, अन्यथा नहीं।जैसे-

  • उसने  चाल सीधी चली।
  • उसने लडाई लड़ी।

जब संयुक्त क्रिया के दोनों खण्ड सकर्मक हों तब अपूर्णभूत को छोड़कर  शेष सभी भूतकालों में कर्ता के आगे ‘ने’ चिह्न का प्रयोग होता है।जैसे-

  • श्याम ने सीधा कह दिया।
  • किशोर ने देख लिया।

प्रेरणार्थक क्रियाओं के साथ सदैव अपूर्णभूत काल  को छोड़कर शेष सभी भूतकालों में ‘ने’ का प्रयोग होता है।जैसे-

  • तुमने उसे पढ़ाया।
  • उसने एक रुपया दिलवाया।

 

कर्ता के साथ ‘ने’ का प्रयोग तब होता है जब संयुक्त क्रिया सकर्मक भूतकालिक होती है।  लेकिनसामान्य भूत, आसन्न भूत, पूर्ण भूत, संदिग्ध भूत, हेतुहेतुमद् भूत कालों में ‘ने’ विभक्ति लगती है। जैसे-

  1. सामान्य भूत- राम ने रोटी खायी।
  2. आसन्न भूत राम ने रोटी खायी है।
  3. पूर्ण भूत- रा ने रोटी खायी थी।
  4. संदिग्ध भूतराम ने रोटी खायी होगी।
  5. हेतुहेतुमद् भूत- राम ने पुस्तक पढ़ी होती, तो उत्तर ठीक होता।

तात्पर्य यह है कि –केवल अपूर्ण भूत को छोड़ शेष पाँच भूतकालों में ‘ने’ का प्रयोग होता है।

विभक्ति-चिह्न  ‘ने’ का प्रयोग कर्ता के निम्न स्थानों और नियमों में नहीं होता

विभक्ति  ‘ने’ का प्रयोग निम्नलिखित स्थितियों में नहीं होता है।

वर्तमान और भविष्यत् कालों की क्रिया में कर्ता के साथ ‘ने’ का प्रयोग नहीं होता।जैसे-

  • राम जाता है। राम जायेगा।

सकर्मक क्रिया में जैसे — “बकना, बोलना, भूलना” आदि  क्रियाओं में ने का प्रयोग हो सकता है।  लेकिन अपवादस्वरूप सामान्य, आसत्र, पूर्ण और सन्दिग्ध भूतकालों में कर्ता के ‘ने’ चिह्न का व्यवहार नहीं होता।जैसे-

  • वह गाली बका।
  • वह बोला।
  • वह मुझे भूला।

क्रिया हाँ और बोलना” में कहीं-कहीं ‘ने’ विभक्ति का प्रयोग हो जाता है। जैसे-

  • उसने बोलियाँ बोलीं।
  • ‘वह बोलियाँ बोला’- ऐसा भी लिखा या कहा जा सकता है।

यदि संयुक्त क्रिया का अन्तिम खण्ड अकर्मक होता है।  तो उसमें ‘ने’ का प्रयोग नहीं होता है।।जैसे-

  • मैं चल चुका।
  • वह पुस्तक ले आया।
  • उसे सामान  ले जाना है।

जिन वाक्यों में लगना, जाना, सकना तथा चुकना आदि  सहायक क्रियाएँ होती हैं उनमे ‘ने’ का प्रयोग नहीं होता।जैसे-

  • वह देख चुका।
  • मैं खाना खाने लगा।
  • उसे कल जाना हैं।

(2)कर्म कारक (Accusative/objective case)

वाक्य में जब क्रिया का फल कर्ता पर न पडकर किसी अन्य संज्ञा या सर्वनाम पर पडता है। तो उसे कर्म कारक कहतेहै

अर्थात कहने का तात्पर्य है कि—जिस संज्ञा या सर्वनाम पर क्रिया का प्रभाव पड़े उसे कर्म कारक कहते है।

अन्य शब्दों में —वह वस्तु या व्यक्ति जिस पर वाक्य में की गयी क्रिया का प्रभाव पड़ता है वह कर्म कहलाता है।कर्म कारक का विभक्ति चिन्ह ‘को’ होता है।

  • गोपाल ने राधा को बुलाया।
  • रामू ने घोड़े को पानी पिलाया।
  • माँ ने बच्चे को खाना खिलाया।
  • मेरे दोस्त ने कुत्तों को भगाया।उदाहरण :

दूसरे शब्दों में– वाक्य में क्रिया का फल जिस शब्द पर पड़ता है, उसे कर्म कारक कहते है।इसकी विभक्ति ‘को’ है।जैसे

  • राधा बच्चे को सुला रही है।

इस वाक्य में सुलाने की क्रिया का प्रभाव बच्चे पर पड़ रहा है। इसलिए ‘बच्चे को’ कर्म कारक है।

कर्म कारक के वाक्य में अन्य उदहारण

  • उसने श्याम को पढ़ाया।
  • राहुल ने चोर को पकङा।
  • लङकी ने लङके को देखा।
  • राम पुस्तक पढ़ रहा है।
  • मजदूरो ने मकान को गिरा दिया।

मुख्य बिन्दु

कर्म कारक की पहचान करने के लिए मुख्य क्रिया के सा​थ क्या लगाकर प्रश्न किया जाता है। जैसे

  • वह क्या पढता है?
  • उत्तर —पुस्तक
  • यह उत्तर कर्म है।

विशेष-

कर्म के साथ ’को’ विभक्ति आती है। इसकी यही मुख्य पहचान होती है। कभी-कभी को विभक्ति का लोप भी हो जाता है। जैसे

  • वह पुस्तक पढ़ता है।—( परसर्ग् नहीे)
  • उसने पुस्तक को पढ़ा—( परसर्ग को का प्रयोग)

कभी-कभी ‘को’ चिह्न का प्रयोग नहीं भी होता है। जैसे-

  • मोहन पुस्तक पढता है।
  • राधा नाचती है।
  • लता खाना खाती है।

कर्मकारक का प्रत्यय चिह्न ‘को’ है। बिना प्रत्यय के या अप्रत्यय कर्म के कारक का भी प्रयोग होता है।

समान्य रूप से —”बुलाना, सुलाना, कोसना, पुकारना, जगाना, भगाना” आदि क्रियाओं के कर्मों के साथ ‘को’ विभक्ति लगती है।जैसे-

  • मैंने राकेश को बुलाया।
  • सीता ने बच्चे को सुलाया।
  • शीला ने सावित्री को जी भर कोसा।
  • माता ने पुत्र को पुकारा।
  • हमने उसे खूब सबेरे जगाया।
  • लोगों ने शेरगुल करके डाकुओं को भगाया।

क्रिया ‘मारना’ का अर्थ जब ‘पीटना’ होता है तो तब कर्म के साथ को विभक्ति लगती है, जैसे-

  • लोगों ने चोर को मारा।
  • राम ने बैल को मारा।

लेकिन जब क्रिया मारना का अर्थ ‘शिकार करना‘ होता है तब वाक्य के साथ को विभक्ति नहीं लगती, अर्थात कर्म अप्रत्यय रहता है।
जैसे

  • पर- शिकारी ने बाघ मारा।
  • पर- मछुए ने मछली मारी।

बहुधा कर्ता में विशेष कर्तृत्वशक्ति जताने के लिए कर्म सप्रत्यय रखा जाता है।
जैसे-

  • मैंने यह कुआ खुदवाया है,
  • मैंने इस कुआ को खुदवाया है।
  • दोनों वाक्यों में अर्थ का अन्तर ध्यान देने योग्य है।

पहले वाक्य के कर्म से कर्ता में साधारण कर्तृत्वशक्ति का और
दूसरे वाक्य में कर्म से कर्ता में विशेष कर्तृत्वशक्ति का बोध होता है।

इस तरह के अन्य वाक्य के प्रयोग में भी को विभक्ति का पयोग किया जाता है-

  • शेर बकरी को खा गया,
  • मनीष ने ही पेड़ को काटा है,
  • लड़के ने फलों को तोड़ लिया इत्यादि।

जहाँ कर्ता में विशेष कर्तृत्वशक्ति का बोध कराने की आवश्यकता न हो, वहाँ सभी स्थानों पर कर्म को सप्रत्यय नहीं रखना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, जब कर्म निर्जीव वस्तु हो, तब ‘को’ का प्रयोग नहीं होना चाहिए। जैसे- ‘

  • राम ने रोटी को खाया’ की अपेक्षा ‘राम ने रोटी खायी ज्यादा अच्छा है।
  • मैं कॉंलेज को जा रहा हूँ
  • मैं आम को खा रहा हूँ
  • मैं कोट को पहन रहा हूँ

इन उदाहरणों में ‘को’ का प्रयोग बहुत ही भद्दा लग रहा है। प्रायः चेतन पदार्थों के साथ ‘को’ चिह्न का प्रयोग होता है और अचेतन के साथ नहीं। पर यह अन्तर वाक्य-प्रयोग पर निर्भर करता है।

कर्म सप्रत्यय रहने पर क्रिया सदा पुंलिंग होगी, किन्तु अप्रत्यय रहने पर कर्म के अनुसार होती है। ।
जैसे-

  • तुम्हारे बेटे ने किताब को फाडा——-(सप्रत्यय)
  • तुम्हारे बेटे ने किताब को फाड दिया— (अप्रत्यय)
  • राम ने रोटी को खाया ————–(सप्रत्यय)
  • राम ने रोटी खायी—————— (अप्रत्यय)।

यदि विशेषण संज्ञा के रूप में प्रयुक्त होंते है तो कर्म में ‘को’ अवश्य लगता है।
जैसे-

  • अपनो से बड़ों का पहले आदर करो ।
  • अपनों से छोटों को प्यार करना चाहिए।

को विभक्ति चिह्न भी बहुत-से स्थानों पर नहीं लगता। कार्य का फल अर्थात प्रभाव जिस पर पड़ता है, उसे कर्म कारक कहते हैं
जैसे –

  • राम ने आम को खाया।

इस वाक्य में ‘आम’ कर्म है, क्योंकि राम के कार्य (खाने) का प्रभाव आम पर पड़ा है।जैसे-

  1. मोहन ने साँप को मारा।
  2. लड़की ने पत्र लिखा।

पहले वाक्य में— ‘मारने’ की क्रिया का फल साँप पर पड़ा है। अतः साँप, कर्म कारक है। इसके साथ परसर्ग ‘को’ लगा है।
दूसरे वाक्य में —‘लिखने’ की क्रिया का फल पत्र पर पड़ा। अतः पत्र, कर्म है। इसमें कर्म कारक का हिंदी पर्याय ‘को’ नहीं लगा।

(3)करण कारक (Instrument case)

करण का अर्थ —साधन होता है।
कर्ता जिस साधन से क्रिया करता है। उसे करण कारक कहते है।

सरल शब्दों में— संज्ञा या सर्वनाम के जो रूप क्रिया होने के साधन या माध्यम होते है।उन्हें करण कारका कहते है।

अर्थात कहने का तात्पर्य करण कारक— ऐसे साधन को कहते है जिसमें क्रिया होती है और उसकी सहायता से किसी काम को अंजाम दिया जाता है। वह करण कहलाता है। करण कारक के दो विभक्ति चिन्ह होते है -“ से और के द्वारा”।उदाहरण :

  • मैने चाकू से सेब काटा। —इसमें चाकू सेब को काटने का साधन है।
  • वह बस द्वारा बगलौर जाता है। —यहॉं बस स्कूल जाने का साधन है।

अन्य शब्दों में— जिस वस्तु की सहायता से या जिसके द्वारा कोई काम किया जाता है, उसे करण कारक कहते है।

दूसरे शब्दों में- वाक्य में जिस शब्द से क्रिया के सम्बन्ध का बोध हो, उसे करण कारक कहते है।
इसकी विभक्ति ‘से’ है।
जैसे-

  • बच्चे गाड़ियों से खेल रहे हैं।
  • पत्र को कलम से लिखा गया है।
  • राम ने रावण को बाण से मारा।
    अमित सारी जानकारी पुस्तकों से लेता है।

मुख्य बिन्दु

हिन्दी में करणकारक के अन्य चिह्न है- से, द्वारा, के द्वारा, के जरिए, के साथ, के बिना इत्यादि।

इन चिह्नों में अधिकतर प्रचलित शब्द —से’, ‘द्वारा’, ‘के द्वारा’ ‘के जरिए’ इत्यादि ही है। के साथ’, के बिना’ आदि
साधनात्मक योग-वियोग जतानेवाले अव्ययों के कारण, साधनात्मक योग बतानेवाले ‘के द्वारा’ की ही तरह के करणकारक के चिह्न हैं।

करन’ का अर्थ है ‘साधन’। अतः ‘से’ चिह्न वहीं करणकारक का चिह्न है जहाँ यह साधन’ के अर्थ में प्रयुक्त हो।
जैसे-

  • मुझसे यह काम न सधेगा। यहाँ ‘मुझसे’ का अर्थ है ‘मेरे द्वारा’,

मुझ साधनभूत के द्वारा’ या ‘मुझ-जैसे साधन के द्वारा। अतः ‘साधन’ को इंगित करने के कारण यहाँ ‘मुझसे’ का ‘से’ करण का विभक्तिचिह्न है।

करणकारक का क्षेत्र अन्य सभी कारकों से विस्तृत है। इस कारण में अन्य समस्त कारकों से छूटे हुए प्रत्यय या वे पद जो अन्य किसी कारक में आने से बच गए हों, आ जाते है।

करण कारक के सबसे अधिक प्रत्ययचिह्न हैं। जिनमें ‘ने’ भी करण कारक का ऐसा चिह्न है जो करणकारक के रूप में संस्कृत में आये कर्ता के लिए ‘एन’ के रूप में कर्मवाच्य और भाववाच्य में आता है। लेकिन हिन्दी की प्रकृति ‘ने’ को सप्रत्यय कर्ताकारक का ही चिह्न मानती है।

करण कारक की पहचान और नियम

करन कारक और अपादान कारक दोनों विभक्तियों का चिह्न ‘से’ है, लेकित साधनभूत का प्रत्यय होने पर करण कारक माना जाता है, जबकि अलगाव का प्रत्यय होने पर अपादान।
जैसे-

  • दुकानदार तराजु से सामान तोलता है।
  • वह बस से घर पहुचॉं
  • वह कुल्हाड़ी से वृक्ष काटता है।
  • मुझे अपनी कमाई से खाना मिलता है।
  • साधुओं की संगति से बुद्धि सुधरती है।

यह पाचों वाक्य करण कारक के है।

  • तराजु से सामान तोला
  • बस से घर पहुचॉ।
  • पेड़ से फल गिरा।
  • घर से लौटा हुआ लड़का।
  • छत से उतरी हुई लता।

यह पाचों वाक्य अपादान के है।

यहॉं सप्रत्यय कर्ता कारक का चिह्न ‘ने’ है। लेकिन ‘से’, ‘के द्वारा’ और ‘के जरिये’ हिन्दी में प्रधानत करणकारक के ही प्रत्यय माने जाते है; क्योंकि ये सारे प्रत्यय ‘साधन’ अर्थ की ओर इंगित करते हैं।
जैसे-

  • मुझसे यह काम न सधेगा।
  • उसके द्वारा यह कथा सुनी थी।
  • आपके जरिये ही घर का पता चला।
  • तीर से बाघ मार दिया या।
  • मेरे द्वारा मकान ढहाया गया था।

यदि एकवचन करणकारक में भूख, प्यास, जाड़ा, आँख, कान, पाँव इत्यादि शब्द सप्रत्यय में होते है। तो वह एकवचन होते है ,और अप्रत्यय में रहते है वह तो बहुवचन।

जैसे-

  • वह भूख से बेचैन है;………… वह भूखों बेचैन है;
  • लड़का प्यास से मर रहा है;………… लड़का प्यासों मर रहा है।
  • स्त्री जाड़े से काँप रही है;…………. स्त्री जाड़ों काँप रही है।
  • मैंने अपनी आँख से यह घटना देखी;…….. मैंने अपनी आँखों यह घटना देखी।
  • कान से सुनी बात पर विश्र्वास नहीं करना चाहिए;………. कानों सुनी बात पर विश्र्वास नहीं करना चाहिए
  • लड़का अब अपने पाँव से चलता है;…………. लड़का अब अपने पाँवों पर चलता है।

अपादान का भी विभक्तिचिह्न ‘से’ है। जिसमें अपादान’ का अर्थ है ‘अलगाव की प्राप्ति’ को सम्बोधित करता है।अतः अपादान का ‘से’ चिह्न अलगाव के संकेत का प्रतीक है, जबकि करन का, अपादान के विपरीत, साधना का, साधनभूत लगाव का।

जैसे-

  • पेड़ से फल गिरा’,
  • मैं घर से चला’ आदि

वाक्यों में ‘से’ प्रत्यय ‘पेड़’ को या घर को ‘साधन’ नहीं सिद्ध करता, बल्कि इन दोनों से अलगाव सिद्ध करता है।

अतः इन दोनों वाक्यों में ‘घर’ और ‘पेड़’ के आगे प्रयुक्त ‘से’ विभक्तिचिह्न अपादानकारक का है और इन दोनों शब्दों में लगाकर इन्हे अपादानकारक का ‘पद’ बनाता है।

(4)सम्प्रदान कारक (Dative case)

– सम्प्रदान का अर्थ है— देना होता है।—वाक्य में कुछ दिया जाए या किसी के लिए कुछ किया जाए, इसका बोध कराने वाले शब्द के रूप को सम्प्रदान कारक कहते है।

दूसरे शब्दों में- संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से किसी को देने या किसी के लिए कुछ कार्य करने का पता चलता है। उसे सम्प्रदान कारक कहते है।

अर्थात कहने का मतलब है कि—जिसके लिए कोई क्रिया (काम )की जाती है,उसे सम्प्रदान कारक कहते है।इसकी विभक्ति ‘को’ और ‘के लिए’ है।
जैसे-

  • श्याम मीरा के लिए खिलौने लाया।
  • राकेश शीला के लिए रोता है।
  • शिष्य ने अपने गुरु के लिए सब कुछ किया।
  • गरीब को धन दीजिए।
  • वह अरुण के लिए मिठाई लाया।’

इन वाक्यों में लाना और रोना क्रियाएँ क्रमशः मीरा और शीला के लिए सम्पादित की जा रही हैं। इसलिए मीरा और शीला केलिए शब्द रूप सम्प्रदान कारक है।  अन्य वाक्य में लाने का काम ‘अरुण के लिए’ हुआ। इसलिए ‘अरुण के लिए’ सम्प्रदान कारक है।

अन्य उदहारणों

  • माँ अपने बच्चे के लिए दूध लेकर आई।
  • विकास ने तुषार को गाडी दी।
  • मैं हिमालय को जा रहा हूँ।
  • रमेश मेरे लिए कोई उपहार लाया है।

विशेष

साधारणतः जिसे कुछ दिया जाता है या जिसके लिए कोई काम किया जाता है, वह पद सम्प्रदानकारक का होता है।जैसे-

  • भूखों को अत्र देना चाहिए और प्यासों को जल।
  • गुरु ही शिष्य को ज्ञान देता है।

प्रत्ययवाले अव्यय भी सम्प्रदानकारक के प्रत्यय है। जैसे-‘के हित’, ‘के वास्ते’, ‘के निर्मित’ आदि

  • राम के हित लक्ष्मण वन गये थे।
  • तुलसी के वास्ते ही जैसे राम ने अवतार लिया।
  • मेरे निर्मित ही ईश्र्वर की कोई कृपा नहीं।

कर्म और सम्प्रदान का एक ही विभक्ति के प्रत्यय है इन दोनों में को के अर्थो में अन्तर है

सम्प्रदान का ‘को’, ‘के लिए’ अव्यय के स्थान पर या उसके अर्थ में प्रयुक्त होता है, जबकि कर्म के ‘को’ का ‘के लिए’ अर्थ से कोई सम्बन्ध नहीं है।
नीचे लिखे वाक्यों के द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है

  • कर्म- हरि मोहन को मारता है।……… (सम्प्रदान)– हरि मोहन को रुपये देता है।
  • कर्म- उसके लड़के को बुलाया।…….... (सम्प्रदान)– उसने लड़के को मिठाइयाँ दी।
  • कर्म- माँ ने बच्चे को खेलते देखा।……. (सम्प्रदान)– माँ ने बच्चे को खिलौने खरीदे।

 

(5)अपादान कारक(Ablative case)

जिससे किसी वस्तु का अलग होना पाया जाता है,उसे अपादान कारक कहते है।

दूसरे शब्दों में- संज्ञा के जिस रूप से किसी वस्तु के अलग होने का भाव प्रकट होता है, उसे अपादान कारक कहते है। इसकी विभक्ति ‘से’ है।

सरल शब्दों में—अपादान का अर्थ है— अलग होना। जिस संज्ञा अथवा सर्वनाम से किसी वस्तु का अलग होना ज्ञात हो, उसे अपादान कारक कहते हैं।

करण कारक की भाँति अपादान कारक का चिन्ह भी ’से’ है, परन्तु करण कारक में इसका अर्थ सहायता के लिए होता है और अपादान में अलग होने के लिए होता है।
उदाहरणार्थ –

  • हिमालय से गंगा निकलती है।
  • पेड़ से पत्ते गिरते हैं।
  • घुङसवार घोङे से गिरता है।

इन वाक्यों में ’हिमालय से’, ’वृक्ष से’, ’घोङे से’ अपादान कारक है।

अन्य उदहारण

  • शारदा नहर गंगा नदी से निकली है।
  • पक्षी आकाश से नीचे गिरा।

इन वाक्यों में निकलना और गिरना क्रियाओं के अलग होने का भाव क्रमशः गंगा नदी और पक्षी से स्पष्ट हो रहा है। अतएव इन दोनों शब्दों की स्थिति अपादान कारक में है।

मुख्य बिन्दु तथा महत्वपूर्ण तथ्य

इसके अलावा भय या भय जैसे अन्य भावों डरने,लज्जित होने आदि का बोध होता है। जैसे

  • वृक्ष से टहनी गिरी।
  • पत्ता पेड से गिर पडा।
  • तुम दरवाजे से बहार मत निकलना।
  • सुरेश छत से गिर गया।
  • सांप बिल से बाहर निकला।
  • आसमान से बिजली गिरती है।

अपादान कारक में दुरी का बोध होता है। जैसे

  • मो​हन मथुरा से आज ही आया है।
  • राधा विद्यालय से घर चली गई है।
  • पृथ्वी सूर्य से बहुत दूर है।

जिस शब्द में अपादान की विभक्ति लगती है, उससे किसी दूसरी वस्तु के पृथक होने का बोध होता है। जैसे-

  • अचानक पेढ से एक आम नीचे गिरा।
  • अध्यापक ने मुरारी को कक्षा से बहार निकाल दिया।
  • आप बस से नीचे उतर आइए।
  • वह छत से गिर पडा।
  • गंगा हिमालय से निकलती है।
  • मोहन ने घड़े से पानी ढाला।
  • बिल्ली छत से कूद पड़ी
  • चूहा बिल से बाहर निकला।

करण और अपादान के ‘से’ प्रत्यय में अर्थ का अन्तर करणवाचक के प्रसंग में बताया जा चुका है।

(6)सम्बन्ध कारक(Genitive Case)

जहॉं दो संज्ञा एक सर्वनाम और संज्ञा के बीच संबंध दिखाया जाता है। व​हॉं वे संज्ञा और सर्वनाम संबंध कारक में होते है।

सरल शब्दों में —शब्द के जिस रूप से संज्ञा या सर्वनाम के संबध का ज्ञान हो, उसे सम्बन्ध कारक कहते है।

दूसरे शब्दों में— संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से किसी अन्य शब्द के साथ सम्बन्ध प्रकट होता है, उसे सम्बन्धकारक कहते है।

अन्य शब्दों में—संज्ञा या सर्वनाम शब्द के जिस रूप से किसी एक व्यक्ति/वस्तु या पदार्थ का दूसरे व्यक्ति/वस्तु या पदार्थ से संबंध का पता चले उसे संबंध कारक कहते हैं। इसके विभक्ति चिन्ह “का, के, की, रा, रे, री “आदि होते हैं। इसकी विभक्तियाँ संज्ञा, लिंग, वचन के अनुसार बदल जाती हैं।
जैसे-

  • पूर्वा का भाई।
  • राम की बहन।
  • निखिल के पिता जी।

इस वाक्य में पूर्वा तथा भाई दोनों शब्द संज्ञा है। भाई से पूर्वा का संबध दिखाया गया है। वह किसका भाई है ? पूर्वा का। इसलिए पूर्वा का संबध कारक है ।

संबंध का लिंग-वचन संबद्ध वस्तु के अनुसार होता है। प्रत्यय का रूप ‘रा’, ‘री’, ‘रे’ या ‘ना’, ‘नी’, ‘ने’ भी होता है।

रा’, ‘री’, ‘रे’ के उदहारण इस प्रकार है।
जैसे-

  • मेरा घर ,
  • मेरी पुस्तक,
  • मेरे कपडें

ना’, ‘नी’, ‘ने’ के उदहारण इस प्रकार है।
जैसे-

  • अपना लड़का,
  • अपनी लड़की,
  • अपने लड़के। आदि

सम्बन्धकारक का विभक्तिचिह्न ‘का’ है। वचन और लिंग के अनुसार इसकी विकृति ‘के’ और ‘की‘ है। इस कारक से अधिकतर कर्तृत्व, कार्य-कारण, मोल-भाव, परिमाण इत्यादि का बोध होता है।
जैसे-

  • अधिकतर- राम की किताब, श्याम का घर।
  • कर्तृत्व- प्रेमचन्द्र के उपन्यास, भारतेन्दु के नाटक।
  • कार्य-करण- चाँदी की थाली, सोने का गहना।
  • मोल-भाव- एक रुपए का चावल, पाँच रुपए का घी।
  • परिमाण- चार भर का हार, सौ मील की दूरी, पाँच हाथ की लाठी।

सर्वनाम की स्थिति में सम्बन्धकारक का प्रत्यय रा-रे-री और ना-ने-नी हो जाता है। जैसे

  • मेरा लड़का,
  • मेरी लड़की,
  • तुम्हारा घर,
  • तुम्हारी पगड़ी,
  • अपना काम,
  • अपने लोग
  • अपनी रोजी।

विशेष

बहुधा सम्बन्धकारक की विभक्ति के स्थान में ‘वाला’ प्रत्यय भी लगता है। जैसे-

  • राधा वाली किताब,
  • कुवंर वाला घर,
  • मुंशी प्रेमचन्द वाले उपन्यास,
  • चाँदीवाली थाली इत्यादि।

सम्बन्धकारक विभक्तियों का प्रयोग कुछ मुहावरों में भी किया जाता है।

अ —-शब्द के रूप में मुहावरों का प्रयोग
जैसे-

  • दिन के दिन,
  • महीने के महीने
  • दीवाली की दीवाली
  • होली की होली,
  • रात की रात
  • दोपहर के दोपहर इत्यादि।

आ—— शब्द के रूप में मुहावरों का प्रयोग

  • कान का कच्चा,
  • बात का पक्का,
  • आँख का अन्धा,
  • गाँठ का पूरा,
  • बात का धनी,
  • दिल का सच्चा इत्यादि।

इ—— शब्द के रूप में मुहावरों का प्रयोग

  • वह अब आने का नहीं,
  • मैं अब जाने का नहीं,
  • वह टिकने का नहीं इत्यादि।

दूसरे कारकों के अर्थ में भी सम्बन्धकारक की विभक्ति लगती है। जैसे-

  • जन्म का भिखारी= जन्म से भिखारी (करण),
  • हिमालय का चढ़ना= हिमालय पर चढ़ना (अधिकरण)।

सम्बन्ध, अधिकार और देने के अर्थ में बहुधा सम्बन्धकारक की विभक्ति का प्रयोग होता है। जैसे

  • गोविंद को बाल-बच्चा नहीं हैं।
  • श्याम के घर बहन हुई है।
  • राजा के आँखें नहीं होती, केवल कान होते हैं।
  • रावण ने विभीषण के लात मारी।
    ब्राह्मण को दक्षिणा दो।

 

(7)अधिकरण कारक (Locative case)

 अधिकरण का अर्थ है——क्रिया के घटित होने का आधार।

क्रिया जिस स्थान या समय पर घटित होती है वह स्थान या समय संबंधी आधार अधिकरण कहा जाता है।आधार या समय को बताने वाली संज्ञा अधिकरण कारक में होती ​है।

सरल शब्दों में—— संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया के समय,स्थान,आधार आदि का बोध होता है। अर्थात शब्द के जिस रूप से क्रिया के आधार का ज्ञान होता है,उसे अधिकरण कारक कहते है।

दूसरे शब्दों में- क्रिया या आधार को सूचित करनेवाली संज्ञा या सर्वनाम के स्वरूप को अधिकरण कारक कहते है।इसकी विभक्ति ‘में’ और ‘पर’ हैं।
जैसे-

  • बच्चे छत पर खेल रहे है।
  • दीवार पर एक पुरानी घडी टंगी है।

इस वाक्य में ‘खेलने’ की क्रिया किस स्थान पर हो रही है ?छत पर। इसलिए मैदान पर अधिकरण कारक है।

दूसरा उदाहरण-

  • घर पर माँ है।
  • घोंसले में चिङिया है।
  • सङक पर गाङी खङी है।
    कागज घर पर रखे हैं।

यहाँ ’घर पर’, ’घोंसले में’, और ’सङक पर’ घर पर अधिकरण है।

तीसरा उदहारण

  • मनमोहन मैदान में खेल रहा है।”

इस वाक्य में ‘खेलने’ की क्रिया किस स्थान पर हो रही है? —–‘मैदान मे’ । इसलिए ‘मैदान मे’ अधिकरण कारक है।

विशेष या मुख्य बिन्दु

समय के संदर्भ में अधिकरण कारक में, को आदि परसर्ग लगते है। जैसे

  • वे आज शाम को आएॅंगे।
  • वे लोग रात को चलेंगे।
  • वह एक सप्ताह में आ जाएगी।
  • हम अक्टुबर में मुंबई गए थे।

कभी-कभी में के अर्थ में ——पर’ और ‘पर’ के अर्थ में ——’में’ का प्रयोग होता है। अर्थात में और पर आपय में संबंध स्थापित करते है।जैसे-

  • आपके घर पर चार आदमी हैं=घर में।
  • दूकान पर कोई नहीं था =दूकान में।
  • नाव जल में तैरती है =जल पर।

इसके अलावा अधिकरण कारक में —से परसर्ग का प्रयोग पाया जाता है।

  • बच्चा घबराकर मॉं के सीने से लग गया।
  • दोनों दोस्त गले से लग गए

कभी-कभी अधिकरणकारक की विभक्तियों का लोप भी हो जाता है। जैसे-

  • इन दिनों वह पटने है।
  • वह सन्ध्या समय गंगा-किनारे जाता है।
  • वह द्वार-द्वार भीख माँगता चलता है।
  • लड़के दरवाजे-दरवाजे घूम रहे हैं।
  • जिस समय वह आया था, उस समय मैं नहीं था।
  • उस जगह एक सभा होने जा रही है।

सप्रत्यय अधिकरणकारक में पद स्वयं जैसे —”किनारे, आसरे और दिनों” आदि का प्रयोग होता है। लेकिन “यहाँ, वहाँ, समय” आदि पदों का अर्थ सप्रत्यय अधिकरणकारक का है।

अतः इन पदों की स्थिति में अधिकरणकारक का प्रत्यय नहीं लगता।

(8)संबोधन कारक(Vocative case)

वक्ता द्वारा जिस संज्ञा को सम्बोधित किया जाता है। वह संबोधन कारक में होती है। कहने का अर्थ है कि——जिस संज्ञा या सर्वनाम का प्रयोग सबोंधन के रूप में किया जाता है, उसे संबोधन कारक कहते है।

दूसरे शब्दों में-संज्ञा के जिस रूप से किसी के पुकारने या संकेत करने का भाव पाया जाता है, उसे संबोधन कारक कहते है

अन्य शब्दों में–जिन शब्दों का प्रयोग किसी को बुलाने या पुकारने में किया जाता है, इसमें संज्ञा या सर्वनाम को प्रकट करने से पहले अरे,अरा,रे,हे आदि शब्द लगते है।
जैसे-

  • हे !भगवान’मेरी मदद करो।
  • रे! भैया सडक परा तो करा दो।
  • रमा! देखो कैसा सुन्दर दृश्य है।
  • लङके! जरा इधर आ।

विशेष

इनके आगे विस्मयादिबोधक चिह्न! का प्रयोग किया जाता है। जैसे-

  • बाप रे!कितना तेज भूकंप था।

इनमें कोई सम्बोधनकारक की विभक्ति नहीं होती है —जैसे

  • रीना को मत मारो।
  • राधा अपना काम करो।

कारकों में आपस में अंतर

1).कर्म और सम्प्रदान कारक में अन्तर

  • कर्म कारक में क्रिया का फल कर्म पर पडता है।
  • सम्प्रदान कारक में कर्ता देने का कार्य करता है।

कर्म और सम्प्रदान कारक दोनों कारकों में ‘को’विभक्ति का प्रयोग होता है तथापि दोनों के प्रयोग में भी अन्तर होता है तथा को विभक्ति के कारण भूल होने की सम्भावना बनी रहती ​है।

कर्म कारक वाक्य के उस पद प्रयुक्त में होता है जिसमें कर्ता द्वारा की गयी क्रिया का फल पड़ता है।
जैसे-

  • मैंने महेश को पढ़ाया। वाक्य में क्रिया का कर्ता ‘मैं’ है और क्रिया‘पढ़ाना’ । पढ़ाना क्रिया के कर्ता का फल ‘महेश’ पर पड़ रहा है। इसलिए ‘महेश’ कर्म कारक है

सम्प्रदान कारक में कर्ता जिसके लिए क्रिया का सम्पादन करता है अथवा जिसको कुछ देता है, उसे प्रकट करने वाले शब्द को सम्प्रदान कारक की स्थिति में माना जाता है। जैसे-

  • यशोदा ने कृष्ण को बॉंसूरी दी। इस वाक्य में देना क्रिया को ‘कृष्ण’ के लिए पूरा किया गया। अतः ‘कृष्ण’ सम्प्रदान कारक है।

विशेष

  • कर्म कारक में देने का काम नहीं होता सम्प्रदान कारक में होता है।
  • कर्म कारक में किसी के लिए काम नहीं किया जाता । सम्प्रदान कारक में किया जाता है।

निम्नलिखित उदहारणों के द्वारा अतंर स्पष्ट किया गया है।

  • यशोदा ने कृष्ण को पुकारा।——(कर्म कारक)
  • यशोदा ने कृष्ण को बॉंसुरी दी।—-(सम्प्रदान कारक)
  • दादाजी ने ललित को कंम्यूटर सिखाया।—–(कर्म कारक)
  • दादाजी ने ललित को कंम्यूटर खरीद कर दिया।—-(सम्प्रदान कारक)
  • राम ने तार को हिलाया।——–(कर्म कारक)
  • राम ने सोहन को तार पकडाई।—-(सम्प्रदान कारक)

करण कारक और अपादान कारक में अन्तर

करण कारक और अपादान कारक दोनों ही कारकों की विभक्ति ‘से है। किन्तु दोनों में पर्याप्ति अन्तर परिलक्षित होता है।

करण कारक में कर्ता के कार्य का बोध होता है। लेकिन अपादान में ऐसा नहीं होता है।जैसे—

  • अनीता धागे से कढाई कर रही है।—(करण कारक )
  • अनीता ने सूई से धागा निकाला।—–(अपादान कारक)
  • सुषमा ने घी से पुरी तली।——-(करण कारक )
  • सुषमा ने कडाही से पूरी निकाली—-(अपादान कारक)

करण कारक से अलग होने की तुलना का बोध नहीं होता ।,अपादान कारक के साथ अलग होने का बोध होता है।  जैसे—

  • राधा रिंकु से अधिक शरारती है।—–(अपादान कारक)
  • राधा रसोई से निकली।—--(करण कारक )
  • कमल सुमन से समझदार है।——(अपादान कारक)
  • कमल कुरसी से गिर गया—–-(करण कारक )

करण कारक का प्रयोग उस पद या वाक्य में किया जाता है जो क्रिया को सम्पादित करने में साधन के रूप में कर्ता का सहायकार होकर वाक्य में प्रयुक्त होता है।
जैसे-

  • राम ने बाण से रावण को मारा।
  • राधा ने श्याम से पुस्तक पढने में मदद ली।
  • मोहन मथुरा से अभी आया है।

इस वाक्य में ‘बाण’ करण कारक की अवस्था में है, क्योंकि बाण की सहायता से राम ने रावण के मारने के कार्य को पूर्णता प्रदान की।

दूसरी ओर अपादान कारक का प्रयोग उस पद में होता। है जो वाक्य में पार्थक्य सूचित करता है।
जैसे-

  • गंगा हिमालय से निकलती है।
  • पेड से कई आम गिरते है।

यहाँ गंगा के निकलने का काम हिमालय से हो रहा है, अतः हिमालय अपादान कारक के रूप में वाक्य में प्रयुक्त हुआ है।

उपसर्ग की परिभाषा,अर्थ, प्रकार/भेद,एंवम् उदाहरण (Upsarg in Hindi)

उपसर्ग की भूमिका(Introduction of Prefixes)

ब्दों की रचना उसी भाषा को बोलने वाले लोग करते है। जो उस भाषा का प्रयोग करते है। बताया जाता है कि— किसी व्यक्ति ने सबसे पहले किसी वस्तु को देखा और उसका कोई नाम तय कर दिया।
धीरे धीरे उस नाम को सारे समाज ने स्वीकार कर लिया और सभी उस वस्तु को उसी नाम से पुकारने लगे। नई-नई खोजों और शोध के परिणामस्वरूप भाषा में नई- नई संकल्पनाएॅं नए -नए विचार आते रहते हैं ,जिनके लिए हमें नए-नए शब्द बनाने की आवश्यकता होती है।

भारत सरकार की एक संस्था जिसका नाम “तकनीकी शब्दावली आयोग‘ है, जिसका कार्य नई नई संकल्पनाओं के लिए नए- नए शब्दों का निर्माण करना है।
भाषा में एक शब्द से दूसरा शब्द बनाए जाने की प्रक्रिया ही शब्द रचना या शब्द निर्माण कहलाती है।
उदहारण के लिए,

  • योग्य शब्द के प्रारंभ में” वि” जोडकर—-वियोग,
  • अंत में जोडकर—– —————वियोगी तथा
  • आसन शब्द जोडकर —————–योगासन शब्द बना सकते है।

भाषा में शब्द— रचना की प्रकिया तीन प्रकार से हो सकती है—

  • मूल शब्द के” प्रारंभ” में कोई अंश जोडकर,
  • मूल शब्द के “अंत” में कोई अंश जोडकर,
  • दो शब्दों” को जोडकर । इस तरह भाषा में शब्द रचना तीन तरह से हो सकती है।

इनको कुछ उदहारण के द्वारा समझते है।
जैसे—

  • नि+कुंज—— निकुंज
  • सु+ पुत्र—— सुपुत्र
  • सर+पंच—— सरपंच
  • अभि+नेता—— अभिनेता

इन उदहारणों में कुंज,पुत्र,पंच, और अभि शब्दों से पहले कुछ शब्दांश जोडकर नए शब्द बनाए है। जैसे—”नि,सु,सर और अभि” ऐसे शब्दांश है। जिन्होने मूल शब्दों से पहले जुडकर उनके अर्थ में परिवर्तन ला दिया है। इन शब्दांश को उपसर्ग कहते है।

उपसर्ग की परिभाषा ( Definition of Prefixes)

भाषा के वे लघुत्तम अर्थवान खंड है। जो शब्दों के आरम्भ में लगकर नए नए शब्दों की रचना करते है। इसका तात्पर्य है कि उपसर्ग भाषा की सबसे छोटी इकाई है। जिसके और अधिक अर्थवान खंड नहीं किए जा सकते है। शब्दों की तरह ये भी अर्थवान होते है। परंतु जहॉं शब्द भाषा में स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त हो सकते है। वही उपसर्ग हमेशा किसी ना किसी शब्द के साथ आबद्ध होकर ही प्रयुक्त होते है। इसलिए ये बद्ध रूप कहलाते है।
जैसे

  • पर+दादा— परदादा
  • चौ+राहा —चौराहा
  • अध+मरा—अधमरा

दूसरे शब्दों में——वह शब्दांश जो किसी शब्द के पूर्व अथवा पहले लगकर उस शब्द का अर्थ बदल देते हैं अथवा उसमें नई विशेषता उत्पन्न कर देते हैं ऐसे शब्दांश उपसर्ग कहलाते हैं.

अर्थात कहने का तात्पर्य है कि— लघुत्तम सार्थक शब्द खंड जो अन्य शब्दों के आदि में जुड़ कर उनका अर्थ बदल देते हैं ,उपसर्ग कहलाते हैं.

जो अक्षर या अक्षर समूह शब्द से पूर्व में लगाया जाता है वह उपसर्ग कहलाता हैं जैसे सु + पुत्र =
सुपुत्र .

यहाँ “सु” शब्दांश “पुत्र” शब्द के साथ जुड़कर नए शब्द का निर्माण हुआ हैं. यहाँ ‘सु’ शब्दांश हैं शब्द नहीं हैं. शब्द वाक्य में स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त हो सकता हैं, शब्दांश नहीं. शब्दांश तो केवल किसी शब्द से जुड़कर ही नए अर्थ की रचना में सहायक होते हैं.

उपसर्ग का अर्थ(Meaning of prefixes)

भाषा के वे लघुत्तम अर्थवान,बद्ध—रूप जो शब्दों के प्रारंभ में लगकर नए नए शब्दों की रचना करते है। वे उपसर्ग कहलाते है।
अन्य शब्दों में—— जो शब्दांश किसी शब्द के आरंम्भ में जुडकर उसके अर्थ में परिवर्तन ला देते है। उन्हें उपसर्ग कहते है।
दूसरे शब्दों में ——उपसर्ग उस शब्दांश या अव्यय को कहते है, जो किसी शब्द के पहले आकर उसका विशेष अर्थ प्रकट करता है। वह उपसर्ग होता है।

उपसर्ग दो शब्दों से मिलकर बना है ——उप+सर्ग | उप का अर्थ है – समीप, निकट’ या ‘पास में’ है। और सर्ग का अर्थ – सृष्टि करना|

उपसर्ग का अर्थ हुआ—— किसी शब्द के समीप आ कर नया शब्द बनाना/निर्माण करना।, या पास में बैठाकर दूसरा नया अर्थवाला शब्द बनाना। हार’ के पहले ‘प्र’ उपसर्ग लगा दिया गया, तो एक नया शब्द ‘प्रहार’ बन गया, जिसका नया अर्थ हुआ ‘मारना’ । उपसर्गो का स्वतन्त्र अस्तित्व न होते हुए भी वे अन्य शब्दों के साथ मिलाकर उनके एक विशेष अर्थ का बोध कराते हैं।पसर्ग शब्द के पहले आते है। जैसे– ‘अन’ उपसर्ग ‘बन’ शब्द के पहले रख देने से एक शब्द ‘अनबन ‘बनता है, जिसका विशेष अर्थ ‘मनमुटाव’ है। कुछ उपसर्गो के योग से शब्दों के मूल अर्थ में परिवर्तन नहीं होता, बल्कि तेजी आती है। जैसे- ‘भ्रमण’ शब्द के पहले ‘परि’ उपसर्ग लगाने से अर्थ में अन्तर न होकर तेजी आयी। कभी-कभी उपसर्ग के प्रयोग से शब्द का बिलकुल उल्टा अर्थ निकलता है।

उपसर्ग के भेद(Types of prefixes)

हिंदी में प्रचलित उपसर्गो को निम्नलिखित भागो में विभाजित किया जा सकता है।

उपसर्ग के भेद/ संख्या
हिंदी में प्रचलित उपसर्गो को निम्नलिखित भागो में विभाजित किया जा सकता है-

  • तत्सम उपसर्ग — संस्कृत के उपसर्ग—( संख्या—22)
  • तद्भव उपसर्ग— हिंदी के उपसर्ग——(संख्या—13)
  • आगत उपसर्ग — अरबी—फारसी (उर्दू के) उपसर्ग—— (संख्या —19)
  • अंग्रेजी के उपसर्ग(गणना में नहीं है। )
  •  उपसर्गवत् — उपसर्ग के समान प्रयुक्त होने वाले सस्ंकृत के अव्यय—— (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण)

(1) तत्सम उपसर्ग — संस्कृत के उपसर्ग—

इनकी संख्या—22 होती है। हिंदी में जब अनेक तत्सम शब्द आए तो उनके साथ अनेक उपसर्ग भी आए हिंदी में इनका प्रयोग तत्सम शब्दों के साथ लगकर भी किया जाता है। ये तत्सम उपसर्ग है। इनका प्रयोग हिंदी में संस्कृत से आए उपसर्गों के साथ किया जाता है। इन उपसर्गों से बने अनेक शब्द में हिंदी में मिलते हैं हिंदी में प्रयुक्त संस्कृत उपसर्ग निम्नलिखित है।ये नीचे दिए गए हैं:
“प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आ (आं), नि, अधि, अपि, अति, सु, उत् /उद्, अभि, प्रति, परि तथा उप।

इन सभी उपसर्गों का अर्थ तथा वाक्य में प्रयोग नीचे तालिका में दी गई है।

उपसर्गअर्थउपसर्ग से बने शब्द
अतिअधिक, ऊपर, उस पारअतिरिक्त, अत्यंत, अतिक्रमण, अत्युत्तम, अत्याचार, अतिकोमल, अतिशय,अत्याधिक, अत्याधुनिक, अत्यल्प, अतिवृष्टि,अतिकाल,अतिकर्मण, , अतिशय, अत्युक्ति, अतिक्रमण, इत्यादि
अधि
श्रेष्ठ ऊपरअधिनायक, अधिकार, अध्यादेश, अधिपति, अधिकृत, अधिकरण, अधिवास, अधिक, अधिशुल्क, अध्ययन,अधिराज, अध्यात्म, अध्यक्ष, अधिपति इत्यादि।।
अभावअज्ञान, अधर्म, अस्वीकार इत्यादि।
अनुपीछे, समानता, क्रम, पश्र्चातअनुज, अनुचर, अनुगामी, अनुराग, अनुकूल, अनुसार, अनुभूति, अनुगमन, अनुसंधान, अनुकरण, अनुभव, अनुरोध, अनुशासन, अनुवाद, अनुरूप, अनुकंपा, अनुग्रह, अनुपात, अनुवाद, अनुचर, अनुकरण,, अनुस्वार, अनुशीलन इत्यादि।
ओर, सीमा, समेत, कमी, विपरीत,तक,आरक्षण, आमरण, आदान, आगमन, आहार, आक्रमण, आजीवन, आजन्म, आकर्षण, आचरण, आसेतु, आकंठ आकाश, आदान, आजीवन, आगमन, आरम्भ, आचरण, आमुख, आकर्षण, आरोहण इत्यादि।
अवहीनता, अनादर, पतनअवकाश, अवमूल्यन, अवसान, अवसर, अवज्ञा, अवसाद अवगत, अवलोकन, अवनत, अवस्था, अवसान, अवज्ञा, अवरोहण, अवतार, अवनति,अवशेष,अवनति, अवगुण, अवचेतन, अवशेष,अवतरण,इत्यादि।
उपनिकटता, सदृश, गौण, सहायक,हीनता,समानउपनगर, उपकरण, उपग्रह, उपनाम, उपमंत्री, उप प्रधानमंत्री, उप मुख्यमंत्री, उपकृत, उपसचिव, उपदेश, उपसर्ग, उपमेय, उपमान, उपकार, उपस्थित, उपचार, उपसंहार, उपहार, उपयोग,उपवन,उपकार, उपकूल, उपनिवेश, उपदेश, उपस्थिति, उपवन, उपनाम, उपासना, उपभेद इत्यादि।
निभीतर, नीचे, अतिरिक्तनिरोध, निवास, नियोग, निवारण, निषेध, निबंध, नियम, निपात, निकृष्ट, नियुक्त, निरूपण, निगमन, निहार, निडर, निगम, निवास, निदान, निहत्थ, निबन्ध, निदेशक, निकर, निवारण निदर्शन, निपात, नियुक्त, निवास, निरूपण, निवारण, निम्र, निषेध, निरोध, निदान, निबन्ध इत्यादि।
निर्बाहर, निषेध, रहित निर्वास,निरपराध, निर्जीव ,निराकरण, निर्भय, निरपराध, निर्वाह, निर्दोष, निर्जीव, निरोग, निर्मल,निर्जन, निर्णय, निर्मल, निर्वाह, निर्भय, निर्धन, नियति, निष्काम, निष्कपट,निश्छल, निस्तेज, निश्चय, निश्चल, निसंदेह, निर्माणी, निराशा, निष्कलंक, निरहुआ, निर्गुण, निर्विघ्न, निरोग, इत्यादि।
पराउलटा, अनादर, नाशपराजय, पराभव, पराक्रम, परामर्श, पराधीन, पराभूत, परास्त, पराकाष्ठा, पराशर, परावर्तन इत्यादि।
परिआसपास, चारों ओर, पूर्णपरिक्रमा, परिजन, परिणाम, परिधि, परिपूर्ण परीक्षा, परिचालक, परिष्कार, परिकल्पना, परिचायक, परिपक्व, परिपूर्ण, परीक्षा, परिणाम, परिवर्तन, पर्यटन, परिधि, परिवार इत्यादि।
प्रअधिक, आगे, ऊपर, यशप्रकार, प्रकृति, प्रसार, प्रस्थान,परिणाम,प्रक्रिया, प्रवाह, प्रमाण, प्रहार, प्रताप, प्रभाव, प्रसिद्धि, प्रयत्न, प्रबल, प्रस्ताव, प्राध्यापक, प्राचार्य, प्रदर्शनी,प्रयोग, प्रलय,प्रख्यात, प्रचार,, प्रभु, प्रयोग, प्रगति, प्रसार, प्रयास , प्रकाश इत्यादि।
प्रति विरुद्ध, सामने ,विरोध, बराबरी,
प्रतिकार, प्रतिकूल, प्रतिध्वनी, प्रतिनिधि, अध्यक्ष, प्रतिरोध, प्रतिरोध, प्रतिवादी, प्रतिदिन, प्रतिहिंसा, प्रतिष्ठा, प्रतिदान, प्रत्यागम, प्रतिवाद,प्रत्येक, परिवर्तन प्रतिक्षण, प्रतिनिधि, प्रतिकार, प्रत्येक, प्रतिदान, प्रतिकूल, प्रत्यक्ष इत्यादि।
वि विशिष्ट, भिन्न,भित्रता, हीनता, असमानता, विशेषताविकार, विवाद, विदेश, विनाश, सुयोग, विशिष्ट, विरोध, विकास, विभाग, विश्वयुद्ध, विराम, विपक्ष, विनय, विजय, विज्ञान, विश्व, विख्यात, विज्ञप्ति, विजय, विलक्षण, विज्ञान, विधवा, विवाद, विशेष, विस्मरण, विराम, वियोग, विभाग, विकार, विमुख, विनय, विनाश इत्यादि।
सम्पूर्णता, साथ, अच्छा, संयोगसंकल्प, संग्रह, सन्तोष, संन्यास, संयोग, संस्कार, संरक्षण, संहार, सम्मेलन, संस्कृत, सम्मुख, संग्राम संयम, संशय, संभव, संकल्प, संगति, संजय, संग्राम, संतुलन, सन्यासी, सम्मेलन, संरक्षण, संसाधन, संशोधन, संहार, सम्मुख, संगम, संचय, संतोष, संताप, संपूर्ण, सम्मान, संयोग, संघात इत्यादि।
सुअच्छा,सुखी, अच्छा भाव, सहज, सुन्दरसुकृत, सुगम, सुलभ, सुदूर, स्वागत, सुयश, सुभाषित, सुवास, सुजन सुबह, सुलभ, सुराग, सुपुत्र, सुराज, सुकर, सुदूर, सुपौल, सुजन, सुशील, सुयोग, सुव्यवस्थित, सकर्मक, सुनयन, सुपुत्र, सुबोध, सुमनोहर, सुपात्र, सुशिक्षित, स्वच्छ, स्वागत
उछ् (उत् )
उन्नति, उद्धार, उत्थान, उद्देश्य, उन्नयन, उत्पत्ति, उच्चारण, उत्कर्ष, उद्घाटन, उद्योग, उल्लंघन, उन्नायक, उद्गम
दुस् / दूरबुरा कठिनदुश्चिन्त, दुश्शासन, दुष्कर, दुष्कर्म, दुस्साहस, दुस्साध्य, दुष्कृत्य, दुष्प्राप्य, दु:सह, दुराशा, दुरुह, दुरुक्ति, दुर्जन, दुर्गम, दुर्बल, दुर्लभ, दुखद, दुरावस्था, दुर्दमनीय, दुर्भाग्य, दुराग्रह, दुराचार, दुरवस्था, दुरुपयोग, दुरभिसंधि, दुर्गुण, दुर्दशा, दुर्घटना, दुर्भावना इत्यादि।
कु
बुरा, हीनताकुपुत्र , कुरूम , कुकर्म , कुमति ,कुयोग , कुकृत्य ,कुख्यात , कुखेत , कुपात्र , कुकाठ , कपूत , कुढंग आदि।
अधआधे के अर्थ मेंअधजला, अधपका, अधखिला, अधमरा, अधसेरा इत्यादि।
अ-अननिषेध के अर्थ मेंअमोल, अपढ़, अजान, अथाह, अलग, अनमोल, अनजान इत्यादि।
उनएक कमउत्रीस, उनतीस, उनचास, उनसठ, उनहत्तर इत्यादि।
हीनता, निषेधऔगुन, औघट, औसर, औढर इत्यादि।
दुबुरा, हीनदुकाल, दुबला इत्यादि।
बिननिषेधबिनजाना, बिनब्याहा, बिनबोया, बिनदेखा, बिनखाया, बिनचखा, बिनकाम इत्यादि।
निनिषेध, अभाव, विशेषनिकम्मा, निखरा, निडर, निहत्था, निगोड़ा इत्यादि।

तद्भव उपसर्ग— हिंदी के उपसर्ग–

इनकी संख्या—13 है। जो उपसर्ग तत्सम उपसर्गों से विकसित हुए है। उन्हें तद्भव उपसर्ग
कहते है। उपसर्ग मूलतः संस्कृत के ही तत्सम उपसर्गों से ही विकसित हुए है,वे मुख्यतः अभाव,निषेध,संख्या,अच्छाई-बुराई, पूर्णता आदि का अर्थ लिए हैं. इन्ही को उपसर्ग कहा जाता हैं. कुछ प्रमुख तद्भव उपसर्ग इस प्रकार हैं। जैसे
“अ, अध,अन,उन,औ—अव, क—कु,चौ,दु,नि,पर,बिन,भर,स—सु”आदि।

इन सभी उपसर्गों का अर्थ तथा वाक्य में प्रयोग नीचे तालिका में दी गई है।

उपसर्गअर्थउपसर्ग से बने शब्द
अननिषेध अर्थ मेंअनमोल, अनकहा, अनदेखा, अनजान , अनकहा , अनदेखा , अनमोल , अनबन , अनपढ़ , अनहोनी , अछूत , अचेत , अनचाहा , अनसुना , अलग , अनदेखी आदि।
अभाव, निषेधअछूता, अथाह, अटल ,अलग,इत्यादि।
अध्आधा अधपका , अधमरा , अधक्च्चा , अधकचरा , अधजला , अधखिला , अधगला , अधनंगा, अधजला, अधखिला, अधपका, अधकचरा, अधकच्चा, अधमरा इत्यादि।
दुबुरा, हीन, विशेषदुबला, दुर्जन, दुर्बल, दुकाल , दुलारा , दुधारू , दुसाध्य , दुरंगा , दुलत्ती , दुनाली , दुराहा , दुपहरी , दुगुना , दुकाल इत्यादि।

निआभाव, विशेष रहित,कमी निडर, निपूता, निहत्था, निकम्मा,निहाल,निगोड़ा, निडर, निकम्मा इत्यादि।
उनएक कमउनतीस, उनचास, उनसठ,उनतीस , उनचास , उनसठ , उनहत्तर , उनतालीस , उन्नीस , उन्नासी इत्यादि।
भरपूरा ,ठीकभरपेट, भरपूर, भरदिन इत्यादि।
कुबुरा कुचालकुचैला, कुचक्र, कुढंग ,कुसंगति , कुकर्म , कुरूप , कुपुत्र , कुमार्ग ,कुरीति , कुख्यात , कुमति आदि।
अव/औहीन, निषेधऔसान,औगुन , औघर औसर ,औसान , औघट , औतार , औगढ़ , औढर आदि।
स / सुअच्छासुफल , सुनामी , सुकाल , सपूत, सुडौल , सुजान , सुघड़,सुफल आदि।
बिनबिना, निषेधबिनब्याहा, बिनबादल, बिनपाए, बिनजाने आदि।
परदूसरा, बाद का,दूसरी पीढ़ी ,परलोक, परोपकार, परसर्ग, परहित परदादा , परपोता , परनाना , परदेशी , परजीवी , परकोटा , परलोक , परकाज परलोक आदि।
बुरा, हीनकपूत, कचोटआदि।

(3) आगत उपसर्ग — अरबी—फारसी (उर्दू )के उपसर्ग

इनकी संख्या —19 है। जो उपसर्ग अरबी फारसी व उर्दू भाषा से आए है।इन सभी उपसर्गों का अर्थ तथा वाक्य में प्रयोग नीचे तालिका में दी गई है। अरबी फारसी एवम् उर्दू के निम्न शब्द है  जैसे   “अल,कम,खुश,गैर,ना,ब,बद,बा,ला,सर,हम,हर,”आदिं

उपसर्गअर्थउपसर्ग से बने शब्द
अल – निश्र्चित, अन्तिम
अलविदा,अलबत्ता,अलगरज आदि।
कमथोड़ा, हीनकामखयाल, कमज़ोर, कमदिमाग, कमजात,कमसिन, कमअक्ल, कमज़ोर इत्यादि।
खुशश्रेष्ठता के अर्थ मेंखुशनुमा, खुशगवार, खुशमिज़ाज, खुशदिल, खुशहाल खुशबू, खुशनसीब, खुशकिस्मत, इत्यादि।
ग़ैरनिषेधग़ैरहाज़िर, ग़ैरकानूनी, ग़ैरवाजिब, ग़ैरमुमकिन, ग़ैरसरकारी,ग़ैरमुनासिब इत्यादि।
दरमध्य मेंदरम्यान, दरअसल, दरहकीकत इत्यादि।
नाअभावनामुमकिन, नामुराद, नाकामयाब, नापसन्द, नासमझ, नालायक, नाचीज़, नापाक, नाकाम इत्यादि।
फिल/फीमें प्रतिफिलहाल, फीआदमी इत्यादि।
और, अनुसारबनाम, बदौलत, बदस्तूर, बगैर, बमुश्किल, बतकल्लुफ़ आदि।
बासहितबाकायदा, बाइज्जत, बाअदब,बामौक़ा,बाइन्साफ,बामुलाहिज़ा,बाकलम आदि।
बदबुरा
बदनाम, बदमाश, बदकिस्मत, बदबू, बदहज़मी, बददिमाग, बदमज़ा, बदहवास, बददुआ, बदनीयत, बदकार,बदसूरत, बदनाम, इत्यादि।
बेबिनाबेबुनियाद, बेईमान, बेवक्त, बेरहम, बेतरह, बेइज्जत, बेअक्ल, बेकसूर, बेमानी, बेशक आदि
बिला
बिनाबिलावज़ह, बिलालिहाज़, बिलाशक, बिलानागा आदि।
बिलाबिनाबिलावजह, बिलाशक बिलआखिर, बिलकुल, आदि।
लाबिना, नहींलापता, लाजबाब, लावारिस, लापरवाह, लाइलाज, लामानी, लाइल्म, लाज़वाल,लाचार, लाजवाब, लापरवाह, लापता इत्यादि।
सर मुख्यसरहद, सरताज, सरकार, सरगना,सरंपच आदि।
हमबराबर, समानहमउम्र, हमदर्दी, हमपेशा इत्यादि।
हरप्रत्येकहरदिन हरसाल हरएक हरबार इत्यादि।

अंग्रेजी के उपसर्ग

इसमें सब, डिप्टी, वाइस, जनरल प्रधान,हैड,चीफ,एक्स हाफ,सब आदि शब्द अग्रेंजी के उपसर्ग में आते है।

इन सभी उपसर्गों का अर्थ तथा वाक्य में प्रयोग नीचे तालिका में दी गई है।

उपसर्गअर्थउपसर्ग से बने शब्द
हैड –मुख्य
हेडमास्टर, हेड क्लर्क, हेड ऑफिस, हेड कांस्टेबल, हैड मुंशी, हैड पंडित आदि
जनरल –प्रधान, सामान्य
जनरल मैनेजर, जनरल सेक्रेटरी, जनरल इंश्योरेंस आदि|
डिप्टी –
सहायकडिप्टी कलेक्टर, डिप्टी रजिस्टर, डिप्टी मिनिस्टर,डिप्टी-रजिस्ट्रार, आदि
वाइस –सहायकउपवाइसराय, वाइस चांसलर, वाइस प्रेजिडेंट, वाइस प्रिंसिपल आदि।
एक्स –
मुक्तएक्सप्रेस , एक्स कमिश्नर , एक्स स्टूडेंट , एक्स प्रिंसिपल आदि।
चीफ – प्रमुख
चीफ मिनिस्टर, चीफ इंजीनियर, चीफ सेक्रेटरी आदि।
हाफ –
आधाहाफटिकट, हाफरेट, हाफकमीज, हाफ पेंट, हाफ बाड़ी आदि।
सब –
अधीन , नीचेसबजज, सबकमेटी, सबरजिस्टर, सब पोस्टर, सब इंस्पेक्टर,सब-जज,आदि।
(5) उपसर्गवत् — उपसर्ग के समान प्रयुक्त होने वाले सस्ंकृत के अव्यय—( संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण)

सभी उपसर्गों का अर्थ तथा वाक्य में प्रयोग नीचे तालिका में दी गई है।

उपसर्गअर्थउपसर्ग से बने शब्द
अभावअशोक, अकाल, अनीति, अधर्म, अज्ञान, अनीति
अनअभाव/निषेधअनर्थ, अनंत
अलम्शोभा, बेकारअलंकार
अंतःभीतरीअंतःकरण, अंतःपुर, अंतर्मन, अंतर्देशीय
अधःनीचेअधःपतन, अधोगति, अधोमुखी, अधोलिखित
अन्तरभीतरअन्तर्नाद, अन्तर्राष्ट्रीय
आविसप्रकट/बाहर होनाआविष्कार, आविर्भाव
चिरबहुत देरचिरंजीवी, चिरकुमार, चिरकाल, चिरायु
पुनरफिरपुनर्जन्म, पुनर्लेखन, पुनर्जीवन, पुननिर्माण, पुनरागमन
पुरस्सामनेपुरस्कार
प्रादुर्प्रकट होना,सामने आना,प्रादुर्भाव, प्रादुर्भूत
पुरापहलेपुरातत्व, पुरावृत्त,पुरातन
पुरापहलेपुरातन, पुरातत्त्व
सहितसपरिवार, सदेह, सचेत
सहसाथसहकार, सहपाठी, सहयोगी, सहचर
समसमानसमकालीन, समदर्शी, समकोण, समकालिक
सतसच्चासज्जन, सत्कर्म, सदाचार, सत्कार्य
बहिरबाहरबहिर्गमन, बहिर्जगत, बहिष्कार, बहिर्द्वार
का/कुबुरा
कापुरुष, कुपुत्र
अभावनगण्य, नपुंसक
तिरस्तिरछा, टेढ़ा, अदृश्यतिरस्कार, तिरोभाव

उपसर्गवत् अव्यय—- संज्ञा, सर्वनाम तथा विशेषण से बने संस्कृत के अन्य उपसर्ग व उनके उदहारण

अभाव

  • अशोक ,अकाल, अनीति

चिरबहुत देर

  • चिरंजीवी, चिरकुमार, चिरकाल, चिरायु

पुनर्फिर

  • पुनर्जन्म, पुनर्लेखन, पुनर्जीवन

बहिर्बाहर

  • बहिर्गमन, बहिष्कार

सत्सच्चा

  • सज्जन, सत्कर्म, सदाचार, सत्कार्य

पुरापुरातन

  • पुरातत्त्व, पुरावृत्त

समसमान

  • समकालीन, समदर्शी, समकोण, समकालिक

सहसाथ

  • सहकार, सहपाठी, सहयोगी, सहचर

अधःनीचे

  • अधःपतन, अधोगति, अधोमुखी, अधोलिखित

अंतःभीतरी

  • अंतःकरण, अंतःपुर, अंतर्मन, अंतर्देशीय

एक से अधिक उपसर्गों का एक साथ प्रयोग:—

प्राय: संस्कृत के शब्दों में एक साथ एक से अधिक उपसर्गों का प्रयोग करके शब्दों की रचना होती है।

जैसे——

उपसर्ग+ उपसर्ग+शब्द — नया शब्द

  • सु+ आ+ गत =  स्वागत
  • अन+ आ+ चार = अनाचार
  • सु+ प्र+  स्थान = सुप्रस्थान
  • अन+ आ+ गत = अनागत
  • वि +आ+ करण = व्याकरण
  • अ +परा+ जय = अपराजय
  • अ+ नि+ यंत्रित = अनियंत्रित
  • परी+ आ+ वरण = पर्यावरण
  • अति +आ+चार =   अत्याचार
  • निर् + आ + करण = निराकरण
  • प्रति + उप + कार = प्रत्युपकार
  • सु + सम् + कृत = सुसंस्कृत
  • अन् + आ + हार = अनाहार
  • सम् + आ + चार = समाचार
  • अन् + आ + सक्ति = अनासक्ति
  • अ + सु + रक्षित = असुरक्षित
  • सम् + आ + लोचना= समालोचना
  • सु + सम् + गठित = सुसंगठित
  • अ  + प्रति + अक्ष = अप्रत्यक्ष
  • सत्  +आ  +चार = सदाचार
  • अन्+  आ+ चार = अनाचार
  • अ+  परा+  जय = अपराजय
  • सु+  प्र+  स्थान = सुप्रस्थान

विशेष तथा ध्यान देने योग्य बातें

उपसर्ग में निम्न बातों का होना आवश्यक है।

  • उपसर्ग लगने के बाद शब्द का अर्थ बदल जाता है
  • उपसर्ग शब्द की रूप रचना को नया रूप प्रदान करते है
  • उपसर्ग भाषा के वे लघुत्तम अर्थवान खंड होते हैं।
  • यह शब्दों के आरंभ में लगकर नए शब्दों की रचना करते है।
  • शब्द खंड अपने आप में अपूर्ण होते हैं अतः उनका स्वतंत्र प्रयोग नहीं हो सकता, किसी अन्य के साथ जुड़ने पर ही वाक्य में उनका प्रयोग करता हैं
  • भाषा के वह सार्थक एवं छोटे खंड जो किसी शब्द के आरम्भ में लग जाते हैं एवं उससे मिलकर किसी दुसरे शब्द का निर्माण कर देते हैं।
  • पसर्ग शब्द का अर्थ होता है –” समीप आकर नया शब्द बनाना”। अर्थात यह किसी शब्द साथ लगकर नया शब्द बनाता है।
  • ‘उपसर्ग’ के अन्य अर्थ-“-बुरा लक्षण या अपशगुन”
  • वह पदार्थ जो कोई पदार्थ बनाते समय बीच में संयोगवश बन जाता या निकल आता है (बाई प्राडक्ट)। जैसे-गुड़ बनाते समय जो शीरा निकलता है, वह गुड़ का उपसर्ग है।

उपसर्ग की विशेषता

उपसर्ग की  विशेषताएँ निम्नलिखित होती हैं-

उपसर्गों के द्वारा शब्दों के अर्थ बदल जाते है।

  • जैसे- अ + सत्य= असत्य
  • अप + यश= अपयश

शब्द के अर्थ में, कोई खास परिवर्तन न करके मूलार्थ के इर्द-गिर्द अर्थ प्रदान करना।

  • जैसे- वि + शुद्ध= विशुद्ध
  • परि + भ्रमण= परिभ्रमण

उपसर्गों के द्वारा शब्दों के अर्थ में नई विशेषता को प्रकट किया जा सकता है।

  • जैसे- प्र + बल= प्रबल
  • अनु + शासन= अनुशासन

 उपसर्ग के द्वारा किसी प्रकार का उत्पात, उपद्रव या विघ्न दूर किया जा सकता है।

  • योगियों की योगसाधना के बीच होनेवाले विघ्न उपसर्ग हैं। जिसमें निम्न प्रकार के होते हैं :
  • प्रतिभा,  श्रावण, दैव,मुनि

मुनियों पर होनेवाले उक्त उपसर्गों के विस्तृत विवरण मिलते हैं। जैन साहित्य में विशेष रूप से इनका उल्लेख रहता है क्योंकि जैन धर्म के अनुसार साधना करते समय उपसर्गो का होना अनिवार्य है

वचन की परिभाषा,अ​र्थ,भेद, उदाहरण-Vachan in Hindi Grammar

वचन :-(Number)

वचन शब्द वह रूप है। जिससे यह पता चले कि कोई संज्ञा शब्द एक ईकाई के रूप में ग्रहण किया जाएगा या एक से अधिक अथवा अनेक के रूप में।
उदहारण के लिए:-

  • बच्चा, कुरसी, मेज आदि एकवचन होने की सूचना दे रहे है।
  • जबकि किताबें, बच्चें, मेजे आदि एक से अधिक होने का बोध करा रहे है।

अर्थात हम कह सकते है कि—शब्द के जिस रूप से एक या एक से अधिक का बोध होता है, उसे हिन्दी व्याकरण में ‘वचन’ कहते है।

दूसरे शब्दों में – संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के जिस रूप से संख्या का बोध हो, उसे’वचन’ कहते है।
जैसे –

  • लड़की खेलती है।
  • लड़कियाँ खेलती हैं।

इन वाक्यों में ‘लड़की’ शब्द एक होने का तथा ‘लड़कियाँ’ शब्द एक से अधिक होने का बोध करा रही हैं। अतः स्पष्ट है कि ‘लड़की’ शब्द एकवचन का है और ‘लड़कियाँ’ शब्द बहुवचन का हैं।

वचन की परिभाषा(Definition of number)

वचन शब्द का अभिप्रायः संख्या से है। विकारी शब्दों के जिस रूप से उनकी संख्या एक या अनेक का बोध होता है। उसे वचन कहते है। उदहारण के लिए:-
1). लडका जाता है।
–लडके जाते है।
2).बच्चा सोता है।
–बच्चे सोते है। आदि एक से अधिक होने का बोध करा रहे है।

वचन का अर्थ (Meaning of Number)

वचन का शब्दिक अर्थ ‘संख्यावचन’ होता है। ‘संख्यावचन’ को ही वचन कहते हैं। वचन का एक अर्थ ‘कहना’ भी होता है।
संज्ञा के जिस रूप से किसी व्यक्ति, वस्तु के एक से अधिक होने का या एक होने का पता चले उसे वचन कहते हैं। अथार्त संज्ञा के जिस रूप से संख्या का बोध हो उसे वचन कहते हैं।

दूसरे शब्दों में —संज्ञा शब्द के जिस अंश रूप से यह ज्ञात होता है। कि:- वह एक ईकाइ के रूप में ग्रहण किया जाएगा या अनेक रूप में व्याकरण में वचन कहलाता है।
सरल शब्दों में :-वचन संज्ञा पदों का वह लक्षण है जो एक या अधिक का बोध कराता है
जैसे :-

  • घोडा— घोडा
  • पुस्तक— पुस्तकें
  • नदी —नदियॉ ।

वचन के प्रकार (Kinds of Number)

संस्कृत में तीन वचन है-

  • एकवचन
  • द्विवचन
  • बहुवचन 

 हिंदी में केवल दो ही वचन रह गए है, अर्थात वचन के भेद :-

  1. एकवचन
    2. बहुवचन

एकवचन(Singular)
संज्ञा शब्द के जिस रूप से किसी एक वस्तु पदार्थ या व्यक्ति के ज्ञान का बोध होता है। वह एकवचन कहलाता है।
दूसरे शब्दों में—— जिस शब्द के कारण हमें किसी व्यक्ति , वस्तु , प्राणी , पदार्थ आदि के एक होने का पता चलता है उसे एकवचन कहते हैं।.जैसे
मेज, किताब ,कमरा, ताला, माला ,बोतल, दवाई ,ऑख, नाक ,कमीज ,बिल्ली ,कछुआ स्त्री, घोड़ा, नदी, रुपया, लड़का, गाय, सिपाही, बच्चा, कपड़ा, माता, माला, पुस्तक, टोपी, बंदर, मोर, लडकी , बेटी , घोडा , नदी , कमरा , घड़ी , घर , पर्वत , मैं , वह , यह , रुपया , बकरी , गाड़ी , माली , अध्यापक , केला , चिड़िया , संतरा , गमला , तोता , चूहा आदि

बहुवचन(Plural)
संज्ञा शब्द के जिस रूप से एक से अधिक वस्तुओं पदार्थों और व्यक्तियों के ज्ञान का बोध हो वह बहुवचन कहलाता है ।

दूसरे शब्दों में :– जिस विकारी शब्द या संज्ञा के कारण हमें किसी व्यक्ति , वस्तु , प्राणी , पदार्थ आदि के एक से अधिक या अनेक होने का पता चलता है उसे बहुवचन कहते हैं।,
जैसेः
बालकों ,,मालाएं, बोतलें दवाइयॉ ,आखें, नाकें, कमीजें, बिल्लियॉ, लडके , गायें , कपड़े , टोपियाँ , मालाएँ , माताएँ , पुस्तकें , वधुएँ , गुरुजन , रोटियां , पेंसिलें , स्त्रियाँ , बेटे , बेटियाँ , केले , गमले , चूहे , तोते , घोड़े , घरों , पर्वतों , नदियों , हम , वे , ये , लताएँ , लडकियाँ , गाड़ियाँ , बकरियां , रुपए आदि।

वचन की पहचान(Identification of Number)

वचन की पहचान नि​म्नलिखित शब्दों से की जा सकती है।

वचन की पहचान दो प्रकार से की जा सकती है।

  • संज्ञा, सर्वमान, विशेषण द्वारा
  • क्रिया द्वारा

संज्ञा, सर्वमान, विशेषण द्वारा वचन की पहचान
वाक्य में संज्ञा, सर्वमान, विशेषण का प्रयोग जिस वचन में होता है,उससे वचन की पहचान कहते है।

संज्ञा शब्दों से—वाक्य में प्रयुक्त संज्ञा शब्दों से एकवचन और बहुवचन की पहचान होती है।
जैसे

  • सोहन ने किताब खरीदी–( एकवचन)
  • सोहन ने किताबें खरीदी– (बहुवचन)
  • लडकी के पास छाता है।–(एकवचन)
  • लडकियों के पास छाता है।—(बहुवचन)
  • पायल ने संतरा खाया –(एकवचन)
  • पायल ने संतरें खाए।–(बहुवचन)

उपर्युक्त वाक्य में पत्रिका, संतरा,लडकी और छाता एकवचन का बोध करा रहें है, और पत्रिकाएॅ,सतरें,लडकियॉं और छाते बहुवचन का बोध करा रहें है।

सर्वनाम शब्दों सेवाक्य में प्रयुक्त सर्वनाम शब्दों से एकवचन और बहुवचन की पहचान होती है।
जैसे

  • वह आज नहीं आया । (एकवचन )
  • वे आज नहीं आए। ( बहुवचन)
  • मै दिल्ली जाउॅगा। (एकवचन )
  • हम सब दिल्ली जाएगें।( बहुवचन)
  • तुम मंदिर चले जाओ।(एकवचन )
  • तुम सब  मंदिर चले जाओ। ( बहुवचन)

उपर्युक्त वाक्य में मैं,तुम एकवचन का बोध करा रहें है। और तुम सब बहुवचन का बोध करा रहें है।

 क्रिया शब्दों से — कभी कभी वाक्य में प्रयुक्त में संज्ञा और सर्वनाम शब्दों से वचन का बोध न होकर वाक्य में प्रयुक्त क्रियापदों से एकवचन और बहुवचन का बोध होता है।
कुछ वाक्यों में वचन की पहचान

  • शेर जंगल में रहता है।–(एकवचन)
  • शेर जंगल में रहते है।—–( बहुवचन)
  • अचानक फयूज हो गया –(एकवचन)
  • बल्ब अचानक फयूज हो गए।–(बहुवचन)
  • खिलाडी मैदान से चला गया।– (एकवचन)
  • खिलाडी मैदान से गए—-।( बहुवचन)

इन वाक्यों में प्रयुक्त संज्ञा शब्दों खिलाडी,सिंहऔर बल्ब से वचन की पहचान न होकर वाक्य में प्रयुक्त क्रियापद’ रहता है,हो गया,और चला गया से एकवचन का बोध होता है।
तथा अन्य वाक्यों में प्रयुक्त क्रियापद रहते हैं,हो गए,और चले गए से बहुवचन का बोध होता है।

विशेष

सदा एकवचन में प्रयुक्त होने वाले शब्द

कुछ संज्ञा शब्द सद एकवचन में रहते है। इनका प्रयोग सदा एकवचन में होता है। जैसे भीड, जनता,आकाश,सोना,लोहा,दूध,मक्खन,पानी,वर्षा आदि।

  • चलती कार में आग लग गई।
  • मूसलाधार वर्षा होने लगी।
  • तालाब में बहुत पानी है।
  • सारा आकाश स्वच्छ है।
  • ठंडी हवा चल रही है।
  • थोडा सा आटा बचा है

भाववाचक तथा व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ सदैव एकवचन में प्रयुक्त होती है।
जैसे-

  • प्रेम हो जाता है।
  • आमों में मिठास है।
  • पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।
  • बुराई की सदैव पराजय होती है।
  • प्रेम ही पूजा है।
  • किशन बुद्धिमान है।

धातुओं का बोध कराने वाली द्रव्यवाचक संज्ञाएॅ सदैव एकवचन में प्रयुक्त होती है।
जैसे-

  • राम सोना खरीद रहा है।
  • लोहा मजबूत होता है।
    चीनी बहुत महँगी हो गई है।

कुछ अन्य एकवचन शब्द —— पानी,दूध, सोना,चॉदी,स्टील,घी,तेल,जनता,बालू आदि।

 

कुछ संज्ञा शब्द सदा बहुवचन में रहते है।

कुछ शब्द सदैव बहुवचन में रहते है।इनका प्रयोग सदा बहुवचन में किया जाता है। जैसे —होश,प्राण,आॅंसू ,हस्ताक्षर,दर्शन,बाल, लोग आदि।
जैसे-

  • पुत्र को देखकर ललिता के आॅंसू निकल पडे।
  • चोर को देखते ​ही माधुरी के होश अड गए ं
  • राम ने मकान के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए है।
  • अभिनेत्री को देखने के लिए लोग उमड पडे।
  • दर्दनाक दृश्य देखकर मेरे तो प्राण ही निकल गए।
  • आजकल मेरे बाल बहुत टूट रहे हैं।
  • रवि जब से अफसर बना है, तब से तो उसके दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं।
  • आजकल हर वस्तु के दाम बढ़ गए हैं।

कुछ अन्य बहुवचन शब्द— दर्शक,श्रोता, आदि।

एकवचन शब्दों का बहुवचन के रूप में प्रयोग —— किया जाता है।

आदर सम्मान प्रकट करने के लिए एकवचन के स्थान पर बहुवचन का प्रयोग किया जाता है।

हिंदी भाषा में आदर प्रकट करने के लिए एकवचन के स्थान पर बहुवचन का प्रयोग किया जाता है।
जैसे-

  • प्रधानमंत्री दूरदर्शन पर भाषण देगें।
  • अनीता की बुआ आई हैं।
  • अटलबिहारी वाजपेयी कवि भी थे।

अभिमान प्रकट करने के लिए एकवचन के स्थान पर बहुवचन का प्रयोग किया जाता है।
जैसे-

  • उसकी कार नहीं हमारी सुदंर है।
  • अभी हमसे वास्ता नहीं पडा।
  • हमारी तो बात ही कुछ और है।

एकवचन और बहुवचन बनाने के लिए महत्वपूर्ण एवम ध्याान रखने योग्य बातें

 

आदरणीय व्यक्तियों के लिए सदैव बहुवचन का प्रयोग किया जाता है।

  • जैसे- दादा जी कल से आएगें।

द्रव्यसूचक संज्ञायें एकवचन में प्रयोग होती है।

  • जैसे- पानी, तेल, घी, दूध आदि।

संबद्ध दर्शाने वाली कुछ संज्ञायें एकवचन और बहुवचन में एक समान रहती है।

  • जैसे- ताई, मामा, दादा, नाना, चाचा आदि।

कुछ शब्द सदैव बहुवचन में प्रयोग किये जाते है

  • जैसे- दाम, दर्शन, प्राण, आँसू आदि।

पुल्लिंग ईकारान्त, उकारान्त और ऊकारान्त शब्द दोनों वचनों में समान रहते है।

  • जैसे-एक मुनि -दस मुनि,
  • एक डाकू -दस डाकू,
  • एक आदमी -दस आदमी आदि।

बड़प्पन दिखाने के लिए कभी -कभी वक्ता अपने लिए ‘मैं’ के स्थान पर ‘हम’ का प्रयोग करता है
जैसे-

  • पिताजी ने आयुषी से कहा ” हम शहर जा रहें है, अभी लौट आएगें”।
  • दारोगा जी ने कहा—”हम बदमाशों को आत्नसमर्पण करने के लिए मजबूर कर देगें

व्यवहार में ‘तु, ‘ के स्थान पर ‘तुम या आप’ का प्रयोग करते हैं। जैसे-
जैसे

  • मॉं ने बेटे से कहा — तुम इधर आकर बैठों।
  • शिक्षक ने छात्र से कहा —तुम अपनी पुस्तक लेकर मेरे पास आओं
  • आप’ कल कहाँ गये थे ?

जातिवाचक संज्ञायें दोनों ही वचनों में प्रयुक्त होती है।
जैसे-

  • कुत्ता’ भौंक रहा है।
  • कुत्ते’ भौंक रहे है।
  • शेर जंगल का राजा है।
  • घोडे के चार पाँव होते हैं।

परन्तु धातुओं का बोध कराने वाली जातिवाचक संज्ञायें एकवचन में ही प्रयुक्त होती है। जैसे- ‘सोना’ महँगा है, ‘चाँदी’ सस्ती है। अर्थात

  • सोना बहुत महँगा है।
  • चाँदी सस्ती है।
  • उसके पास बहुत धन है।

गुण वाचक और भाववाचक दोनों संज्ञाओं का प्रयोग एकवचन और बहुवचन दोनों में ही किया जाता है।
जैसे –

  • मैं उनके धोके से ग्रस्त हूँ।
  • इन दवाईयों की अनेक खूबियाँ हैं।
  • डॉ राजेन्द्र प्रसाद की सज्जनता पर सभी मोहित थे।

सिर्फ एकवचन में हर, प्रत्येक और हर-एक का प्रयोग होता है।
जैसे

  • प्रत्येक व्यक्ति सज्जन नही होगा।
  • हर इन्सान इस सच को जानता है।
  • हर-एक कुएँ का पानी मीठा नहीं होता।

समूहवाचक संज्ञा का प्रयोग केवल एकवचन में ही किया जाता है।
जैसे

  • इस देश की बहुसंख्यक जनता अनपढ़ है।
  • बदरों की एक टोली ने बहुत उत्पात मचा रखा है।

ज्यादा समूहों का बोध करने के लिए समूहवाचक संज्ञा का प्रयोग बहुवचन में किया जाता है।
जैसे

  • विद्यार्थियों की बहुत सी टोलियाँ गई हैं।
  • अकबर की सदी में अनेक देशों की प्रजा पर अनेक अत्याचार होते थे।

एक से ज्यादा अवयवों का प्रयोग बहुवचन में होता है लेकिन एकवचन में उनके आगे एक लगा दिया जाता है।
जैसे – आँख, कान, ऊँगली, पैर, दांत, अंगूठा आदि।
उदहारण –

  • सीता के दांत चमक रहे थे।
  • मेरे बाल सफेद हो चुके हैं।
  • मेरा एक दांत टूट गया।
  • मेरी एक आँख में खराबी है।

करणकारक के शब्द जैसे – जाडा, गर्मी, भूख, प्यास आदि को बहुवचन में ही प्रयोग किया जाता है।
जैसे –

  • बेचारा कुत्ता जाड़े से ठिठुर रहा है।
  • भिखारी भूखे मर रहे हैं।

कभी-कभी कुछ एकवचन संज्ञा शब्दों के साथ गुण, लोग, जन, समूह, वृन्द, दल, गण, जाति शब्दों को बहुवचन में प्रयोग किया जाता है।
जैसे –

  • छात्रगण बहुत व्यस्त होते हैं।
  • मजदूर लोग काम कर रहे हैं।
  • स्त्रीजाति बहुत संघर्ष कर रही है।

संज्ञा, सर्वनाम के अनुसार वचन बदलने पर क्रिया में भी बदलाव आता है।

जैसे –

  • कवचन – मैं पढ़ना चाहता हूँ।
  • बहुवचन – हम पढ़ना चाहते हैं।
  • एकवचन – कैदी छूट गया।
  • बहुवचन – कैदी छूट गए।

अन्य उदहारण

वचन परिवर्तन संज्ञा या सर्वनाम के विशेषणों में भी होता है।
जैसे –

  • अच्छा बच्चा हमेशा सच बोलता है। (एकवचन)
  • अच्छे बच्चे हमेशा सच बोलते हैं। (बहुवचन)

वचन के अनुसार पूरे वाक्य का परिवर्तन करते समय संज्ञा या सर्वनाम के अनुरूप विशेषण एवं क्रिया में परिवर्तन का भी ध्यान रखना आवश्यक है।

 

दोनों वचनों में समान रहने वाले शब्दों में कारक के अनुसार बदलाव आता है।
जैसे-

  • फूल – (कर्ता कारक में) – बगिया में फूल खिले हैं।
  • फूल – (अधिकरण कारक में) – फूलों पर भँवरे मँडरा रहे हैं।
  • बालक – (कर्ता कारक में) – आज कुछ बालक नहीं आ पाए हैं।
  • बालक – (संप्रदान कारक में) –हम बालकों के लिए पुस्तकें लाए हैं।

एकवचन से बहुवचन बनाने के नियम-

एकवचन से बहुचवन बनाने के लिए दो प्रकार के नियमों का प्रयोग किया जाता है।

  1. विभिक्तिरहित संज्ञा शब्दों से बहुवचन
  2. विभिक्तिसहित संज्ञा शब्दों से बहुवचन

विभिक्तिरहित संज्ञाओं के बहुवचन बनाने के नियम-

जब आकारान्त के पुल्लिंग शब्दों में आ की जगह पर ए लगा दिया जाता है।

एकवचन
.बहुवचन
गधा गधे
कौआकौए
केला केले
पेडा
पेडे
कुत्ता
पेडे
कमराकमरे
जूता
जूते
तारातारे
लड़का
लड़के
घोड़ा
घोडे
बेटबेटे
मुर्गा
मुर्गे
कपड़ा
कपड़े
मेज मेजें

अकारांत स्त्रीलिंग शब्दों में ‘अ’ के स्थान पर ‘एें’ लगाने से
एकवचन..बहुवचन
कलम
कलमें
बात
बातें
रात
रातें
आँख
आखें
पुस्तक पुस्तकें
तलवार
तलवारें
गाय
गाएँ
सड़कसड़कें
बात
बातें
दवात
दवातें
यादयादें
भैंसभैंसे
किताबकिताबें
नीदनीदें

स्त्रीलिंग शब्दों के अंत में आए ”आ के साथ एँ ” जोड़कर
एकवचनबहुवचन
आशाआशाएँ
अध्यापिकाअध्यापिकाएँ
कथाकथाएँ
भावनाभावनाएँ
चिताचिताएँ
पत्रिकापत्रिकाएँ
समस्यासमस्याएँ
संज्ञासंज्ञाएॅ
छात्राछात्राएँ
शाखाशाखाएँ
भुजाभुजाएँ
विद्याविद्याएँ
कविताकविताएँ
मालामालाएँ
लतालताएँ
कन्याकन्याएँ
मातामाताएँ
कलाकलाएँ
वस्तुवस्तुएँ
दवादवाएँ
कथाकथाएँ

जिन स्त्रीलिंग संज्ञाओं के अन्त में ‘या’ आता है, उनमें ‘या’ के ऊपर चन्द्रबिन्दु लगाने से बहुवचन बनता है। जैसे-
एकवचनबहुवचन
बुढियाबुढियाँ
लुटियालुटियाँ
गैया गैयाँ
कुतियाकुतियाँ
बिंदियाबिंदियाँ
चिडियाचिडियाँ
डिबियाडिबियाँ
गुडियागुडियाँ
चुहियाचुहियाँ
चिड़ियाचिड़ियाँ
शक्तिशक्तियाँ
राशिराशियाँ
रीतिरीतियाँ
तिथितिथियाँ आदि।

ईकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के ‘इ’ या ‘ई’ के स्थान पर ‘इयाँ’ लगाने से-
एकवचनबहुवचन
तिथि तिथियाँ
नारीनारियाँ
गतिगतियाँ
थाली थालियाँ
नीतिनीतियाँ
रीतिरीतियाँ
नदीनदियाँ
लडकीलडकियाँ
घुड़कघुड़कियाँ
चुटकीचुटकियाँ
टोपीटोपियाँ
रानीरानियाँ
रीति
रीतियाँ
थालीथालियाँ
कलीकलियाँ

आकारांत स्त्रीलिंग एकवचन संज्ञा-शब्दों के अन्त में ‘एँ’ लगाने से बहुवचन बनता है। जैसे-

एकवचनबहुवचन
लतालताएँ
अध्यापिकाअध्यापिकाएँ
कन्याकन्याएँ
मातामाताएँ
भुजाभुजाएँ
पत्रिकापत्रिकाएँ
शाखाशाखाएँ
कामनाकामनाए
कथाकथाएँ

इकारांत स्त्रीलिंग शब्दों में ‘याँ’ लगाने से-
एकवचनबहुवचन
जाति
जातियाँ
रीति
रीतियाँ
नदीनदियाँ
लड़कीलड़कियाँ

उकारान्त व ऊकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के अन्त में ‘एँ’ लगाते है। ‘ऊ’ को ‘उ’ में बदल देते है-
एकवचन
.बहुवचन
वस्तु
वस्तुएँ
गौगौएँ
बहुबहुएँ
वधूवधुएँ
गऊगउएँ

संज्ञा के पुंलिंग अथवा स्त्रीलिंग रूपों में ‘गण’ ‘वर्ग’ ‘जन’ ‘लोग’ ‘वृन्द’ ‘दल’ वृन्द,गण,लोग,जन,दल आदि शब्द जोड़कर भी शब्दों का बहुवचन बना देते हैं। जैसे-
एकवचनबहुवचनएकवचन.बहुवचन
नेता –
नेतागणतुम – आप
गुरु –
गुरुजनदेेव –देवगण
पक्षी – पक्षीवृंदअमीर –अमीर लोग
मित्र –मित्रजननारी-नारीवृन्द
विद्यार्थी – विद्यार्थीगणस्त्री-स्त्रीजन
अध्यापक –अध्यापकगणअधिकारी-अधिकारीवर्ग
तुमलोग –आपलोगपाठक-पाठकगण
कवि –कविजनअध्यापक-अध्यापकवृंद
दर्शक –दर्शकगणविद्यार्थी-विद्यार्थीगण
आप-आपलोगसेना-सेनादल-
श्रोता-श्रोताजनगुरु -गुरुजन
मित्रमित्रवर्गगरीबगरीब लोग

कुछ शब्दों में गुण, वर्ण, भाव आदि शब्द लगाकर बहुवचन बनाया जाता है। जैसे-
एकवचनबहुवचन
व्यापार
.व्यापारीगण
मित्रमित्रवर्ग
सुधी सुधिजन

जब एकवचन और बहुवचन दोनों में शब्द एक समान होते हैं। जैसे :-

एकवचन ,बहुवचन शब्द एक समानएकवचन ,बहुवचन शब्द एक समान
फल फल
पानीपानी
क्रोध क्रोध
फूल फूल
छात्र छात्र
नेतानेता
पितापिता
चाचाचाचा
क्षमाक्षमा
जलजल
योद्धायोद्धा
राजाराजा
दादा दादा
बाजार बाजार
प्रेम प्रेम

जब शब्दों को दो बार प्रयोग किया जाता है।
जैसे :-

  • भाई = भाई -भाई
  • बहन = बहन-बहन
  • गॉंव = गाँव -गाँव
  • घर = घर -घर
  • शहर = शहर -शहर आदि।

नोट-

एकवचन और बहुवचन में समान रहने वालेशब्द

  • फूल,भाई,प्रेम,बालक,फल,मुनि,घर,क्रोध,पेड़,हाथी,ऋषि,बाजार,साधु,जल आदि।

कुछ शब्द दोनों वचनों में एक जैसे रहते है। जैसे-

  • पिता, योद्धा, चाचा, मित्र, फल, बाज़ार, अध्यापक, फूल, छात्र, दादा, राजा, विद्यार्थी आदि।

विभक्तिसहित संज्ञाओं के बहुवचन बनाने के नियम-

जो संज्ञा शब्द विभक्तियों से प्रयुक्त होते है उन शब्दों को बहुवचन के रूप बनाने के लिए लिंग के कारण उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता। अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि— जब अकारांत , आकारान्त और एकारांत के संज्ञा शब्दों में अ, आ , तथा ए की जगह पर ओं कर दिया जाता है। जब इन संज्ञाओं के साथ ने , को , का , से आदि परसर्ग होते हैं तब भी इनके साथ ओं लगा दिया जाता है।

इसके कुछ सामान्य नियम निम्नलिखित है-

अकारान्त, आकारान्त (संस्कृत-शब्दों को छोड़कर) तथा एकारान्त संज्ञाओं में अन्तिम ‘अ’, ‘आ’ या ‘ए’ के स्थान पर बहुवचन बनाने में ‘अों’ कर दिया जाता है। जैसे-

एकवचन.बहुवचन
लडका लडकों
घरघरों
गधागधों
घोड़ा घोड़ों
चोरचोरों

वाक्य में प्रयोग

  • लडकी को बुलाओ – लड​कियों को बुलाओ।
  • बच्चे ने गाना गाया – बच्चों ने गाना गाया।
  • कुएॅं का जल बहुत ठंडा है – कुओं का जल बहुत ठंडा है।
  • बालक से पूछ लो – बालकों से पूंछ लो।
  • लडके ने पढ़ा – लडकों ने पढ़ा।
  • गाय ने दूध दिया – गायों ने दूध दिया।
  • चोर को छोड़ना मत – चोरों को छोड़ना मत।

संस्कृत की आकारान्त तथा संस्कृत-हिन्दी की सभी उकारान्त, ऊकारान्त, अकारान्त, औकारान्त संज्ञाओं को बहुवचन का रूप देने के लिए अन्त में ‘अों’ जोड़ना पड़ता है। उकारान्त शब्दों में ‘अों’ जोड़ने के पूर्व ‘ऊ’ को ‘उ’ कर दिया जाता है।

एकवचन बहुवचन
लता लताओं
साधु
साधुओं
वधू
वधुओं
घरघरों
जौ
जौअों
दवादवाओं

सभी इकारान्त और ईकारान्त संज्ञाओं का बहुवचन बनाने के लिए अन्त में ‘यों’ जोड़ा जाता है। ‘इकारान्त’ शब्दों में ‘यों’ जोड़ने के पहले ‘ई’ का इ’ कर दिया जाता है। जैसे-

  
एकवचन
बहुवचन
मुनि
मुनियों
गली
गलियों
नदीनदियों
श्रीमतीश्रीमतियों
गाड़ी
गाड़ियों
झाड़ीझाड़ियों
साड़ी.साड़ियों


वचन परिवर्तन  के वाक्य के प्रयोग द्वारा उदहारण

  • लड़का खाता है. लड़के खाते हैं।
  • लड़की खाती है. लड़कियाँ खाती हैं।
  • एक लड़का जा रहा है. तीन लड़के जा रहे हैं।

इन वाक्यों में  लड़का शब्द एक के लिए आया है और लड़के एक से अधिक के लिए। लड़की एक के लिए और लड़कियाँ एक से अधिक के लिए व्यवहृत हुआ है। यहाँ संज्ञा के रूपान्तर का आधार श्वचनश् है। लड़का एकवचन है और लड़के बहुवचन में प्रयुक्त हुआ है।

वचन परिवर्तन :-

एकवचनबहुवचनएकवचनबहुवचन
तिनकातिनकेपत्ता
पत्ते
भेड़भेड़ेंबच्चाबच्चे
बहनबहनें
बेटाबेटे
घोडाघोड़ेकपड़ा
कपड़े
तस्वीरतस्वीरेंलड़का
लडके
कक्षाकक्षाएँबातबातें
ऋतुऋतुएँआँखआँखें
कमराकमरेपुस्तक
पुस्तकें
भाषाभाषाएँकिताब
किताबें
सेनासेनाएँरुपयारुपए
अध्यापिकाअध्यापिकाएँचुहिया
चुहियाँ
कविताकविताएँ
कुर्सी
कुर्सियां
वस्तुवस्तुएँमिठाई
मिठाइयाँ
लतालताएँहड्डीहड्डियाँ
बुढियाबुढियांदवाईदवाईयाँ
चिड़ियाचिड़ियाँछुट्टीछुट्टियाँ
गुडियागुड़ियाँकविकविगण
कहानीकहानियाँगुरुगुरुजन
घड़ीघड़ियाँअलमारीअलमारियाँ

लिंग: परिभाषा,अर्थ,भेद,पहचान और उदाहरण सहित वर्णन – Gender Hindi Vyakaran

लिंग की परिभाषा(Definition of Gender)

लिंग का तात्पर्य ऐसे प्रावधानों से जिसके द्वारा वक्ता के स्त्री, पुरूष तथा ​निर्जीव और सजीव अवस्था के अनुसार परिवर्तन होते है। विश्व में लगभग एक चौथाई भाषाओं  किसी ना किसी प्रकार  की ‘लिंग’ व्यवस्था है।
अर्थात “संज्ञा के जिस रूप से व्यक्ति या वस्तु की नर या मादा जाति का बोध हो, उसे व्याकरण में ‘लिंग’ कहते है।
दूसरे शब्दों में-संज्ञा शब्दों के जिस रूप से उसके पुरुष या स्त्री जाति होने का पता चलता है, उसे लिंग कहते है।
सरल शब्दों में- शब्द की जाति को ‘लिंग’ कहते है।

लिंग का अर्थ(Meaning of Gender)

लिंग का  शाब्दिक अर्थ है— चिह्न/निशान एवम् पहचान का साधन,
शब्द के जिस रूप से यह जाना जाय कि वर्णित वस्तु या व्यक्ति पुरूष् जाति का है, या स्त्री जाति का,उसे
लिंग कहते है।
  • लिंग संज्ञा का गुण है,अत: हर संज्ञा शब्द या तो पुल्लिंग होगा या स्त्री लिंग।
  • लिंग के द्वारा संज्ञा, सर्वनाम,विशेषण आदि शब्दों की जाति का बोध होता है ।

जिसमें संज्ञा के  दो रूपों को बताया गया  हैं।

  • एक,  प्राणिवाचक संज्ञा- घोड़ा-घोड़ी, माता-पिता, लड़का-लड़की इत्यादि।
  • दूसरा,अप्राणिवाचक संज्ञा गिलास, प्याली, पेड़, पत्ता इत्यादि।

अँगरेजी व्याकरण में लिंग का निर्णय इसी व्यवस्था के अनुसार होता है। मराठी, गुजराती आदि आधुनिक आर्यभाषाओं में भी यह व्यवस्था ज्यों-की-त्यों चली आ रही है।

लिंग के भेद(kind of Gender)

लिंग संज्ञा का वह लक्षण है जो संज्ञा के पुरूषवाची तथा स्त्रीवाची होने का बोध कराता है। वह “लिंग” कहलाता है।
 इस प्रकार सारी सृष्टि की प्रमुख तीन जातियाँ हैं-
  •  पुरुष  जाति
  • स्त्री जातिऔर
  • जड़ जाति।
अनेक भाषाओं में इन्हीं तीन जातियों के आधार पर लिंग के तीन भेद किये गये हैं
  •  पुंलिंग
  •  स्त्रीलिंग और
  •  नपुंसकलिंग।
पुंलिंग  —पुल्लिंग  का संधि विच्छेद है- पुम्+ लिंग । यह दो शब्दों से मिलकर बना है।( पुम +लिंग) में म् का अनुसार हो जाता है। अत: पुल्लिंग लिखना चाहिए।
इसके विपरीत, हिन्दी में दो ही लिंग-” पुंलिंग और स्त्रीलिंग “हैं। नपुंसकलिंग यहाँ नहीं हैं।
अतः, हिन्दी में सारे पदार्थवाचक शब्द, चाहे वे चेतन हों या जड़, स्त्रीलिंग और पुंलिंग, इन दो लिंगों  को बाटॉं गया  है।
हिन्दी व्याकरण में लिंग के दो भेद होते है-
  • पुलिंग(Masculine Gender)
  • स्त्रीलिंग( Feminine Gender)
(1)पुलिंग(Masculine Gender)ऐसे शब्द जिनमें पुरूष जाति का बोध होता है। उसे पुलिंग कहते है।
जैसे-
  • केला, दुकानदार,स्कूटर बस्ता,अध्यापक,वायुयान,टेलीविजन, लडका आदि।
  • सजीव-— कुत्ता, बालक, खटमल, पिता, राजा, घोड़ा, बन्दर, हंस, बकरा, लड़का इत्यादि।
  • निर्जीव पदार्थ-— मकान, फूल, नाटक, लोहा, चश्मा इत्यादि।
  • भाव-— सुख, दुःख, लगाव, इत्यादि।
(2)स्त्रीलिंग( Feminine Gender) :- जिस संज्ञा शब्द से स्त्री जाति का बोध होता है, उसे स्त्रीलिंग कहते है।
जैसे-
  • पुस्तक, साडी ,कमीज, दीवार, गली, पतंग,बंदूक,फुलवारी आदि।
  • सजीव– माता, रानी, घोड़ी, कुतिया, बंदरिया, हंसिनी, लड़की, बकरी,जूँ।
  • निर्जीव पदार्थ– सूई, कुर्सी, गर्दन इत्यादि।
  • भाव- लज्जा, बनावट इत्यादि।

पुल्लिंग की पहचान

सजीव वस्तुओं के लिंग की पहचान  करना आसान होता है, लेकिन निर्जीव वस्तुओं  का उनके  व्यवहार और परंपरा के आधार पर स्त्रीलिंग या पुल्लिंग माना जाता है।
इन सभी शब्दों का लिंग जानने के लिए उन शब्दों के साथ वाक्यों में जो क्रिया हो रही है या उनमें आए विशेषण शब्दों पर ध्यान  दिया जाए तो लिंग की पहचान आसान हो जाती है।
प्राणिवाचक संज्ञाओं के लिंग की पहचान

1). प्राणिवाचक संज्ञाओं के लिंग की पहचान उनकी शारीरिक संरचना से हो जाती है।

  • लडका, युवक ,वृद्ध,शेर, घोडा, गधा, सॉंड, बंदर——इनकी शारीरिक संरचना से इनके पुल्लिंग होने का पता चलता है।
  • चिडिया, गधी, गाय, स्त्री, लडकी, बूढी, बंदरिया, हथिनी, सर्पिर्णी,मछली——इनकी शारीरिक संरचना से इनके स्त्रीलिंग  होने का पता चलता है।
2).सदा पुल्लिंग र​हने वाले शब्द ——
कुछ संज्ञा शब्द सदा पुल्लिंग रहते है।
जैसे ——
  • कौआ,गीदड, उल्लू, बगुला, ज़िराफ,गैंडा,मच्छर,लगूंर,और खरगोश,खटमल, भेड़या,चीता, मच्छर, पक्षी, आदि।
3).सदा स्त्रीलिंग र​हने वाले शब्द ——
कुछ संज्ञा शब्द सदा स्त्रीलिंग रहते है।
जैसे ——
  • कोयल,गिलहरी,भेड,चमगादड,मक्खी, मैना,मछली आदि।

4).पदनाम सदैव पुल्लिंग में होते है।

राजदूत,मुख्यमंत्री,प्रधानमंत्री,कुलपति,राष्ट्रपति,इंजीनियर,प्रोड्यूसर,फोटोग्राफ,रिपोर्टर,डाक्टर,प्रोफेसर,सचिव सभापति,आदि।

  • चाहे उन पदों पर बैठा व्यक्ति पुरूष हो या स्त्री।ये उभयलिंगीं हो गए है। इनके लिंग का विधान क्रिया केद्वारा हो पाता है।
अप्राणिवाचक संज्ञाओं  की लिंग की पहचान
अप्राणिवाचक संज्ञाओं  की लिंग के विषय में निश्चित नियम नहीं है। इनका प्रयोग परम्परा लिंग के अनुसार होता चला आ रहा है। वही समान्य रूप है।
अप्राणिवाचक संज्ञा शब्दों के परंपरानुसार कुछ नियम प्रचलित है। ये निम्नलिखित है।

   सदा पुंलिग रहने वाले शब्द

दिनों के नाम-
  • सोमवार, मंगलवार, बुधवार, वीरवार, शुक्रवार, शनिवार, रविवार आदि।
महीनो के नाम- 
  • ज्येष्ठ,आषाढ,श्रावण,भादप्रद,अश्विन,कार्तिक,मार्गशीष,पौष,माघ,फाल्गुन, चैत, वैशाख आदि। (अपवाद- जनवरी, मई, जुलाई-स्त्रीलिंग)
समयसूचक- 
  •  पल, पहर, क्षण, मिनट, सेकेंड घंटा,दिन, महीना, वर्ष आदि।
फलों के नाम-
  • केला,संतरा,तरबूज,जामुन,आम आदि।
  • (अपवाद-लीची, खजूर स्त्रीलिंग)
वृक्षों, के नाम-
  • पीपल, देवदार, चिनार, बरगद, अशोक, पलाश,अमरुद,आदि।
  • (अपवाद-इमली स्त्रीलिंग)पर्वतों के नाम-
  • हिमालय, विन्द्याचल, सतपुड़ा, आल्प्स, यूराल, कंचनजंगा, एवरेस्ट, फूजीयामा आदि।
देशों के नाम——
  • मॉरीशस,मलेशिया,नेपाल,वियतनाम,भारत, चीन, इरान, अमेरिका आदि।
नक्षत्रों, व ग्रहों के नाम-
  • सूर्य, चन्द्र, राहू, शनि, आकाश, बृहस्पति, बुध आदि।
  • (अपवाद- पृथ्वी-स्त्रीलिंग)
रत्न और धातुओं के नाम
  • मुंगा,पुखराज,मोगध, माणिक्य, पन्ना, मोती,हीरा, सोना, तांबा, पीतल, लोहा, आदि।
  • (अपवाद-चॉंदी स्त्रीलिंग)
समूहवाचक संज्ञा  के नाम –
  • मण्डल, समाज, दल, समूह, वर्ग आदि।
भारी और बेडौल वस्तुअों के नाम –
  • जूता, रस्सा, लोटा ,पहाड़ आदि।
अनाजों के नाम
  • गेहूँ, बाजरा, चना, जौ आदि।
  • (अपवाद- मक्की, ज्वार, अरहर, मूँग-स्त्रीलिंग)
फूलों के नाम-
  • गेंदा, मोतिया, कमल, गुलाब आदि।
देशों और नगरों के नाम
  • दिल्ली, लन्दन, चीन, रूस, भारत आदि।
द्रव पदार्थो के नाम
  • शरबत, दही, दूध, पानी, तेल, कोयला, पेट्रोल, घी आदि।
  • (अपवाद- चाय, कॉफी, लस्सी, चटनी- स्त्रीलिंग)
द्वीप  के नाम
  • अंडमान-निकोबार, जावा, क्यूबा, न्यू फाउंडलैंड आदि।
सागरके नाम–
  •  हिंद महासागर, प्रशांत महासागर, अरब सागर आदि।
वर्णमाला के अक्षर
  • क्, ख्, ग्, घ्, त्, थ्, अ, आ, उ, ऊ आदि।
  • (अपवाद- इ, ई, ऋ- स्त्रीलिंग)
शरीर के अंग के नाम–
  • हाथ, पैर, गला, अँगूठा, कान, सिर, मस्तक, मुँह, घुटना, ह्रदय, दाँत आदि।
  • (अपवाद- जीभ, आँख, नाक, उँगलियाँ-स्त्रीलिंग)
आकारान्त संज्ञायें
  • गुस्सा, चश्मा, पैसा, छाता आदि।
‘दान, खाना, वाला’ आदि से अंत होने वाले अधिकतर शब्द पुल्लिंग होते हैं; जैसे
  • खानदान, पीकदान, दवाखाना, जेलखाना, दूधवाला आदि।
अरबी, फारसी के ‘खाना’ प्रत्यय (पीछे लगने वाले) शब्द पुल्लिंग होते है । जैसे
  • दवाखाना, डाकखाना आदि ।
अरबी, फारसी के दान प्रत्यय वाले शब्द पुल्लिंग होते है । जैसे
  • फूलदान, कमलदान आदि ।

आ, आव, पा, पन, न

  • ये प्रत्यय जिन शब्दों के अन्त मे हों वे प्रायः पुल्लिंग होते है ।

यात्रा के साधनों में –

  • ताँगा, स्कूटर, ट्रक, इंजन, हवाईजहाज, राकेट आदि पुल्लिंग है।

वस्त्रों के नाम –

  • रुमाल, कुर्ता, पाजामा, कोट, पेटीकोट, सूट, हैट, कच्छा, घाघरा, मोजे, दुपट्टा, गाउन शब्द पुल्लिंग है ।
अ, आ, आव, पा, पन, क, त्व, आवा तथा औड़ा से अंत होने वाली संज्ञाएँ पुल्लिंग होती हैं :
शब्दवाक्य
अ-खेल, रेल, बाग, हार, यंत्र आदि।
आ-लोटा, मोटा, गोटा, घोड़ा, हीरा आदि।
आव- पुलाव, दुराव, बहाव, फैलाव, झुकाव आदि।
पा- बुढ़ापा, मोटापा, पुजापा आदि।
पन-लड़कपन, अपनापन, बचपन, सीधापन आदि।
क-लेखक, गायक, बालक, नायक आदि।
त्व-ममत्व, पुरुषत्व, स्त्रीत्व, मनुष्यत्व आदि।
आवा-भुलावा, छलावा, दिखावा, चढ़ावा आदि।
औड़- पकौड़ा, हथौड़ा आदि।
मच्छर, गैंडा, कौआ, भालू, तोता, गीदड़, जिराफ, खरगोश, जेबरा आदि सदैव पुल्लिंग होते हैं।

सदा स्त्रीलिंग रहने वाले शब्द

नदी, भाषा, लिपि, तिथि, बोली, बरतन, आदि के नाम स्त्रीलिंग होते हैं; जैसे
बोलियों के नाम –
  • अंगिका,राजस्थानी, मंडियाली,  भोजपुरी, मगही, आदि।
भाषाओं के नाम
  •  हिंदी, संस्कृत, मराठी, गुजराती, तमिल, अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, आदि।
लिपियों के नाम
  • देवनागरी,अरबी, रोमन, गुरुमुखी आदि।
नदियों के नाम
  •  सतलुज,रावी,व्यास, यमुना, गंगा, सरस्वती, गोदावरी, कावेरी आदि।
तिथियों के नाम –
  • पूर्णिमा, एकादशी, अमावस्या ,
नक्षत्र- के नाम –
  • अश्विनी, रेवती, मृगशिरा, चित्रा, भरणी, रोहिणी आदि।चतुर्थी, प्रथमा आदि।आदि।
कुछ बरतनों के नाम –
  •  कटोरी, थाली, चम्मच, कलछी,कढाई प्लेट, छलनी आदि।
समूहवाचक संज्ञा के नाम-
  • भीड़, कमेटी, सेना, सभा, कक्षा आदि।
प्राणिवाचक संज्ञा के नाम-
  • धाय, सन्तान, सौतन आदि।
छोटी और सुन्दर वस्तुअों के नाम-
  • जूती, रस्सी, लुटिया, पहाड़ी आदि।
आहारों के नाम——
  • खिचडी,रोटी,चपाती,दाल,कढी,कचौडी,इडली आदि।अपवाद- हलुआ, अचार, रायता आदि।
किराने की वस्तुएॅ तथा कुछ मसाले आदि भी स्त्रीलिंग के अंतर्गत आते हैं
  • चीनी ,इलायची,अरहर,मुॅंग,सौंफ,मिर्च दालचीनी, लौंग, हल्दी, मिर्च, धनिया, इलायची, अजवायन, सौंफ, चिरौंजी, चीनी, कलौंजी, चाय, कॉफी आदि। आदि।
महीनों के नाम—
  • जनवरी फरवरी,मई, जुलाई आदि।
शरीर के कुछ अंगों के नाम –
  • गरदन, कमर, जीभ, उँगली, छाती, आँख आदि।
ईकारान्त वाले शब्द-
  • नानी, बेटी, मामी, भाभी आदि।
इसके अतिरिक्त जिन शब्दों के अंत में आई, आ, ता, नी, आवट, आहट, ई, री, आस, इया, इमा आदि प्रत्यय जुड़े होते हैं, वे भी स्त्रीलिंग में होते है; जैसे
प्रत्यय शब्दस्त्रीलिंग शब्द
आई   अगडाई, पढाई,लड़ाई, धुलाई, कढाई, मिठाई, चिकनाई  सगाई, मिठाई, धुनाई, पिटाई,आदि।
भाषा, कविता, प्रजा, दया, विद्या आदि
तानिकटता, समीपता, घटता,बढता,सरलता,पढता,रैंगता  सुंदरता, मधुरता, एकता, मनुष्यता गीता, ममता, लता, संगीता, माता, सुंदरता, मधुरता आदि।
नी कटनी, जापानी, चटनी, छलनी, कथनी, करनी आदि।
आवट बनावट,  रूकावट , लिखावट, थकावट आदि।
आहट हिचकिचाहट, जगमगाहट,  चिल्लाहट,घबराहट, सरसराहट, मुसकराहट  ​आदि।
  भलाई, अच्छाई, खिड़की, लकड़ी, गरमी, सरदी, मज़दूरी आदि।
रीबकरी, परी कोठरी, मोटरी आदि।
आस भड़ास, प्यास खटास, मिठास, आदि ।
इया चिड़िया, गुड़िया, पुड़िया, बुढ़िया, लुटिया कुटिया, चिड़िया, बिंदिया, डिबियाआदि।
इमालालिमा, गरिमा, कालिमा, महिमा आदि।
देवियों के नाम :
  • दुर्गा , लक्ष्मी, पार्वती, काली,रमा , उमा  आदि ।
महिलाओं के नाम :
  • शोभा, पूनम, निकी, राधा जमुना आदि।
लताओं के नाम :
  • अमर बेल , मालती , तोरई गिलोई बेल रमास की बेल सेम बेल ।
सदैव ये शब्द स्त्रीलिंग होते हैं
  • गिलहरी, तितली, दीमक, मक्खी, मैना, छिपकली, चील, कोयल, मकड़ी, लोमड़ी, मछली, जू आदि।

संस्कृत के कुछ ऐसे शब्द जो आकारांत होते हैं, वे भी स्त्रीलिंग में होते हैं; जैसे-

  • क्रिया, कृपा, घृणा, सुता, छात्रा आदि।
पद सूचक शब्द न तो स्त्रीलिंग होते हैं न पुल्लिंग। इन्हें उभयलिंगी कहते हैं। ये दोनों के लिए प्रयोग किए जाते हैं; जैसे
  • पार्षद, सचिव, गवर्नर, राजदूत, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, डॉक्टर, मैनेजर आदि।
कुछ संज्ञाएँ हमेशा स्त्रीलिंग रहती है
  • मक्खी ,कोयल, मछली, तितली, मैना आदि।

विशेष

हिन्दी भाषा में वाक्य रचना में क्रिया का रूप लिंग पर ही निर्भर करता है। यदि कर्ता पुल्लिंग है तो क्रिया रूप भी पुल्लिंग होता है तथा यदि कर्ता स्त्रीलिंग है तो क्रिया का रूप भी स्त्रीलिंग होता है।
हिंदी में लिंग निर्धारण
संज्ञा सर्वनाम  प्रत्ययों और विशेषण आदि के रूप पर निम्न  आधार पर लिंग निर्धारण किए जाते है।
  • रूप के आधाार पर
  • अर्थ के आधार पर
  • प्रयोग के आधार पर
—रूप के आधाार पर
रूप के आधार पर लिंग निर्णय का का तात्पर्य है— “शब्द की व्याकरणिक बनावट।”
शब्द की रचना में किन प्रत्ययों का प्रयोग हुआ है तथा शब्दांश में कौन— सा स्वर है— इसे आधार बनाकर शब्द के लिंग  का निर्धारण किया जाता है।

लिंग निर्णय करने के लिए निम्नलिखित प्रकार  हैं :-

  1. तत्सम शब्दों का लिंग निर्णय
    2. संस्कृत शब्दों का लिंग निर्णय
    3. तद्भव शब्दों का लिंग निर्णय
    4. अर्थ के अनुसार लिंग निर्णय
    5. प्रत्ययों के आधार पर तद्भव हिंदी शब्दों का लिंग निर्णय
    6. उर्दू शब्दों का लिंग निर्णय
तत्सम शब्दों का लिंग निर्णय :- तत्सम शब्दों के लिंग निर्णय को दो भागों में बाँटा गया है ।
  • तत्सम पुल्लिंग शब्द
  • तत्सम स्त्रीलिंग शब्द

(पुलिंग शब्द)(Masculine)

पुलिंग तत्सम  (संस्कृत) शब्दों का लिंग-निर्णय निम्न आधाारों पर किया जाता है,

संस्कृत पुंलिंग तत्सम शब्द

पं० कामताप्रसाद गुरु ने संस्कृत शब्दों को पहचानने के निम्नलिखित नियम बताये है-

अकारांत ,आकारान्त शब्द प्राय: पुलिंग होते है। जैसे
  • रात,सूर्य क्रोध,समुद्र,चीता,घोडा कपडा,घडा आदि।
जिन शब्दों के अन्त में ‘आर’, ‘आय’, ‘वा’, ‘आस’ हो। जैसे-
  • विकार, उदार, आधार, विस्तार,  संसार, अध्याय, अन्याय, उपाय,समुदाय, लकवा,जजवा,अथवा,मित्तवा,निकास,मिठास, उदास,भडास,उल्लास, विकास, ह्रास इत्यादि।
  • अपवाद- सहाय (उभयलिंग), आय (स्त्रीलिंग)।
भाव वाचक संज्ञाएं जिनके अन्त में त्व,व,य होता है। वे प्राय: पुंलिग होती है। जैसे ——
  • गुरूत्व, गौरव,शौर्य  सतीत्व, बहूत्व, नृत्य,कृत्य, लाघव, गौरव, माधुर्यआदि।
जिन शब्दों के अंत में पा,पन,आव,आवा,खाना,जुडे होते है। वे प्राय:पुलिंग होते है। जैसे
  • बुढापा बचपन,मोटापा,घुमाव,भुलावा,पागलखाना आदि।
अ’-प्रत्ययान्त संज्ञाएँ। जैसे-
  • क्रोध, मोह, पाक, त्याग, दोष, स्पर्श इत्यादि।
  • अपवाद- जय (स्त्रीलिंग), विनय (उभयलिंग) आदि।

व्यंजन के साथ प्रत्यय लगाकर पुलिंग शब्द  बनाए जा सकते है।

ज’-प्रत्ययान्त संज्ञाएँ। जैसे- 

  • जलज,स्वेदज, पिण्डज, सरोज ,जमादार,जलसा, जमीन,इत्यादि।
त’-प्रत्ययान्त संज्ञाएँ। जैसे-
  • चरित, गणित, फलित, मत, गीत, स्वागत इत्यादि।
जिन संज्ञाओं के अन्त में ‘त्र’ होता है। जैसे
  • चित्र, क्षेत्र, पात्र, नेत्र, चरित्र, शस्त्र इत्यादि।
‘नान्त’ संज्ञाएँ। जैसे-
  • पालन, पोषण, दमन, वचन, नयन, गमन, हरण इत्यादि।
  • अपवाद- ‘पवन’ उभयलिंग है।

जिन संज्ञा शब्दों के अंत में” त” आता है ।जैसे :-

  • चरित , फलित , गणित , गीत , मत , स्वागत आदि ।

जिन संज्ञा शब्दों के अंत में ख आता है ।जैसे :-

  • नख , मुख , सुख , दुःख , लेख , मख , शख आदि ।
तत्सम पुंलिंग शब्द
तत्सम पुंलिंग शब्द
आश्र्चर्य, नृत्य, काष्ट, छत्र, मेघ, कष्ट, प्रहर, सौभाग्य, अंकन, अंकुश, अंजन, अंचल, अन्तर्धान, अन्तस्तल, अम्बुज, अंश, अकाल, अक्षर, कल्याण, कवच, कायाकल्प, कलश, काव्य, कास, गज, गण, ग्राम, गृह, चन्द्र, चन्दन, क्षण, छन्द, अलंकार, सरोवर, परिमाण,चित्र, पत्र, पात्र, मित्र, गोत्र, दमन, गमन, गगन, श्रवण, पोषण, शोषण, पालन, लालन, मलयज, जलज, उरोज,सतीत्व, कृत्य, लाघव, वीर्य, माधुर्य, कार्य, कर्म, प्रकार, प्रहार, विहार, प्रचार, सार, विस्तार, प्रसार, अध्याय, स्वाध्याय, उपहार, ह्रास, मास, लोभ, क्रोध, बोध, मोद, ग्रन्थ, नख, मुख, शिख, दुःख, सुख, शंख, तुषार, तुहिन, उत्तर, पश्र, मस्तक,  परिमार्जन, संस्करण, संशोधन, परिवर्तन, परिशोध, परिशीलन, प्राणदान,विधेयक, विनिमय, विनियोग, विभाग, विभाजन, विऱोध, विवाद, वाणिज्य, शासन, प्रवेश, अनुच्छेद, शिविर, वाद, अवमान, अनुमान, आकलन, निमन्त्रण, नियंत्रण, आमंत्रण,उद्भव, निबन्ध, नाटक, स्वास्थ्य, निगम, न्याय, समाज, विघटन, विसर्जन, विवाह, व्याख्यान, धर्म,वचन, मर्म, यवन, रविवार,सोमवार, मार्ग, राजयोग, रूप, रूपक, स्वदेश, राष्ट, प्रान्त, नगर, देश, सर्प, सागर, साधन, सार, तत्त्व, स्वर्ग, दण्ड, दोष, धन, नियम, पक्ष, पृष्ट,  उपकरण, आक्रमण, श्रम,बहुमत, निर्माण, सन्देश, ज्ञापक, आभार, आवास, छात्रावास, अपराध, प्रभाव, लोक, विराम, विक्रम, न्याय, संघ, संकल्प इत्यादि।
संस्कृत तत्सम स्त्रीलिंग शब्द
  • पं० कामताप्रसाद गुरु ने अनेक नियमों का उल्लेख किया है।

संस्कृत स्त्रीलिंग शब्दों को पहचानने के निम्नलिखित नियम बताये है-

आकारान्त शब्द स्त्रीलिंग होते है।——— जैसे-

  • लता,रमा,ममता, दया, माया, कृपा, लज्जा, क्षमा, शोभा इत्यादि।
नाकारान्त शब्द स्त्रीलिंग होते है।——— जैसे-
  • प्रार्थना, वेदना, प्रस्तावना, रचना, घटना इत्यादि।
उकारान्त शब्द स्त्रीलिंग होते है।——— जैसे-
  • वायु, रेणु, रज्जु, जानु, मृत्यु, आयु, वस्तु, धातु इत्यादि।
  • अपवाद- मधु, अश्रु, तालु, मेरु, हेतु, सेतु इत्यादि।

जिनके अन्त में ‘ति’ वा ‘नि’ हो। जैसे-

  • गति, मति, रीति, हानि, ग्लानि, योनि, बुद्धि,
  • ऋद्धि, सिद्धि (सिध् +ति=सिद्धि) इत्यादि।

ता’-प्रत्ययान्त भाववाचक संज्ञाएँ। जैसे-

  • न्रमता, लघुता, सुन्दरता, प्रभुता, जड़ता इत्यादि।

इकारान्त संज्ञा शब्द भी प्राय:स्त्रीलिंग होते है।  । जैसे

  • रीति,तिथि,हानि, निधि, विधि, रिधि, राशि, अग्नि, छवि, केलि, रूचि इत्यादि।
  • अपवाद-​कवि ,कपि, रवि,वारि, जलधि, पाणि, गिरि, अद्रि, आदि, बलि इत्यादि। पुलिंग है।
‘इमा’- प्रत्ययान्त शब्द। जैसे-
  • महिमा, निलिमा, गरिमा, कालिमा,लालिमा इत्यादि।

आई, इया ,आवट, आहट प्रत्यय वाले शब्द भी प्राय: स्त्रीलिंग  होते है। जैसे —

  • लिखाई, डिबिया,मिलावट घबराहट  सुन्दरता, महिमा आदि।
तत्सम स्त्रीलिंग शब्द
[table id=106 /]
तद्भव (हिन्दी) शब्दों का लिंग निर्णय

तद्भव शब्दों के लिंग निर्णय को दो भागों में बाँटा गया है ।

  • तद्भव पुल्लिंग शब्द
  • तद्भव स्त्रीलिंग शब्द
तद्भव पुंलिंग शब्द

तद्भव पुल्लिंग शब्द व् उनके नियम इस प्रकार हैं

जिन भाववाचक संज्ञाओं के अन्त में ना, आव, पन, वा, पा, होता है। जैसे-

  • आना, गाना, बहाव, चढाव, बड़प्पन, बढ़ावा, बुढ़ापा इत्यादि।
ऊनवाचक संज्ञाओं को छोड़ शेष आकारान्त संज्ञाएँ। जैसे-
  • कपड़ा, गत्रा, पैसा, पहिया, आटा, चमड़ा, इत्यादि।
कृदन्त की आनान्त संज्ञाएँ। जैसे-
  • लगान, मिलान, खान, पान, नहान, उठान इत्यादि।
  • अपवाद– उड़ान, चट्टान इत्यादि।

तद्भव  स्त्रीलिंग शब्द

तद्भव स्त्रीलिंग शब्द व् उनके नियम इस प्रकार हैं

ईकारान्त संज्ञा शब्द। जैसे-

  • नदी, चिट्ठी, रोटी, टोपी, उदासी,हॅंसी  इत्यादि।
  • अपवाद– घी, जी मोती, दही इत्यादि।
ऊनवाचक याकारान्त संज्ञा शब्द। जैसे-
  • गुड़िया, खटिया, टिबिया, पुड़िया, ठिलिया इत्यादि।
तकारान्त संज्ञा शब्द— जैसे-
  • रात, बात, लात, छत, भीत, पत इत्यादि।
  • अपवाद- भात, खेत, सूत, गात, दाँत इत्यादि।
उकारान्त संज्ञा शब्द। जैसे-
  • बालू, लू, दारू, ब्यालू, झाड़ू इत्यादि।
  • अपवाद- आँसू, आलू, रतालू, टेसू इत्यादि।
अनुस्वारान्त संज्ञा शब्द। जैसे-
  • सरसों, खड़ाऊँ, भौं, चूँ, जूँ इत्यादि।
  • अपवाद- गेहूँ।
सकारान्त संज्ञा शब्द। जैसे- 
  • बाँस, साँस प्यास, मिठास, निदास, रास(लगाम),  इत्यादि।
  • अपवाद- निकास, काँस, रास (नृत्य)।
कृदन्त नकारान्त संज्ञाएँ
जिनका उपान्त्य वर्ण अकारान्त हो अथवा जिनकी धातु नकारान्त हो। जैसे-
  • रहन, सूजन, जलन, उलझन, पहचान इत्यादि।
  • अपवाद- चलन आदि।
कृदन्त की अकारान्त संज्ञाएँ। जैसे-
  • लूट, मार,समझ, दौड़, सँभाल, रगड़, चमक, छाप, पुकारइत्यादि।
  • अपवाद नाच, मेल, बिगाड़, बोल, उतार इत्यादि।
जिन भाववाचक संज्ञाओं के अन्त में ट, वट, हट, होता है। जैसे-
  • सजावट, घबराहट, चिकनाहट,आहट, झंझट इत्यादि।
जिन संज्ञाओं के अन्त में ‘ख’ होता है। जैसे-
  • ईख, भूख, राख, चीख, काँख, कोख, साख, देखरेख  इत्यादि।
  • अपवाद- पंख, रूख

अर्थ के अनुसार लिंग-निर्णय

कुछ शब्द अर्थ की दृष्टि से समान होते हुए भी लिंग की दृष्टि से भिन्न है। इनका प्रयोग उचित एवंम समयक प्रयोग करना चाहिए। जिसमें कुछ लोग अप्राणिवाचक शब्दों का लिंगभेद अर्थ के अनुसार करते है।
अर्थ के अनुसार लिंग निर्णय को दो भागों में बाँटा गया है।
  • अप्राणीवाचक पुल्लिंग हिंदी शब्द
  • अप्राणीवाचक स्त्रीलिंग हिंदी शब्द
पं० कामताप्रसाद गुरु ने इस आधार और दृष्टिकोण को ‘अव्यापक और अपूर्ण’ कहा है– क्योंकि इसके जितने उदाहरण है, प्रायः उतने ही अपवाद हैं। इसके अलावा, इसके जो थोड़े-से नियम बने हैं, उनमें सभी तरह के शब्द सम्मिलित नहीं होते। यहाँ इन नियमों का उल्लेख किया जा रहा है-

() अप्राणीवाचक पुल्लिंग हिंदी शब्द और नियम इस प्रकार हैं :-

अप्राणिवाचक पुंलिंग हिन्दी शब्द

(i) शरीर के अवयवों के नाम पुंलिंग होते है। जैसे-
  • कान, मुँह, दाँत, ओठ, पाँव, हाथ, गाल, मस्तक, तालु, बाल, अँगूठा, मुक्का, नाख़ून, नथना, गट्टा इत्यादि।
  • अपवाद- कोहनी, कलाई, नाक, आँख, जीभ, ठोड़ी, खाल, बाँह, नस, हड्डी, इन्द्रिय, काँख इत्यादि।
(ii) रत्नों के नाम पुंलिंग होते है। जैसे
  • मोती, माणिक, पत्रा, हीरा, जवाहर, मूँगा, नीलम, पुखराज, लाल इत्यादि।
  • अपवाद- मणि, चुत्री, लाड़ली इत्यादि।
(iii) धातुओं के नाम पुंलिंग होते है। जैसे-
  • ताँबा, लोहा, सोना, सीसा, काँसा, राँगा, पीतल, रूपा, टीन इत्यादि।
  • अपवाद- चाँदी।
(iv) अनाज के नाम पुंलिंग होते है। जैसे-
  • जौ, गेहूँ, चावल, बाजरा, चना, मटर, तिल इत्यादि।
  • अपवाद- मकई, जुआर, मूँग, खेसारी इत्यादि।
(v) पेड़ों के नाम पुंलिंग होते है। जैसे-
  • पीपल, बड़, देवदारु, चीड़, आम, शीशम, सागौन, कटहल, अमरूद, शरीफा, नीबू, अशोक तमाल, सेब, अखरोट इत्यादि।
  • अपवाद-लीची, नाशपाती, नारंगी, खिरनी इत्यादि।
(vi) द्रव्य पदार्थों के नाम पुंलिंग होते हैं। जैसे-
  • पानी, घी, तेल, अर्क, शर्बत, इत्र, सिरका, आसव, काढ़ा, रायता इत्यादि।
  • अपवाद- चाय, स्याही, शराब।
(vii) भौगोलिक जल और स्थल आदि अंशों के नाम प्रायः पुंलिंग होते है। जैसे-
  • देश, नगर, रेगिस्तान, द्वीप, पर्वत, समुद्र, सरोवर, पाताल, वायुमण्डल, नभोमण्डल, प्रान्त इत्यादि
  • अपवाद- पृथ्वी, झील, घाटी इत्यादि।
(ख) अप्राणिवाचक स्त्रीलिंग हिन्दी-शब्द
(i) नदियों के नाम स्त्रीलिंग होते है। जैसे-
  • गंगा, यमुना, महानदी, गोदावरी, सतलज, रावी, व्यास, झेलम इत्यादि।
  • अपवाद- शोण, सिन्धु, ब्रह्यपुत्र नद है, अतः पुंलिंग है।
(ii) नक्षत्रों के नाम स्त्रीलिंग होते है। जैसे-
  • भरणी, अश्र्विनी, रोहिणी इत्यादि।
  • अपवाद- अभिजित, पुष्य आदि।
(iii) बनिये की दुकान की चीजें स्त्रीलिंग है। जैसे- 
  • लौंग, इलायची, मिर्च, दालचीनी, चिरौंजी, हल्दी, जावित्री, सुपारी, हींग इत्यादि।
  • अपवाद- धनिया, जीरा, गर्म मसाला, नमक, तेजपत्ता, केसर, कपूर इत्यादि।
(iv) खाने-पीने की चीजें स्त्रीलिंग है। जैसे-
  • कचौड़ी, पूरी, खीर, दाल, पकौड़ी, रोटी, चपाती, तरकारी, सब्जी, खिचड़ी इत्यादि।
  • अपवाद- पराठा, हलुआ, भात, दही, रायता इत्यादि।
विशेष तथा ध्यान देने योग्य बातें
  • विशेषण अपने विशेष्य के लिंग के अनुसार होता है। जैसे- ‘ल’ तद्धित-प्रत्यय संज्ञा-शब्दों में लगने पर उन्हें स्त्रीलिंग कर देता है,
  • मगर विशेषण में- ‘घाव+ल=घायल’- अपने विशेष्य के अनुसार होगा, अर्थात विशेष्य स्त्रीलिंग हुआ तो ‘घायल’ स्त्रीलिंग और पुंलिंग हुआ तो पुंलिंग।

अप्राणीवाचक स्त्रीलिंग हिंदी शब्द और नियम इस प्रकार हैं :-

इसमें नदियों के नाम स्त्रीलिंग होते हैं ।जैसे :

  • गंगा , जमुना , सरस्वती , ब्रह्मपुत्र , सतलुज , गोदावरी , रावी , झेलम , व्यास आदि ।

इसमें नक्षत्रों के नाम स्त्रीलिंग होते हैं ।जैसे :-

  • भरणी , अश्विनी , रोहिणी आदि ।

दुकानदार की चीजें स्त्रीलिंग होती हैं ।जैसे :-

  • लौंग , इलायची , मिर्च , दालचीनी , हल्दी , सुपारी , हींग आदि ।

इसमें खाने पिने की चीजें स्त्रीलिंग होती हैं ।जैसे :-

  • कचौड़ी , खीर, पूरी , दाल , पकौड़ी , रोटी , चपाती , तरकारी , खिचड़ी आदि
प्रत्ययों के आधार पर तद्भव हिन्दी शब्दों का लिंग-निर्णय

प्रत्ययों के आधार पर तद्भव हिंदी शब्दों का लिंग निर्णय चार भागों में बाँटा गया है ।

  • स्त्रीलिंग कृदंत प्रत्यय
  • पुल्लिंग कृदंत प्रत्यय
  •  स्त्रीलिंग तद्धित प्रत्यय
  •  पुल्लिंग तद्धित प्रत्यय
हिन्दी के कृदन्त और तद्धित-प्रत्ययों में स्त्रीलिंग-पुंलिंग बनानेवाले अलग-अलग प्रत्यय इस प्रकार है-
स्त्रीलिंग कृदन्त-प्रत्यय-
  • अ, अन्त,आई, आन, आवट, आस, आहट, ई, औती, आवनी, क, की, त, ती, नी इत्यादि।
हिन्दी कृदन्त-प्रत्यय जिन धातु-शब्दों में लगे होते है, वे स्त्रीलिंग होते है। जैसे-
  • लूट, चमक, देन, भिड़न्त, लड़ाई, लिखावट, प्यास, घबराहट, हँसी, मनौती, छावनी, बैठक, फुटकी, बचत, गिनती, करनी, भरनी।

विशेष

 इन स्त्रीलिंग कृदन्त-प्रत्ययों में अ, क, और न प्रत्यय कहीं-कहीं पुंलिंग में भी आते है और कभी-कभी इनसे बने
शब्द उभयलिंग भी होते है। जैसे- ‘सीवन’ (‘न’-प्रत्ययान्त) क्षेत्रभेद से दोनों लिंगों में चलता है। शोष सभी प्रत्यय स्त्रीलिंग है।
पुंलिंग कृदन्त-प्रत्यय-
  • अक्कड़, आ, आऊ, आक, आकू, आप, आपा, आव, आवना, आवा, इयल, इया, ऊ, एरा, ऐया, ऐत, औता, औना, औवल, क, का, न, वाला, वैया, सार, हा इत्यादि

हिन्दी कृदन्त-प्रत्यय जिन धातु-शब्दों में लगे है, वे पुंलिंग होते है। जैसे-

  • पियक्कड़, घेरा, तैराक, लड़ाकू, मिलाप, पुजापा, घुमाव, छलावा, लुटेरा, कटैया, लड़ैत, समझौता, खिलौना, बुझौवल, घालक, छिलका, खान-पान, खानेवाला, गवैया।
विशेष
क और न कृदन्त-प्रत्यय उभयलिंग हैं। इन दो प्रत्ययों और स्त्रीलिंग प्रत्ययों को छोड़ शेष सभी पुंलिंग हैं। (ii)’सार’ उर्दू का कृदन्त- प्रत्यय है, जो हिन्दी में फारसी से आया है मगर काफी प्रयुक्त है।
स्त्रीलिंग तद्धित-प्रत्यय-
  • आई, आवट, आस, आहट, इन, एली, औड़ी, औटी, औती, की, टी, ड़ी, त, ती, नी, री, ल, ली इत्यादि। हिन्दी तद्धित-प्रत्यय जिन शब्दों में लगे होते है, वे स्त्रीलिंग होते है। जैसे-
  • भलाई, जमावट, हथेली, टिकली, चमड़ी।
पुंलिंग तद्धित-प्रत्यय-
  • आ, आऊ, आका, आटा, आना, आर, इयल, आल, आड़ी, आरा, आलू, आसा, ईला, उआ, ऊ,
  • एरा, एड़ी, ऐत, एला, ऐला, ओटा, ओट, औड़ा, ओला, का, जा, टा, ड़ा, ता, पना, पन, पा,
  • ला, वन्त, वान, वाला, वाँ, वा, सरा, सों, हर, हरा, हा, हारा, इत्यादि।

हिन्दी तद्धित प्रत्यय जिन शब्दों में लगे होते है वे शब्द पुंलिंग होते है। जैसे-

  • धमाका, खर्राटा, पैताना, भिखारी, हत्यारा, मुँहासा, मछुआ, सँपेरा, डकैत, अधेला, चमोटा,
  • लँगोटा, हथौड़ा, चुपका, दुखड़ा, रायता, कालापन, बुढ़ापा, गाड़ीवान, टोपीवाला, छठा, दूसरा,
  • खण्डहर, पीहर, इकहरा, चुड़िहारा।

विशेष-

इया, ई, एर, एल, क तद्धित प्रत्यय उभयलिंग हैं। जैसे

प्रत्ययपदतद्धित पदलिंग
डोरडोरीस्त्रीलिंग
इयामुखमुखियापुंलिंग
इयाखाटखटियास्त्रीलिंग-(ऊनवाचक)
एरमूँड़मुँड़ेरस्त्रीलिंग
एरअंधअँधेरपुंलिंग
एलफूलफुलेलपुंलिंग
एलनाकनकेलस्त्रीलिंग
पंचपंचकपुंलिंग
ठण्डठण्डकस्त्रीलिंग

‘क’ तद्धित प्रत्यय स्त्रीलिंग है, किन्तु संख्यावाचक के आगे लगने पर उसे पुंलिंग कर देता है। जैसे- 
  • पंचक, चौक(पुंलिंग)
 ठण्डक, धमक (स्त्रीलिंग)। ‘आन’ प्रत्यय भाववाचक होने पर शब्द को स्त्रीलिंग करता है, किन्तु विशेषण में विशेष्य के अनुसार।जैसे-
  • लम्बा+आन=लम्बान (स्त्रीलिंग)।
अधिकतर भाववाचक और उनवाचक प्रत्यय स्त्रीलिंग होते है।

उर्दू शब्दों का लिंग-निर्णय

उर्दू  भाषा से — हिन्दी ,अरबी  तथा फारसी के बहुत से शब्द आये है, जिनका  प्रयोग हम अपने व्यवहार  प्रतिदिन करते है।

उर्दू शब्दों का लिंग निर्णय :-उर्दू शब्दों के लिंग निर्णय को दो भागों में बाँटा गया है ।

  •  पुल्लिंग उर्दू शब्द
  •  स्त्रीलिंग उर्दू शब्द
इन शब्दों का लिंगभेद निम्नलिखित नियमों के अनुसार किया जाता है-
पुंलिंग उर्दू शब्द
आकारान्त शब्द पुंलिंग है ; जैसे-
  • परदा, गुस्सा, किस्सा, रास्ता, चश्मा, तमगा।
मूलतः ये शब्द विसर्गात्मक हकारान्त उच्चारण के हैं। जैसे
  • परद:, तम्ग: । किन्तु हिन्दी में ये ‘परदा’, ‘तमगा’ के रूप में आकारान्त ही उच्चरित होते है।
  • अपवाद– दफा
जिनके अन्त में ‘आब’ हो, वे पुंलिंग है। जैसे-
  • गुलाब, जुलाब, हिसाब,  जवाब, कबाब।
  • अपवाद- शराब, मिहराब, किताब, ताब, किमखाब इत्यादि।
 जिनके अन्त में ‘आर’ या ‘आन’ लगा हो। जैसे-
  • बाजार, इकरार, इश्तिहार, इनकार, अहसान, मकान, सामान, इम्तहान इत्यादि।
  • अपवाद– दूकान, सरकार, तकरार इत्यादि।

स्त्रीलिंग उर्दू शब्द

 ईकारान्त भाववाचक संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती है। जैसे-
  • गरीबी, गरमी, सरदी, बीमारी, चालाकी, तैयारी, नवाबी इत्यादि।
 शकारान्त संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती है। जैसे-
  • नालिश, कोशिश, लाश, तलाश, वारिश, मालिश इत्यादि।
  • अपवाद– ताश, होश आदि।

तकारन्त संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती है। जैसे-

  • दौलत, कसरत, अदालत, इजाजत, कीमत, मुलाकात इत्यादि।
  • अपवाद– शरबत, दस्तखत, बन्दोबस्त, वक्त, तख्त, दरख्त इत्यादि।
आकारान्त संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती है। जैसे-
  • हवा, दवा, सजा, दुनिया, दगा इत्यादि।
  • अपवाद– मजा इत्यादि।
हकारान्त संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती हैं। जैसे-
  • सुबह, तरह, राह, आह, सलाह, सुलह इत्यादि।
तफईल’ के वजन की संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती है। जैसे-
  • तसवीर, तामील, जागीर, तहसील इत्यादि

अंग्रेजी शब्दों का लिंग निर्णय :-

अंग्रेजी शब्दों का लिंग निर्णय दो भागों में बंटा होता है ।

  • अंग्रेजी पुल्लिंग शब्द
  •  अंग्रेजी स्त्रीलिंग शब्द

विदेशी शब्दों में उर्दू (फारसी और अरबी)- शब्दों के बाद अँगरेजी शब्दों का प्रयोग भी हिन्दी में कम नहीं होता। जहाँ तक अँगरेजी शब्दों के लिंग-निर्णय का पश्र है, मेरी समझ से इसमें कोई विशेष कठिनाई नहीं है; क्योंकि हिन्दी में अधिकतर अँगरेजी शब्दों का प्रयोग पुंलिंग में होता है।

इस निष्कर्ष की पुष्टि नीचे दी गयी शब्दसूची से हो जाती है। अतः इन शब्दों के तथाकथित ‘मनमाने प्रयोग’ बहुत अधिक नहीं हुए है। मेरा मत है कि इन शब्दों के लिंगनिर्णय में रूप के आधार पर अकारान्त, आकारान्त, और ओकारान्त को पुंलिंग और ईकारान्त को स्त्रीलिंग समझना चाहिए।

फिर भी, इसके कुछ अपवाद तो हैं ही। अँगरेजी के ‘पुलिस’ (Police) शब्द के स्त्रीलिंग होने पर प्रायः आपत्ति की जाती है। मेरा विचार है कि यह शब्द न तो पुंलिंग है, न स्त्रीलिंग। सच तो यह है कि ‘फ्रेण्ड’ (Friend) की तरह उभयलिंग है। अब तो स्त्री भी ‘पुलिस’ होने लगी है। ऐसी अवस्था में जहाँ पुरुष पुलिस का काम करता हो, वहाँ ‘पुलिस’ पुंलिंग में और जहाँ स्त्री पुलिस का काम करेगी, वहाँ उसका व्यवहार स्त्रीलिंग में होना चाहिए। हिन्दी में ऐसे शब्दों की कमी नहीं है, जिनका प्रयोग दोनों लिंगों में अर्थभेद के कारण होता है। जैसे- टीका, हार, पीठ इत्यादि। ऐसे शब्दों की सूची आगे दी गयी है।

लिंगनिर्णय के साथ हिन्दी में प्रयुक्त होनेवाले अँगरेजी शब्दों की सूची निम्नलिखित है

अँगरेजी के पुंलिंग शब्द
अकारान्त-
अँगरेजी के पुंलिंग शब्द
अकारान्त---------------------- ऑर्डर, आयल, ऑपरेशन, इंजिन, इंजीनियर, इंजेक्शन, एडमिशन, एक्सप्रेस, एक्सरे, ओवरटाइम, क्लास, कमीशन, कोट, कोर्ट, कैलेण्डर, कॉंलेज, कैरेम, कॉलर, कॉलबेल, काउण्टर, कारपोरेशन, कार्बन, कण्टर, केस, क्लिनिक, क्लिप, कार्ड, क्रिकेट, गैस, गजट, ग्लास, चेन, चॉकलेट, चार्टर, टॉर्च, टायर, ट्यूब, टाउनहाल, टेलिफोन, टाइम, टाइमटेबुल, टी-कप, टेलिग्राम, ट्रैक्टर, टेण्डर, टैक्स, टूथपाउडर, टिकट, डिवीजन, डान्स, ड्राइंग-रूम, नोट, नम्बर, नेकलेस, थर्मस, पार्क, पोस्ट, पोस्टर, पेन, पासपोर्ट, पेटीकोट, पाउडर, पेंशन, प्रोमोशन, प्रोविडेण्ट फण्ड,
पेपर, प्रेस, प्लास्टर, प्लग, प्लेट, पार्सल, प्लैटफार्म, फुटपाथ, फुटबॉल, फार्म, फ्रॉक, फर्म, फैन, फ्रेम, फुलपैण्ट, फ्लोर, फैशन, बोर्ड, बैडमिण्टन, बॉर्डर, बाथरूम, बुशशर्ट, बॉक्स, बिल, बोनस, बजट, बॉण्ड, बोल्डर, ब्रश, ब्रेक, बैंक, बल्ब, बम, मैच, मेल, मीटर, मनिआर्डर, रोड, रॉकेट, रबर, रूल, राशन, रिवेट, रिकार्ड, रिबन, लैम्प, लेजर, लाइसेन्स, वाउचर, वार्ड, स्टोर, स्टेशनर, स्कूल, स्टोव, स्टेज, स्लीपर, स्टेल, स्विच, सिगनल, सैलून, हॉल, हॉंस्पिटल, हेयर, हैण्डिल, लाइट, लेक्चर, लेटर।

अँगरेजी के स्त्रीलिंग शब्द

ईकारान्त-
  • एसेम्बली, कम्पनी, केतली, कॉपी, गैलरी, डायरी, डिग्री, टाई, ट्रेजेडी, ट्रेजरी, म्युनिसिपैलिटी,
  • युनिवर्सिटी, पार्टी, लैबोरेटरी।

लिंग-निर्णय/ निर्धारण

लिंग-निर्णय करने में कठिनाई और उसकी समस्या का समाधान निम्नलिखित नियमों द्वारा किया जा सकता है—

1). संज्ञा शब्दों में——हिंदी में बहुत से प्राणिवाचक संज्ञा शब्दों का लिंग निर्धारण प्राय: उनके लिंग नर या मा दा के आधार पर कर लिया जाता है।

2).ऐसे प्राणि जिनमें लिंग के आधार पर अंतर करता सभंव नहीं होता ‘नर या मादा’शब्द जोडकर अंतर किया जाता है।

  • जैसे –नर भालू/ मादा भालू, नर मक्खी/ मादा मक्खी आदि।

3).हिंदी में संज्ञा शब्दों का प्रयोग दोनों लिंगों में किया जाता है।

  •  जैसे — खिलाडी,मैनेजर, इंजीनियर, चपरासी,वकील,मरीज,मंत्री,डॉकटर आदि। ऐसे शब्दों को उभयलिंगी कहा जाता है।

4). निर्जीव वस्तुओं का लिंग—निर्धारण प्रयोग के आधार पर किया जाता है।

  • जैसे—मकान,खिलाडी ,पंखा,पानी,दुध सोफा,मेंज़,कुरर्सी पलंग,घडी,चूल्हा,झाडू, बिस्तर,चादर,आदि

5).हिंदी में लिंग के निर्णय का आधार संस्कृत के नियम ही हैं। संस्कृत में हिंदी से अलग एक तीसरा लिंग भी है जिसे नपुंसकलिंग कहते हैं। नपुंसकलिंग में अप्राणीवाचक संज्ञाओं को रखा जाता है।

6).हिंदी में अप्राणीवाचक संज्ञाओं के लिंग निर्णय में सबसे अधिक कठिनाई हिंदी न जानने वालों को होती है।वस्तुत: भाषा का प्रत्येक शब्द के लिंग का निर्धारण पहले से ही मातृभाषा— भाषी दवारा किया जाता है। अत: मातृभाषा सीखने के दौरान बच्चा सभी संज्ञा शब्दों का लिंग निर्धारण अपने परिवेश से सीख लेता है।

7).समस्या उन लोगों के साथ आती है। जो उस भाषा को द्वितीय भाषा या विदेशी भाषा के रूप में सीखते है।

8). शब्द के रूप को देखकर शब्दों का लिंग तय किया जाता है।

  • उदहारण के लिए—’माला’ और ताला’दोनो अकारांत सज्ञांएं है।

अत: इन दोनो शब्दों में आ के आधार पर इनका लिंग तय नहीं किया जा सकता क्योकि हिंदी में “माला स्त्रीलिंग और ताला पुलिंग” शब्द है। अत: ऐसे शब्दों का लिंग तय करना असंभव है। इसमें छात्रों विशेषकर अन्य भाषा भाषी छात्रों को को लिंग निर्धारण वाक्य प्रयोग द्वारा कराना जाना चाहिए तथा नया संज्ञा शब्द सीखाते समय ही उसका लिंग भी सिखाया जाना चाहिए

जैसे

  • पानी उबल गया चाय उबल गई
  • मकान बन गया झोनडी टूट गई
  • खाना बन गया मिठाई बन गई
  • दरवाज़ा खुल गया खिडकी खुल गई

जिनकी मातृभाषा हिंदी होती है उन्हें सहज व्यवहार के कारण लिंग निर्णय में परेशानी नहीं होती। लेकिन इनमें भी एक समस्या है की- कुछ पुल्लिंग शब्दों के पर्यायवाची स्त्रीलिंग हैं और कुछ स्त्रीलिंग के पुल्लिंग। जैसे :-

“पुस्तक को स्त्रीलिंग कहते हैं और ग्रन्थ को पुल्लिंग।”

लिंग-निर्णय के सामान्य नियम

जिन शब्दों के अंत में त्व, ना, आ, आटा, आव, आवा, औरा, पन इत्यादि (कृदंत-तद्धित) प्रत्यय लगते हों, वे पुंलिंग होते है

-प्रत्यय पुंलिंग शब्द

प्रत्ययपुंलिंग शब्द
मंदा,चचंला,प्यास, रास, फेरा, घेरा, सहरा
आटाफर्राटा,सन्नाटा, खर्राटा
आपा पुजापा, बुढ़ापा,,सियापा
आव जमाव, घुमाव, फैलाव, बचाव, बहाव
आवाबुलावा, चढ़ावा, दिखावा, भुलावा, पहनावा
औड़ा भगौडा,हथौड़ा, पकौड़ा,
त्रचित्र, मित्र,सूत्र,इत्र,
पन बचपन, पागलपन, बड़प्पन छुटपन,
त्व नारीत्व,पुरूषत्व, महत्व,देवत्व
ना
लिखना, चलना,कहना, सुनना, दिखाना
र्य शौर्य, वीर्य, माधुर्य

जिन शब्दों के अंत में आई, आवट, आस, आहट, इया, ई, त, नी, री, ली इत्यादि प्रत्यय लगते हों, वे स्त्रीलिंग होते हैं। जैसे-
प्रत्यय स्त्रीलिंग शब्द

प्रत्ययस्त्रीलिंग शब्द
आईमहँगाई, भलाई, बुराई, ढिलाई, चिकनाई, सिलाई, धुनाई, रुलाई
आवटरुकावट, मिलावट, गिरावट
आस प्यास (पिआस), मिठास
आहट घबराहट, बुलाहट,झंझनाहट,छटपटाहट,सरसराहट
हँसी, गरीबी, अमीरी, गुलामी, रस्सी, टोपी, गोटी, जूती
नी घिरनी, चलनी, चटनी, खैनी
इयाडिबिया, टिकिया
रंगत, चाहत, हजामत
रीकोठरी, गठरी, छतरी
ली टिकली, डफली

संस्कृत (तत्सम) के अकारांत शब्द पुलिंग और आकारांत स्त्रीलिंग होते हैं।
जैसे-
(पुलिंग), शब्द(स्त्रीलिंग) शब्द
जल, स्वर्ण, लाभ, स्तंभ (पुलिंग),
भिक्षा, शिक्षा, निन्द्रा, संध्या, परीक्षा, लज्जा (स्त्रीलिंग)

तद्धव (हिंदी) के लिंग प्रायः तत्सम (संस्कृत) के लिंग के अनुसार होते हैं। जैसे-

अकारांत (तत्सम )लिंगहिंदी तद्धवअकारांत (तत्समलिंगहिंदी तद्धव
कर्पट
पुलिंग कपड़ाभिक्षास्त्रीलिंगभीख
पर्यकपुलिंगपलंगशय्यास्त्रीलिंग सेज
चत्वर पुलिंगचबूतरा निन्द्रास्त्रीलिंग नींद
कटाहपुलिंगकड़ाह नासिकास्त्रीलिंग नाक
स्वर्णपुलिंग सोनापरीक्षा स्त्रीलिंग परख
स्नानपुलिंगनहानवंध्या स्त्रीलिंगबाँझ
स्तंभ
पुलिंगखंभा, खंभ संध्यास्त्रीलिंग साँझ
जीव
पुलिंगजीहरिद्रा स्त्रीलिंगहरदी
आम्रपुलिंगआम
शिक्षा स्त्रीलिंग सीख
पौत्र पुलिंगपोता लौहस्त्रीलिंगलोहा

प्रयोग के आधार पर

प्रयोग के आधार पर लिंग निर्णय के लिए संज्ञा शब्द के साथ प्रयुक्त क्रिया ,कारक चिह्न,एवंम क्रिया को आधार माना गया है।

1). अच्छा लडका—अच्छी लडकी
– लडका (पुल्लिंग) लडकी (स्त्रीलिंग)

2). राम की पुस्तक—राम का चाकू
– पुस्तक (स्त्रीलिंग) चाकू (पुल्लिंग)

3). राम ने रोटी खाई-
रोटी (स्त्रीलिंग)  क्रिया( स्त्रीलिंग)

4).राम ने आम खाया-
आम (पुल्लिंग़) क्रिया( पुल्लिंग)

पुलिंग तथा  स्त्रीलिंग शब्दों का स्वर और व्यजंन वर्णों में वर्गीकरण:–

पुलिंग स्वर एवम व्यजंन शब्द

अ- अक्षर के रूप में शब्द

  •  अक्षर, अनुच्छेद, अखरोट असर अरमान, अवयव,अवशेष ,अवसर,अनमोल , अनवर अपसरा, अपग्रह, अपमान, अनुदान, अनबन, अवरोध,अनार, अदरख,  अचरज,अपराध, अनाज, अनुसार, अनुसरण, अबरब , अबीर, अन्वय, अमृत,  अवधान,अपकार, अपरिग्रह, अपहरण, अनुदान, अनुमोदन, अनुसन्धान, अपयश, अक्षत, अणु, अकाल, ।
आ- अक्षर के रूप में  शब्द
  • आरोग्य, आलस्य, आचार, आईना, आचरण, आखेट, आभार, आलू, आवेश, आविर्भाव, आश्रम, आश्र्वासन, आसन, आषाढ़, आस्वादन, आहार, आसव, आशीर्वाद, आकाश, आयोग, आटा, आमंत्रण, आक्रमण, आरोप, आयात, आयोजन, आरोपण, आलोक, आवागमन, आविष्कार।
अं, अँ, आँ- अक्षर के रूप में शब्द
  • अंधड़, अंगूर, अंक, अंबार, अंकुश, अंगार, अंतरिक्ष, अंतर्धान, अंतस्तल, अंबुज, अंश, अंजन, अंचल, अंकन, अंगुल, अंकगणित, अंतःपुर, अंतःकरण, अँधेरा, अंधेर, अंबर, अंशु, आँसू।
ओ, औ-अक्षर के रूप में शब्द
  • ओठ, ओल, ओला, औजार,  औसत।
इ, ई-अक्षर के रूप में शब्द
  • इजलास, इन्द्रासन, इकतारा, इलाका, इजहार, इनाम, इलाज, इस्तीफा, इस्पात, इस्तेमाल, इन्तजार, इन्साफ, इलजाम, इत्र, ईंधन।
उ, ऊ-अक्षर के रूप में शब्द
  • उद्धार, उतार, उपवास, उफान, उबटन, उबाल, उलटफेर, उपादान, उपकरण, उत्पादन, उत्कर्ष, उच्छेदन,उत्तरदायित्व, उत्तरीय, उत्ताप, उत्साह, उत्सर्ग, उदय, उद्गार, उद्घाटन, उद्धरण, उद्यम, उन्माद, उन्मूलन, उपकार, उपक्रम, उपग्रह, उपचार, उपनयन, उपसर्ग, उपहास, उपाख्यान, उपालंभ, उल्लंघन, उल्लास, उल्लू, उल्लेख, ऊख, ऊन, ऊखल, ऊधम।
व्यंजन वर्णों का मात्रा के साथ  शब्दों के रूप में प्रयोग

क-अक्षर के रूप में शब्द

  • कण्ठ, कपूर, कर्म, कम्बल, कलंक, कपाट, कछार, कटहल, कफन, कटोरा, कड़ाह, कलह, कक्ष, कच्छा, कछुआ, कटिबन्ध, कदम्ब, कनस्तर, कफ, कबाब, कब्ज, करकट, करतल, कर्णफूल, करार, करेला, कलाप, कलेवर, कल्प, कल्याण, कल्लोल, कवच।
का-अक्षर के रूप में शब्द
  • काग, काजल, काठ, कार्तिक, काँच (शीशा), कानन, कार्य, कायाकल्प।
कि, की- अक्षर के रूप में शब्द
  • कित्रर, किमाम, किसलय, कीर्तन, कीचड़।
कु, कू- अक्षर के रूप में शब्द
  • कुँआ, कुटीर, कुतूहल, कुमुद, कुल, कुहासा, कुशल, कुष्ट, कूड़ा।
के, को, कौ-अक्षर के रूप में शब्द
  • केवड़ा, केंकड़ा, केराव, केशर, केश, कोटर, कोल्हू, कोढ़, कोदो, कीप, कोष(श), कोहनूर, कोष्ठ, कोट, कौतूहल, कौर, कौआ,कौशल।
व्यंजन वर्णों का बिना  मात्रा  शब्दों के रूप में प्रयोग
ख- अक्षर के रूप में शब्द
  • खँडहर, खजूर, खटका, खटमल, खपड़ा, खरगोश, खरबूजा, खराद (यन्त्र), खर्राटा, खलिहान, खाँचा, खाका, खान(पठान), खान-पान, खार, खिंचाव, खीर-मोहन, खीरा, खुमार, खुदरा, खुर, खुलासा, खूँट(छोर), खूँटा, खेमा, खेल, खेलवाड़, खोंचा, खोआ।
ग- अक्षर के रूप में शब्द
  • गंजा, गन्धक, गन्धराज, गगन, गज, गजट, गजब, गठबन्धन, गढ़, गदर, गद्य, गबन, गमन, गरुड़,
  • गर्जन, गर्व, गर्भाशय, गलसुआ, गलियारा, गलीचा, गश, गाँजा, गार्हस्थ्य, गिरजा, गिरगिट, गड्ढा,
  • गुणगान, गोदाम, गुनाह, गुंजार, गुलाब, गुलाम, गिला, गूदा, गोंद, गेंद, गोत्र, गोधन, गोलोक, गौरव,
  • ग्रह, ग्रीष्म, ग्रहण, ग्रास, गिलाफ, गिद्ध।
घ-  अक्षर के रूप में शब्द
  • घट, घटाटोप, घटाव, घड़ा, घड़ियाल, घन, घराना, घपला, घर्षण, घाघरा, घाघ, घाटा, घात (चोट),
  • घाव, घी, घुँघरू, घुटना, घुन, घुमाव, घूँघट, घूँट, घृत, घेघा, घोंघा, घोटाला, घोल।
च-अक्षर के रूप में शब्द
  • चंगुल, चण्डमुण्ड, चन्दन, चन्द्रमा, चन्दनहार, चन्द्रबिन्दु, चन्द्रहार, चन्द्रोदय, चकमा, चकला, चकवा
  • चकोर, चक्कर, चक्र, चक्रव्यूह, चटावन, चढाव, चढ़ावा, चप्पल, चमगादड़, चमत्कार, चमर, चम्मच,
  • चम्पक, चयन, चर्खा, चरागाह, चर्स, चलचित्र, चलन, चालान, चषक, चाँटा, चाँद, चाक, चातक, चातुर्य,
  • चाप (धनुष), चाबुक, चाम, चरण, चाकू, चाव, चिन्तन, चित्रकूट, चित्रपट, चिरकुट, चिराग, चीता
  • चीत्कार, चीर, चीलर, चुम्बक, चुम्बन, चुनाव, चुल्लू, चैन, चोकर, चौक, चौपाल।
छ-अक्षर के रूप में शब्द
  • छन्द, छछूँदर, छज्जा, छटपट, छत्ता, छत्र, छप्पर, छलछन्द, छाजन, छार, छिद्र, छिपाव, छींटा,
  • छेद, छोआ, छोर।
ज- अक्षर के रूप में शब्द
  • जख्म, जमघट, जहाज, जंजाल, जन्तु, जड़ाव, जत्था, जनपद, जनवासा, जप, जमाव, जलधर,
  • जलपथ, जलपान, जाँता, जाकड़, जाम, जाप, जासूस, जिक्र, जिगर, जिन, जिहाद, जी, जीरा,
  • जीव, ज्वारभाटा, जुआ, जुकाम, जुर्म, जुलाब, जुल्म, जुलूस, जूड़ा, जेठ, जेल,जौ, जैतून, जोश, ज्वर।
झ- अक्षर के रूप में शब्द
  • झंझा, झंझावात, झकझोर, झकोर, झाड़ (झाड़ी), झंखाड़, झाल (बाजा), झींगुर, झुण्ड, झुकाव,
  • झुरमुट, झूमर।
ट-अक्षर के रूप में शब्द
  • टण्टा, टमटम, टकुआ, टाट, टापू, टिकट, टिकाव, टिफिन, टीन, टमाटर, टैक्स।
ठ-अक्षर के रूप में शब्द
  • डंक, डंड, डण्डा, डब्बा, डमरू, डर, डीह, डोल, डेरा।
ढ- अक्षर के रूप में शब्द
  • ढक्कन, ढेला, ढाँचा, ढोंग, ढाढस, ढंग, ढोल, ढकना, ढिंढोरा, ढोंग, ढेर।
त- अक्षर के रूप में शब्द
  • तम्बाकू, तम्बूरा, तकिया, तन, तनाव, तप, तबला, तमंचा, तरकश, तरबूज, तराजू, तल, ताण्डव,
  • ताज, तार, ताला, तालाब, ताश, त्रिफला, तिल, तिलक, तिलकुट, तीतर, तीर, तीर्थ, तेजाब, तेल,
  • तेवर, तोड़-जोड़, तोड़-फोड़, तौल, तौलिया, त्रास, तख्ता, तंत्र।
थ- अक्षर के रूप में शब्द
  • थन, थप्पड़, थल, थूक, थोक, थाना, थैला।
द- अक्षर के रूप में शब्द
  • दंड, दबाव, दर्जा, दर्शन, दरबार, दहेज, दाँत, दाग, दाम, दही, दिन, दिमाग, दिल, दीपक, दीया,
  • दुःख, दुशाला, दूध, दृश्य, देहात, देश, द्वार, द्वीप, दर्द, दुखड़ा, दुपट्टा, दंश, दफा, दालान, दलाल,
  • दानव, दाय, दास, दिखाया, दिमाग, दिल, दीपक, दुलार, दुशाला, दूध, दृश्य, दैत्य, दोष, दौरान, द्वार
  •  द्वीप, द्वेष, दफ्तर।
ध-अक्षर के रूप में शब्द
  • धन्धा, धक्का, धड़, धन, धनुष, धर्म, धान, धाम, धैर्य, ध्यान, धनिया, धुआँ।
न- अक्षर के रूप में शब्द
  • नकद, नक्षत्र, नग, ननिहाल, नभ, नगर, नमक, नसीब, नरक, नल, नाख़ून, निबाह,नियम, निर्झर, निगम
  • निवास, निवेदन, निशान, निष्कर्ष, नीबू, नीर, नीलम, नीलाम, नृत्य, नेत्र, नैवेद्य, न्याय, नमस्कार, नक्शा
  • नगीना, नशा, न्योता।
प-अक्षर के रूप में शब्द
  • पंक्षी, पकवान, पक्ष, पक्षी, पत्र, पड़ोस, पतंग, पनघट, पतलून, पतन, पत्थर, पद, पदार्थ, पनीर, पपीहा
  • पर्दा, परमाणु, परलोक, पराग, परिचय, परिणाम, परिवर्तन, परिवार, पर्व, पल्लव, पहर, पहिया, पाखण्ड
  • पाचन, पाताल, पापड़, पाला, पिल्लू, पीताम्बर, पीपल, पुआल, पुराण, पुरस्कार, पुल, पुलक, पुस्तकालय
  • पूर्व, पोत, पोल, पोषण, पाजामा, प्याज, प्रकोप, प्रयोग, प्रतिफल, प्रतिबन्ध, प्रत्यय, प्रदेश, प्रभाव, प्रलय
  • प्रसार, प्रातः, प्रारम्भ, पैसा, प्राण, पेट, पौधा, प्यार, पहरा, पानी।
फ- अक्षर के रूप में शब्द
  • फर्क, फर्ज, फर्श, फल, फसाद, फाटक, फल, फूल, फेन, फेफड़ा, फेर, फेरा, फतिंगा।
ब- अक्षर के रूप में शब्द
  • बण्डल, बन्दरगाह, बखान, बबूल, बचपन, बचाव, बड़प्पन, बरतन, बरताव, बल,बलात्कार, बहाव
  • बहिष्कार, बाँध, बाँस, बाग, बाज, बाजा, बाजार, बादाम, बेलन, बेला, बेसन, बोझ, बोल, बैर, बगीचा
  • बादल, बुढ़ापा, बटन, बिल, बुखार, बीज, बिछावन, बेंत, बदला।
भ-अक्षर के रूप में शब्द
  • भण्डाफोड़, भँवर, भजन, भवन, भत्ता, भरण, भस्म, भाग्य, भाल, भाव, भाषण, भिनसार, भुजंग
  • भुलावा, भूकम्प, भेदभाव, भेड़िया, भोज, भोर, भरोसा।
म-अक्षर के रूप में शब्द
  • मंच, मंजन, मण्डन, मजा, मटर, मसूर, मतलब, मद्य, मच्छर, मनसूबा, मनोवेग, मरहम, मरोड़, मवेशी
  • मलय, मलाल, महुआ, माघ, माजरा, मिजाज, मील, मुकदमा, मुरब्बा, मुकुट, मूँगा, मृग, मेघ, मेवा,
  • मोक्ष, मोती, मोतीचूर, मोम, मोर, मोह, मौन, म्यान, मुरब्बा, मक्खन।
य-अक्षर के रूप में शब्द
  • यन्त्र, यति (संन्यासी), यम, यश, यातायात।
र-अक्षर के रूप में शब्द
  • रक्त, रबर, रमण, रहस्य, राग, रासो, रूपा, रेत, रोग, रोमांच, रिवाज, रूमाल ।
ल- अक्षर के रूप में शब्द
  • लंगर, लक्ष्य, लगान, लगाव, लटकन, लाघव, लालच, लिहाज, लेख, लेप, लोप, लोभ, लेनदेन।
व-अक्षर के रूप में शब्द
  • वजन, वज्र, वन, वनवास, वर, वसन्त, वार, विकल्प, विक्रय, विघटन, विमर्श, विलास, विष,
  • विवाद, विसर्जन, विस्फोट, विहार, वैष्णव, व्यंजन, व्यय, व्याख्यान, व्याज, व्यास, व्यूह।
श-अक्षर के रूप में शब्द
  • शंख, शक, शनि, शर, शव, शरबत, शहद, शाप, शिखर, शीर्ष, शील, शुक्र, शून्य, शोक, श्रम, श्र्वास।
स-अक्षर के रूप में शब्द
  • संकट, संकेत, संकोच, संखिया, संगठन, संगम, संचार, संयोग, सन्दूक, संन्यास, सम्पर्क, सम्बन्ध,
  • संविधान, सतू, सफर, समीर, सर, सरोवर, सहन, सहयोग, सहारा, साग, साधन, साया, सार, सिंगार,
  • सिन्दूर, सियार, सिर, सिल्क, सींग, सुमन, सुराग, सूअर, सूत, सूत्र, सूना, सूद, सूप, सेतु, सेब, सेवन,
  • सोच, सोन, सोना, सोफा, सोम, सोहर (गीत), सौभाग्य, सौरभ, स्तर, स्थल, स्पर्श, स्वरूप, स्वर्ग, सवर्ण, स्वाद।
ह- अक्षर के रूप में शब्द
  • हंस, हक, हमला, हरण, हरिण, हल, हवाला, हार (माला), हाल (समाचार, दशा), हास्य, हित,
  • हिल्लोल, हीरा, हेरफेर, हैजा, होंठ, होश, ह्रास।

पुल्लिंग शब्द और उनके वाक्य में प्रयोग

पुल्लिंग शब्दों का वाक्य में प्रयोग के लिए निम्नलिखित शब्दों का उपयोग किया गया है।

पुल्लिंग शब्दउनका वाक्य में प्रयोग
अपराध –
उनका अपराध क्षमा के योग्य है।
अकाल –
राजस्थान में भीषण अकाल पड़ा था।
आईना –
आईना टूट गया।
आयोजन – पूजा का आयोजन हो रहा है।f
अम्बार –
किताबों का अम्बार लगा हुआ है।
आँसू –मोहन के आँसू निकल पड़े।
इत्र –यह जैस्मिन का इत्र है।
ईंधन – ईंधन जला दिया गया।
कवच –यह सूअर की खाल का कवच है।
कीचड़ –कीचड़ सुख गया।
कुआँ –कुआँ गहरा है।
कुहासा – कुहासा छाया हुआ है।
कंबल – कंबल बहुत मोटा है।
कफन –कफन थोडा छोटा है।
गिरगिट –गिरगिट रंग बदल सकता है।
खलिहान-वह सोहन का खलिहान है।
घाव – घाव पक कर गहरा हो गया है।
गुनाह-उनका गुनाह क्या है ?
चाबुक –
तुम्हारा चाबुक गिर गया है।
चुनाव –
चुनाव आने वाला है।
जुलूस-जुलूस लंबा है।
छप्पर – वह लकड़ी का छप्पर है।
पतंग-पतंग उड़ रहा है।
जहाज – जहाज डूब गया है।
जख्म – जख्म हर हो गया है।
तीर-हाथ से तीर छूट गया।
जेल –यह मुम्बई का जेल है।
जौ – जौ का स्वाद अच्छा नहीं होता है।
टिकट –यह बस का टिकट है।
अम्बार-किताबों का अम्बार लगा हुआ है।
तकिया –
यह रश्मी का तकिया है।
तौलिया –
यह स० डी० ओ० का तौलिया है।
दंगा –
दंगा अच्छा नहीं होता है।
दाग –पान का दाग नहीं छूटता है।
नीड़ – मेरा तो नीड़ उजड़ गया है।
नकद –उसने खरीद के नकद पैसे दिए हैं।
पहिया –पहिया टूट चूका है।
नीलाम –जमीन को नीलाम होना ही है।
फर्ज – हमारे प्रति उनका फर्ज बहुत ही ऊँचा है।
भोर – भोर हो चूका है।
मोती –मोती चमकता रहता है ।
बोझ –उसके सिर पर बोझ रखा है।
मोम –मोम पिघल रहा है ।
रुमाल – रुमाल फटने वाला है
शोक – उन्हें गाने का शोक है ।
सींग –गाय के दो सींग होते हैं
हार – यह हार बहुत महँगा है ।
होश –उनके होश उड़ चुके हैं ।
पानी – पानी साफ है ।
दही – दही बहुत खट्टा होता है ।
बचपन – सभी का बचपन बहुत सुंदर होता है ।
घर –घर साफ बना है ।
उमंग – मन में उमंग बहुत अच्छी होती है ।
पर्वत –पर्वत बहुत ऊँचा है।
क्रोध –
क्रोध आदमी को पागल कर देता है ।
गीत –वह गीत अच्छा नहीं है ।
वृक्ष –वृक्ष सुख चूका है ।
प्राण –
उसके प्राण उड़ गये।
घी – घी महँगा है।
तीर –हाथ से अचानक तीर छुट गया।
आयोजन-पूजा का आयोजन हो रहा है।
सींग-गाय को दो सींग होता है।
पहिया-पहिया टूट गया।
बचपन-बचपन बड़ा सुंदर होता है।
पर्वत-पर्वत ऊँचा है।

स्त्रीलिंग शब्द (Feminine)

स्त्रीलिंग शब्दों का स्वर और व्यंजन वर्णों में प्रयोग

स्वर के साथ प्रयोग

अ-अक्षर के रूप में शब्द

  • अँगड़ाई, अँतड़ी, अकड़, अक्ल, अदालत, अनबन, अप्सरा, अफवाह, अपेक्षा, अपील, अहिंसा, अरहर, अवस्था।
आ- अक्षर के रूप में शब्द
  • आँच, आँत, आग, आजीविका, आज्ञा, आत्मा, आत्महत्या, आदत, आन, आपदा, आफत, आमद,
  • आय, आयु, आराधना,आवाज, आस्तीन, आह, आहट, आशिष, आँख।
इ, ई-अक्षर के रूप में शब्द
  • इंच, इन्द्रिय, इच्छा, इजाजत, इज्जत, इमारत, इला, ईट, ईद, ईख, ईर्ष्या।
उ, ऊ-अक्षर के रूप में शब्द
  • उड़ान, उथल-पुथल, उपासना, उपेक्षा, उमंग, उम्र, उर्दू (भाषा), उलझन, उषा, ऊब।
ए, ऐ-अक्षर के रूप में शब्द
  • एकता, ऐंठ, ऐंठन, ऐनक।
ओ, औ-अक्षर के रूप में शब्द
  • ओट, ओस, औलाद।

व्यंजन वर्णों  के साथ शब्द

क- अक्षर के रूप में शब्द
  • कक्षा, कटुता, कड़क, कतार, कथा, कदर, कन्या, कमर, कमाई, कमान, कमीज, करवट, करुणा,
  • कसक, कसम, कसरत, कपास, कसौटी, कस्तूरी, काँगरेस, काश्त, करतूत, किस्मत, किशमिश, क़िस्त
  • (ऋण चुकाने का भाग), कीमत, कील, कुंजी, कुटिया, कुशल(कुशलता), कुल्हाड़ी, कूक, कृपा, कैद,
  • कोख, कोयल, क्रिया, क्रीड़ा, क्षमा।
ख-अक्षर के रूप में शब्द
  • खटपट, खटास, खटिया, खड़क, खडांऊँ, खनक, खपत, खबर, खरीद, खींच, खरोंच, खाँड़, खाई,
  • खाज, खाट, खातिर, खाद, खाल, खान (खनि), खिजाँ, खिदमत, खोच, खीझ, खीर, खील, खुदाई,
  • खुरमा, खुशामद, खैरात, खोट, खोह।
ग- अक्षर के रूप में शब्द
  • गंगा, गन्ध, गजल, गटपट, गठिया, गड़बड़, गणना, गति, गदा, गनीमत, गफलत, गरज, गर्दन,
  • गरिमा, गर्द, गर्दिश, गाँठ, गाजर, गाज (बिजली), गागर, गाथा, गाद, गिटपिट, गिरफ्त, गिरह,
  • गिलहरी, गीता, गीतिका, गुंजाइश, गुड़िया, गुड्डी, गुफा, गुरुता, गेरू, गुलेल, गूज, गैल, गैस, गोट, गोद, गोपिका, गौ।
घ- अक्षर के रूप में शब्द
  • घटा, घटिका, घास, घिन, घुड़दौड़, घुड़साल, घूस, घृणा, घोषणा।
च-अक्षर के रूप में शब्द
  • चमेली, चकई, चटक (चमक-दमक), चट्टान, चपत, चपला, चर्चा, चमक, चहक, चहल-पहल,
  • चाँदी, चाँप, चाट, चादर, चारपाई, चाल, चाह, चाहत, चालढाल, चिकित्सा, चिट, चिमनी, चिलक,
  • चिल्लाहट, चिढ, चिता, चिन्ता, चित्रकला, चिनक, चिनगारी, चिप्पी, चिलम, चील, चीख, चींटी, चीनी,
  • चुटिया, चुड़ैल, चुनरी, चुनौती, चुहल, चुहिया, चूक, चें-चें, चेचक, चेतना, चेष्टा, चोंच, चोट, चौपड़, चौखट।
छ- अक्षर के रूप में शब्द
  • छटा, छत, छमछम, छलाँग, छवि, छाँह, छाछ, छानबीन, छाप, छाया, छाल, छींक, छींट, छीछालेदर, छूट, छूत, छेनी, छुआछूत।
ज-अक्षर के रूप में शब्द
  • जंग, जंजीर, जँभाई, जगह, जटा, जड़, जनता, जमात, जलवायु, जमानत, जमावट, जमीन, जलन,
  • जय, जरा, जरूरत, जाँच, जाँघ, जागीर, जान, जायदाद, जिज्ञासा, जिद, जिरह, जिल्द, जिल्लत,
  • जिह्ना, जीत, जीभ, जूँ, जूठन, जेब, जेवनार, जोंक, जोत, ज्वाला।
झ- अक्षर के रूप में शब्द
  • झंकार, झंझट, झख, झिझक, झड़प, झनकार, झपक, झपट, झपास, झरझर, झकझक,
  • झलमल, झाड़फूंक, झाड़(झाड़ने की क्रिया), झाड़, झाँझ, झाँझर, झाँप, झाड़न, झाल, (तितास),
  • झालर, झिड़क, झील, झूम।
ट-अक्षर के रूप में शब्द
  • टकसाल, टक्कर, टपक, टहल, टाँक, टाँग, टाँय-टाँय, टाप, टाल-मटोल, टिकिया, टिप-टिप, टिप्पणी, टीक, टीपटाप, टीमटाम, टीस, टूट, टेंट, टेंटे, टेक, टेर, टोह, टोक, ट्रेन।
ठ- अक्षर के रूप में शब्द
  • ठण्डक, ठक-ठक, ठन
क,अक्षर के रूप में शब्द
  • ठमक, ठिठक, ठिलिया, ठूँठ, ठेक, ठोकर, ठेस।
ड- अक्षर के रूप में शब्द
  • डग, डगर, डपट, डाक, डाट, डाँक, डाल, डींग, डीठ, डोर, डिबिया।
ढ-अक्षर के रूप में शब्द
  • ढोलक।
त- अक्षर के रूप में शब्द
  • तन्द्रा, तकरीर, तकदीर, तकरार, तड़क-भड़क, तड़प, तबीयत, तमत्रा, तरंग, तरकीब, तरफ,
  • तरह, तरावट, तराश, तलब, तलवार, तलाश, तशरीफ, तह, तहजीब, तहसील, तान, ताक-झाँक,
  • ताकत, तादाद, ताकीद, तातील, तारीफ, तालीम, तासीर, तिजारत, तीज, तुक, तुला, तोंद, तोबा,
  • तोप, तोल, तोशक, त्योरी, त्रिया।
थ-अक्षर के रूप में शब्द
  • थकान, थकावट, थरथर, थलिया, थाप, थाह।
-अक्षर के रूप में शब्द
  •  दक्षिण, दगा, दतवन, दमक, दरखास्त, दरगाह, दरार, दलदल, दस्तक, दहाड़, दारू, दहशत,
  • दावत, दिनचर्या, दिव्या, दीक्षा, दीठ, दीद, दीमक,दीवार, दुआ, दुकान, दुविधा, दुत्कार, दुम,
  • दूरबीन, दुनिया, दुर्दशा, दूर, दूब,देखभाल, देखरेख, देन, देह।
ध- अक्षर के रूप में शब्द
  • धड़क, धड़कन, धरपकड़, धमक, धरा, धरोहर, धाक, धातु, धाय, धार, धारणा, धुन्ध, धुन, धूम, धूप (सूर्य-प्रकाश), धूपछाँह, धौंक, धौंस, ध्वजा।
न- अक्षर के रूप में शब्द
  • नकल, नस (स्त्रायु), नकाव, नकेल, नजर, नहर, नजाकत, नजात, नफरत, नफासत,
  • नसीहत, नब्ज, नमाज, नाँद, नाक, निगाह, निद्रा, निराशा, निशा, निष्ठा, नींद, नीयत,
  • नुमाइश, नोक, नोकझोंक, नौबत, नालिश, नेत्री।
प-अक्षर के रूप में शब्द
  • पंचायत, पंगत, पकड़, पखावज, पछाड़, पतवार, पटपट, पतझड़, पताका, पत्तल, पनाह,
  • परख, पसन्द, परवाह, परत, परात, परिक्रमा, परिषद, परीक्षा, पलटन, पहचान, पहुँच
  • , पायल, पिपासा, पिस्तौल, पुलिस, पुश्त, पुड़िया, पुकार, पूछताछ, पूँछ, पेंसिल, पेंशन,
  • पोशाक, पैदावार, पौध, प्रकिया, प्रतिज्ञा, प्रतिभा, प्रतीक्षा, प्रभा।
फ-अक्षर के रूप में शब्द
  • फजीहत, फटकार, फटकन, फतह, फरियाद, फसल, फिक्र, फुरसत, फुलिया, फुहार,
  • फूंक, फूट, फीस, फौज।
ब-अक्षर के रूप में शब्द
  • बन्दूक, बकवास, बयार, बगल, बचत, बदबू, बदौलत, बधाई, बनावट, बरात, बर्दाश्त, बर्फ,
  • बला, बहार, बाँह, बातचीत, बाबत, बरसात, बुलाहट, बूँद, बूझ, बेर (दफा या बार), बैठक,
  • बोतल, बोलचाल, बौखलाहट, बौछार।
भ-अक्षर के रूप में शब्द
  • भगदड़, भड़क, भनक, भभक, भरमार, भभूत, भाँग, भाप, भार्या, भिक्षा, भीख, भीड़,
  • भुजा, भूख, भेंट, भेड़, भैंस, भौंह।
म- अक्षर के रूप में शब्द
  • मंजिल, मंशा, मचक, मचान, मजाल, मखमल, मटक, मणि, मसनद, ममता, मरम्मत, मर्यादा
  • मलमल,मशाल, मज्जा, मशीन, मस्जिद, महक, मसल, महफिल, महिमा, माँग, माता, मात्रा,
  • माया, माप, माला, मिठास, मिर्च, मिलावट, मीनार, मुद्रा, मुराद, मुलाकात, मुसकान,
  • मुसीबत, मुस्कराहट, मुहब्बत, मुहर, मूँग, मूँछ, मूर्खता, मेखला, मेहनत, मैना, मैल, मौज, मौत, मृत्यु।
य-अक्षर के रूप में शब्द
  • यमुना, याचना, यादगार, यातना, यात्रा, यामा, योजना।
र- अक्षर के रूप में शब्द
  • रक्षा, रचना, रात, राह, रेखा, रंगत, रकम, रंग, रगड़, रफ्तार, रस्म, राख, रामायण, राय,
  • राहत,रियासत,रिमझिम, रीढ़, रुकावट, रूह, रेणु, रेत (बालू), रेल, रोक, रोकड़, रोर, रौनक, रोकटोक,रोटी।
ल- अक्षर के रूप में शब्द
  • लौंग, लड़ाई, लता, ललकार, लात, लहर, लार, लालटेन, लंका, लकीर, लगन, लगाम,
  • लटक, लताड़, लचर, लज्जा, लट, लपक, ललक, ललकार, लहर, लात, लाज, लालमिर्च, लाश, लीक, लोटपोट, लू।
व-अक्षर के रूप में शब्द
  • वकालत, वायु, विद्या, विनय, वसीयत, विजय, विदाई, विधवा, व्यथा, विदुषी।
श-अक्षर के रूप में शब्द
  • शंका, शक्कर, शराब, शान, शाम, शरण, शर्त, शतरंज, शक्ल, शराफत, शबनम, शान,
  • शाखा, शिखा, शिकायत, श्रद्धा।
स- अक्षर के रूप में शब्द
  • सरसों, संस्कृत, संस्था, सजावट, सड़क, समझ, सभ्यता, समस्या, सरकार, ससुराल, साँझ,
  • साँस, सिगरेट, सीमा, सुधा, सुविधा, सुबह, सूझ, सेना, सैर, साजिश, सनक, सन्तान (औलाद), सम्पदा, संसद।
ह-अक्षर के रूप में शब्द
  • हजामत, हड़ताल, हत्या, हवा, हलचल, हाय, हाट, हालत, हिंसा, हिचक, हिम्मत,
  • हींग, हरकत, हड़प, हद, हकीकत, हिफाजत, हैसियत, हिम्मत।
स्त्रीलिंग शब्द और उनके वाक्य में प्रयोग
स्त्रीलिंग शब्दों का वाक्य में प्रयोग के लिए निम्नलिखित शब्दों का उपयोग किया गया है।
स्त्रीलिंग शब्दउनका वाक्य में प्रयोग
आग –घर में आग लग गई ।
आदत-मुझे पान खाने की आदत है।
आय-मेरी आय थोड़ी है।
आँख-उनकी आँख बड़ी-बड़ी है।
इच्छा-मेरी इच्छा घूमने की है।
ईट-ईट पकी नहीं है।
ईष्र्या-दूसरे की संपत्ति से ईष्र्या नहीं करनी चाहिए।
उम्र-तुम्हारी उम्र लम्बी है।
ऊब-नीरस बातों से ऊब होती है।
कब्र-कब्र खोदी गयी।
कमर-मेरी तो कमर टूट गयी।
कसम-मुझे उनकी कसम है।
कलम-कलम टूट गयी।
खटिया-उसने मेरी खटिया खड़ी कर दी।
खोज-खोये हुए बच्चे की खोज जारी है।
खबर-उनकी मृत्यु की खबर गलत निकली।
गर्दन-मेरी गर्दन फँसी है।
घूस-घूस बुरी चीज है।
घात-बिल्ली चूहे की घात में है।
चमक-उनके चेहरे की चमक गायब हो गयी।
चिढ-राधा की चिढ महँगी पड़ी।
चाल-गाय की चाल अच्छी है।
चिडिया -आकाश में चिडिया उड़ रही है।
छत-छत टूट गयी।
जाँच-जाँच हो रही है ।
जीभ-जीभ कट गयी।
जूँ-मेरे बाल में जूँ रेंगती है।
झंझट-झंझट किसी से नहीं करनी चाहिए।
टाँग-मेरी टाँग टूट गयी।
ठेस-ठेस लग गयी।
किताब-किताब पुरानी है।
तबीयत-उसकी तबीयत ठीक नहीं है।
थकावट-बिस्तर पर जाते ही थकावट दूर हो गयी।
दीवार-दीवार गिर गयी।
देह-उनकी देह मोटी है।
धूप-धूप निकल आयी है।
नकल-मेरी नकल मत करो।
नहर-नहर गाँव से होकर जाती है।
नब्ज-मैं उसकी नब्ज पहचानता हूँ।
प्रतिज्ञा-मेरी प्रतिज्ञा अटल है।
फटकार-उसने फटकार लगायी।
बंदूक-यह किसकी बंदूक है ?
बर्फ-बर्फ गिर रही है।
बालू-बालू पीली है।
बूँद-पानी की बूँदे गिरी है।
भीख-भीख देनी चाहिए।
मूँछ-उनकी मूँछे नुकीली हैं।
यात्रा-यात्रा अच्छी रही।
भीड़-वहाँ भीड़ लगी थी।
भूख-
मुझे भूख लगी है।
लाश-लाश सड़ गयी।
लीक-यह लीक कैसी है।
लू-लू चल रही है।
शराब-शराब महँगी है।
विजय-उसकी विजय हुई।
सजा-उसको सजा हो गयी है।
सड़क-सड़क चौड़ी है।
साँझ-साँझ घिर आयी है।
नाकभरी सभा में सौदागर की नाक कट गई।
बाढ़पिछले साल भीषण बाढ़ आई थी।
लगामघोड़े की लगाम हाथ में थी।
नींदखाने के बाद मुझे नींद लगने लगी।
ऋतुवर्षा ऋतु आ गई।
सरसोंफागुन चढ़ते ही सरसों कटने लगती है।
खोजहनुमान ने सीता की खोज की।
शपथमैंने शपथ खाई कि उसे हराकर ही रहूँगा।
प्यास
कौवे को प्यास लगी थी।
आयुभगवान करे, आपकी आयु लंबी हो।
चाँदीसोनार के यहाँ से चाँदी चोरी हो गई।
कचनारग्रीष्म ऋतु में भीषण ताप में भी कचनार हरी-भरी रहती है।
साँससाँप को देखकर मेरी साँस फूल गई।
ओसजाड़े में ओस पड़ती है।
सरकारकेंद्र की सरकार राजनीतिक दलों के सहयोग से बनी है।
स्त्रीलिंग और पुलिंग दोनों लिंगों का वाक्य में प्रयोग—-
पुलिंग शब्द वाक्य में प्रयोग स्त्रीलिंग शब्द वाक्य में प्रयोग
प्राण (पु०)- प्राण उड़ गए।मोती (स्त्री)-मोती चमकता है।
घी (पु०)-घी उजला है।छत (स्त्री०)-छत गिर गई।
मूँछ (स्त्री०)-पिताजी की मूँछ पक रही है।दाल (स्त्री०)-दाल अच्छी बनी है।
होश (पु०)-उसके होश उड़ गए।चादर (स्त्री)-चादर फट गई है।
पहिया (पु०)-बैलगाड़ी में दो पहिये होते है।धूप (स्त्री /पु०)-धूप कड़ी है।/यज्ञ में धूप जल रहा है।
बुढ़ापा (पु०)-देखते-देखते बुढ़ापा आ गया।दीमक (स्त्री०)-किताबों में दीमक लग गई है।
दर्शन (पु०)-आपके दर्शन हुए, अहोभाग्य।जूँ (स्त्री०)-मूर्ख के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती।
कीचड़ (पु०)-गली में कीचड़ फैल गया है।खीर (स्त्री०)-खीर अच्छी बनी है।
हार (स्त्री० /पु०)-रावण की हार हो गई /रानी का हार खो गया।आग (स्त्री०)-आग धधक उठी है।
मोती (पु०)-मोती चमकीला होता है।अफवाह (स्त्री०)-अफवाह फैल गई कि उसकी हत्या कर दी गई है।
घूँट (पु०)-मैं खून का घूँट पीकर रह गया।अरहर (स्त्री०)-जनवरी में अरहर फूलने लगती है।
लालच (पु०)-ज्यादा लालच नहीं करना चाहिए।अफीम (स्त्री०)-अफीम जहरीली होती है।
चरित्र (पु०)-चरित्र चला जाता है, तो सब कुछ चला जाता है।अनबन (स्त्री०)-
दोनों भाइयों में अनबन चल रही है।
नेत्र (पु०)-मेरा नेत्र लाल है।आँख (स्त्री०)-
मेरी आँख में दर्द हो रहा है।
उल्लास (पु०)-हारने से सारा उल्लास ही समाप्त हो गया।चोंच (स्त्री०)-इस पंक्षी की चोंच लंबी है।
चश्मा (पु०)-चश्मा हमारी आँखों की रक्षा करता है।भीड़ (स्त्री०)-भीड़ एकत्र हो गई।

विशेष  :-

आपको जिस संज्ञा शब्द का लिंग बदलना है पहले उसका बहुवचन में परिवर्तन कीजिए । बहुवचन में बदलने के बाद अगर शब्द के पीछे ऍ या आँ आये तो वो स्त्रीलिंग है और अगर पीछे ऍ और आँ नहीं आता है तो वह पुल्लिंग होगा ।जैसे :-

  • पंखापंखे = “आँ या ऍ “नहीं आया है तो यह पुल्लिंग है
  • चाबी – चाबियाँ = आँ आया है तो यह स्त्रीलिंग हैं

लिंग परिवर्तन

प्राय: पुंल्लि्ग शब्दों के साथ प्रत्यय लगाने से स्त्रीलिंग शब्दबन जाते है। कुछ शब्द सदा स्त्रीलिंग और पुंल्लि्ग ही रहते है। इनके आगे ‘नर या मादा’लगाकर उनके पुंल्लि्ग या स्त्रीलिंग रूप बना दिए जाते है।

पुल्लिंग स्त्रीलिंगपुल्लिंगस्त्रीलिंग
1. कविकवियित्री31. गायक
गायिका
2. विद्वान्
विदुषी32. शिक्षक
शिक्षिका
3. नेता नेत्री
33. वर
वधू
4. महान
महती34. श्रीमान
श्रीमती
5. साधु साध्वी
35. भेड़
भेडा
6. दादादादी
36. नागनागिन
7. बालक बालिका37. पडोस
पड़ोसिन
8. घोडाघोड़ी
38. मामा मामी
9. शिष्य
शिष्या39. बलवान
बलवती
10. छात्र
छात्रा40. नर तितलीतितली
11. बाल
बाला41. भेडिया
मादा भेडिया
12. धोबीधोबिन
42. नर मक्खी
मक्खी
13. पंडित पण्डिताइन
43. कछुआ मादा कछुआ
14. हाथी
हथिनी44. नर चील
चील
15. ठाकुर चील45. खरगोश
मादा खरगोश
16. नर
मादा46. नर चीताचीता
17. पुरुषस्त्री
47. भालू
मादा भालू
18. युवक युवती
48. नर मछली
मछली
19. सम्राटसम्राज्ञी
49. घोडा
घोड़ी
20. मोर मोरनी
50. देवदेवी
21. सिंह सिंहनी
51. लड़का
लडकी
22. सेवक सेविका
52. ब्राह्मण
ब्राह्मणी
23. अध्यापकअध्यापिका53. बकरा
बकरी
24. पाठकपाठिका
54. चूहा
चुहिया
25. लेखक
लेखिका55. चिड़ा
चिड़िया
26. दर्जी दर्जिन
56. बेटा बिटिया
27. ग्वालाग्वालिन57. गुड्डा गुडिया
28. मालिक मालकिन
58. लोटालुटिया
29. शेरशेरनी
59. माली
मालिन
30. ऊँट ऊंटनी60. कहारकहारिन
61. सुनार सुनारिन
62. लुहार
लुहारिन
63. नौकर नौकरानी
64. चौधरीचौधरानी
65. देवरदेवरानी
66. सेठसेठानी
67. जेठजेठानी
68. बालबाला
69. सुतसुता
70. तपस्वी
तपस्विनी
71. हितकारीहितकारिनी
72. स्वामी स्वामिनी
73. परोपकारी
परोपकारिनी
74. दासदासी आदि ।

पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनाने के निम्नलिखित नियम हैं :-

अकारान्त व आकारान्त पुल्लिंग शब्दों के अन्तिम ‘अ’ या ‘आ’ मे प्राय; ‘ई’ प्रत्यय लगाने से स्त्रीलिंग बनता

पुल्लिंग स्त्रीलिंगपुल्लिंग स्त्रीलिंग
मौसी मौसासुन्दरसुन्दरी
बकराबकरीनरनारी
ब्राह्मणब्राह्मणीदेव देवी
लड़कालड़कीचाचाचाची
दादादादीपुत्र पुत्री
बेटाबेटी नानी नाना
दादा दादीघोडा घोड़ी
कबूतर कबूतरीगूँगागूँगी
दास दासी गधागधी
पोता पोतीदेव
देवी
नर नारीनालानाली
मोटा मोटी मुर्गा मुर्गी
बन्दरबंदरी
नट नटी
घोडा घोड़ी
कालाकाली
चाचा
चाची काका
काकी
पुत्र पुत्री साला
साली
मामा
मामीपडोसपडोसी

कुछ ‘आकारान्त’ पुल्लिंग शब्दों के अन्तिम ‘आ’ को ‘इया’ लगा दिया जाता है – अर्थात जब अ , आ , वा आदि पुल्लिंग शब्दों को स्त्रीलिंग में बदला जाता है तो अ, आ, तथा वा की जगह पर ‘ इया ‘ लगा दिया जाता हैं ।

पुल्लिंगस्त्रीलिंग
बन्दरबंदरिया
बुढाबुढिया
बेटबिटिया
लोटा
लुटिया
खाट खटिया
बाछा/बछडा बछिया
चूहाचुहिया
चिड़ाचिड़िया
गुड्डागुड़िया
बूड्ढाबुढिया

व्यवसायबोधक, जातिबोधक तथा उपनामवाचक शब्दों के अन्तिम स्वर का लोप कर उनमें कहीं इन और कहीं आइन प्रत्यय लगाकर स्त्रीलिंग बनाया जाता है जैसे-

पुल्लिंगस्त्रीलिंग
धोबी धोबिन
भंगीभंगिन
तेलीतेलिन
पुजारीपुजारिन
माली मालिन
ग्वालाग्वालिन
पंडापंडाइन
मालिकमालकिन
दर्जी दर्जिन
जुलाहिनजुलाहा
कहारिनकहार
चौबाचौबाइन
मुगलमुगलानी
मेहतरमेहतरानी
पठानपठानी
भवभवानी
सेठसेठानी
इन्द्रइन्द्रानी
देवरदेवरानी
नौकर

नौकरानी

उपजातिवाचक शब्द प्राय; ‘आइन’ प्रत्यय लगाते है और पहले स्वर को ह्रस्व कर देते है –

पुल्लिंगस्त्रीलिंग
लालालालाइन
चौबेचौबाइन
ठाकुरठकुराइन
मल्लामुल्लाइन
पंडितपंडिताइन
दुबेदुबाइन
गुरुगुरुआइन
बाबूबबुआइन
चौधरीचौधराइन
हलवाई हलवाइन

संस्कृत की कुछ संज्ञाओं मे अन्तिम ‘अ’ को ‘आ’ कर देते है –

पुल्लिंगस्त्रीलिंग
प्रियप्रिया
बालबाला
सुतसुता
मूर्खमूर्खा
शिष्यशिष्या
आचार्यआचार्या
वृद्धवृद्धा
महाशयमहाशया

कुछ पशु पक्षियों के पुल्लिंग शब्दों को स्त्रीलिंग मे परिवर्तित करने के लिए अन्त मे ‘नी’ लगाते है

पुल्लिंगस्त्रीलिंग
मोरमोरनी
शेर शेरनी
बाघबाघिन
हंसहंसनी
सिंहसिंहनी
हाथीहथिनी
उँटउँट्नी
कबुतरकबुतरनी

कुछ शब्दों का स्त्रीलिंग न हो पाने की वजह से उनमें ‘ आनी ‘ प्रत्यय लगाकर स्त्रीलिंग बनाया जाता है ।

पुल्लिंगस्त्रीलिंग
देवरदेवरानी
सेठसेठानी
इन्द्रइन्द्रानी
पठानपठानी
भवभवानी
मुगलमुगलानी
मेहतरमेहतरानी
नौकरनौकरानी
ठाकुरठकुरानी
चौधरीचौधरानी
पण्डितपंडितानी

कुछ संज्ञा शब्दों के अन्त मे ‘ई’ के स्थान पर ‘इनी’ प्रत्यय लगाते है –

पुल्लिंगस्त्रीलिंग
एकाकीएकाकिनी
यशस्वीयशस्विनी
मनोहरमनोहारिनी
अभिमानअभिमानिनी
स्वामीस्वामिनी
तपस्वीतपस्विनी

कुछ ‘अक’ अन्त वाले संज्ञा शब्दों के स्थान पर ‘इका’ लगाया जाता है –

पुल्लिंगस्त्रीलिंग
लेखकलेखिका
नायकनायिका
याचकयाचिका
पाठकपाठिका
बालकबालिका
सेवकसेविका
गायकगायिका
दर्शकदर्शिका
अध्यापकअध्यापिका
शिक्षकशिक्षिका

अन्तिम ‘ता’ वाले शब्दों के स्थान पर ‘त्री’ लगाया जाता है

पुल्लिंगस्त्रीलिंग
नेतानेत्री
कर्ता
कर्त्री
दातादार्त्री
भर्ता भर्त्री

कुछ संज्ञा शब्दों के अन्त मे ‘आन’ के स्थान पर ‘अती’ लगाया जाता है –

पुल्लिंग स्त्रीलिंगपुल्लिंगस्त्रीलिंग
महानमहती
बलवान
बलवती
बुद्धिमानबुद्धिमति
श्रीमानश्रीमति
रुपवानरुपवतीपुत्रवानपुत्रवती
प्रज्ञावानप्रज्ञावतीगुणवानगुणवती
धनवानधनवतीभगवानभगवती

कुछ शब्द स्वतंत्र रूप से स्त्री -पुरुष के स्वंय में ही जोड़े होते हैं । कुछ पुल्लिंग शब्दों के स्त्रीलिंग बिलकुल उल्टे होते हैं

पुल्लिंगस्त्रीलिंग

पुल्लिंगस्त्रीलिंग
राजारानीबाप माँ
पितामाताबैल गाय
वर वधूभाईबहन
सासससुरविद्वान
विदुषी
आदमीऔरतकवि
कवयित्री
युवकयुवतीसम्राट
साम्राज्ञी

कुछ संज्ञा शब्दों के रुप बिलकुल बदल दिए जाते है –

पुल्लिंग स्त्रीलिंग
राजारानी
पुत्रकन्या
साहब मेम
फूफा बुआ
बिलावबिल्ली
बेटापुतोहू
सम्राट
सम्राज्ञी
पिता
माता
भाई
बहन
वर वधू
पति पत्नी
मर्द औरत
पुरुषस्त्री
बैल गाय

कुछ शब्दों मे ‘नर’ और ‘मादा’ शब्द लगाया जाता है –

पुल्लिंगस्त्रीलिंग
नर कोयल
मादा कोयल
नरभेड़ियामादा भेड़िया
नर चीलमादा चील
नर चीतामादा चीता
नर खरगोशमादा खरगोश
नर चींटीमादा चींटी
नर कौवामादा कौवा
नर मक्खीमादा मक्खी
नर मकड़ीमादा मकड़ी
नर भेड़मादा भेड़
नर तोतामादा तोता
नर खरगोशमादा खरगोश
नर मच्छरमादा मच्छर
नर जिराफमादा जिराफ

कहीं-कहीं स्त्रीलिंग शब्दों मे ‘आ’ ‘आव’ ‘उआ’ ‘ओई’ प्रत्यय लगाने से पुरुष वाचक बन जाते है

पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंगतथा स्त्रीलिंगपुल्लिंगतथा स्त्रीलिंग
भैसा भैसविधुरविधवा
ननदोईननदबहनोई
बहन
रडुँआ राँडबिलाव

बिल्ली

नीचे लिखे शब्द पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग दोनों मे एक समान प्रयुक्त होते है –
नीचे लिखे शब्द पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग दोनों मे एक समान प्रयुक्त होते है –
मित्र, शिशु, पवन, बर्फ, ग्राहक, चित्रकार, श्वास, मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, डाक्टर, प्रिंसिपल, मैनेजर ।
प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री , राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति , चित्रकार , पत्रकार , गवर्नर ,लेक्चर , वकील , डॉक्टर , सेक्रेटरी , प्रोफेसर , शिशु , दोस्त , बर्फ , मेहमान , मित्र , ग्राहक , प्रिंसिपल , मैनेजर , श्र्वास , मंत्री

संस्कृत स्त्रीप्रत्यय

संस्कृत के ‘वान्’ और ‘मान्’ प्रत्ययान्त विशेषण शब्दों में ‘वान्’ तथा ‘मान्’ को क्रमशः वती और मती कर देने से स्त्रीलिंग बन जाता है। जैसे
पुंलिंग
स्त्रीलिंगपुंलिंगस्त्रीलिंग
बुद्धिमान्-बुद्धिमतीभगवान्-भगवती
श्रीमान्- श्रीमतीधनवान्-धनवती
पुत्रवान्-पुत्रवतीआयुष्मान्-आयुष्मती
संस्कृत के बहुत-से अकारान्त विशेषण शब्दों के अन्त में आ लगा देने से स्त्रीलिंग हो जाते है। जैसे-
पुल्लिंगस्त्रीलिंग
तनुज-
तनुजा
पूज्य-
पूज्या
श्याम-श्यामा
सुत-सुता
प्रिय-प्रिय
आत्मज-आत्मजा
चंचल- चंचलता
जिन पुलिंग शब्दों के अन्त में ‘अक’ होता है, उनमें ‘अक’ के स्थान पर इका कर देने से वे शब्द स्त्रीलिंग बन जाते है। जैसे
पुल्लिंगस्त्रीलिंग
सेवक-सेविका
बालक-बालिका
पालक- पालिका
पाठक-पाठिका
भक्षक-भक्षिकानायक
कुछ पुल्लिंग शब्दों के अंत में ‘ता’ के स्थान पर ‘त्री’ जोड़कर भी स्त्रीलिंग शब्द बनाए जाते हैं :
पुलिंगस्त्रीलिंग
दाता- दात्री
धाता-धात्री
अभिनेता-अभिनेत्री
रचयिता-
रचयित्री
विधाता-
विधात्री
वक्ता-वक्त्री
नेता- नेत्री

लिंग का महत्त्व (Importance of Gender)

हिंदी में अनेक शब्दों में पुल्लिंग अथवा स्त्रीलिंग शब्दों का निर्धारण उनके लिंग के अनुसार किया जाता है.
  • जैसे बालक- बालिका, नर- नारी आदि.
कुछ शब्दों में प्रारम्भ में ही नर, मादा लगाकर लिंग निर्धारण कर लेते है.
  • जैसे की नर कौवा, मादा कौवा.
अधिकांश प्राणियों  के लिंग निश्चित होते है किंतु निर्जीव वस्तुओ के लिंग निर्धारण में समस्या आती है
  • जैसे की चाय, दूध, दही, किताब आदि.
वास्तव में इनका कोई लिंग नहीं होता. भाषा की परंपरा में इनके लिंग का निर्धारण हो जाता है और व्यक्ति उसी अनुसार ही इनका वाक्यों में प्रयोग करता है.
उदाहरण
  • मेज टूट गई है- स्त्रीलिंग  शब्द
  • दूध ठंडा हो गया है- पुल्लिंग शब्द
हिंदी भाषा में लिंग सूचक शब्द रूपों का बहुत महत्त्व है. प्रत्येक शब्द का पुल्लिंग या स्त्रीलिंग होना अनिवार्य है, क्योंकि विश्लेषण या क्रिया के रूप भी संज्ञा के व्याकरणिक रूप के अनुरूप ही चलते है
जैसे-
  • अच्छा व्यक्ति सभी का सम्मान करता है.
  • अच्छी नारी सभी का सम्मान करती है.

अव्यय की परिभाषा अर्थ,भेद, पहचान,प्रयोग, विशेष और उदहारण – Indeclinable in Hindi

अव्यय (Indeclinable)की परिभाषा

उसी प्रकार  जिसका रूप सदैव एक ही बना रहता है। और उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता,अर्थात एक ही रूप में बने रहने के कारण इन्हें अव्यय कहते है और जिनमें कोई विकार उत्पन्न नहीं होता। उन्हें अविकारी पद कहते हैं।
जैसे—
  • सचिन आज वहॉं जाएगा।
  • राकेश और शशांक मेरे मित्र हैं।
  • मैं पिताजी के साथ मुंबई जा रहा है।
  • मैं भी जा रहा हूॅं
उपर के वाक्यों में’ आज’ ‘वहॉं ‘ ‘और’ ‘के साथ’ ‘वाह भी’ अव्यय हैं। इन शब्दों का रूप नहीं बदलता एक ही रूप में बने रहने के कारण इन्हें अव्यय कहते हैं।
अर्थात अव्यय वे पद शब्द हैं जिनमें  लिंग, वचन,पुरूष्, काल आदि के कारण कोई विकार या परिवर्तन नहीं होता।
अव्यय के अपरिवर्तित रूप के उदहारण
  • वाह! गीता धीरे धीरे चलने लगी।
  • वाह!लडकियॉं धीरे धीरे चलने लगी।
  • वाह!लडके धीरे धीरे चलने लगा।
  • वाह!पंखा धीरे धीरे चलने लगा।
  • वाह!पंखे धीरे धीरे चलने लगे।

अव्यय का अर्थ

शब्द—भेद के अंर्तगत यह ज्ञात होता है कि अव्यय या अविकारी शब्द वे होते है, जिनका रूप वाक्य में प्रयुक्त होने पर लिंग ,वचन , काल,पक्ष आदि के प्रभाव से नहीं बदलता और ये अपने मूल रूप में ही बने रहते है ।
अव्यय  शब्द का अर्थ है— जिसका व्यय न हो अर्थात जिसमें विकार न आए। इन्हें अविकारी पद कहते है।
दूसरे शब्दो में :—-वाक्य में प्रयुक्त होने के बाद, जिन शब्दों के रूप में लिंग,वचन, पुरूष, काल ,आदि व्याकरणिक कोटियों के प्रभाव से कोई परिवर्तन नहीं होता, अव्यय या अविकारी शब्द कहलाते है।
जैसे
उपर, नीचे,यहॉ वहॉ,आज, कल,तब,और,अथवा,में,पर,के उपर,के नीचे,, क्यों, वाह, आह, ठीक, अरे, और, तथा, एवं, किन्तु, परन्तु, बल्कि, इसलिए, अतः, अतएव, चूँकि, अवश्य, जब, तब, अभी, उधर, वहाँ, इधर, कब, क्यों अर्थात इत्यादि। ।
उदहारण के लिए:—
  • तुम यहॉं मत बैठो।
  • तुम चलो या फिर अपने भाई को भेज दो।
  • घर के बाहर क्या कर रहे हो।
  • वाह! कितना सुंदर दृश्य है।
  • राहुल ने ही गिलास तोडा है।

अव्यय के भेद

अव्यय निम्नलिखित चार प्रकार के होते है –
  • क्रियाविशेषण (Adverb)
  • संबंधबोधक (Preposition)
  • समुच्चयबोधक (Conjunction)
  • विस्मयादिबोधक (Interjection)
  • निपात अव्यय
क्रियाविशेषण :- जो अव्यय शब्द क्रिया की विशेषता बतलाते है, उन्हें क्रिया विशेषण कहा जाता
दूसरे शब्दो में-:- जिन शब्दों से क्रिया, विशेषण या दूसरे क्रियाविशेषण की विशेषता प्रकट हो, उन्हें क्रियाविशेषण’ कहते है। जैसे :—
जहाँ पर यहाँ , तेज , अब , रात , धीरे-धीरे , प्रतिदिन , सुंदर , वहाँ , तक , जल्दी , अभी , बहुत आते हैं वहाँ पर क्रियाविशेषण अव्यय होता है
उदहारण के लिए
  • वह प्रतिदिन नवाज पढता है।
  • मैं तुम्हारे सामने ही खडा था।
  • वहॉ कौन खडा है।
  • आप मुझसे कल मिलिएगा।
  • इतना खाओ की पच जाए।
  • धीरे बालो यह लाइब्रेरी है।
उपर दिए गए वाक्यों में प्रयुक्त प्रतिदिन ,वहॉ ,सामने,कल,धीरे तथा इतना अपनी अपनी क्रियाओं की विशेषता बताने का कार्य कर रहे है। क्रिया की विशेषता बताने के कारण ये शब्द क्रिया विशेषण हैं।

नोट:—

  • क्रियाविशेषण अविकारी विशेषण भी कहलाते हैं।
  • इसके अतिरिक्त, क्रियाविशेषण दूसरे क्रियाविशेषण की भी विशेषता बताता हैं। जैसे—राम धीरे-धीरे टहलता है;
  • इस वाक्य में ‘बहुत’ क्रियाविशेषण है; क्योंकि यह दूसरे क्रियाविशेषण ‘धीरे’ की विशेषता बतलाता है।
क्रिया विशेषण शब्दों की  विशेषता निम्न प्रकार से बताई जाती है
  •  क्रिया के घटित होने के स्थान बताकर अर्थात क्रिया कहॉं घटित हुई
  •  क्रिया के घटित होने के समय बताकर अर्थात क्रिया कब  घटित हुई।
  •  क्रिया के घटित होने के तरीका बताकर अर्थात क्रिया कैसे घटित हुई।
  •  क्रिया के घटित होने का परिणाम या मात्रा  बताकर अर्थात क्रिया कितनी मात्रा में घटित हुई।
इन्ही आधारों पर क्रिया विशेषण की विशेषता निम्न प्रकार से बताई गई है। अत:अर्थ के अनुसार क्रियाविशेषण अव्यय के भेद  है।
  •  रीतिवाचक क्रियाविशेषण
  • कालवाचक क्रियाविशेषण
  •  स्थानवाचक क्रियाविशेषण अव्यय
  • परिमाणवाचक क्रियाविशेषण अव्यय
रीतिवाचक क्रियाविशेषण:—  जिन क्रियाविशेषण शब्दों से क्रिया के ढ़ंग या रीति की विशेषता का बोध होता है। उन्हें रीतिवाचक क्रियाविशेषण कहते है।
दूसरे शब्दों में:— जो शब्द क्रिया के घटित होने की रीति या विधि की सूचना  देते है। वे रीतिवाचक क्रियाविशेषण कहलाते है।
जैसे-
  • राधा मधुर गाती है।
  • चीता तेज दौड़ता है।
  • प्रेशर कुकर अचानक फट गया।
  • आपने उचित कहा है।
  • पुस्तकालय खोलने के लिए सहयोग यथाशक्ति देंगे।
  • यदि सम्मान पूर्वक आमंत्रित किया गया तो अवश्य जाएगें
उपर्युक्त वाक्यों में ‘मधुर’ तथा ‘तेज’,अचानक,उचित ,यथाशक्ति, अवश्य,शब्द रीतिवाचक क्रिया-विशेषण हैं
क्योंकि ये क्रमशः ‘गाती’ तथा ‘दौड़ता’ क्रियाओं की रीति या ढंग संबंधी विशेषता बतलाते हैं।

नोट :—

रीतिवाचक क्रिया-विशेषण  निम्न शब्दों के द्वारा पहचान की जा सकती है।  जैसे ———

सुखपूर्वक, शांतिपूर्वक वैसे , अचानक , इसलिए , कदाचित , यथासंभव , सहज , धीरे , सहसा , एकाएक , झटपट , आप ही , ध्यानपूर्वक , धडाधड , यथा , ठीक , सचमुच , अवश्य , वास्तव में , निस्संदेह , बेशक , शायद ,संभव है , हाँ , सच , जरुर , जी , अतएव , क्योंकि , नहीं , न , मत , कभी नहीं , कदापि नहीं ,फटाफट , शीघ्रता , भली-भांति , ऐसे , तेज , कैसे , ज्यों , त्यों आदि आते हैं वहाँ पर रीतिवाचक क्रियाविशेषण अव्यय कहते हैं।

इस क्रियाविशेषण की संख्या गुणवाचक विशेषण की तरह बहुत अधिक है। ऐसे क्रियाविशेषण प्रायः निम्नलिखित अर्थों में आते हैं- अर्थात

रीतिवाचक क्रिया-विशेषण  निम्न प्रकार है।
  1. विधि बोधक:— —–ध्याानपूर्वक,सहसा,हाथोंहाथ,सुखपूर्वक,परिश्रमपूर्वक, धीरे धीरे तेज आदि
  2. निश्चय बोधक :——-जरूर, बेशक,अलबत्ता, अवश्य’ और ‘निःसंदेह आदि।
  3. अनिश्चय बोधक:— –शायद प्राय:,बहुध,कदाचित्, संभव , अक्सर, मुमकिन आदि।
  4. हेतु बोधक:————क्यों ,किसलिए,अतएव,अत:,क्योकि आदि।
  5. निषेधवाचक:——— न, नहीं,मत,कभी नहीं आदि।
  6. प्रश्नवाचक:———— क्यों ,कैसे आदि।
  7. स्वीकृति बोधक———हॉं, जी,ठीक, सच ,बिल्कुल आदि।
  8. आकस्मिकताबोधक———ससिा, अचानक,एकाएक,अकस्मात् आदि।
  9. आवृति बोधक————सरासर,फटाफट,धडधड,चुपचाप आदि।

 रीतिवाचक क्रिया-विशेषणों की पहचान

  • रीतिवाची क्रिया-विशेषण शब्द की पहचान करने के लिए क्रिया पर कैसे प्रशनवाचक शब्द से प्रश्न करना चाहिए कैसे के उत्तर में जो शब्द प्राप्त होते है। वे रीतिवाचक क्रिया-विशेषण कहलाते है।
अर्थात इसे हम ऐसे भी कह सकते है।
  • यदि वाक्य में मुख्य क्रिया के साथ कैसे प्रश्न लगा दिया जाए तो उतर में रीतिवाचक क्रिया-विशेषण  आएगा।
उदहारण के लिए:—
  • वह सरपट भाग गया
  • प्रश्न पूछा जाए— कैसे भागा?
  • उतर होगा— सरपट
  • अत: सरपट  क्रिया-विशेषण होगा।

2. कालवाचक क्रियाविशेषण:—

जिन क्रिया विशेषण शब्दों से क्रिया के समय की विशेषता का बोध होता है।  उन्हें कालवाचक क्रियाविशेषण कहते
है।
दूसरे शब्दों में —जो शब्द क्रिया के घटित होने के बारे में सूचना देते है वे कालवाची क्रियाविशेषण कहलाते है।
उदहारण के लिए :—
  • ढोल बजा है। राधा अब नाचेगी
  • विवाह के पश्चात हम शीघ्र ही चल पडेगें।
  • इंफाल में वर्षा लगातार हो रही है।
  • लघुकथा साहित्य पत्रिका प्रतिमाह छपती है।
  • यह पत्र संम्पादक को तत्काल दे आओं।
इन वाक्यों में आए क्रियाविशेषण तत्काल, अब ,शीघ्र, प्रतिमाह आदि कालवाचक क्रियाविशेषण है।
कुछ अन्य कालवाचक क्रिया-विशेषण शब्द- अभी-अभी, आज, कल, परसों, प्रतिदिन, अब, जब, कब, तब, लगातार, बार-बार, पहले, बाद में, निरन्तर, नित्य, दोपहर, सायं आदि।

कालवाचक क्रियाविशेषणों की पहचान:—

कालवाचक क्रियाविशेषण शब्द की पहचान करने के लिए क्रिया में कब शब्द से प्रश्न करना चाहिए कब प्रश्प के उत्तर में प्राप्त होने वाले शब्द कालवाचक क्रियाविशेषण  कहलाते है।

उदहारण के लिए :—
  • वह रोज टहलने जाता है।—   टहलने  कब जाता है? उत्तर— रोज
  • कल बहुत तेज तुफान आया——तुफान  कब आया? उत्तर— कल

कालवाचक क्रियाविशेषण के प्रकार

कालवाचक क्रियाविशेषण  के तीन प्रकार होते  है।
  • काल बिंदु वाचक—— आज कल अब अभी प्रात: साय: कल जब पश्चात आदि।
  • अवधिवाचक :—— हमेशा लगातार सदैव दिनभर नित्य निरंतर लगातार आजकल आदि।
  • बारम्बारता वाचक —— हरबार प्रतिदिन प्रतिवर्ष बहुआ हर बार आदि।

स्थानवाचक क्रियाविशेषण

जिन क्रिया  विशेषण शब्दों से  क्रिया के स्थान की विशेषता का बोध होता है। उन्हें स्थानवाचक क्रियाविशेषण कहते है।
दूसरें शब्दों में—- जिन शब्दों से यह पता चलता है कि क्रिया कहॉ और किस स्थान पर घटित हुई वे स्थानवाचक क्रियाविशेषण  कहलाते है।
उदहारण के लिए
  • राधा और रमा उस ओर गई
  • मम्मी जी बहार घुम रही है।
  • धर्मकी सर्वत्र विजय होती है।
  • रोहन की चप्पले यहॅं पडी है।
  • आगे बढ़ना है तो परिश्रम करो।
इन वाक्यों में आए क्रियाविशेषण  उस ओर यहॅा आगे बहार और सर्वत्र आदि स्थानवाचक क्रिया-विशेषण है।
स्थानवाचक क्रिया-विशेषण  निम्न शब्दों के द्वारा पहचान की जा सकती है।  जैसे ———
वहाँ , भीतर , बाहर , इधर , उधर , दाएँ , बाएँ , कहाँ , किधर , जहाँ , पास , दूर , अन्यत्र , इस ओर , उस ओर , ऊपर , नीचे , सामने , आगे , पीछे , आमने आते है वहाँ पर स्थानवाचक क्रियाविशेषण अव्यय होता है।
स्थानवाचक क्रिया-विशेषण दो प्रकार के होते है।
  • स्थिति बोधक
  • दिशबोधक
स्थिति बोधक क्रिया-विशेषण-   जो शब्द क्रिया की स्थिति के बारे में या सम्बद्ध के बारे में विशेषता बताएँ, उन्हें स्थिति बोधक क्रिया-विशेषण कहते है।
जैसे-
  • मेरे पास बैठों।
  • तुम दूर चले गए
  • यहॉं आओ
इन वाक्यों में ‘पास,दूर ,यहॉं   स्थिति बोधक क्रिया-विशेषण हैं क्योंकि वे क्रमशः ‘बैठों’ और ‘ चले गए’ क्रियाओं की स्थित-संबंधी विशेषता बताते हैं
कुछ अन्य  स्थितिवाचक क्रिया-विशेषण शब्द जैसे —आगे ,पीछे ,उपर ,नीचे ,बाहर, भीतर, यहॉ ,वहॉ ,दूर पास,निकट आदि है।
दिशाबोधक क्रिया-विशेषण- जो शब्द क्रिया की दिशा  के बारे में सूचना दे या  उसके सम्बद्ध  की विशेषता बताएँ, उन्हें दिशावाचक क्रिया-विशेषण कहते हैं।
जैसे-
  • मेरी ओर देखो।
  • वह उधर मुड़ गया।
इन वाक्यों में ‘ओर’ तथा ‘उधर’ दिशावाचक क्रिया-विशेषण हैं क्योंकि वे क्रमशः ‘देखो’ और ‘मुड़ गया’ क्रियाओं की दिशा-संबंधी विशेषता बताते हैं।
कुछ अन्य दिशावाचक क्रिया-विशेषण- नीचे की ओर, उपर की ओर, चारों ओर इधर, उधर, जिधर, किधर, सामने आदि। है।

स्थानवाचक क्रियाविशेषणों की  पहचान

 स्थानवाचक क्रियाविशेषणों की  पहचान करने के लिए क्रिया पर कहॉं, तथा किधर प्रश्नवाचक शब्दों से प्रश्न करके देखना चाहिए। कहॉं तथा किधर प्रश्नों के उत्तर में सदैव स्थानवाची क्रियाविशेषण शगब्द प्राप्त होते है।
जैसे
  • तुम यहॉ मत बैठों  —————कहॉ मत बैठों? उत्त्र —यहॉं
  • मेरा स्कूल यहॉं से पास ही है।—————स्कूल कहॉं है?—उत्तर —पास ही

4 परिमाणवाचक क्रियाविशेषण-​

जिन क्रियाविशेषण शब्दों से क्रिया की मात्रा या नाप तौल आदि की विशेषता का बोध होता है। उन्हें परिमाणवाचक क्रियाविशेषण कहा जाता है।
अन्य शब्दों में — ​जिन शब्दों से क्रिया के परिणाम या क्रिया की मात्राा की जानकारी मिलती है। वे परिमाणवाची क्रियाविशेषण कहलाते है।
दूसरे शब्दों में –जो शब्द क्रिया के परिमाण (मात्रा) से सम्बद्ध विशेषता प्रकट करें, उन्हें ‘परिमाणवाचक क्रियाविशेषण’ कहते है।
जैसे-
  • थोडा खाओ,खूब चबाओ।
  • उतना खाइए,जितना खा सके
  • लडडू में मीठा बराबर डाला है।
  • कार में पेट्रोल कम रह गया है।
  • पजामें के लिए कपडा अधिक कट गया है।
इन वाक्यों में आए क्रियाविशेषण शब्द थोडा —खूब,उतना—जितना,बराबर ,कम  अधिक आदि  परिमाणवाचक क्रियाविशेषण-​ है।

परिमाणवाची क्रियाविशेषणों की पहचान

—परिमाणवाचक क्रियाविशेषणों की प​हचान के लिए क्रिया पर कितना/कितनी/कितने प्रश्नवाचक शब्दों से प्रश्न करना चाहिए। इन प्रश्नों के उत्तर में प्राप्त होने वाले शब्द परिमाणवाची क्रियाविशेषण होते है। जैसे
  • आज तो दावत में सब ने खुब खाया —— कितना खाया———उत्तर खूब
  • तुम सबके बीच में कम बोलना————कितना बोलना———— उत्तर कम
कुछ अन्य परिमाणबोधक क्रिया-विशेषण शब्द- बहुत, इतना,उतना, कम,जितना, थोड़ा, पर्याप्त, जरा, खूब, अत्यन्त, तनिक, बिलकुल, स्वल्प, केवल, सर्वथा, अल्प आदि।

परिमाणबोधक क्रिया-विशेषण कई प्रकार के होते हैं-

(क) अधिकताबोधक– बहुत, अति, बड़ा, बिलकुल, सर्वथा, खूब, निपट, अत्यन्त, अतिशय।
(ख) न्यूनताबोधक- कुछ, लगभग, थोड़ा, टुक, प्रायः, जरा, किंचित्।
(ग) पर्याप्तिवाचक- केवल, बस, काफी, यथेष्ट, चाहे, बराबर, ठीक, अस्तु।
(घ) तुलनावाचक- अधिक, कम, इतना, उतना, जितना, कितना, बढ़कर।
(ड़) श्रेणिवाचक- थोड़ा-थोड़ा, क्रम-क्रम से, बारी-बारी से, तिल-तिल, एक-एककर, यथाक्रम।
अर्थ के अनुसार क्रिया -विशेषण अव्यय के कुछ अन्य भेद हैं :-
  • विधि बोधक  क्रिया-विशेषण
  • निश्चयवाचक क्रिया-विशेषण-
  • अनिश्चयवाचक क्रिया-विशेषण-
  • निषेधवाचक क्रिया-विशेषण-
  • कारणवाचक क्रिया-विशेषण
विधि बोधक  क्रिया-विशेषण :— जिन क्रिया विशषणों के द्वारा किसी भी कार्य करने की विधि यय गति/चाल आदि का बोध होता है।उसे विधि बोधक रीतिवाचक क्रिया-विशेषण कहते है।
जैसे
  • वह धीरे धीरे चलता है।
  • पाठ को ध्याानपूर्वक पढना।
  • राम तेज गति में दौडता है।
उपर्युक्त वाक्यों में ध्याानपूर्वक,सहसा,हाथोंहाथ,सुखपूर्वक,परिश्रमपूर्वक, धीरे धीरे तेज आदि शब्द रीतिवाचक क्रिया-विशेषण है।
निश्चयवाचक क्रिया-विशेषण- जो शब्द क्रिया में निश्चय संबंधी विशेषता को प्रकट करें, उन्हें निश्चयवाचक क्रिया-विशेषण कहते हैं।
जैसे-
  • मैं वहाँ अवश्य जाऊँगा।
  • वह निःसंदेह सफल होगा।

उपर्युक्त वाक्यों में ‘अवश्य’ और ‘निःसंदेह’ निश्चयवाचक क्रिया-विशेषण हैं,—कुछ अन्य निश्चयवाचक क्रिया-विशेषण- अलबत्ता, जरूर, बेशक आदि।

अनिश्चयवाचक क्रिया-विशेषण- जो क्रिया विशेषण शब्द क्रिया में अनिश्चय संबंधी विशेषता को प्रकट करें, उन्हें अनिश्चयवाचक क्रिया-विशेषण कहते हैं।
जैसे-
  • वह शायद चला जाए।
  • राम संभवतः न पहुँच पाए।
उपर्युक्त वाक्यों में ‘शायद’ और ‘संभवतः’ अनिश्चयवाचक क्रिया-विशेषण हैं
निषेधवाचक क्रिया-विशेषण- जो शब्द क्रिया के करने या होने का निषेध प्रकट करें, उन्हें निषेधवाचक क्रिया-विशेषण कहते हैं।जैसे-
  • यहाँ मत बैठो।
  • मैं कुछ नहीं कहूँगा।
इन वाक्यों में ‘मत’ और ‘नहीं’ निषेधवाचक क्रिया-विशेषण हैं क्योंकि वे क्रमशः ‘बैठो’ और ‘कहूँगा’ क्रियाओं के निषेध का बोध कराते हैं।
कारणवाचक क्रिया-विशेषण- जो शब्द क्रिया के होने या करने का कारण बताएँ, उन्हें कारणवाचक क्रिया-विशेषण कहते हैं।
जैसे-
  • दुर्बलता के कारण वह चल नहीं सकता।
  • ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी, इसलिए वह सो गया।
इन वाक्यों में ‘कारण’ और ‘इसलिए’ क्रमशः ‘न चल सकने’ और ‘सोने’ का कारण बताते हैं।

क्रिया विशषणों की रचना  के आधार पर

कुछ शब्द मूलत: क्रिया विशेषण होते है। और कुछ क्रिया विशेषणों की रचना की जाती है। किसी भी मूल शब्द के साथ प्रत्यय लगाकर तथा समास द्वारा क्रिया विशेषण बनाए जाते है। अर्थात  हम कह सकते है। कि

रूप के आधार पर क्रियाविशेषण अव्यय के तीन  भेद होते है।  :-

  1. मूल क्रियाविशेषण
  2. यौगिक क्रियाविशेषण
  3. स्थानीय क्रियाविशेषण

 

(i) मूल क्रियाविशेषण– जो किसी अन्य शब्द अथवा प्रत्यय के योग के बिना ही प्रयोग में लाए जाते है। वे मूल क्रियाविशेषण कहलाते है।

दूसरे शब्दों में— ऐसे क्रियाविशेषण, जो किसी दूसरे शब्दों के मेल से नहीं बनते, ‘मूल क्रियाविशेषण’ कहलाते हैं।

जैसे-  यहॉ ,वहॉं कम, अधिक,बराबर, थोडा,कल, आज,उपर , अचानक,निकट  ठीक, दूर, अचानक, फिर, नहीं आदि।

(ii) यौगिक क्रियाविशेषण- ऐसे शब्द जो  समास द्वारा बनते है।  या फिर शब्दों के साथ प्रत्यय लगाकर बनते है।  ऐसे शब्द यौगिक क्रियाविशेषण कहलाते है।

 

दूसरे शब्दों में– ऐसे क्रियाविशेषण, जो किसी दूसरे शब्द में प्रत्यय या पद जोड़ने पर बनते हैं, ‘यौगिक क्रियाविशेषण’ कहलाते हैं।

जैसे-  यथाशक्ति , प्रेमपूर्वक ,रातों रात, धीरे धीरे ,चुपके चुपके मन से, जिससे, चुपके से, भूल से, देखते हुए, यहाँ तक, झट से, वहाँ पर। यौगिक क्रियाविशेषण संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, धातु और अव्यय के मेल से बनते हैं।

यौगिक क्रियाविशेषण नीचे लिखे  निम्न शब्दों के मेल से बनते हैं-

संज्ञा से——

  • रात+ भर —रातभर ,
  • प्रेम+  पूर्वक  ———प्रेमपूर्वक,
  • प्रात:, सायं, सुबह आदि

संज्ञाओं की द्विरुक्ति से

  • घर-घर,
  • घड़ी-घड़ी,
  • बीच-बीच,
  • हाथों-हाथ आदि ।

दो भित्र संज्ञाओं के मेल से-

  • दिन-रात,
  • साँझ-सबेरे,
  • घर-बाहर,
  • देश-विदेश आदि ।

सर्वनाम से

  • यहॉं वहॉं,
  • अब, तक
  • इसलिए,आदि

 

सर्वनाम की द्विरुक्ति से

  • मैं —मेरा,
  • उससे — इससे ,
  • तुम— तुमहारा आदि।

विशेषण से——

  • कम, अधिक,बहुत,तेज,धीरे,पहला आदि।

विशेषणों की द्विरुक्ति से———-

  • एक-एक,
  • ठीक-ठीक,
  • साफ-साफ आदि ।

क्रिया से —

  • आते– जाते
  • उठते— बैठते
  • खाते —नीते आदि।

क्रियाविशेषणों की द्विरुक्ति से-—

  • धीरे-धीरे,
  • जहाँ-तहाँ,
  • कब-कब,
  • कहाँ-कहाँ आदि ।

दो क्रियाविशेषणों के मेल से-—

  • जहाँ-तहाँ,
  • जहाँ-कहीं,
  • जब-तब,
  • जब-कभी,
  • कल-परसों,
  • आस-पास आदि ।

दो भित्र या समान क्रियाविशेषणों के बीच ‘न’ लगाने से-

  • कभी-न-कभी,
  • कुछ-न-कुछ।

विलोम शब्दों से ——

  • रात दिन
  • सुबह शाम,
  • देश परदेश,
  • यहॉं वहॉं आदि।

 

शब्दों की आवृति से

  • जल्दी— जल्दी,
  • धीरे— धीरे,
  • घर— घर
  • फटाफट– हाथोंहाथ आदि।

अनुकरण वाचक शब्दों की द्विरुक्ति से-

  • पटपट, तड़तड़, सटासट, धड़ाधड़।

संज्ञा और विशेषण के योग से-

  • एक साथ,
  • एक बार,
  • दो बार।

अव्यय और दूसरे शब्दों के मेल से-

  • प्रतिदिन, यथाक्रम, अनजाने, आजन्म।

पूर्वकालिक कृदन्त और विशेषण के मेल से-

  • विशेषकर, बहुतकर, मुख़्यकर, एक-एककर

क्रिया विशेषण की विशेषता बताने वाले शब्द क्रिया विशेषण  कहलाते हैं। इन्हें क्रिया प्रविशेषण भी कहा जा सकता है।—

  • जरा अधिक उचॉं बोलो।
  • गीता बहुत मधुर गाती है।
  • वह बहुत तेज दौडती है।

स्थानीय क्रियाविशेषण– ऐसे क्रियाविशेषण, जो बिना रूपान्तर के किसी विशेष स्थान में आते हैं, ‘स्थानीय क्रियाविशेषण’ कहलाते हैंजैसे-

  • वह अपना सिर पढ़ेगा।
  • वह दौड़कर चलते हैं।
  • तुम तेज भागकर पकडते हों

प्रयोग के आधार पर क्रिया -विशेषण अव्यय के भेद :-

  1. साधारण क्रियाविशेषण अव्यय
  2. संयोजक क्रियाविशेषण अव्यय
  3. अनुबद्ध क्रियाविशेषण अव्यय

 

साधारण क्रियाविशेषण अव्यय :- जिन शब्दों का प्रयोग वाक्यों में स्वतंत्र रूप से किया जाता है उन्हें साधारण क्रियाविशेषण अव्यय कहते हैं।जैसे :- (i)

  • हाय! अब मैं क्या करूँ।
  • बेटा जल्दी जाओ !
  • अरे! वह सांप कहाँ गया ?

 

संयोजक क्रियाविशेषण अव्यय :- जिन शब्दों का संबंध किसी उपवाक्य के साथ होता है उन्हें संयोजक क्रियाविशेषण अव्यय कहते हैं।जैसे :-

  • जब अंकित ही नहीं तो मैं जी कर क्या करूंगी।
  • जहाँ पर अब समुद्र है वहाँ पर कभी जंगल था।

अनुबद्ध क्रियाविशेषण अव्यय :- जिन शब्दों का प्रयोग निश्चय के लिए किसी भी शब्द भेद के साथ किया जाता है उन्हें अनुबद्ध क्रियाविशेषण अव्यय कहते हैं।

जैसे :-

  • मैंने उसे देखा तक नहीं।
  • आपके आने भर की देर है।

 

विशेषण और  क्रियाविशेषणों के समानार्थक शब्दों अंतर

  • कई विशेषण शब्द क्रियाविशेषण के रूप में भी प्रयोग में लाए जाते है।

विशेषण शब्द जब क्रिया से पहले आएॅंगे वे तभी क्रिया विशेषण होगें यदि वे संज्ञा से पहले आएॅंगें तो विशेषण ही रहेंगें जैसे ——

  • राहुल कम बोलता है। —क्रियाविशेषण
  • राम चाय में कम चीनी पीता है। ————क्रियाविशेषण
  • शशि तेज दौडती है।————क्रियाविशेषण
  • शशि कक्षा का तेज विद्याथी है।———विशेषण
  • बाएॅ मुडते ही एयरफोर्स स्कूल है।———क्रियाविशेषण
  • बाएॅं हाथ पर कैम्ब्रिज फाउडेंशन है।—————विशेषण

 

न,नहीं , और मत — इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

न  के उदहारण तथा प्रयोग

इनका प्रयोग निषेध के अर्थ में होता है। ‘न’ से साधारण-निषेध  अर्थ निकलता है।  जैसे

  • रोगी न खा सका।
  • तुम न करोगे, तो वह कर देगा।
  • न’ तुम सोओगे, न वह।
  • जाओ न, रुक क्यों गये ?

नहीं —के उदहारण तथा प्रयोग

इनका प्रयोग निषेध के अर्थ में होता है।’नहीं’ से निषेध का निश्र्चय सूचित किया जाता  है। ‘न’ की अपेक्षा ‘नहीं’  पर अधिक जोर दिया जाता  है।

  • अंजलि को गणित नहीं आता
  • राधा को चलना नहीं आता
  • तुम नहीं जा सकते।
  • मैं  नहीं जाऊँगा।
  • मैं काम नहीं कर सकता।
  • मैंने पत्र नहीं लिखा।

मत-के उदहारण तथा प्रयोग

इनका प्रयोग निषेध के अर्थ में होता है।’मत’ का प्रयोग निषेधात्मक आज्ञा के लिए होता है। जैसे

  • निंदा करके चरित्र मत गिराओ।
  • झूठ मत बोलो।
  • भीतर मत जाओ।
  • तुम यह काम मत करो।

 

——— इन वाक्यों में आए न,नहीं,और मत क्रिया विशेषण है।

कहाँ-कहीं-  इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

कहाँ’ शब्द  किसी निश्र्चित स्थान का बोधक होता  है और ‘

जैसे-

  • वह कहाँ गया ?
  • मैं कहाँ आ गया ?
  • कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली!

कहीं- के उदहारण तथा प्रयोग

‘कही’ शब्द का प्रयोग  किसी अनिश्र्चित स्थान का परिचायक रूप में किया जाता है। कभी-कभी ‘कही’ निषेध के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है; जैसे-

  • वह कहीं भी जा सकता है।
  • उसे कहीं भी अकेला छोड दो।
  • तुम कहीं भी रह सकते हों।

अन्य अर्थों में भी ‘कही’ का प्रयोग होता है-

  •  बहुत अधिक- यह पुस्तक उससे कहीं अच्छी है।
  • कदाचित्- कहीं बाघ न आ जाय।
  • विरोध- राम की माया, कहीं धूप कहीं छाया।

बाद-पीछे- इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

बाद-पीछे-के उदहारण तथा उनका प्रयोग

‘बाद’ काल का और ‘पीछे’ समय का सूचक है। जैसे-

  • बाद- वह एक सप्ताह बाद आया।
  • पीछे– वह पढ़ने में मुझसे पीछे है।

 

इनके अन्य भी उदहारण है। जैसे कि————

अब-अभी ,तब-फिर, ,केवल-मात्र,भला-अच्छा- ,प्रायः-बहुधा इन सभी क्रिया विशेषणों में सूक्ष्म अंतर पाया जाता है।

1).अब और अभी इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

अब का प्रयोग

  • अब का प्रयोग वर्तमान समय की अनिश्चिता के बारे में बतलाने के लिए किया जाता  है।

उदहारण के लिए

  • राज अब घर जाएगा—
  • अब आप जा सकते हैं।
  • अब आप क्या करेंगे ?

इन वाक्यों  में वर्तमान समय की अनिश्चिता के बारे में बताया गया है।

अभी का प्रयोग 

  • कार्य के तुरंत होने के सबंधं बताया गया है।

उदहारण  के लिए

  • रूको, अभी आती हूॅं।
  • अभी खाना खया है।
  • अभी-अभी आया हूँ।
  • अभी पाँच बजे हैं।

इन वाक्यों में कार्य के तुरंत होने का सबंधं बताया गया है।

तब-फिर का प्रयोग इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

तब शब्द का प्रयोग

हम  बीते हुए समय का बोध कराने के लिए करते है।  है और ‘फिर’ भविष्य की ओर संकेत करता है।अर्थात ‘तब’ का अर्थ ‘उस समय’ से सम्बधित  है।

जैसे-

  • तब तुम लचे गए थे।
  • तब तुमने देखा नहीं थां
  • तब उसने कहा।
  • तब की बात कुछ और थी।

 

फिर का प्रयोग

फिर शब्द का प्रयोग हम दुबारा किसी शब्द के अर्थ को बताने के लिए करते है।  अर्थात फिर’ का अर्थ’दुबारा’ होता  है।

उदहारण के लिए

  • फिर आप वहॉ चले जाओ।
  • फिर आप भी क्या कहेंगे।
  • फिर ऐसा होगा।

 

केवल-मात्र-  का प्रयोग —इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

केवल का प्रयोग अकेला एक अर्थ को दर्शाने लिए किया जाता हैै

केवल का प्रयोग

उदहारण के लिए

  • आज हम केवल दूध पीकर रहेंगे।
  • यह काम केवल वह कर सकता है।

 

मात्र का प्रयोग —

सम्पूर्णता के अर्थ सूचित करने के लिए किया जाता है;

जैसे-

  • मुझे पाँच रूपये मात्र मिले।

 

भला-अच्छा- —इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

भला’ अधिकतर विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है, पर कभी-कभी संज्ञा के रूप में भी आता है;जैसे-

  • भला का भला फल मिलता है।

अच्छा’ स्वीकृतिमूलक अव्यय है। यह कभी अवधारण के लिए और कभी विस्मयबोधक के रूप में प्रयुक्त होता है। जैसे-

  • अच्छा, कल चला जाऊँगा।
  • अच्छा, आप आ गये !

प्रायः-बहुधा- —

इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

  • दोनों का अर्थ ‘अधिकतर’ है, किन्तु ‘प्रायः’ से ‘बहुधा की मात्रा अधिक होती है।
  • प्रायः- बच्चे प्रायः खिलाड़ी होते हैं।
  • बहुधा- बच्चे बहुधा हठी होते हैं

संबंधबोधक अव्यय

संज्ञा और  सर्वनाम  के बाद आकर उनका संबंध वाक्य के अन्य शब्दों के साथ प्रकट करने वाले अव्यय शब्दों  को संबंधबोधक अव्यय कहते है।
दूसरे शब्दों में ———जो अव्यय शब्द अपने पूर्व आने वाले शब्द के साथ संबंध प्रकट करें ,वह  संबंधबोधक अव्यय कहलाता है। इनके पहले किसी ना किसी परसर्ग की अपेक्षा रहती है। जैसे
  •  छत पर कबूतर बैठा है।
  •  राम भोजन के बाद जायेगा।
  •  मोहन दिन भर खेलता है।
  • छत के ऊपर राम खड़ा है।
  • रमेश घर के बाहर पुस्तक रख रहा था।
  • पाठशाला के पास मेरा घर है।
  • विद्या के बिना मनुष्य पशु है।
सरल शब्दों में ——जिन अव्यय शब्दों के कारण संज्ञा के बाद आने पर दूसरे शब्दों से उसका संबंध बताते हैं उन शब्दों को संबंधबोधक शब्द कहते हैं। ये शब्द संज्ञा से पहले भी आ जाते हैं।जैसे-
  • दूर, पास, अन्दर, बाहर, पीछे, आगे, बिना, ऊपर, नीचे आदि।
अन्य शब्दों में—— संबंधबोधक शब्द का अर्थ है— संबंध का बोध् कराने वाला, अर्थात वाक्य में ये संज्ञा या सर्वनाम के बाद प्रयुक्त होते है। तथा वाक्य के अन्य संज्ञा/ सर्वनाम पदों के साथ संबंध बताते है। जैसे-
——
  • राहुल के साथ उसका भाई नहीं आया।
  • पोस्ट आफिस के सामने लोग खडे हैं। म
  • मुझे बैंक के बाद बाजार जाना है।
  • मॉं के ​बिना घर घर सूना सूना लगता है।
  • झरने के आसपास पहाडियॉं है।
  • हैदराबाद ,के निकट गोलकोंडा है।
इन वाक्यों में आए शब्द के साथ,के सामने ,के बाद,के ​बिना ,आसपास ,के निकट आदि संबंधबोधक अव्यय है।
संबंधबोधक अव्ययों के कुछ और उदाहरण निम्नलिखित है –
अपेक्षा , सामान , बाहर ,  भीतर ,  पूर्व , पहले , आगे , पीछे , संग , सहित , बदले , सहारे , आसपास  , भरोसे ,  मात्र , पर्यंत , भर , तक , सामने, भर , के ऊपर , की और , कारण , ऊपर , नीचे , बाहर , भीतर , बिना , सहित , पीछे , से पहले , से लेकर , तक , के अनुसार , की खातिर , के लिए  आदि।

विशेष-

सम्बन्धबोधक शब्दों  का  सम्बन्ध दर्शाना आवश्यक होता है। जब यह सम्बन्ध न जोड़कर साधारण रूप में प्रयोग होता है तो यह क्रिया-विशेषण का कार्य करता है। इस प्रकार एक ही शब्द क्रिया-विशेषण भी हो सकता है और सम्बन्धबोधक भी। जैसे-
  • सम्बन्धबोधक        ————————क्रिया-विशेषण
  • दुकान ‘पर’ ग्राहक खड़ा है।—————————दुकान ‘पर’ खड़ा है।
  • मेज के ‘ऊपर’ किताबें है।——————————मेज के ‘ऊपर’ है।

सम्बन्धबोधक के भेद

सम्बन्धबोधक अव्यय के तीन आधार है।
  • प्रयोग
  • अर्थ
  • उत्पत्ति
प्रयोग के आधार पर सम्बन्धबोधक अव्यय के निम्नलिखित भेद है ।
  •  सम्बद्ध
  • अनुबद्ध
सम्बद्ध सम्बन्धबोधक — जो शब्द संज्ञा की विभक्तियों के पश्चात /पीछे आने वाले सम्बन्धबोधक शब्दों को सम्बद्ध सम्बन्धबोधककहते है।
जैसे
  • कुरूक्षेत्र से दूर जलंधर है।
  • घी के बिना सब्जी नहीं बनेगी
  • रीना से पहले सीमा को बुलाओ।
  • नानी के अतिरिक्त मधु भी पार्टी में आई थी।
इन वाक्यों में  आए—अतिरिक्त,पहले, बिना,दूर सम्बद्ध सम्बन्धबोधक है। ये संज्ञा की विभक्ति के और से के बाद आई है।
असम्बद्ध सम्बन्धबोधक —जो शब्द संज्ञा शब्द  के बदले हुए रूपों के पश्चचात आने वाले सम्बन्धबोधक शब्दों को  असम्बद्ध सम्बन्धबोधक कहते है।
जैसे—
  • मजदूर तक सीढीयॉं पहुचा आओ।
  • भाई मुळी भर चावल को तरसते है।
  • नेताओं सहित कर्मचारी गिरफतार किए गए।
इन वाक्यों में  आए संज्ञ शब्दों के परिवर्तित रूप के पश्चात आए सम्बन्धबोधक शबद तक सहित और भर असम्बद्ध सम्बन्धबोधक शब्द है।

अर्थ के अनुसार-

— कालवाचक,स्थानवाचक,दिशावाचक,साधनवाचक,हेतुवाचक ,विषयवाचक ,व्यतिरेकवाचक,,विनिमयवाचक,सादृश्यवाचक ,विरोधवाचक ,सहचरवाचक,संग्रहवाचक ,तुलनावाचक 

 अर्थ के आधार पर  सम्बन्धबोधक के भेद
क्रमभेदउदहारण
1समतावाचकसा, अनुसार ,तरह,सम्मान,जैसे ,भॉति,नाई बराबर, आदि।
2पृथक वाचकअलग ,परे , दूर हटकर आदि।
3विनिमयवाचकपलटे, बदले, जगह, एवज।
4संग्रहवाचकभर, मात्र ,तक, लौं, पर्यन्त आदि।
5व्यतिरेकवाचकसिवा, अलावा, बिना, बगैर, अतिरिक्त, रहित।
6कालवाचकआगे, पीछे, बाद, पहले, पूर्व, अनन्तर, पश्र्चात्, उपरान्त, लगभग।
7दिशावाचकओर, तरफ, पार, आरपार, आसपास, प्रति।
9साधनवाचकद्वारा, जरिए, हाथ, मारफत, बल, कर, जबानी, सहारे।
10हेतुवाचकलिए, निमित्त, वास्ते, हेतु, खातिर, कारण, मारे, चलते।
11विषयवाचकबाबत, निस्बत, विषय, नाम, लेखे, जा,भरोसे।
12सादृश्यवाचक समान, तरह, भाँति, नाई, बराबर, तुल्य, योग्य, लायक, सदृश, अनुसार, अनुरूप,अनुकूल, देखादेखी, सरीखा, सा, ऐसा, जैसा, मुताबिक।
13विरोधवाचकविरुद्ध, खिलाप, उलटे, विपरीत।
14सहचरवाचक संग, साथ, समेत, सहित, पूर्वक, अधीन, स्वाधीन, वश।
15तुलनावाचकअपेक्षा, बनिस्बत, आगे, सामने।
16स्थानवाचकआगे, पीछे, नीचे, तले, सामने, पास, निकट, भीतर, समीप, नजदीक, यहाँ, बीच, बाहर, परे, दूर।
(3) व्युत्पत्ति के आधार पर  सम्बन्धबोधक के भेद
  • मूल सम्बन्धबोधक
  •  यौगिक सम्बन्धबोधक-

(i) मूल सम्बन्धबोधक
– हिेदी, संस्कृत और उर्दू भाषाओं के संबंधबोधक शब्द जो मूल रूप से ही सम्बन्धबोधक हैं।
 कुछ मूल सम्बन्धबोधक हैं।-
जैसे
  •  बिना, पूर्वक, पर्यन्त, नाई, खातिर,मार्फ़त सिवाय तरफ इत्यादि।
(ii) यौगिक सम्बन्धबोधक- संज्ञा,विशेषण, क्रिया ,क्रियाविशेषण शब्दों से बनने वाले सम्बन्धबोधक यौगिक सम्बन्धबोधक कहते है।
जैसे

संज्ञा से बने –

  • जगह, द्वारा,कारण पलट,संग , लेखे, अपेक्षा, मारफत।

विशेषण से बने– 

  • ऐसा,जैसा,विरूद्ध, तुल्य, समान, उलटा, ऐसा, योग्य।
क्रिया से बने——
  •  जोडकर,लेकर,लिए, मारे, चलते, कर, जाने।
क्रियाविशेषण से बने
  • आगे ,इधर ,उधर,नीचे, ऊपर, भीतर, यहाँ, बाहर, पास, परे, पीछे।
सम्बन्धबोधक अव्ययों का प्रयोग तीन प्रकार से होता है।
  • विभक्ति सहित सविभक्तिक
  • विभक्ति रहित निर्विभक्तिक
  • उभय विभक्तिक
विभक्ति सहित ———जो अव्यय शब्द विभक्ति के साथ संज्ञा या सर्वनाम के बाद लगते हैं उन्हेंविभक्ति सहित/ सविभक्तिक कहते हैं। जिन शब्दों में — आगे, पीछे, समीप, दूर, ओर, पहले आते हैं वहाँ पर सविभक्तिक होता है।
जैसे —
  • घर के पीछे पेड है।
  • घर के आगे स्कूल है।
  • उत्तर की ओर पर्वत हैं।
विभक्ति रहित:- जो शब्द विभक्ति के बिना संज्ञा के बाद प्रयोग होते हैं उन्हें  विभक्ति रहित/निर्विभक्तिक कहते हैं।
जिन शब्दों में — भर, तक, समेत, पर्यन्त आते हैं वहाँ पर निर्विभक्तिक होता है।
उदाहरण
  • उसने जीवन पर्यन्त वचन निभाया।
  • वह रात तक लौट आया।
  • वह जीवन पर्यन्त ब्रह्मचारी रहा।
  • वह बाल बच्चों समेत यहाँ आया।
उभय विभक्ति:– जो अव्यय शब्द विभक्ति रहित और विभक्ति सहित दोनों प्रकार से आते हैं उन्हें उभय विभक्ति कहते हैं। जिन शब्दों में — द्वारा, रहित, बिना, अनुसार आते हैं वहाँ पर उभय विभक्ति होता है।
उदाहरण
  • पत्र के द्वारा सूचित करो।
  • पत्र द्वारा सूचित करो।
  • पत्रों के द्वारा संदेश भेजे जाते हैं।
  • रीति के अनुसार काम होना है
क्रिया-विशेषण और सम्बन्धबोधक में अंतर
यदि अव्यय शब्द क्रिया-विशेषण की विशेषता प्रकट करने के साथ साथ अन्य किसी संज्ञा अथवा सर्वनाम के साथ सम्बंंधित  हो या संबंध स्थापित होता है। तो सम्बन्धबोधक कहलाता है,अन्यथा क्रिया-विशेषण कहलाता है।  अर्थात
अनेक शब्द क्रिया-विशेषण भी हैं तथा सम्बन्धबोधक भी। प्रयोग में जब ये क्रिया की विशेषता प्रकट करें, तब क्रिया-विशेषण कहलाते हैं
तथा जब संज्ञा अथवा सर्वनाम के साथ आकर उनका वाक्य के शेष शब्दों के साथ संबंध बताएँ तब सम्बन्धबोधक।
जैसे-
  • दिव्या स्वाति से मधुर गाती है। (सम्बन्धबोधक)
  • दिव्या मधुर गाती है। (क्रिया-विशेषण)
  • आप उसके पीछे चलिए। (सम्बन्धबोधक)
  • आप पीछे चलिए। (क्रिया-विशेषण)
  • समीर छत के उपर बैठा है। (सम्बन्धबोधक)
  • समीर उपर बैठा है (क्रिया-विशेषण)

 समुच्चयबोधक अव्यय :

कुछ अविकारी शब्द दो पदों,दो पदबंधों या दो उपवाक्यों को जोडने का कार्य करते है ‘योजक ‘या’ समुच्चयबोधक अव्यय कहा जाता है।  अर्थात
जो अविकारी शब्द दो पदों,दो पदबधों या दो उपवाक्यों को जोडने का कार्य करते है ‘योजक अथवा समुच्चयबोधक अव्यय  कहलाते है।
जैसे—
  • शब्द+ शब्द——— —–दाल और चावल
  • पद+ पद—————– मुझे कलम व दवात चाहिएं
  • पदबंध +पदबंध ———–मेरे स्कूल के लडके और तुम्हारे स्कूल की लडकियॉं पिकनिक पर जा रहे है।
  • उपवाक्य+ उपवाक्य ———-माता जी खाना बना रही है और पिताजी अखबार पढ रहे है।
दूसरे शब्दों में —जो शब्द दो शब्दों , वाक्यों और वाक्यांशों को जोड़ते हैं उन्हें समुच्चयबोधक अव्यय कहा जाता है। ये शब्द दो वाक्यों को परस्पर जोड़ते हैं इन्हें योजक भी कहते है।
सरल शब्दो में- दो वाक्यों को परस्पर जोड़ने वाले शब्द समुच्चयबोधक अव्यय कहे जाते है।
जैसे –
  • यद्यपि, चूँकि, परन्तु, और किन्तु आदि।
उदहारण के लिए:—
  • सुमीता या किरण ने पुस्तक ली थी।
  • मॉं ने समझाया था परन्तु पुत्र समझा नहीं।
  • पुलिस पहुॅंच गई अन्यथा दगां हो जाता
  • राधा,अनु,और प्रिया ने पुरस्कार जीते।
  • राजू को जगा दो क्योंकि उसे गाडी पकडनी हैं।
इन वाक्यों में आए शब्द —और , तथा,या,अन्यथा,क्योंकि,औा परंतु  आदि समुच्चयबोधक अव्यय  है।
समुच्चयबोधक के भेद
समुच्चयबोधक के दो मुख्य भेद हैं-
  •  समानाधिकरण समुच्चयबोधक (Co-ordinative Conjunction)
  •  व्यधिकरण समुच्चयबोधक (Subordinative Conjunction)
(1) समानाधिकरण समुच्चयबोधक-ऐसे समुच्चयबोधक शब्द जिनसे समान पदों, शब्दों, वक्याशों ,पदबधों, उपवाक्यों को जोडा जाता है, समानाधिकरण समुच्चयबोधक कहलाते हैं जैसे——
सरल शब्दों में——जिन पदों या अव्ययों द्वारा मुख्य वाक्य जोड़े जाते है, उन्हें ‘समानाधिकरण समुच्चयबोधक’ कहते है।
दूसरे शब्दों में– समान स्थिति वाले दो या दो से अधिक शब्दों, पदबंधों या उपवाक्यों को जोड़ने वाले शब्दों को समानाधिकरण समुच्चयबोधक कहते हैं।
उदहारण के लिए——
  • अध्यापक पढा रहा था और विद्यार्थी पढ रहे थे।
  • विकास को बुखार था इसलिए वह विद्यालय नहीं गया।
  • दादाजी ने वर एवं वधू को आर्शीवाद दिया।
  • रूपावली तथा वसुधा ने नृत्य किया।
इन वाक्यों में आए और इसलिए, एवं,या और तथा समानाधिकरण समुच्चयबोधक हैं, क्योंकि ये दो या दो से
अधिक पदों, पदबंधों,उपवाक्यों को जोड रहें है।

समानाधिकरण समुच्चयबोधक के चार उपभेद हैं

 

  • संयोजक समानाधिकरण समुच्चयबोधक
  • विभाजक समानधिकरण समुच्चयबोधक
  • विरोधदर्शक समानधिकरण समुच्चयबोधक
  • परिणामदर्शक समानधिकरण समुच्चयबोधक
संयोजक समानाधिकरण समुच्चयबोधक– जो समानाधिकरण समुच्चयबोधक दो समान शब्दों,वाक्याशों और वाक्यों को जोडते है। उन्हें संयोजक समानाधिकरण समुच्चयबोधक कहते है।
अन्य शब्दों में— जो शब्द, शब्दों या वाक्यों को जोड़ने का काम करते है, उन्हें संयोजक कहते है।
दूसरे शब्दों में– दो शब्दों, पदबंधों या उपवाक्यों को आपस में जोड़ने वाले अव्यय को संयोजक कहते हैं।
जैसे-
जोकि, कि, तथा, व, एवं, और आदि।
उदहारण के लिए——
  •  कैलाशचंद्र के पुत्र और सुभाष की पुत्री का जन्मोत्सव मनाया जाता है।
  • तरूण तथा वरूण ने वाद— विवाद प्रतियोगिता जीती।
  • कुलदीप ने विज्ञान विषय ​लिए एंव मनदीप ने वणिज्य विषय लिए।
  • रीतिका समोसा खिलाएगी व ऋतु जलेबियॉं खिलाएगी।
इन वाक्यों में आए— और, तथा,एवं, व ,शब्द सयोंजक समानधिकरण समुच्चयबोधक है।
विभाजक समानधिकरण समुच्चयबोधक- जो समुच्चयबोधक अव्यय, शब्दों ,वाक्याशों और उपवाक्यों में विभाजन तथा विकल्प करते है,उन्हें विभाजक समानधिकरण समुच्चयबोधक कहते है।
सरल शब्दों में———जो शब्द, विभिन्नता प्रकट करने के लिए प्रयुक्त होते है, उन्हें विभाजक कहते है।
दूसरे शब्दों में– दो या दो से अधिक बातों में से एक की स्वीकृति अथवा दोनों की अस्वीकृति बताने वाले अव्यय को विभाजक कहते हैं।
जैसे-
  • या, वा, अथवा, किंवा, कि, चाहे, न…. न, न कि, नहीं तो, ताकि, मगर, तथापि, किन्तु, लेकिन आदि विभाजक समानधिकरण समुच्चयबोधक होते है।
उदाहरण-
  • पेन से लिखिए चाहें पेसिल से लिखिए।
  • न सुधा जाएगी ना सोम जाएगा।
  • तैयार हो जाओ नहीं तो माता जी डाटेंगी।
  • जूते खराद लों अथवा चप्पले ले लों
  • कॉपी मिल गयी किन्तु किताब नही मिली।
 विरोधदर्शक समानधिकरण समुच्चयबोधक-ऐसे शब्द जो दो वाक्यों को जोडते है,विरोधदर्शक  समानधिकरण समुच्चयबोधक कहलाते है।
दूसरे शब्दों में ——दो वाक्यों में परस्पर विरोध प्रकट करके उन्हें जोड़ने वाले अथवा प्रथम वाक्य में कही गयी बात का निषेध दूसरे वाक्य में करने वाले अव्यय को विरोधदर्शक कहते हैं।
जैसे- किन्तु, परन्तु, पर, लेकिन, मगर, वरन, बल्कि।
उदाहरण-
  • गोपाल ही नहीं आया बल्कि बबली भी आई ।
  • परिवार के सभी सदस्य पहुचें मगर लोकेश नहीं पहुॅचा।
  • मोहन की बुद्धि तीव्र है किन्तु वह आलसी है।
  • मेरा मित्र इस गाड़ी से आने वाला था, परन्तु वह नहीं आया।
(v) परिणामदर्शक समानधिकरण समुच्चयबोधक दो समुच्चयबोधक दो वाक्यों को मिलाकर दूसरे वाक्य को पहले वाक्य के परिणाम के रूप में दर्शाता है, उसे  परिणामदर्शक समानधिकरण समुच्चयबोधक कहते है।
 दूसरे  शब्दों में ——प्रथम वाक्य का परिणाम या फल दूसरे वाक्य में बताने वाले अव्यय को परिणामदर्शक कहते हैं।
जैसे-
  • अन्यथा, फलत:,ताकि, इसलिए, अतः, सो, अतएव।परिणामदर्शक होते है।
उदाहरण-
  • दूध नहीं था अत: चाय न बन सकी।
  • बॉंध टूट गया इसलिए नगर जलमगन हो गया।
  • समय पर पहुचों ताकि प्रधानमंत्री से मिल सकों।
  • वह बीमार था इसलिए पाठशाला नहीं गया।
  • वर्षा हो रही थी अतः मैं घर से नहीं निकला।
इन वाक्यों में ‘इसलिए’ और ‘अतः’ अव्यय प्रथम वाक्य का परिणाम दूसरे वाक्य में बताते हैं, अतः ये परिणामदर्शक समुच्ययबोधक हैं।
विकल्पसूचक- जो शब्द विकल्प का ज्ञान करायें, उन्हें ‘विकल्पसूचक’ शब्द कहते है।
जैसे-
  • तो, न, अथवा, या आदि।
उदाहरण – मेरी किताब रमेश ने चुराई या राकेश ने। इस वाक्य में ‘रमेश’ और ‘राकेश’ के चुराने की क्रिया करने में विकल्प है।
व्यधिकरण समुच्चयबोधकऐसे समुच्चयबोधक  जो वाक्य में एक या एक से अधिक आश्रित उपवाक्यों को जोडते है। व्यधिकरण समुच्चयबोधक कहलाते है।
सरल शब्दों में– एक या एक से अधिक उपवाक्यों को मुख्य उपवाक्य से जोड़ने वाले अव्यय को व्यधिकरण समुच्चयबोधक कहते हैं।
दूसरे शब्दों में —जिन अव्यय शब्दों में एक शब्द को मुख्य माना जाता है और एक को गौण। गौण वाक्य मुख्य वाक्य को एक या अधिक उपवाक्यों को जोड़ने का काम करता है।
जैसे ———,
  • इसलिए, यद्यपि, तथापि, कि, मानो, क्योंकि, यहाँ, तक कि, जिससे कि, ताकि , यदि, तो, यानि आते हैं वहाँ पर व्यधिकरण समुच्चयबोधक अव्यय होता है।
इसके चार उपभेद है।-
  •  कारणवाच
  • उद्देश्यवाचक
  • संकेतवाचक
  •  स्वरूपवाचक
(i) कारणवाचक-ऐसे समुच्चयबोधक अव्यय जो किसी वाक्य को कारणसूचक वाक्यों से जोडते है। ,उन्हें कारणवाचक कहते हैं।
जैसे-
  • क्योंकि,  इसलिए, के ​कारण, जोकि, इसलिए कि आदि शब्द कारणवाचक है।
उदाहरण
  • टेलीफोन कट गया क्योंकि बिल नहीं भरा
  • बिजली चले जाने के कारण नगर में अंधेरा छा गया।
  • मैं वहाँ नहीं आ सका क्योंकि वर्षा हो रही थी।
(iv) स्वरूपवाचक-ऐसे  समुच्चयबोधक अव्यय जो बाद वाले उपवाक्य से पूर्व लगकर,प्रथम वाक्य के स्वरूप को स्पष्ट करते है। उन्हें स्वरूपवाचक कहते हैं।
इसे ऐसे कहते है——ऐसे अव्यय शबद जो  दो उपवाक्यों को ऐसे जोड़ते है कि पहले वाक्य का स्वरूप दूसरे वाक्य से ही स्पष्ट हो, उसे स्वरूपवाचक कहते हैं।
़जैसे-
  • यानी, कि, जो, अर्थात, मानो। आदि स्वरूप वाचक शब्द है।
उदाहरण-
  • पूरी कक्षा मानती है कि राधा होशियार है।
  • ​बिहारी द्वारा लिखे दोहे अर्थात गागर में सागर।
  • तुम चंद्रशेखर थोडी हो जो तुम्हारी बात मान लूॅं।
  • कृष्ण ने कहा कि मैं आज खाना नहीं खाऊँगा।
  • उसने ठीक किया जो यहाँ चला आया।
उद्देश्यवाचक-ऐसे समुच्चयबोधक अव्यय जो प्रथम उपवाक्य के उदे्श्य को प्रकट करते है,
उन्हें उद्देश्यवाचक कहते है। ये समुच्चयबोधक वाक्य के आरम्भ  में लगते है।
दूसरे शब्दों में —जिस अव्यय से एक वाक्य का उद्देश्य या फल दूसरे वाक्य द्वारा प्रकट हो, उसे उद्देश्यवाचक कहते हैं।
जैसे-
  • ताकि, कि, जो, इसलिए कि आदि उद्देश्यवाचक शब्द है।
उदाहरण-
  • चाबी बनाने वाले को बुलाओ ताकि ताला खुल सके।
  • रामकली को जाना है,इसलिए तैयार हो रही है।
  • नरेश को नायक बनाओ जोकि अच्छा अभिनय करता है।
  • मैं वहाँ इसलिए गया था ताकि पुस्तक ले आऊँ।
  • राम इसलिए नहीं आया कि कहीं उसका अपमान न हो।
संकेतवाचक-ऐसे समुच्चयबोधक अव्यय जो दो उपवाक्य के शुरू में लगकर दोनों उपवाक्यों को जोडते है,
जैसे-
  • यदि—तो
  • अग— तो
  •  जब—तब
  • यद्यपि–तथापि
  • जो—–तो
  • चाहे—परन्तु, कि आदि संकेतवाचक शब्द है।
उदाहरण-
  • अगर सावधान रहते तो जेब नहीं कटती।
  • यद्यपि इंदिरा तेज़ दौडी तथापि प्रथम भूमिका ही आई।
  • यदि समय मिला तो मैं अवश्य जाऊँगा।
  • यदि अनुपमा परिश्रम करती तो प्रथम आ जाती है।

विस्मयादिबोधक अव्यय :-

विस्मय शब्द का अर्थ है—“आश्चर्य ,,“विस्मय आदि भावों को व्यक्त करने वाले शब्द है”। जो  अरे!, हो!,उफ़, हाय!,छि आदि इन वाक्यों  या अव्ययों का अपना  कोई अलग कोई अर्थ तो नहीं होता पर किसी वियोष परिस्थिति में मुह से निकल जाते है।  और हमारे मन के भावों को व्यक्त करते है।
अर्थात हम कह सकते है कि ऐसे अव्यय  शब्द  जो  विस्मय ,प्रशंसा, प्रसननता, आश्चर्य, हर्ष, शोक, घृणा, आशीर्वाद, क्रोध, उल्लास, भय आदि भावों को प्रकट करें, उन्हें’विस्मयादिबोधक’ कहते है।
दूसरे शब्दों में- जिन अव्ययों से हर्ष-शोक आदि के भाव सूचित हों, पर उनका सम्बन्ध वाक्य या उसके किसी विशेष पद से न हो, उन्हें ‘विस्मयादिबोधक’ कहते है।
जैसे-
  • हाय! अब मैं क्या करूँ ?
  • हैं! तुम क्या कर रहे हो ? यहाँ ‘हाय!’ और ‘है !’
  • अरे! पीछे हो जाओ, गिर जाओगे।
इस वाक्य में अरे! शब्द से भय प्रकट हो रहा है।
विस्मयादिबोधक के निम्नलिखित भेद हैं-
विस्मयादि भाव और विस्मयादिबोधक शब्द
  • विस्मयादि (भाव)—————–  विस्मयादिबोधक (शब्द)
  • विस्मय आश्चर्य ——————-अरे!,क्या, है आदि।
  • प्रशंसा प्रोत्साहन——————वाह,सुंदर,ओहो,आदि।
  • हर्ष उल्लास——————— वाह,आहा आदि।
  • संबोधन ————————-अबे, ओए,अजी,अरे,अरी,ओजी आदि।
  • पीडा व्यथा———————-ओह,उफ़,हाय आदि।
  • शोक————————— हाय,आह आदि।
  • भय ————————– हाय,अरे आदि।
  • चेतावनी————————-सावधान,खबरदार,बचो,हटो,जागो आदि।
  • आशीर्वाद ———————–शाबाश, बने रहो,दीर्घायु हो आदि।
  • तिरस्कार  दूर हटाना—————-धिक्,जा,हट आदि।
  • स्वीकृत —————————ठीक,अच्छा,जी,जी—हॉं आदि।
  • क्रोध—————————–अरे,खामोश, चुप आदि।
  • कुतज्ञता ————————–शुक्रिया,धन्यावाद,आभारी,आदि।
  • अभिवादन————————नमस्ते, प्रणाम,नमस्कार आदि।
  • घृणा————————— छि:,छि:—छि:,दुर  
विकारी शब्दों का विस्मयादिबोधक के रूप में प्रयोग
कई बार विकारी शब्दों का विस्मयादिबोधक के रूप में प्रयोग में लाया जाता है।
  • संज्ञा —– ——-बाप रे बाप! छोटी सी लडकी और गज भर जबान
  • सर्वनाम——— –क्या! तुम प्रथम आ गए।
  • विशेषण ———अच्छा!अशोक कहानियॉं भी लिखता है।
  • क्रिया ———– पढो! पढाई ही काम आती है।

विशेष

  • जिन अविकारी शब्दों का प्रयोग वाक्य के प्रारम्भ में होता है तथा इनका वाक्य की रचना से सीधा संबंध नहीं होता।
  • विस्मयादिबोधक शब्दों के बाद विशेष चिह्न (!) लगता है।
  • विस्मयादिबोधक एक  अव्यय शब्द  है, जिनका अपने वाक्य या किसी पद से कोई सम्बन्ध नहीं।
  • व्याकरण में विस्मयादिबोधक अव्ययों का कोई विशेष महत्त्व नहीं है।
  • विस्मयादिबोधक शब्दों या वाक्यों के निर्माण में कोई विशेष सहायता नहीं मिलती।
  •  इनका प्रयोग मनोभावों को तीव्र रूप में प्रकट करने के लिए होता है।
  • ‘अब मैं क्या करूँ ? इस वाक्य के पहले ‘हाय!’ जोड़ा जा सकता है।

निपात अव्यय

कुछ विकारी या अविकारी शब्द वाक्य में किसी पद के बाद लगकर उस पद के अर्थ में विशेष बल देते है
हिंदी में इनको निपात कहते है।
सरल शब्दों में —जो अव्यय वाक्य में किसी शब्द के बाद लगकर उसे विशेष बल प्रदान करतें है उन्हें निपात कहते है। इन्हें अवधारणामूलक शब्द  भी कहते हैं।  और यह वाक्य में नवीनता या चमत्कार उत्पन्न करने का कार्य करते है।
  • जिन वाक्यों में ——— ही, भी, तो, तक, मात्र, भर, मत, सा, जी, केवल आते हैं वहाँ पर निपात अव्यय होता है।

निपात का अर्थ

यास्क के अनुसार ‘निपात’ शब्द के अनेक अर्थ है, इसलिए ये निपात कहे जाते हैं-
उच्चावच्चेषु अर्थेषु निपतन्तीति निपाताः यह पाद का पूरण करनेवाला होता है- ‘निपाताः पादपूरणाः । कभी-कभी अर्थ के अनुसार प्रयुक्त होने से अनर्थक निपातों से अन्य सार्थक निपात भी होते हैं।
निपात शुद्ध अव्यय नहीं है; क्योंकि संज्ञाओं, विशेषणों, सर्वनामों आदि में जब अव्ययों का प्रयोग होता है,
तब उनका अपना अर्थ होता है, पर निपातों में ऐसा नहीं होता। साधारणतः निपात अव्यय ही है। हिन्दी में अधिकतर निपात शब्दसमूह के बाद आते हैं, जिनको वे बल प्रदान करते हैं।यद्यपि निपातों में सार्थकता नहीं होती, तथापि उन्हें सर्वथा निरर्थक भी नहीं कहा जा सकता।
यास्क ने निपात के तीन भेद माने है-
  • उपमार्थक निपात : यथा——– इव, न, चित्, नुः
  • कर्मोपसंग्रहार्थक निपात : ——-यथा- न, आ, वा, ह;
  • पदपूरणार्थक निपात : यथा- —–नूनम्, खलु, हि, अर्थ।

निपात का प्रयोग

  • मूलतः निपात का  प्रयोग अव्ययों के लिए होता है लेकिन वे शुद्ध अव्यय नहीं होते है
  • निपातों का प्रयोग निश्चित शब्द, शब्द-समूह या पूरे वाक्य को अन्य (अतिरिक्त) भावार्थ प्रदान करने के लिए होता है।
  • निपात का कोई लिंग, वचन नहीं होता। । जैसे अव्ययों में आकारगत अपरिवर्त्तनीयता होती है, वैसे ही निपातों में भी। इसके अतिरिक्त,
  • निपात सहायक शब्द होते हुए भी वाक्य के अंग नही होते। पर वाक्य में इनके प्रयोग से उस वाक्य का समग्र अर्थ व्यक्त/प्रभावित होता है।

निपात के कार्य

निपात के निम्नलिखित कार्य होते हैं-
  •  पश्र– ————-जैसे : क्या वह जा रहा है ?
  • अस्वीकृति———- जैसे : मेरा छोटा भाई आज वहाँ नहीं जायेगा।
  • विस्मयादिबोधक– ——जैसे : क्या अच्छी पुस्तक है !
  • वाक्य में किसी शब्द पर बल देना- बच्चा भी जानता है
निपात के प्रकार |

तुलनाबोधक निपात – सा

  • हरीश—सा भाई नवल का सहारा है।
  • कल्लू सा अपराधी पुत्र खानदान पर कंलक है।
  • राकेश मुकेश सा समझदार नहीं है।
स्वीकारबोधक निपात – हा,जी,जीहाँ
  • जी हॉं ,हम सब अवश्य गाएॅंगें ।
  • हॉं, मैं पहुॅंच जाउॅंगा।
  • जी, इतनी धनराशि पर्याप्त है।
नकारबोधक निपात – जीनहीं,नहीं
  • अशोक जैन श्री नगर नहीं जाता।
  • सुदेश शर्मा नहीं गाएगी।
 निषेधबोधक निपात – मत
  • नाना जी के चित्र को मत उतारो।
  • आवारागर्द लडकों से मित्रता मत करों
 प्रश्नबोधक निपात – क्या
  • बस क्या यहॉं से मिलेगा?
  • अनिल और सुनील क्या दिल्ली से वापस आ गए।
 विस्मयबोधक निपात – क्या,काश
  • क्या!दीदी अस्पताल में है।
  • क्या तुम्हें प्रथम पुरस्कार मिला?
अवधारणाबोधक निपात – ठीक,करीब,लगभग,तकरीबन
  • बढई ने मेज ठीक बनाया है।
  • सडक लगभग तैयार हो गई है।
  • राधा के अंक पारवती की अपेक्षा के करीब आए है।
आदरबोधक/ सम्मानवाचक  निपात – जी
  • गुरू जी ने शिष्यों को भली भॉंति समझाया।
  • मैं प्रात: उठकर दादा जी और दादी जी के चरण छूता है।
बल प्रदायकबोधक निपात –तो,ही,भी,तक,भर,सिर्फ,केवल
  • श्री नगर जा रही हो साथ में   गर्म वस्त्र तो ले लों
  • जानकी का भरोसा बडे पुत्र पर पर है।

वाच्य की परिभाषा, अर्थ, प्रकार/भेद, प्रयोग एवंम परिवर्तन (Vachya in Hindi)

वाच्य  की परिभाषा (Definition of  Voice)

क्रिया के जिस रूपांतर से यह ज्ञात/बोध  हो कि क्रिया द्वारा किये गये विधान का मुख्य बिंदु/विषय कर्ता है, या कर्म उसे वाच्य कहते है।

सरल शब्दों में —क्रिया के जिस रूप से यह पता चलें कि किसी वाक्य में कर्ता कर्म या भाव में किसी एक की प्रधानता है, उसे वाच्य कहते है।
दूसरे शब्दों में—जिस क्रिया के द्वारा हमें यह पता चलता है कि  वाक्य क्रिया को मुख्य या मूल रूप से चलाने वाला कौन है। अर्थात कर्म,कर्ता भाव,या कोई अन्य घटक है। उसे वाच्य कहते है। 
जैसे —
  1.  रंजन पुस्तक बेच रहा था।
  2.  (क). पुस्तक बेची जा रही थी ।   (ख). वह पुस्तक बहुत बिक रही थी
  3.  हमसे यहॉं नहीं बैठा जाता ।
वाक्य 1 में— बेच रहा था- क्रियापद रंजन के बारे में बता रहा है। रंजन कर्ता है और क्रिया पद उसी के बारें में कुछ विधान कर रहा है। अत: पूरा वाक्य कर्तृवाच्य है।
वाक्य 2 में— बेची जा रही थी क्रिया पद का उददेश्य बेचने वाले व्यक्ति के बसरे में बताना नहीं है। बल्कि पुस्तक के बारें में बताना है। यहॉं पुस्तक कर्म है। इसलिए सम्पूर्ण वाक्य में है। इसी प्रकार वाक्य ख में भी कर्मवाच्य है।
वाक्य 3 में — बैठा जाता क्रिया के साथ कर्म सम्भव नहीं है। और न ही कर्ता पर बल है। इसमें क्रिया का भाव ही मुख्य है। इसलिए यह वाक्य भाव वाच्य है।
इस प्रकार उस रूप रचना को वाच्य कहते है जिससे यह पता चलें कि क्रिया को मूल रूप से चलाने वाला कर्ता है,कर्म है।, या अन्य कोई घटक।
  • इनमें इन्ही  के अनुसार क्रिया के पुरुष, वचन आदि आए हैं।
इन परिभाषाओं  के अनुसार वाक्य में क्रिया के लिंग, वचन चाहे तो कर्ता के अनुसार होंगे अथवा कर्म के अनुसार अथवा भाव के अनुसार।

वाच्य का अर्थ(Meaning of Voice)

वाच्य का अर्थ  है— वाणी या कथन,,, यहॉं वाणी का अर्थ— वक्ता की वाणी या वक्ता का कथन है।
वस्तुत: वाच्य किसी एक बात को थोडे से अर्थ के अंतर के साथ कहने का तरीका है। इस तरह कहे गए वाक्यों कथनों की सरंचना भिन्न हो जाती है।
उदहारण के लिए
  1. मॉं ने खाना बनाया
  2. मॉं के द्वारा  खाना बनाया गया।
यद्यपि दोनो वाक्यों का अर्थ समान्य तो लग ही रहा है किंतु दोनों के अर्थ में सूक्ष्म अंतर है। दोनों की सरंचना भी भिन्न है।  कर्ता द्वारा मॉं के कार्य खाना बनाना  को प्रधानता दी गई है।
 जबकि वाक्य 2—- में कर्ता के कार्य को नकारने या निरस्त  करने का  कार्य किया गया है, कार्य को निरस्त करने का अर्थ है,
जहॉं वाक्य 1—- में कर्ता क्रिया को करने में सक्रिय रूप से भाग लेता है।  है। , वही वाक्य 2 में  उसकी भूमिका निष्क्रिय हो जाती ​है।
इन सभी कार्यों से क्रिया के मूल रूप की सरंचना का पता चलता है कि कौन कर्ता है। क्रिया क्या है। भाव कौन सा है। वही वाच्य कहलाता है।
इसके अन्य उदहारण है।
वर्ग---1वर्ग---2वर्ग---3
1.मजदूर ने पेड काटामजदूर के  द्वारा /से पेड काटा गयापेड काटा गया 
2.बच्चे ने चित्र बनायाबच्चे के द्वारा/से चित्र बनाया गयाचित्र बनाया गया
3.किसान हल चला रहा है।किसान के द्वारा/से हल चलाया जा रहा है।हल चलाया जा रहा है। 
वाच्य में क्रिया के तीनों मूल रूप की सरंचना की प्रधानता  का होना आवश्यक  है
  1.  कर्ता
  2. कर्म
  3. भाव
जैसे –
  1.  राम  क्रिकेट खेलता है।————– (क्रिया कर्ता के अनुसार)
  2. राम द्वारा क्रिकेट खेला जाता है।——- (क्रिया कर्म के अनुसार)
  3.  राम से क्रिकेट खेला जाता है।———(क्रिया भाव के अनुसार)

वाच्य के भेद

हिंदी में मख्य रूप से दो ही वाच्य है।
  1. कर्तृवाच्य (Active Voice)
  2. अकर्तृवाच्य(Passive Voice)
(1) कर्तृवाच्य (Active Voice) जिन वाक्यों  में वक्ता, कर्ता के कार्य की प्रधानता या महत्त्व देता है। वे
कृर्तवाच्य कहलाते है।
सरल शब्दों में—क्रिया के उस रूपान्तरण को कृर्तवाच्य कहते है। जिससे वाक्य में कर्ता की प्रधानता का बोध होता है।  कृर्तवाच्य में क्रिया के लिंग, वचन आदि कर्ता के समान होते है
जैसे
  • राम ने दूध पीया।
  • सीता गाती है।
  • मैं स्कूल गया ।
  • सचिन सो रहा है।
  • मैंने शरबत पी लिया है।
  • राधा पुस्तक पढ़ रही है। 
इस प्रकार के वाक्यों में अकर्मक सकर्मक दोनों प्रकार की क्रियॉंए हो सकती है। इनमें कर्ता प्रमुख होता है। 
और कर्म गौण होता है।
  1. पिताजी आ रहें है। ——————(अकर्मक)
  2. बच्चा रो रहा है। ———————(अकर्मक)
  3. माताजी सो रही है। ——————(अकर्मक)
  4. मजदूर काम कर रहें है।————–(अकर्मक)
  5. गरिमा पुस्तक पढ़ रही है। ———–(सकर्मक)
  6. मैं खाना खाता हूॅं।———————-(सकर्मक)
  7. डाकिया डाक विकरित करता है।—- (सकर्मक)
  8. निर्मला कंप्यूटर ठीक करती है।——–(सकर्मक)
ध्यान रखिए
  • कर्ता के कार्य की प्रधानता दिए जाने का का अर्थ बिल्कुल भी नहीं है कि कर्तृवाच्य के वाक्य की क्रिया कर्ता की संज्ञा के अनुसार ही बदलेगी।
  • कर्तृवाच्य के वाक्यों में क्रिया कर्ता के अनुसार उसी समय तक बदलती है। जब कर्ता के बाद कोई परसर्ग नहीं लगा होता है।
  • यदि वाक्य में कर्ता के बाद परसर्ग आ रहा है तो क्रिया वाक्य की दूसरी संज्ञा केअनुसार बदलती है।

विशेष

  • क्रिया का बदलने का संबंध वाच्य के साथ नहीं होता है।
  • हिंदी में क्रिया बदलने के अलग नियम है। जिनका वाचय से संबंध नहीं है।

पहचान

  • वाच्य सकर्मक और अकर्मक दोनों क्रियाओं से बनता है।
  • कर्तृवाच्य में क्रिया कर्ता के अनुसार होती हैअर्थात कर्ता की प्रधानता होती ​है और उसी क्रिया के अनुसार चलती है,
  • कभी कभी कर्ता के साथ ने चिह्न नहीं लगाया जाता ।
  • जहॉं पर वाक्य में क्रिया को मुख्य रूप से चलाने वाला कर्ता होता है। वहॉं पर कृर्त वाच्य होता है।
  • जिन वाक्यों  में कर्ता ही प्रधानता होती है, उसे कृर्तवाच्य कहते है।
(2) अकर्तृवाच्य(Passive Voice)जिन वाक्यों में वक्ता द्वारा कर्ता के कार्य को निरस्त अथवा निष्क्रिय कर दिया जाता है। वे अकर्तृवाच्य के वाक्य कहलाते है।
दूसरे शब्दों में——जिन वाक्यों में कर्ता गौण होता अथवा लुप्त ​होता हैं, उन्हें अकृर्तवाच्य कहते है।

अकर्तृवाच्य(Passive Voice) के भेद

सकर्मक क्रिया और अकर्मक क्रिया के प्रयोग के आधार पर अकर्तृवाच्य के दो भेद किए गए है।
  • कर्मवाच्य और
  • भाव वाच्य ।
क़) कर्मवाच्य (Passive Voice) क्रिया के उस रूपान्तरण को कर्मवाच्य कहते है। जिससे वाक्य में कर्म की प्रधानता का बोध होता है।  यह वाच्य सकर्मक क्रिया से बनता है।
दूसरे शब्दों में—  अकर्तृवाच्य के वे वाक्य जिनमें सकर्मक क्रिया का प्रयोग होता है, कर्मवाच्य के वाक्य कहे जाते है।
सरल शब्दो में ——जहॉं पर क्रिया को मुख्य रूप से चलाने वाला कर्म होता है। उसे कर्मवाच्य कहते है।
उदहारण के लिए:—
  • प्रेमचंद द्वारा उपन्यास लिखा जाता है।
  • मुझ से पत्र नहीं पढ़ा जाता है।
  • यहॉं हिंदी बोली जाती है।
  • बच्चों से नदी पार न की जा सकीं
उपर्युक्त सभी वाक्य अकर्तृवाच्य के वाक्य है। जिनमें सकर्मक क्रिया का प्रयोग हुआ है।  अत: ये सभी वाक्य कर्मवाच्य कहे जाएगें 

ध्यान देने योग्य बातें

  • अकर्तृवाच्य के वाक्य में क्रिया कर्ता की संज्ञा के अनुसार कभी नहीं बदलेगी क्योकि उसके भेद हमेशा “से अथवा के द्वारा “परसर्ग लगा होगा।
  • कर्मवाच्य के वाक्यों में दो ही सम्भावनाएॅ होती है। या तो क्रिया कर्म  की संज्ञा के अनुसार बदलेगी या उसके साथ कोई परसर्ग लगा होगा तो फिर उसके अनुसार भी नहीं बदलेगी।
  • ऐसी स्थिति में क्रिया तटस्थ हो जाती है।
  • ​क्रिया  का तटस्थ रूप है—अन्य पुरूष पु​ल्लिंग एकवचन ,भूतालिक रूप

 विशेष

  • इनमें सकर्मक क्रियाएॅ ही प्रयुक्त होती है।
  • इस प्रकार के वाक्यों में क्रिया को करने वाला कर्ता और कर्म दोनों ही रहते है। पर कर्म प्रधान होता है। कर्ता नहीं

कभी कभी कर्ता का लोप भी हो जाता है।

  • मुझसे यह चिळी नहीं पढी जाती।
  • मुझसे यह कपडा नहीं धोया जाता।
  • यह किताब नहीं बिकती ।
  • बाहर का दरवाजा नहीं खुलता।
कर्मवाच्य में कर्म की प्रधानता होती है। कर्म के बाद”से अथवा द्वारा, के द्वारा” का प्रयोग होता है। 
  • प्रेमचंद द्वारा यह उपन्यास हलखा गया। ————(कर्ता द्वारा )
  • नेता के द्वारा पुल का उद्घाटन किया गया———(कर्ता के द्वार)
  • मोहन से यह मेज़ टूट गई।—————————(कर्ता से )
  • आप का काम कर दिया गया है।———————(कर्ता का लोप)
  • दीपावली अक्टूबर या सवम्बर में मनाई जाती है।—(कर्ता का लोप)
  • यह उल्लेखनीय है कि कर्म वाच्य में कर्ता के साथ द्वारा  के द्वारा,या से” जोडा जाता है।इस कारण कर्ता गौण हो जाता है।
  • कर्म वाच्य रचना में असर्मथता सूचक वाक्य भी आते है। किंतु इनमें द्वारा के स्थान पर प्राय: “से” परसर्ग का प्रयोग होता है।
इनमें भी सकर्मक क्रिया प्रयुक्त होती है। ये वाक्य केवल निषेधात्मक रूप में प्रयुक्त होते है। और कर्ता की असर्मथता को सूचित करते है।
जैसे
  • मुझसे दरवाजा नहीं खोला जाता।
  • मुकेश से खानाा नहीे खया जाता ।
हिंदी में क्रिया का एक ऐसा रूप है। जो कर्मवाच्य की तरह प्रयुक्त होता है। वह रूप सकर्मक रूप है। इसका अकर्मक रूप जिसे व्युत्पन्न कहते है।
जैसे
  • दरवाजा खुल गया ——— (खोलना ,खूलना)
  • गिलास टूट गया ———- (तोडना टूटना।)
  • भोजन पक गय।————(पकाना ,पकना)।

कर्म वाच्य के प्रयोग स्थल या स्थान

  • कई बार क्रिया का कर्ता अज्ञात होता है।
  • जैसे गाना गाया गया।
  • जब कर्ता को प्रकट करने की आवश्यकता ही न हों।
  • जैसे साहित्यिक गोष्ठी में कविता पढी जाएगी 
  • कानूनी भाषा में
  • जैसे — कानून का उल्लंघन करने वालों को दण्ड दिया जाएगा
  • दर्प ,गर्व ,अधिकार प्रकट करने के लिए
  • जैसे——मामलों की पूरी जॉच की जाए।

कर्म वाच्य  वाले वाक्य में

  • एक से अधिक पद होते है।
  • जाना क्रिया को सहायक क्रिया के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
  • वाक्य का उद्देश्य कर्म होता है। मुख्य क्रिया सकर्मक होती है।
  • कर्ता गौण् होता है।
 3) भाववाच्य (Impersonal Voice)- जिन वाक्यों में कर्ता और कर्म दोनों ही अप्रधान होते है। वे भाव वाच्य कहलाते है।
सरल शब्दों में ———अकर्तृवाच्य के वे वाक्य जिनमें अकर्मक क्रिया का प्रयोग किया जाता है, भाववाच्य के वाक्य कहलाते जाते है।
दसरे शब्दों —क्रिया के उस रूपान्तर को भाववाच्य कहते हैं, जिससे वाक्य में क्रिया अथवा भाव की प्रधानता का बोध हो।
अत: कहा जा सकता है कि– क्रिया के जिस रूप में न तो कर्ता की प्रधानता हो, न कर्म की, बल्कि क्रिया का भाव ही प्रधान हो, वहाँ भाववाच्य होता है।
अन्य शब्दों में —क्रिया के जिस रूप में भाव की प्रधानता होती है और क्रिया का सीधा सम्बंध भाव से होता है। उसे भाव वाच्य कहते है। यह केवल अकर्मक क्रिया के वाक्यों में ही प्रयुक्त होता है।
उदाहरण के लिए-
  • शेर से दहाडा भी नहीं गया
  • लडकियों से हसॉ तक नहीं गया।
  • माताजी से पहाउ पर चढा नहीं गया।
  • बच्चों से नदी में तैरा नहीं जाता ।
उपर्युक्त सभी अकर्तृवाच्य के वाक्य है। तथा इनमें अकर्मक क्रिया का प्रयोग हुआ है। अत: ये सभी वाक्य भाव वाच्य के अंतर्गत आएगें  अकर्तृवाच्य में वाक्यों में प्राय: लोन कर दिया जाता है। 
भाव वाच्य के अन्य उदहारण 
  • गाया नहीं जाता
  • यहॉं बैठा नहीं जाता
  • पैदल चला नहीं जाता
  • खडे होकर पानी पीया नहीं जाता
  • अब सोया जाए

ध्यान रखिए

  • प्रयोग के स्तर पर भाव वाच्य का प्रयोग निषेधात्मक वाक्यों में अधिक देखने को मिलता है।
  • भाव वाच्य के सकारात्मक वाक्य सहज प्रतीत नहीं होते  जैसे
  • बच्चों से दौडा गया।
  • लडकियों से हॅसा गया।

विशेष

  • इसमें वक्ता का कथ्य बिंदु क्रिया से प्रकट होता है।

भाव वाच्य में केवल अकर्मक क्रिया काा प्रयोग किया जाता है। वस्तुत: अकर्मक क्रिया का कर्म वाच्य ही भाव वाच्य है। जैसे

  • यहॉ सोया नहीं जाता ।
  • मुझसे चला नहीं जाता ।
कर्मवाच्य या भाव वाच्य के जिन वाक्यों में कर्ता के बाद से प्रयोग होता है। वहॉ कर्ता के सामथर्य का भाव वा रहता है। ऐसे वाक्य प्राय: नकारात्मक होते है। तथा इस प्रकार के वाक्य भाव वाच्य में आते है।
जैसे———
  • अब चला जाए
  • थोडी देर सो लिया जाए।
भाव वाच्य केवल अकर्मक क्रियाओं  के साथ ही सम्भव है। क्योकि इनमें कर्म की स्थिति नहीं होती ,भाव वाच्य क्रिया हमेशा एकवचन,अन्य पुरूष्,पुल्लिग रूप में रहती है।
जैसे —-
  • सोया जाता है।
  • चला जाता है।
भाव वाच्य के प्रयोग स्थल या स्थान
भाव वाच्य के प्रयोग प्राय: असमर्थता और विवशता को प्रकट करने के लिए नही के साथ किया जाता है।
जैसे —
  • मुझसे अब नहीं चला जाता
जहॉ नहीं का प्रयोग होता,वहॉ मूल कर्ता समान्य होता है।
जैसे
  • अब चला जाए।
  • चलो उपर सोया जाए।

कर्मवाच्य और  भाव वाच्य में अंतर

कर्मवाच्य तथा भाववाच्य दोनों ही अकर्तृवाच्य के भेद है। दोनो में अंतर केवल इस बात को लेकर है कि कर्मवाच्य वाले वाक्य में सकर्मक क्रिया का प्रयोग होता है। भाववाच्य वाले वाक्यों में  अकर्मक क्रिया का प्रयोग होता है।

वाच्य-परिवर्तन

(1) कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य (Active to Passive)
कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य में रूपान्तरण के लिए हमें निम्नलिखित कार्य करने चाहिए-
  • कर्तृवाच्य के साथ लगी विभक्ति हटा दी जाती है और  कर्त्ता कारक में करण कारक के चिह्न ‘से’या केद्वारा’ का प्रयोग करना चाहिए।
  •  कर्तृवाच्य की मुख्य क्रिया को समान्य भूतकाल की क्रिया में बदला जाता है। और जाना क्रिया के उचित रूप का प्रयोग किया जाता है।
  • कर्म के साथ कोई परसर्ग हो तो उसे हटा दिया जाता है।
  •  कर्म को चिह्न-रहित करना चाहिए।
  •  क्रिया को कर्म के लिंग-वचन-पुरुष के अनुसार रखना चाहिए अर्थात कर्म प्रधान बनाना चाहिए।
नीचे कुछ उदाहरण दिया जा रहा है
कर्तृवाच्य                   कर्मवाच्य
दीपिका ने खाना बनाया ।      दीपिका के द्वारा खाना बनाया गया।
क्या अमीना आगरा जाएगी।      क्या अमीना के द्वारा  आगरा  जाया जाएगा ।
केदारनाथ ने पूजा की ।       केदारनाथ के द्वारा  पूजा की  गई।
राधा ने कहानी सुनाई ।       राधा के द्वारा  कहानी सुनाई गई।
यह मकान नानी जी ने बनवाया था। यह मकान नानी जी के द्वारा  बनवाया  गया था ।
चित्रकार चित्र बनाता है।चित्रकार द्वारा चित्र बनाया जाता है
राधा नृत्य करती है। राधा द्वारा नृत्य किया जाता है।
पुलिस ने अपराधी को पकड़ा।पुलिस द्वारा अपराधी को पकड़ा गया।
मित्र विपत्ति में मदद करते हैं।मित्रों के द्वारा विपत्ति में मदद की जाती है।
महेश पत्र लिखता है।महेश के द्वारा पत्र लिखा जाता है।
फैक्टरी बंद कर दी।फैक्टरी बंद करा दी गई
बुढ़िया खाना नहीं खा सकती।बुढ़िया के द्वारा खाना नहीं खाया जाता है।
बच्चे शोर मचाएँगे। बच्चों के द्वारा शोर मचाया जाएगा।
भारतवासी महात्मा गाँधी को नहीं भूल सकते है।भारतवासियों के द्वारा महात्मा गाँधी नहीं भुलाए जा सकते।

 कर्मवाच्य से कर्तृवाच्य बनाना

कर्मवाच्य से कर्तृवाच्य में परिवर्तन के लिए निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए-
  • भूतकाल की सकर्मक क्रिया रहने पर कर्म के लिंग, वचन के अनुसार क्रिया को रखना चाहिए।
  • कर्त्ता के अपने चिह्न (०, ने) आवश्यकतानुसार लगाना चाहिए।
  • यदि वाक्य की क्रिया वर्तमान एवं भविष्यत् की है तो कर्तानुसार क्रिया की रूप रचना रखनी चाहिए।
नीचे कुछ उदाहरण दिया जा रहा है-
 कर्मवाच्य सेकर्तृवाच्य
बंदर द्वारा बच्चे को काटा गया  बंदर ने बच्चे को काट लिया
रोगी के द्वार दवा खाई गई।     रोगी ने दवा खाई ।
मोहित के द्वारा हनुमान चालीसा पढ़ा गया मोहित ने  हनुमान चालीसा पढ़ा
मैं यह दृश्य नहीं देख सका।मुझसे यह दृश्य नहीं देखा गया।
मजदूर पत्थर नहीं तोड़ रहे। मजदूरों से पत्थर नहीं तोड़े जा रहे।
यह छात्रा भावभीनी श्रद्धांजलि दे रही है।इस छात्रा द्वारा भावभीनी श्रद्धांजलि दी जा रही है।
भक्तों के द्वारा भजन गाए गए   भक्तों ने भजन गाए 
ड्राइवर ​के द्वारा बस रोकी गईड्राइवर ​ने बस रोकी
नरेश पत्र लिखता है। नरेश से पत्र लिखा जाता है।
मैं अख़बार नहीं पढ़ सकता। मुझसे अख़बार पढ़ा नहीं जाता
लड़कियों द्वारा गीत गाए जा रहे हैं। —लड़कियाँ गीत गा रही हैं।
मैं यह वजन उठा नहीं पाऊँगा।मुझसे यह वजन नहीं उठाया जाएगा।

कर्तृवाच्य से भाववाच्य (Active voice to Impersonal Voice)

कर्तृवाच्य से भाववाच्य  निम्नलिखित बिंदुंओ के आधार पर बनते है।
  • क्रिया के साथ से विभक्ति चिह्न लगाया जाता हें
  • क्रिया को सामान्य भूत काल में लाकर उसके साथ काल के अनुसार ‘जाना’ क्रिया रूप जोड़ा जाता है
  • कर्त्ता के साथ से/द्वारा चिह्न लगाकर उसे गौण किया जाता है।
  • मुख्य क्रिया को सामान्य क्रिया एवं अन्य पुरुष पुल्लिंग एकवचन में स्वतंत्र रूप में रखा जाता है।
  • भाववाच्य में प्रायः अकर्मक क्रियाओं का ही है।
  • क्रिया को एकवचन, पुल्लिंग और अन्य पुरुष में परिवर्तित कर दिया जाता है
  • हिंदी में निषेधात्मक अधिंकाश्त: भाववाच्य  का ही प्रचलन है। अन्य भाववाच्य प्रचलन के ही बराबर है।

कर्तृवाच्य से भाववाच्य में परिवर्तित कुछ उदाहरण

  
कर्तृवाच्य सेभाववाच्य में
अध्यापिका ज़ोर से नहीं बोलती अध्यापिका से ज़ोर से नहीं बोला जाता 
बकरी में—में करती है।
बकरी से में—में ​किया जाता
चिडिया नहीं बैठती है।चिडिया से नहीं बैठा जाता है। 
कनु​प्रिया नहीं गाएगी   कनुप्रिया से   गाया नहीं  जाएगा।
महादेवी नहीं उठतीमहादेवी से नहीं उठा जाता 
गरमियों में लोग खूब नहाते हैं। गरमियों में लोगों से खूब नहाया जाता है।
पक्षी रात में सोते हैं।पक्षियों से रात में सोया जाता है।
 वह तख्त पर सोता है।उससे तख्त पर सोया जाता है।
पक्षी उड़ रहे हैं। पक्षियों से उड़ा जा रहा है।
बच्चा चल नहीं पाता।बच्चे से चला नहीं जाता।
राधा हँसती है। राधा से हँसा जाता है।
वाच्य संबंधी कुछ महत्वपूर्ण या विशिष्ठ बातें 
  • कर्म वाच्य तथा भाव वाच्य में कर्ता के बाद के द्वारा/द्वारा या से परसर्ग का प्रयोग किया जाता है।
  • भाव वाच्य की क्रिया सदा अन्य पुरूष पुल्लिंग में रहती है।
भाव वाच्य से प्राय: में  “से” का प्रयोग होता है।  बोलचाल की भाषा में से का प्रयोग प्राय: निषेधात्मक वाक्यों में किया जाता है। जैसे :—
  • मुझसे चला नहीं जाता है।
  • उससे काम नहीं होता

कर्मवाच्य तथा भाव वाच्य के निषेधात्म्क वाक्यों में जहॉं कर्ता से का प्रयोग किया होता है। वहॉं एक अन्य असमर्थकतासूचक अर्थ की अभिव्यक्ति होती है।

जैसे:—

  • मुझसे चावल नहीं खाया जाता है।
  • पिता जी से पैदल नहीं चला जाता।
  • उनसे कन्नड नहीं बोली जाती।?
  • बच्चे से दूध नहीं पीया जाता ।
कर्तृवाच्य क सकारत्मक वाक्यों में इसी सामथर्य को सूचित करने के लिए क्रिया के साथ “सक” का प्रयोग किया जाता है। जैसे :
  • वे पुस्तक पढ सकते है। 
  • गीता मिठाई बना सकती है
इसी तरह असमर्थकतासूचक  वाक्यों में सक का प्रयोग किया जा सकता है।
  • मैं यह नौकरी नहीं कर सकता ।
  • वह दुकान नहीं चला सकता।
कर्तृवाच्य  के निषेधात्मक वाक्यों को कर्मवाच्य और भाववाच्य दोनों में रूपांतरित/परिवर्तित किया जा सकता है।
कर्मवाच्य के वाक्यों में प्राय: क्रिया में “जा” रूप लगाकर किया जाता है।
  • सोया जाता है।
  • खाया जाता है। 
जैसे वाक्य बनते है। लेकिन कुछ व्युत्पन्न अकर्मक क्रियाओं का प्रयोग भी कर्मवाच्य में होता है।

1 श्रमिक पेड नहीं काट रहे 

  • क).).श्रमिकों से  पेड नहीं काटा जाता।
  • ख श्रमिकों से पेड नहीं कट  रहा।
2 हलवाई मिठाई नहीं बना रहा
  • क). हलवाई  से मिठाई नहीं बनाई  जा रही।
  • ख).  हलवाई  से मिठाई नहीं बन रही।
हिंदी में अकर्तृवाच्य कर्मवाच्य तथा भाववाच्य के वाक्यों में प्राय: कर्ता का लोप कर दिया जाता है।
जैसे:—
  • पेट नहीं काटा जा रहा है। 
  • पेड नहीं कट रहा।
  • कपडें नहीं धुल रहे।
हिंदी में क्रिया का एक ऐसा भी रूप है, जो कर्मवाच्य की तरह प्र्युक्त होता है। वह है—सकर्मक क्रिया से बना उसका अकर्मक रूप जिसे व्युत्पन्न अकर्मक कहते है।
जैसे
  • गिलास टूट गया  तोडना से टूटना रूप 
  • हवा से दरवाजा खुल गया  खोलना से खुलना रूप 
कुछ व्युत्पन्न  अकर्मक क्रियाओं का प्रयोग भी कर्मवाच्य में होता है। जैसे
  • मजदूर पेड नहीं काट रहे।
  • मजदूर  से पेड नहीं काटे जाते। 
  • मजदूर  से पेड नहीं कट रहे।

वाच्य के प्रयोग

प्रत्येक वाच्य का प्रयोग स्थल उसकी क्रिया  लिंग वचन संज्ञा  तथा पुरुष  के  आदि द्वारा अलग अलग किया जाता है। वाक्य की क्रिया का लिंग, वचन एवं पुरुष कभी कर्ता के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार होता है, तो कभी कर्म के लिंग-वचन-पुरुष के अनुसार, लेकिन कभी-कभी वाक्य की क्रिया कर्ता तथा कर्म के अनुसार न होकर एकवचन, पुंलिंग तथा अन्यपुरुष होती है,इन सभी कि द्वारा प्रयोग किया जाता है।

प्रयोग को निम्न आधारों पर  वर्गीकृत किया जाता है। 
  1. कर्मणि (कर्म ) के अनुसार वाक्य का प्रयोग
  2.  कर्तरि (कर्ता) के अनुसार वाक्य का प्रयोग
  3.  भावे (भाव )के अनुसार वाक्य का प्रयोग
1).कर्मणि का प्रयोग :———जब वाक्य की क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार हों, तो उसे कर्मणि प्रयोग कहते हैं।
सरल शब्दों में-  जिस रूप में  क्रिया  का प्रयोग पुरुष, लिंग और वचन कर्म के अनुसार हों, उसे कर्मणि प्रयोग कहते हैं।
जैसे-
  • राधा ने गीत गाया ————————क्रिया कर्म के अनुसार पुल्लिग है।
  • मोहन ने किताब पढ़ी ————क्रिया कर्म के अनुसार स्त्रीलिंग है।
2). कर्तरि का  प्रयोग–  जब वाक्य की क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्ता के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार हों, तो उसे कर्तरि प्रयोग कहते हैं।
सरल शब्दों में:—जिस रूप में क्रिया के  लिंग  वचन और पुरुष,कर्ता के अनुसार हों, उसे कर्तरि प्रयोग कहते हैं।
जैसे-
  • रोहणी खाना खाती है।
  • लडकें  पुस्तकें पढेंगें।
पहले वाक्य में ‘खाती’ क्रिया कर्ता ‘रोहणी’ के अनुकूल अन्य पुरुष,स्त्रीलिंग  बहुवचन और है। दूसरे वाक्य में ‘पढ़ेंगें’ क्रिया कर्ता ‘लडके’ के अनुसार अन्य पुरुष, पुल्लिंग और एकवचन  है। ये दोनों कर्तरि प्रयोग के उदाहरण हैं।
भावे का प्रयोग :—  क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्ता अथवा कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार न होकर एकवचन, पुंलिंग तथा अन्य पुरुष हों ,तब  भाव भावे का  प्रयोग होता हैं।
जैसे
  • राम से रोया नहीं जाता
  • सीता से रोया नहीं जाता
  • लडकों से रोया नहीं जाता

इन तीनों वाक्यों में कर्ता के बदलने पर भी क्रिया अपरिवर्तित है। तथा वह पुल्लिंग है। एकवचन तथा अन्य पुरूष में है। अत: ये भावे प्रयोग है।

विशेष

वाच्य के प्रयोग में तीनों वाच्यों में भाव भावे  का प्रयोग देखा जा सकता हैं। जैसे-
इसमें क्रिया का रूप सदैव अन्य पुरुष, पुल्लिंग और एकवचन में रहता है,
वह कर्ता या कर्म के अनुसार नहीं होता।

कर्म वाच्य के प्रयोग

कर्म वाच्यों के प्रयोग स्थल नीचे दिए गए है।
असर्मथता प्रकट करने के लिए :—
  • मुझसे चला नहीं जाता।
  • रोमा सा किसी कर दुख देखा नहीं जाता।
  • अब उससे जागा  नहींके  जाएगा।
कार्यालय में प्रयोग करने पर 
  • आपकी स्कूटर लिए ऋण संबंधी प्रार्थना स्वीकार की जाती है।
  • बस हडताल के कारण विद्यालय कल बंद रखा जाएगा।
  • पर्यावरण दिवस प्रतियोगिता संबंधी पुरस्कार शीघ्र दिए जाएगें
  • आपको अतिरिक्त वेतन वृद्धि प्रदान की जाती है।
वाक्य में कर्ता का न रहने पर 
  • बसें तोडी जा रही है।
  • सडक बना दी गई है।
  • आतंकवादी गतिविधियॉं निंरतर चल रही है।
  • प्रार्थना पत्र दिया जा चुका है।
कर्ता के व्यक्ति न होकर संस्था समाज या सरकार होने पर
  • सुमंगलम के महासचिव द्वारा लेखकों को अनुदान दिया जाता है।
  • सरकार द्वारा अनुसूचितों को अनेक सुविधाएॅं प्रदान की जाती है।
  • उडान शिक्षा द्वारा पशिक्षण दिया जाता है।
  • आपको सूचित किया जाता है कि————
अधिकार अभिमान और अंहकार प्रकट किए जाने पर
  • नृर्तकियों से नृत्य कराया जाए।
  • इतनी गरमी में हमसे नहीं जाया जाता
  • कर्मचारियों से सफाई कराई जाए।
सूचना विज्ञप्ति में जहॉं कर्ता निश्चित हो—
  • पटरी पार करने वालों को सजा दी जाए ।

 भाव वाच्य का प्रयोग

 भाव वाच्य का प्रयोग निम्न स्थितियों में किया जाता है। 
असमर्थता प्रकट करने  के लिए नहीं का प्रयोग 
  • लालचंद से चला नहीं जाता
  • राधा से अधिक खाया नहीे जाता
  • विद्याप्रसाद से इनता बोला नहीं जाता
जब नहीं कर प्रयोग नहीं होता तो मूल कर्ता जनसमान्य होता है:—
  • गर्मिंयों में छत पर सोया जाता है।
अनुमति या आदेश प्राप्त करने पर  भाव का प्रयोग 
  • अब प्रस्थान किया जाए ।
  • यात्रा पर निकल लिया जाए।
  • कम्पूटर चला लिया जाए।

विशेषण की परिभाषा, अर्थ, भेद, उदाहरण एवंम विशेषताएँ

विशेषण(Adjective)-(एडजेक्टिव)

 

विशेषण की परिभाषा

विशेषण वे शब्द है। जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने का कार्य करते है।

जैसे —‘पीला आम’  में “पीला “शब्दआम’ संज्ञा की रंग संबंधी विशेषता को बता रहा है।
इस शब्द से पता चल रहा है कि ‘आम का रंग पीला’

विशेषण जिस शब्द संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताता है। उसे विशेष्य कहते है। उक्त उदहारण में ‘आम ‘विशेष्य है।

सरल शब्दों में कह सहते है।—जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने का कार्य करते हैं; ‘विशेषण कहलाते है।

जैसे

  • बडा —छोटा, सुंदर, कायर,निडर ,हल्का, भारी, बुरा, लम्बा, मोटा टेढ़ा–मेढ़ा, खट्टा आदि विशेषण शब्दों के कुछ उदाहरण हैं।

दूसरे शब्दों में — ऐसे विकारी शबद जो प्रत्येक परिस्थिति में संज्ञा /सर्वनाम की विशेषता को प्रकट ​करते है। वे शब्द विशेषण कहलाते है।जैसे :—

  • काला कुत्ता; भूरी गाय ।

उपयुक्त वाक्यों में ‘काला’ और ‘भूरी’ शब्द” कुत्ता और गाय “(संज्ञा )की विशेषता बता रहे है। इसलिए ये शब्द विशेषण है।

विशेषण को निम्नलिखित उदहारणें के द्वारा समझते है।

  • मै गरम दूध पीता हूॅ।
  • मै ठंडा पानी पीना चाहता हूॅ
  • चार किलो आम दिजिए
  • रवि के पास सात किताबें है।
  • पेड की हरी पत्त्यिॉ मत तोडो।
  • गिलास में कुछ पानी है।
  • घर में आठ आदमी है।
  • वे मीठे आम लाए है।
  • मुझे तीन लीटर दूध चाहिए।
  • प्रंधानमंत्री गंभीर समस्याओं पर विचार कर रहे है।

उपर्युक्त वाक्य में—

गरम ,ठंडा ,हरी, कुछ, मीठे ,गंभीर,आठ —आगे आने वाले संज्ञा शब्दों —दूध, पानी, आम, दूध, समस्याओं की विशेषता बता रहे हैं।

 

  • इनमें गरम मीठे गंभीर अपनी अपनी संज्ञाओं के गुण बता रहे हैं।
  • कुछ और तीन लीटर वस्तु का परिणाम मात्रा बता रहे हैं।
  • आठ आदमियों ​की संख्या को बता रहे है।

व्याकरण में काले रेखांकित किए गए शब्द विशेषण है। जो विशेषण की विशेषता को दर्शा रहे है।

विशेषण का अर्थ(Meaning of Adjective)

अर्थ—विशेषण की विशेषता को सूचित /प्रकट करने वाला शब्द।

 

दूसरे शब्दों में— ऐसे शब्द जो वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता प्रकट करते है या दर्शाते है।उन्हें विशेषण कहते है। अर्थात

सरल शब्दों में—संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द विशेषण कहलाते है।

जैसे :—

  • मोटा लडका
  • सुंदर बच्ची
  • राधा गोरी
  • ईमानदार आदमी आदि।

अन्य शब्दों में —ऐसे शब्द जो संज्ञा या सर्वनाम की जैसे—गुण धर्म दोष दशा भाव रूप रंग आकार आदि की विशेषता बताते है। उन्हें विशेषण कहते है।अर्थात

हम कह सकते है कि–जिस विकारी शब्द से संज्ञा की व्याप्ति मर्यादित होती है, उसे भी विशेषण कहते हैं।
जैसे-

  • मेहनती विद्यार्थी सफलता पाते हैं।
  • दिल्ली ऐतिहासिक नगर है।
  • यह पीला है।
  • ऐसा आदमी कहाँ मिलेगा?

इन वाक्यों में मेहनती,ऐतिहासिक , पीला और ऐसा शब्द विशेषण हैं। जो क्रमशः विद्यार्थी,दिल्ली , यह और आदमी की विशेषता बताते हैं।

विशेष्य

विशेषण पद जिस संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताता है उसे विशेष्य कहते है।
नीचे इस संबंध को और स्पष्ट रूप में सम​िझए—

विशेषण विशेष्य

  • काला घोडा
  • दो किलो चीनी
  • तीन केले
  • लंबी मेज

विशेषण के बारे में जानने योग्य कुछ अन्य बातें

 

क. उददेश्य विशेषण और विधेय विशेषण

 

उददेश्य विशेषण:— विशेष्यों के पूर्व लगने वाले विशेषणों को उददेश्य विशेषण कहते है—

जैसे

  • अच्छा लडका—–अच्छी लडकी
  • सुंदर बालक——सुंदर बालिका
  • मोटा लडका—–मोटी लडकी ।

विधेय विशेषण:— विशेष्य संज्ञा सर्वनाम आदि के बाद में प्रयुक्त होने वाले विशेषण कहलाते है—

जैसे

  • वह लडका कितना सुंदर है।
  • ये फल मीठे है।
  • उसकी कमीज नीली है।

 

नोट

  • विशेषण विशेष्य से पहले भी आ सकता है और बाद में भी।

विशेष्य से पूर्व आने वाले विशेषण उददेश्य विशेषण कहलाते हैं तथा विशेष्य के बाद आने वाले विशेषण विधेय विशेषण कहलाते है।

दोनों के उदहारण देखो और समझो—

  • चतुर बालक काम करते है। ——उददेश्य विशेषण
  • यह बालक चतुर है।————— विधेय विशेषण


विधेय विशेषण के कुछ उदहारण —

 

  • यह पानी ठंडा है।
  • यह फूल लाल है।
  • यह मकान उॅचा है।


विशेषण चाहे उददेश्य हो चाहे विधेय विशेषण दोनों ही स्थिति में उनका रूप संज्ञा या सर्वनाम के अनुसार बदलता है जैसे

उददेश्य विशेषण के रूप

  • तली युवती खेल रही है। —–विशेषण और विशेष्य दोनों स्त्री—एकवचन
  • पतली युव​तियों खेल रही है। —–स्त्रीलिंग विशेषण अपरिवर्तित रहता है।
  • पतला लडका जा रहा है। ——— विशेषण— विशेष्य दोनों पु0 एकवचन
  • पतले लडके जा रहे है।———— विशेषण— विशेष्य दोनों पु0 बहुवचन

 

विधेय विशेषणों के रूप

  • ह लडका पतला है। —— विशेषण— विशेष्य दोनों पु0 एकवचन
  • वह लडके पतले हैं——— विशेषण— विशेष्य दोनों पु0 बहुवचन
  • वह लडकी लंबी है।——— विशेषण— विशेष्य दोनों स्त्री बहुवचन
  • वे लडकियॉ लंबी हैं।——— स्त्री विशेषण अपरिवर्तित रहता है।

 

दूसरे शब्दों में विशेषण जिन शब्दों की विशेषता बताते हैं वे विशेष्य कहलाते है।

जैसे:—

  • हाथी बलवान जानवर है।———— हाथी कैसा जानवर है—( बलवान)
  • बलवान शब्द विशेषता बता रहा है इसलिए विशेष्य है।
  • बलवान कौन है?—— हाथी। हाथी शब्द विशेष्य है।

क) अकारांत पुल्लिंग विशेषण बहुवचन में एकारांत हो जाते हैं— जैसे

  • अच्छा—— अच्छी
  • हरा——– हरे
  • बडा—— बडें

ख) विशेष्य के साथ परसर्ग लगने पर अकारांत विशेषण एकवचन में भी एकारांत हो जाता है। जैसे—

  • अच्छे —–लडके ने
  • हरा——- हरे
  • बडा—— बडे।

ग) कुछ विशेषण में लिंग और वचन के अनुसार परिवर्तन नहीं होता:

जैसे

  • बढिया ,उम्दा, ज्यादा, सुखी ,सुंदर, उतम।


ड)
ईकारांत स्त्रीलिंग विशेषण एकवचन तथा बहुवचन दोंनों के रूप में और विशेष्य के साथ परसर्ग लगने पर भी ईकारांत ही रहते है

जैसे—

  • काली बकरी— काली बकरियों ने
  • बडी कलम से — बडी कलमों से
  • बडों का कहना मानना चाहिए

च) विशेष्य के बिना कुछ विशेषण संज्ञा की भॉति प्रयुक्त होते है—

जैसे—

  • यहॉ हरी भरी घास दिखाई देती है।
  • छोटे—— छोटे लडके सुंदर लग रहे है।


ज)
  दो या दो से अधिक विशेष्यों के गुणों की तुलना करने के लिए विशेषण से पहले से की तुलना में की अपेक्षा आदि का प्रयोग होता है।

जैसे—

  • मेरा स्कूल उसके स्कूल से अच्छा है।
  • मेरा घर उसके घर की तुलना में सुंदर है।
  • मेरा बैग उसके बैग की तुलना अपेक्षा मजबूत है।

प्रविशेषण

विशेषण शब्द संज्ञा तथा सर्वनाम शब्दों की विशेषता तो बताते ही है। इनके साथ साथ विशेषण अन्य विशेषण शब्दों की भी विशेषता बता सकते है।

विशेषणों की विशेषता बताने के लिए ये विशेषण से पहले लगते हैं जैसे —” लाल फूल” में “लाल” शब्द विशेषण है

​लेकिन यदि कहें तीन लाल फूल तो इस पद में तीन संख्यावाचक विशेषण लाल विशेषण के पहले लगकर उसकी विशेषता बता रहा है।

विशेषणों के पूर्व लगकर उनकी विशेषता बताने वाले विशेषण प्रविशेषण कहे जाते हैं निम्नलिखित वाक्यों के सभी स्थूल पद प्रविशेषण है।

जैसे—

  • मेरा बडा भाई जर्मनी में रहता है।
  • पुरानी लकडी की कुरसी टुट गई।
  • उस छोटे बच्चे ने यह चित्र बनाया है।
  • ​​पिताजी ने नई कार खरीदी।
  • बासी रोटी मै नही खा सकता


सरल शब्दों में
— प्रविशेषण उन विशेष्णात्मक शब्दों को कहते है जो विशेषण को भी प्रकट करते है।

जैसे—

  • गंगा सबसे लम्बी नदी है।
  • मेरी अध्यापिका सबसे अच्छी है।
  • मेरा भाई अत्यंत ही कुशल अधिकारी है।
  • मेरी अध्यापिका सबसे अच्छी है।
  • सुनीला बहुत मोटी महिला है।
  • पूजा अधिक आलसी लडकी है।


इन वाक्यों में आए शब्द
— सबसे, सबसे, अधिक, बहुत ,और अत्यंत शब्द प्रविशेषण हैं।


ये शब्द प्रविशेषण शब्द
—लम्बी ,अच्छी ,कुशल, मोटी, आलसी से पहले लगकर इनकी विशेषता प्रकट कर रहें है।


अर्थात हम कह सकते है
— कि जो शब्द विशेषण शब्दों की विशेषता प्रकट करतें है। उन्हें प्रविशेषण कहते है।


दूसरे शब्दों में
— विशेषण की भी विशेषता प्रकट करने वाले शब्दों को प्रविशेषण कहते है।

जैसे—

  •  वह बडा भोला है।
  • मोहन बहुत चतुर है।
  • सोहन बडा परिश्रमी है।
  • वहॉ लगभग बीस छात्र थे ।
  • ​राम अब बिल्कुल स्वस्थ है।

समान्य:प्रचलित प्रविशेषण निम्लिखित है

बहुत, बहुत,अधिक, अत्यधिक, अंत्यत ,बडा, खूब, बिल्कुल, थोडा ,कम, ठीक, पूर्ण लगभग।

विशेष्य प्रविशेषण और विशेषण में सम्बन्ध

विशेष्य:— जिसकी विशेषता बताई जा रही है। उसे विशेष्य कहते है।
  • जो विशेषण संज्ञा और  सर्वनाम की विशेषता बताते है,उसे विशेष्य कहते हैं। अर्थात
  • वाक्य में जिस संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बतायी जाती है उन्हें विशेष्य कहते हैं।
वाक्य में विशेषण का प्रयोग दो प्रकार से होता है- कभी विशेषण विशेष्य के पहले आता है और कभी विशेष्य के बाद।
प्रविशेषण – जो शब्द विशेषण की विशेषता बताते है, वे प्रविशेषण कहलाते है

विशषणों के पूर्व लगकर उनकी विशेषता बताने वाले विशेषण प्रविशेषण कहे जाते है। जैसे-

  •  पिताजी ने एक नई कार खरीदी।
  • मेरा भाई बनारस में रहता है।
  • यह लड़की बहुत अच्छी है।

विशेषण:—-जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने का कार्य करते हैं; ‘विशेषण कहलाते है।

जैसे

  • बडा —छोटा, सुंदर, कायर,निडर
प्रयोग की दृष्टि से विशेषण के भेद 
प्रयोग की दृष्टि से विशेषण के दो भेद है-
  •  विशेष्य-विशेषण
  • विधेय-विशेषण
(1)विशेष्य-विशेष– जो विशेषण विशेष्य से  पहले आकर उसकी विशेषता बताते है। उसे विशेष्य-विशेषण कहते है तथा वह विशेष्य-विशेष होता हैं।
जैसे-
  • रमेश ‘नटखट’ बालक है। अनीता ‘गम्भीर’ लड़की है।
इन वाक्यों में ‘रमेश’ और ‘अनीता’ क्रमशः बालक और लड़की के विशेषण हैं, जो संज्ञाओं (विशेष्य) के पहले आये हैं।
(2) विधेय-विशेषण- जो विशेषण विशेष्य और क्रिया के बीच आकर उसकी विशेषता बताते है,उसे विधेय-विशेषण कहते है तब  वहाँ  पर विधेय-विशेषण होता हैं।
जैसे-
  • मेरा घोडा ‘काला’ हैं। मेरा दामाद ‘आलसी’ है। इन वाक्यों में ‘काला’ और ‘आलसी’ ऐसे विशेषण हैं,
जो क्रमशः ‘घोडा'(संज्ञा) और ‘है'(क्रिया) तथा ‘दामाद'(संज्ञा) और ‘है'(क्रिया) के बीच आये हैं।
 ध्यान रखने योग्य बातें ———
 (क) विशेषण के लिंग, वचन आदि विशेष्य के लिंग, वचन आदि के अनुसार होते हैं।
जैसे-
  • अच्छे बच्चे पढ़ते हैं।
  • रानी भोली लड़की है।
  • राजू बुरा लड़का है।
(ख) यदि एक ही विशेषण के अनेक विशेष्य हों तो विशेषण के लिंग और वचन समीपवाले विशेष्य के लिंग, वचन के अनुसार होंगे;
जैसे-
  • नये पुरुष और नारियाँ, नयी धोती और कुरता।

विशेषण की विशेषता और उसके कार्य

 

विशेषण के निम्नलिखित विशेषता और प्रमुख कार्य हैं-
  • यह एक विकारी शब्द है।:—
  • विशषण के द्वारा किसी भी वाक्य का स्वरूप स्पष्ट किया ता सकता है।
  • विशेषण के प्रयोग के द्वारा वस्तु को सजीव व मूर्तिमय रूप प्रदान करता है।
  • विशेषणों के द्वारा हमें प्रश्नों के उत्तर प्राप्त होते है। जैसे मम्मी ने कितनी चॉकलेट दी।
  • विशेषण के द्वारा किसी व्यक्ति या वस्तु की विशेषता बताई जाती है। जैसे-राधा सुंदर लडकी है। है। यहाँ ‘सुन्दर’ राधा की विशेषता बताता है।
  • विशेषण किसी की हीनता भी बताता है। जैसे- वह लड़का शैतान है। यहाँ ‘शैतान’ लड़के की हीनता बताता है।
  • विशेषण द्वारा अर्थ को सीमित रूप प्रदान  किया जा सकता है। जैसे- काला कुत्त । यहाँ’काला’ शब्द कुत्ता के एक विशेष प्रकार का अर्थबोध कराता है।
  • विशेषणों के द्वारा  संख्या निर्धारित की जा सकती है तथा संख्या के दोनो रूपों  निश्चिता और  अनिश्चिता का बोध  कराते है। है
  • जैसे- एक आम दो। यहाँ ‘एक’ शब्द से आम की संख्या निर्धारित होती है।
  • विशेषणों  के द्वारा निश्चित  और  अनिश्चित परिणाम या मात्रा  के दोनों  रूपों को जाना जा सकता है।। जैसे- पाँच सेर दूध। यहाँ ‘पाँच सेर’ से दूध की निश्र्चित  मात्रा का अर्थबोध होता है।

विशेषण के प्रकार

 

विशेषणों को अलग अलग मतों के द्वारा भिन्न् भिन्न् प्रकार बताये गए है। लेकिन विशेष रूप से मूलत: चार प्रकार होते है।

विशेषण निम्नलिखित प्रकार के होते है –

  • गुणवाचक विशेषण (Qualitative Adjective)
  • संख्यावाचक विशेषण ((Numeral Adjective)
  • परिमाणवाचक विशेषण (Quantitative Adjective)
  • संकेतवाचक या सार्वनामिक विशेषण (Demonstrative Adjective)
  • नामिक विशेषण (Nominal Adjective)
  • व्यक्तिवाचक विशेषण (Proper Adjective)
  • संबंधवाचक विशेषण(Relative Adjective)


(1)गुणवाचक विशेषण (Qualitative Adjective)
:-

जो विशेषण अपने विशेष्य के गुण—दोष्, रूप—रंग, आकार—प्रकार, स्वभाव आदि से संबधित विशेषताओं के बारे में सकेंत करते है। गुणवाचक विशेषण कहलाते है।


दूसरे शब्दों में—
वे विशेषण शब्द जो संज्ञा या सर्वनाम शब्द के गुण-दोष, रूप-रंग, आकार, स्वाद, दशा, अवस्था, स्थान आदि की विशेषता प्रकट करते हैं, गुणवाचक विशेषण कहलाते है।


सरल शब्दों में
—जो विशेषण हमें संज्ञा या सर्वनाम के रूप, रंग आदि का बोध कराते हैं वे गुणवाचक विशेषण कहलाते हैं।-

  • गुण- वह लडका अच्छा है, वह प्यारी लडकी है।
  • रंग- काला घोडा दौड रहा है, राम ने लाल टोपी पहनी है।
  • आकार- बडा पेड टूट गया ,उसका चेहरा गोल है।
  • अवस्था- भूखे पेट भजन नहीं होता, वह कमजोर है

 

विशेष:-

 

संज्ञा विशेष्य पर कैसा/ कैसी/ कैसे शब्दों से प्रशन किए जाते है तथा इन प्रश्नों के उत्तर में जो शब्द मिलते है। वे गुणवाचक विशेषण होते है। 

–सरल शब्दों में —गुणवाचक वे विशेषण है जिसमें विशेष्य के साथ कैसा/कैसी लगाकर प्रश्न करने पर उत्तर प्राप्त किया जाता है,वह उत्त्रर ही  विशेषण होता है।विशेषणों में इनकी संख्या सबसे अधिक है।

–गुणवाचक विशेषण अनेक प्रकार के हो सकते है।तथा गुणवाचक विशेषणों के द्वारा संज्ञा या सर्वनाम शब्दों की
निम्नलिखित विशेषताओं का बोध होता है।

 

-गुण बोधक—  योग्य, परिश्रमी,उदार,निश्छल सहासी दयालु सच्चा समझदार श्रेष्ठ  भला, उचित, अच्छा, ईमानदार, सरल, विनम्र, बुद्धिमानी, सच्चा, दानी, न्यायी, सीधा, शान्त आदि।

दोषबोधक
बुरा,छली,कपटी,अन्यायी,क्रोधी,कृपण,कंजूस,अनुदार,निर्दयी,दुस्साहसी,आलसी,मूर्ख,बुरा,कामचोर,कुटिल,तुच्छ,कायर अनुचित, झूठा, क्रूर, कठोर, घमंडी, बेईमान, पापी, दुष्ट आदि।

 

-रूप/रंग बोधक– काला, गोरा, सॉवला,आकर्षक, सुंदर , लाल, पीला, नीला, हरा, सफेद, काला, बैंगनी, सुनहरा, चमकीला, धुँधला, फीका।

 

-आकार/प्रकार बोधक — खुरदरा,टेढा,बेढंगा,चौरस,आयताकार,  गोल, चौकोर, सुडौल, समान, पीला, सुन्दर, नुकीला, लम्बा, चौड़ा, सीधा, तिरछा, बड़ा, छोटा, चपटा, ऊँचा, मोटा, पतला आदि।

 

-स्वादबोधक-  फीका,मधुर कसैला,तीता,मीठा, कड़वा, नमकीन, तीखा, खट्टा, सुगंधित आदि

-अवस्था/दशा बोधक —अधेड,युवा,बाल्य,प्रौड, ​धनी—निर्धन,अमीर— गरीब,दुबला, पतला, मोटा, भारी, पिघला, गाढ़ा, गीला, सूखा, घना, , उद्यमी, पालतू, रोगी, स्वस्थ, कमजोर, हल्का, बूढ़ा आदि।

 

-स्थानबोधक-  बिहारी,झारखंडी,छतीसगढी,लुधियानवी,जालंधरी, पंजाबी, अमेरिकी, भारतीय, विदेशी, ग्रामीण, शहरी,पहाडी,चीनी,जापानी,उजाड़, चौरस, भीतरी, बाहरी, उपरी, सतही, पूरबी, पछियाँ, दायाँ, बायाँ, स्थानीय, देशीय, क्षेत्रीय,  आदि।

 

-कालबोधक– दैनिक,साप्ताहिक,पाक्षिक,मासिक,वार्षिक,नवीन,समकालीन,अर्वाचीन, नया, पुराना, ताजा, बासी, भूत, वर्तमान, भविष्य, प्राचीन, अगला, पिछला, मौसमी, आगामी, टिकाऊ, , सायंकालीन, आधुनिक, , मासिक आदि।

 

-स्थिति/दिशाबोधक-अगला ,पिछला ,बाहरी, निचला, ऊपरी, उत्तरी, पूर्वी पश्चिमी,दक्षिणी,पूर्वोतरी,पश्चिमोतरी  आदि।

 

-स्पर्शबोधक-चिकना,कठोर,स्निग्ध,मुदुल, मुलायम, सख्त, ठंड, गर्म, कोमल, ख़ुरदरा आदि।

 

-स्वभाव बोधक – हॅसमुख,खुशमिजाज, चिड़चिड़ा, मिलनसार आदि।

 

-गंध बोधक–   खुशबुदार,सुवासित,गंधमय,दुर्गंधमय,बदबूदार, सुगंधित,  दुर्गंधपूर्ण आदि।

 

-व्यवसाय बोधक– व्यापारी, औद्योगिक, शौक्षणिक, प्राविधिक आदि।

 

-पदार्थ बोधक– सूती, रेशमी, ऊनी, कागजी, फौलादी, लौह आदि।

 

-समयबोधक– अगला, पिछला, बौद्धकालीन, प्रागैतिहासिक, नजदीकी आदि।

 

-तापमानबोधक- ठंडा, गरम, कुनकुना आदि।

 

-ध्वनिबोधक– मधुर, कर्कश आदि।

-भारबोधक– हल्का, भारी आदि।

-द्रष्टव्यबोधक– गुणवाचक विशेषणों में ‘सा’ सादृश्यवाचक पद जोड़कर गुणों को कम भी किया जाता है।

  • जैसे- बड़ा-सा, ऊँची-सी, पीला-सा, छोटी-सी।

(2)संख्यावाचक विशेषण((Numeral Adjective)

जिन विशेषण शब्दों से संख्या का बोध हो उन्हें संख्यावाचक विशेषण कहते हैं।

उदहारण के लिए—

  • सात लोग, चार गाय, तीसरी कक्षा,दस कमरे,


सरल शब्दों में
— ऐसे  विशेषण शब्द जिनसे संज्ञा अथवा सर्वनाम की संख्या की विशेषता का  बोध होता हैं,उन्हें संख्यावाचक विशेषण कहते हैं। जैसे—

  • चौथी मंजिल,कुछ लोग,ढाईसौ छात्र, सारे पेड बहुत जानवर आदि।


दूसरे शब्दों में
– वह विशेषण, जो अपने विशेष्यों की निश्चित या अनिश्चित संख्याओं का बोध कराए, ‘संख्यावाचक विशेषण’ कहलाता है। उदहारण के लिए—एक, दो,तीसरा,चौथा, दुगुना आदि।

जैसे-

  • राम का पहला पुत्र डॉक्टर है।
  • सोहन दसवीं कक्षा में पढता है।
  • हमारी कालोनी में सोलह मकान है।

इन वाक्यों में ‘पहला’,’दसवीं ‘औा ‘सोलह’संख्यावाचक विशेषण हैं,

अन्य शब्दों में—जो विशेषण अपने विशेष्य की संख्या—संबंधी विशेषता का बोध कराते है। संख्यावाचक विशेषण’ कहलाता है।

जैसे-

  • ‘पाँच’ घोड़े दौड़ते हैं।
  • सात विद्यार्थी पढ़ते हैं।

इन वाक्यों में ‘पाँच’ और ‘सात’ संख्यावाचक विशेषण हैं, क्योंकि इनसे ‘घोड़े’ और ‘विद्यार्थी’ की संख्या संबंधी विशेषता का ज्ञान होता— है।

संख्यावाचक विशेषण के भेद

संख्यावाचक विशेषण के दो भेद होते है-

  1. निश्चित संख्यावाचक विशेषण
  2. अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण


(i)निश्चित संख्यावाचक विशेषण :
जो  विशेषण संज्ञा या सर्वनाम शब्दों की संख्या  संबंधी- निश्चित विशेषता का बोध कराते है।उन्हें निश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते हैं।


दूसरे शब्दों में
—वे विशेषण शब्द जो विशेष्य की निश्चित संख्या का बोध कराते हैं,निश्चित संख्यावाचक विशेषण कहलाते हैं।


सरल शब्दों में
– जिन विशेषण शब्दों से  किसी भी निश्र्चित संख्या का ज्ञान/बोध होता है।, वह निश्चित संख्यावाचक विशेषण होते  है।

जैसे-

  • एक, दो आठ,  पॉच,तीगुना,चौगुना, सातवाँ आदि।

अन्य उदाहरण-

  • मेरी कक्षा में चालीस छात्र हैं।
  • कमरे में एक पंखा घूम रहा है।
  • डाल पर दो चिड़ियाँ बैठी हैं।
  • प्रार्थना-सभा में सौ लोग उपस्थित थे।

इन सभी वाक्यों में विशेष्य की निश्चित संख्या का बोध हो रहा हैं। जैसे- कक्षा में कितने छात्र हैं?- चालीस, कमरे में कितने पंखे घूम रहे हैं?- एक, डाल पर कितनी चिड़ियाँ बैठी हैं?- दो तथा प्रार्थना-सभा में कितने लोग उपस्थित थे?- सौ।

निश्चित संख्यावाचक विशेषणों से संज्ञा या सर्वनाम की निम्नलिखित  विशेषता या प्रकार का बोध होता हैं-

 

(क) गणनासूचक/बोधक विशेषण-  जिन  विशेषणों से गिनती/गणना और अकों का बोध कराएँ।

  • जैसे-  तीन, सात ,तेरह, सवा, अढाई,डेढ सौ,एक, दो, दस, बीस आदि।

उदहारण

  • राम के दो बेटे है।
  • नौकर ने सवा सौ रूपए लिए।
  • कक्षा में पॉच छात्र है।

 

इसके भी दो प्रभेद होते हैं-

(1) पूर्णांकबोधक विशेषण- इसमें पूर्ण संख्या का प्रयोग होता है।

  • जैसे- चार छात्र, आठ लड़कियाँ।

(2) अपूर्णांकबोधक विशेषण- इसमें अपूर्ण संख्या का प्रयोग होता है।

  • जैसे- सवा रुपये, ढाई किमी. आदि।

 

(ख) क्रमसूचक/बोधक विशेषण– जो विशेषण क्रम का बोध कराएॅ अर्थात  वे विशेषण जो वस्तुओं या व्यक्तियों के क्रम (order) का बोध कराएँ। क्रमसूचक/बोधक विशेषण  है।

  • जैसे-  छठा,सातवीं,सौवी, आठवी,अठाहरवॉ,दूसरी,पाँचवाँ, बीसवाँ आदि।

 

उदहारण:—

  • हम आठवी मंजिल पर रहते है।
  • रीना की दूसरी बहन दिल्ली में है।

(ग) आवृत्तिसूचक/बोधक विशेषण- जो विशेषण संख्या के गुणन का बोध कराएँ।

  • जैसे- दुगने छात्र, ढाई गुना लाभ आदि।

उदहारण:—

  • राधा चतुर से ​तिगुनी तनख्वाह पाती है।
  • लोगों को तुम्हारे दोहरे व्यक्तित्व का पता चल ही गया।

(घ) संग्रह सूचक/बोधक विशेषण– यह अपने विशेष्य की सभी इकाइयों का संग्रह बतलाता है।

  • जैसे- चारो आदमी, आठो पुस्तकें आदि।

उदहारण:—

  • राधा के चारो बेटे मूर्ख है।
  • सुधा ने आठों धामों के दर्शन कर लिए

(ड़) समुदाय/समुच्चयसूचक/बोधक विशेषण– यह वस्तुओं की सामुदायिक संख्या को व्यक्त करता है।

  • जैसे- दर्जन, कौडी, सैंकडा ,सतसई,शतक, चौका, पंसेरी, दुक्की, छक्का तिग्गी आदि।

उदहारण:—

  • रेखा ने जोड़ी चप्पल खरीदी।
  • गोपाल पाँच दर्जन कॉपियाँ  लाया।।
  • पूजा ने दर्जन केले खरीदे।
  • शयाम ने चार दस्ते का रजिस्टर बनाया।

(च) वीप्सासूचक/बोधक विशेषण- व्यापकता का बोध करानेवाली संख्या को वीप्सावाचक कहते हैं

यह दो प्रकार से बनती है– संख्या के पूर्व प्रति, फी, हर, प्रत्येक इनमें से किसी के पूर्व प्रयोगसे या संख्या के द्वित्व से।जैसे

  •  प्रत्येक तीन घंटों पर यहाँ से एक गाड़ी खुलती है।
  • पाँच-पाँच छात्रों के लिए एक कमरा है।


(ii)अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण :-
जो  विशेषण संज्ञा या सर्वनाम शब्दों की संख्या संबंधी- निश्चित विशेषता का बोध  नहीं कराते है।उन्हें अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते हैं,जैसे:—

  • सुनामी में बहुत सारे लोग मारे गए।
  • लंका में अनेक महल जल गए।
  • बम के भय से कुछ लोग बेहोश हो गए।


सरल शब्दों में
:—वे विशेषण शब्द जो विशेष्य की निश्चित संख्या का बोध न कराते हों, वे अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण कहलाते हैं।

जैसे:—

  • सारे आम सड़ गए।
  • पुस्तकालय में असंख्य पुस्तकें हैं।
  • कक्षा में बहुत कम छात्र उपस्थित थे।
  • कुछ फल खाकर ही मेरी भूख मिट गई।


दूसरे शब्दों में
– जिस विशेषण से संख्या निश्चित रूप से नहीं जानी जा सके, वह अनिश्चित विशेषण है।जैसे-

  • कई, कुछ, सब, थोड़, सैकड़ों, अरबों आदि।

अन्य उदाहरण

  • वह कुछ महीने से गायब है।
  • मुझे थोडे रूपये चाहिए।
  • इस अस्पताल में बहुत मरीज है।
  • तुम उसे सभी दिशाओं में ढूढों
  • पिताजी ने बहुत केले खरादे
  • वह इस घडी की बहुत कीमत मॉग रहा है।
  • चुनावों में कई गुंडे भी खडे थे।

इन सभी वाक्यों में विशेष्य की निश्चित संख्या का बोध नहीं हो रहा है? क्योकि कुछ, थोडे ,बहुत,सभी ,कई आदि ये सभी शब्द अनिश्चित संख्या का बोध करा रहे है।

(3)परिमाणवाचक विशेषण(Quantitative Adjective) :-

परिमाण शब्द का अर्थ है—मात्रा
अन्य शब्दों में —जो विशेषण अपने विशेष्य की मात्रा या परिणाम संबंधी विशेषता का बोध कराते है,वे परिमाणवाचक विशेषण कहलाते हैं।
  • जैसे- ‘सेर’ भर दूध, ‘तोला’ भर सोना,आदि।
सरल शब्दों में —जिन विशेषण शब्दों से किसी वस्तु पदार्थ के माप या नाप-तोल का बोध होता है, वे परिमाणवाचक विशेषण कहलाते हैं।
दूसरे शब्दों में- ऐसे विशेषण शब्द जिनसे संज्ञा और सर्वनाम शब्दों की नाप तौल संबंधी विशेषता का बोध होता है,उन्हें  परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं। अर्थात
हम कह सकते है कि—जो विशेषण  अपने विशेष्यों की निश्चित अथवा अनिश्चित मात्रा (परिमाण) का बोध कराए, परिमाणवाचक विशेषण कहलाता है।
जैसे—
  • पॉच किलो चीनी, डेढ लीटर दूध, बहुत सामान, थोडी मिठाई, इतना विश्वास, इतनी हिम्मत, सौ टन लोहा आदि।
इन वाक्यों में  “डेढ लीटर,पॉच किलो,सौ टन” आदि से माप तोल का पता चलता है। इसलिए परिमाणवाचक विशेषण  हैं।
परिणाम विशेषण उन संज्ञा शब्दों की विशेषता बताते हैं जिन्हें गिना नहीं जा सकता है अर्थात वे द्रव्यवाचक संज्ञा शब्द होते है।जैसे —
  • कुछ चावल ,अधिक अनाज, थोड़ा’ पानी, ‘कुछ’ पानी, ‘सब’ धन, ‘और’ घी लाओ, ‘ ‘बहुत’ चीनी इत्यादि।
संख्यावाचक विशेषणों की ही तरह परिणाम विशेषण भी अपने विशेष्य के निश्चित तथा अनिश्चित परिणाम के बारे में बताते हैं। अत:इनके भी दो उपभेद किए जाते हैं
परिमाणवाचक विशेषण के भेद

परिमाणवाचक विशेषण के दो भेद होते है-
  1. निश्चित परिमाणवाचक विशेषण
  2. अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण
(i) निश्चित परिमाणवाचक:– निश्चित परिमाणवाचक विशेषण किसी संज्ञा या सर्वनाम के निश्चित परिणाम का बोध कराते है।
सरल शब्दों में कह सकते है कि— जो  विशेषण संज्ञा या सर्वनाम शब्दों  की परिणाम संबंधी निश्चित विशेषता का बोध कराते है। वे निश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहलाते है।
जैसे-
  • चार गज कपडा,दस लीटर दूध, एक क्विंटल गेंहू बीस ग्राम सोनाआदि।
वाक्य प्रयुक्त अन्य उदहारण:—
  • राधा एक किलो चावल लाई।
  • रोहन ने आधा लीटर दूध पी लिया ।
  • सीमा ने तीन मीटर तार खरीदी।
इन वाक्यों में आए ” एक किलो,आधा लीटर ,तीन मीटर” निश्चित परिमाणवाचक विशेषण है।
(ii)अनिश्चित परिमाणवाचक :– जिस अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण से किसी संज्ञा या सर्वनाम के निश्चित परिणाम का बोध  न हो, उन्हें अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहते है।
जैसे
  • कुछ आम, थोडा दूध, बहुत घी, कम चीनी, थोडा पानी आदि।
सरल शब्दों में कह सकते है कि —जो विशेषण शब्द किसी वस्तु की निश्चित मात्रा अथवा माप-तौल का बोध नहीं कराते हैं, वे अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहलाते है।
जैसे-
  •  कुछ आम, बहुत घी, कम चीनी,थोडा पानी ‘सब’ धन, ‘कुछ’ दूध, ‘बहुत’ पानीआदि।
वाक्य प्रयुक्त अन्य उदहारण:—
  • राम चावल ले आया।
  • चाय में थोडी—सी चीनी और डाल दो।
  • दाल में ज्यादा नमक पड गया है।

संकेतवाचक या सार्वनामिक विशेषण (Demonstrative Adjective)

जब सर्वनाम शब्द वाक्य में प्रयुक्त होकर किसी संज्ञा की विशेषता बताने का प्रकार्य करने लगते हैं तो वे सार्वनामिक विशेषण कहलाते है।
दूसरे शब्दों में —ऐसे सर्वनाम शब्द जो संज्ञा शब्दों के पहले आकर विशेषण का कार्य करते हैं या जानकारी देते है,उन्हें सार्वनामिक विशेषण कहते है।

सरल शब्दों में— यदि कोई सर्वनाम शब्द किसी संज्ञा शब्द से पहले लगकर अपना संबंध दर्शाए ,तब वे सार्वनामिक विशेषण कहलाते है।

उदहारण के लिए

  • वह बंदर शैतान हैं।
  • यह मेज  टूट गई है।
  • उसकी बहन अभिनेत्री है।
  • वहॉ कौन आदमी जा रहा है।
  • हमारा परिवार ह​​रियाणा में है।
  • इस कमरे को साफ कर दो।
  • किसी लडके को बुला दो।
इन वाक्यों में आए सार्वनामिक विशेषण है—वह, यह, कौन, उसकी ,हमारा, उस, किसी,इस आदि ये शब्द संज्ञा शब्दों से पहले लगकर उनकी विशेषता प्रकट कर रहें है।

विशेष

  • सर्वनाम  शब्द संज्ञा से पहले लगते है और उसकी विशेषता प्रकट करते है।
  • ऐसे सर्वनाम जो संज्ञा से पूर्व प्रयुक्त होकर उसकी ओर संकेत करते हुए विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं, ‘संकेतवाचक विशेषण’ कहलाते हैं।
  • जब सर्वनाम शब्द अपना प्रकार्य छोडकर किसी संज्ञा की विशेषता बताने का प्रकार्य करने लगते हैं तब वे विशेषण बन जाते हैं।
  • मेरा,तेरा,आपका,उसका,इसका,इनका,उनका,यह,वह,किसक,जिसका,आदि शब्द मूलत: विशेषण बन जाते हैं
  • जब ये संज्ञा शब्दों की विशेषता बताने लगते है। तब उनका सदंर्भ विशेषण बन जाता है। जैसे—यह मेज,वह कुरसी,आपका बेटा,  उनकी दुकान,मेरा घर ,अपना देश किसकी किताब आदि।
जिन सर्वनाम शब्दों से किसी के विषय में सकेंत पाया जाए, उन्हें  सार्वनामिक,संकेतवाचक या निर्देशक भी कहते है,
जैसे
  • यह घर हमारा है।—-निश्चय वाचक
  • यह बालक अच्छा है। — सार्वनामिक
  • उस श्रेणाी में बहुत शोर हो रहा है।—— निश्चय वाचक
  • तुम किस गली में रहते हो? ————प्रश्नवाचक
  • यहीं,यह,वह,उस,तथा किस संकेत वाचक विशेषण है।—- सार्वनामिक
पुरूषवाचक और निजवाचक सर्वनामों को छोड़ बाकी सभी सर्वनाम संज्ञा के साथ प्रयुक्त होकर सार्वनामिक विशेषण बन जाते हैं।
(मैं, तू, वह ) के सिवा अन्य सर्वनाम जब किसी संज्ञा के पहले आते हैं, तब वे ‘संकेतवाचक’ या ‘सार्वनामिक विशेषण’ बन जाते हैं।
सार्वनामिक विशेषण के अनेक रूप हो सकते है।
निश्चयवाचक/संकेतवाचक सार्वनामिक विशेषण———
  • उस किताब को यहॉ ले आओ।
  • क्या यह कलम तुम्हारी है।
अनिश्चयवाचक सार्वनामिक विशेषण———
  • कोई सज्जन आए हुए हैं।
  • घर में खाने को कुछ चीज नहीं है।
प्रश्नवाचक सार्वनामिक विशेषण——
  • कौन आदमी आया है?
  • किस लडके ने तुम्हें मारा है?
  • कौन सी किताबें तुम्हें चाहिए?
संबंधवाचक सार्वनामिक विशेषण———
  • जो आदमी कल आया था वह आदमी बहार बैठा है।
  • वह बालक सामने जा रहा है जिसने तुम्हारी किताब फाडी थी ।


सार्वनामिक विशेषण के भेद


व्युत्पत्ति के अनुसार सार्वनामिक विशेषण के भी दो भेद है
  1.  मौलिक सार्वनामिक विशेषण
  2. यौगिक सार्वनामिक विशेषण
(i) मौलिक सार्वनामिक विशेषण– जो सर्वनाम बिना रूपान्तर के मैलिक रूप में संज्ञा के पहले आकर उसकी विशेषता बतलाते हैं।    मौलिक सार्वनामिक विशेषण कहलाते हैं,उन्हें इस वर्ग में रखा जाता है।
जैसे-
  •  यह घर मेरा है।
  • वह लड़का सोहन है।
  • यह किताब फटी हुई है।
  • कोई आदमी रो रहा है।
  • कोई नौकर  काम के लिए है।इत्यादि।
(ii) यौगिक सार्वनामिक विशेषण– जो मूल सर्वनाम रूपान्तरित होकर संज्ञा शब्दों की विशेषता बतलाते है।उन्हें  यौगिक सार्वनामिक विशेषण कहा जाता है।
जैसे-
  • ऐसा आदमी नहीं देखा
  • कैसा घर  चाहिए
  • जैसा देश  वैसा भेष आदि।

नामिक विशेषण (Nominal Adjective)

​जिस तरह सर्वनाम शब्द वाक्य में प्रयुक्त होहर संज्ञा की विशेषता बताते है,उसी तरह संज्ञा शब्द अन्य शब्दों की विशेषता बता सकते है। जैसे:—
  • सोने के गहने,प्लास्टिक के बरतन , सिलाईकी मशीन,कूडे का ढेर,मावे की बरफी,गन्ने का रस,बैंगन का भरता, मक्के की रोटी,भिंडी की सब्जी,रबर की चप्पल,आम का वृक्ष,सुरेश की बहन,पिताजी का कमरा आदि।
इन उदहारणों में समस्त स्थूल संज्ञा अपने अपने संज्ञा पदों की विशेषता बता रहे हैं।
अर्थात हम कह सकते है कि जो संज्ञा शब्द किसी अन्य संज्ञा की विशेषता बताने का प्रकार्य करते हैं। उन्हें  नामिक विशेषण कहते है।
उदहारण के लिए
  • कल रीना की शादी है।
  • इन दिनों बच्चों के स्कूल बंद हैं।
  • गंगा की सफाई बहुत जरूरी है।
  • असम की नदियों में बाढ आ गईहै।
  • पुलिस ने चोर की पिटाई की।

(ड) व्यक्तिवाचक विशेषण (Proper Adjective)

व्यक्तिवाचक विशेषण वह विशेषण है जो संज्ञा से बनकर/प्रयुक्त् होकर अन्य संज्ञा व सर्वनाम की विशेषता बताते है । वे व्यक्तिवाचक विशेषण कहलाते हैं।  जैसे-
  •  जोधपुरी जूती,काशमीरी सेव, बीकानेरी भुजिये
दूसरे शब्दों में– ऐसे शब्द जो संज्ञा के असल या विशेष रूप व्यक्तिवाचक संज्ञा में प्रयुक्त् हुए होते है, या बनते  हैं , वे व्यक्तिवाचक विशेषण कहलाते हैं। जैसे-
  • यथा- वह राम ही है, जो कल वहां खड़ा था
सरल शब्दों में ——व्यक्तिवाचक संज्ञा शब्दों से बने विशेषणों  को व्यक्तिवाचक विशेषण कहते हैं। एवं विशेषण शब्दों की रचना भी करते हैं।जैसे-
  • इलाहाबाद से इलाहाबादी
  • जयपुर से जयपुरी
  • बनारस से बनारसी
  • लखनऊ से लखनवी आदि।
उदाहरण-
  • ‘इलाहाबादी’ अमरूद मीठे होते है।
  • भरत जोधपुरी जूती पहनता हैं।
इस वाक्य में जोधपुर व्यक्तिवाचक संज्ञा शब्द है जो जोधपुरी में बदलकर व्यक्तिवाचक विशेषण हो गया है और जो जूती(जातिवाचक संज्ञा) की विशेषता बता रहा है।जैसे :-
  • इलाहबाद से इलाहाबादी ,
  • जयपुर से जयपुरी ,
  • बनारस से बनारसी , लखनऊ से लखनवी आदि।
व्यक्तिवाचक विशेषण के  कुछ अन्य उदाहरण
मुझे  खाने में भारतीय खाना बहुत पसंद है

ऊपर दिए गए उदाहरण में आप देख सकते हैं भारतीय शब्द असल में तो व्यक्तिवाचक संज्ञा से बना भारत शब्द लेकिन अब भारतीय शब्द विशेषण की रचना कर रहा है। इस वाक्य में यह शब्द खाने कि विशेषता बता रहा है। अतः यह उदाहरण व्यक्तिवाचक विशेषण के अंतर्गत आयेंगे।

  मुझे गुजराती साडी सभी साड़ियों में से सबसे ज्यादा पसंद है

जैसा कि आप ऊपर दिए गए उदाहरण में देख सकते हैं कि गुजराती शब्द का प्रयोग किया गया है। यह शब्द  गुजरात शब्द से बना है जो एक व्यक्तिवाचक संज्ञा है लेकिन अब यह बनारसी बनने के बाद यह विशेषण कि तरह प्रयोग हो रहा है। अतः यह उदाहरण व्यक्तिवाचक विशेषण के अंतर्गत आएगा।

• हमारी दूकान पर जयपुरी जूतियॉ मिलती हैं।
ऊपर दिए गए उदाहरणों में जैसा कि आप देख सकते हैं जयपुरी शब्द का इस्तेमाल किया गया है। यह शब्द जयपुर शब्द से बना है जो कि एक व्यक्तिवाचक संज्ञा है।
यह शब्द जयपुरी बनने के बाद विशेषण बन जाता हैं एवं अब इस वाक्य में जूतियों  कि विशेषता बता रहा है। अतः यह उदाहरण व्यक्तिवाचक विशेषण के  है।
जैसे: –
  • आपका यह लखनवी अंदाज़ मुझे अच्छा लगा।
  • हमारी दूकान पर जयपुरी मिठाइयां मिलती हैं।

संबंधवाचक विशेषण(Relative Adjective)

 

संबंधवाचक विशेषण की परिभाषा
संज्ञा,सर्वनाम, क्रिया, क्रिया विशेषणों में विशेषण शब्दों  आदि का प्रयोग करके किसी एक वस्तु या व्यक्ति का संबंध दूसरी वस्तु या व्यक्ति के साथ बताया जाता है। तो वह संबंधवाचक विशेषण कहलाता है।
जैसे:
  • पढाकू’ यह शब्द ‘पढना‘ शब्द से बना है जो एक क्रिया विशेषण है।
  • भीतरी : यह शब्द “भीतर” शब्द से बना है।
  • कटाई: यह शब्द “काटना” शब्द से बना है।
अन्य शब्दों में कह सकते है कि——ऐसे विशेषण शब्द जो किसी एक वस्तु की विशेषता को दूसरी वस्तु के साथ जोडते या संबंध  बताते है, उन्हें संबंधवाचक विशेषण कहते हैं।
इस तरह के विशेषण संज्ञा, क्रियाविशेषण तथा क्रिया से बनते हैं। जैसे-
  • आनन्द   से   आनन्दमय (‘आनन्द’ संज्ञा से)
  • बाहरी    से    ” बाहर’    (क्रियाविशेषण से),
  • खुला     से     “खुलना’   (क्रिया से)।
कुछ अन्य उदहारण
  • वह दयामय है|
  • बरामदा बाहर है|
  • वह गला हुआ है|

प्रश्नवाचक विशेषण(Question Adjective )

 

जिन शब्दों  के द्वारा  किसी भी संज्ञा या  सर्वनाम से सम्बधित जानकारी प्राप्त करने के लिए  प्रश्न/उत्तर पुछे या किए जाते है। वे प्रश्नवाचक विशेषण  कहलाते है।
जैसे :-
  • कौन सी पुस्तक है , कौन आदि आया था , वह क्या है ? आदि।
सरल शब्दों में—— ऐसे विशेषण शब्द जिनका प्रयोग करके हमें संज्ञा या सर्वनाम के बारे में अधिक से अधिक (सम्पूर्ण) जानकारी मिल जाती है,या प्राप्त हो जाती है।  ऐसे शब्द प्रश्नवाचक विशेषण  कहलाते है।
जैसे
  • कौन, क्या ,किसे, किसको, किसलिए आदि।

 

प्रश्नवाचक विशेषण के अन्य उदहारण

  • व्यक्ति कौन है ?,
  • ह चीज़ क्या है ? वे शब्द प्रश्नवाचक विशेषण कहलाते हैं।
  • विकास के साथ कहाँ गए थे तुम ?
  • मेरे जाने के बाद घर कौन आया था ?
  • तुम कौन सी किताब के बारे में बात कर रहे हो?

विशेषण  की रूप—रचना

विशेषण  की रूप—रचना संज्ञा की रूप रचना से पर्याय मिलती है।दोनों में रूपावली वर्ग निर्धारण लिंग पुल्ल्गि व स्त्रीलिंग और ध्वन्यात्मक स्वरूप अकारांत ईकारांत आदि पर होता है तथा रूपावली वचन एकवचन बहुवचन तथा विभक्ति मूल परसर्ग रहित,तिर्यक परसर्ग सहित के अनुसार चलती है।
नीचे विशेषणों की रूपावलीयों /तालिका  के द्वारा समझाया गया है।

रूपावली वर्ग—1 पुल्ल्गि (अकारांत)

 

  • विभक्ति                    एकवचन            बहुवचन
  • मूल परसर्ग  रहित —    अच्छा लडका—      अच्छे लडके
  • तिर्यक परसर्ग सहित—    अच्छे लडके को—  अच्छे लडकों को

संज्ञा की रूपावली वर्ग—1 में यह ध्याान रखना है कि यह संज्ञा तिर्यक बहुवचन में ओ’ विभक्ति लगता है।  यहॉ ‘ए’। ये प्रत्यय मात्रा के रूप  में ो लगते है।

रूपावली वर्ग—2 पुल्ल्गि अकारांत से भिन्न
  • विभक्ति         एकवचन             बहुवचन
  • मूल            सुंदर घर             सुंदर घर
  • तिर्यक          सुंदर घर, में          सुंदर घरों में
स्त्रीलिंग विशेषण
  • विभक्ति         एकवचन             बहुवचन
  • मूल           अच्छा/सुंदर लडकी—     अच्छी/सुंदर लड​कियॉ
  • तिर्यक          अच्छा/सुंदर लडकी ने    अच्छी/सुंदर लड​कियॉ ने

​नोट:—

  •   केवल पुल्ल्गि अकारांत विशेषणों में मूलरूप से भिन्न एक परिवर्तित रूप होता है।—–जैसे अच्छा मोटा, अच्छी मोटी
  • पुल्ल्गि अकारांत भिन्न तथा स्त्रीलिंग एक परिवर्तित रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
  • अत: यह सरल नियम बनाते है।
  • विशेषणों को ज्यों का त्यों प्रयुक्त किया जा सकता है।
  • केवल पुल्ल्गि अकारांत विशेषणों में मूल विभक्ति् एकवचन के अतिरिक्त सर्वत्र ‘ए’लगा रूप  प्रयुक्त किया जा सकता है।
  • अकारांत विशेषण के स्त्रीलिंग रूप ई लगाकर बनते है। जैसे अच्छा—अच्छी, मोटा—मोटी
  • किंतु कुछ फारसी विशेषण तथा इया शब्द उर्दू शैली में स्त्रीलिंग रूप ईकारांत रूप नहीं लेते है।
  • ये अकारांत विशेषण रूपावली वर्ग—2 के समान चलते है। न कि रूपावली वर्ग—1 के ।
हिंदी भाषा में विशेषण शब्दों की रचना संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, अव्यय आदि शब्दों के साथ उपसर्ग, प्रत्यय आदि लगाकर की जाती है।
विशेषणों की रूप-रचना निम्नलिखित अवस्थाओं में मुख्यतः संज्ञा, सर्वनाम और क्रिया में प्रत्यय लगाकर होती है-
कुछ शब्द मूल रूप से विशेषण होते है। जैसे—
  • निपुण, चतुर, सुंदर लेकिन कुछ प्रत्ययों तथा उपसर्गो्ं के लगाने से बनते है;
–संज्ञा में व्यक्तिवाचक संज्ञा से —बनारस से बनारसी,गाँधीवाद से गाँधीवादी, गुजरात से गुजराती,मुरादाबाद से मुरादाबादी, गाजीपुर से गाजीपुरी आदि।
–संज्ञा में जातिवाचक संज्ञा से———पुस्तक से पुस्तकीय, ,घर से घरेलू, ग्राम से ग्रामीण, शिक्षक से शिक्षकीय, परिवार से पारिवारिक,पहाड़ से पहाड़ी, कागज से कागजी आदि।
–सर्वनाम से
  • मैं से —मुझ—सा (सार्वनामिक विशेषण),
  • इतने—-  (संख्यावाचक विशेषण)
  • इतना — (परिमाणवाचक विशेषण)
  • उतने —  (संख्यावाचक विशेषण)
  • वैसा–    (सार्वनामिक विशेषण)
  • आप—सा – (सार्वनामिक विशेषण)
क्रिया से
  • चलना से चालू
  • भूलना से भूलक्क्ड ,
  • बेचना से बिकाउ
  • कमाना से कमाऊ,
  • भागना से भगोड़ा,
  • समझना से समझदार,
  • पठ से पठित,आदि।

अव्यय से—

  • बहार से बहारी
  • उपर से उपरी,
  • नीचे से निचला,
  • पीछे से पिछला, आदि।

विशेषणार्थकप्रत्यय से—

संज्ञा शब्दों को विशेषण बनाने के लिए जिन प्रत्ययों को जोडा जाता है। उन्हें विशेषणार्थक प्रत्यय कहते है। जैसे

  • इला,इक, ई,मान,वान, ईय आदि।
कुछ शब्द स्वंय विशेषण होते है और कुछ प्रत्यय लगाकर बनते है। जैसे
(1)’ई’ प्रत्यय से =  बोली,पारखी, सरकारी,थपकी,धमकी,टोली, जापान-जापानी, गुण-गुणी, स्वदेशी, धनी, पापी।
(2) ‘ईय’ प्रत्यय से = शासकीय, मानवीय, नारकीय,जाति-जातीय, भारत-भारतीय, स्वर्गीय, राष्ट्रीय ।
(3)’इक’ प्रत्यय से = ऐतिहासिक, मासिक, नैतिक, आर्थिक, सप्ताह-साप्ताहिक, वर्ष-वार्षिक, नागरिक, सामाजिक
(4)’इन’ प्रत्यय से =   पाप—पापिन, जोगी—जोगिन, तेली—तेलिन, माली—मालिन, कुल-कुलीन,
नमक-नमकीन, प्राचीन।
(5)’मान’ प्रत्यय से = बुद्धिमान,यजमान,वर्तमान, गति-गतिमान, श्री-श्रीमान।
(6)’आलु’प्रत्यय सेझगडालु, शर्मालु, लजालु, कृपा -कृपालु, दया-दयालु ।

(7)’वान’ प्रत्यय से =    सत्य—सत्यवान,दया —दयावान , बल-बलवान, धन-धनवान।

(8)’इत’ प्रत्यय से = नियम-नियमित, अपमान-अपमानित, आश्रित, चिन्तित ।

(9)’ईला’ प्रत्यय सेखर्च —खर्चीला,नोक—नुकीला,छवि—छबीला,रस—रसीला,चमक-चमकीला, हठ-हठीला, फुर्ती-फुर्तीला।

 

विशेषण शब्दों की रचना

हिंदी भाषा में विशेषण शब्दों की रचना संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, अव्यय आदि शब्दों के साथ उपसर्ग, प्रत्यय आदि लगाकर की जाती है।

संज्ञा शब्दों से विशेषण शब्दों का निर्माण/रचना

संज्ञा विशेषणसंज्ञाविशेषण
अंत
अतिमअभ्यास
अभ्यस्त
आदर
आदरणीय अवरोध
अवरुद्ध
विवाह
वैवाहिकआराधनाआराध्य.
दो
दूसराउत्तेजना
उत्तेजित
नगरनागरिकऋण
ऋणी
तुंदतुंदिल एकता एकआदि
प्रदेशप्रादेशिकआधार

आधारित
प्रकृतिप्राकृतिकआरम्भआरम्भिक
कथनकथिततत्त्वतात्त्विक
राधाराधेयदेव
दैविक/दैवी
गंगा
गांगेयसूर्यसौर/सौर्य
प्रसंग
प्रासंगिकहृदय
हार्दिक
पर्वतपर्वतीयक्षेत्रक्षेत्रीय
धनधनवानआदि
आदिम
दीक्षा
दीक्षितआकर्षणआकृष्ट
नियम
नियमितआयु
आयुष्मान
निषेधनिषिद्धअनुवाद
अनुदित
जटाजटिलअनुशासन
अनुशासित
इतिहासऐतिहासिकअपमानअपमानित
अंचल
आंचलिकअंक
अंकित
अपेक्षाअपेक्षित
अग्निआग्नेय
अध्यात्मआध्यात्मिकअर्थआर्थिक
उत्कर्षउत्कृष्टअधिकारअधिकारिक
उपकारउपकृत/गर्वगर्वीला
उपकारक
उपेक्षाघावघायल
काँटा
कँटीलाग्राम
ग्राम्य/ग्रामीण
उपेक्षितउपेक्षणीयग्रहणगृहीत/ग्राह्य
बुद्ध
बौद्धमृत्युमर्त्य
भूमिभौमिकमुख
मौखिक
तट
तटीयरसायनरासायनिक
परिवार
पारिवारिकराजनीतिराजनीतिक
पूजा
पूजनीयसभासभ्य
संकेत सांकेतिकइच्छाऐच्छिक
लघुलाघवईश्वर

ईश्वरीय
घरघरेलूउदयउदित
श्रद्धाश्रद्धेय/श्रद्धालुउन्नतिउन्नत
वनवन्यकर्मकर्मठ
लोभ

लुब्ध/लोभीक्रोधक्रोधालु, क्रोधी
उपयोगउपयोगी/उपयुक्तकर्मीकर्मण्य
गृहस्थ
गार्हस्थ्यसंसार
सांसारिक
गुणगुणवान/गुणीजलजलीय
चिंताचिंत्य/चिंतनीय/चिंतितअणुआणविक
जागरणजागरित/जाग्रतनिश्र्चय
निश्चित
तिरस्कारतिरस्कृतधर्मधार्मिक
दयादयालुदर्शन
दार्शनिक
परलोकपारलौकिकचयन
चयनित
कुंतीकौंतेय
निंदानिंद्य/निंदनीय
समरसामरिकनगरनागरिक
पुरस्कार
पुरस्कृतशोभा
शोभित
पुरुषपौरुषेयअनुभव
अनुभवी
उदास उदासीचमक
चमकीला
पृथ्वी पार्थिवमाता
मातृक
प्रमाण
प्रामाणिकराष्ट्रराष्ट्रीय
बुद्धिबौद्धिकलोहा
लौह
भूगोलभौगोलिक
लाभलब्ध/लभ्य
मासमासिकवायुवायव्य/वायवीय
शरीर शारीरिकधन धनी
ईमानदार
ईमानदारीसुख सुखी
सजावटसजावटी
शीत
शीतल
आत्मा
आत्मीयपुण्य
पुण्यमय
सब्जी
सब्जीवाला
हरियाणाहरियाणवी
भय भयभीत
मानव
मानवीय
जहर


जहरीलाविवाह
वैवाहिक
पीडा पीडितसाहित्य साहित्यिक

सर्वनाम शब्दों से विशेषण शब्दों निर्माण

सर्वनाम विशेषणसर्वनाम विशेषण
जोजैसा
यह

ऐसा
मैं मुझसा
कौन
कैसा
हमहमसाआप आपसी
वह
वैसातुमतुमसा
क्रिया शब्दों से विशेषण शब्दों निर्माण
क्रिया विशेषणक्रियाविशेषण
उडना
उडाकूभूलना
भूलक्क्ड
टिकना
टिकाउसडनास​डियल
सजाना

सजावटीपीनापियक्कड
खानाखाउ
कटना

कटाई

मरना
मरियलमिलन

मिलनसार
बेचना बिकाउलड़ना

लड़ाकू
तैरनातैराकखेलना
खिलाड़ी
पढना
पढाकूअडनाअडियल
कमानाकमाउभागना
भगोडा
घटनाघटितलूटनालुटेरा
पठपठितरक्षारक्षक

उड़ना उड़ाकू
उड़ाकू
पत् पतित
अव्यय शब्दों से विशेषण शब्दों निर्माण
अव्यय विशेषणअव्यय विशेषण
पीछे
पिछलाउपरउपरी
बाहर
बाहरीआगेअगला
भीतरभीतरीनीचे निचला

विशेषण की तुलना या अवस्थायें  (Degree of Comparison)

विशेषण विशेष्य की विशेषता बताता है और यह विशेषता  गुण, परिणाम अथवा संख्या की दृष्टि से होती है। दो या दो सेअधिक व्यक्तियों, प्रणियों,वस्तुओं आदि में एक से गुण प्राय: कम होते है। तथा इन सभी  विशेष्यों के गुण-अवगुणों  की तुलना की जाती है तो उन्हें ‘तुलनाबोधक विशेषण’ कहते हैं

अन्य शब्दो में — विशेषण शब्द संज्ञा और सर्वनाम की विशेषता प्रकट करने के साथ साथ ​कुछ स्थितियों में तुलना करने का कार्य भी करते है। तथा तुलना के द्वारा हम इस अंतर को समझाते है।
तुलना— वस्तुओं ,व्यक्तियों,के गुण दोष बतलाने या उनका आपस में मिलान करने को तुलना कहते है।
तुलना करने के विचार या दृष्टि से विशेषणों की तीन अवस्थाएॅ है।
  1. मूलावस्था (Positive Degree)
  2. उत्तरावस्था (Comparative Degree)
  3. उत्तमावस्था (Superlative Degree)
(i)मूलावस्था :- यह अवस्था पहली अवस्था होती है।  जिसमें  केवल विशेषणों का समान्य प्रयोग होता है। इस स्थिति में विशेषण तुलना नहीं करते है। अर्थात

जिस अवस्था में किसी  व्यक्ति या  वस्तु के गुण-दोष  को बताने के लिए  हम  जिन विशेषणों का  उपयोग करते है। वह  विशेषण की मूलावस्था कहलाती है

दूसरे शब्दों में– जिन  विशेषण शब्दों के द्वारा  केवल एक व्यक्ति या वस्तु की विशेषता का पता चलता है और किसी् दूसरे से तुलना करना सम्भव ना हो , उसे विशेषण की मूलावस्था कहते हैं।

इस अवस्था में विशेषण की किसी अन्य से विशेषण तुलना नहीं की जाती है। सीधे व्यक्त किया जाता है।
जैसे
  • यह बालक चंचल है।
  • यह आम बहुत मीठा है।
  • मीता घोष” योग्य” अध्यापिका है।
  • जीवनी “अज्ञेय” का नया उपन्यास है।
  • स्वर्गश्रम हरिद्वार का प्राचीन आश्रम है।
  • “नवभारत टाइम्स” दैनिक समाचार—पत्र है।
इसमें कोई तुलना नहीं होती, बल्कि सामान्य विशेषता बताई जाती है।
(ii)उत्तरावस्था :—-इसमें दो व्यक्तियों या पदार्थों की परस्पर तुलना की जाती है।
उत्तरावस्था में दो व्यक्तियों और प्रणियों आदि के गुण— दोषों की तुलना की जाती है। इसमें एक संज्ञा शब्दों को दूसरे संज्ञा शब्द से श्रेष्ठ या हीन दिखाया जाता है।अर्थात
अन्य शब्दों में कह सकते है कि—जब दो व्यक्तियों या वस्तुओं के बीच  के गुणों— दोषों की तुलना श्रेष्ठ या हीन के आधार पर की जाती है।  तब उसे विशेषण की उत्तरावस्था कहते हैं।
दूसरे शब्दों में- जिन विशेषण शब्दों में एक वस्तु की विशेषता को दूसरी वस्तु की विशेषता से अधिक  बताई जाती है,  तो वह विशेषण की उत्तरावस्था  होती है।
उत्तरावस्था में—  से, से कम, से अधिक,की अपेक्षा, से कहीं, आदि शब्द प्रयुक्त किए जाते है।
जैसे-
  • सीमा बहन से डरपोक है।
  • राजेश की अपेक्षा विकास कुजूस है।
  • मॉ से बढकर बेटी चालाक है।
  • अमृतसर की अपेक्षा हैदराबाद बडा शहर है।
  • गोपी राम से श्रेष्ठ वक्ता है।
उत्तरावस्था में केवल तत्सम शब्दों में ‘तर’ प्रत्यय लगाया जाता है। जैसे-
  • सुन्दर + तर >सुन्दरतर
  • महत् + तर >महत्तर
  • लघु + तर >लघुतर
  • अधिक + तर >अधिकतर
  • दीर्घ + तर > दीर्घतर
हिन्दी में उत्तरावस्था का बोध कराने के लिए ‘से’ और ‘में’ चिह्न का प्रयोग किया जाता है। जैसे-।
  • वह बालक गणेश से बडा है।
  • मेरा मकान तुम्हारे मकान से बडा है।
  • पंजाब में अधिकतम अन्न होता है।
विशेषण की उत्तरावस्था का बोध कराने के लिए ‘के अलावा’, की तुलना में’, ‘के मुकाबले’ आदि पदों का प्रयोग भी किया जाता है। जैसे-
  • दिल्ली के मुकाबले गोआ अधिक स्वच्छ है।
  • अंग्रेजी की तुलना में हिंदी सरल  है।
  • आपके अलावा वहाँ कोई उपस्थित नहीं था

(iii)उत्तमावस्था :– इसमें दो से अधिक व्यक्तियों या पदार्थों की परस्पर तुलना की जाती है।

यह विशेषण की सर्वोत्तम अवस्था है।इसमें (उत्तमावस्था) में अनेक वस्तुओं और प्रणियों आदि की तुलना की जाती है। इसमें किसी एक को कम श्रेष्ठ या सबसे कम दर्शाया जाता है।  तब वह अवस्था  विशेषण की उत्तमावस्था कहलाती है। अर्थात
अन्य शब्दों में जब दो या दो से  अधिक वस्तुओं और प्रणियों के बीच तुलना की जाती है और उनमें से एक को श्रेष्ठता  दी जाती है,उस अवस्था को  विशेषण की उत्तमावस्था कहते है।
दूसरे शब्दों में– जिन विशेषणों में किसी वस्तु की विशेषता को दूसरी सभी  वस्तुओं की विशेषता से अधिक गुणवान बताया जाए तथा  दूसरे को दोषी तो  वह विशेषण की उत्तमावस्था होती  है।
इसमें विशेषण द्वारा किसी वस्तु अथवा प्राणी को सबसे अधिक गुणशाली या दोषी बताया जाता है ,तथा  उनमें एक की दूसरी सब वस्तुओं या व्यक्तियों से न्युनता या अधिकता बतलाई जाती हैं ।
उत्तमावस्था में सर्वश्रेष्ठ,सबमें,सबसे बढकर,सर्वाधिक,सभी को आदि शब्द प्रयुक्त किए जाते है।
  • इन सब में से तुम सबसे सुन्दर हो।
  • हल्क सबसे ज्यादा बलवान है।
  • सभी महासागरों में प्रशांत महासागर विशालतम है
तत्सम शब्दों की उत्तमावस्था के लिए ‘तम’ प्रत्यय जोड़ा जाता है। जैसे-
  • सुन्दर + तम > सुन्दरतम
  • महत् + तम > महत्तम
  • लघु + तम > लघुतम
  • अधिक + तम > अधिकतम
  • श्रेष्ठ + तम > श्रेष्ठतम
‘श्रेष्ठ’, के पूर्व, ‘सर्व’ जोड़कर भी इसकी उत्तमावस्था दर्शायी जाती है।
जैसे
  • नीरज सर्वश्रेष्ठ लड़का है।
फारसी के ‘ईन’ प्रत्यय जोड़कर भी उत्तमावस्था दर्शायी जाती है।
जैसे
  • बगदाद बेहतरीन शहर है।
उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि विशेषण की उत्तरावस्था तथा उत्तमावस्था बताने के लिए एक या अधिक से तुलना की जाती है।

तुलनात्मक अवस्थाओं के रूप

विशेषण से पहले  ‘अधिक’, ‘सबसे अधिक’ लगाकर, तुलनात्मक विशेषण शब्द बनाए जाते है।
मूलावस्थाउत्तरावस्था उत्तमावस्था
बुद्धिमानअधिक बुद्धिमान सबसे अधिक बुद्धिमान
मोटाअधिक मोटा सबसे अधिक मोटा
अच्छा अधिक
अच्छा सबसेअधिक अच्छा
चालाक अधिक चालाक सबसे अधिक चालाक
अच्छी अधिक अच्छी सबसे अच्छी
बलवान अधिक बलवान
सबसे अधिक बलवान
संस्कृत और हिंदी के साथ ‘तर’ और तम’ प्रत्यय लगाकर तुलनात्मक विशेषण शब्द बनाए जाते है।
मूलावस्थाउत्तरावस्था उत्तमावस्था
लघुलघुतरलघुतम
सुन्दरसुन्दरतरसुन्दरतम
कोमलकोमलतरकोमलतम
कठोरकठोरतरकठोरतम
तीव्रतीव्रतरतीव्रतम
उच्च
उच्चतर
उच्त्तम
प्रियप्रियतरप्रियतम
निम्रनिम्रतर
निम्रतम
निकृष्टनिकृष्टतर निकृष्टतम
महत्महत्तर
महत्तम
महानमहानतरमहानतम
न्यूनन्यूनतरन्यूनतम
श्रेष्ठश्रेष्ठतरश्रेष्ठतम
मूलावस्थाउत्तरावस्थाउत्तमावस्था
चतुर
चतुरतरचतुरतम
अधिकअधिकतर
अधिकतम
प्रियप्रियतरप्रियतम
मधुर

मधुरतरमधुरतम
तीव्र तीव्रतर तीव्रतम
वृहत्
वृहत्तर वृहत्तम
विशाल विशालतर
विशालतम
उत्कृष्ट उत्कृष्टर उत्कृटतम
सुंदर सुंदरतर सुंदरतम
गुरु
गुरुतर गुरुतम

विशेषण  पर प्रभाव(Effect of Adjective)

विशेषण एक विकारी शब्द है। अत: इसके रूप में विकार परिवर्तन आता है।
यह प्रभाव चार प्रकार का होता है।
  • लिंग का प्रभाव
  • वचन का प्रभाव
  • कारक का प्रभाव
  • विशेषण का विशेषण प्रभाव
लिंग का प्रभाव:—यदि मूल विशेषण अकारांत हो और स्त्रीलिंग हो तो अकारांत विशेषण ईकारांत हो जाता है।
जैसे
  • मीठा——— मीठी    —-(चीनी)
  • विषैला——— विशैली—-( गैस)
  • बुरा————— बुरी —-(स्त्री)
  • धीमा———— धीमी—–( लौ)
  • छोटा———— छोटी —-(लडकी)
  • अच्छा ————अच्छी—-( घडी)
वाक्य में प्रयोग
  • आम मीठा है।———————  इमरती ​​मीठी है।
  • मेरा स्वर धीमा है।——————उसकी चाल धीमी है।
  • सॉप विषैला होता है।—————यह दवा विषैली है।
  • छोटा घोडा आ रहा है।————छोटी बिल्ली जा रही है।
  • बुरा काम मत करो।—————बुरी बात मत कहो।
  • यह अच्छा घर  है।——————यह अच्छी आदत है।
ध्यान देने योग्य बातें
अकारांत को छोडकर अन्य विशेषण स्त्रीलिंग विशेष्य के साथ भी अपरिवर्तित रूप में रहते है
  • दयालु पुरूष —————दयालु स्त्री
  • श्रद्धालु नर ———————श्रद्धालु नारी
  • नमकीन बिस्कुट———— नमकीन लस्सी
  • जोधपुरी साफा —————जोधपुरी साडी
  • विदेशी युवक ———————विदेशी युवती
  • शरारती लडका————— शरारती लडकी
अनिश्चित परिणाम वाचक विशेषण पर भी लिंग का प्रभाव नहीं पडता । जैसे —
  • दो आम——————————  दो लीची
  • चार लडके————————  चार लडकियॉ
  • दो किलो सेब————————दो किलो चीनी
वचन का विशेषण पर प्रभाव
यदि मूल विशेषण अकारांत हो विशेष्य बहुवचन पुल्लिंग हो तो अकारांत विशेषण एंकारांत हो जाता है।  उदहारण
  • छोटा ——छोटे
  • भला——- भले
  • लंबा——- लंबे
  • मीठा—— मीठे
  • अच्छा ——अच्छी
  • नीला ——-नीले
  • विषैला ——विषैले
  • काला ——–काले
वाक्य में प्रयोग
  • यह फल मीठा है। ———— ये फल मीठे है
  • यह बच्चा छोटा है। ————ये बच्चे छोटे है।
  • यह सॉप विषैला है।     ये सॉप विषैले है।
  • यह व्यक्ति भलाा है ———— ये व्यक्ति भले है।
  • अच्छा घोडा लाओ————— अच्छे घोडे लाओ।
  • काला कोट पहनो——————काले कोट पहनो
  • लंबा आदमी सोता है। —— लंबे आदमी सोते है।
  • यह फूल नीला है। ————— ये फूल नीले है।
ध्यान देने योग्य
  • यदि विशेष्य बहुवचन स्त्रीलिंग हो तो अकारांत विशेषण ईकारांत में परिवर्तित होता है।
कारक का विशेषण पर प्रभाव
यदि विशेष्य परसर्ग सहित हो तो अकारांत विशेषण एकवचन होते हुए भी एंकारांत हो जाता है।
  • अच्छा बालक पुस्तक पढता है। —— (परसर्ग रहित रूप)
  • अच्छे बालक पुस्तक पढते है।——   (परसर्ग सहित रूप)
  • रवि ने लंबा सॉप देखा।————     (परसर्ग रहित रूप)
  • रवि ने लंबे सॉप देखे—————     (परसर्ग सहित रूप)
  • दुशमन ने तीखा बाण मारा ———   ( परसर्ग रहित रूप)
  • दुशमन ने तीखे बाण मारे———      (परसर्ग सहित रूप)
विशेषण का विशेषण प्रभाव
यदि किसी वाक्य में एक विशेष्य के एक से अधिक विशेषणों हों तो उनमें एकरूपता होती है। ये सभी विशेषण या तो पुल्लिंग मेें होते हैअथवा स्त्रीलिंग में
  • राकेश छहरा, लंबा,गोरा लडका है।——— गरिमा छहीर लंबी गोरी लडकी है।
  • शांशक बुद्धिमान गुणवान अच्छा लडका है।———— रीना बुद्धिमती गुणवती अच्छी लडकी है।
यदि एक विशेषण के साथ अनेक विशेष्य हो तो विशेषण निकटस्थ विशेष्य के अनुरूप लगता है।  जैसे
  • काला कोट और टोपी
  • अच्छे आदमी और औरतें
विशेषण पुनरूक्त में प्रयुक्त होते है।
  • ये लम्बें लम्बें वृक्ष अच्छे प्रतीत होते है।
  • नन्हेंनन्हें बालक नृत्य करते है।

विशेषणों  में आपस में अंतर(Difference  between in Adjective)

सर्वनाम और सार्वनामिक विशेषण में अंतर

सर्वनाम वे शब्द है। जो संज्ञा के स्थान पर प्रयंक्त किए जाते हैं और प्रकार्य करते है। जो संज्ञा शब्दों द्वारा किया जाता है। इसलिए  संज्ञा के स्थान पर सर्वनाम तथा सर्वनाम के स्थान पर संज्ञा शब्द आ सकते है।

जब सर्वनाम स्वंय संज्ञा शब्दों विशेषता बताने लगते हैं तब वे सर्वनाम नहीं बल्कि सार्वनामिक विशेषण कहे जाते है। सार्वनामिक विशेषणों के स्थान पर कोई अन्य विशेषण तो आ सकता है,पर संज्ञा शब्द नहीं आ सकता

,जैसे —

  • उसका मकान बन गया है’वाक्य में उसका  विशेषण का कार्य कर रहा है। इसके स्थान पर कोई अन्य विशेषण शब्द जैसे —नया, पुराना, बडा छोटा,तो आ सकता है।
पर कोई संज्ञा शब्द नहीं अत्: संज्ञा की विशेषता बताने के कारण यहॉ उसका सार्वनामिक विशेषण है।

निश्चयवाचक सर्वनाम और सार्वनामिक विशेषण में अंतर

इन दोनों में सुक्ष्म अंतर है। निश्चयवाचक सर्वनाम किसी व्यक्ति,प्राणि,वस्तु,घटना आदि की निश्चिता का बोध कराता है।
जबकि सार्वनामिक विशेषण से व्यक्ति,प्राणि,वस्तु,घटना आदि की विशेषता प्रकट होती है।
जैसे —
  •  क) 1 गीता की पुस्तक है।——— यह पुस्तक गीता की है।
  • ख)  2 वह रीना का घर है। ———  वह घर रीना का है।
वाक्य 1 और 2 में यह और वह  क्रमश:गीता की पुस्तक और शीला का घर की निश्चिता का बोध कराते है। इसलिए निश्चय सर्वनाम हैं

जबकि ख के अर्तंगत वाक्य 1और 2 में  यह पुस्तक और वह घर  में यह पुस्तक की और वह घर की विशेषता बता रहें है।इसलिए सार्वनामिक विशेषण है।

संख्यावाचक तथा परिणाम वाचक विशेषण में अंतर

संख्यावाचक विशेषण हमेशा किसी ​​िनश्चित या अनिश्चित सख्या की ओर सकेंत करते है। उनके विशेष्य जातिवाचक संज्ञा शब्द होते हैं और उनको गिना जा सकता है।
जैसे
  • दस लोग,एक चोर,कुछ कमरे, बहुत छात्र आदि।

जबकि परिणाम अपने विशेष्य पनश्चित व अनिश्चित मात्रा बताते है।तथा इनके विशेष्यों संज्ञाओं को गिना जा सकता है। क्योंकि ये द्रवयवाचक संज्ञा शब्द होते है।

जैसे —

  • पॉच किलो सब्जी,दो किलो आटा, दस किलो बादाम,बहुत सामान,थोडे चावल,जरा—सी चाय आदि।

विशेषणों का  रूप परिवर्तन( रूपान्तर)

विशेषण शब्द लिंग वचन और कारक की दृष्टि से बदल जाते है।
विशेषण शब्दलिंगवचन
काला

काली काले
खट्टा खट्टीखट्टे
कडवाकडवीकडवे
पतला पतलीपतले
बुराबुरी बुरे
ममेराममेरी ममेरे
टेढाटेढीटेढे
हरा
हरी हरे
मोटा मोटी मोटा
भला भलीभले
सीधासीधीसीधे
मीठामीठीमीठे
रसीला
रसीली
रसीले
नीचा नीची
नीचे
लंबालंबी लंबे
विशेषण शब्दों  का संज्ञा शब्दों के रूप में प्रयोग
  • कई बार विशेषण शब्द का संज्ञा शब्दों के रूप में प्रयोग  किया जाता है।
  • भलों से म़ित्रता रखनी चाहिए।
  • मूर्खों से दूर रहना ही समझदारी है।
  • प्यासों के लिए पानी का प्रबंध किया गया।
  • बूढों के प्रति सम्मान की भवना रखो।
  • रोगियों को कम्बल दिए।
  • नागरिकों पर अनेक उत्तरदायित्व हैं।
  • बेईमानों की देश में भरमार है।
  • अनपढों के कारण लोकतंत्र का मजाक बन गया है।
  • निर्धरता के प्रति सरकार का ही दायित्व है।
  • सैनिकों ने सीमाओं की रक्षा में प्राण त्याग दिए।
इन वाक्यों में आए _शब्द विशेषण है। इन वाक्यों में ये शब्द संज्ञा के रूप में प्रयुक्त हुए है।

विशेषणों का रूपान्तर

विशेषण का अपना लिंग-वचन नहीं होता। वह प्रायः अपने विशेष्य के अनुसार अपने रूपों को परिवर्तित करता है। हिन्दी के सभी विशेषण दोनों लिंगों में समान रूप से बने रहते हैं; केवल आकारान्त विशेषण स्त्री० में ईकारान्त हो जाया करता है।
अपरिवर्तित रूप
(1) बिहारी लड़के भी कम प्रतिभावान् नहीं होते।
(2) वह अपने परिवार की भीतरी कलह से परेशान है।
(3) उसका पति बड़ा उड़ाऊ है।
परिवर्तित रूप
(1) अच्छा लड़का सर्वत्र आदर का पात्र होता है।
(2) अच्छी लड़की सर्वत्र आदर की पात्रा होती है।
(3) हमारे वेद में ज्ञान की बातें भरी-पड़ी हैं।
(4) विद्वान सर्वत्र पूजे जाते हैं।
(5) राक्षस मायावी होता था।
(6) राक्षसी मायाविनी होती थी।
जिन विशेषण शब्दों के अन्त में ‘इया’ रहता है, उनमें लिंग के कारण रूप-परिवर्तन नहीं होता।
जैसे-
  • मुखिया, दुखिया, बढ़िया, घटिया, छलिया।
  • दुखिया मर्दो की कमी नहीं है इस देश में।
  • दुखिया औरतों की भी कमी कहाँ है इस देश में।
उर्दू के उम्दा, ताजा, जरा, जिंदा आदि विशेषणों का रूप भी अपरिवर्तित रहता है।
जैसे-
  • आज की ताजा खबर सुनो।
  • पिताजी ताजा सब्जी लाये हैं।
सार्वनामिक विशेषणों के रूप भी विशेष्यों के अनुसार ही होते हैं।
जैसे-
  • जैसी करनी —–वैसी भरनी
  • यह लड़का——वह लड़की
  • ये लड़के——–वे लड़कियाँ
जो तद्भव विशेषण ‘आ’ नहीं रखते उन्हें ईकारान्त नहीं किया जाता है। स्त्री० एवं पुं० बहुवचन में भी उनका प्रयोग वैसा ही होता है। जैसे-
  • ढीठ लड़का कहीं भी कुछ बोल जाता है।
  • वहां के लड़के बहुत ही ढीठ हैं।
जब किसी विशेषण का जातिवाचक संज्ञा की तरह प्रयोग होता है तब स्त्री०- पुं० भेद बराबर स्पष्ट रहता है।
जैसे-
  • उस सुन्दरी ने पृथ्वीराज चौहान को ही वरण किया।
  • उन सुन्दरियों ने मंगल