अव्यय की परिभाषा अर्थ,भेद, पहचान,प्रयोग, विशेष और उदहारण – Indeclinable in Hindi

अव्यय (Indeclinable)की परिभाषा

उसी प्रकार  जिसका रूप सदैव एक ही बना रहता है। और उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता,अर्थात एक ही रूप में बने रहने के कारण इन्हें अव्यय कहते है और जिनमें कोई विकार उत्पन्न नहीं होता। उन्हें अविकारी पद कहते हैं।
जैसे—
  • सचिन आज वहॉं जाएगा।
  • राकेश और शशांक मेरे मित्र हैं।
  • मैं पिताजी के साथ मुंबई जा रहा है।
  • मैं भी जा रहा हूॅं
उपर के वाक्यों में’ आज’ ‘वहॉं ‘ ‘और’ ‘के साथ’ ‘वाह भी’ अव्यय हैं। इन शब्दों का रूप नहीं बदलता एक ही रूप में बने रहने के कारण इन्हें अव्यय कहते हैं।
अर्थात अव्यय वे पद शब्द हैं जिनमें  लिंग, वचन,पुरूष्, काल आदि के कारण कोई विकार या परिवर्तन नहीं होता।
अव्यय के अपरिवर्तित रूप के उदहारण
  • वाह! गीता धीरे धीरे चलने लगी।
  • वाह!लडकियॉं धीरे धीरे चलने लगी।
  • वाह!लडके धीरे धीरे चलने लगा।
  • वाह!पंखा धीरे धीरे चलने लगा।
  • वाह!पंखे धीरे धीरे चलने लगे।

अव्यय का अर्थ

शब्द—भेद के अंर्तगत यह ज्ञात होता है कि अव्यय या अविकारी शब्द वे होते है, जिनका रूप वाक्य में प्रयुक्त होने पर लिंग ,वचन , काल,पक्ष आदि के प्रभाव से नहीं बदलता और ये अपने मूल रूप में ही बने रहते है ।
अव्यय  शब्द का अर्थ है— जिसका व्यय न हो अर्थात जिसमें विकार न आए। इन्हें अविकारी पद कहते है।
दूसरे शब्दो में :—-वाक्य में प्रयुक्त होने के बाद, जिन शब्दों के रूप में लिंग,वचन, पुरूष, काल ,आदि व्याकरणिक कोटियों के प्रभाव से कोई परिवर्तन नहीं होता, अव्यय या अविकारी शब्द कहलाते है।
जैसे
उपर, नीचे,यहॉ वहॉ,आज, कल,तब,और,अथवा,में,पर,के उपर,के नीचे,, क्यों, वाह, आह, ठीक, अरे, और, तथा, एवं, किन्तु, परन्तु, बल्कि, इसलिए, अतः, अतएव, चूँकि, अवश्य, जब, तब, अभी, उधर, वहाँ, इधर, कब, क्यों अर्थात इत्यादि। ।
उदहारण के लिए:—
  • तुम यहॉं मत बैठो।
  • तुम चलो या फिर अपने भाई को भेज दो।
  • घर के बाहर क्या कर रहे हो।
  • वाह! कितना सुंदर दृश्य है।
  • राहुल ने ही गिलास तोडा है।

अव्यय के भेद

अव्यय निम्नलिखित चार प्रकार के होते है –
  • क्रियाविशेषण (Adverb)
  • संबंधबोधक (Preposition)
  • समुच्चयबोधक (Conjunction)
  • विस्मयादिबोधक (Interjection)
  • निपात अव्यय
क्रियाविशेषण :- जो अव्यय शब्द क्रिया की विशेषता बतलाते है, उन्हें क्रिया विशेषण कहा जाता
दूसरे शब्दो में-:- जिन शब्दों से क्रिया, विशेषण या दूसरे क्रियाविशेषण की विशेषता प्रकट हो, उन्हें क्रियाविशेषण’ कहते है। जैसे :—
जहाँ पर यहाँ , तेज , अब , रात , धीरे-धीरे , प्रतिदिन , सुंदर , वहाँ , तक , जल्दी , अभी , बहुत आते हैं वहाँ पर क्रियाविशेषण अव्यय होता है
उदहारण के लिए
  • वह प्रतिदिन नवाज पढता है।
  • मैं तुम्हारे सामने ही खडा था।
  • वहॉ कौन खडा है।
  • आप मुझसे कल मिलिएगा।
  • इतना खाओ की पच जाए।
  • धीरे बालो यह लाइब्रेरी है।
उपर दिए गए वाक्यों में प्रयुक्त प्रतिदिन ,वहॉ ,सामने,कल,धीरे तथा इतना अपनी अपनी क्रियाओं की विशेषता बताने का कार्य कर रहे है। क्रिया की विशेषता बताने के कारण ये शब्द क्रिया विशेषण हैं।

नोट:—

  • क्रियाविशेषण अविकारी विशेषण भी कहलाते हैं।
  • इसके अतिरिक्त, क्रियाविशेषण दूसरे क्रियाविशेषण की भी विशेषता बताता हैं। जैसे—राम धीरे-धीरे टहलता है;
  • इस वाक्य में ‘बहुत’ क्रियाविशेषण है; क्योंकि यह दूसरे क्रियाविशेषण ‘धीरे’ की विशेषता बतलाता है।
क्रिया विशेषण शब्दों की  विशेषता निम्न प्रकार से बताई जाती है
  •  क्रिया के घटित होने के स्थान बताकर अर्थात क्रिया कहॉं घटित हुई
  •  क्रिया के घटित होने के समय बताकर अर्थात क्रिया कब  घटित हुई।
  •  क्रिया के घटित होने के तरीका बताकर अर्थात क्रिया कैसे घटित हुई।
  •  क्रिया के घटित होने का परिणाम या मात्रा  बताकर अर्थात क्रिया कितनी मात्रा में घटित हुई।
इन्ही आधारों पर क्रिया विशेषण की विशेषता निम्न प्रकार से बताई गई है। अत:अर्थ के अनुसार क्रियाविशेषण अव्यय के भेद  है।
  •  रीतिवाचक क्रियाविशेषण
  • कालवाचक क्रियाविशेषण
  •  स्थानवाचक क्रियाविशेषण अव्यय
  • परिमाणवाचक क्रियाविशेषण अव्यय
रीतिवाचक क्रियाविशेषण:—  जिन क्रियाविशेषण शब्दों से क्रिया के ढ़ंग या रीति की विशेषता का बोध होता है। उन्हें रीतिवाचक क्रियाविशेषण कहते है।
दूसरे शब्दों में:— जो शब्द क्रिया के घटित होने की रीति या विधि की सूचना  देते है। वे रीतिवाचक क्रियाविशेषण कहलाते है।
जैसे-
  • राधा मधुर गाती है।
  • चीता तेज दौड़ता है।
  • प्रेशर कुकर अचानक फट गया।
  • आपने उचित कहा है।
  • पुस्तकालय खोलने के लिए सहयोग यथाशक्ति देंगे।
  • यदि सम्मान पूर्वक आमंत्रित किया गया तो अवश्य जाएगें
उपर्युक्त वाक्यों में ‘मधुर’ तथा ‘तेज’,अचानक,उचित ,यथाशक्ति, अवश्य,शब्द रीतिवाचक क्रिया-विशेषण हैं
क्योंकि ये क्रमशः ‘गाती’ तथा ‘दौड़ता’ क्रियाओं की रीति या ढंग संबंधी विशेषता बतलाते हैं।

नोट :—

रीतिवाचक क्रिया-विशेषण  निम्न शब्दों के द्वारा पहचान की जा सकती है।  जैसे ———

सुखपूर्वक, शांतिपूर्वक वैसे , अचानक , इसलिए , कदाचित , यथासंभव , सहज , धीरे , सहसा , एकाएक , झटपट , आप ही , ध्यानपूर्वक , धडाधड , यथा , ठीक , सचमुच , अवश्य , वास्तव में , निस्संदेह , बेशक , शायद ,संभव है , हाँ , सच , जरुर , जी , अतएव , क्योंकि , नहीं , न , मत , कभी नहीं , कदापि नहीं ,फटाफट , शीघ्रता , भली-भांति , ऐसे , तेज , कैसे , ज्यों , त्यों आदि आते हैं वहाँ पर रीतिवाचक क्रियाविशेषण अव्यय कहते हैं।

इस क्रियाविशेषण की संख्या गुणवाचक विशेषण की तरह बहुत अधिक है। ऐसे क्रियाविशेषण प्रायः निम्नलिखित अर्थों में आते हैं- अर्थात

रीतिवाचक क्रिया-विशेषण  निम्न प्रकार है।
  1. विधि बोधक:— —–ध्याानपूर्वक,सहसा,हाथोंहाथ,सुखपूर्वक,परिश्रमपूर्वक, धीरे धीरे तेज आदि
  2. निश्चय बोधक :——-जरूर, बेशक,अलबत्ता, अवश्य’ और ‘निःसंदेह आदि।
  3. अनिश्चय बोधक:— –शायद प्राय:,बहुध,कदाचित्, संभव , अक्सर, मुमकिन आदि।
  4. हेतु बोधक:————क्यों ,किसलिए,अतएव,अत:,क्योकि आदि।
  5. निषेधवाचक:——— न, नहीं,मत,कभी नहीं आदि।
  6. प्रश्नवाचक:———— क्यों ,कैसे आदि।
  7. स्वीकृति बोधक———हॉं, जी,ठीक, सच ,बिल्कुल आदि।
  8. आकस्मिकताबोधक———ससिा, अचानक,एकाएक,अकस्मात् आदि।
  9. आवृति बोधक————सरासर,फटाफट,धडधड,चुपचाप आदि।

 रीतिवाचक क्रिया-विशेषणों की पहचान

  • रीतिवाची क्रिया-विशेषण शब्द की पहचान करने के लिए क्रिया पर कैसे प्रशनवाचक शब्द से प्रश्न करना चाहिए कैसे के उत्तर में जो शब्द प्राप्त होते है। वे रीतिवाचक क्रिया-विशेषण कहलाते है।
अर्थात इसे हम ऐसे भी कह सकते है।
  • यदि वाक्य में मुख्य क्रिया के साथ कैसे प्रश्न लगा दिया जाए तो उतर में रीतिवाचक क्रिया-विशेषण  आएगा।
उदहारण के लिए:—
  • वह सरपट भाग गया
  • प्रश्न पूछा जाए— कैसे भागा?
  • उतर होगा— सरपट
  • अत: सरपट  क्रिया-विशेषण होगा।

2. कालवाचक क्रियाविशेषण:—

जिन क्रिया विशेषण शब्दों से क्रिया के समय की विशेषता का बोध होता है।  उन्हें कालवाचक क्रियाविशेषण कहते
है।
दूसरे शब्दों में —जो शब्द क्रिया के घटित होने के बारे में सूचना देते है वे कालवाची क्रियाविशेषण कहलाते है।
उदहारण के लिए :—
  • ढोल बजा है। राधा अब नाचेगी
  • विवाह के पश्चात हम शीघ्र ही चल पडेगें।
  • इंफाल में वर्षा लगातार हो रही है।
  • लघुकथा साहित्य पत्रिका प्रतिमाह छपती है।
  • यह पत्र संम्पादक को तत्काल दे आओं।
इन वाक्यों में आए क्रियाविशेषण तत्काल, अब ,शीघ्र, प्रतिमाह आदि कालवाचक क्रियाविशेषण है।
कुछ अन्य कालवाचक क्रिया-विशेषण शब्द- अभी-अभी, आज, कल, परसों, प्रतिदिन, अब, जब, कब, तब, लगातार, बार-बार, पहले, बाद में, निरन्तर, नित्य, दोपहर, सायं आदि।

कालवाचक क्रियाविशेषणों की पहचान:—

कालवाचक क्रियाविशेषण शब्द की पहचान करने के लिए क्रिया में कब शब्द से प्रश्न करना चाहिए कब प्रश्प के उत्तर में प्राप्त होने वाले शब्द कालवाचक क्रियाविशेषण  कहलाते है।

उदहारण के लिए :—
  • वह रोज टहलने जाता है।—   टहलने  कब जाता है? उत्तर— रोज
  • कल बहुत तेज तुफान आया——तुफान  कब आया? उत्तर— कल

कालवाचक क्रियाविशेषण के प्रकार

कालवाचक क्रियाविशेषण  के तीन प्रकार होते  है।
  • काल बिंदु वाचक—— आज कल अब अभी प्रात: साय: कल जब पश्चात आदि।
  • अवधिवाचक :—— हमेशा लगातार सदैव दिनभर नित्य निरंतर लगातार आजकल आदि।
  • बारम्बारता वाचक —— हरबार प्रतिदिन प्रतिवर्ष बहुआ हर बार आदि।

स्थानवाचक क्रियाविशेषण

जिन क्रिया  विशेषण शब्दों से  क्रिया के स्थान की विशेषता का बोध होता है। उन्हें स्थानवाचक क्रियाविशेषण कहते है।
दूसरें शब्दों में—- जिन शब्दों से यह पता चलता है कि क्रिया कहॉ और किस स्थान पर घटित हुई वे स्थानवाचक क्रियाविशेषण  कहलाते है।
उदहारण के लिए
  • राधा और रमा उस ओर गई
  • मम्मी जी बहार घुम रही है।
  • धर्मकी सर्वत्र विजय होती है।
  • रोहन की चप्पले यहॅं पडी है।
  • आगे बढ़ना है तो परिश्रम करो।
इन वाक्यों में आए क्रियाविशेषण  उस ओर यहॅा आगे बहार और सर्वत्र आदि स्थानवाचक क्रिया-विशेषण है।
स्थानवाचक क्रिया-विशेषण  निम्न शब्दों के द्वारा पहचान की जा सकती है।  जैसे ———
वहाँ , भीतर , बाहर , इधर , उधर , दाएँ , बाएँ , कहाँ , किधर , जहाँ , पास , दूर , अन्यत्र , इस ओर , उस ओर , ऊपर , नीचे , सामने , आगे , पीछे , आमने आते है वहाँ पर स्थानवाचक क्रियाविशेषण अव्यय होता है।
स्थानवाचक क्रिया-विशेषण दो प्रकार के होते है।
  • स्थिति बोधक
  • दिशबोधक
स्थिति बोधक क्रिया-विशेषण-   जो शब्द क्रिया की स्थिति के बारे में या सम्बद्ध के बारे में विशेषता बताएँ, उन्हें स्थिति बोधक क्रिया-विशेषण कहते है।
जैसे-
  • मेरे पास बैठों।
  • तुम दूर चले गए
  • यहॉं आओ
इन वाक्यों में ‘पास,दूर ,यहॉं   स्थिति बोधक क्रिया-विशेषण हैं क्योंकि वे क्रमशः ‘बैठों’ और ‘ चले गए’ क्रियाओं की स्थित-संबंधी विशेषता बताते हैं
कुछ अन्य  स्थितिवाचक क्रिया-विशेषण शब्द जैसे —आगे ,पीछे ,उपर ,नीचे ,बाहर, भीतर, यहॉ ,वहॉ ,दूर पास,निकट आदि है।
दिशाबोधक क्रिया-विशेषण- जो शब्द क्रिया की दिशा  के बारे में सूचना दे या  उसके सम्बद्ध  की विशेषता बताएँ, उन्हें दिशावाचक क्रिया-विशेषण कहते हैं।
जैसे-
  • मेरी ओर देखो।
  • वह उधर मुड़ गया।
इन वाक्यों में ‘ओर’ तथा ‘उधर’ दिशावाचक क्रिया-विशेषण हैं क्योंकि वे क्रमशः ‘देखो’ और ‘मुड़ गया’ क्रियाओं की दिशा-संबंधी विशेषता बताते हैं।
कुछ अन्य दिशावाचक क्रिया-विशेषण- नीचे की ओर, उपर की ओर, चारों ओर इधर, उधर, जिधर, किधर, सामने आदि। है।

स्थानवाचक क्रियाविशेषणों की  पहचान

 स्थानवाचक क्रियाविशेषणों की  पहचान करने के लिए क्रिया पर कहॉं, तथा किधर प्रश्नवाचक शब्दों से प्रश्न करके देखना चाहिए। कहॉं तथा किधर प्रश्नों के उत्तर में सदैव स्थानवाची क्रियाविशेषण शगब्द प्राप्त होते है।
जैसे
  • तुम यहॉ मत बैठों  —————कहॉ मत बैठों? उत्त्र —यहॉं
  • मेरा स्कूल यहॉं से पास ही है।—————स्कूल कहॉं है?—उत्तर —पास ही

4 परिमाणवाचक क्रियाविशेषण-​

जिन क्रियाविशेषण शब्दों से क्रिया की मात्रा या नाप तौल आदि की विशेषता का बोध होता है। उन्हें परिमाणवाचक क्रियाविशेषण कहा जाता है।
अन्य शब्दों में — ​जिन शब्दों से क्रिया के परिणाम या क्रिया की मात्राा की जानकारी मिलती है। वे परिमाणवाची क्रियाविशेषण कहलाते है।
दूसरे शब्दों में –जो शब्द क्रिया के परिमाण (मात्रा) से सम्बद्ध विशेषता प्रकट करें, उन्हें ‘परिमाणवाचक क्रियाविशेषण’ कहते है।
जैसे-
  • थोडा खाओ,खूब चबाओ।
  • उतना खाइए,जितना खा सके
  • लडडू में मीठा बराबर डाला है।
  • कार में पेट्रोल कम रह गया है।
  • पजामें के लिए कपडा अधिक कट गया है।
इन वाक्यों में आए क्रियाविशेषण शब्द थोडा —खूब,उतना—जितना,बराबर ,कम  अधिक आदि  परिमाणवाचक क्रियाविशेषण-​ है।

परिमाणवाची क्रियाविशेषणों की पहचान

—परिमाणवाचक क्रियाविशेषणों की प​हचान के लिए क्रिया पर कितना/कितनी/कितने प्रश्नवाचक शब्दों से प्रश्न करना चाहिए। इन प्रश्नों के उत्तर में प्राप्त होने वाले शब्द परिमाणवाची क्रियाविशेषण होते है। जैसे
  • आज तो दावत में सब ने खुब खाया —— कितना खाया———उत्तर खूब
  • तुम सबके बीच में कम बोलना————कितना बोलना———— उत्तर कम
कुछ अन्य परिमाणबोधक क्रिया-विशेषण शब्द- बहुत, इतना,उतना, कम,जितना, थोड़ा, पर्याप्त, जरा, खूब, अत्यन्त, तनिक, बिलकुल, स्वल्प, केवल, सर्वथा, अल्प आदि।

परिमाणबोधक क्रिया-विशेषण कई प्रकार के होते हैं-

(क) अधिकताबोधक– बहुत, अति, बड़ा, बिलकुल, सर्वथा, खूब, निपट, अत्यन्त, अतिशय।
(ख) न्यूनताबोधक- कुछ, लगभग, थोड़ा, टुक, प्रायः, जरा, किंचित्।
(ग) पर्याप्तिवाचक- केवल, बस, काफी, यथेष्ट, चाहे, बराबर, ठीक, अस्तु।
(घ) तुलनावाचक- अधिक, कम, इतना, उतना, जितना, कितना, बढ़कर।
(ड़) श्रेणिवाचक- थोड़ा-थोड़ा, क्रम-क्रम से, बारी-बारी से, तिल-तिल, एक-एककर, यथाक्रम।
अर्थ के अनुसार क्रिया -विशेषण अव्यय के कुछ अन्य भेद हैं :-
  • विधि बोधक  क्रिया-विशेषण
  • निश्चयवाचक क्रिया-विशेषण-
  • अनिश्चयवाचक क्रिया-विशेषण-
  • निषेधवाचक क्रिया-विशेषण-
  • कारणवाचक क्रिया-विशेषण
विधि बोधक  क्रिया-विशेषण :— जिन क्रिया विशषणों के द्वारा किसी भी कार्य करने की विधि यय गति/चाल आदि का बोध होता है।उसे विधि बोधक रीतिवाचक क्रिया-विशेषण कहते है।
जैसे
  • वह धीरे धीरे चलता है।
  • पाठ को ध्याानपूर्वक पढना।
  • राम तेज गति में दौडता है।
उपर्युक्त वाक्यों में ध्याानपूर्वक,सहसा,हाथोंहाथ,सुखपूर्वक,परिश्रमपूर्वक, धीरे धीरे तेज आदि शब्द रीतिवाचक क्रिया-विशेषण है।
निश्चयवाचक क्रिया-विशेषण- जो शब्द क्रिया में निश्चय संबंधी विशेषता को प्रकट करें, उन्हें निश्चयवाचक क्रिया-विशेषण कहते हैं।
जैसे-
  • मैं वहाँ अवश्य जाऊँगा।
  • वह निःसंदेह सफल होगा।

उपर्युक्त वाक्यों में ‘अवश्य’ और ‘निःसंदेह’ निश्चयवाचक क्रिया-विशेषण हैं,—कुछ अन्य निश्चयवाचक क्रिया-विशेषण- अलबत्ता, जरूर, बेशक आदि।

अनिश्चयवाचक क्रिया-विशेषण- जो क्रिया विशेषण शब्द क्रिया में अनिश्चय संबंधी विशेषता को प्रकट करें, उन्हें अनिश्चयवाचक क्रिया-विशेषण कहते हैं।
जैसे-
  • वह शायद चला जाए।
  • राम संभवतः न पहुँच पाए।
उपर्युक्त वाक्यों में ‘शायद’ और ‘संभवतः’ अनिश्चयवाचक क्रिया-विशेषण हैं
निषेधवाचक क्रिया-विशेषण- जो शब्द क्रिया के करने या होने का निषेध प्रकट करें, उन्हें निषेधवाचक क्रिया-विशेषण कहते हैं।जैसे-
  • यहाँ मत बैठो।
  • मैं कुछ नहीं कहूँगा।
इन वाक्यों में ‘मत’ और ‘नहीं’ निषेधवाचक क्रिया-विशेषण हैं क्योंकि वे क्रमशः ‘बैठो’ और ‘कहूँगा’ क्रियाओं के निषेध का बोध कराते हैं।
कारणवाचक क्रिया-विशेषण- जो शब्द क्रिया के होने या करने का कारण बताएँ, उन्हें कारणवाचक क्रिया-विशेषण कहते हैं।
जैसे-
  • दुर्बलता के कारण वह चल नहीं सकता।
  • ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी, इसलिए वह सो गया।
इन वाक्यों में ‘कारण’ और ‘इसलिए’ क्रमशः ‘न चल सकने’ और ‘सोने’ का कारण बताते हैं।

क्रिया विशषणों की रचना  के आधार पर

कुछ शब्द मूलत: क्रिया विशेषण होते है। और कुछ क्रिया विशेषणों की रचना की जाती है। किसी भी मूल शब्द के साथ प्रत्यय लगाकर तथा समास द्वारा क्रिया विशेषण बनाए जाते है। अर्थात  हम कह सकते है। कि

रूप के आधार पर क्रियाविशेषण अव्यय के तीन  भेद होते है।  :-

  1. मूल क्रियाविशेषण
  2. यौगिक क्रियाविशेषण
  3. स्थानीय क्रियाविशेषण

 

(i) मूल क्रियाविशेषण– जो किसी अन्य शब्द अथवा प्रत्यय के योग के बिना ही प्रयोग में लाए जाते है। वे मूल क्रियाविशेषण कहलाते है।

दूसरे शब्दों में— ऐसे क्रियाविशेषण, जो किसी दूसरे शब्दों के मेल से नहीं बनते, ‘मूल क्रियाविशेषण’ कहलाते हैं।

जैसे-  यहॉ ,वहॉं कम, अधिक,बराबर, थोडा,कल, आज,उपर , अचानक,निकट  ठीक, दूर, अचानक, फिर, नहीं आदि।

(ii) यौगिक क्रियाविशेषण- ऐसे शब्द जो  समास द्वारा बनते है।  या फिर शब्दों के साथ प्रत्यय लगाकर बनते है।  ऐसे शब्द यौगिक क्रियाविशेषण कहलाते है।

 

दूसरे शब्दों में– ऐसे क्रियाविशेषण, जो किसी दूसरे शब्द में प्रत्यय या पद जोड़ने पर बनते हैं, ‘यौगिक क्रियाविशेषण’ कहलाते हैं।

जैसे-  यथाशक्ति , प्रेमपूर्वक ,रातों रात, धीरे धीरे ,चुपके चुपके मन से, जिससे, चुपके से, भूल से, देखते हुए, यहाँ तक, झट से, वहाँ पर। यौगिक क्रियाविशेषण संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, धातु और अव्यय के मेल से बनते हैं।

यौगिक क्रियाविशेषण नीचे लिखे  निम्न शब्दों के मेल से बनते हैं-

संज्ञा से——

  • रात+ भर —रातभर ,
  • प्रेम+  पूर्वक  ———प्रेमपूर्वक,
  • प्रात:, सायं, सुबह आदि

संज्ञाओं की द्विरुक्ति से

  • घर-घर,
  • घड़ी-घड़ी,
  • बीच-बीच,
  • हाथों-हाथ आदि ।

दो भित्र संज्ञाओं के मेल से-

  • दिन-रात,
  • साँझ-सबेरे,
  • घर-बाहर,
  • देश-विदेश आदि ।

सर्वनाम से

  • यहॉं वहॉं,
  • अब, तक
  • इसलिए,आदि

 

सर्वनाम की द्विरुक्ति से

  • मैं —मेरा,
  • उससे — इससे ,
  • तुम— तुमहारा आदि।

विशेषण से——

  • कम, अधिक,बहुत,तेज,धीरे,पहला आदि।

विशेषणों की द्विरुक्ति से———-

  • एक-एक,
  • ठीक-ठीक,
  • साफ-साफ आदि ।

क्रिया से —

  • आते– जाते
  • उठते— बैठते
  • खाते —नीते आदि।

क्रियाविशेषणों की द्विरुक्ति से-—

  • धीरे-धीरे,
  • जहाँ-तहाँ,
  • कब-कब,
  • कहाँ-कहाँ आदि ।

दो क्रियाविशेषणों के मेल से-—

  • जहाँ-तहाँ,
  • जहाँ-कहीं,
  • जब-तब,
  • जब-कभी,
  • कल-परसों,
  • आस-पास आदि ।

दो भित्र या समान क्रियाविशेषणों के बीच ‘न’ लगाने से-

  • कभी-न-कभी,
  • कुछ-न-कुछ।

विलोम शब्दों से ——

  • रात दिन
  • सुबह शाम,
  • देश परदेश,
  • यहॉं वहॉं आदि।

 

शब्दों की आवृति से

  • जल्दी— जल्दी,
  • धीरे— धीरे,
  • घर— घर
  • फटाफट– हाथोंहाथ आदि।

अनुकरण वाचक शब्दों की द्विरुक्ति से-

  • पटपट, तड़तड़, सटासट, धड़ाधड़।

संज्ञा और विशेषण के योग से-

  • एक साथ,
  • एक बार,
  • दो बार।

अव्यय और दूसरे शब्दों के मेल से-

  • प्रतिदिन, यथाक्रम, अनजाने, आजन्म।

पूर्वकालिक कृदन्त और विशेषण के मेल से-

  • विशेषकर, बहुतकर, मुख़्यकर, एक-एककर

क्रिया विशेषण की विशेषता बताने वाले शब्द क्रिया विशेषण  कहलाते हैं। इन्हें क्रिया प्रविशेषण भी कहा जा सकता है।—

  • जरा अधिक उचॉं बोलो।
  • गीता बहुत मधुर गाती है।
  • वह बहुत तेज दौडती है।

स्थानीय क्रियाविशेषण– ऐसे क्रियाविशेषण, जो बिना रूपान्तर के किसी विशेष स्थान में आते हैं, ‘स्थानीय क्रियाविशेषण’ कहलाते हैंजैसे-

  • वह अपना सिर पढ़ेगा।
  • वह दौड़कर चलते हैं।
  • तुम तेज भागकर पकडते हों

प्रयोग के आधार पर क्रिया -विशेषण अव्यय के भेद :-

  1. साधारण क्रियाविशेषण अव्यय
  2. संयोजक क्रियाविशेषण अव्यय
  3. अनुबद्ध क्रियाविशेषण अव्यय

 

साधारण क्रियाविशेषण अव्यय :- जिन शब्दों का प्रयोग वाक्यों में स्वतंत्र रूप से किया जाता है उन्हें साधारण क्रियाविशेषण अव्यय कहते हैं।जैसे :- (i)

  • हाय! अब मैं क्या करूँ।
  • बेटा जल्दी जाओ !
  • अरे! वह सांप कहाँ गया ?

 

संयोजक क्रियाविशेषण अव्यय :- जिन शब्दों का संबंध किसी उपवाक्य के साथ होता है उन्हें संयोजक क्रियाविशेषण अव्यय कहते हैं।जैसे :-

  • जब अंकित ही नहीं तो मैं जी कर क्या करूंगी।
  • जहाँ पर अब समुद्र है वहाँ पर कभी जंगल था।

अनुबद्ध क्रियाविशेषण अव्यय :- जिन शब्दों का प्रयोग निश्चय के लिए किसी भी शब्द भेद के साथ किया जाता है उन्हें अनुबद्ध क्रियाविशेषण अव्यय कहते हैं।

जैसे :-

  • मैंने उसे देखा तक नहीं।
  • आपके आने भर की देर है।

 

विशेषण और  क्रियाविशेषणों के समानार्थक शब्दों अंतर

  • कई विशेषण शब्द क्रियाविशेषण के रूप में भी प्रयोग में लाए जाते है।

विशेषण शब्द जब क्रिया से पहले आएॅंगे वे तभी क्रिया विशेषण होगें यदि वे संज्ञा से पहले आएॅंगें तो विशेषण ही रहेंगें जैसे ——

  • राहुल कम बोलता है। —क्रियाविशेषण
  • राम चाय में कम चीनी पीता है। ————क्रियाविशेषण
  • शशि तेज दौडती है।————क्रियाविशेषण
  • शशि कक्षा का तेज विद्याथी है।———विशेषण
  • बाएॅ मुडते ही एयरफोर्स स्कूल है।———क्रियाविशेषण
  • बाएॅं हाथ पर कैम्ब्रिज फाउडेंशन है।—————विशेषण

 

न,नहीं , और मत — इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

न  के उदहारण तथा प्रयोग

इनका प्रयोग निषेध के अर्थ में होता है। ‘न’ से साधारण-निषेध  अर्थ निकलता है।  जैसे

  • रोगी न खा सका।
  • तुम न करोगे, तो वह कर देगा।
  • न’ तुम सोओगे, न वह।
  • जाओ न, रुक क्यों गये ?

नहीं —के उदहारण तथा प्रयोग

इनका प्रयोग निषेध के अर्थ में होता है।’नहीं’ से निषेध का निश्र्चय सूचित किया जाता  है। ‘न’ की अपेक्षा ‘नहीं’  पर अधिक जोर दिया जाता  है।

  • अंजलि को गणित नहीं आता
  • राधा को चलना नहीं आता
  • तुम नहीं जा सकते।
  • मैं  नहीं जाऊँगा।
  • मैं काम नहीं कर सकता।
  • मैंने पत्र नहीं लिखा।

मत-के उदहारण तथा प्रयोग

इनका प्रयोग निषेध के अर्थ में होता है।’मत’ का प्रयोग निषेधात्मक आज्ञा के लिए होता है। जैसे

  • निंदा करके चरित्र मत गिराओ।
  • झूठ मत बोलो।
  • भीतर मत जाओ।
  • तुम यह काम मत करो।

 

——— इन वाक्यों में आए न,नहीं,और मत क्रिया विशेषण है।

कहाँ-कहीं-  इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

कहाँ’ शब्द  किसी निश्र्चित स्थान का बोधक होता  है और ‘

जैसे-

  • वह कहाँ गया ?
  • मैं कहाँ आ गया ?
  • कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली!

कहीं- के उदहारण तथा प्रयोग

‘कही’ शब्द का प्रयोग  किसी अनिश्र्चित स्थान का परिचायक रूप में किया जाता है। कभी-कभी ‘कही’ निषेध के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है; जैसे-

  • वह कहीं भी जा सकता है।
  • उसे कहीं भी अकेला छोड दो।
  • तुम कहीं भी रह सकते हों।

अन्य अर्थों में भी ‘कही’ का प्रयोग होता है-

  •  बहुत अधिक- यह पुस्तक उससे कहीं अच्छी है।
  • कदाचित्- कहीं बाघ न आ जाय।
  • विरोध- राम की माया, कहीं धूप कहीं छाया।

बाद-पीछे- इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

बाद-पीछे-के उदहारण तथा उनका प्रयोग

‘बाद’ काल का और ‘पीछे’ समय का सूचक है। जैसे-

  • बाद- वह एक सप्ताह बाद आया।
  • पीछे– वह पढ़ने में मुझसे पीछे है।

 

इनके अन्य भी उदहारण है। जैसे कि————

अब-अभी ,तब-फिर, ,केवल-मात्र,भला-अच्छा- ,प्रायः-बहुधा इन सभी क्रिया विशेषणों में सूक्ष्म अंतर पाया जाता है।

1).अब और अभी इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

अब का प्रयोग

  • अब का प्रयोग वर्तमान समय की अनिश्चिता के बारे में बतलाने के लिए किया जाता  है।

उदहारण के लिए

  • राज अब घर जाएगा—
  • अब आप जा सकते हैं।
  • अब आप क्या करेंगे ?

इन वाक्यों  में वर्तमान समय की अनिश्चिता के बारे में बताया गया है।

अभी का प्रयोग 

  • कार्य के तुरंत होने के सबंधं बताया गया है।

उदहारण  के लिए

  • रूको, अभी आती हूॅं।
  • अभी खाना खया है।
  • अभी-अभी आया हूँ।
  • अभी पाँच बजे हैं।

इन वाक्यों में कार्य के तुरंत होने का सबंधं बताया गया है।

तब-फिर का प्रयोग इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

तब शब्द का प्रयोग

हम  बीते हुए समय का बोध कराने के लिए करते है।  है और ‘फिर’ भविष्य की ओर संकेत करता है।अर्थात ‘तब’ का अर्थ ‘उस समय’ से सम्बधित  है।

जैसे-

  • तब तुम लचे गए थे।
  • तब तुमने देखा नहीं थां
  • तब उसने कहा।
  • तब की बात कुछ और थी।

 

फिर का प्रयोग

फिर शब्द का प्रयोग हम दुबारा किसी शब्द के अर्थ को बताने के लिए करते है।  अर्थात फिर’ का अर्थ’दुबारा’ होता  है।

उदहारण के लिए

  • फिर आप वहॉ चले जाओ।
  • फिर आप भी क्या कहेंगे।
  • फिर ऐसा होगा।

 

केवल-मात्र-  का प्रयोग —इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

केवल का प्रयोग अकेला एक अर्थ को दर्शाने लिए किया जाता हैै

केवल का प्रयोग

उदहारण के लिए

  • आज हम केवल दूध पीकर रहेंगे।
  • यह काम केवल वह कर सकता है।

 

मात्र का प्रयोग —

सम्पूर्णता के अर्थ सूचित करने के लिए किया जाता है;

जैसे-

  • मुझे पाँच रूपये मात्र मिले।

 

भला-अच्छा- —इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

भला’ अधिकतर विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है, पर कभी-कभी संज्ञा के रूप में भी आता है;जैसे-

  • भला का भला फल मिलता है।

अच्छा’ स्वीकृतिमूलक अव्यय है। यह कभी अवधारण के लिए और कभी विस्मयबोधक के रूप में प्रयुक्त होता है। जैसे-

  • अच्छा, कल चला जाऊँगा।
  • अच्छा, आप आ गये !

प्रायः-बहुधा- —

इन शब्दों का प्रयोग भी क्रियाविशेषणों  के रूप में किया जाता है।

  • दोनों का अर्थ ‘अधिकतर’ है, किन्तु ‘प्रायः’ से ‘बहुधा की मात्रा अधिक होती है।
  • प्रायः- बच्चे प्रायः खिलाड़ी होते हैं।
  • बहुधा- बच्चे बहुधा हठी होते हैं

संबंधबोधक अव्यय

संज्ञा और  सर्वनाम  के बाद आकर उनका संबंध वाक्य के अन्य शब्दों के साथ प्रकट करने वाले अव्यय शब्दों  को संबंधबोधक अव्यय कहते है।
दूसरे शब्दों में ———जो अव्यय शब्द अपने पूर्व आने वाले शब्द के साथ संबंध प्रकट करें ,वह  संबंधबोधक अव्यय कहलाता है। इनके पहले किसी ना किसी परसर्ग की अपेक्षा रहती है। जैसे
  •  छत पर कबूतर बैठा है।
  •  राम भोजन के बाद जायेगा।
  •  मोहन दिन भर खेलता है।
  • छत के ऊपर राम खड़ा है।
  • रमेश घर के बाहर पुस्तक रख रहा था।
  • पाठशाला के पास मेरा घर है।
  • विद्या के बिना मनुष्य पशु है।
सरल शब्दों में ——जिन अव्यय शब्दों के कारण संज्ञा के बाद आने पर दूसरे शब्दों से उसका संबंध बताते हैं उन शब्दों को संबंधबोधक शब्द कहते हैं। ये शब्द संज्ञा से पहले भी आ जाते हैं।जैसे-
  • दूर, पास, अन्दर, बाहर, पीछे, आगे, बिना, ऊपर, नीचे आदि।
अन्य शब्दों में—— संबंधबोधक शब्द का अर्थ है— संबंध का बोध् कराने वाला, अर्थात वाक्य में ये संज्ञा या सर्वनाम के बाद प्रयुक्त होते है। तथा वाक्य के अन्य संज्ञा/ सर्वनाम पदों के साथ संबंध बताते है। जैसे-
——
  • राहुल के साथ उसका भाई नहीं आया।
  • पोस्ट आफिस के सामने लोग खडे हैं। म
  • मुझे बैंक के बाद बाजार जाना है।
  • मॉं के ​बिना घर घर सूना सूना लगता है।
  • झरने के आसपास पहाडियॉं है।
  • हैदराबाद ,के निकट गोलकोंडा है।
इन वाक्यों में आए शब्द के साथ,के सामने ,के बाद,के ​बिना ,आसपास ,के निकट आदि संबंधबोधक अव्यय है।
संबंधबोधक अव्ययों के कुछ और उदाहरण निम्नलिखित है –
अपेक्षा , सामान , बाहर ,  भीतर ,  पूर्व , पहले , आगे , पीछे , संग , सहित , बदले , सहारे , आसपास  , भरोसे ,  मात्र , पर्यंत , भर , तक , सामने, भर , के ऊपर , की और , कारण , ऊपर , नीचे , बाहर , भीतर , बिना , सहित , पीछे , से पहले , से लेकर , तक , के अनुसार , की खातिर , के लिए  आदि।

विशेष-

सम्बन्धबोधक शब्दों  का  सम्बन्ध दर्शाना आवश्यक होता है। जब यह सम्बन्ध न जोड़कर साधारण रूप में प्रयोग होता है तो यह क्रिया-विशेषण का कार्य करता है। इस प्रकार एक ही शब्द क्रिया-विशेषण भी हो सकता है और सम्बन्धबोधक भी। जैसे-
  • सम्बन्धबोधक        ————————क्रिया-विशेषण
  • दुकान ‘पर’ ग्राहक खड़ा है।—————————दुकान ‘पर’ खड़ा है।
  • मेज के ‘ऊपर’ किताबें है।——————————मेज के ‘ऊपर’ है।

सम्बन्धबोधक के भेद

सम्बन्धबोधक अव्यय के तीन आधार है।
  • प्रयोग
  • अर्थ
  • उत्पत्ति
प्रयोग के आधार पर सम्बन्धबोधक अव्यय के निम्नलिखित भेद है ।
  •  सम्बद्ध
  • अनुबद्ध
सम्बद्ध सम्बन्धबोधक — जो शब्द संज्ञा की विभक्तियों के पश्चात /पीछे आने वाले सम्बन्धबोधक शब्दों को सम्बद्ध सम्बन्धबोधककहते है।
जैसे
  • कुरूक्षेत्र से दूर जलंधर है।
  • घी के बिना सब्जी नहीं बनेगी
  • रीना से पहले सीमा को बुलाओ।
  • नानी के अतिरिक्त मधु भी पार्टी में आई थी।
इन वाक्यों में  आए—अतिरिक्त,पहले, बिना,दूर सम्बद्ध सम्बन्धबोधक है। ये संज्ञा की विभक्ति के और से के बाद आई है।
असम्बद्ध सम्बन्धबोधक —जो शब्द संज्ञा शब्द  के बदले हुए रूपों के पश्चचात आने वाले सम्बन्धबोधक शब्दों को  असम्बद्ध सम्बन्धबोधक कहते है।
जैसे—
  • मजदूर तक सीढीयॉं पहुचा आओ।
  • भाई मुळी भर चावल को तरसते है।
  • नेताओं सहित कर्मचारी गिरफतार किए गए।
इन वाक्यों में  आए संज्ञ शब्दों के परिवर्तित रूप के पश्चात आए सम्बन्धबोधक शबद तक सहित और भर असम्बद्ध सम्बन्धबोधक शब्द है।

अर्थ के अनुसार-

— कालवाचक,स्थानवाचक,दिशावाचक,साधनवाचक,हेतुवाचक ,विषयवाचक ,व्यतिरेकवाचक,,विनिमयवाचक,सादृश्यवाचक ,विरोधवाचक ,सहचरवाचक,संग्रहवाचक ,तुलनावाचक 

 अर्थ के आधार पर  सम्बन्धबोधक के भेद
क्रमभेदउदहारण
1समतावाचकसा, अनुसार ,तरह,सम्मान,जैसे ,भॉति,नाई बराबर, आदि।
2पृथक वाचकअलग ,परे , दूर हटकर आदि।
3विनिमयवाचकपलटे, बदले, जगह, एवज।
4संग्रहवाचकभर, मात्र ,तक, लौं, पर्यन्त आदि।
5व्यतिरेकवाचकसिवा, अलावा, बिना, बगैर, अतिरिक्त, रहित।
6कालवाचकआगे, पीछे, बाद, पहले, पूर्व, अनन्तर, पश्र्चात्, उपरान्त, लगभग।
7दिशावाचकओर, तरफ, पार, आरपार, आसपास, प्रति।
9साधनवाचकद्वारा, जरिए, हाथ, मारफत, बल, कर, जबानी, सहारे।
10हेतुवाचकलिए, निमित्त, वास्ते, हेतु, खातिर, कारण, मारे, चलते।
11विषयवाचकबाबत, निस्बत, विषय, नाम, लेखे, जा,भरोसे।
12सादृश्यवाचक समान, तरह, भाँति, नाई, बराबर, तुल्य, योग्य, लायक, सदृश, अनुसार, अनुरूप,अनुकूल, देखादेखी, सरीखा, सा, ऐसा, जैसा, मुताबिक।
13विरोधवाचकविरुद्ध, खिलाप, उलटे, विपरीत।
14सहचरवाचक संग, साथ, समेत, सहित, पूर्वक, अधीन, स्वाधीन, वश।
15तुलनावाचकअपेक्षा, बनिस्बत, आगे, सामने।
16स्थानवाचकआगे, पीछे, नीचे, तले, सामने, पास, निकट, भीतर, समीप, नजदीक, यहाँ, बीच, बाहर, परे, दूर।
(3) व्युत्पत्ति के आधार पर  सम्बन्धबोधक के भेद
  • मूल सम्बन्धबोधक
  •  यौगिक सम्बन्धबोधक-

(i) मूल सम्बन्धबोधक
– हिेदी, संस्कृत और उर्दू भाषाओं के संबंधबोधक शब्द जो मूल रूप से ही सम्बन्धबोधक हैं।
 कुछ मूल सम्बन्धबोधक हैं।-
जैसे
  •  बिना, पूर्वक, पर्यन्त, नाई, खातिर,मार्फ़त सिवाय तरफ इत्यादि।
(ii) यौगिक सम्बन्धबोधक- संज्ञा,विशेषण, क्रिया ,क्रियाविशेषण शब्दों से बनने वाले सम्बन्धबोधक यौगिक सम्बन्धबोधक कहते है।
जैसे

संज्ञा से बने –

  • जगह, द्वारा,कारण पलट,संग , लेखे, अपेक्षा, मारफत।

विशेषण से बने– 

  • ऐसा,जैसा,विरूद्ध, तुल्य, समान, उलटा, ऐसा, योग्य।
क्रिया से बने——
  •  जोडकर,लेकर,लिए, मारे, चलते, कर, जाने।
क्रियाविशेषण से बने
  • आगे ,इधर ,उधर,नीचे, ऊपर, भीतर, यहाँ, बाहर, पास, परे, पीछे।
सम्बन्धबोधक अव्ययों का प्रयोग तीन प्रकार से होता है।
  • विभक्ति सहित सविभक्तिक
  • विभक्ति रहित निर्विभक्तिक
  • उभय विभक्तिक
विभक्ति सहित ———जो अव्यय शब्द विभक्ति के साथ संज्ञा या सर्वनाम के बाद लगते हैं उन्हेंविभक्ति सहित/ सविभक्तिक कहते हैं। जिन शब्दों में — आगे, पीछे, समीप, दूर, ओर, पहले आते हैं वहाँ पर सविभक्तिक होता है।
जैसे —
  • घर के पीछे पेड है।
  • घर के आगे स्कूल है।
  • उत्तर की ओर पर्वत हैं।
विभक्ति रहित:- जो शब्द विभक्ति के बिना संज्ञा के बाद प्रयोग होते हैं उन्हें  विभक्ति रहित/निर्विभक्तिक कहते हैं।
जिन शब्दों में — भर, तक, समेत, पर्यन्त आते हैं वहाँ पर निर्विभक्तिक होता है।
उदाहरण
  • उसने जीवन पर्यन्त वचन निभाया।
  • वह रात तक लौट आया।
  • वह जीवन पर्यन्त ब्रह्मचारी रहा।
  • वह बाल बच्चों समेत यहाँ आया।
उभय विभक्ति:– जो अव्यय शब्द विभक्ति रहित और विभक्ति सहित दोनों प्रकार से आते हैं उन्हें उभय विभक्ति कहते हैं। जिन शब्दों में — द्वारा, रहित, बिना, अनुसार आते हैं वहाँ पर उभय विभक्ति होता है।
उदाहरण
  • पत्र के द्वारा सूचित करो।
  • पत्र द्वारा सूचित करो।
  • पत्रों के द्वारा संदेश भेजे जाते हैं।
  • रीति के अनुसार काम होना है
क्रिया-विशेषण और सम्बन्धबोधक में अंतर
यदि अव्यय शब्द क्रिया-विशेषण की विशेषता प्रकट करने के साथ साथ अन्य किसी संज्ञा अथवा सर्वनाम के साथ सम्बंंधित  हो या संबंध स्थापित होता है। तो सम्बन्धबोधक कहलाता है,अन्यथा क्रिया-विशेषण कहलाता है।  अर्थात
अनेक शब्द क्रिया-विशेषण भी हैं तथा सम्बन्धबोधक भी। प्रयोग में जब ये क्रिया की विशेषता प्रकट करें, तब क्रिया-विशेषण कहलाते हैं
तथा जब संज्ञा अथवा सर्वनाम के साथ आकर उनका वाक्य के शेष शब्दों के साथ संबंध बताएँ तब सम्बन्धबोधक।
जैसे-
  • दिव्या स्वाति से मधुर गाती है। (सम्बन्धबोधक)
  • दिव्या मधुर गाती है। (क्रिया-विशेषण)
  • आप उसके पीछे चलिए। (सम्बन्धबोधक)
  • आप पीछे चलिए। (क्रिया-विशेषण)
  • समीर छत के उपर बैठा है। (सम्बन्धबोधक)
  • समीर उपर बैठा है (क्रिया-विशेषण)

 समुच्चयबोधक अव्यय :

कुछ अविकारी शब्द दो पदों,दो पदबंधों या दो उपवाक्यों को जोडने का कार्य करते है ‘योजक ‘या’ समुच्चयबोधक अव्यय कहा जाता है।  अर्थात
जो अविकारी शब्द दो पदों,दो पदबधों या दो उपवाक्यों को जोडने का कार्य करते है ‘योजक अथवा समुच्चयबोधक अव्यय  कहलाते है।
जैसे—
  • शब्द+ शब्द——— —–दाल और चावल
  • पद+ पद—————– मुझे कलम व दवात चाहिएं
  • पदबंध +पदबंध ———–मेरे स्कूल के लडके और तुम्हारे स्कूल की लडकियॉं पिकनिक पर जा रहे है।
  • उपवाक्य+ उपवाक्य ———-माता जी खाना बना रही है और पिताजी अखबार पढ रहे है।
दूसरे शब्दों में —जो शब्द दो शब्दों , वाक्यों और वाक्यांशों को जोड़ते हैं उन्हें समुच्चयबोधक अव्यय कहा जाता है। ये शब्द दो वाक्यों को परस्पर जोड़ते हैं इन्हें योजक भी कहते है।
सरल शब्दो में- दो वाक्यों को परस्पर जोड़ने वाले शब्द समुच्चयबोधक अव्यय कहे जाते है।
जैसे –
  • यद्यपि, चूँकि, परन्तु, और किन्तु आदि।
उदहारण के लिए:—
  • सुमीता या किरण ने पुस्तक ली थी।
  • मॉं ने समझाया था परन्तु पुत्र समझा नहीं।
  • पुलिस पहुॅंच गई अन्यथा दगां हो जाता
  • राधा,अनु,और प्रिया ने पुरस्कार जीते।
  • राजू को जगा दो क्योंकि उसे गाडी पकडनी हैं।
इन वाक्यों में आए शब्द —और , तथा,या,अन्यथा,क्योंकि,औा परंतु  आदि समुच्चयबोधक अव्यय  है।
समुच्चयबोधक के भेद
समुच्चयबोधक के दो मुख्य भेद हैं-
  •  समानाधिकरण समुच्चयबोधक (Co-ordinative Conjunction)
  •  व्यधिकरण समुच्चयबोधक (Subordinative Conjunction)
(1) समानाधिकरण समुच्चयबोधक-ऐसे समुच्चयबोधक शब्द जिनसे समान पदों, शब्दों, वक्याशों ,पदबधों, उपवाक्यों को जोडा जाता है, समानाधिकरण समुच्चयबोधक कहलाते हैं जैसे——
सरल शब्दों में——जिन पदों या अव्ययों द्वारा मुख्य वाक्य जोड़े जाते है, उन्हें ‘समानाधिकरण समुच्चयबोधक’ कहते है।
दूसरे शब्दों में– समान स्थिति वाले दो या दो से अधिक शब्दों, पदबंधों या उपवाक्यों को जोड़ने वाले शब्दों को समानाधिकरण समुच्चयबोधक कहते हैं।
उदहारण के लिए——
  • अध्यापक पढा रहा था और विद्यार्थी पढ रहे थे।
  • विकास को बुखार था इसलिए वह विद्यालय नहीं गया।
  • दादाजी ने वर एवं वधू को आर्शीवाद दिया।
  • रूपावली तथा वसुधा ने नृत्य किया।
इन वाक्यों में आए और इसलिए, एवं,या और तथा समानाधिकरण समुच्चयबोधक हैं, क्योंकि ये दो या दो से
अधिक पदों, पदबंधों,उपवाक्यों को जोड रहें है।

समानाधिकरण समुच्चयबोधक के चार उपभेद हैं

 

  • संयोजक समानाधिकरण समुच्चयबोधक
  • विभाजक समानधिकरण समुच्चयबोधक
  • विरोधदर्शक समानधिकरण समुच्चयबोधक
  • परिणामदर्शक समानधिकरण समुच्चयबोधक
संयोजक समानाधिकरण समुच्चयबोधक– जो समानाधिकरण समुच्चयबोधक दो समान शब्दों,वाक्याशों और वाक्यों को जोडते है। उन्हें संयोजक समानाधिकरण समुच्चयबोधक कहते है।
अन्य शब्दों में— जो शब्द, शब्दों या वाक्यों को जोड़ने का काम करते है, उन्हें संयोजक कहते है।
दूसरे शब्दों में– दो शब्दों, पदबंधों या उपवाक्यों को आपस में जोड़ने वाले अव्यय को संयोजक कहते हैं।
जैसे-
जोकि, कि, तथा, व, एवं, और आदि।
उदहारण के लिए——
  •  कैलाशचंद्र के पुत्र और सुभाष की पुत्री का जन्मोत्सव मनाया जाता है।
  • तरूण तथा वरूण ने वाद— विवाद प्रतियोगिता जीती।
  • कुलदीप ने विज्ञान विषय ​लिए एंव मनदीप ने वणिज्य विषय लिए।
  • रीतिका समोसा खिलाएगी व ऋतु जलेबियॉं खिलाएगी।
इन वाक्यों में आए— और, तथा,एवं, व ,शब्द सयोंजक समानधिकरण समुच्चयबोधक है।
विभाजक समानधिकरण समुच्चयबोधक- जो समुच्चयबोधक अव्यय, शब्दों ,वाक्याशों और उपवाक्यों में विभाजन तथा विकल्प करते है,उन्हें विभाजक समानधिकरण समुच्चयबोधक कहते है।
सरल शब्दों में———जो शब्द, विभिन्नता प्रकट करने के लिए प्रयुक्त होते है, उन्हें विभाजक कहते है।
दूसरे शब्दों में– दो या दो से अधिक बातों में से एक की स्वीकृति अथवा दोनों की अस्वीकृति बताने वाले अव्यय को विभाजक कहते हैं।
जैसे-
  • या, वा, अथवा, किंवा, कि, चाहे, न…. न, न कि, नहीं तो, ताकि, मगर, तथापि, किन्तु, लेकिन आदि विभाजक समानधिकरण समुच्चयबोधक होते है।
उदाहरण-
  • पेन से लिखिए चाहें पेसिल से लिखिए।
  • न सुधा जाएगी ना सोम जाएगा।
  • तैयार हो जाओ नहीं तो माता जी डाटेंगी।
  • जूते खराद लों अथवा चप्पले ले लों
  • कॉपी मिल गयी किन्तु किताब नही मिली।
 विरोधदर्शक समानधिकरण समुच्चयबोधक-ऐसे शब्द जो दो वाक्यों को जोडते है,विरोधदर्शक  समानधिकरण समुच्चयबोधक कहलाते है।
दूसरे शब्दों में ——दो वाक्यों में परस्पर विरोध प्रकट करके उन्हें जोड़ने वाले अथवा प्रथम वाक्य में कही गयी बात का निषेध दूसरे वाक्य में करने वाले अव्यय को विरोधदर्शक कहते हैं।
जैसे- किन्तु, परन्तु, पर, लेकिन, मगर, वरन, बल्कि।
उदाहरण-
  • गोपाल ही नहीं आया बल्कि बबली भी आई ।
  • परिवार के सभी सदस्य पहुचें मगर लोकेश नहीं पहुॅचा।
  • मोहन की बुद्धि तीव्र है किन्तु वह आलसी है।
  • मेरा मित्र इस गाड़ी से आने वाला था, परन्तु वह नहीं आया।
(v) परिणामदर्शक समानधिकरण समुच्चयबोधक दो समुच्चयबोधक दो वाक्यों को मिलाकर दूसरे वाक्य को पहले वाक्य के परिणाम के रूप में दर्शाता है, उसे  परिणामदर्शक समानधिकरण समुच्चयबोधक कहते है।
 दूसरे  शब्दों में ——प्रथम वाक्य का परिणाम या फल दूसरे वाक्य में बताने वाले अव्यय को परिणामदर्शक कहते हैं।
जैसे-
  • अन्यथा, फलत:,ताकि, इसलिए, अतः, सो, अतएव।परिणामदर्शक होते है।
उदाहरण-
  • दूध नहीं था अत: चाय न बन सकी।
  • बॉंध टूट गया इसलिए नगर जलमगन हो गया।
  • समय पर पहुचों ताकि प्रधानमंत्री से मिल सकों।
  • वह बीमार था इसलिए पाठशाला नहीं गया।
  • वर्षा हो रही थी अतः मैं घर से नहीं निकला।
इन वाक्यों में ‘इसलिए’ और ‘अतः’ अव्यय प्रथम वाक्य का परिणाम दूसरे वाक्य में बताते हैं, अतः ये परिणामदर्शक समुच्ययबोधक हैं।
विकल्पसूचक- जो शब्द विकल्प का ज्ञान करायें, उन्हें ‘विकल्पसूचक’ शब्द कहते है।
जैसे-
  • तो, न, अथवा, या आदि।
उदाहरण – मेरी किताब रमेश ने चुराई या राकेश ने। इस वाक्य में ‘रमेश’ और ‘राकेश’ के चुराने की क्रिया करने में विकल्प है।
व्यधिकरण समुच्चयबोधकऐसे समुच्चयबोधक  जो वाक्य में एक या एक से अधिक आश्रित उपवाक्यों को जोडते है। व्यधिकरण समुच्चयबोधक कहलाते है।
सरल शब्दों में– एक या एक से अधिक उपवाक्यों को मुख्य उपवाक्य से जोड़ने वाले अव्यय को व्यधिकरण समुच्चयबोधक कहते हैं।
दूसरे शब्दों में —जिन अव्यय शब्दों में एक शब्द को मुख्य माना जाता है और एक को गौण। गौण वाक्य मुख्य वाक्य को एक या अधिक उपवाक्यों को जोड़ने का काम करता है।
जैसे ———,
  • इसलिए, यद्यपि, तथापि, कि, मानो, क्योंकि, यहाँ, तक कि, जिससे कि, ताकि , यदि, तो, यानि आते हैं वहाँ पर व्यधिकरण समुच्चयबोधक अव्यय होता है।
इसके चार उपभेद है।-
  •  कारणवाच
  • उद्देश्यवाचक
  • संकेतवाचक
  •  स्वरूपवाचक
(i) कारणवाचक-ऐसे समुच्चयबोधक अव्यय जो किसी वाक्य को कारणसूचक वाक्यों से जोडते है। ,उन्हें कारणवाचक कहते हैं।
जैसे-
  • क्योंकि,  इसलिए, के ​कारण, जोकि, इसलिए कि आदि शब्द कारणवाचक है।
उदाहरण
  • टेलीफोन कट गया क्योंकि बिल नहीं भरा
  • बिजली चले जाने के कारण नगर में अंधेरा छा गया।
  • मैं वहाँ नहीं आ सका क्योंकि वर्षा हो रही थी।
(iv) स्वरूपवाचक-ऐसे  समुच्चयबोधक अव्यय जो बाद वाले उपवाक्य से पूर्व लगकर,प्रथम वाक्य के स्वरूप को स्पष्ट करते है। उन्हें स्वरूपवाचक कहते हैं।
इसे ऐसे कहते है——ऐसे अव्यय शबद जो  दो उपवाक्यों को ऐसे जोड़ते है कि पहले वाक्य का स्वरूप दूसरे वाक्य से ही स्पष्ट हो, उसे स्वरूपवाचक कहते हैं।
़जैसे-
  • यानी, कि, जो, अर्थात, मानो। आदि स्वरूप वाचक शब्द है।
उदाहरण-
  • पूरी कक्षा मानती है कि राधा होशियार है।
  • ​बिहारी द्वारा लिखे दोहे अर्थात गागर में सागर।
  • तुम चंद्रशेखर थोडी हो जो तुम्हारी बात मान लूॅं।
  • कृष्ण ने कहा कि मैं आज खाना नहीं खाऊँगा।
  • उसने ठीक किया जो यहाँ चला आया।
उद्देश्यवाचक-ऐसे समुच्चयबोधक अव्यय जो प्रथम उपवाक्य के उदे्श्य को प्रकट करते है,
उन्हें उद्देश्यवाचक कहते है। ये समुच्चयबोधक वाक्य के आरम्भ  में लगते है।
दूसरे शब्दों में —जिस अव्यय से एक वाक्य का उद्देश्य या फल दूसरे वाक्य द्वारा प्रकट हो, उसे उद्देश्यवाचक कहते हैं।
जैसे-
  • ताकि, कि, जो, इसलिए कि आदि उद्देश्यवाचक शब्द है।
उदाहरण-
  • चाबी बनाने वाले को बुलाओ ताकि ताला खुल सके।
  • रामकली को जाना है,इसलिए तैयार हो रही है।
  • नरेश को नायक बनाओ जोकि अच्छा अभिनय करता है।
  • मैं वहाँ इसलिए गया था ताकि पुस्तक ले आऊँ।
  • राम इसलिए नहीं आया कि कहीं उसका अपमान न हो।
संकेतवाचक-ऐसे समुच्चयबोधक अव्यय जो दो उपवाक्य के शुरू में लगकर दोनों उपवाक्यों को जोडते है,
जैसे-
  • यदि—तो
  • अग— तो
  •  जब—तब
  • यद्यपि–तथापि
  • जो—–तो
  • चाहे—परन्तु, कि आदि संकेतवाचक शब्द है।
उदाहरण-
  • अगर सावधान रहते तो जेब नहीं कटती।
  • यद्यपि इंदिरा तेज़ दौडी तथापि प्रथम भूमिका ही आई।
  • यदि समय मिला तो मैं अवश्य जाऊँगा।
  • यदि अनुपमा परिश्रम करती तो प्रथम आ जाती है।

विस्मयादिबोधक अव्यय :-

विस्मय शब्द का अर्थ है—“आश्चर्य ,,“विस्मय आदि भावों को व्यक्त करने वाले शब्द है”। जो  अरे!, हो!,उफ़, हाय!,छि आदि इन वाक्यों  या अव्ययों का अपना  कोई अलग कोई अर्थ तो नहीं होता पर किसी वियोष परिस्थिति में मुह से निकल जाते है।  और हमारे मन के भावों को व्यक्त करते है।
अर्थात हम कह सकते है कि ऐसे अव्यय  शब्द  जो  विस्मय ,प्रशंसा, प्रसननता, आश्चर्य, हर्ष, शोक, घृणा, आशीर्वाद, क्रोध, उल्लास, भय आदि भावों को प्रकट करें, उन्हें’विस्मयादिबोधक’ कहते है।
दूसरे शब्दों में- जिन अव्ययों से हर्ष-शोक आदि के भाव सूचित हों, पर उनका सम्बन्ध वाक्य या उसके किसी विशेष पद से न हो, उन्हें ‘विस्मयादिबोधक’ कहते है।
जैसे-
  • हाय! अब मैं क्या करूँ ?
  • हैं! तुम क्या कर रहे हो ? यहाँ ‘हाय!’ और ‘है !’
  • अरे! पीछे हो जाओ, गिर जाओगे।
इस वाक्य में अरे! शब्द से भय प्रकट हो रहा है।
विस्मयादिबोधक के निम्नलिखित भेद हैं-
विस्मयादि भाव और विस्मयादिबोधक शब्द
  • विस्मयादि (भाव)—————–  विस्मयादिबोधक (शब्द)
  • विस्मय आश्चर्य ——————-अरे!,क्या, है आदि।
  • प्रशंसा प्रोत्साहन——————वाह,सुंदर,ओहो,आदि।
  • हर्ष उल्लास——————— वाह,आहा आदि।
  • संबोधन ————————-अबे, ओए,अजी,अरे,अरी,ओजी आदि।
  • पीडा व्यथा———————-ओह,उफ़,हाय आदि।
  • शोक————————— हाय,आह आदि।
  • भय ————————– हाय,अरे आदि।
  • चेतावनी————————-सावधान,खबरदार,बचो,हटो,जागो आदि।
  • आशीर्वाद ———————–शाबाश, बने रहो,दीर्घायु हो आदि।
  • तिरस्कार  दूर हटाना—————-धिक्,जा,हट आदि।
  • स्वीकृत —————————ठीक,अच्छा,जी,जी—हॉं आदि।
  • क्रोध—————————–अरे,खामोश, चुप आदि।
  • कुतज्ञता ————————–शुक्रिया,धन्यावाद,आभारी,आदि।
  • अभिवादन————————नमस्ते, प्रणाम,नमस्कार आदि।
  • घृणा————————— छि:,छि:—छि:,दुर  
विकारी शब्दों का विस्मयादिबोधक के रूप में प्रयोग
कई बार विकारी शब्दों का विस्मयादिबोधक के रूप में प्रयोग में लाया जाता है।
  • संज्ञा —– ——-बाप रे बाप! छोटी सी लडकी और गज भर जबान
  • सर्वनाम——— –क्या! तुम प्रथम आ गए।
  • विशेषण ———अच्छा!अशोक कहानियॉं भी लिखता है।
  • क्रिया ———– पढो! पढाई ही काम आती है।

विशेष

  • जिन अविकारी शब्दों का प्रयोग वाक्य के प्रारम्भ में होता है तथा इनका वाक्य की रचना से सीधा संबंध नहीं होता।
  • विस्मयादिबोधक शब्दों के बाद विशेष चिह्न (!) लगता है।
  • विस्मयादिबोधक एक  अव्यय शब्द  है, जिनका अपने वाक्य या किसी पद से कोई सम्बन्ध नहीं।
  • व्याकरण में विस्मयादिबोधक अव्ययों का कोई विशेष महत्त्व नहीं है।
  • विस्मयादिबोधक शब्दों या वाक्यों के निर्माण में कोई विशेष सहायता नहीं मिलती।
  •  इनका प्रयोग मनोभावों को तीव्र रूप में प्रकट करने के लिए होता है।
  • ‘अब मैं क्या करूँ ? इस वाक्य के पहले ‘हाय!’ जोड़ा जा सकता है।

निपात अव्यय

कुछ विकारी या अविकारी शब्द वाक्य में किसी पद के बाद लगकर उस पद के अर्थ में विशेष बल देते है
हिंदी में इनको निपात कहते है।
सरल शब्दों में —जो अव्यय वाक्य में किसी शब्द के बाद लगकर उसे विशेष बल प्रदान करतें है उन्हें निपात कहते है। इन्हें अवधारणामूलक शब्द  भी कहते हैं।  और यह वाक्य में नवीनता या चमत्कार उत्पन्न करने का कार्य करते है।
  • जिन वाक्यों में ——— ही, भी, तो, तक, मात्र, भर, मत, सा, जी, केवल आते हैं वहाँ पर निपात अव्यय होता है।

निपात का अर्थ

यास्क के अनुसार ‘निपात’ शब्द के अनेक अर्थ है, इसलिए ये निपात कहे जाते हैं-
उच्चावच्चेषु अर्थेषु निपतन्तीति निपाताः यह पाद का पूरण करनेवाला होता है- ‘निपाताः पादपूरणाः । कभी-कभी अर्थ के अनुसार प्रयुक्त होने से अनर्थक निपातों से अन्य सार्थक निपात भी होते हैं।
निपात शुद्ध अव्यय नहीं है; क्योंकि संज्ञाओं, विशेषणों, सर्वनामों आदि में जब अव्ययों का प्रयोग होता है,
तब उनका अपना अर्थ होता है, पर निपातों में ऐसा नहीं होता। साधारणतः निपात अव्यय ही है। हिन्दी में अधिकतर निपात शब्दसमूह के बाद आते हैं, जिनको वे बल प्रदान करते हैं।यद्यपि निपातों में सार्थकता नहीं होती, तथापि उन्हें सर्वथा निरर्थक भी नहीं कहा जा सकता।
यास्क ने निपात के तीन भेद माने है-
  • उपमार्थक निपात : यथा——– इव, न, चित्, नुः
  • कर्मोपसंग्रहार्थक निपात : ——-यथा- न, आ, वा, ह;
  • पदपूरणार्थक निपात : यथा- —–नूनम्, खलु, हि, अर्थ।

निपात का प्रयोग

  • मूलतः निपात का  प्रयोग अव्ययों के लिए होता है लेकिन वे शुद्ध अव्यय नहीं होते है
  • निपातों का प्रयोग निश्चित शब्द, शब्द-समूह या पूरे वाक्य को अन्य (अतिरिक्त) भावार्थ प्रदान करने के लिए होता है।
  • निपात का कोई लिंग, वचन नहीं होता। । जैसे अव्ययों में आकारगत अपरिवर्त्तनीयता होती है, वैसे ही निपातों में भी। इसके अतिरिक्त,
  • निपात सहायक शब्द होते हुए भी वाक्य के अंग नही होते। पर वाक्य में इनके प्रयोग से उस वाक्य का समग्र अर्थ व्यक्त/प्रभावित होता है।

निपात के कार्य

निपात के निम्नलिखित कार्य होते हैं-
  •  पश्र– ————-जैसे : क्या वह जा रहा है ?
  • अस्वीकृति———- जैसे : मेरा छोटा भाई आज वहाँ नहीं जायेगा।
  • विस्मयादिबोधक– ——जैसे : क्या अच्छी पुस्तक है !
  • वाक्य में किसी शब्द पर बल देना- बच्चा भी जानता है
निपात के प्रकार |

तुलनाबोधक निपात – सा

  • हरीश—सा भाई नवल का सहारा है।
  • कल्लू सा अपराधी पुत्र खानदान पर कंलक है।
  • राकेश मुकेश सा समझदार नहीं है।
स्वीकारबोधक निपात – हा,जी,जीहाँ
  • जी हॉं ,हम सब अवश्य गाएॅंगें ।
  • हॉं, मैं पहुॅंच जाउॅंगा।
  • जी, इतनी धनराशि पर्याप्त है।
नकारबोधक निपात – जीनहीं,नहीं
  • अशोक जैन श्री नगर नहीं जाता।
  • सुदेश शर्मा नहीं गाएगी।
 निषेधबोधक निपात – मत
  • नाना जी के चित्र को मत उतारो।
  • आवारागर्द लडकों से मित्रता मत करों
 प्रश्नबोधक निपात – क्या
  • बस क्या यहॉं से मिलेगा?
  • अनिल और सुनील क्या दिल्ली से वापस आ गए।
 विस्मयबोधक निपात – क्या,काश
  • क्या!दीदी अस्पताल में है।
  • क्या तुम्हें प्रथम पुरस्कार मिला?
अवधारणाबोधक निपात – ठीक,करीब,लगभग,तकरीबन
  • बढई ने मेज ठीक बनाया है।
  • सडक लगभग तैयार हो गई है।
  • राधा के अंक पारवती की अपेक्षा के करीब आए है।
आदरबोधक/ सम्मानवाचक  निपात – जी
  • गुरू जी ने शिष्यों को भली भॉंति समझाया।
  • मैं प्रात: उठकर दादा जी और दादी जी के चरण छूता है।
बल प्रदायकबोधक निपात –तो,ही,भी,तक,भर,सिर्फ,केवल
  • श्री नगर जा रही हो साथ में   गर्म वस्त्र तो ले लों
  • जानकी का भरोसा बडे पुत्र पर पर है।