Hindi Vyakaran-हिंदी व्याकरण

व्याकरण (GRAMMAR)की परिभाषा

जिस शास्त्र के द्वारा हमें शब्दों की रचना तथा उनकी बनावट के शुद्व व अशुद्ध रूप का ज्ञान होता है। उसे व्याकरण कहते है  भाषा के नियम सीमित होते है। जिसमें भाषा की अभिव्यक्तियों का रूप असीमित होता है। लेकिन व्याकरण में भाषा के नियम , अभिव्यक्तियों और संरचना भिन्न तथा नियंत्रित होती है। भाषा के सभी नियमों का अध्ययन करना व्याकरण शास्त्र के अर्न्तगत आता है। इसी शास्त्र में भाषा के नियमों को जोडना, संचालन करना, नियमित रूप प्रदान करना ही व्याकरण शास्त्र कहलाता है।

व्याकरण का निर्माण

व्याकरण का निर्माण – व्याकरण का निर्माण 110 साल पहले आया। व्याकरण इससे पहले सस्कृंत में होती थी। जिस साधन के द्वारा प्रत्येक शब्द की व्याख्या कर सकते है।  उसे व्याकरण कहते है। इसे “शब्दानुसाशन और शब्दयोनी” भी कहते है। व्याकरण ग्रन्थ को बिना पढे हुए किसी भी भाषा में निपूर्ण नहीं हुआ जा सकता है।

व्याकरण या( ग्रामर) की निम्नलिखित परिभाषाऐं हैं ।

 

  • डॉ स्वीट के अनुसार:—- “व्याकरण भाषा का व्यवहारिक विश्लेषण अथवा उसका शरीर विज्ञान है”।
  • जैगर के अनुसार:——- “प्रचलित भाषा संबंधी नियमों की व्याख्या ही व्याकरण है”।
  • हैजालिट के अनुसार:—-“व्याकरण भाषा की विशेष प्रकार की रचना का वर्णन है”।

व्याकरण का अर्थ (Meaning of Grammar)

व्याकरण शब्द (वि+ आ+कृ –धातु +ल्युट +प्नत्यय) के योग से बना है। जिसका अर्थ है ““व्याक्रियन्ते व्युत्पाद्यन्त शब्द अनेनेति व्याकरणम्”    अर्थात जिस के द्वारा अर्थ स्वरूप से शब्दों की सिद्धि होती है व्याकरण कहलाता है।व्याकरण शब्दों के प्रयोग का अनुशासक है।

  • महर्षि पणिनि ने इसे ‘शब्दानुशासन’ कहा है। व्याकरण का अध्ययन भाषा के शुद्ध प्रयोग के लिए किया जाता है।
  • महर्षि पंतजलि ने भी अपने महाभाष्य में इसे “शब्दानुशासन “ही कहा है। अर्थात
  • “महाभाष्य में व्याकरण शब्दानुशासन” कहा है।
  • आचार्य हेमचन्द ने भी इसी मत का समर्थन किया है।
  • किसी भी भाषा के अंग प्रत्यंग का विश्लेषण तथा विवेचन व्याकरण कहलाता है।

अर्थात व्याकरण वह शास्त्र है जिसके द्वारा हम किसी शषा के शुद्व रूप को बोला, पढा और लिखा जाता है। किसी भी भाषा के बोलने, पढने और लिखने के निश्चित नियम होते है। व्याकरण भाषा के इन सभी नियमों का विश्रलेषण तथा सकंलन करता है। व्याकरण भाषा के सभी नियमों को स्थिरता प्रदान करता है। व्याकरण के सभी नियम भाषा को मानक बनाते है। एक बहुभासावादी समाज के नागरिक भाषा के जिस रूप को आधार मानकर नियमों का पालन किया जाता है।

  • सर्वप्रथम हिन्दी व्याकरण ‘श्री कामता प्रसाद‘ गुरू ने लिखी है।
  • विश्व का पहला व्याकरण रचना कार ‘पाणिनि‘ को माना जाता है। जिनकी रचना ‘अष्टाध्यायी‘ है।
  •  वह शास्त्र है जिसके द्वारा हमें किसी भाषा के शुद्व बोलने,लिखने व पढने के नियमों का ज्ञान होता है।

व्याकरणकुछ उदाहरण इस प्रकार है।

  • गीता गाना गा रहा। —————- (अशुद्व रूप)
  • कल जाना है मुझे कलकता ——— -(अशुद्व रूप)
  • तेरे को मैनें देना है।—————- -(अशुद्व रूप)
  • परिक्षा ,डीब्बा, प्रमात्मा ————– (अशुद्व रूप)
  • मार दिया को ने राम श्याम———— (अशुद्व रूप)

इन पाचों उदाहरणों में कुछ न कुछ अशुद्वि है।

  • पहले वाक्य में लिंग संबंधी अशुद्वि है स्त्रीलिंग के साथ क्रिया का रूप ‘रही‘ होना चाहिए।
  • (शुद्व वाक्य)——- गीता गाना गा रही है।
  • दुसरे वाक्य में शब्दों का क्रम सही नहीं है।
  • (शुद्व वाक्य)———- मुझे कल कोलकता जाना है।
  • तीसरे वाक्य में शब्दों का अशुद्व प्रयोग है।
  • (शुद्व वाक्य) ———–तुम को मुझे देना है।
  • चौथे उदाहरण में शब्दों की वर्तनी (Spelling)
  • (शुद्व वाक्य)——- परीक्षा,डिब्बा,परमात्मा
  • पाचवें उदाहरण में शब्दों का अर्थ स्पष्ट नहीं है क्योंकि कर्म,कर्ता तथा कारक निश्चित स्थान पर नहीं है।
  • (शुद्व वाक्य)- ———-राम ने श्याम को मार दिया

व्याकरण की अनिवार्यता या आवश्यकता (Grammar Imperative)

 

  • भाषा को शुद्व रूप प्रदान करने के लिए व्याकरण की अनिवार्यता होती है। अर्थात जो शास्त्र शब्दों की रचना करता है। वह व्याकरण (Vayakaran) कहलाता है।
  • व्याकरण के नियमों का ज्ञान छात्रों में मौलिक वाक्य संरचना की योग्यता का विकास करता है। भाषा की मितण्ययिता के आधार हेतु व्याकरण के नियमों का ज्ञान आावश्यक है। छात्रों में भाषा शुद्ध लिखने बोलने के कौशल का विकास करती है।
  • व्याकरण:- शिक्षा से मातृभाषा के प्रयोग से लिखने, बोलने में शुद्धता आती है। मातृभाषा में व्याकरण के उपयोग से शुद्ध एवं स्पषट व्यवहार आता है। शुद्ध सम्प्रेषण व्याकरण के उपयोग पर निर्भर होता है।

व्याकरण का महत्व (Importance of Hindi Grammar)

  • हिन्दी Vyakarna का भाषा में बहुत अधिक महत्व है।

किसी भाषा के अध्ययन के लिए उस भाषा के व्याकरण का ज्ञान होना आवश्यक है। वस्तुतः व्याकरण का ज्ञान भाषा का उचित प्रयोग करना सिखाता है। जिस प्रकार गुरू के ज्ञान के बिना मानव जीवन अधूरा है व्याकरण के ज्ञान के बिना शुद्ध व मानक भाषा का ज्ञान भी अधूरा है।

  • Grammar (व्याकरण) के द्वारा भाषा के शुद्व एंव स्थाई रूप को निश्चित किया जा सकता है ।
  • हिन्दी ग्रामर (व्याकरण) के द्वारा मनुष्य द्वारा भाषा में आए दिन होने वाले परिवर्तनों से बचाकर उसे स्थायी रूप प्रदान करता है।
  • व्याकरण के नियमों का पालन करके भाषा जीवंत सतत विकास कर सकती है तथा भाषा रूप के आधार पर व्याकरण नियम बनाता है।
  • व्याकरण भाषा के नियमों को स्वीकार करता है।
  • व्याकरण वह(part) या हिस्सा है। जो शब्दों के बदलाव के साथ उनके अर्थ को बदलने के लिए व्यवहार करता है।
  • व्याकरण की महता सर्व विदित है।
  • व्याकरण के द्वारा भाषा के स्वरूप की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। इसी से भाषा के शुद्व व अशुद्व रूप की पहचान कर सकते है।
  • व्याकरण की महत्वता के बारे में संस्कृत भाषा में एक श्लोक है।

 

व्याकरण की उपयोगिता (Utility of Grammar)

व्याकरण की उपयोगिताः-व्याकरण की उपयोगिता यह है कि – किसी भी भाषा को अच्छे तरीके से जानने के लिए सबसे शुरू (starting) में उस भाषा के व्याकरण का ज्ञान होना अति अनिवार्य है।

  • बिना व्याकरण के ज्ञान के किसी भाषा के शुद्व रूप को ठीक ढंग से न तो बोल सकते है,न ही लिख सकते है।
  • व्याकरण से भाषा का मानक प्रयोग सीखते है।
  • व्याकरण सीखने के बाद मनुष्य भाषा की प्रकृति को समझकर शुद्व रूप में बोलने,लिखने,पढने, और समझने लगता है।
  • इस प्रकार भाषा में शुद्वता और एकरूपता बनाए रखने में व्याकरण बहुत उपयोगी होता है।
  • व्याकरण किसी भी भाषा के नियमों को स्पष्ट करता है अर्थात परिभाषित करता है।
  • व्याकरण किसी भाषा के शुद्व और स्थायी रूप को निश्चित करने के लिए नियमबद्व योजना है।
  • इसके द्वारा हमें शुद्वियों व अशुद्वियों का ज्ञान होता है तथा व्याकरण किसी भी भाषा के नियमों को स्पष्ट करता है अर्थात परिभाषित करता वह व्याकरण कहलाता है।

 

 

व्याकरण की विशेषताएँ (Grammatical features)

 

सस्ंकृत भाषा से हिन्दी व्याकरण के नियमों का विकास हुआ है। हिन्दी व्याकरण ने सस्ंकृत के क्रलिष्ठ कठिन रूप को सरलतम रूप में परिवर्तित कर दिया है

पं0 किशोरी दास वाजपेयी ने लिखा है कि– “हिंदी व्याकरण प्रायः संस्कृत व्याकरण के आधार पर लिखा गया है। हिन्दी व्याकरण का कार्य या क्रियाप्रवाह संस्कृत व्याकरण के आधार पर है, पर कहींकहीं मार्ग भेद भी है। मार्ग भेद वहीं हुआ है, जहॉ हिन्दी ने संस्कृत की अपेक्षा सरलतम मार्ग ग्रहण किया है।

व्याकरण की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं है।

 

  • हिन्दी व्याकरण का उद्वभव विकास है, सस्ंकृत भाषा
  • व्याकरण के सहयोग से शुद्ध लिखना,बोलना, पढना आ जाता है।
  • वयाकरण के द्वारा शुद्ध रूप का ज्ञान होता है।
  • व्याकरण के द्वारा वाक्य की संरचना तथा उसकी शुद्वता का ज्ञान होता है।
  • भाषा में होने वाले वाले परिवर्तनों को व्याकरण द्वारा ही नियोजित किया है।
  • भाषा के नवीनतम रूप को सरलता और सुगमता पूर्वक पढने में व्याकरण का बहुत अधिक योगदान या महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • व्याकरण द्वारा भाषा के व्यवहारिक रूप का विश्लेषण किया जाता है और भाषा में व्याकरण के नियमों का पालन करके भाषा को स्पष्ट और सरल बनाता है।
  • भाषा में व्याकरण के सभी नियमों का पालन करके मनुष्य के द्वारा पढना, लिखना, बोलना और सुनना आदि सभी कौशलों का विकास करती है।
  • व्याकरण के द्वारा शुद्ध सम्प्रेषण किया जा सकता है। जिसमें स्पष्ट रूप से अपनें शब्दों की व्याख्या कर सकते है।
  • व्याकरण भाषा के स्वरूप को सार्थक बनाता है।
  • व्याकरण गद्य साहित्य की आधार शिला है।

व्याकरण के समानार्थक शब्द तथा अन्यनाम

  • शब्द शास्त्र
  • शब्द योनि
  • शब्दानुशासन
  • योनि विदया

व्याकरण के अंग – (Grammar parts)

भाषा के शुद्व व अशुद्व रूप का बोध कराने वाले शास्त्र को व्याकरण कहा जाता है।

भाषा के मुख्य चार अंग है वर्ण, शब्द,पद,और वाक्य । इसलिए व्याकरण के मुख्यतः चार भाग (Part) है-

  1. वर्ण-विचार
  2. शब्द-विचार
  3. पद-विचार
  4. वाक्य-विचार

1).वर्ण-विचार या अक्षरः– भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि वर्ण ध्वनि है। ध्वनि को वर्ण कहते है। जिसके टुकडे नहीं किये सकते है। अर्थात भाषा की सबसे छोटी इकाई या ध्वनि जिसके टुकडे नहीं किये जा सकते उसे वर्ण या अक्षर कहते है। जैसे

क ल ट म आदि।

2).शब्द -विचार :-व्याकरण में जिस रचना के द्वारा शब्दों के स्वरूप, भेद, लिंग आदि का अध्ययन किया जाता है। उसे शब्द कहते है। इसनें शब्दों के भेद,स्तोत्र,रूप और रचना आती है।

उदाहरणः-राजा,पानी,सोना,पुस्तक आदि।

3).पद-विचारः– कोई भी शब्द जब वाक्य में प्रयुक्त या प्रयोग होता है तो वह पद कहलाता है या पद बन जातें हैं। इसमें पद-भेद, पद-रूपान्तर,तथा उनके प्रयोग आदि शामिल किये गए है।

4).वाक्य-विचारः– अक्षरों और वर्णों के मेल से जो शब्द बनते हैं वह वाक्य कहलाते है। व्याकरण की दृष्टि से वाक्य रचना, वाक्य के भेद,और विराम चिह्रन आदि का अध्ययन किया जाता है।

ध्वनि  व  लिपि 

 

ध्वनि :-वर्ण या भाषा की लघुतम ईकाई को ध्वनि कहते है। ध्वनि को बांटा नहीं जा सकता क्योंकि उसके और टुकडे नहीं हो सकते है

भाषा के सदंर्भ में-ध्वनि भाषा की स्वत्रंत व लघुत्तम ईकाई है।जिसका स्वय स्वत्रंत अस्तित्व होता है तथा भाषा में प्रयुक्त लघुत्तम ईकाई जिसका उच्चारण एंवम श्रव्यता की दृष्टि से स्वत्रंत अस्तित्व हो वह भाषा ध्वनि कहलाती है।

ध्वनि की महत्वता

  • ध्वनि भाषा की प्रथम और लघुत्तम ईकाई है। जिसके द्वारा ध्वनियॉं मानव मुख से निःसृत होती है।ध्वनि भाषा
    का मुख्य आधार है
  • मनुष्य के शरीर में ध्वनि को उत्पन्न करने और ग्रहण करने वाले दोनों ही प्रकार के अवयव होते है। जो मनुष्य के किसी कार्य विशेष से निकलती है जैसे -चलना-फिरना,दौडना-भागना, आदि।
  • ध्वनि और भाषा का अटूट संबंध है जिसूमें ध्वनिसमूह को भाषा कहा जाता है जिसके अंर्तगत वर्ण शब्द, पद, वाक्य आदि सम्मिलित है।
  • भाषा विज्ञान में ध्वनियों का अध्ययन ध्वनि विज्ञान के द्वारा होता है तथा ध्वनि विज्ञान के अंर्तगत उच्चारण से संबंधित अध्ययन किया जाता है।

 

 लिपि (script)

 

मौखिक या उच्चारित भाषा को स्थायी रूप प्रदान करने के लिए लिखित भाषा का विकास हुआ ।प्रत्येक सार्थक ध्वनि के लिए लिखित चिह्न या वर्ण बनाए गए। शब्दों को लिखने के लिए विभिन्न वर्णां को मिलाकर लिखे जाने की पूरी व्यवस्था को विकसित किया गया। लेखन की इसी व्यवस्था को लिपि कहा गया है।वस्तुतः लिपि विभिन्न भाषिक ध्वनियों को लिखकर प्रस्तुत करने का तरीका है। अतः कहा जा सकता है कि

“उच्चारित भाषा को लिखकर व्यक्त करने के लिए विभिन्न लिखित चिह्नों या वर्णों की व्यवस्था लिपि कहलाती है।”

मानव विचारों ने भाषा को जन्म दिया और भाषा को स्थायी व मानक रूप प्रदान करने की आवश्यता ने लिपि का  विकास किया। इसी आवश्यकता को देखते हुए लिपि के विकास चार अवस्थाएं है।

  • प्रतीक लिपि
  • चित्र लिपि
  •  भाव लिपि
  •  ध्वनि लिपि

 

लिपि (Sound) :- भाषा की ध्वनियों को अंकित करने के लिए निश्चित किए गए चिह्रनों की व्यवस्था को लिपि कहते है।अतः हम कह सकते प्रत्येक भाषा के वर्ण अलग अलग होते है। जिस रूप में वर्णों को अंकित किया जाता है। वही रूप लिपि कहलाता है।

भाषा को लिखने के लिए निर्धारित किये गए चिह्रनों को लिपि कहते है। लिपि का शाब्दिक अर्थ होता हैः-“लिखित या चित्रित करना।”

किसी भी भाषा को लिखने के लिए हम जिन चिन्हों को निर्धारित करते है उन चिन्हों को लिपि कहते है। भाषा के लिखित रूप लिपि कहते है। और निश्चित लिपि होती है।

  • भारत की अनेक भाषाएं -हिंदी,संस्कृत मराठी,,कोंकणी नेपाली,आदि ’देवनागरी लिपि’में लिखी जाती है। तथा अग्रेंजी,फ्रेंच,जर्मन,इटेलियन स्पेनिश,पोलिश, आदि भाषाएं रोमन लिपि में लिखी जाती है।

प्रत्येक भाषा की लिपि अलग अलग होती है जिस तरह लिपि एक होने पर भाषाएं एक नहीं हो जाती उसी तरह किसी एक भाषा को अलग अलग लिपियों में लिख देने पर वह अलग भाषा नहीं हो जाती।

उदाहरण के लिए  हिंदी भाषा को देवनागरी तथा रोमन लिपि में लिख देने पर वह अलग भाषा नहीं होगी।

जैसे:-

देवनागरी लिपि मेंः-  (मोहन घर जाता है।)
रोमन लिपि 🙁 Mohan ghar jata hai|)

  • हिंदी ,गुजराती,मराठी की लिपि देवनागरी होती है
  • अंग्रेजी भाषा की लिपि रोमन है
  • उर्दू की लिपि फारसी है
  • पंजाबी की लिपि गुरुमुखी है
  • बांगला की लिपि बांगला है।

देवनागरी का विकास

 

भाषा को लिपियों में लिखने का प्रचलन सबसे पहले भारत में शुरू हुआ । भारत में इसे सुमेरियन बेबोलियन और यूनानी लोगों ने किया है हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। देवनागरी लिपि का जन्म या विकास भारत की सबसे प्राचीन लिपि ‘ब्राही लिपि‘ से हुआ है तथा ‘ब्राही लिपि‘ का अविष्कार वैदिक आर्यों के द्वारा शुरू किया इसमें राजा अशोक के द्वारा निर्मित शिला लेखो के संदेशों को लिखने में ब्राही लिपि का प्रयोग किया गया है। इस लिपि से शारदा लिपि, कुटील लिपि, प्राचीन लिपि और गुप्त लिपि आदि लिपियां निकली है । भारत की सभी लिपियां ब्रीहमी लिपि से निकली है।देवनागरी लिपि को लोक नागरी लिपि और हिन्दी लिपि भी कहा जाता है।

देवनागरी लिपि का नामकरण

 

देवनागरी लिपि के विषय में नामकरण की दृष्टि से अलग अलग मत पाए जाते है। किन्तु अनेक विद्ववाने के शोध का निष्कर्ष यही है। कि इसका नामकरण तत्कालीन बनारस के प्रसिद्ध न्यायधीश ‘श्री शारदा चरण मित्र‘के द्वारा किया है। उनका कहना है कि इस लिपि का प्रयोग सबसे ‘देवनागर‘ जाति ब्राहमणों के द्वारा किया गया था। इसके विकास का इतिहास ब्राहमणी लिपि से माना जाता है।

देवनागरी लिपि का स्वरूप

 

देवनागरी लिपि का स्वरूप अत्यंत प्राचीन है। यह लिपि ब्राही लिपि का ही विकसित रूप है जिसमें हिंदी,संस्कृत मराठी,,कोंकणी, नेपाली आदि भाषाओं को इसी लिपि में लिखा जाता है।

  • यह लिपि बांयी ओर से दायीं ओर लिखि जाती है। जबकि फारसी लिपि उर्दू अरबी,फारसी,भाषा की लिपि दायीं ओर से बायीं लिखी जाती है।
  • यह अक्षरात्मक लिपि (syllabic script) रोमन लिपि (अंग्रेजी भाषा )की लिपिद्ध वर्णात्मक लिपि(Alphabetic script) है।

देवनागरी लिपि की विशेषता/ सीमाएं

 

देवनागरी लिपि की लोकप्रियता का कारण उसकी कुछ महत्वपूर्ण विशेषता है।

  • इस लिपि में जो शब्द जैसे बोले जाते हे वैसे ही लिखे जा सकते है।
  • देवनागरी लिपि में सभी स्वरों व व्यजनों को उनके शुद्ध रूप में लिखने की व्यवस्था हैं
  • देवनागरी लिपि में जो ध्वनि का नाम है वही वर्ण का नाम है।
  • इस लिपि में कुछ वर्ण दो प्रकार से लिखे जाने का प्रावधान है।
  • इस लिपि में अनुस्वार , अर्धचंद्र बिंदु आदि के प्रयोग की व्यवस्था है।
  • देवनागरी लिपि में शब्दों पर शिरो रेखा लगाने की व्यवस्था है।
  • यह लिपि भारत की अनेंक लिपियों के निकट है।
  • देवनागरी लिपि का प्रयोग और क्षेत्र बहुत ही व्यापक और विस्तृत है जों हिंदी,संस्कृत मराठी,,कोंकणी नेपाली,आदि की एकमात्र लिपि है।

देवनागरी लिपि के दोष व सुधार के प्रयत्न

 

यदपि देवनागरी लिपि में अनेक विशेषताएं है तथापि कुछ दोष भी है। जिनके सुधार के प्रयत्न किए जा रहे है।

  • मुख्य रूप से इसमें ‘श और ष‘ के उच्चारण में अन्तर पडता है। इसी प्रकार ‘थ और य‘ तथा ‘घ और ध‘ में भ्रम हो जाता है। इस देवनागरी लिपि में कुछ अक्षर ऐसे भी है। जो दो प्रकार से लिखे जाते है। जैसे – झ और ल ।
  • अनुस्वार एवम् अनुनासिक के प्रयोग में एकरूपता का अभाव देखने को मिलता है।
  • शिरो रेखा का अनावश्यक प्रयोग अलंकार के लिए किया जाता है।
  • इस लिपि में वर्णां को संयुक्त करने के लिए कोई निश्चित व्यवस्था नहीं की गई है।
  • इसमें द्विरूप वर्ण तथा समरूप वर्ण की निश्चित व्यवस्था नहीं है। जिसके कारण भ्रम उत्पन हो जाता है।
  • इस प्रकार के दोषों को सुधारने के लिए कई सस्थाएं प्रयत्न कर रही है। जिसमें हिंदी साहित्य सम्मेलन “प्रयाग काशी नागरी प्रचारणी सभा काशी “केद्रिय हिंदी निदेशालय प्रमुख है।
  • श्याम सुन्दर दास का पंचमाक्षर के बदले अनुस्वार के प्रयोग का सुझाव दिया है

जिन विद्ववानों ने देवनागरी लिपि को सुधारने के लिए प्रयत्न किए है।

  • पण्डित किशोरी दास वाजपेयी
  • डा0 धीरेंद्र वर्मा
  • बाबू रामचंद्र वर्मा
  • आचार्य नरेंन्द्र देव प्रमुख है।

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वैयाकरण

वैयाकरण :-  को पढने वाला तथा पढाने वाला वैयाकरण कहलाता है।

धातु ,उपसर्ग, निपात, वर्ण, व्यंजन, शब्द, पद, पदबंध, व्युत्पति, निरूपत, निर्वचन, अव्यय, गुण, लोभ, आगम, मूर्तिपद, अमूर्त,पद, विकारी पद, अविकारी पद, उपधा, तत्सम, तदभव, यौगिक, योगरूढ, देशज-विदेशज, पाई- पाई रहित वर्ण/ स्वर व्यंजन, पाई-पाई सहित वर्ण/ स्वर व्यंजन, सवर्ण, मात्रा ,वर्णविनाश, प्रत्याहार, स्त्रोतभाषा ,लक्ष्य भाषा, राजभाषा , सघं भाषा, आदर्श भाषा, औद्वान्तिक भाषा , विक्षिप्त भाषा  मानक भाषा संध्या भाषा , टकसाली भाषा आदि व्याकरण को पढने के लिए इसमें सम्मिलित किए गए है ताकि भाषा के कठिन रूप को व्याकरण के नियमों के द्वारा सरल रूप में बताया जा सकता है।

धातु जैसेः- सोना,चॉदी,आदि धातु से आभूषण बनते है।वैसे ही भाषा के सभी शब्दों का निर्माण धातु से होता है।

उपसर्ग :- शब्दों के वे छोटे छोटे जो धातु के पहले नई रचना बनाते हैं वे उपसर्ग कहलाते है। जैसेः-

  • अ, अन, अनु ,री आदि 20 उपसर्ग है। अनु़़क्रिया

प्रत्ययः- धातु के बाद लगते है। जैसेः- गन्त़ तव्य गन्त तव्य तथा शब्द की रचना करते है।

निपातः- जिनका अर्थ हल नहीं हो लेकिन बीच में आकर वाक्य को रूप प्रदान करते है। जैसेः-

  • जो, ही भी, ते,ज्यों त्यों आदि ।

वर्ण :-भाषा का प्रारम्भ वर्ण से होता है। वर्ण वह छोटी सी ध्वनि है। जिसके टुकडे नहीं हो सकते इन्हें स्वर भी कहते है

जैसे अ, इ,उ,

भाषा विज्ञान और व्याकरण में स्वर तथा व्यजनों को ध्वनि कहते है।

व्यंजन :– जो स्वर तथा व्यंजन कहलाते है।वे व्यंजन कहलाते है। जैसे :-

  • स्पर्श व्यंजन 25, क वर्ग , च वर्ग,ट वर्ग, प वर्ग क से म तक स्पर्श व्यंजन है
  • य,र,ल,व अन्तस्थ व्यंजन
  • श,स,ष उष्म व्यंजन वर्ण माला भी कहते है।

शब्दः स्वर या वर्णो को मिलाने से जो सार्थक ध्वनि निकलती है।उसे शब्द कहते है।

ये दो प्रकार के होते है।

  • सार्थक:-रोटी- पानी
  • निरर्थक:- वोटी-वाणी

पद :- कोई भी शब्द जब वाक्य में प्रयोग होता है। तो वह पद बन जाता है।

पद बंद्धः कोई पद या शब्द जब वाक्य में अन्य शब्द के साथ जुडता है। उसे पदंबद्ध कहते है।
जैसे  :-राम दशरथ का बेटा था भेद,सज्ञां विश्लेषण,क्रिया पदंबद्ध है।

पद परिचय :– वाक्य में पद का आपस में परिचय देना उसे पद परिचय कहते है।

व्युत्पति,–कवि को कविता पढने के लिए जिस शास्त्र को पढना होता है। उसे व्युत्पति कहते है।

व्युत्पति शब्द की मूल निर्माण रचना को व्युत्पति कहते है।

निर्वचन :- किसी भी कठिन शब्द के अर्थ बताने की विधि को निर्वचन कहते है।

अव्यय :- (व्यय/खर्च) जिनका हिंदी भाषा में कभी भी स्त्रीलिंग या पुलि्र्लंग या वचन नहीं बदलते उसे अव्यय कहते है। जैसे :-

  • यथाशक्ति, तथा ,प्रति, अनु,जैसे- तैसे

गुणः- व्याकरण मूल धातु जब शब्द में बदलती है। उसे शब्द कहते है। जैसे

  •   पठ् से पाठ  (गुण
  •   मृत से मृत्यु
  •   भज से भजन
  •  जन से जनम

अर्थात क्रिया जब संज्ञा या कर्म के रूप में सामने आती है।उसे गुण कहते है।

लोपः-  ( छिपना) जब दो शब्दों के मिलन से कोई अक्षर छुप जाता है।उसे लोप कहते है
जैसे:- सु +आगतमत् = स्वागतम

आगमः- जब सन्धि करने पर कोई नया अक्षर या वर्ण आ जाता है। तोउसे आगम कहते है।
जैसे  :- सु़ +आगतम = स्वागतम
अर्थात जब सन्धि करने पर कोई पुराना अक्षर,वर्ण या शब्द चला जाए तो लोप होता है। तथा नया शब्द आ जाए तो आगम होता है।

मूर्त पद-जिन शब्दां के अर्थ लोकप्रचलित है,प्रत्यक्ष है उन्हें पद कहते है।
जैसे

  • दिल्ली,ताज महल,दूध, दही आदि ।

अमूर्त,पद  -जिन शब्दां को प्रत्यक्ष देख नहीं सकते उन्हें अमूर्तपद कहते है। जैसे

  • स्वर्ग, अपसरा,चन्दन ,वृक्ष आत्मा आदि

विकारी पदः- वे शब्द होते है।जिनमें विकार उत्पन्न होता है। अर्थात लिंग वचन से परिवर्तन होता है।वे विकारी पद कहलाते है।

अविकारी पदः-जिन शब्दांका लिंग वचन में भी परिवर्तन नहीं होता है। वे अविकारी पद कहलाते है।

 

उपधाः- किसी शब्द के अंतिम वर्ग में आने वाले पहले वर्ण को उपधा कहते है। जैसे लडका का से पहले वर्ण ड है।

 

तत्सम– तत्सम उन शब्दों को कहते है जो संस्कृत में थे संस्कृत में प्रयोग किए जातें है। लेकिन हम हिंदी में ज्यों को त्यों प्रयुक्त करते है।

तदभवः- तदभव,वे शब्द है संस्कृत से बिगडकर हिंदी में आ गए वे तदभव कहलाते है।

 

यौगिक :-जोडना जो शब्द दो शब्दों से मिलकर बना हो।

  • जैसे पाठ शाला
  • मुसाफिर खाना
  • रसोई घर
  • विघालय

योगरूढः– जो शब्द अर्थ के लिए प्रयुक्त ना होकर किसी अन्य अर्थ के लिए प्रयुक्त होते है।

  • जैसे पात्र ,नीरज

अर्थात जो अर्थानुसार अपने अर्थ को छोडकर किसी दूसरे शब्द के लिए प्रयुक्त होते है।

जैसे

  • नीरजः- कमल जो शब्द अपने विशेष के लिए प्रसिद्ध है।

देशजः- जो क्षेत्र अपनी सुविधानुसार स्ंवय भाषा का निर्माण कर लेता है।तथा व्याकरण की दृष्टि से कोई महत्व नहीं होता है। जैसे

  • ठॉय ठॉय ,ढम ढम, फॉएं फॉए जुगाड आदि ।

अर्थात देश में पैदा होने वाले शब्द देज कहलाते है

विदेशजः- जो शब्द विदेषी भाषा सेआए हुए है और हमारी भाषा में मिल गए है। उसे विदेशज भाषा कहते है।
जैसे स्कूल, स्टेशन

  • औरत –अरबी भाषा का शब्द है।
  • लालटेन –तुर्की भाषा का शब्द है।
  • तम्बाकू– पुर्तगाली भाषा का शब्द है।

पाईः-जिन स्वर व्यंजन शब्दों के पीछे चिह्न या निशान तथा डण्डा खींचा होता है या डण्डे के साथ पूर्ण होते है।

 

पाई सहित वर्णः- जिन व्यंजन के पीछे डण्डा खींचा होता है वह पाई सहित वर्ण होते है।
उदाहरणः-

  • त,घ,न,ख,ग,घ, ण,ज,झ,प,ब,म,श,ष,स,भ,च य,र,ल,व,आदि ।

पाई रहित वर्णः- जिन व्यंजन/स्वर के पीछे डण्डा खींचा नहीं होता है वह पाई रहित वर्ण होते है।

सवर्ण :-एक ही वर्ण वाले अक्षर जिन का रंग रूप उच्चारण स्थान एक सा होता है। जैसे क के साथ वाले सभी वर्ण सवर्ण है।
मात्रा :– वर्ण के पलटे हुए रूप को मात्रा कहते है।
जैसे अ ,इ ई उ
ा, ि , ी ु

वर्ण विनाश:- शुरू में बीच में वर्ण छुट जाए या लिखना भूल जाए या नहीं लिखा जाए उसे वर्ण विनाश कहते है।

जैसे

  •   वर्ण — वर्ण विनाश
  •   विघायल — विघाल

प्रत्याहारः– संक्षिप्त कथन को प्रत्यहार कहते है।जैसे

  • तुम कहां जा रहे हो।

स्त्रोतभाषा -जिस भाषा का अनुवाद किसी अन्य भाषा में किया जाता है। जैसे

  • हिन्दी का अनुवाद -अग्रेंजी में करना

लक्ष्य भाषा – जिस भाषा में अनुवाद कर रहे है।वह लक्ष्य भाषाहै। जैसे

  • हिन्दी का अनुवाद -अग्रेंजी में कर रहे है। — अग्रेंजी भाषा

राज भाषा :-जिस भाषा में सरकारी काम या आदेश लिखे जाते है। उसे राज मपिि कहते है। लगभग दस 10 प्रान्तों में राज भाषा बोली जाती है। जैसे

  • हरियाणा ,दिल्ली बिहार ,उतरप्रदेश, उतराखण्ड आदि।

 संघ भाषा : – राज भाषा का दूसरा नाम संघ भाषा है। संघ शब्द का अर्थ राज्य या प्रांत है।

 

आदर्श भाषा :-भाषा  का वह रूप जिसका प्रयोग गद्य, पद्य ,महाकाव्य तथा में प्रयोग किया जाता है तथा शब्दकोष में इनका प्रयोग किया जाता है। यह विद्ववानों द्वारा साहित्य में प्रयोग किया जाता है।

 

औद्वान्तिक भाषा – जिसका अर्थ समझाने के लिए उद्यान बाग बगीचे फूल पत्तियों पेड आदि के उदाहरण देकर बताया जाता है। उसे औद्वान्तिक भाषा  कहते है।

उदाहरण:-

  • माली आवत देख कर कलियां करे पुकार।
    फुली फुली चुन लिए काल हमारा आत।।
  • ज्यों तोको काटें बोए।
    तोको फूल की फूल।।
    वाको है त्रिशुल।।।

विक्षिप्त भाषा – बडबडाना, पागल, रोगियों ,शराबी लोगों की भाषा को विक्षिप्त भाषा कहते है।

 

मानक भाषा – भाषा के जो रूप पूरे देश काल वातावरण में प्रचलित रहता है। उसे मानक भाषा  कहते है।
जैसे

  • मीटर,किलोमीटर, लीटर , किलोग्राम ,यह मानक भाषा के गुण है।

टकसाली भाषा  :- जिन शब्दों का प्रयोग कम हुआ है या अनुप्रास, यमक, श्लेष, शब्दों से मिलकर बना है। उसे टकसालीभाषा कहते है।
जैसे :-

  • तत्सम— तदभव
  • चवरधरी –चौधरी

संध्याभाषा :-सिद्धों व नाथों की भाषा संध्याभाषा कहते है। 9नाथ ,84 सि़द्धों आदिकाल के कवि है।