सर्वनाम- परिभाषा, अर्थ, भेद\प्रभेद, प्रयोग, आपस में अतंर – Sarvanam Ke Bhed

सर्वनाम

सर्वनाम  की परिभाषा(Defination of Pronoun)

’’ऐसे शब्द जो संज्ञा शब्दों के स्थान पर प्रयोग में लाए जाते हैं’’ उन्हें सर्वनाम कहते है।

ये शब्द किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा प्रयुक्त न होकर सबके द्वारा प्रयुक्त होते है। तथा कसी एक नाम न होकर सबका नाम न होकर सबका नाम होते है। मैं का प्रयोग सभी व्यक्ति अपने लिए करते है। अतः मै किसी एक का नाम न होकर सबका नाम अर्थात सर्वनाम है।

अतः हम कह सकते है- कि संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होकर संज्ञा का ही प्रकार्य करने वाले शब्दों को सर्वनाम कहा जाता है।

सर्वनाम का प्रयोग करके हम एक ही संज्ञा शब्द को बार बार प्रयोग करने से बचते हैं।

उपर्युक्त गद्यांश के द्वारा हम सर्वनाम को समझते है-
’’गरिमा सुंदर लडकी है। गरिमा प्रतिदिन स्कूल जाती है। गरिमा के भाई का नाम धवल है। ’गरिमा के पिताजी जीवन बीमा निगम में काम करते हैं। गरिमा के सभी भाई प्यार करतें है।’’

उपर्युक्त गद्यांश में -’गरिमा’ संज्ञा शब्द का प्रयोग पॉच बार हुआ है यह बडा अटपटा-सा प्रतीत हो रहा है। इसलिए

इस गद्यांश को इस प्रकार लिखा जाना चाहिए था- गरिमा सुंदर लडकी है। वह प्रतिदिन स्कूल जाती है। उसके भाई का नाम धवल है। उसके पिताजी जीवन बीमा निगम में काम करते हैं। उसको सभी भाई प्यार करतें है। इस बार गरिमा शब्द एक बार ही आया है और उसके लिए ’वह’ उसके ’ उसको’ सर्वनाम का प्रयोग हुआ है।

इस प्रकार,

संज्ञा के स्थान पर आने वाले शब्दों को सर्वनाम कहते हैं।- मै, तू, वह, आप, कोई, यह, य, वे, हम, तुम, कुछ, कौन, क्या, जो, सो, उसका आदि सर्वनाम शब्द हैं। अन्य सर्वनाम शब्द भी इन्हीं शब्दों से बने हैंए जो लिंगए वचन कारक की दृष्टि से अपना रूप बदलते हैं,

अतः हम कह सकते है- कि संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होकर संज्ञा का ही प्रकार्य करने वाले शब्दों को सर्वनाम कहा जाता है

सर्वनाम का अर्थ(Meaning of Pronoun)

 

सर्वनामः(Pronoun)– सर्वनाम का शाब्दिक अर्थ है-  सर्व’’ (सब)का नाम’’ यह दो शब्दों से मिलकर बना है।— सर्व $ नाम ।

अर्थात जो शब्द सबके नामों के स्थान पर प्रयुक्त होते है उन्हें सर्वनाम कहते है।

सरल शब्दों में सर्व सब नामों संज्ञाओं के बदले जो शब्द आते है उन्हें सर्वनाम  कहते है यानी संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्दों को सर्वनाम कहते है। जैसे -मै तुम हम वे आप आदि शब्द सर्वनाम हैं।

नोट:-
सर्वनाम शब्द का प्रयोग संज्ञा शब्दों के पुनरावृति से बचने के लिए किया जाता है। अनुच्छेद में बार बार एक ही संज्ञा शब्द का प्रयोग करने से भाषा का सौंदर्य नष्ट हो जाता है। निम्नलिखित उदहारण द्वारा यह स्पष्ट किया जाता है

  • दिल्ली एक ऐतिहासिक नगर है।
  • दिल्ली के इतिहास में भारत के इतिहास की झलक मिलती है।
  • दिल्ली की संस्कृति पर विभिन्न संस्कृतियों का प्रभाव पडा है।
  • दिल्ली भारत की राजधानी है।
  • दिल्ली में आधुनिक भारत की संस्कृति की छवि देखी जा सकती है।
  • एक ओर दिल्ली आधुनिकता की परिचायक है तो दूसरी ओर दिल्ली प्रदूषण रूपी कैंसर से ग्रसित/रोग ग्रस्त है।

उपर लिखित अनुछेद/उदहारण में दिल्ली शब्द बार बार प्रयोग करने से भाषा का सुंदरता नष्ट हो गई है। दिल्ली के स्थान पर सर्वनाम शब्दों का प्रयोग करने से भाषा का सौंदर्य प्रभावशाली हुआ है।

यथा- हम कह सकते है कि-

  • दिल्ली एक ऐतिहासिक नगर है।
  • इसके इतिहास में भारत के इतिहास की झलक मिलती है।
  • इसकी संस्कृति पर विभिन्न संस्कृतियों का प्रभाव पडा है।
  • यह भारत की राजधानी है। इसमें आधुनिक भारत की संस्कृति की छवि देखी जा सकती है।
  • एक ओर यह आधुनिकता की परिचायक है तो दूसरी ओर यह प्रदूषण रूपी कैंसर से ग्रसित/रोग ग्रस्त है।

दिल्ली के स्थान पर इसके इसकी यह इसमें यह सर्वनाम शब्दों का प्रयोग करने से उक्त अनुच्छेद पूर्णयता नया और प्रभावशाली रूप प्राप्त हुआ है।

विशेष

  • संज्ञा की अपेक्षा सर्वनाम की विलक्षणता यह है कि संज्ञा से जहाँ उसी वस्तु का बोध होता है, जिसका वह संज्ञा नाम है,
  • वहाँ सर्वनाम में पूर्वापरसम्बन्ध के अनुसार किसी भी वस्तु का बोध होता है।
  • लडका कहने से केवल लड़के का बोध होता है,
  • घर, सड़क आदि का बोध नहीं होता, किन्तु किन्तु ‘वह’  कहने से पूर्वापरसम्बन्ध के अनुसार ही किसी वस्तु का बोध होता है।

 

सर्वनाम के भेद /प्रभेद(Kind of Pronoun)

जिस तरह संज्ञा शब्द के अलग अलग तरह के प्रकार्य होते है। उसी तरह सर्वनाम शब्द के भी अलग अलग तरह के प्रकार्य होते है। अलग अलग प्रकार्य करने के कारण सर्वनामों के भी अलग अलग भेद हो जाते है। सर्वनाम शब्दों के निम्नलिखित भेद किए गए है-

सर्वनाम के छ: भेद होते है

  •  पुरुषवा चक सर्वनाम  (Personal pronoun)
  • निश्चयवाचक सर्वनाम (Demonstrative pronoun)
  • अनिश्चयवाचक सर्वनाम (Indefinite pronoun)
  • संबंधवाचक सर्वनाम  (Relative Pronoun)
  • प्रश्नवाचक सर्वनाम  (Interrogative Pronoun)
  • निजवाचक सर्वनाम (Reflexive Pronoun)

पुरुषवाचक सर्वनाम (Personal pronoun)

जिन सर्वनाम शब्दों से व्यक्ति का बोध होता हैए उन्हें पुरुषवाचक सर्वनाम कहते है

पुरूष वाचक -सर्वनाम व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त किए जाते है। इसका प्रयोग तीन रूपों में होता है। वार्तालाप की स्थितियों के अनुसार इसके ये रूप बनते है।

  •  वार्तालाप करते समय बोलने वाले व्यक्ति को वक्ता कहते है।
  •  जिससे वकता बात करता है। उसे श्रोता कहते है। यह दूसरा व्यक्ति है।
  • वक्ता श्रोता से जिस अन्य व्यक्ति के विषय में वार्तालाप करता है। वह तीसरा व्यक्ति है।

दूसरे शब्दों में. बोलने वाले, सुनने वाले तथा जिसके विषय में बात होती है, उनके लिए प्रयोग किए जाने वाले सर्वनाम पुरुषवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।

वक्ता श्रोता तथा अन्य व्यक्ति के लिए भाषा में जिन सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है। वे शब्द पुरूष वाचक ़सर्वनाम कहलाते है।

इन स्थितियों के आधार पर पुरूष वाचक सर्वनाम के तीन भेद है।

पुरुषवाचक सर्वनाम पुरुषों -स्त्री या पुरुष के नाम के बदले आते हैं।
जैसे.

  • मैं आता हूँ।
  • तुम जाते हो।
  • वह भागता है।

उपर्युक्त वाक्यों में श्मैं, तुम, वह, पुरुषवाचक सर्वनाम हैं ।

पुरुषवाचक सर्वनाम के प्रकार:-

पुरुषवाचक सर्वनाम तीन प्रकार के होते है.

  1. उत्तम पुरुषवाचक(First Person)
  2.  मध्यम पुरुषवाचक(Second Person)
  3. अन्य पुरुषवाचक(Third Person)

1-उत्तम पुरुषवाचक (First Person)

जिन सर्वनामों का प्रयोग बोलने वाला अपने लिए करता हैए उन्हें उत्तम पुरुषवाचक कहते है।
जैसे. मैं, हमारा, हम, मुझको, हमारी, मैंन, मेरा, मुझे आदि।

–उदाहरणः.

एकवचन-.

  • मैं एक विद्यार्थी है।…
  • मैंने इस साल सातवीं कक्षा पास की है।
  • मुझ में बहुत हिम्मत है।

बहुवचन

  • हम दिल्ली के रहने वाले है।
  •  मुझे क्रिकेट खेलना बहुत पंसद है।
  •  हमसे किसी का दुख देखा नहीं जाता है।
  •  मेरे लिए सब बराबर हैं।
  •  हमको अपना काम स्वंय करना चाहिए।
  •  पिताजी हमारे लिए कुछ लाए है।

 मध्यम पुरुषवाचक(Second Person)

वक्ता द्वारा श्रोता के नाम के स्थान पर जिन सर्वनामों का प्रयोग किया जाता है। वे मध्यम पुरूष सर्वनाम कहलाते है। इस वर्ग में तू एकवचन तुम बहुवचन आप बहुवचन आदर सूचक तथा इनके विभिन्न रूप आते है।

ऐसे सर्वनाम शब्द जिनका प्रयोग सुनने वाले और पढनेवाले के लिए होता है। उन्हें मध्यम पुरूष कहते हैं।

जैसे. तू, तुम, तुम्हे, आप, तुम्हारेए तुमने, आपने आदि।

उदाहरण

  • तुम सो जाओ।
  • आप से यह काम नहीं हो पाएगा
  • आप इतना काम मत किजिए।
  • तुमको पहले बताना चाहिए था।
  • मै पत्र लिख रहा हूॅ।
  • तुमने गृहकार्य नहीं किया है।
  • तुम्हारे पिता जी क्या काम करते हैं घ्
  • तू घर देर से क्यों पहुँचा
  • घ्तुमसे कुछ काम है।

मध्यम पुरूष के सर्वनाम की स्थिति

यद्यपि संरचना के आधार पर मघ्यम पुरूष एकवचन सर्वनाम तू है पर प्रयोग के स्तर पर हिंदी में तू तुम तथा आप तीनों का ही एकवचन का प्रयोग किया जाता है।एकवचन में तू का प्रयोग अत्यंत निकटता की स्थिति में किया जाता है।

हिंदी में समान्यतः तुम तथा आप का प्रयोग एकवचन में किया जाता है।

आप सर्वनाम का प्रयोग आदर /सम्मान देने के अलावा औपचारिक स्थिति में अनजान लोगों के लिए किया जाता है। बहुवचन में इनके साथ लोग शब्द जोड दिया जाता है।

एकवचन का प्रयोग

  • मरिया! क्या तुम मेरे साथ चलोगी?
  • पिताजी! आप मेरे साथ चलेगें ?
  •  बहुवचन का प्रयोग
  • लडकियों ! तुम लोग रात को बाहर मत निकलना।
  • दोस्तों ! आप अपना अपना काम कीजिए।
  •  आप का प्रयोग

आदर्शनाथ मध्यम पुरूष के लिए भी होता है

  • आप आगे आ जाएं।
  • आप खाना खा लिजिए।
  • तू का प्रयोग

तु सर्वनाम का प्रयोग या तो समीपता आत्मीयता प्रकट करने के लिए आता है, निरादर और हीनता दिखाने के लिए आता है।

  • मॉ! तू जल्दी आ —- आत्मीयता
  • तू बडा दुष्ट है। —– निरादर

अन्य पुरुषवाचक (Third Person)

वक्ता या श्रोता किसी अन्य अनुपस्थित पुरूष या व्यक्ति के नाम के स्थान पर जिन सर्वनामों का प्रयोग किया जाता है। वे अन्य पुरूष कहलाते है।

इस वर्ग में एकवचन के अंतर्गत वह तथा उसके विभिन्न रूप जैसे उसने उससे उसमें उसको उसके लिए आदि आते है
तथा बहुवचन के अंतर्गत वे विभिन्न रूप जैसे उनसे उन्होनें उसमें उनका उन पर उनके लिए आदि आते है

दूसरे शब्दों में :-ऐसे सर्वनाम शब्द जिनका प्रयोग वक्ता और श्रोता किसी अन्य के लिए के लिए करते है। उन्हें अन्य पुरुषवाचक कहते है।
जैसे. वे, यह, वह,इनका, इन्हें, उसे, उन्होंने, इनसे, उनसे आदि।

सरल शब्दों में जिन सर्वनाम शब्दों का प्रयोग किसी अन्य व्यक्ति के लिए किया जाता है,

उदाहरण.

  • वह गा रही है।
  • उसे बाजार भेजो।
  • उन्हें सम्नानित किया गया।
  • उनको चाय दे जाओ।
  • वे पढते पढते सो गए।
  • वे मैच नही खेलेंगे।
  • उन्होंने कमर कस ली है।
  • वह कल विद्यालय नहीं आया था।
  • उसे कुछ मत कहना।
  • उन्हें रोको मत, जाने दो।

निश्चयवाचक सर्वनाम (Demonstrative pronoun)

जिन सर्वनाम शब्दों से किसी वस्तु व्यक्ति या घटना का निश्चित बोध होता है। निश्चित बोध निकटवर्ती तथा दूरवर्ती दोनों ही वस्तुओं/व्यकितयों का हो सकता है।

  • हिंदी में समीप की वस्तुओं के लिए एकवचन में -यह तथा बहुचवन में -ये’ का प्रयोग किया जाता है।
  • दूर की वस्तुओं/व्यक्तियों के लिए एकवचन में -वह और बहुचवन में -वे का प्रयोग किया जाता है।

दूसरे शब्दों में -जिन सर्वनाम शब्दों से दूरवती अथवा समीपवर्ती व्यक्तियों प्रणियों वस्तुओं और घटनाओं का निश्चित बोध होता है। उसे निश्चियवाचक सर्वनाम कहते है। जैसे-

  • भाई मतिदास चौक वह है।
  • डबलरोटी उससे ले आओ।
  • वह सरकारी विद्यालय है।
  • हमारे हिंदी के अध्यापक वे
  • अटैचीकेस की चाबी है।
  • यह सीमा का मकान है।
  • सब्जियॉ उसमें पडी है।
  • इन वाक्यों में वह उसमें उससे और यह वह निश्चयवाचक सर्वनाम है।

यह और वह पुरूषवाचक सर्वनाम और निश्चयवाचक सर्वनाम दोनों है। इन दोनों में अंतर इस प्रकार किया गया है।

  •  शशांक मेरा भाई है वह मुबंई में रहता है।-पुरूषवाचक सर्वनाम
  •  यह किताग मेरी है, वह तुम्हारी है। – निश्चयवाचक सर्वनाम
  •  यह गीता की साईकिल है।- पुरूषवाचक सर्वनाम
  •  ये मेरे हथियार है। वे तुम्हारे आदमी है।_निश्चयवाचक सर्वनाम

अन्य शब्दों में कह सकते है– जो सर्वनाम शब्द संज्ञा के निश्चित होने का बोध कराएं उन्हें सर्वनाम कहते है। जैसे – यह वह वे आप उन्होनें उसका उसके उनके अपना आदि। जैसे:-

यह /ये और उनके रूप

  •  अध्यापक -पास में रखे कलम की ओर इशारा करते हुए राम! यह किसका है ?
  •  मिनी- मेज पर रखी मिठाई की ओर इशारा करते हुए मम्मी!यह कौन है?
  •  अध्यापिका -पास पडी झाडू की ओर इशारा करते हुए रामू! इसे यहॉ क्यों छोड दिया?
  • पिता – हाथ में पकडे हुए थैले की ओर इशारा करते हुए दीपा! इसमें से आम निकालकर फ्रिज में रख दो।

वह /वे और उनके रूप

  •  मॉ -दूर खडी साइकिल की ओर सकेंत करते हुए—- उसे कौन लेकर आया?
  •  पिताजी-छत पर खेल रहे बच्चों की ओर सकेंत करते —हुए वे छत पर क्या कर रहे हैं?
  • अध्यापक-दूर पडी कुरसियों की ओर इशारा करते हुए—-उन्हें यहॉ लेकर आओं

वाक्यों में इनका प्रयोग देखिए\

  • तनुज का छोटा भाई आया है। यह बहुत समझदार है।
  • किशोर बाजार गया थाए वह लौट आया है।

उपर्युक्त वाक्यों में यह और वह किसी व्यक्ति का निश्चयपूर्वक बोध कराते हैंए अतः ये निश्चयवाचक सर्वनाम हैं।

अनिश्चयवाचक सर्वनाम(Indefinite pronoun)

जब किसी व्यक्ति/वस्तु के बारे में यह निश्चित न हो कि वह व्यक्ति कौन है अथवा वह वस्तु क्या है तब जिन सर्वनामों का प्रयोग किया जाता है वे अनिश्चिय वाचक सर्वनाम कहलाते है। अथवा

दूसरे शब्दों में –जिस सर्वनाम शब्द से किसी निश्चित व्यक्ति या वस्तु का बोध न होए उसे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते है। जैसे-कोई ,व्यक्ति के, लिए ,कुछ, वस्तु के लिए आदि

अनिश्चयवाचक केअन्य उदहारण

  • कोई आ गया तो क्या करोगे?
  • उसने कुछ नहीं लिया।
  • मम्मी किसी ने फूल भेज दिए।
  • मुझे भी कुछ खरीदना है।
  • घर में कोई घुसा था ।

उदहारण के लिए कुछ विशेष तथ्यः

कुछ- ही, कुछ- कोई, सब- कुछ , हर- कोई, कुछ -भी ,कुछ -कुछ –ये सभी अनिश्चय वाचक सर्वनाम में आते है

वाक्यों में इनका प्रयोग देखिए.

  • मोहन! आज कोई तुमसे मिलने आया था।
  • पानी में कुछ गिर गया है।

यहाँ  और व्यक्ति और वस्तु का अनिश्चित बोध कराने वाले अनिश्चयवाचक सर्वनाम हैं।

संबंधवाचक सर्वनाम (Relative Pronoun)

संबंधवाचक का अर्थ है-सबंधं बताने/जोडने वाले

कुछ सर्वनाम मिश्रवाक्य के आश्रित उपवाक्यों को प्रधान उपवाक्य के साथ जोडने का कार्य करते हैं। इनको संबंधवाचक सर्वनाम कहते है। हिंदी के अंतर्गत “जो तथा जिसे” सर्वनाम आते है।

सरल शब्दों मे – दो उपवाक्यों का आपस में संबंध स्थापित करने वाले सर्वनाम शब्दों को संबंधवाचक सर्वनाम कहते है।

अन्य शब्दों में
– जिन सर्वनाम शब्दों का प्रयोग वाक्य में आए दूसरे सर्वनाम शब्दों से संबंध प्रकट करने के लिए किया जाता है। उदहारण के लिए-

  • जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है।
  • वह पुस्तक दो जो गुरू जी ने दी थी ।
  • यह वही पैन है जिसे रोहित ने खरीदा था।
  • वे लोग नहीं आए जो नारे लगा रहे थे।
  • जिसने कभी झूठ न बोला हो मेरे साथ आए।
  • यह वही नदी है जिसमें निले साल बाढ आई थी ।

इन वाक्यों में जो-उसकी वह-जो और यह -जिसे शब्द संबंधवाचक सर्वनाम है। ये शब्द एक-दूसरे से संबंध बता रहे हैं।

दूसरे शब्दों में यदि वाक्य के पहले भाग में प्रयुक्त सर्वनाम शब्द का वाक्य के दूसरे भाग में प्रयुक्त संज्ञा या सर्वनाम शब्द के साथ संबंध दिखाई देता है। जैसे –

  • जो-सो’ जैसा-वैसा ’जिसकी-उसकी’ जो वो ’ आदि प्रयोग किया जाता है।
  • जैसा कहा था वैसा कर दिखाया।
  • जिसने आना था उसने मना कर दिया।
  • जैसी करनी वैसी भरनी।
  • जो नृत्य कर रही थी वह प्रिया की मैसी थी ।
  • जैसा बोया वैसा काटा ।

इन वाक्यों में आए सर्वनाम शब्द जैसा-वैसा जो-वह जिसने-उसने वह-जो जिसको -वह जैसा-वैसा संबंधबोधक सर्वनाम है।

वाक्यों में इनका प्रयोग देखिए.

  • जैसा करोगे, वैसा भरोगे।
  • जिसकी लाठी, उसकी भैंस।

उपर्युक्त वाक्यों में वैसा का सम्बंध जैसा  के साथ तथा उसकी का सम्बन्ध जिसकी  के साथ सदैव रहता है। अतः ये संबंधवाचक सर्वनाम है।

प्रश्नवाचक सर्वनाम (Interrogative Pronoun)

प्रश्न पुछने के लिए जिन सर्वनाम शब्दों का प्रयोग किया जाता है। उन्हें प्रश्नवाचक कहा जाता है। अर्थात

हम कह सकते है। कि प्रश्न करने के लिए प्रयुक्त होने वाले सर्वनाम शब्दों को प्रश्नवाचक कहा जाता है। –

हिंदी में प्रश्नवाचक सर्वनाम “कौन”– व्यक्ति के लिए तथा “क्या”. “कौन-सा”, “कौन-सी “-वस्तु या घटना के लिए आदि ।

उदहारण के लिएः-

  • कल मेले में तुमने क्या खरीदा?
  • मेरे साथ कौन चलना चाहता है?
  • मुंबई में तम्हें कौन मिला था?
  • इन मकानों में से तुम्हें कौन-सा पसंद है?

सरल शब्दों में-सर्वनाम शब्द जिनसे किसी प्राणी वस्तु व्यक्ति और कार्य आदि के विषय में प्रश्न का बोध होता है। उन्हें प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते है।

जो सर्वनाम शब्द सवाल पूछने के लिए प्रयुक्त होते हैए उन्हें प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते है।जैसे. कौन, क्या, किसने आदि।

वाक्यों में इनका प्रयोग देखिए

  • कपडे कौन धो रही है?
  • नाना जी किसे बुला रहे हैं?
  • कूडा किसने फेंका था?
  • तुम्हें क्या चाहिए?
  • टोकरी में क्या रखा है।
  • बाहर कौन खड़ा है।
  • तुम क्या खा रहे हो

उपर्युक्त वाक्यों में क्या और कौन का प्रयोग प्रश्न पूछने के लिए हुआ है। अतः ये प्रश्नवाचक सर्वनाम है।

नोट :-

  •  कौन किसने क्या किसे किससे और किनके प्रश्नवाचक सर्वनाम है
  •  कब कहां क्यों कितना कैसे आदि प्रश्नवाचक में नहीं आते है।
  •  कौन क्या प्रश्नवाचक में आते है।

निजवाचक सर्वनाम (Reflexive Pronoun)

निजवाचक सर्वनाम का अर्थ है-“अपने लिए प्रयुक्त करना।”

यह दो शब्दों से मिलकर बना -निज +वाचक  जिसमें -निज का अर्थ होता है- “अपना” और ” वाचक” का अर्थ होता है— “बोध” ज्ञान कराने वाला अर्थात  निजवाचक का अर्थ हुआ”” अपनेपन का बोध कराना।

 

निजवाचक सर्वनाम शब्दों का प्रयोग वक्ता वाक्य के कर्ता के लिए करता है। निजवाचक सर्वनाम हैं- मैं ,स्वयं ,खुद ,अपने ,आप-, निजी आदि।

 

अर्थात हम कह सकते है कि– ऐसे सर्वनाम जिनका प्रयोग कर्ता अपने या स्ंवय के लिए करता है वे निजवाचक सर्वनाम कहलाते है। इसमें अपने -आप; स्वत; स्वय या खुद के लिए प्रयुक्त सर्वनाम है।

  • जैसे- यह कार्य मैं आप ही कर लूगॉ।

वाक्य में इनका प्रयोग

  • मैं यह काम स्वयं कर लूॅगा।
  • वह खुद आया था।
  • वह अपने आप आ जाएगा।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • ध्यान रहे कि यहॉ प्रयुक्त आप स्वंय के लिए प्रयुक्त है जो कि पुरूषवाचक मध्यम पुरूष आदरसूचक सर्वनाम आप’ से अलग है।
  • संज्ञा या सर्वनाम के बाद आप स्वयं खुद आए तो निज वाचक सर्वनाम है
  • संज्ञा व सर्वनाम का आपस में गहरा संबंध एक व्यक्ति के लिए दोनों शब्द प्रयुक्त किए जा सकते है

निजवाचक सर्वनामआप का प्रयोग निम्नलिखित अर्थो में होता है.

  • निज वाचक सर्वनाम में संज्ञा या सर्वनाम के अवधारणा/निश्चय के लिए किया जाता है
  • जैसे- मैं आप वही से आया हूॅ।
  • निजवाचक आप का प्रयोग दूसरे व्यक्ति के निराकरण के लिए भी होता है।
  • जैसे—-वह औरों को नहीं अपने आप को सुधार रहा है।
  • सर्वसाधारण के अर्थ में भी आप का प्रयोग होता है।
  • जैसे—- आप भला तो जग भला,
  • अपने से बड़ों का आदर करना
  • अवधारण केअर्थ में– कभी.कभी  आप के साथ ही जोड़ा जाता है।
  • जैसे. मैं,आप ही चला आता था,
  • यह काम आप ही कर लूँगा।
सर्वनाम और सर्वनामिक में अंतर

निश्चयवाचक सर्वनाम यह वह अनिश्चयवाचक सर्वनाम कोई कुछ तथा प्रश्नवाचक कौन क्या आदि सर्वनाम सर्वनामिक विशेषण के रूप में भी प्रयुक्त हो सकते है। अतः दोनों में अंतर समझना आवश्यक है।

ध्यान दे-

  •  यदि ये शब्द संज्ञा के स्थान पर आ रहे है। तो सर्वनाम होगें |
  • बहार कोई आया है? — अनिश्चयवाचक सर्वनाम|
  • कौन रो रहा है? —– प्रश्नवाचक सर्वनाम|

 

परंतु जब ये सर्वनाम किसी संज्ञा के पूर्व लगकर संज्ञा की विशेषता बताते है। तब सर्वनामिक विशेषण कहलाते है।

  • मैं यह पुस्तक लेना चाहता हूॅ — सर्वनामिक विशेषण
  • कोई लडका आया है।—- सर्वनामिक विशेषण
  • कौन लडकी रो रही है। — सर्वनामिक विशेषण

नोटः-

जब यह वह कोई कुछ जो सो अकेले आते है तो सर्वनाम होते हैं और जब किसी संज्ञा क साथ आने हैं तो विशेषण हो जाते है। जैसे-

  • यह आ गई। यह सर्वनाम है।
  • यह किताब कैसी है। यह विशेषण है।

सर्वनाम का अपना कोई लिंग विधान नहीं है। वाक्य में संज्ञा के लिए जिस लिंग का प्रयोग होता है। उसके लिए प्रयुक्त सर्वनाम के लिए भी उसी का प्रयोग होता है

सर्वनाम के लिंग की जानकारी क्रिया-रूपों से मिलती है
।जैसे–

  • कुत्ता घर में घुस आया है वह भौंक रहा है।
  • गीता के पैर में चोट आई है वह चल नहीं सकती ।
  • मध्यम पुरूष सर्वनाम तू एकवचन है। इसका प्रयोग अत्ंयत आत्मीयता घनिष्ठता अथवा निरादार का भाव दर्शाता है।
  • कौन सा सर्वनाम का प्रयोग प्रायःअप्राणिवाचक रूपों में होता है
  • जैसे आप कौन सा कमरा लेगें ?

कुछ सर्वनाम सयुंक्त सर्वनाम भी होते है जिनका प्रयोग: रूस के हिन्दी वैयाकरण डॉ० दीमशित्स “ने सर्वनाम के रूप में उल्लेख किया है जिन्हें सयुंक्त सर्वनाम कहा जाता है। यह प्रथम श्रेणी में आते है।  क्योंकि

  • यह सर्वनाम के बाकि भेदों से अलग है।
  • सयुंक्त सर्वनाम में एक शब्द नहीं बल्कि एक से अधिक शब्द आते है।

सयुंक्त सर्वनाम स्वतंत्र रूप से अथवा संज्ञा के साथ भी प्रयुक्त किए जाते है

उदहारण के लिए

  • जो कोई, सब कोई, हर कोई, और कोई, कोई और, जो कुछ, सब कुछ, और कुछ, कुछ और, कोई एक, एक कोई, कोई भी, कुछ एक, कुछ भी, कोई-न-कोई, कुछ-न-कुछ, कु-.कुछ, कोई-कोई इत्यादि।

सर्वनाम शब्दों की रूप रचना/सर्वनाम की कारक-रचना (रूप-रचना)

परसर्ग के कारण सर्वनाम का रूपांतरणः

पुरूषवाचक सर्वनामों के साथ परसर्ग लगने पर अधिकतर सर्वनामों में परिवर्तन हो जाता है।उसी प्रकार संज्ञा शब्दों की भाँति ही सर्वनाम शब्दों की भी रूप.रचना होती जिससे हम उनकी रचना में परिवर्तन ला सकते है।

क- अन्य पुरूष सर्वनाम ’’ यह वह वे ये ’’के साथ ’’ने’’परसर्ग लगने पर ये सर्वनाम क्रमशः उसने इसने उन्होनें रूपों में बदल जाते है।

ख – उत्तम पुरूष मध्यम पुरूष और अन्य पुरूष सर्वनामों के साथ को उपसर्ग लगने पर प्रायः अंतर आ जाता है। जैसे\

  • मै+ को -मुझको या मुझे।
  • वह+को – उसको या उसे।
  • तू+को – तुझको या तुझे ।
  • वे+को- उनको या उन्हें ।
  • तुम+को -तुमको या तुम्हें।
  • हम+को- हमको या हमें ।

इसी प्रकार से के लिए में पर आदि परसर्गां के लगने से मूल सर्वनामों में प्रायः अंतर होता है।

उत्तम पुरूष मध्यम पुरूष सर्वनामों के साथ ने परसर्ग लगने पर परिवर्तन नही होता है।

(‘मैं’ उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम)

कारकएकवचनबहुवचन
कर्तामैं, मैंनेहम, हमने
कर्ममुझे, मुझकोहमें, हमको
करणमुझसेहमसे
सम्प्रदानमुझे, मेरे लिएहमें, हमारे लिए
अपादानमुझसेहमसे
सम्बन्धमेरा, मेरे, मेरीहमारा, हमारे, हमारी
अधिकरणमुझमें, मुझपरहममें, हमपर

मध्यम पुरुषवाचक सर्वनाम ‘तू’, ‘तुम

कारकएकवचनबहुवचन
कर्तातू, तूनेतुम, तुमने, तुमलोगों ने
कर्मतुझको, तुझेतुम्हें, तुमलोगों को
करणतुझसे, तेरे द्वारातुमसे, तुम्हारे से, तुमलोगों से
सम्प्रदानतुझको, तेरे लिए, तुझेतुम्हें, तुम्हारे लिए, तुमलोगों के लिए
अपादानतुझसेतुमसे, तुमलोगों से
सम्बन्धतेरा, तेरी, तेरेतुम्हारा-री, तुमलोगों का-की
अधिकरणतुझमें, तुझपरतुममें, तुमलोगों में-पर

(‘वह’ अन्य पुरुषवाचक सर्वनाम)

कारकएकवचनबहुवचन
कर्तावह, उसनेवे, उन्होंने
कर्मउसे, उसकोउन्हें, उनको
करणउससे, उसके द्वाराउनसे, उनके द्वारा
सम्प्रदानउसको, उसे, उसके लिएउनको, उन्हें, उनके लिए
अपादानउससेउनसे
सम्बन्धउसका, उसकी, उसकेउनका, उनकी, उनके
अधिकरणउसमें, उसपरउनमें, उनपर

(‘यह’ निश्चयवाचक सर्वनाम)

कारक


एकवचनबहुवचन
कर्तायह, इसनेये, इन्होंने
कर्मइसको, इसे ये, इनको, इन्हें
करणइससे इनसे
सम्प्रदान
इसे, इसको इन्हें, इनको
अपादान
इससेइनसे
सम्बन्धइसका, की, केइनका, की, के
अधिकरणइसमें, इसपरइनमें, इनपर

(‘आप’ आदरसूचक)

कारकएकवचनबहुवचन
कर्ताआपनेआप लोगों ने
कर्मआपकोआपलोगों को
करणआपसेआपलोगों से
सम्प्रदानआपको, के लिएआप लोगों को, के लिए
अपादानआपसेआप लोगों से
सम्बन्धआपका, की, केआप लोगों का, की, के
अधिकरणआप में, परआपलोगों में, पर

(‘कोई’ अनिश्चयवाचक सर्वनाम)

कारकएकवचनबहुवचन
कर्ताकोई, किसनेकिन्हीं ने
कर्म
किसी कोकिन्हीं को
करणकिसी सेकिन्हीं से
सम्प्रदानकिसी को, किसी के लिएकिन्हीं को, किन्हीं के लिए
अपादानकिसी सेकिन्हीं से
सम्बन्धकिसी का, किसी की, किसी केकिन्हीं का, किन्हीं की, किन्हीं के
अधिकरणकिन्हीं का, किन्हीं की, किन्हीं के

(‘जो’ संबंधवाचक सर्वनाम)

कारकएकवचनबहुवचन
कर्ताजो, जिसनेजो, जिन्होंने
कर्मजिसे, जिसकोजिन्हें, जिनको
करणजिससे, जिसके द्वाराजिनसे, जिनके द्वारा
सम्प्रदानजिसको, जिसके लिएजिनको, जिनके लिए
अपादानजिससे (अलग होने)जिनसे (अलग होने)
संबंधजिसका, जिसकी, जिसकेजिनका, जिनकी, जिनके
अधिकरणजिसपर, जिसमेंजिनपर, जिनमें

(‘कौन’ प्रश्नवाचक सर्वनाम)

कारकएकवचनबहुवचन
कर्ताकौन, किसनेकौन, किन्होंने
कर्मकिसे, किसको, किसकेकिन्हें, किनको, किनके
करणकिससे, किसके द्वाराकिनसे, किनके द्वारा
सम्प्रदानकिसके लिए, किसकोकिनके लिए, किनको
अपादानकिससे (अलग होने)किनसे (अलग होने)
संबंधकिसका, किसकी, किसकेकिनका, किनकी, किनके
अधिकरणकिसपर, किसमेंकिनपर, किनमें

 

सर्वनाम के विकारी रूप

विभिन्न कारकों में प्रयुक्त होने पर सर्वनाम शब्दों के रूप परिवर्तित हो जाते है। सर्वनाम का प्रयोग सम्बोधन में नहीं होता है।
इसके विकारी रूप है- मैने मुझको मुझसे हमने हमको हमसे मेरा हमारा उसने उसको तुमने तुमको आपने आपको तुझे तुम्हारा तुमसे इसने इसको किसको आदि।

सर्वनामों का प्रयोग

कोई और किन्ही सर्वनामों का प्रयोग प्रणियों के लिए किया जाता है।

  • जैसे -कोई दौड रहा है।
  • किन्हीं से पुस्तक मंगवा लो।
  • नल से कोई पानी भर रहा है।
  • उनमें से किन्हीं दो ने झगडा किया था।

कुछ का प्रयोग कीडे मकोडों कीटाणुओं और निर्जीव के के लिए किया जाता है।

  • दीवार पर कुछ चल रहा है।
  • कुछ ओढकर ही सोना
  • दाल में कुछ काला गिर गया है।

मैं हम और तुम सर्वनाम के साथ रा री रे विभक्तियों का प्रयोग किया जाता है।

  • जैसे -मै- मेरा मेरी मेरे हम -हमारा हमारी हमारे तुम -तुम्हारा तुम्हारी तुम्हारे ।

कुछ सर्वंनाम शब्द दो बार प्रयुक्त होते है। इनका प्रयोग किसी कथन पर बल देने के लिए किया जाता है।

  • कुछ कुछ – रमा को मॉ के विषय में कुछ-कुछ याद है।
  • कहॉ-कहॉ – दिल्ली में कहॉ कहॉ घूमने जाएॅगें।
  • अपना-अपना- अपना-अपना कार्य करके ही घर जाना
  • कोई -कोई- कक्षा में कोई कोई पुस्तक लाया है।
  • किस -किस – चाकलेट किस किसको नहीं मिली।
  • जो-जो –जो-जो गृह कार्य करके लाए, हैं कापियॉ दे दो ।

 कई स्थानों का पर भिन्न- भिन्न सर्वनाम शब्दों कर साथ प्रयोग होता है।

  • जो कोई – जो कोई बोलगा वही पिटेगा।
  • हमारा-तुम्हारा आज से हमारा- तुम्हारा कोई संबंध नहीं रहा।
  • जो कुछ- आगरा से जो कुछ लाए हो दिखा तो दो।

सर्वनाम पद का व्याकरणिक परिचय

सर्वनाम पद का व्याकरणिक परिचय पद परिचय देते समय शब्द-भेद का नाम सर्वनाम का उपभेद पुरूष वचन लिंग और कारकीय संबंध बताना आवश्यक होता है।

सरल शब्दों में किसी वाक्य में प्रयुक्त सर्वनाम का पद परिचय देने के लिए पहले सर्वनाम का भेद लिंग वचन कारक एंव अन्य पदों से उसका संबंध बताना पडता है।

उदहारण

  1.  मैनें उन्हें पढने के लिए कहा।
  2.  दूध में क्या पडा है।
  3. वह मुझे कुछ देनेवाला है।
  4. चाय में कुछ पडा है।

इन वाक्यों में प्रयुक्त सर्वनामों का परिचय इस प्रकार होगा

  • मैनें – मैंने :पुरूषवाचक सर्वनाम, उत्तमपुरूष एकवचन कर्ता कारक कहा जाता है।
  • उन्हें- निश्चयवाचक सर्वनाम बहुवचन कर्मकारक कहा क्रिया का कर्म।
  • क्या-प्रश्नवाचक सर्वनाम एकवचन पुल्लिंग एकवचन कर्ता कारक देना क्रिया का कर्ता ।
  • वह- पुरूषवाचक सर्वनाम अन्यपुरूष पुल्लिंग एकवचन कर्ता कारक देना क्रिया का कर्ता
  • मुझे- पुरूषवाचक सर्वनाम उत्तमपुरूष एकवचन पुल्लिंग।
  • कुछ- अनिश्यवाचक सर्वनाम एकवचन ।

सर्वनाम के बारे में ध्यान देने योग्य बातें

लिंग के कारण पदों में कोई परिवर्तन नहीं होता अर्थात स़्त्री-पुरूष दोनों के लिए एक समान सर्वनामों का प्रयोग होता है। अतः किसी सर्वनाम पद का लिंग उसके साथ प्रयुक्त क्रिया रूप से जाना जाता है अथवा संज्ञापद से जाना जाता है जिसके स्थान पर उसका प्रयोग किया गया होः-
जैसे-

  • वह अर्थात रमेश जा रहा है।
  • वह अर्थात गीता जा रही है।
  • तू जा रहा है।तू जा रही है।

वह और यह का प्रयोग पुरूषवाचक निश्चयवाचक संकेतवाचक के लिए होता है। प्रंसगानुसार वाक्य में प्रयोग से ही की जा सकती है।

  • वह लिख रहा है। – पुरूषवाचक सर्वनाम
  • यह लिख रहा है।
  • वह रोहन की पुस्तक है।- निश्चयवाचक सर्वनाम
  • यह राम की पुस्तक है।

 

 Vakya Vichar Rachna – वाक्य विचार रचना (Syntax, Sentence)

Vakya Vichar Rachna – वाक्य विचार रचना (Syntax, Sentence)

वाक्य की परिभाषा 

जब भी हमें अपने मन की बात दूसरों तक पहुॅंचानी होती है या बातचीत करनी होती है। तब हम वाक्यों का सहारा लेते है।अर्थात्   वाक्य वक्ता के विचारों को श्रोता तक पंहुचाने का माध्यम हैं। उदहारण के लिए , अगर कोई भी व्यक्ति आम खरीदना चाहता है तो  फल बेचने वाले से कहेगा -’मुझे दो किलो आम दे दो’ या किसी बच्चे को रूपये की जरूरत हैतो वह अपनी मॉ से कहेगा -’मॉ, मुझे कुछ रूपए चाहिए’।इस तरह अपनी बात दूसरे तक संप्रेषित करने के लिए हम वाक्यों का प्रयोग करते है।
वाक्यों के कुछ अन्य उदहारण इस प्रकार हैं
  •  शेर पिंजडे में बंद है।
  • किसान खेत में हल चला रहा है।
  • दरजी कपडे सिल रहा है।
  • लडकी नृत्य कर रही है।
यदि वाक्य-1 एक के स्थान पर हम’ शेर पिंजडा बंद’ अथवा वाक्य-2 के स्थान पर ’किसान खेत हल चलाना’ कहें तो ये वाक्य नहीं कहलाएगें। ये केवल शब्दों का संग्रह है, वाक्य नहीं।
वाक्य के लिए सबसे आवश्यक बात , वाक्य में प्रयुक्त होने वाले सभी शब्दों का वाक्य के नियमों में बॉधकर आना है। तभी वे किसी विचार या भाव को व्यक्त  कर पाने  में समर्थ हो जाते है। अतः जब तक कोई रचना  किसी भाव या विचार को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाती तब तक उसे वाक्य नहीं कहा जाता ।
1).सार्थक का मतलब होता है अर्थ रखने वाला। यानी शब्दों का ऐसा समूह जिससे कोई अर्थ निकल रहा हो, वह वाक्य कहलाता है।
2). शब्दों के एक सार्थक समूह को ही वाक्य कहते हैं

वाक्य का अर्थ

भाषा की मुख्य इकाई वाक्य है,जिससे किसी भाव को पूर्ण रूप से व्यक्त किया जा सकता है। यद्यपि शब्दों का अपना अर्थ होता है,लेकिन इनके बिना किसी क्रम के अलग अलग बोलने से वक्ता का पूरा अभिप्राय स्पष्ट नहीं हो पाता इन शब्दों को निश्चित क्रम और स्वाभविक गति से बोलने पर वक्ता का अभिप्राय: स्पष्ट हो जाता है।

  • जैसे नदी के किनारे—किनारे एक गाय जा रही थी ‘इस वाक्य को अलग अलग या रूक रूक कर बोला जाए तो अभिप्राय: स्पष्ट नहीं होगा

अर्थात कहा जा सकता है कि -वाक्य के शब्दों को सही क्रम में संयोजित करने तथा स्वाभिक गाति से बोलने पर बात पूरी तरह समझ आ जाये ,वाक्य कहलाता है।

भाषा की वह इकाई जो किसी भाव या विचार को पूरी तरह से व्यक्त करने में शक्ति होती है, वाक्य कहलाती है।
कहने  का तात्पर्य यह है कि -वाक्य पदों का वह व्यवस्थित समूह है। जिसमें पूर्ण अर्थ देने का सामर्थ्य  होता है, वाक्य कहलाता है।
  • वाक्य शब्दों की इकाई है जो रचना की दृष्टि से अपने आप में स्वतंत्र है।
  • वाक्य किसी विचार भाव या मंतव्य को पूर्णतया प्रकट करता है।

वाक्य के  अंग

वाक्य के दो अंगहोते है.
  1. उद्देश्य (Subject)
  2.  विद्येय(Predicate)

1).उद्देश्य (Subject):- 

वाक्य में जिसके विषय में कुछ कहा जाये उसे उद्देश्य कहते हैं।  यह प्रायः वाक्य के  प्रारंभ में आता है। इसमें कर्ता, और कर्ता का विस्तार विशेषण आदि आता है।
  • उहारण 1-सपेरा बीन बजा रहा है
  • उहारण 2 – पेड काटने वाला मजदूर घर चला गया है।
  • उहारण 3-मेरा मित्र मोहन कल आ रहा है।
वाक्य-1. में सपेरे द्वारा बीन बजाए जाने की बात कही गई है अतः सपेरा पद, जो वाक्य का कर्ता तो है ही, साथ ही वाक्य का उद्देश्य भी है। इसी प्रकार वाक्य-2 का उद्देश्य है- पेड काटने वाला मजदूर क्योंकि वाक्य में ’अपने घर जाने की बात’ पेड काटने वाले मजदूर के बारे में कही गई है।  भी लगा हुआ है। वाक्य-2 का उद्देश्य में कर्ता ’मजदूर’ को विस्तार देने वाला विशेषण पद पेड काटने वाला भी लगा
2).  विद्येय(Predicate) 
वाक्य के उद्देश्य के बारे में जो कुछ कहा जाता है, वह विधेय कहलाता है उपर दिए वाक्य -1 में बीन बजा रहा है तथा वाक्य-2 में अपने घर चला हैं विधेय हैं क्योंकि ये अंश दोनो वाक्यों के उद्देश्य के बारे में  कुछ कह रहे हैं। विधेय के अंतर्गत क्रिया  तथा क्रिया के  विस्तार हैं
उद्देश्य के विषय में जो कुछ कहा जाता है, उसे विद्येय कहते है।जैसे-
  •  रेलगाडी पटरी पर दौड रही है।
इस वाक्य में ’’दौड रही है। विधेय है क्योंकि ’’रेलगाडी’ उद्देश्य के विषय में कहा गया है।
दूसरे शब्दों में. वाक्य के कर्ता -उद्देश्य को अलग करने के बाद वाक्य में जो कुछ भी शेष रह जाता है, वह विधेय कहलाता है।
इसके अंतर्गत विधेय का विस्तार आता है। जैसे. लंबे-लंबे बालों वाली लड़की अभी-अभी एक बच्चे के साथ दौड़ते हुए उधर गई
इस वाक्य में विधेय “गई” का विस्तार अभी-अभी एक बच्चे के साथ दौड़ते हुए उधर है

विधेय के भाग.

वाक्य छह होते है।
  1. क्रिया
  2. क्रिया के विशेषण
  3. कर्म
  4. कर्म के विशेषण या कर्म से संबंधित शब्द
  5. पूरक
  6. पूरक के विशेषण।
वाक्यउद्देश्यविधेय
रेलगाडी पटरी पर दौड रही है।दौडरही है।
सब्जी बेचने वाला लडका घर के बाहर खडा है। सब्जी बेचने वालाबाहर खडा है।
सभी बच्चे कक्षा के शांत बैठे हैं।सभीबैठे हैं।
तुम्हारे पिताजी इस समय टेलिविजन देख रहें हैंतुम्हारेदेख रहें हैं
वाक्य के भेद या अंग
वाक्य के  भेद दो आधारों पर किए जाते हैं-
  1. अर्थ  के आधार पर
  2.  रचना के आधार पर

अर्थ के आधार पर वाक्य के भेद.

अर्थ के आधार पर वाक्य मुख्य रूप से आठ प्रकार के होते है.
  • विधानवाच
  • निषेधवाचक
  • आज्ञावाचक
  • प्रश्नवाचक
  • इच्छावाचक
  • संदेहवाचक
  • विस्मयवाचक
  • सकेंतवाचक
 विधानवाचकः/विधानार्थक – जिन वाक्यों में क्रिया के समान्य रूप से  करने या होने की सूचना मिलें ,या बोध होउन्हें विधानवाचक वाक्य कहते है, जैसे –
  • ठंडी हवा चल रही है।
  • बाग में फूॅल खिल रहें है।
  • लडके पढ रहे है।
  • राधा ने पूजा की।
  • रमाकांत पुस्तकें लाया

2.)  निषेधवाचक /नकारात्मक वाक्य -ःजिन वाक्यों की क्रियाओं के द्वारा कार्य न होने के भाव का बोध होता है। उनहें निषेधवाचक वाक्य कहते है।
सरल शब्दों में—जिन वाक्यों में किसी बात,कथन या कार्य का निषेध मनाही किया जाता है।उनहें निषेधवाचक वाक्य कहते है।
जैसे

  • वह नहीं आएगा।
  • बोतल में शर्बत नहीं है।
  • उससे बात मत करो।
अन्य शब्दों में — इन वाक्यों में समान्य कथनों को नकारा जाता है। हिंदी में प्रायः नही, मत, तथा लगाकर निषेधात्मक वाक्य बनाए जाते हैं। कथात्मक वाक्यों को नहीं लगाकर निषेधात्मक वाक्य बनाया जाता है।  जैसे
कथात्मक निषेधात्मक वाक्य
  •  आज फिल्म नहीं दिखाई जाएगी।
  • प्रधानमंत्री अमेरिका नहीं जा रहे ।
  • किताब मेज पर नहीं हैं।
आज्ञार्थक निषेधात्मक वाक्य
  •  मेरे सामने झूठ मत बोलो ।
  • देर रात तक मत जागा करो।
  • आपस में झगडा मत करना।
इच्छार्थक निषेधात्मक वाक्य
  •  मैं चाहता हूॅ कि आप कभी सफल न हो ।
  • तुम्हें कभी नौकरी न मिले ।

संभावनार्थक निषेधात्मक वाक्य

  • शायद रेलगाडी समय पर न आए।
  • हो सकता है आज बारिश न आए।

आज्ञावाचक/आज्ञार्थक/विधिवाचक– जिन वाक्यों में वक्ता किसी को आज्ञा, आदेश,अनूमति, निवेदन,देता है,या बोध होता है। उन्हें आज्ञावाचक या विधिवाचकवाक्य कहा जाता है। जैसे-

  • पुस्तकालय में बात मत करो
  • जाइए,जल्दी किजिए।
  • यह फाइल प्रंबधक तक पहुॅंचाओ।
  • कृपया सम्मान—समारोह में मुख्य—अतिथि के रूप में पधारें।
  • हमारी प्रार्थना स्वीकार करें।
प्रश्नवाचक/प्रश्नार्थक :-  जिन वाक्यों में वक्ता के द्वारा कोई प्रश्न पूछा जाता है। , उन्हें प्रश्नवाचक कहते है,
अन्य शब्दों में– जिन वाक्यों से प्रश्न पूछने करने के भाव का बोध होता है। उन्हें प्रश्नवाचक कहते है,
जैसे-
  • सोहिमा किस कक्षा में पढती है।
  • –संभव को लाने कौन गया है।
  • रमेश कहॉ जाएगा?
  • आपको किसका डर है?
  • अभी कौन आया है?
5).  इच्छावाचक/इच्छार्थक :- जिन वाक्यों से इच्छा,  आशीष एंव शुभकामना, अभिशाप, आशीर्वाद आदि का भाव प्रकट किया जाता है।,इन्हें इच्छावाचक वाक्य कहते है। जैसे :-
  •  तुमहारा कल्याण हो।
  • आपकी यात्रा सफल हो।
  • ईश्वर तुम्हें दीर्घायु हो।
  • आज तो मैं केवल फल खाउगॉ।
6). संदेहवाचक/संदेहार्थक /संभावनार्थक —वाक्यों से कार्य होने के प्रति संदेह और सभांवना का बोध होता है।,
उन्हें संदेहवाचक वाक्य कहते है।
अन्य शब्दों में -इन वाक्यों में वक्ता कार्य के होने या न होने के बारे में संदेह या संभावना व्यक्त या प्रकट की जाती है।
जैसेः-
  • दोनों परिवारों में पहले सा प्रेम स्थापित हो।
  • आपको नौकरी मिल जाए।
  • बारिश आ जाए, तो अच्छा है।
  • निराला पुस्तक मिलने पर बधाई ।
7. विस्मयवाचक/विस्मयार्थकः-
जिन वाक्यों सें शोक, आश्चर्य, हर्ष, विस्मय, घृणा,को्रध  आदि मनोभावों को व्यक्त किया जाता है या अभिव्यक्ति  होती है तथा वाक्य के प्रारंभ में विस्मयादिसूचक अव्ययों का प्रयोग किया जाता है,उन्हें विस्मयवाचक वाक्य कहते है,जैसेः-
  •  हाय उसके माता-पिता दोनों ही चल बसे।
  • शाबाश तुमने बहुत अच्छा काम किया ।
  • वाह कितना बढिया भोजन बनाया है।
  • अरे यह क्या कर रहे है?
  • सावधान! सडक निर्माण कार्य चल रहा है।
  • राम राम! बुढे ने पुत्री की उम्र की लडकी से विवाह कर लिया।
8. सकेंतवाचक या शर्तवाची वाक्यः
जिन वाक्यों से शर्त संकेत का बोध होता है। यानी एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया पर निर्भर होता है,उन्हें संकेतवाचक वाक्य कहते है,
अन्य शब्दों में —जिन वाक्यों में क्रिया के विषय में शर्त का बोध हों उन्हें सकेंत वाचक वाक्य कहते है।

सरल शब्दों में
इन वाक्यों में किसी  न किसी शर्त को पूरा करने का कार्य किया जाता है। अतःइन वाक्यों को शर्तवाची वाक्य भी कहते है।  जैसे :-
  •  यदि विमान का किराया देंगे तो ही मै हैदराबाद जाउगॉ।
  • यदि तुम परिश्रम करोगे तो अवश्य सफल होगे ।
  • अगर उसने शादी की होती तो आज इस तरह भटकना न पडता ।
  • अगर मीरा मेरी बात मानेगी तो मैं उसका काम अवश्य करूगॉ

2). रचना के आधार पर वाक्य भेद :-

1). सरल वाक्य
2). जटिल वाक्य
1). सरल वाक्य या साधरण वाक्य:-.  जिन वाक्यों में केवल एक क्रिया या क्रिया पदबंध होता है सरल वाक्य कहलाते हैं जैसे – चपरासी पॅंहुच गया।
सरल वाक्य के अन्य अर्थ
  • जिन वाक्य में एक ही क्रिया होती है, और एक कर्ता होता है, वे साधारण वाक्य कहलाते है।
  • सरल वाक्यों में कर्ता से अधिक हो सकते है। पंरतु विधेय और क्रिया एक ही हो सकते है।
  • इन वाक्यों में केवल एक ही उददेश्य और एक ही विधेय होता है।
  • सरल वाक्यों में एक ही समापिका क्रिया करता है,किया,करेगा आदि होती है।
जैसे –
  •  सोनू ने मकान बनवाया ।
  • इंद्रप्रकाश को पुस्तकें दो।
  • रेलगाडी रूकी।
  • नर्तकी ने आकर्षक भरतनाटय.प्रस्तुत किया ।
  • बस चालाक ने बस बहुत तेज चलाई।
  • इन वाक्यों में एक-एक क्रिया बनवाया, दो, रूकी, चलाई, और िकया आई । इसलिए ये सरल वाक्य है।
 इन वाक्यों में एक ही क्रिया होती है, जैसे.
  • मुकेश पढ़ता है। राकेश ने भोजन किया।
सरल वाक्य(simple Sentance)—
एक क्रिया पदबंध वाले वाक्य सरल वाक्य कहलाते हैं। नीचे दिए सभी वाक्यों में केवल एक ही क्रिया पदबंध का प्रयोग हुआ है। अतः ये सभी वाक्य ’’सरल वाक्य’’ के उदहारण हैं-
  •  आज स्कूल बंद रहेगा।
  • लडके पंतग उडा रहे है।
  • बंदर पेड से लडका हुआ है।
  • महिलाएं मंदिर में पूजा कर रहे है।

2.जटिल वाक्यः-जिन वाक्यों में एक से अधिक क्रिया पदबंध होते है, रचना की दृष्टि से वह वाक्य जटिल वाक्य कहलाते है।

यदि किसी वाक्य में एक से अधिक क्रिया-पदबंध आते हैं तो इसका  अर्थ यही है कि उसकी रचना एक से अधिक सरल वाक्यों के मेल  से हुई होगी, जैसे –

वाक्य -1 मॉ खाना बना रही है और बच्चे खेल रहे हैं।
जटिल वाक्य को दो भागों में विभाजित किया गया है।
  •  संयुक्त वाक्य
  •   मिश्र वाक्य
1. संयुक्त वाक्यः-जिस जटिल वाक्य के सभी उपवाक्य स्वतंत्र या समानाधिकृत उपवाक्य होते है।उसे संयुक्त वाक्य कहा जाता है।
समानाधिकृत शब्द का अर्थ है— समान अधि
कार वाला 
संयुक्त वाक्य के सभी उपवाक्य स्वतंत्र और समान स्तर के होतें है।जो और, अथवा,या,एंव,सो,इसलिए,पो,वरना,अन्यथा,लेकिन,किंतु परंतु आदि समुच्चयबोधक अव्ययों/ योजकों से जुड़े रहते है।
जैसे.
  • सच—सच बताओ अन्यथा/वरना सजा मिलेगी।
  • सब लोग वहॉं पहुचें और/तथा नारे लगाने लगे।
  • तुम चलना चाहोगें या/ अथवा यही आराम करोगें।
  • मैने उसे बहुत समझाया लेकिन उसने मेरी एक न सुनी।
  • मैं नहा रहा था इसलिए आपका फोन नहीं सुन पाया ।
  • मैं आपका काम कर दूॅंगा लेकिन/पर आनको मुझे कुछ रूपये उधार देने होगें।
  • वह शादी तो करेगा पर/पंरतु घरजमाइ बनकर नहीं रहेगा।
ऊपर दिए गए उदाहरण में जैसा की आप देख सकते हैए एक पूर्ण वाक्य में किन्हीं दो स्वतंत्र सरल वाक्यों को रखा गया है। ये वाक्य एक दुसरे पर आश्रित नहीं हैं। इन दोनों वाक्यों को किन्तु अव्यय सयोंजक से जोड़ा गया है।
संयुक्त वाक्य के चार प्रकार होते हैं inko bnana h
.
1).संयोजक संयुक्त वाक्य      इसके उपवाक्यों में परस्पर मेल प्रकट होता है। जैसे:-
  • रचना बोल रही है और सीमा सुन रही है।।
2). विभाजक संयुक्त वाक्य  :- इसके उपवाक्यों में परस्पर विरोध उत्पन्न होता है। जैसे :-
  • रीमा गा रही है, पर सीमा चुप है।
3).विरोधसूचक – विकल्पसूचकसंयुक्त वाक्य  :-  इसके दों उपवाक्यों में प्रकट होता है। जैसेः-
  • तुम कुछ तो कहो या यहॉ से चले जाओ
4). परिमाणवाचक संयुक्त वाक्य  :-  इसके एक उपवाक्य दूसरे उपवाक्य का परिणाम या फल होता है, जैसः-
  • मोहन ने कठिन परिश्रम किया इसलिए पास हो गया ।

मिश्रित वाक्य ..

जिस  जटिल वाक्य में एक ’प्रधान उपवाक्य’’ तथा शेष उस पर ’’आश्रित उपवाक्य’’ होते है। पहले को मुख्य वाक्य और दूसरे को  सहायक वाक्य भी कहते हैं। इनमें एक मुख्य उद्देश्य और मुख्य विधेय के अलावा एक से अधिक समापिका क्रियाएँ होती हैं,
जैसे –
  •  गॉधी जी ने कहा कि सदा सत्य बोलो।
  • तुम वहॉ चले जाओ, जहॉ बस खडी है।
  • जिसने गिलास तोडा है, खडा हो जाए।
  • ये आश्रित उपवाक्य किसी ना किसी योजक से जुडे होते है।

अतः हम कह सकते है किः  वह वाक्य जिसमें एक मुख्य (प्रधान) उपवाक्य हो  तथा एक से अधिक  आश्रित उपवाक्य हो, मिश्र वाक्य कहलाता है- तथा जो आपस में ‘कि’ ‘जो’ ‘क्योंकि’ ‘जिना’ ‘उतना’ ‘जैसा’ ‘वैसा’ ‘जब’ ‘तब’ ‘जहाँ’ ‘वहाँ’ ‘जिधर’ ‘उधर’ ‘अगर/यदि’ ‘तो’ ‘यद्यपि’ ‘तथापि’ आदि से मिश्रित(मिले.जुले) हों उन्हें मिश्रित वाक्य कहते हैं। हमने इन वाक्यों में आए मुख्य और आश्रित उपवाक्यों को अलग अलग करके दर्शाया गया है।

मुख्य उपवाक्य  औरआश्रित उपवाक्य

  •  सिपाही ने उस युवक को पीटा जिसने (आश्रित उपवाक्य)जेब काटी थी।
  •  अटलबिहारी वाजपेयी ने कहा था कि (आश्रित उपवाक्य)हम शांति और युद्ध दोनों के लिए तैयार है।
  •  बिस्मिल्लाह खॉ वही शहनाईवादक हैं जिन्हें(आश्रित उपवाक्य) भारत रत्न से अलकृंत किया गया।
  •  यह वही मकान हैजिसमें (आश्रित उपवाक्य)बालमुकुंद गुप्त का जन्म हुआ था।
  • अशोक महता मुख्य अतिथि थे  जो  (आश्रित उपवाक्य)प्रसिद्ध साहित्यकार है।
  •  स्वामी गणेशानंद ने कहा था कि (आश्रित उपवाक्य) शाकाहारी रहो और आनंदपूर्वक जियो।

मुख्य और आश्रित उपवाक्यों को पहचानना

1). वाक्य में मुख्य उपवाक्य की क्रिया ही मुख्य क्रिया होती है।
2). वाक्यों में आए आश्रित उपवाक्यों का आरंभ अधिकांशः समुच्चयबोधक शब्दों से होता है। जैसे-जिसने, कि, जिन्हें, जिसमें, जहॉ, जब, तो, क्योंकि, यदि, परन्तु, तब आदि।
3). आश्रित उपवाक्य के आरंभ, मध्य, या अंत, में भी रहती है।  उदहारण के लिए
  • जिसने बालक की जान बचाई , वह युवती कुंदन कालोनी में रहती है।
  • वह युवती जिसने बालक की जान बचाई , कुंदन कालोनी में रहती है।
  • वह युवती कुंदन कालोनी में रहती है, जिसने बालक की जान बचाई ।
पहले वाक्य में आश्रित  उपवाक्य जिसने बालक की जान बचाई वाक्य के आरंभ में आया है।दूसरे वाक्य में ये मध्य  में आया है। तीसरे वाक्य में अंत में आया है।

आश्रित उपवाक्य के भेद

  • संज्ञा उपवाक्य
  • विशेषण उपवाक्य
  • क्रिया-विशेषण उपवाक्य
उपवाक्य वाक्य :-
यदि किसी एक वाक्य में एक से अधिक समापिका क्रियाएॅ होती है। तो वह वाक्य उपवाक्य में बॅट जाता है और उसमें जितनी भी क्रियाएॅ होती हैं उतने  ही उपवाक्य होते है इन उपवाक्यों में से जो वाक्य का केंद्र होता है। उसे मुख्य या प्रधान उपवाक्य कहते है। और शेष आश्रित उपवाक्य कहते है। आश्रित उपवाक्य तीन प्रकार के होते है।

1). संज्ञा उपवाक्यः- जो आश्रित उपवाक्य प्रधान उपवाक्य की क्रिया के कर्ता, कर्म, अथवा क्रिया पूरक के रूप में प्रयुक्त हों, उन्हें संज्ञा उपवाक्य कहते है,

सरल शब्दों में कह सकते है-  किसी वाक्य में जो आश्रित उपवाक्य मुख्य उपवाक्य की संज्ञा के स्थान पर आते है, उन्हें संज्ञा उपवाक्य कहते है जैसेः-

  •  दादा जी कहा करते थे कि आलोक महान व्यक्ति बनेगा।
  •  कौशल्या नहीं आएगी, सुमित्रा जानती थी।
इन वाक्यों में संज्ञा  उपवाक्य हैः- कि आलोक महान व्यक्ति बनेगा’ और कौशल्या नहीं आएगी,
  •  मैं जानता हूॅ कि वह ईमानदार है
  • उसका विचार है- कि राम सच्चा आदमी है।
  • रश्मि ने कहा कि उसका भाई पटना गया है।

संज्ञा  उपवाक्यों कें  आरम्भ में प्रायः कि शब्द आता है। ये  मुख्य उपवाक्य से कि द्वारा जुडे होते है। यदि संज्ञा उपवाक्य आरम्भ में आ  जाते हैं तो इनके साथ कि का प्रयोग किया जाता है।

संज्ञा  उपवाक्य कर्ता और कर्म दोनों के स्थान पर दिया जाता है। जैसे :-

 

 कर्ता के स्थान पर संज्ञा उपवाक्य
  •  राधा जानती है कि सोना को ही पुरस्कार मिलेगा ।
  • सास का यह सोचना कि बहू झगडालु है।सत्य सिद्ध हुआ
  •  मुरलीधर का यह कहना है कि अमित पास हो जाएगा।
कर्म के स्थान पर संज्ञा उपवाक्य
  •  गुरू जी कहते हैं कि तुम्हें प्रथम आना चाहिए ।
  •  कर्मचारियों ने कहा कि उन्हें पूरा वेतन दिया जाए।
  • अध्यापिकाएॅ चाहती हैं कि वे पिकनिक पर जाए।
  • कमला ने बताया कि तुम कविता भी लिखते है।
पहचान :- संज्ञा उपवाक्य का प्रारंभ कि’ से होता है।
2. विशेषण उपवाक्यः
जब कोई आश्रित उपवाक्य प्रधान उपवाक्य की संज्ञा पद की विशेषता बताते है, उन्हें विशेषण उपवाक्य कहते हैं,
  • जैसे- मैंने एक व्यक्ति को देखा जो बहुत मोटा था
  • वे फल कहॉ है जिन को आप लाए थे।इन वाक्यों में रगींन अक्षरों वाले अंश विशेषण उपवाक्य हैं।
पहचान :- विशेषण उपवाक्य का प्रारंभ जो अथवा इसके किसी रूप- जिसे, जिस को, जिसने, जिन से को आदि से होता है। 
3. क्रिया-विशेषण उपवाक्य :-

जो आश्रित उपवाक्य प्रधान उपवाक्य की क्रिया की विशेषता बताए, उसे क्रियाविशेषण उपवाक्य कहते हैं।  ये प्रायः क्रिया का काल, स्थान, रीति, परिणाम, कारण आदि के सूचक क्रियाविशेषणों के द्वारा प्रधान वाक्य से जुडे रहते है, जैसे –

  • मैं उससे नहीं बोलता, क्योंकि वह बदमाश है।
  • जब वर्षा हो रही थी तब मैं कमरे में था।
  • जहॉ-जहॉ वे गए, उनका स्वागत हुआ।
  • यदि मैंने परिश्रम किया होंता तो अवश्य सफल होता
  • यद्पि वह गरीब है, तथापि ईमानदार है।
  • इन वाक्यों में रंगीन अक्षरों वालें अंश क्रियाविशेषण उपवाक्य  हैं।
पहचानः- क्रियाविशेषण उपवाक्य का प्रारम्भ ’क्योंकि ’जितना’ जैसा, जब, जहॉ, जिधर, अगर/यदि, यद्पि, आदि से होता है।

क्रिया-विशेषण उपवाक्यों के भेद

क्रिया- विशेषण उपवाक्यों के पॉच भेद होते है।
  1.  कालवाचक उपवाक्य
  2.  रीतिवाचक उपवाक्य
  3.  स्थानवाचक उपवाक्य
  4.  परिणाम उपवाक्य
  5. कार्य-कारणवाचक या परिणामवाचक उपवाक्य
1). कालवाचक उपवाक्य :– ऐसे क्रिया-विशेषण उपवाक्य जिनमें समय काल का बोध होता है। उन्हें कालवाचक उपवाक्य कहते है।  जैसे :-
  •  जब पिताजी समाचार-पत्र पढ रहे थे तब मैं टी0 वी0 देख रही थी
  • जब तक तुम नृत्य करोगी दर्शक बैठे रहेगें।
  • जब बिजली चली गई सभा विसर्जित हो गई।
2). रीतिवाचक उपवाक्य :- ऐसे क्रिया-विशेषण उपवाक्य जिनसे रीति या ढंग की विशेषता का बोध होता है। उन्हें रीतिवाचक उपवाक्य कहते है।  जैसे :-
  •  जैसा पत्नी कहती है वही करता है।
  •  जैसी मेरी पसंद थी दुकान वैसी ही मिल गई।
  •  जैसा बनाने के लिए कहा था चित्र वैसा ही बन गया ।

3. स्थानवाचक उपवाक्य :- ऐसे क्रिया-विशेषण उपवाक्य जिनमें स्थान का बोध होता है। उन्हें स्थानवाचक उपवाक्य कहतें है। जैसे

  • जहॉ तक दृष्टि जाती है।प्रकृति की अनुपम यछटा बिखरी पडी है।
  • यह वही जेल है जहॉ भष्टाचारी नेता रखे जाते है।
  • जहॉ खेत थे वहॉ बहुमजिलें भवन बन गए है।

 4).परिणामवाचक उपवाक्य :- ऐसे क्रिया-विशेषण उपवाक्य जिनमें परिणाम का बोध होता है। उन्हें परिणामवाचक उपवाक्य कहतें है।जैसेः-

  •  जितनी चीनी पडी थी उतनी चटनी में डाल दी।
  • जैसे जैसे शरबत पियोगे वैसे वैसे और मॉगोगे।
  • जतनी रबडी आई थी उतनी  प्ररेणा खा गई।
  • जितना पानी जमा था उतपा बह गया।

5).कार्य-कारणवाचक या परिणामवाचक उपवाक्य :– ऐसे क्रिया-विशेषण उपवाक्य जिनसे कार्य होने के कारणों का बोध होता है। उन्हें कार्य-कारणवाचक या परिणामवाचक उपवाक्य कहतें है।जैसेः-

  •  यदि कूलर ठीक होता तो गर्मी नहीं लगती
  • यदि घायल को समय पर  अस्तपताल ले जाते तो वह बच जाता।
  • यद्यपि गुंजन  तेज दौडी तथापि प्रथम न आ स  के।
  • सीमा खूब पढ रही है। ताकि मेडिकल में प्रवेश ले सके ।

वाक्य रचनांताण/रूपांतरण

 

एक प्रकार के वाक्य का दूसरे प्रकार के  वाक्य परिवर्तन  रचनांतरण कहलाता है।
जैसे :-
  •  मैं बाजार जाउॅगा -विधान वाचक
  • मैं बाजार  नहीं जाउॅगा -निषेध वाचक
वाक्य-रचनांतरण निम्न रूपों में होता है
  1.  संरचना की दृष्टि से
  2. अर्थ की दृष्टि से
  3. वाक्य की दृष्टि से

1. संरचना की दृष्टि से वाक्य-रचनांतरण के तीन भेद होते है।

 

  1. .सरल वाक्य
  2. संयुक्त वाक्य
  3. मिश्र वाक्य

इन वाक्यों का एक-दूसरे में परिवर्तन हो जाता है।यह परिवर्तन निम्न रूपों में होता है।

 

  1. सरल वाक्य का संयुक्त वाक्य में रचनांतरण
  2. सरल वाक्य का मिश्र वाक्य में रचनांतरण
  3. संयुक्त वाक्य का सरल वाक्य में रचनांतरण
  4. संयुक्त वाक्य का मिश्र वाक्य में रचनांतरण
  5. मिश्र वाक्य का सरल वाक्य में रचनांतरण
  6. मिश्र वाक्य का संयुक्त वाक्य में रचनांतरण

सरल वाक्यों का संयुक्त वाक्यों में रचनांतरण

 

क). सरल वाक्य :- सरस्वती ने नहाकर पूजा की।
क) संयुक्त वाक्य :- सरस्वती नहाई और पूजा की।
ख). सरल वाक्य :- बच्चे नाश्ता करके विद्यालय गए।
ख).संयुक्त वाक्य :- बच्चों ने  नाश्ता किया और विद्यालय गए।
ग) सरल वाक्य :- लक्ष्मी के जाते ही सीमा आ गई।
ग) संयुक्त वाक्य :- लक्ष्मी गई और सीमा आ गई।
घ). सरल वाक्य :- नेता भाषण देकर चला गया।
)संयुक्त वाक्य :- नेता  ने भाषण  दिया और चला गया।
ड). सरल वाक्य :- मॉ ने बेटी को दूध पिलाकर सुलाया।
ड)संयुक्त वाक्य :-  मॉ ने बेटी को दूध पिलाया और  सुलाया।
च).सरल वाक्य  :- राधा सास से मिलने के लिए दिल्ली गई।
च). संयुक्त वाक्य :-  राधा ने सास से मिलना था इसलिए दिल्ली गई।

सरल वाक्यों का मिश्र वाक्यों में रचनांतरण

 

सरल वाक्य-– उसने अपने मित्र का पुस्तकालय खरीदा।
मिश्र वाक्य-– उसने उस पुस्तकालय को खरीदा- जो उसके मित्र का था।
सरल वाक्य— अच्छे लड़के परिश्रमी होते हैं।
मिश्र वाक्य-– जो लड़के अच्छे होते है- वे परिश्रमी होते हैं।
सरल वाक्य— लोकप्रिय कवि का सम्मान सभी करते हैं।
मिश्र वाक्य– जो कवि लोकप्रिय होता है- उसका सम्मान सभी करते हैं।
इस प्रक्रिया के ठीक विपरीत मिश्र वाक्यों को साधारण वाक्यों में बदला जा सकता है। एक उदाहरण देखिए.
मिश्र वाक्य–. जो लोग नियमित रूप से व्यायाम करते है- वे सदैव स्वस्थ रहते हैं।
साधारण वाक्य-— नियमित रूप से व्यायाम करने वाले लोग सदैव स्वस्थ रहते हैं।
3. संयुक्त वाक्य का सरल वाक्य में रचनांतरण
1). संयुक्त वाक्यः– पूनम ने कविता लिखी और पुरस्कार प्राप्तकिया।
1).सरल वाक्यः- पूनम ने कविता लिखकर पुरस्कार प्राप्त किया।
2). संयुक्त वाक्यः-बिजली नहीं थी इसलिए अंधेरा था।
2).सरल वाक्यः–   बिजली न होने के कारण अंधेरा था।
3). संयुक्त वाक्यः-   दर्शाना बहुत मोटी है इसलिए चल नहीं पाती है।
3). सरल वाक्यः– बहुत मोटी होने के कारण दर्शाना चल नहीं पाती
4) . संयुक्त वाक्यः– दादा जी आए और टेलिविजन देखने लगे।
4).  सरल वाक्यः- दादा जी आकर टेलिविजन देखने लगे।
5). संयुक्त वाक्यः-पानी गिरा और पुस्तक गीली हो गई।
5).सरल वाक्यः– पानी गिरने पर पुस्तक गीली हो गई।
6).संयुक्त वाक्यः– रमेश धनी है परंतु कंजूस है।
6).सरल वाक्यः– धनी होने पर भी रमेश कंजूस है।
4. संयुक्त वाक्य का मिश्र वाक्य में रचनांतरण

 

संयुक्त वाक्यः– नेहा शोर मचा रही थी इसलिए डॉट पडी।
मिश्र वाक्यः–  क्योंकि नेहा शोर मचा रही थी इसलिए डॉट पडी।
संयुक्त वाक्यः– सुरेश को रूपए मिले और उसने लौटा दिए।
मिश्र  वाक्यः– सुरेश को ज्योंहि रूपए मिले उसने लौटा दिए।
संयुक्त वाक्यः– समय हो गया है परंतु कंडेक्टर बस नही चला रहा ।
मिश्र वाक्यः– यद्यपि समय हो गया है तथापि कंडेक्टर बस नही चला रहा ।
संयुक्त वाक्य— सूर्य निकला और कमल खिल गए।
मिश्र वाक्य— जब सूर्य निकला, तो कमल खिल गए।
संयुक्त वाक्य— छुट्टी की घंटी बजी और सब छात्र भाग गए।
मिश्र वाक्य.—- जब छुट्टी की घंटी बजीए तब सब छात्र भाग गए।
5. मिश्र वाक्यों  का  सरल वाक्यों में रचनांतरण

 

मिश्र वाक्यः– जिनके पास टिकट नहीं है- वे बस से उतर जांए

सरल वाक्यः–  बेटिकट बस से उतर जांए

मिश्र वाक्यः– कोई ऐसा गीत गाओ जिसमें देश प्रेम की भावना हों।

सरल वाक्यः– देश प्रेम की भावना का कोई गीत गाओ ।

मिश्र वाक्यः– नानी जी कहती है कि मै अध्यापिका बनूॅ।

सरल वाक्यः– नानी जी मुझे अध्यापिका बनने के लिए कहती है।

मिश्र वाक्य.– उसने कहा कि मैं निर्दोष हूँ।

सरल वाक्य.— उसने अपने को निर्दोष घोषित किया।

मिश्र वाक्य–. मुझे बताओ कि तुम्हारा जन्म कब और कहाँ हुआ था।

सरल वाक्य–. तुम मुझे अपने जन्म का समय और स्थान बताओ।

मिश्र वाक्य. जो छात्र परिश्रम करेंगेए उन्हें सफलता अवश्य मिलेगी।
सरल वाक्य. परिश्रमी छात्र अवश्य सफल होंगे।

6. मिश्र वाक्यों का संयुक्त वाक्यों में रचनांतरण

 

मिश्र वाक्यः– जब गोमती घर पहॅुची बेटी रो रही थी।

संयुक्त वाक्यः– गोमती घर पहॅुची  तो बेटी रो रही थी।

मिश्र वाक्यः– यदि घुमने चलना है तो तैयार हो जाओ।
संयुक्त वाक्यः– घुमने चलना है इसलिए तैयार हो जाओ।
मिश्र वाक्य– जब सूर्य निकला- तो कमल खिल गए।

संयुक्त वाक्य सूर्य निकला और कमल खिल गए।

मिश्र वाक्य-.   जब छुट्टी की घंटी बजीए तब सब छात्र भाग गए।
संयुक्त वाक्य.– छुट्टी की घंटी बजी और सब छात्र भाग गए।

अर्थ की दृष्टि से वाक्य में परिवर्तन

 अर्थ की दृष्टि से वाक्य आठ प्रकार के होते है।-
  1. विधानवाचक
  2. निषेधवाचक
  3. विस्मयवाचक
  4. संदेहवाचक
  5. आज्ञावचक
  6. संकेतवाचक
  7. इच्छावाचक
  8. प्रश्नवाचक।
इन सब वाक्य-भेदों में विधानवाचक को मूलाधार रचना माना जाता हैं इनमें कुछ अर्थ वैशिष्ट्य के कारण अन्य वाक्य भेद बनते है।
इन्हें इस रूप में देखा जा सकता है-
  1. विधानवाचक- कुणाल पुस्तक पढता है
  2.  निषेधवाचक  – कुणाल पुस्तक नहीं पढता है।
  3.  प्रश्नवाचक- क्या कुणाल पुस्तक पढता है।
  4.  आज्ञावचक- कुणाल पुस्तक पढो।
  5.  इच्छावाचक- कुणाल पुस्तक पढे।
  6.  विस्मयवाचक – अरे! कुणाल पुस्तक पढता है।
  7. संदेहवाचक- कुणाल पुस्तक पढता होगा।
  8.  संकेतवाचक- यदि कुणाल पुस्तक पढे तो……..

वाच्य

वाच्य को अग्रेंजी में (voice) कहते है। जिसमें कर्ता कर्म और भाववाच्य तीनों को शामिल किया गया है।

इस प्रकार :- उस रूप- रचना को वाच्य कहते हैं जिससे यह पता चलता है कि क्रिया को मूल रूप से चलाने वाला कर्ता है-कर्म है या कोई अन्य घटक ।

वाच्य तीन  प्रकार के होतेहै।
  1.  कृर्त वाच्य
  2. कर्म वाच्य
  3. भाव वाच्य  इन सभी के द्वारा वाच्य परिवर्तन किए जाते हैं।

3. वाक्य की दृष्टि से वाक्य में परिवर्तन /रचनांतरण

1).कर्तृवाचक से कर्मवाचक वाक्य में रचनांतरण

कर्तृवाचक वाक्य—— प्रधानमंत्री उद्घाटन करते है।
कर्मवाचक वाक्य——–प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन किया गया ।

कर्तृवाचक वाक्य———-मजदूर काम कर रहें है।
कर्मवाचक वाक्य——– मजदूरों से काम करवाया जा रहा है।

कर्तृवाचक वाक्य——-डाकिया डाक वितरित करता है।
कर्मवाचक वाक्य—— डाकिया द्वारा डाक वितरित किया जाता है।

2.विधिवाचक से निषेधवाचक वाक्य में रचनांतरण

विधिवाचक वाक्य—-–मैं बाजार जाउगॉं
निषेधवाचक.———- मैं बाजार नहीं जाउगॉं

विधिवाचक वाक्य——. शशिकांत कार्यालय जाएग।
निषेधवाचक वाक्य.——-शशिकांत कार्यालय नहीं जाएग ।

विधानवाचक वाक्य से निषेधवाचक वाक्य में परिवर्तन

विधानवाचक वाक्य.— ठंडी हवा चल रही है।
निषेधवाचक.—- ठंडी हवा नहीं चल रही है।

 

विधानवाचक वाक्य-——. उससे बात किजिए।
निषेधवाचक—–.——- उससे बात मत किजिए।

विधानवाचक वाक्य——— महेश खाना बनाएगा।
निषेधवाचक————– महेश खाना नहीं बनाएगा।

विधानवाचक वाक्य-——–.सुरेश राजस्थान से अभी लौटा है।
निषेधवाचक————. सुरेश राजस्थान से अभी नहीं लौटा है।

विधानवाचक वाक्य———– मोनु की नौकरी लग गई है।
निषेधवाचक-—————. मोनु की नौकरी अभी नहीं लगी।

विधानवाचक वाक्य———— उमांकात रसगुल्ले लाया।
निषेधवाचक—————– उमांकात रसगुल्ले नहीं लाया ।

विधानवाचक वाक्य———— बाग में फूल खिले हैं।
निषेधवाचक—————– बाग में फूल नहीं खिले है।

4 प्रश्नवाचक वाक्य से .निश्चयवाचक वाक्य में परिवर्तन

प्रश्नवाचक———– संभव को लाने कौन गया है?
निश्चयवाचक———-संभव को लाने गया है।
.
प्रश्नवाचक–.———- क्या राधा पहली कक्षा में पढती है?
निश्चयवाचक———— राधा पहली कक्षा में पढती है।

प्रश्नवाचक———- सोहन ने क्या खानाा खा लिया है?
निश्चयवाचक——–-सोहन ने खाना खा लिया है।

प्रश्नवाचक———— क्या प्रसाद विमलिया पहुॅच गया?
निश्चयवाचक———–.प्रसाद विमलिया पहुॅच गया।

प्रश्नवाचक-———– तुम कब चलोगें?
निश्चयवाचक———-. तुम चलोगें।

प्रश्नवाचक———— मीरा बांका किसके साथ जाएगी?
निश्चयवाचक-———-मीरा बांका साथ जाएगी।

 

5.विस्मयादिबोधक वाक्य से विधानवाचक वाक्य में परिवर्तन

विस्मयादिबोधक——– वाह! कितना बढ़िया भोजन बनाया है।
विधानवाचक वाक्य——-. बहुत ही स्वादिष्ट भोजन बनाया है।

विस्मयादिबोधक–———– उफ! कितनी गरमी है।
विधानवाचक वाक्य———-आज अधिक गरमी है।

विस्मयादिबोधक———–शबाश! तुमने तो कमाल कर दिया।
विधानवाचक वाक्य———-क्रिकेट खेल में आज कमाल हो गया है।

विस्मयादिबोधक——– अरे! तुम आ गए।
विधानवाचक वाक्य.—- आपके आने की खुशी हुई ।

विस्मयादिबोधक. ——–हाय! यह क्या हो गया।
विधानवाचक वाक्य——-. मुझसे यह गलत हो

वाक्य प्रयोग के नियम/वाक्यगत प्रयोग

वाक्य कुछ वर्ण. शब्द तथा पदो के मेल से बनते है। जो बिना शब्द और पद के अधूरे है। वाक्य का सारा  श्रृंगार और सौंदर्य शब्द और पद पर निर्भर या आश्रित है।  प्रयोग सम्बन्धी कुछ आवश्यक निर्देश निम्रलिखित हैं.
कुछ आवश्यक निर्देश
1). वाक्य  में शब्दों का प्रयोग करते समय व्याकरण सम्बंधी नियमों का पालन करना चाहिए।
2). वाक्य में वाक्य रचना करते समय वाक्यों को अधूरा पहीं रखना चाहिए।
3).जब हम वाक्य प्रयोग करते है तो उसमें एक ही भाव प्रकट हो।
4). वाक्य.योजना में ही स्पष्ट उचित शब्दावली तथा शैली सम्बंधी शिष्टता का समावेश होना चाहिए ।
5). वाक्य में सभी शब्दों का आपस में घनिष्ठ सम्बंध हो ताकि वाक्य में सभी शब्दों का एक ही समय में एक ही स्थान में और एक अर्थ के साथ प्रयोग होना चाहिए ।
6) वाक्य में पुनरुक्तिदोष नहीं होना चाहिए। शब्दों के प्रयोग में औचित्य पर ध्यान देना चाहिए।
7). वाक्य में उसके सही वर्ण- ध्वनि तथा उसके अर्थ पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
8) वाक्य में उन शब्दों या पदों का प्रयोग नहीं होना चाहिए जो व्यर्थ के हों हमेशा शुद्ध शब्दावली का प्रयोग हो।
9) वाक्य.योजना में हमें जहां जहां वाक्यों ् मुहावरों और लोकोक्तियों की आवश्यकता होती है वहां वहां प्रयोग करना चाहिए।
10). वाक्य में उन शब्दों का प्रयोग न हो जो शब्द अप्रचलित हों
11. वाक्य में एक ही व्यक्ति या वस्तु के लिए कहीं ‘यह’ और कहीं ‘वह’, कहीं ‘आप’ और कहीं ‘तुम’, कहीं ‘इसे’ और कहीं ‘इन्हें’, कहीं ‘उसे’ और कहीं ‘उन्हें’, कहीं ‘उसका’ और कहीं ‘उनका’, कहीं ‘इनका’ और कहीं ‘इसका’ प्रयोग नहीं होना चाहिए।

उपवाक्य और पदबंधः

उपवाक्य से छोटी इकाई पदबंध है’’मेरा भाई मोहन बीमार है, उपवाक्य हैऔर इसमें ’’मेरा भाई मोहन संज्ञा पदबंध है। पदबंध में अधूरा भाव प्रकट हो भी सकता है किन्तु उपवाक्य में पूरा भाव प्रकट हो भी सकता है और कभी – कभी नहीं भी। उपवाक्य में क्रिया अनिवार्य रहती है जबकि पदबंध में क्रिया का होना आवश्यक नहीं। उदहारणः-
  •  रमेश की बहन शीला तेजी बस से गिर पडी और उसे कई चोटे आई ।
  • रमेश की बहन शीला तेजी से चलती बस से गिर पडी.
  • रमेश की बहन शीला
  • तेजी से चलती बस
  • गिर पडी

पदबंध :-

कई पदो ंके योग से बने वाक्याशों को, जो एक ही पद का काम करता है, ’’पदबंध’’ कहते है। पदबंध को वाक्यांश भी कहते हैं। जैसे-
  • 1. सबसे तेज दौडने वाला छात्र जीत गया।
  • 2. यह लडकी अत्यंत सुशील और परिश्रमी है।
  • 3. नदी बहती चली जा रही है।
  • 4. नदी कल-कल करती हुई बह रही थी।
उपर्युक्त वाक्यों में रंगीन छपे शब्द पदबंध है। पहले वाक्य के  सबसे तेज दौडने वाला छात्र में पॉच पद है, किन्तु वे मिलकर एक ही एक अर्थात संज्ञा का कार्य कर रहे है, दूसरे वाक्य के अत्यंत सुशील और परिश्रमी में भी चार पद है, किन्तु वे मिलकर एक ही पद अर्थात क्रिया का काम कर रहे है। चौथे वाक्य के कल -कल करती हुई, में तीन पद है, किन्तु वे मिलकर एक ही पद अर्थात क्रिया विशेषण का काम कर रहे है।

पदबंध के प्रकारः-

 1).संज्ञा पदबंध
 2).विशेषण पदबंध
  3). क्रिया पदबंध
4).क्रिया विशेषण पदबंध
1). संज्ञा पदबंधः
पदबंध का अतिम अथवा शीर्ष शब्द यदि संज्ञा हो और अन्य सभी पद उसी पर आश्रित हो तो वह ’’संज्ञा पदबंध’’ कहलाता है। जैसे –
अ. चार ताकतवार मजदूर इस भारी चीज को उठे पाए।
आ. राम ने लंका के राजा रावण को मार गिराया ।
इ. अयोध्या के राजा दशरथ के चार पुत्र थे ।
आसमान में उडता गुब्बारा फट गया
उपर्युक्त वाक्यों में रंगीन छपे शब्द ’संज्ञा पदबंध’ है,
2). विशेषण पदबंधः
पदबंध का शीर्ष अथवा अंतिम शब्द यदि विशेषण हो और अन्य सभी पद उसी पर आश्रित हो तो वह विशेषण पदबंध कहलाता है।
अ.. तेज चलने वाली गाडियॉ प्रायः देर से पहुचती है।
आ.. उस घर के कोने में बैठा हुआ आदमी जासूस है।
इ.. उसका घोडा अत्यंत सुंदर, फुरतीला और आज्ञाकारी है।
ई.. बरगद और पीपल की घनी छॉव से हमें बहुत सुख मिला।
 3).क्रिया पदबंधः
क्रियापदबंध में मुख्य क्रिया पहले आती है। उसके बाद अन्य क्रियाएॅ मिलकर एक समग्र इकाई बनाती है। यही क्रिया पदबंध है। जैसे :-
1). वह बाजार की ओर आया होगा ।
2). मुझे मोहन छत से दिखाई दे रहा है।
3). सुरेश नदी में डूब गया।
4). अब दरवाजा खोला जा सकता है।
4).क्रिया  विशेषण पदबंधः
यह पदबंध मूलतः क्रिया का विशेषण रूप होने के कारण प्रायः क्रिया से पहले आता है। इसमें क्रिया विशेषण प्रायः शीर्ष स्थान पर होता है, अन्य पद उस पर आश्रित होते है। जैसेः-
1). मैनें रमा की आधी रात तक प्रतीक्षा की।
2). उसने सॉप को पीट-पीटकर मारा ।
3). छात्र मोहन की शिकायत दबी जबान से कर रहे थे।
4). कुछ लोग सोते-सोते चलते है।

वाक्य.विग्रह(Analysis)

वाक्य.विग्रह:-
वाक्य के विभिन्न अंगों को अलग.अलग किये जाने की प्रक्रिया को वाक्य.विग्रह कहते हैं। इसे  वाक्य विभाजन या वाक्य विश्लेषण भी कहा जाता है।
सरल वाक्य का विग्रह करने पर एक उद्देश्य और एक विद्येय बनते है। संयुक्त वाक्य में से योजक को हटाने पर दो स्वतंत्र उपवाक्य यानी दो सरल वाक्य बनते हैं। मिश्र वाक्य में से योजक को हटाने पर दो अपूर्ण उपवाक्य बनते है।
 1).सरल वाक्य:-   1उद्देश्य + 1 विद्येय
2). संयुक्त वाक्य:- सरल वाक्य+  सरल वाक्य
3) मिश्र  वाक्य :- प्रधान उपवाक्य + आश्रित उपवाक्य

 वाक्य के अनिवार्य तत्व

वाक्य में निम्नलिखित छ तत्व अनिवार्य है.
  •  सार्थकता
  • योग्यता
  • आकांक्षा
  • निकटता
  • पदक्रम
  • अन्वय
1). सार्थकता:-  वाक्य का कुछ ना कुछ अर्थ अवश्य होता है। अतः इसमें सार्थक शब्दों का प्रयोग होता है। लेकिन कभी कभी वाक्य में निरर्थक शब्दों के कहीं कहीं प्रयोग की अभिव्यक्ति के कारण  वाक्यों का गठन कर बैठते है। जैसे.
  •  तुम बहुत बक.बक कर रहे हो।
  • चुप भी रहोगे या नहीं
इस वाक्य में  बक-बक निरर्थक-सा लगता है, परन्तु अगले वाक्य से अर्थ समझ में आ जाता है कि क्या कहा जा रहा है।
2).योग्यता –  इसका अर्थ है— क्षमता । 
शब्दों का सार्थक होने के साथ साथ प्रसंगानुसार अर्थ देने की क्षमता भी होनी चाहिए।
वाक्य में कई शब्द पद होते है। इन शब्दों के अपने अपने अर्थ होते है। इन शब्दों को जब वाक्य में प्रयुक्त किया जाता है। तो ये शब्द अपने अपने अर्थ प्रकट करते है। इससे वाक्य अपनी संपूर्णता एक ईकाइ के रूप में प्रकट करता है।
वाक्य में प्रयुक्त होने वाले शब्दों में अपने अर्थ प्रकट करने की योग्यता आवश्यक होती है। यदि शब्दोंमें यह योग्यता नहीं होती तो वाक्य अपने अर्थ स्पष्ट नहीं कर सकते जैसे:—
  •  चाय खाई  यह वाक्य नहीं है।- क्योंकि चाय खाई नहीं जाती है। पी जाती है।
  • नाव पानी में उड रही है।(यह वाक्य नहीं है)-
  • रजनी पट्रोल से स्नान कर रही है।(यह वाक्य नहीं है)-

इन वाक्य में आए शब्द सार्थक है। इनके प्रयोग के कारण अर्थ् स्पष्ट हो जाने चाहिए ऐसा नहीं हुआ
नाव पानी में चलती है.उडती नहीं इसी प्रकार पट्रोल से स्नान नहीं किया जाता जल से किया जाता है। अत: इन वाक्यों के शुद्ध रूप होंगें

  • नाव पानी में चल रही थी
  • रजनी जल से स्नान कर रही थी
3).आकांक्षा:- आकांक्षा का अर्थ है. इच्छा।    वाक्य अपने आप पूरा होना चाहिए उसमें किसी ऐसे  शब्द अर्थ की कमी नही होनी चाहिए जिसके कारण अर्थ की अभिव्यक्ति में अधूरापन लगे। जैसे-
  • पत्र लिखता है, इस वाक्य में क्रिया के कर्ता को जानने की इच्छा होगी । अतः पूर्ण वाक्य इस प्रकार होगा -राम पत्र लिखता है।

अन्य शब्दों में कह सकते है:—वाक्य में एक से अधिक शब्द पद होते है। प्रत्येक शब्द के पश्चात उससे अगले शब्द को जानने की इच्छा या उत्सुकता बनी रहती है। यह उत्सुकता आवश्यक होती है। इसी उत्सुकता को आकांक्षा कहते है।
आकाक्षा का समान्य अर्थ इच्छा से होता है।

सरल शब्दों में कह सकते है:-   एक पद को सुनने के बाद दूसरे पद को जानने की इच्छा  आकांक्षा ही  है।
 यदि वाक्य में आकांक्षा शेष रहा जाती है  “खाता है” तो स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि क्या कहा जा रहा है. किसी के भोजन करने की बात कही जा रही है या (bank) के खाते के  बारे में
 4).निकटता /आसक्तिः- आसक्ति का तात्पर्य है -वाक्यों में प्रयुक्त किए जाने वाले जाने वाले शब्दों की एक- दूसरे से निकटता।
वाक्यों में आने वाले शब्दों का उच्चारण साथ- साथ होता है। एक शब्द के पश्चात दूसरे शब्द को दूरी पर लिखने वाक्यों के अर्थ स्पष्ट नहीं होते है। जैसे:-
  • अपराधी…………..चुनाव जीतकर…………………..विधानसभाओं ……..और संसद………… .में……..पहुॅच जाते…हैं।
इस वाक्य में आए शब्दों में आक्ति नहीं हैं। इस वाक्य को पढते समय प्रत्येक शब्द को रूक रूककर पढना पडता है
इससे अर्थ ग्रहण में रूकावट आती है।
इस वाक्य का शुद्ध रूप होगा :— अपराधी चुनाव जीतकर विधानसभाओं और संसद में पहुॅच जाते हैं। 
 5).पदक्रम :- वाक्य शब्दों या पदों का मात्र समूह नहीं होता है। प्रत्येक पद किसी-ना किसी संबंध से परस्पर जुडा रहता है। यह संबंध ही पदो ंके समूह को वाक्य का रूप प्रदान करता है।
वाक्य में पदों का एक निश्चित क्रम होना चाहिए। ‘सुहावनी है रात होती चाँदनी’ इसमें पदों का क्रम व्यवस्थित न होने से इसे वाक्य नहीं मानेंगे। इसे इस प्रकार होना चाहिए- ‘चाँदनी रात सुहावनी होती है’।
6). अन्वय :- अन्वय का अर्थ है. मेल। किसी वाक्य में प्रयुक्त शब्दों का लिंग,वचन, कारक और पुरूष आदि की दृष्टि से मेल अन्वय कहलाता है। यदि वाक्यों के शब्दों में अन्वय नहीं होगा तो उनके अर्थ स्पष्ट नहीं होगें जैसे:-
  •  इला ,गीता और कांता को मिलकर गाना गाई।
  •  सरोज भाई में राखी बांधने गया।
  • इन वाक्यों में लिंग,वचन और कारक में न अन्वय न होने से अर्थ स्पष्ट नहीं होते है।
इन वाक्यों का शुद्ध रूप है।
1. इला ,गीता और कांता ने मिलकर गाने गाए।
2. सरोज भाई को राखी बॉधने गई।
वाक्य में लिंग, वचन, पुरुष, काल, कारक आदि का क्रिया के साथ ठीक-ठीक मेल होना चाहिए; जैसे- ‘बालक और बालिकाएँ गई’, इसमें कर्ता क्रिया अन्वय ठीक नहीं है। अतः शुद्ध वाक्य होगा ‘बालक और बालिकाएँ गए’।

कर्म और क्रिया का अन्व

1. यदि वाक्य में कर्ता विभक्ति सहित हो- कर्म विभक्ति रहित हो तो -क्रिया का लिंग वचन और पुरूष कर्म के अनुसार होगें
  •  नीतू ने गाना गाया । एकवचन
  • राम ने पुस्तक पढी।
  • आशा ने पुस्तक पढ़ी।
  • हमने लड़ाई जीती।
  • उसने गाली दी। मैंने रूपये दिये।
  •   तुमने क्षमा माँगी।
2. यदि कर्ता और कर्म दोनों के साथ विभक्ति हो तो क्रिया एकवचन पुल्लिंग व अन्य पुरूष होता है।
  • मोहन ने चोर को पकडा।
  • राहुल ने सीमा को देखा ।
  • मैंने कृष्ण को बुलाया।
  • तुमने उसे देखा।
  • स्त्रियों ने पुरुषों को ध्यान से देखा।
 3. यदि वाक्य में भित्र.भित्र लिंग के अनेक प्रत्यय कर्म आयें  और वे ‘और’ से जुड़े हों, तो क्रिया अन्तिम कर्म के लिंग और वचन में होगी। जैसे
  • . मैंने मिठाई और पापड़ खाये।
  • उसने दूध और रोटी खिलाई।
4. यदि कर्ता के साथ विभक्ति ने लगी हो और वाक्य में दो कर्म हो तो क्रिया अन्तिम कर्म के अनुसार लगती है।
  • . सुनील ने विभक्ति रबड और पेंसिल खरीदी । स्त्रालिंग एकवचन
  • समय ने मिठाई और फल खरीदे । पुल्लिंग
  • मैंने एक गाय और एक भैंस खरीदी।
  • सोहन ने एक पुस्तक और एक कलम खरीदी।
  • मोहन ने एक घोड़ा और एक हाथी बेचा।

2. कर्ता और क्रिया का अन्वय

 1. वाक्य में कर्ता के परसर्ग का प्रयोग नहीं हुआ तो क्रिया का लिंग वचन और पुरूष कर्ता के अनुसार होता है।
  • राधा गाना गाती है।
  • मोहन गाना गाती है।
  • करीम किताब पढ़ता है।
  • सोहन मिठाई खाता है।
  • रीता घर जाती है।
2  वाक्य में विभक्ति रहित एक ही लिंग वचन पुरूष के कर्ता हो अर्थात एक से अधिक कर्ता हो तो क्रिया उसी लिंग में बहुवचन में होगी ।
  • .राकेश सोहन अमन खाना खा रहे है।
  • राधा रेखा प्रिया गाना गा रही है।
3. यदि उत्तमपुरुष, मध्यमपुरुष और अन्यपुरुष एक वाक्य में कर्ता बनकर आयें तो क्रिया उत्तमपुरुष के अनुसार होगी।
जैसे.
  • वह और हम जायेंगे।
  • हरि ,तुम और हम सिनेमा देखने चलेंगे।
  • वह, आप और मैं चलूँगा।
गुरूजी का मत है कि वाक्य में पहले मध्यमपुरुष प्रयुक्त होता हैए उसके बाद अन्यपुरुष और अन्त में उत्तमपुरुष।
जैसे.
  • तुम, वह और मैं जाऊँगा।
4. आंसू हस्ताक्षर होश भाग्य शब्दों का प्रयोग सदैव बहुवचन में होता है।
  • उसने प्राण त्याग दिए ।
  • मेरी आखों में आंसू आ गए।
  • राधा की सुंदरता को देख कर होश उड गए ।
  • उसका भाग्य अच्छा है।
5.यदि वाक्य में अनेक कर्ताओं के बीच विभाजक समुच्चयबोधक अव्यय श्याश् अथवा श्वाश् रहे तो क्रिया अन्तिम कर्ता के लिंग और वचन के अनुसार होगी।जैसे.
  • घनश्याम की पाँच दरियाँ वा एक कम्बल बिकेगा।
  • हरि का एक कम्बल या पाँच दरियाँ बिकेंगी।
  • मोहन का बैल या सोहन की गायें बिकेंगी।
6. कर्ता का लिंग अज्ञात होने पर क्रिया पुल्लिंग होती है।
  • कौन आया है।
  • वहॉ कोई खडा है।
  • कहॉ जाना है।
7  जहॉ आदर या सम्मान का भाव  दर्शाया जाता है वहॉ एकवचन कर्ता के साथ भी क्रिया का बहुवचन में प्रयोग होता है।
  • चाचा जी कल आ रहे है।
  •   पिताजी खाना खा रहें है।
8. एक से अधिक कर्ता विभक्ति रहित हो और अंत में समूहवाचक शब्द हो तो क्रिया बहुवचन में होगी
  • राम राधा श्याम सब जा रहे है।
  • पूनम रीना परिवार में रहतें है।विशेषण और विशेष्य का  अन्वय
1 अगर वाक्य में एक से अधिक विशेष्य हो तो विशेषण अपने निकट विशेष्य के अनुसार होगा
  •  काली गाय सफेद दूध  लाओ।
  • सफेद दूध काली गाय लाओ।
  • काली साडी लाल कुर्ता लाओ।
  • लाल कुर्ता  काली साडी लाओ।
2. अकारांत विशेषण विशेष्य के लिंग वचन के अनुसार बदलते है
  •  तुम सफेद धोती या पजामा पहनो।
  • आप काली साडी पहनो।

वचन  और लिंग का अन्वय

क संबंध कारक रूप का लिंग,वचन संबंधी के अनुसार होता है। जैसे-
  • यह मेरी कमीज है।
  • वह सोहन की पत्नी है।
  • यह श्याम का बेटा है।
  • जॉन का खिलौना टूट गया ।
यदि एक ही वाक्य में भिन्न भिन्न लिंग और वचन के अनेक संबंधी हों तो क्रिया पुलि्ंलग और बहुवचन में होती हैं, जैसे
  •  मेरी बहन के पुत्र, पुत्री, और पुत्रवधू मुबंई गए हुए है।
  • आजकल मेरे भाई की बेटी और दामाद आए हुए हैं।

4.संज्ञा और सर्वनाम का अन्वय

1-वाक्य में सर्वनाम का वचन उस संज्ञा के वचन के अनुसार होता है। जिस के स्थान पर वह प्रयुक्त हुआ है।
  • रोहन ने कहा मै। पत्र लिखूंगा।ः- एकवचन
  • छात्रों ने कहा हम खेल खेलेंगें -ः बहुवचन
2- सर्वनाम में उसी संज्ञा के लिंग और वचन होते हैंए जिसके बदले वह आता हैय परन्तु कारकों में भेद रहता है।
  • रोहन  ने कहा कि मैं कल जाऊँगा।
  • राधिकाने कहा कि मैं यहीं रूकूँगी।
 3.संपादकए ग्रंथकारए किसी सभा का प्रतिनिधि और बड़े.बड़े अधिकारी अपने लिए श्मैंश् की जगह श्हमश् का प्रयोग करते हैं।
  • हम प्रधानमंत्री जी द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करेंगें।
  • .हम सभी मोदी जी का  सर्मथन करते है।
  • देश में आए संकटों का सामना हम सभी मिलकर करेंगें।
 4. संज्ञाओं के बदले का एक सर्वनाम वही लिंग और वचन लेगा जो उनके समूह से समझे जाएँगे।
  • रोहन और राधिका पार्क खेलने गए है लेकिन वे जल्दी ही आएॅगे
  • .देशवासियों ने जो मेहनत की है। उसका वर्णन नही किया जा सकता है।
5.  तु का प्रयोग अनादर और प्यार के लिए होता है।
जैसे.
रे नृप बालक, कालबस बोलत तोहि न संभार। धनुही सम त्रिपुरारिधनु विदित सकल संसार।।
गोस्वामी तुलसीदासद तोहि. तुझसे
  • अरे मूर्ख ! तू यह क्या कर रहा है -अनादर के लिए
  • अरे बेटा, तू मुझसे क्यों रूठा है -प्यार के लिए
  • तू धार है नदिया की, मैं तेरा किनारा हूँ।
 मध्यम पुरुष में सार्वनामिक शब्द की अपेक्षा अधिक आदर सूचित करने लिए किसी संज्ञा के बदले ये प्रयुक्त होते हैं.
  •  पुरुषों के लिए – महाशय, महोदय, श्रीमान्, महानुभाव, हुजूर, हुजुरवाला, साहब, जनाब इत्यादि
  • स्त्रियों के लिए – श्रीमती, महाशया, महोदया, देवी, बीबीजी आदि।
 आदरार्थ अन्य पुरुष में”आप” के बदले ये शब्द आते हैं.
  •  पुरुषों के लिए – श्रीमान्, मान्यवर, हुजूर आदि।
  • स्त्रियों के लिए – श्रीमती, देवी आदि।

वाक्य -रचना :-

वाक्य शब्दों या पदों का मात्र समूह नहीं होता है। प्रत्येक पद किसी-ना किसी संबंध से परस्पर जुडा रहता है। यह संबंध ही पदो ंके समूह को वाक्य का रूप प्रदान करता है।
इस संबंध  को दो प्रकार से समझा जा सकता है-
1 पदक्रम
2 अन्विति

पदक्रम (ORDER )

वाक्य में कर्ता, कर्म, पूरक, क्रिया, क्रिया-विशेषण आदि पद स मान्य रूप से जिस क्रम में आते है, उसकी पदक्रम कहते है।
किसी वाक्य के सार्थक शब्दों के स्थान रखने की क्रिया को क्रम अथवा पदक्रम कहते हैं। इसके कुछ सामान्य नियम इस प्रकार हैं.
1. पदक्रम सभी भाषाओं में एक जैसा नहीं होता है।हिंदी भाषा में समान्य पदक्रम -कर्ता, कर्म, क्रिया है। अर्थात पहले कर्ता आता है, फिर कर्म और अंत में क्रिया पद आता है।
  • उदहारण के लिएः- सचिन पत्र लिखता है।
उपयुर्क्त वाक्य में सचिन कर्ता,है। पत्र कर्म है, और लिखता है क्रिया पद है।
2. हिंदी वाक्य रचना में  पदक्रम का बडा ही महत्व है।पदक्रम में थोडा सा परिवर्तन हो जाने पर अर्थ का अनर्थ होने की सम्भावना रहती  है।
  • उदहारण के लिएः- रवि कमल को पीटता है।
उपयुर्क्त वाक्य में संज्ञापदों का क्रम उलट देने पर वाक्य बनेगा -कमल  रवि को पीटता है।
इससे मूल वाक्य का अर्थ ही बदल जाएगा इसी प्रकार पीटता है कमल को रवि यह वाक्य अस्पष्ट है। और कोई अर्थ नहीं है। इसलिए वाक्य रचना में उचित पदक्रम का  विशेष ध्यान रखना चाहिए .
3. उद्देश्य या कर्ता के विस्तार को कर्ता के पहले और विधेय या क्रिया के विस्तार को विधेय के पहले रखना चाहिए।
  • जैसे. अच्छे लड़के धीरे.धीरे पढ़ते हैं।
4. जिन वाक्य में दो कर्म होते है। उनमें प्रायः पहले गौण कर्म या सम्प्रदान और बाद में मुख्य कर्म आता है।
जैसे
  • -गीता ने राम को पत्र लिखा।
इस वाक्य में राम गौण कर्म तथा पत्र मुख्य कर्म है।
5. सबोधन तथा और विस्मयसूचक शब्द वाक्य से पहले प्रयुक्य होते है।
जैसे –
  • 1. आह कितना सुंदर फूल है।
  • 2. भाईयों आपकी दशा सुधार दूॅगा ।
6. कई बार पदक्रम में परिवर्तन करने से अर्थ तो नहीं बदलता किंतु वाक्य के जिस अंश पर हम बल देना चाहते है वह थोडा बदल जाता है। अतः वाक्य के किसी पद पर विशेष बल देने के लिए हम हिंदी में कभी कभी उस पद को पहले स्थान पर ले आते है या पद क्रम में थोडा थोडा हेर फेर कर देते है।
अन्य शब्दों में यह कह सकते हैकि यदि “न” क्या का अर्थ व्यक्त करे तो अंत में प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग करना चाहिए और ” न” वाक्यान्त में होगा। जैसे :-
  • 1. आपको कहॉ जाना है?
  • 2. कहॉ जाना है आपको ?
7.  विशेषण विशेष्य या संज्ञा के पहले आता है।  जैसे.
  • मेरा सफेद घोडा कहीं चला गया है।
8. क्रियाविशेषण क्रिया के पहले आता है।जैसे
  • वह तेज चलता है।
9.  पदक्रम में अधिकतर अशुद्धिया विशेषणों के प्रयोग में होती है।
  • 1क).. यहॉ शुद्ध गाय का दूध मिलता है।- अशुद्ध
  • ख.) यहॉ गाय का शुद्ध दूध मिलता है।-शुद्ध
  • 2 क. मुझे एक चाय का पैकेट चाहिए।- अशुद्ध
  • ख. मुझे चाय का एक पैकेट चाहिए।- शुद्ध
10. क्रम संबंधी कुछ अन्य नियम
 कर्ता के बाद कर्म आता है। जैसे.
  • मोहन जाता है।   मोहन कर्ता जाता है क्रिया
ऽ कर्म अथवा पूरक, कर्ता और क्रिया के बीच में आता है। जैसे.
  • राम ने पत्र लिखा।  पत्र कर्म
ऽ दो कर्म प्रधान हों तो गौण कर्म का स्थान मुख्य कर्म से पहले आता है। जैसे.
  • सोहन ने मोहन को गौण कर्म आम खिलाया ।
ऽ यदि पूरा वाक्य ही प्रश्नवाचक हो तो ऐसे शब्द ;प्रश्नसूचक- वाक्यारंभ में रखना चाहिए।जैसे.
  • क्या आपको यही बनना था घ्
ऽ यदि वाक्य में एक कर्म और एक पूरक हो तो पूरक बाद में आता है। जैसे.
  • राकेश ने रस्सी कर्म को सॉप पूरक समझा
ऽ संबंध वाचक पद संबंधित विशेषण से पहले आता है। जैसे.
  • मेरा छोटा भाई नवीं कक्षा में पढता है।
ऽ क्रिया विशेषण का स्थान प्रायः संबंधित किया से पहले से किया जाता है।जैसे.
  • राम आज आ गया
  • वह तेज दौडता है।
ऽ समुच्चयबोधक अव्यय जिन शब्दों या वाक्यों को जोडते हैं,उनके बीच में आते है। जैसे.
  • अर्जुन तो आ गया पर भीम नहीं आया ।
  • राम और श्याम पढ रहे है।
ऽ सबोधन और विस्मयदिबोधक पद प्रायः वाक्य के आंरभ में आते है। जैसे.
  • अरे आप कब आए।
  • अहा  कैसा सुंदर दृश्य है।
  • सचिन तुमसे  आशा न थी
ऽ निपात उन्हीं शब्दों के बाद आते हैं जिन पर बल देना हो। जैसे.
  • मै घर ही गया था।
  • मैं ही घर गया था।
  • उसने कुछ भी नहीं दिया।
  • उसने भी कुछ नहीं दिया।

अन्विति

जब वाक्य कें किसी एक सज्ञांपद के लिंग , वचन , कारक आदि के अनुसार किसी दूसरे पद में समान परिवर्तन हो जाता है। तो उसे अन्विति कहते है।
हिंदी वाक्य में कर्ता,कर्म के साथ क्रिया का , संज्ञा या सर्वनाम के साथ विशेषण का तथा संबंध कारक का संबंधी सं अन्वय होता है।

कर्ता और कर्म तथा क्रिया के बीच अन्विति

क…. कर्ता  — क्रिया अन्विति
1.-यदि कर्ता और  कर्म के बाद किसी परसर्ग का प्रयोग न हुआ हो तो क्रिया की अन्विति कर्ता के लिंग , कारक, वचन, और पुरूष के अनुसार होता है।  जैसे :-
  •  शंशाक दूध पीता है।
  • 2. नीरजा दूध पीती है।
  • 3.लडके दूध पीते है।
  • 4. लडकियां दूध पीती े है।
2.- यदि वाक्य में कर्ता के बाद परसर्ग कारक चिह्न का प्रयोग न हुआ हो और कर्म के बाद परसर्ग का प्रयोग हो तब भी क्रिया की अन्विति कर्ता के लिंग- वचन पंरूष आदि के अनुसार होगी।
  • 1. मोहन गीता को डांटता है
  • 2.गीता कुत्ते को डराती है।
  •  3. लडकियॉ बिल्ली को भगा रही है।
  • 4. लडके कुत्ते को मार रहे है।
 ख-कर्म . क्रिया अन्वितिः-
यदि कर्ता के बाद ने अथवा कोई और परसर्ग हो तो क्रिया की अन्विति कर्ता के साथ नहीं होती। इस स्थ्ति में कर्म या पूरक के बाद किसी परसर्ग का प्रयोग न हुआ हो तो क्रिया की अन्विति कर्म या पूरक के लिंग, वचन, पुरूष आदि के अनुसार होगी, जैसे :-
  •   अहमद ने रोटी खाई।  -कर्म क्रिया
  •   सलमा ने दूध पिया।–कर्म क्रिया
  •  थॉमस ने चिळयॉ लिखी।-कर्म क्रिया
  •  मेरी ने सभी फल खाए -कर्म क्रिया   ख
  •  बच्चों को तेज बुखार था -पूरक क्रिया
  • . मुझको नींद आ रही -पूरक क्रिया
  • बच्चों और मुझ के साथ लगने पर भी दोनों ही  -कर्ता कारक है
ग- निरपेक्ष अन्विति :-
यदि वाक्य में कर्ता और कर्म दोनों के बाद परसर्ग हो तो क्रिया की अन्विति न तो कर्ता के साथ होगी और न ही कर्म के साथ होगी इस स्थिति में क्रिया  हमेशा एकवचन पुलि्र्ंग में होती है।  यही अन्विति निरपेक्ष है। उदहारण के तौर पर
  •  रीना ने नौकर को डॉटा
  • . मैंने रीना को डराया
  •  अध्यापक ने सभी छात्रों को डराया
  •  कुत्तों ने बिल्लियों को भगाया
संज्ञा. सर्वनाम अन्विति
वाक्य  में प्रयुक्त सर्वनामों के लिए वचन उन्हीं सज्ञाओं के अनुसार होता है। जिनके स्थान पर सर्वनाम का प्रयोग होता है।  जैसे
  • मोहन मेरा भाई है। वह मेरे स्कूल में पढता है।
  • मेरी बहन दिव्या है। वह आज स्कूल नहीं आई।
विशेषण-विशेष्य अन्विति
1 यदि विशेष्य संज्ञा  के पहले या बाद में विशेषण का प्रयोग हो तो आकारांत विशेषण विशेष्य के लिंग , वचन , के अनुसार प्रभावित होगा, जैसं – काला घोडा, काली बकरी , बडे लडके बडा लडका, बडी लडकी।
2. अन्य सभी विशेषण विशेष्य के लिंग वचन आदि के अनुसार न बदलकर एक समान ही रहेगें। जैसे – सुंदर लडका, सुंदर लडकी, सुंदर लडके, सुंदर लडकियॉ।

वाक्य के घटक

वाक्य के प्रमुख घटक कर्ता और क्रिया है।  जिसमें लघुत्तम सरल वाक्य में भी क्रिया और कर्ता दो आवश्यक घटक होते है।  जैसेः-
  • रविकांत सो रहा है।
  • रविकांत सेब खा रहा है।

वाक्य में सोना क्रिया और सोने वाले व्यक्ति रविकांत की भूमिका अनिवार्य है।

इसी प्रकार वाक्य में खाना क्रिया के साथ खाने वाले व्यक्ति रविकांत तथा खाई जाने वाली वस्तु सेब दोनो की भूमिका अनिवार्य है।अतः खाना क्रिया से बने वाक्य में क्रिया के अतिरिक्त कर्ता और कर्म अनिवार्य  घटक है।

इस प्रकार वाक्य में जिन घटकों के न रहने से वाक्य अधूरा होता है। और भाव रूपष्ट नहीं होता है,वह अनिवार्य घटक कहलाता है।वाक्य में अनिवार्य घटक के अलावा कुछ ऐसे घटक भी घटक होते  है। जिनके वाक्य में होने से अर्थ अधिक स्पष्ट हो जाता है। किंतु इनके न होने पर वाक्य व्याकवरणिक दृष्टि से अधूरा नहीं माना जाता है। ऐसे घटक को ऐच्छिक घटक कहते है। क्योंकि वाक्य में इन्हें रखना वक्ता की इच्छा पर निर्भर है, जैसे –

  • 1. राजेश्वर अमित के लिए पुस्तक लाया है।
  • 2. पूर्वी कल शाम ो सुदेश के साथ कोलकता जाएगी।
उपर्युक्त वाक्य तके अमित के लिए और कल शाम को सुदेश के साथ घटक रखना आवश्यक नहीं है। इन घटकों को हटा  देने से अधूरापन नहीं रहता। अतः ये ऐच्छिक घटक होते है।

वाक्य के लिए कुछ महत्वपूर्ण अन्य बातें या नियम

1). वचन संबंधी वाक्य नियम :-

क).-वचन संबंधी वाक्य में  कुछ शब्द एकवचन में और कुछ शब्द  केवल बहुवचन में होते है। जैसे :- प्रत्येक. किसी कोई आदि इन्हें बहुवचन में नहीं पढ सकते है।
ख).- हुये, हुए, हुयी, हुई का शुद्ध प्रयोग- मूल शब्द ‘हुआ’ है, एकवचन में। इसका बहुवचन होगा ‘हुए’; ‘हुये’ नहीं ‘हुए’ का स्त्रीलिंग ‘हुई’ होगा; ‘हुयी’ नहीं।
ग). -कुछ वाक्य में ऐसे शब्द भी है। जो दोनों वचनों में प्रयोग किए जाते है जैसे – ‘‘सब और लोग इन दोनों शब्दों में दोनों वचनों का प्रयोग किया है।
नोट :- ‘‘सब‘‘ में कभी-कभी समुच्चय रूप का प्रयोग होता  है इसलिए एकवचन  में है।
उदहारण  के लिए :-  आप अपना सब काम गलत करते है।
यदि काम की अधिकता का बोध हो तो सब  का प्रयोग बहुवचन में होगा। जैसे.
सब यही कहते हैं।
हिंदी में सब समुच्चय और संख्या. दोनों का बोध कराता है।
‘‘लोग‘‘ बहुवचन शब्द है। तथा बहुवचन में ही प्रयुक्त किया जाता है। लोग अन्धे नहीं हैं। लोग ठीक ही कहते हैं।
कभी.कभी सब लोग का प्रयोग बहुवचन में होता है।   लोग-कहने से कुछ व्यक्तियों का और सब लोग कहने से अनगिनत और अधिक व्यक्तियों का बोध होता है। जैसे.
सब लोगों का ऐसा विचार है। सब लोग कहते है कि गाँधीजी महापुरुष थे।
2. संज्ञा तथा क्रिया सम्बंधी वाक्य  नियम
क).- यदि व्यक्तिवाचक संज्ञा कर्ता है तो लिंग व वचन दोनों ही क्रिया के अनुसार होगें।
कशी सदा भारतीय संस्कृति का केन्द्र रही है।( यहाँ कर्ता स्त्रीलिंग है।)
पहले कलकत्ता भारत की राजधानी था।(यहाँ कर्ता पुंलिंग है।)
उसका ज्ञान ही उसकी पूँजी था।(यहाँ कर्ता पुंलिंग है।)
ख).- यदि भाववाचक संज्ञा है। तो भाव वाचक की क्रिया सदा अन्य पुरूष पुलि्र्लंग एकवचन में रहता है।
उदहारण के तौर पर :-
गर्मियों में छत पर सोया जाता है। -जन समाज भावाचक संज्ञा
कम्प्यूटर चला लिया जाता है।
3. समभिन्नार्थक सम्बंधी वाक्य नियम तथा शुद्ध प्रयोग
1).जिस शब्द का अन्तिम वर्ण ‘या’ है उसका बहुवचन ‘ये’ होगा। ‘नया’ मूल शब्द है, इसका बहुवचन ‘नये’ और स्त्रीलिंग ‘नयी’ होगा
उदहारण के तौर
• नए, —-नये,
• नई,— नयी

2). मूल शब्द ‘गया’ है।  नियम के अनुसार ‘गया’ का बहुवचन ‘गये’ और स्त्रीलिंग ‘गयी’ होगा।
उदहारण के लिए
• गए,—- गये,
• गई, —, गयी

3).  मूल शब्द ‘हुआ’ है, एकवचन में है  इसका बहुवचन होगा
‘हुए’; ‘हुये’  ‘हुए’ का स्त्रीलिंग ‘हुई’ होगा; ‘हुयी’ नहीं।
उदहारण के लिए
• हुये—-, हुए,
•हुयी,—- हुई

4).  किए, किये, का शुद्ध प्रयोग- ‘
किया’ मूल शब्द है; इसका बहुवचन ‘किये’ होगा।

5).-  लिए, लिये, का शुद्ध प्रयोग-
लिए, लिये दोनों  -ही शुद्ध रूप हैं।  लेकिन जहाँ अव्यय व्यवहृत होगा वहाँ ‘लिए’ आयेगा  क्रिया के अर्थ में ‘लिये’ का प्रयोग होगा; क्योंकि इसका मूल शब्द ‘लिया’ है।
उदहारण के लिए
मेरे लिए उसने जान दी।
उसने मेरे खाने के लिए मिठाई ली
6).- चाहिये, चाहिए का शुद्ध प्रयोग-
‘चाहिए’ अव्यय है। अव्यय विकृत नहीं होता। इसलिए ‘चाहिए’ का प्रयोग शुद्ध है;   ‘चाहिये’ का नहीं।

Sangya in Hindi

Sangya in Hindi

संज्ञा(Noun)

संज्ञा की परिभाषा(Defination of Noun )

” संज्ञा” और “नाम”  पर्याय शब्द है। जो शब्द संज्ञा के नाम का बोध कराते है। वह संज्ञा कहलाता है। निम्नलिखित उदहारणों के द्वारा संज्ञा को समझते है।

1).महेश कल आगरा जाएगाा
2).इस दीवार की उॅचाई कितनी है?
उपर्युक्त वाक्य में ‘महेश; किसी व्यक्ति का नाम है।
-‘आगरा’ स्थान का नाम है।
-‘दीवार’ किसी वस्तु का नाम है।
-‘ऊंचाई‘ से ऊंचे होने का बोध प्रकट होता है।

ये सभी पद संज्ञा है। संज्ञा पद का अर्थ ही —नाम ।

अर्थात हम कह सकते है। कि–संज्ञा को ‘नाम’ भी कहा जाता है। किसी प्राणी, वस्तु ,स्थान ,भाव आदि का ‘नाम’ ही उसकी संज्ञा कही जाती है ।

दूसरों शब्दों में– किसी का नाम ही उसकी संज्ञा है तथा इस नाम से ही उसे पहचाना जाता है। संज्ञा नहीं हो तो पहचान अधूरी है। और भाषा का प्रयोग भी बिना संज्ञा के सम्भव नहीं है।

सरल शब्दों में –संज्ञा  वे शब्द हैं जो किसी व्यक्ति प्राणी वस्तु स्थान भाव आदि के नाम के रूप में प्रयुक्त होते है।उन्हें संज्ञा कहते है। जैसे :-राकेश, घोडा, गंगा , हैदराबाद, सेब ,मेज, चौडाई ,बुढापा आदि ।

संज्ञा का अर्थ (Meaning of Noun)

जिन विकारी शब्दों से किसी व्यक्ति स्थान प्राणी गुण काम भाव  आदि का बोध होता है,उसे संज्ञा कहते है

अर्थात हम कह सकते है:-ऐसे शब्द जो हमें किसी व्यक्ति/ प्राणी (पशु पक्षियों) के नाम का, स्थान (Place-जगह) के नाम का, वस्तु(Things) के नाम, या किसी सजीव के भाव(Emotion) का ज्ञान या बोध कराए उसे संज्ञा कहते है। जैसेः

  •  व्यक्तियों/प्राणियों के नाम :- दीवान ,महिला, महात्मा गॉधी ,कर्मचंद गांधी ,पुतलीबाई ,मोर,घोड़ा, अनिल, किरण, जवाहरलाल, नेहरू आदि।
  •  स्थानों के नाम :- पोरबंदर, रियासत, देश, काठियावाड , कुतुबमीनार, नगर, भारत, मेरठ आदि
  • स्वतंत्रता  आंदोलन :- वीरता, बुढ़ापा, मिठास आदि
  • वस्तु (जाति) के नाम:- कार मिठाई गंगा गोमती

यहाँ ‘वस्तु’ शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में हुआ है, जो केवल वाणी और पदार्थ का वाचक नहीं, वरन उनके धर्मो का भी सूचक है।

साधारण अर्थ में ‘वस्तु का प्रयोग इस अर्थ में नहीं होता। अतः वस्तु के अन्तर्गत प्राणी, पदार्थ और धर्म आते हैं। इन्हीं के आधार पर संज्ञा के भेद किये गये हैं।

संज्ञा पदों की  पहचान

निम्नलिखित लक्षणों आधार पर  संज्ञा पदों को  पहचाना जा सकता है। 

–कुछ शब्द प्राणिवाचक होते है। और कुछ शब्द अप्राणिवाचक होते है। जिनके द्वारा हम संज्ञा की पहचान कर सकते है।  उदहारण के लिए :

  •  प्राणिवाचक हैः–  बच्चा, भैंस ,चिडिया, राकेश ,आदमी, पिता, पुत्र आदि
  •  अप्राणिवाचक है:-किताब, मकान, रेलगाडी ,रोटी, पर्वत ,नदी, देश, गिलास  आदि 

– कुछ संज्ञा शब्दों की पहचान दो गणनीय रूपों में की जा सकती है।-जैसे की जिन संज्ञा शब्दों की गणना या गिनती की जा सकती है। उन्हें गणनीय संज्ञा कहते है जिन संज्ञा शब्दों की गणना या गिनती  नहीं की जा सकती है। उन्हें अगणनीय संज्ञा कहते है

 उदहारण के लिए :

  •  गणनीय संज्ञा  :- आदमी ,कुत्ता, गेंद, पुस्तक, केला की गणना की जा सकती है। इसलिए यह गणनीय संज्ञाएं है।
  •  अगणनीय संज्ञा  :- दूध  मिठास तेल हरियाली  पानी  हवा प्रेम की गणना नहीं  की जा सकती है। इसलिए यह अगणनीय संज्ञाएं है।
– संज्ञा पद के बाद परसर्ग कारक चिह्न ने को से  के लिए में पर आदि आ सकते है। जैसे :-
  • राम ने मोहन को लडकी के लिए चाकू से दिल्ली में उचॅाई पर आदि।
– संज्ञा  पद से  पूर्व विशेषण का प्रयोग हो सकता है। जैसे
  • छोटी कुरसी काला घोडा अच्छा लडका आदि ।
– परसर्ग या विशेषण न होने पर भी संज्ञा पद किसी व्यक्ति वस्त स्थान या भाव के नाम के कारण पहचाना जा सकता है।
उदहारण के तौर परः-
  • मोहन जाता है।
  • गरिमा फल खातीहै।

संज्ञा के कार्य(Function of Noun)

वाक्य में संज्ञा पद कर्ता कर्म पूरक करण अपादान अधिकरण आदि कई प्रकार की भूमिकाएॅ निभाते है। इन सभी कारकों का अपना अपना अलग महत्व होता है। इनको कुछ उदहारण के द्वारा समझते है।
  •  चित्रिशा खेल रही है। —कर्ता के रूप में
  • वह पुस्तक पढ रहा है। –कर्म के रूप में
  • सुरेश विद्यार्थी है। —- पूरक के रूप में
  • मैने चाकू से सेब काटा —कारण के रूप में

संज्ञा के भेद(Kind of Noun)

अध्ययन  की दृष्टि से मुख्य रूप से संज्ञा के तीन भेद होते है

1. व्यक्तिवाचक (Proper Noun )
2. जातिवाचक (Common Noun)
3. भाववाचक(Abstract Noun)
संज्ञा पाश्चात्य प्रभाव के कारण संज्ञा के दो अन्य भेद भी माने जाते है। –
4. समूहवाचक (Collective Noun)
5. द्रव्यवाचक(Material Noun)

मुख्य रूप से इन दोनो भेदों को जातिवाचक संज्ञा के अंर्तगत समाहित किया गया है या किया जा सकता है।

1).व्यक्तिवाचक संज्ञा (Proper Noun in Hindi )

-जिस शब्द से किसी विशेष व्यक्तिए वस्तु या स्थान के नाम का बोध हो उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं।

 उदहारण के तौर परः-   अकबर

  • विशेष प्राणियों के नामः- ऐरावत  (हाथी का नाम) कामधेनु (गाय कस नाम )आदि।
  • विशेष स्थानों के नामः- मुबई ,शहर, विशेष,  यूरोपीयन
  • विशेष वस्तुओं के नामः– चंदन, चंदमामा, रामचरितमानस, लोटस, टैंपल, महाभारत आदि।
  • विशेष दिशाओं के नाम. पूर्व, पश्र्चिम,   उत्तर ,दक्षिण ।
  • विशेष देशों के नाम. भारत, जापान, अमेरिका, पाकिस्तान,बर्मा।
  • विशेष राष्ट्रीय जातियों के नाम. भारतीय, रूसी, ,अमेरिकी,  एयूरोपी, इटेलियन, फ्रांसीसी
  • विशेष समुद्रों के नाम.  हिन्द महासागर, प्रशान्त महासागर,  भूमध्य सागर , काला सागर, दक्षिणी महासागर
  • विशेष नदियों के नाम. गंगा,  कृष्णा, कावेरी,  गोदावरी ,ब्रह्मपुत्र, बोल्गा, सिन्धु।
  • विशेष पर्वतों के नाम. हिमालय, विन्ध्याचल, अलृ कनन्दा, कराकोरम।
  • विशेष नगरों, चौकों और सड़कों के नाम. वाराणसी, गया, चाँदनी, चौक, हरिसन रोड, अशोक मार्ग।
  • विशेष पुस्तकों तथा समाचारपत्रों के नाम. रामचरितमानस, ऋग्वेद ,धर्मयुगए,इण्डियन नेशन, आर्यावर्त।
  • विशेष ऐतिहासिक युद्धों और घटनाओं के नाम.   1857 की क्रांति पानीपत की पहली लड़ाई, सिपाही-विद्रोह, अक्तूबर-क्रान्ति।
  • विशेष दिनों. महीनों के नाम.   सोमवार, मंगलवार, बुधवार,  अप्रैल , मई  ,अक्टूबर, नवम्बर
  • विशेष त्योहारों, उत्सवों के नाम. होली, दीवाली, रक्षाबन्धन, विजयादशमी।

2). जातिवाचक संज्ञा ((Common Noun in Hindi)):-

हम व्यक्ति किसी न किसी जाति या समुदाय का सदस्य होता है।  जैसे :

  • सूरदास राणा प्रताप प्रेमचंद आदि सभी शब्द व्यक्तियों के नाम है।
  • गांडीव तथा सुदर्शन वस्तुओं के नाम है
  • ऐरावत कामधेनु आदि प्राणियों के नाम हैं तथा
  • कानपुर तथा शिमला आदि स्थानों के नाम है।

अतः हम कह सकते हैः– वे शब्द जो किसी विशेष व्यक्ति ,वस्तु ,प्राणी ,स्थान आदि के वर्गों में आने वाली किसी न किसी जाति का बोध कराते है। जैसे :-

  • बच्चा, जानवर, नदी, अध्यापक, बाजार, गली, पहाड़, खिड़की, स्कूटर आदि शब्द एक ही प्रकार प्राणी, वस्तु और स्थान का बोध करा रहे हैं। इसलिए ये जातिवाचक संज्ञा है।

जो  संज्ञा शब्द किन्ही एक जैसे प्राणियों वस्तुओं या स्थानों का बोध कराते है। वे जाति वाचक संज्ञा शब्द कहे जाते हैं।

सरल शब्दों में – जिस  संज्ञा  शब्द या पद से किसी विशेष  एक जाति के सभी प्राणियों अथवा वस्तुओं का बोध हो,उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे :-आदमी, गाय, शेर, शहर, मेज, नदी, पहाड ,पुस्तक आदि

  • विशेष व्यक्तियों के नाम :- दुल्हन, पुरूष ,लडका, अध्यापक ,कवि आदि ।
  • विशेष स्थानों के नाम :- गॉव ,शहर, मोहल्ला ,पहाड ,बाजार, छत, देश, महाद्वीप ,मैदान, गली ,चौपाल  आदि ।
  • विशेष प्राण्यिां के नाम :-लंगूर, कौआ, हिरन, तोता ,मोर, मुरगा, चातक ,मछली, सॉप, आदमी, लडकी, महिला आदि।
  • विशेष वस्तओुं के नामः-कपडा ,खिलौना, पिज्जा, लैंप ,चौपड, चाट ,गोलगप्पा ,समोसा, चावल ,गेंहू ,तेल ,आटा ,कार साइकिल आदि ।
जाति वाचक संज्ञा के कुछ अन्य उदहारण ध्यान से समझते है।

उदहारण के लिए :- लड़का, पशु पक्षियों वस्तु, नदी, मनुष्य, पहाड़ आदि। जाति वाचक संज्ञा है।

  • लडका  :- राजेश, सतीश, दिनेश आदि सभी लडकों  का बोध होता है।
  • पशु पक्षियों :-  गाय, घोड़, कुत्ता आदि सभी जाति का बोध होता है।
  • वस्तु :-मकान, कुर्सी, पुस्तक, कलम आदि वस्तुओं का बोध होता है।
  • नदी:– गंगा ,यमुना, कावेरी आदि सभी नदियों का बोध होता है।
  • मनुष्य:-संसार की मनुष्य.जाति का बोध होता है।
  • पहाड़ :-कहने से संसार के सभी पहाड़ों का बोध होता हैं।
नोटः- अग्रंजी व्याकरण के प्रभाव से हिंदी के कुछ विद्ववानों  ने जतिवाचक संज्ञा के दो भेद मानते है। 
जतिवाचक संज्ञा :-शब्दों के अंर्तगत दो तरह के शब्द आते है।-
क.. वे  शब्द जो ‘समूह या समुदाय” का(Group) का बोध कराते है जैसे:-
  • -सेना, झुंड, भीड, सभा,  कक्षा, घोडा आदि तथा
ख… वे  शब्द जो  “द्रव्य पदार्थों”(Materials) का बोध कराते है जैसे :-
  • सोना, चॉदी, पीतल ,लोहा, गेहूॅ, चना, मक्का, लकडी, प्लास्टिक, सूट ,उन आदि ।

अत: जातिवाचक संज्ञा शब्दों के दो उपभेद किए जाते है।

क). समूहवाचक/ समुदायवाचक संज्ञा(Collective Noun)

जो जाति वाचक संज्ञा शब्द किसी समूह या समुदाय का बोध कराते है। समूहवाचक संज्ञा शब्द कहलाते है।-जैसे

  • कक्षा, पुलिस ,सेना ,दरबार, समाज ,भीड, टोली, सम्मेलन, सभा, बैठक आदि ।
दूसरें शब्दों में:-  जो संज्ञा शब्द  किसी एक व्यक्ति का वाचक न होकर समूह/समुदाय के वाचक होते हैऔर  इनमें उनके समूह का ज्ञान होता है उन्हें समूहवाचक/ समुदायवाचक संज्ञा कहते है।
जैसे
  • समिति, परिवार, ताश, आयोग, वर्ग ,अधिकारी, टी-सेट, आर्केस्टा आदि।

विशेष 

समूहवाचक संज्ञा शब्द में  एक से अधिक  सदस्य होते है। किंतु इन शब्दों का प्रयोग हमेशा एकवचन में होता है। जैसे कीः-

  • कक्षा समाप्त हो चेकी है।
  • गलत काम करने की अनुमति कोई समाज पहीं देता है।
  • पुलिस पहॅुचने वाली है।
  • सम्मेलन तीन दिन चलेगा
  • मेले में बहुत भीड है।
  • मैं बैठक में भाग नहीं लूंगा।

नोट. ये शब्द सजातीय प्रणियों/वस्तुओं के समूह को ईकाई के रूप में प्रकट करतें है। 

द्रव्य वाचक संज्ञा (Material Noun in Hindi):-

इस वर्ग में द्रव्य /पदार्थ का बोध कराने वाले जाति वाचक संज्ञा शब्द आते है। इनकी सबसे बडी पहचान यह है कि इन पदार्थों से तरह तरह की वस्तुंए बनाई जाती है। जैसेः-
  • प्लास्टिक से खिलौने
  • स्टील से बर्तन
  • अनाज से आटा
  • सोने चॅादी से आभूषण
  • लकडी से फर्नीचर
  • कागज से किताबें आदि बनाए जाते है।
अतः  सरल शब्दों में कह सकते है किः– द्रव्य पदार्थों वस्तुओं आदि का बोध कराने वाले जातिवाचक संज्ञा शब्द द्रव्यवाचक संज्ञा कहलाते है।जैसेः-
  •  ठोस पदार्थ   :- लकडी कोयला रबर पत्थर आदि ।
  •  धातुओं के नाम: -सोना चादी तॉबा लोहा उन आदि।
  •  द्रव पदार्थ :- तेल घी दही  शरबत चाय  पेप्सी आदि
  •  गैसीय पदार्थः- धुऑ आक्सीजन आदि ।
दूसरे शब्दों मेंः- किसी पदार्थ सामग्री या द्रव्य का बोध कराने वाले शब्दों को द्रव्यवाचक संज्ञा कहते है। जैसेः-
  • सोना चॉदी लकडी  चावल अन्न तेल आदि ।

नोट :- द्रव्यवाचक संज्ञाओं की गणना नहीं की जा सकती है। इन्हें नापा या तोला जाता है। 

3. भाववाचक संज्ञा (Abstract Noun in Hindi)

कुछ संज्ञा शब्द किसी वस्तु या व्यक्ति के शील स्वभाव गुण दोष भाव अवस्था आदि जैसी सूक्ष्म स्थितियों का बोध कराते हैं ऐसे संज्ञा  शब्दो को भाववाचक संज्ञा शब्द कहते है। जैसे

  • प्यार सुंदरता सत्य असत्य जन्म मृत्यु ईमानदारी बेईमानी जवानी बुढापा लंबाई अच्छाई  बुराई सुख दुख घृणा क्रोध भय दया आदि ।

दूसरे शब्दों मे ंकिसी व्यक्ति या वस्तु के गुण-दोष शील स्वभाव धर्म अवस्था आदि का बोध कराने वाले शब्द भाववाचक संज्ञा शब्द कहलाते है। जैसे :-

  • कौआ प्यास से व्याकुल था।
  • मि़त्रता अनमोल है।
  • मन से  शत्रुता का भाव निकाल दों।
  • गरीबी एक अभिशाप  है।
इन वाक्यों में प्यास मित्रता और गरीबी शब्दों से व्यक्ति अथवा प्राण्ी के गुण दोष भाव दशा अवस्था स्वभाव आदि का बोध हो रहा है। अतः ये शब्द भाववाचक संज्ञा है।
सरल शब्दों में कह सकते है:-कि जिन संज्ञा शब्दों से प्राणियों  मनुष्यों और वस्तुओं  के  गुंण दोष स्वभाव अवस्था स्थिति कार्य भाव और दशा आदि का ज्ञान होता है उन्हें भाव वाचक संज्ञा कहते है। जैसे:-
  • ईमानदारी, उत्साह, मानवता, राष्टीयता, बचपन, चोरी, ममता, सहायता, मुस्कान, जीवन आदि ।
  • इन उदाहरणों में  उत्साह से मन का भाव है।
  • ईनानदारी से गुण का बोध होता है।
  • बचपन  जीवन की एक अवस्था या दशा को बताता है।

 अतः उत्साह, ईमानदारी, बचपन आदि शब्द भाववाचक संज्ञाए हैं।

नोट (1) :- भाव वाचक संज्ञाओं को देखा अथवा स्पर्श नहीं किया जा सकता है। इन्हें केवल अनुभव किया जा सकता है। जैसे मित्रता, सरदी ,गरमी, खुशी आदि ।

नोट(2):-भाव वाचक संज्ञाओं को केवल अनुभव किया जा सकता है। उदहारण के लिए इसका संबंध “भूख -प्यास” हो जाता है। इसे हम न तो देख सकते है। और न ही स्पर्श कर सकते है। इन्हें केवल अनुभव कर सकते है।

भाव वाचक संज्ञा शब्दों का वाक्यों में प्रयोग –
  • जवानी  बीती और बुढापा आ गया ।
  • किसी की बुराई-भलाई से दूर रहता है।
  • सुख दुख  मानव जीवन के दो पहिए हैं।
  • ईमानदारी की जिंदगी बेईमानी की जिंदगी से लाख बेहतर होती है।
  • भय और क्रोध  मनुष्य के सबसे बडे शत्रु हैं।
  • सत्य और अंहिसा के बल पर ही यह देश आजाद हो गए ।
हर पदार्थ का धर्म होता है। जैसेः-
  •  पानी में शीतलता
  •  आग में गर्मी
मनुष्य में देवत्व और पशुत्व इत्यादि का होना आवश्यक है।
जिस प्रकार  पदार्थ का गुण या धर्म पदार्थ से अलग नहीं रह सकता। घोड़ा है, तो उसमे बल है, वेग है और आकार भी है। व्यक्तिवाचक संज्ञा की तरह भाववाचक संज्ञा से भी किसी एक ही भाव का बोध होता है। श्धर्म, गुण, अर्थ और भाव प्रायः पर्यायवाची शब्द हैं। इस संज्ञा का अनुभव हमारी इन्द्रियों को होता है और प्रायः इसका बहुवचन नहीं होता।

संज्ञा के भेदों का परिवर्तन/ संज्ञा के विशिष्ट प्रयोग

व्यक्ति वाचक  जातिवाचक और भाववाचक संज्ञाएं कई बार एक दूसरे पर प्रयुक्त हो जाती है।
1. व्यक्ति वाचक संज्ञा  का जातिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग :-  कभी-कभी जातिवाचक संज्ञाओं का प्रयोग व्यक्तिवाचक संज्ञाओं में होता है।  जैसेः-
  • जयचंदो के कारण ही भारत पराधीन हुआ था।
  • आज देश में रावणों की कमी नहीं है।
  • हरिश चंदों की सत्यवादिता और ईमानदारी से ही भारत का सम्मान बना हुआ है। 2
  • इस  देश को नटवरलालों ने ही देश के नेताओं ने भी ठगा है।

इन शब्दों/वाक्यों में जयचंद रावण हरिशचंद शब्द व्यक्तिवाचक संज्ञा है। यहॉ इनका प्रयोग जातिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग किया गया है। क्योंकि इन व्यक्तियों के नाम से उनके विशेष गुणों का बोध होता है।

जयचंद दशद्रोही के रूप में जाना जाता है   राजा  हरिशचंद अपनी सत्यवादिता या निष्ठा के लिए प्रसिद्ध है। रावण अपहरणकर्ता के रूप में कुख्यात है।  नटवर अपनी ठगी के लिए जाना जाता है। इन व्यक्तियों संज्ञाओं के बहुवचन रूप बना देने से जातिवाचक संज्ञा बन गए है।

 2).जातिवाचक संज्ञा का व्यक्ति वाचक संज्ञा के रूप में प्रयोगः

कुछ जाति वाचक संज्ञा शब्दों के अर्थ किसी  व्यक्ति विशेष के लिए रूढ हो जाते है। तब प्रयोग के स्तर पर उस सदंर्भ में वे व्यक्तिवाचक संज्ञा बन जाते है।

सरल शब्दों में:- कई बार जातिवाचक संज्ञा का प्रयोग व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग किया जाता है। 

वर्ग-1 जातिवाचक संज्ञावर्ग-2 व्यक्तिवाचक संज्ञा
1) पूजा के लिए पंडित जी को बुला लाओ1). पंडित जी देश के पहले प्रधानमंत्री बने।
2) सरदार के मरते ही सारी सेना भाग निकली।2). सरदार का नाम लौह पुरूष के रूप मे विख्यात है।
3)कल मंदिर मे महात्मा जी आए थे।3). महात्मा जी के कारण ही हमें आजादी मिली ।
इन वाक्यों में प्रयुक्त पंडित जी शब्द का प्रयोग ‘‘पंडित नेहरू‘‘ के लिए सरदार शब्द का प्रयोग सरदार‘‘ वल्लभ भाई पटेल‘‘ के लिए महात्मा जी शब्द का प्रयोग ‘‘ महात्मा गॉधी ‘‘ के लिए किया गया है। इस तरह इन वाक्यों के स्थूल शब्दों का प्रयोग यक्तिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग किया जाता है।

3). भाव वाचक संज्ञा का जातिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयोगः

जब भाव वाचक संज्ञा  शब्दों का  बहुवचन के रूप में प्रयोग किया जाता है। तो वे जाति वाचक संज्ञा बन जाते है।
  • 1. जैसे-जैसे गरीबों  बढती जा रही है दिन-दहाडे चोरियॉ होने लगी है।
  • 2 बुराइयों से सदा दूर रहो।
  • 3 इस प्रकार की मूर्खताएॅ तुम्हें ले डूबेंगी।
  • 4. भाषा की विभिन्नताओे के बावजूद भारतवासी अभिन्न है।
  • 5. आजकल दूरिया बढती जा रही है। बादलों की गडगडाहटों से किसानों के हृदय झूम रहे है।
इन वाक्यों में आए शब्द चोरियॉ ,मूर्खताएॅ, भिन्नताओं ,दूरिया और गडगडाहटों जाति वाचक संज्ञा है।
ये भाववाचक संज्ञाओं चोरी बुराई मूर्खता भिन्नता दूरी और गडगडाहटों से बने हैं।

भाववाचक संज्ञाओं शब्दों की रचना

भाववाचक संज्ञाएं मुख्यतः दो प्रकार की होती है। कुछ भाववाचक संज्ञाएं मूल रूप में होती है। जैसे :-
  • सुख, दुख, प्रेम, घृणा, चिंता आदि ।
लेकिन कुछ भाववाचक संज्ञाए अन्य शब्दों से बनाई जाती है।
भाववाचक संज्ञाओं की रचना निम्न प्रकार से होती है।
1). जाति वाचक संज्ञाओं से
2) सर्वनाम से
3). विशेषण से
4). क्रिया से
5). अव्ययसे
1. जाति वाचक संज्ञाओं से भाववाचक संज्ञा बनाना
जातिवाचक संज्ञाभाववाचक संज्ञाजातिवाचक संज्ञाभाववाचक संज्ञा
शत्रु
शत्रुतामित्रमित्रता
मानवमानवताठगठग
सेवक सेवास्त्रीस्त्रीत्व
ईश्वरऐश्वर्यलडकालडकपन
आदमीआदयितामशिक्षकशिक्षा
देव
देवत्वसिंहसिंहत्व
पितापितृत्व बालबालपन
विद्वान विद्वताबच्चाबचपन
बूढाबूढापाजवानजवानी
पशुपशुताचोरचोरी

सर्वनाम से भाव वाचक संज्ञा

सर्वनामभाववाचक संज्ञासर्वनामभाववाचक संज्ञा
अपना.अपनापन//अपनावममममता/ ममत्व
निजनिजत्व, निजतापरायापरायापन
स्व
स्वत्वसर्वसर्वस्व
अहंअहंकारआप
आपा

विशेषण  से भाववाचक संज्ञा बनाना

विशेषण  भाववाचक संज्ञाविशेषण भाववाचक संज्ञा
मीठा
मिठासमधुरमधुरता
परतंत्रपरतंत्रताच्ंचल चंचलता
लोभी
लोभ सूक्ष्मसूक्ष्मता
डदासीन
उदासीनता सरल सरलता
कायरकायरताअमरअमरता
अच्छा
अच्छाईक्ंजूस क्ंजूसी
त्ीव्र
तीव्रता ल्ंबा लंबाई
अरूणअरूणिमाबुद्धिमानबुद्धिमता
काला
कालापन/ कालिमा कृतघ्नकृतघ्नता
स्पष्ट
स्पष्टताधवल धवलता
चलाकचालाकीस्वतंत्रस्वतंत्रता

क्रिया से भाववाचक संज्ञा बनाना

क्रियाभाववाचक संज्ञा क्रिया भाववाचक संज्ञा
ज्ीतना
जीतमरना मरण
देखना
दृष्टिजलना ज्लन
स्ुनना सुनाईहॅसनाहॅसी
थ्मलना
मेलउडनाउडान
मुस्कराना
मुस्कान लिखनालिखावट
सूझनास्ुझावथकनाथकावट
च्मकना

चमकघबरानाघबराहट
चिल्लानाचिल्लाहट गानागान
रहन सहन
रहन सहन चुननाचुनाव
फैलाना फैलावबुननाबुनाई
स्ींचना

सिंचाईखेलनाखेल
ब्हनाबहाव टिकनाटिकाव
बेलना
बोलढलनाढलान
गडगडाना
गडगडाहटरोनारूलाई
उभरना
उभारगुण गुणी
हारनाहारदौडनादौड

अव्यय से भाववाचक संज्ञा

अव्ययभाववाचक संज्ञाअव्ययभाववाचक संज्ञा
 खूबखूबीउपरउपरी
 समीप सामीप्यय भीतरभीतरी
निकटनैकट्यय   न्ीचे निचाई
बाहरबाहरी मनामनाही
शाबाशशाबाशीयपरस्पर पारस्पर्यय
दूरदूरी वाहवाह वाहवाही
ध्किधिक्कार
शीघ्र शीघ्रता

संज्ञा से विशेषण बनाना

संज्ञाविशेषणसंज्ञा विशेषण
अंत.अंतिम\ अंत्यअर्थआर्थिक
अवश्य आवश्यकअंशआंशिक
अभिमान.अभिमानीअनुभव.अनुभवी
इच्छा. ऐच्छिकइतिहास.ऐतिहासिक
ईश्र्वर.ईश्र्वरीयउपज.उपजाऊ
उन्नति.उन्नत कृपा.कृपालु
काम.कामी/ कामुककाल.कालीन
कुल.कुलीन
केंद्र. केंद्रीय
क्रम.क्रमिककागज.कागजी
किताब.किताबीकाँटा.
कँटीला
कंकड़.कंकड़ीला कमाई.कमाऊ
क्रोध.
क्रोधीआवास.
आवासीय
आसमान.आसमानीआयु.आयुष्मान
आदि.आदिमअज्ञान.अज्ञानी
अपराध.
अपराधी
चाचा. चचेरा
जवाब.जवाबीजहर.जहरीला
जाति.जातीय जंगल.जंगली
झगड़ा.
झगड़ालूतालु. तालव्य
तेल. तेलहा देश.देशी
दान.दानी
दिन.दैनिक
दया.दयालु

दर्द.दर्दनाक
दूध.दुधिया/ दुधार धन.धनी/ धनवान
धर्म.धार्मिक
नीति.नैतिक
खपड़ा.खपड़ैलखेल.खेलाड़ी
खर्च.

खर्चीला खूनखूनी
चुनाव.चुनिंदा/ चुनावीचारचौथा
गाँव.गँवारू/ गँवारगठनगठीला
गुणगुणी/ गुणवान
घरघरेलू
घमंड.घमंडीघाव.घायल
पेट
. पेटूप्यार.प्यारा
पुस्तक.पुस्तकीयपुराण.पौराणिक
पश्र्चिम. पश्र्चिमीपूर्व.पूर्वी
चुनाव.चुनिंदा/ चुनावीचार. चौथा
प्यास. प्यासापशु.पाशविक
प्रमाण.प्रमाणिक प्रकृति.
प्राकृतिक
पिता.

पैतृक प्रांत.प्रांतीय
बालक.बालकीयबर्फ. बर्फीला
भ्रम.भ्रामक/ भ्रांतभोजन. भोज्य
भूगोल.

भौगोलिकभारत.भारतीय
मन. मानसिकमास.मासिक
माह.माहवारीमाता.मातृक
मुख.
मौखिक नगर.नागरिक
नियम.

नियमितनाम.नामी/ नामक
निश्र्चय.निश्र्चितन्याय. न्यायी
नौ. नाविकनमक.नमकीन
पाठ.पाठ्य
पूजा.पूज्य/ पूजित
पीड़ा.

पीड़ितपत्थर.पथरीला
पहाड़.पहाड़ीरोग. रोगी
राष्ट्र. राष्ट्रीय रस.रसिक
लोक.लौकिक
लोभ. लोभी
वेद.


वैदिकवर्ष. वार्षिक
व्यापर.व्यापारिक विष.विषैला
विस्तार. विस्तृतविवाह.वैवाहिक
विज्ञान.वैज्ञानिकविलास.विलासी
समय.

सामयिकस्वभाव. स्वाभाविक
शास्त्र.शास्त्रीय साहित्य.साहित्यिक
विष्णु.वैष्णव शरीर. शारीरिक
सिद्धांत.सैद्धांतिकस्वार्थ.स्वार्थी
स्वास्थ्य. स्वस्थस्वर्ण.स्वर्णिम
रंग

रंगीन/ रँगीलारोजरोजाना
मैल. मैलामधु.मधुर
मामा. ममेरा मर्द.मर्दाना
साल.सालानासुख.सुखी
समाज.सामाजिक संसार.सांसारिक
स्वर्ग.स्वर्गीय/ स्वर्गिक
सप्ताह.
सप्ताहिक
समुद्र.सामुद्रिक/ समुद्रीसंक्षेप. संक्षिप्त
क्षण.क्षणिकहवा.हवाई
सुर.सुरीलासोना सुनहरा

क्रिया से विशेषण बनाना

क्रियाविशेषणक्रियाविशेषण
लड़ना.
लड़ाकू
भागना.भगोड़ा
लूटना.
लुटेरा भूलना. भुलक्कड़
पीना. पियक्कड़तैरना. तैराक
अड़ना.अड़ियलदेखना.दिखाऊ
जड़ना.जड़ाऊ
गाना.गवैया
पालना. पालतू
झगड़ना.झगड़ालू
टिकना.टिकाऊ
चाटना. चटोर
बिकना. बिकाऊ पकना.पका

संज्ञा के विकार/संज्ञा के व्याकरणिक कोटियॉ

संज्ञा एक विकारी पद है। इसका प्रयोग करते समय इसके रूपों में लिंग वचन और कारक के कारण विकार या परिवर्तन आ जाता है।

  •  लिंग
  • वचन
  • कारक

संज्ञा के व्याकरणिक कोटियॉ

संज्ञा का वह रूप जिससे इस बात का पता चलता है कि वह पुरूष वर्ग का है अथवा स्त्री वर्ग का व्याकरण में लिंग कहलाता है।

लिंग :- लिंग शब्द का समान्य अर्थ है- चिह्न या पहचान का साधन

पुरूष वर्ग के अंतर्गत आने वाले संज्ञा शब्द पुल्लि्ांग तथा स्त्री वर्ग के अर्तंगत आने वाले संज्ञा शब्द स्त्रीलिंग कहलाते है।    अत: हम कह सकते है कि:-लिंग संज्ञा का गुण है। 

अतः हर संज्ञा शब्द या तो पुल्लि्ांग होगा या स्त्रीलिंग । उदहारण के तौर परः-

  1.  लडका दौडता है।
  2. लडकी दौडती है।
  3. पंखा चल रहा है।
  4. घडी चल रही है।
इस प्रकार लिंग संज्ञा का वह लक्षण है जो संज्ञा के पुरूषवाची या स्त्रीवाची होने का बोध कराता है।
हिंदी में लिंग दो प्रकार के है
  • 1). पुल्लि्ग(Masculine Gender)  
  • 2).  स्त्रीलिंग(Feminine Gender)

पुल्लि्ांग का सन्धि विच्छेद :है- पुम्’ लिंग। पुम्’ लिंग में म् का अनुस्वार हो जाता है। अतः पुल्लि्ांग लिखना चाहिए।हिंदी में लिंग निर्धारणः-  इसके  लिए निम्न आधार ग्रहण किए गए है।

  • 1 रूप के आधार पर
  • 2 प्रयोग के आधार
  • 3 अर्थ के आधार पर
1). रूप के आधार पर :-रूप के आधार पर लिंग निर्णय का तात्पर्य हैः- शब्द की व्याकरणिक बनावट। शब्द की रचना में किन प्रत्ययोंं का प्रयोग हुआ है तथा शब्दान्त में कौन सा स्वर है- इसे आधार बनाकर लिंग निर्धारण किया जाता है।
1. पुल्लि्ांग शब्द
अकारांत अकारांत शब्द प्रायः . पुल्लि्ांग होते है।  जैसे –
  • राम सूर्य क्रोध समुद्र चीता  घोडा कपडा घोडा आदि ।
 वे भाववाचक संज्ञाए जिनके अन्त में त्व व य होता है। वे प्रायः  पुल्लि्ांग होती हैं गुरूत्व गौरव शौर्य आदि ।
 जिन शब्दों के अंत में पा पन आव आवा खाना जुडे होते है। वे प्रायः . पुल्लि्ांग होते है। जैसे –
  • बुढापा मोटापा बचपन घुमाव भुलावा पागलपन आदि ।
2. स्त्रालिंग शब्द
आकारांत शब्द प्रायः स्त्रालिंग होते है जैसे :-
  • लता, रमा, ममता ।
इकारांत शब्द भी प्रायः स्त्रालिंग होते है जैसे :-
  • रीति, तिथि, हानि, किंतु इसके अपवाद भी हैं
  • कवि , रवि, कपि पुल्लि्ांग है
ईकारांत शब्द  भी प्रायः स्त्रालिंग होते है जैसेः-
  • नदी  रोटी टोपी आदि। किंतु इसके अपवाद भी हैंः-
  • हाथी दही पानी पुल्लि्ांग है
आई इया आवट ता इमा प्रत्यय वाले शब्द भी स्त्रीलिंग होते है। जैसे :-
  • लिखाई डिबिया मिलावट घबराहट सुन्दरता महिमा आदि।
स्त्रीलिंग प्रत्यय
पुल्लि्ांग शब्द को स्त्रीलिंग बनाने के लिए कुछ प्रत्ययों का शब्द में जोडा जाता है। जिन्हें स्त्री प्रत्यय कहते है।
संस्कृत के स्त्री प्रत्यय उदहारण
संस्कृत के स्त्री प्रत्ययउदहारण
-आ छात्र-छात्रा    महोदय- महोदय
-आनीइन्द्र -इन्द्राणी    रूद्र -रूद्राणी
इका गायक- गायिक नायक.नायिक
-इनी यक्ष-यक्षिणी योगी-योगिनी
-ई कुमार- कुमारी  पुत्र पुत्री
-तीश्रीमान-श्रीमती भाग्यवान-भाग्यवती
-त्रीअभिनेता- अभिनेत्री नेता-नेत्री
-नीपति -पत्नी भिक्षु- भिक्षुणी
हिंदी के स्त्री प्रत्यय उदहारण
हिंदी के स्त्री प्रत्ययउदहारण
आइनाठाकुर- ठाकुराइन पंडित-पंडिताइन
आनीजेठ-जेठानी मुगल-मुगलानी
इनतेली-तेलिन धोबी-धोबिन
इयाबेटा-बिटिया लोटा- लुटिया
काका-काकी पोता -पोती
नीमेर-मोरनी  शेर-शेरनी
उर्दू के स्त्री प्रत्यय उदहारणआ माशूक- माशूका वालिद वालिदा

प्रयोग के आधार पर :-

प्रयोग के आधार पर  लिंग निर्णय के लिए संज्ञा शब्द के साथ प्रयुक्त विशेषण कारक चिह्न एंव क्रिया को आधार बनाया जाता है। जैसे
1). अच्छा लडका—अच्छी लडकी
 – लडका (पुल्लिंग) लडकी (स्त्रीलिंग)
2). राम की पुस्तक—राम का चाकू
 – पुस्तक (स्त्रीलिंग) चाकू (पुल्लिंग)
3). राम ने रोटी खाई-
  रोटी (स्त्रीलिंग)  क्रिया( स्त्रीलिंग)
4).राम ने आम खाया-
आम (पुल्लिंग़) क्रिया( पुल्लिंग)

3. अर्थ के आधार पर

कुछ शब्द अर्थ की दृष्टि से भिन्न होते है। उनका उचित और सम्यक प्रयोग करना चाहिए ।
1). आपकी महान कृपा होगी।
आपकी महती कृपा होगी ।
2). वह एक विद्वान लेखिका है।
वह एक विदुषी लेखिका है।
संज्ञा शब्दों का लिंग निर्धारण के लिए महत्वपूर्ण तथ्य :
1). जीव जगत में  लिंग का भेद प्राकृतिक है किंतु भाषा में इस व्याकरण की दृष्टि से देखना अपेक्षित है।

2). हिंदी में बहुत से प्राणिवाचक संज्ञा  लिंग निर्धारण प्रायः उनके लिंग नर/मादा के आधार पर कर लिया जाता है। जैसे-

  •  बच्चा बच्ची नाई-नाईन  माली मालिन  चाचा चाची आदि।
3.) ऐसे प्राणि जिनमें लिंग के आधार पर अंतर करना संभव नहीं होता ’नर या मादा’ शब्द जोडकर अंतर किया जा सकताहै।जैसे –
  • नर भालू/ मादा भालू , नर मक्खी/मादा ेमक्खी आदि ।
4.) हिंदी में कुछ संज्ञा शब्दों का प्रयोग दोनों लिंगों  में किया जाता है। जैसे-
  • खिलाडी, मैनेजर, इंजीनियर, चपरासी ,वकील, मरीज ,मंत्री ,डाक्टर आदि।
5.) निर्जीव वस्तुओं जैसे-
  • मकान, खिडकी, पंखा, पानी, दूध, मेज, कुरसी ,सोफा ,पंलग ,घडी, चूल्हा, झाडू ,बिस्तर, चादर आदि  का लिंग निर्धारण प्रयोग के आधार पर किया जाता है

वचन :-

वचन शब्द वह रूप है। जिससे यह पता चले कि कोई संज्ञा शब्द एक ईकाई के रूप में ग्रहण किया जाएगा या एक से अधिक अथवा अनेक के रूप में। उदहारण के लिए:-
  •   बच्चा कुरसी मेज आदि एकवचन होने की सूचना दे रहे है।
  • जबकि किताबें बच्चें मेजे आदि एक से अधिक होने का बोध करा रहे है।

परिभाषा

वचन शब्द का अभिप्रायः संख्या से है। विकारी शब्दों के जिस रूप से उनकी संख्या एक या अनेक का बोध होता है। उसे वचन कहते है। उदहारण के लिए:-
1). लडका जाता है।
–लडके जाते है।
2).बच्चा सोता है।
–बच्चे सोते है। आदि एक से अधिक होने का बोध करा रहे है।

वचन का अर्थ

संज्ञा शब्द के जिस अंश रूप से यह ज्ञात होता है। कि:- वह एक ईकाइ के रूप में ग्रहण किया जाएगा या अनेक रूप में व्याकरण में वचन कहलाता है।
सरल शब्दों में :-वचन संज्ञा पदों का वह लक्षण है जो एक या अधिक का बोध कराता है जैसे :-
  • घोडा— घोडा
  • पुस्तक— पुस्तकें
  • नदी —नदियॉ ।

वचन के प्रकार

संस्कृत में तीन वचन है-
  • एकवचन
  • द्विवचन 
  • बहुवचन पर हिंदी में केवल दो ही वचन रह गए है।

एकवचनः-

संज्ञा शब्द के जिस रूप से किसी एक वस्तु पदार्थ या व्यक्ति के ज्ञान का बोध होता है। वह एकवचन कहलाता है। जैसे
  •  मेज, किताब ,कमरा, ताला, माला ,बोतल, दवाई ,ऑख, नाक ,कमीज ,बिल्ली ,कछुआ आदि ।

बहुवचन

संज्ञा शब्द के जिस रूप से एक से अधिक वस्तुओं पदार्थों और व्यक्तियों के ज्ञान का बोध हो वह बहुवचन कहलाता है जैसेः
  • -बालकों ,,मालाएं, बोतलें दवाइयॉ ,आखें, नाकें, कमीजें, बिल्लियॉ आदि।

वचन की पहचानः-

वचन की पहचान नि​म्नलिखित शब्दों से की जा सकती है।
1).संज्ञा शब्दों से
2). सर्वनाम शब्दों से
3). क्रिया शब्दों से
1संज्ञा शब्दों सेः-वाक्य में प्रयुक्त संज्ञा शब्दों से एकवचन और बहुवचन की पहचान होती है।
  •  सोहन ने किताब खरीदी–( एकवचन)
  • सोहन ने किताबें खरीदी– (बहुवचन)
  •  लडकी के पास छाता है।–(एकवचन)
  • लडकियों के पास छाता है।—(बहुवचन)
  • पायल ने संतरा खाया –(एकवचन)
  • पायल ने संतरें खाए।–(बहुवचन)
2 सर्वनाम शब्दों से–
  •  वह आज नहीं आया । (एकवचन )
  • वे आज नहीं आए। ( बहुवचन)
  • मै दिल्ली जाउॅगा। (एकवचन )
  • हम सब दिल्ली जाएगें।( बहुवचन)
  • तुम मंदिर चले जाओ।(एकवचन )
  • तुम सब  मंदिर चले जाओ। ( बहुवचन)

3  क्रिया शब्दों से

  •  शेर जंगल में रहता है।–(एकवचन)
  • शेर जंगल में रहते है।—–( बहुवचन)
  •  बल्ब अचानक फयूज हो गया –(एकवचन)
  • बल्ब अचानक फयूज हो गए।–(बहुवचन)
  • खिलाडी मैदान से चला गया।– (एकवचन)
  • खिलाडी मैदान से गए—-।( बहुवचन)
वचन परिवर्तन  के उदहारण
  • लड़का खाता है. लड़के खाते हैं।
  • लड़की खाती है. लड़कियाँ खाती हैं।
  • एक लड़का जा रहा है. तीन लड़के जा रहे हैं।
इन वाक्यों में  लड़का शब्द एक के लिए आया है और लड़के एक से अधिक के लिए। लड़की एक के लिए और लड़कियाँ एक से अधिक के लिए व्यवहृत हुआ है। यहाँ संज्ञा के रूपान्तर का आधार श्वचनश् है। लड़का एकवचन है और लड़के बहुवचन में प्रयुक्त हुआ है।

कारक चिह्न

जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम का संबंध क्रिया के साथ स्थापित करते है। उन्हें कारक चिह्न या परसर्ग कहते है। जैसे
  • – लडका किताब पढ रहा है।
  • – राम ने किताब पढी।
  • – राम ने नौकर को बुलाया।
  • – राम कलम से लिखता है।
  • – राम भाई के लिए कपडे लाया।
  • – उसने भाई को पैसे दिए।
  • – पत्ता पेड से गिरा।
  • – वह कमरे में सो रहा है।
इन वाक्यों में संज्ञाओं का क्रिया से संबंध बताने के लिए कुछ चिह्नों का प्रयोग किया गया है जैसे
  • ने ,को ,से ,के लिए, में आदि।
इन चिह्नों को कारक चिह्न या परसर्ग कहते है। इन्हें विभक्ति चिह्न भी कहा जाता है।

Varn-Vichar (वर्ण-विचार)- ध्वनि ,वर्ण तथा वर्तनी)

वर्ण-विचार(ध्वनि ,वर्ण तथा वर्तनी)

ध्वनि व्यवस्था : हम सभी बोलते समय भाषिक ध्वनियों उच्चारण करते है। ध्वनियों का उच्चारण दो प्रकार से किया जा सकता है-

  1. मुख से बहार निकालने वाली वायु श्वास के रास्ते में रूकावट या अवरोध उत्पन्न करके
  2. मुख से बहार निकलने वाली वायु श्वास को बिना किसी रूकावट या अवरोध के बाहर निकाल कर ।

अतः ध्वनियों का उच्चारण में मुख से बाहर वाली वायु के रास्ते में रूकावट पैदा की जाती है। और कुछ ध्वनियों के उच्चारण में वायु बिना किसी रूकावट के बाहर निकाल दी जाती है। वायु के मार्ग में रूकावट पैदा करने वाले दो अवयव ये दोनों अवयव मुख से बाहर निकालने वाली के रास्ते में रूकावट पैदा करते है। जिन ध्वनियों के उच्चारण में रूकावट उत्पन्न नहीं की जाती उनमें उच्चारण उपर नीचे तो आ जाते है। पर इतना उॅचा नहीं जाते कि मुख से बाहर निकलने वाली वायु के रास्ते में रूकावट उत्पन्न हो सके।

वर्ण व्यवस्थाः-

भाषा संस्कृत के भाष् शब्द से बना है। भाष् का अर्थ है-बोलना भाषा की सार्थक इकाई वाक्य है। वाक्य से छोटी इकाई इकाई उपवाक्य , उपवाक्य से छोटी इकाई इकाई पदबंध, पदबंध से छोटी इकाई पद या शब्द, पद से छोटी इकाई अक्षर और अक्षर से छोटी इकाईध्वनि या वर्ण, है। जैसेः- राम शब्द में 2 अक्षर (रा, + म) एवम् 4 वर्ण (र्+ आ् + म् , + अ) है।

वर्ण (Phonology)

हिंदी में जब ये ध्वनिया लिखि जाती है। तो अक्षर या वर्ण कहलाती है। वर्ण भाषा की सबसे छोटी इकाई होते है। इनके और टुकडे नहीं किए जा सकते है वे वर्ण कहलाते है। जैसे:- गाय शब्द में 2 अक्षर  (गा+ य) एवम् 4 वर्ण (ग्,+ आ़्+ य् , + अ) है।

वर्ण से संम्बधित अन्य तथ्य 

  •  भाषा की सबसे छोटी इकाई या ध्वनि जिसके टुकडें नहीं किए जा सकते ,उसे वर्ण या अक्षर कहते है।
  • ध्वनियों का लिखा गया रूप वर्ण कहलाता है।
  •  वर्ण भाषा की लघुत्तम ईकाई हैं ।
  •  वर्णों के और खंड नही किए जा सकते है-आ, इ, क्, च् ये सभी वर्ण है।
  • हिंदी भाषा में कुल छियालिस 46 वर्णहै।लेकिन लेखन के आधार पर बयावन 52 वर्ण है।
  •  वर्णों को अक्षर भी कहा जाता है। यह वर्णों का उच्चारित रूप है।
  •  उच्चारित ध्वनियों को लिखकर व्यक्त करने के लिए जो चिह्न बनाए गए है, वे वर्ण कहलाते है
  •  उदहारण के लिए :-
    पुस्तक — प् + उ़+ स़्+ त् + अ़ +क़्+ अ

इस प्रकार हम कह सकते है:- कि भाषा की सबसे छोटी ईकाई ध्वनि है। इस ध्वनि को वर्ण कहते है।

दूसरे शब्दों में:- भाषा की वह छोटी से छोटी ईकाई जिसकें और टुकडे या खंड न किए जा सकें, वह वर्ण कहलाती है।
समान्य शब्दों में इस प्रकार कह सकते हैः-वर्ण उस मूल ध्वनि को कहते हैं, जिसके खंड या टुकड़े नहीं किये जा सकते। उदाहरण द्वारा मूल ध्वनियों को यहाँ स्पष्ट किया जा सकता है।  राम और गाय में चार.चार मूल ध्वनियाँ हैं,जिनके खंड नहीं किये जा सकते.

  • नहर —     न् + अ़+ ह़्+ अ़+ ऱ्+ अ=  ( 6– ध्वनियॉ)
  • हाथ :-     ह़् +आ़+ थ़्+ अ==     ( 4– ध्वनिया)
  • पुस्तक :-  प +उ़ +स़+ त़ अ +क़ +अ=( 7– ध्वनियॉ)
  • राम..       र + आ + म + अ= (4– ध्वनियॉ)
  • गया, …    ग + अ + य +आ=( 4– ध्वनियॉ)

 

वर्ण  तथा वर्णमाला

भाषा की अपनी वर्णमाला होती है। उसमें भाषा के वर्णों को निश्चित क्रम में रखा जाता है। जिस प्रकार फूलों को एक साथ माला में पिरोकर रखा जाता है उसी तरह अध्ययन की सुविधा के लिए सभी वर्णो को एक स्थान पर वर्णमाला के रूप में प्रस्तुत किया जाता है

प्रत्येक भाषा की अपनी वर्णमाला होती है।

  • हिंदी. अ, आ, क, ख, ग……
  • अंग्रेजी.A, B, C, D, E….

हिंदी की अधिकांश ध्वनियां और उनके वर्ण हिंदी से मिले है। हिंदी में कुछ नई ध्वनियॉ भी विकसित हुई है। जो संस्कृत में नहीं थी। इन नवविकसित ध्वनियों के लिए नए वर्ण भी बना लिए गए है। संस्कृत से प्राप्त वर्णों को हम पंरपरागत वर्ण भाषाओं से आने वाली ध्वनियों के लिए बनाए गए है तथा दूसरे वे जो हिंदी की अपनी संरचनात्मक विशेषताओं के कारण विकसित ध्वनियों के लिए बनाए गए है।

वर्ण के भेद:-

उच्चारण और प्रयोग के आधार पर हिंदी वर्णमाला के वर्णों को दो भागों में बॉंटा गया है।

  • स्वर
  • व्यंजन

1). स्वर (vowel)  जिन ध्वनियो/वर्णों के उच्चारण में वायु  बिना किसी रूकावट के मुख से बहार निकल जाती है। वे स्वर ध्वनियॉ कहलाती है।

दूसरे शब्दों में.स्वतंत्र रूप से बोले जाने वाले वर्ण स्वर कहलाते है, स्वरों का उच्चारण स्वतंत्र रूप से किया जा सकता है। अर्थात इनके उच्चारण में किसी अन्य ध्वनि की सहायता नहीं ली जा सकती है।

अलग अलग मतों के द्वारा इनकी संख्या भ्रिन्न है।

  • परंपरागत रूप से संख्या 13 है।
  • हिंदी वर्णमाला के अनुसार 11 है।
  • कहीं कहीं पर 16 स्वरों का भी उल्लेख है।

स्वर ( वर्ण ) के भेद

उच्चारण में लगने वाले समय के आधार पर स्वरों के भेद किए जाते है। हिंदी में 11 स्वर है। जिनके स्वर के दो भेद है।

  • मैखिक स्वर—अ,आ,इ,ई,उ,उऋ,ए,ऐ,ओ,औ आदि
  • आगत स्वर–आॅ
  • अनुनासिक स्वर—अॅं,आॅं,इॅं,उॅं,एॅं,ऐं,ओं,आॅं आदि।
  • संयुक्त स्वर

उच्चारण में लगने वाले समय के आधार पर स्वरों के तीन भेद है।

  • ह्स्व स्वर
  • दीर्घ स्वर,
  • प्लुत स्वर

(1) ह्रस्व स्वर (Short Vowels)

जिन स्वरों के उच्चारण में बहुत कम समय (एक मात्रा का समय )लगता है उन्हें ह्स्व स्वर कहते है।
ये चार है. अ ,इ, उ, ऋ।
ऋ की मात्रा (;ृ) के रूप में लगाई जाती है तथा उच्चारण रि की तरह होता है।

(2) दीर्घ स्वर (Long Vowels) .

जिन स्वरों के उच्चारण में हस्व स्वरों की तुलना में अधिक समय (दो मात्राओं का समय) लगता है। उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं।

सरल शब्दों में= जिन स्वरों उच्चारण में अधिक समय लगता है उन्हें दीर्घ स्वरकहते है। ये सात होते है. आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ,, औ। इन्हें गुरू भी कहते है। ये दो शब्दों के योग से बनते है।
जैसे

  • आ= =अ +अ
  • अऊ ==उ + उ
  • ए ==  अ + इ
  • ऐ == अ + ए
  • ओ ==अ + उ
  • औ= =अ +ओ

प्लुत स्वर:-  जिन स्वरों के उच्चारण में लगभग तिगुना समय लगता है। प्लुत स्वर कहलाते हैं।प्लुत लिखते समय उनके आगे हिंदी की गिनती का अंक 3 लिखा जाता है। जैसे. ओ३म्
किसी के पुकारने या नाटक के सवांद में इसका प्रयोग किया जाता है।
इसके उच्चारण में दीर्घ् से भी अधिक समय लगता है। इसे तिमात्रिक स्वर स्वर भी कहते हैं

इसका चिह्न  है जैसे. सुनोऽऽ,,, राऽऽम, ओऽऽम्।

याद रखिए :-

  1. आज कल हिंदी भाषा में उच्चारण स्तर पर हस्व स्वर ‘‘़ऋ‘‘ समाप्त हो चुका है। अब केवल तत्सम शब्दों के लेखन में इसका प्रयोग किया जाता है। तथा इनका उच्चारण ‘ रि‘ की तरह किया जाता है।
  2. आज कल हिंदी भाषा में प्लुत स्वर का प्रयोग पूर्णयता समाप्त हो गया है। इस स्वर कर उच्चारण और लेखन केवल संस्कृत भाषा में होता है।

अयोगवाह(Improper Consonants)

हिंदी वर्णमाला में अं और अः दो वर्ण ऐसे है। जो न तो स्वर है। न तो व्यंजन। ये आयोगवाह कहलाते है। अ की मात्रा को अनुस्वार और अः की मात्रा को विसर्ग कहते है।

अतएव आयोगवाह को इस तरह परिभाषित किया जा सकता है। जो वर्ण स्वर और व्ंयजन के अतिरिक्त होते है। उन्हें आयोगवाह कहते है।

अयोगवाह का अर्थ है. योग न होने पर भी जो साथ रहे।

  • अनुनासिक
  • अनुस्वार
  • विसर्ग
  • निरनुनासिक

 1) अनुनासिक = अनुनासिक शब्द दो शब्दों के मेल से बना है- अनु तथा नासिक ‘‘अनु‘‘ का अर्थ है- ‘‘पीछे-पीछे चलना‘‘ तथा ‘‘नासिक‘‘ का अर्थ है-‘‘नासिक या नाक‘‘ ।

नुनासिक को लिखकर व्यक्त करने के लिए दो चिह्न बनाए गए हैं- ‘‘चंद्र बिंदु‘‘ और ‘‘बिंदु‘‘ है।

  1. चंद्र बिंदुः– जिन स्वर-वर्णों की शिरोरेखा के उपर कोई मात्रा या चिह्न नहीं होता उन पर ‘चंद्र बिंद‘ु लगाया जाता है जैसे ऑकडा, बॉच, ऑच, ऑख, ऑचल , ऑधी , ऑवला , ऑसू, कुॅआ , कॉपना , खॅासना,आदि
  2. बिंदुः– जिन स्वर-वर्णों की शिरोरेखा के उपर मात्रा या चिह्न विद्यमान रहता हैउस वर्ण के उपर ‘बिंदु‘ लगाया जाता है जैसे :- ईंट , ईंधन , ऐंठना , खींचना, गेंद, गोंद, घोंसला, चोंच चौंतीस, छींका, छींट, झेंपना, तोंद आदि।
अनुनासिक स्वर का अर्थ

जिन स्वरों का उच्चारण करते समय वायु मुख के साथ -साथ नासिका मार्ग से भी बाहर निकलती है वे अनुनासिक स्वर कहलाते है। अर्थात जिस ध्वनि के उच्चारण में हवा नाक और मुख दोनों से निकलती है उसे अनुनासिक कहते हैं।
जैसे.

  • गाँव, दाँत, आँगन,पॉव, चॉद, छॉव , सॉप इत्यादि

2)अनुस्वार :-. जिन वर्णों के उच्चारण करने में अधिक जो लगाना पडता है। और वायु केवल नाक से निकलती है, उन्हें अनुस्वार कहते है। लिखते समय अनुस्वार का प्रयोग बिंदु रूप में स्वर और व्यंजन के उपर किया जाता है,
जैसे.

  • अंगूर ,अंश , वंश, कंचन , कंकन।

3) विसर्ग  विसर्ग का उच्चारण ह् की भांति होता है। विसर्ग का प्रयोग वर्ण के आगे दो बिंदुओं के रूप में किया जाता है। इसका प्रयोग अधिकतर संस्कृत भाषा में किया जाता है। जिस ध्वनि के उच्चारण में  की तरह होता है। उसे विसर्ग कहते हैं।

विसर्ग भी एक व्यंजन ध्वनि है। जिसे वर्णमाला में अ स्वर के साथ अ: रूप में दिखाया गया है। संस्कृत में दो तरह से उच्चरित होने वाले ह् व्यंजन थे। —-एक अघोष रूप था, तथा सघोष रूप ।

संस्कृत के वे शब्द जिनके अंत में विसर्ग है,हिंदी में उनका लेखन संस्कृतमें की तरह विसर्ग लगाकर किया जाता है।

जैसे.

  • अतः,स्वत:,सम्भवत:,विशेषतः, प्रातः,प्राय: आदि।

4).निरनुनासिक.=जिन स्वरों का उच्चारण केवल मुख से वायु बहार निकाल कर किया जाता है। वे मैखिक या निरनुनासिक स्वर कहे जाते है।

जिन स्वरों के उच्चारण में हवा केवल मुख से निकलती ​है।निरनुनासिक कहते हैं।
जैसे.:-

अनुस्वार और विसर्ग में अन्तर

 

  •  अनुस्वार और विसर्ग न तो स्वर हैं, न व्यंजन।
  •  ये स्वरों के सहारे चलते हैं।
  • स्वर और व्यंजन दोनों में इनका उपयोग होता है। जैसे. अंगद, रंग।

अनुस्वार और अनुनासिक में अन्तर

अनुस्वार और अनुनासिक के उच्चारण में भिन्नता होती है। अनुस्वार के उच्चारण में वायु नाक से बहार निकलती है।
जबकि अनुनासिक के उच्चारण में वायु मुख और नाक दोनों से बहार निकलती है।जैसे

  • हंस (अनुस्वार)
  • हॅंस (अनुनासिक)

स्मरणीय तथ्यः-

स्वरो का वर्गीकरण निम्न आधारों पर किया जाता है।
मात्रा/ उच्चारण काल के आधार परः-

  • ह्स्व स्वर
  • दीर्घ स्वर
  • प्लुत स्वर का प्रयोग किया जाता है।
जीभ के प्रयोग के आधार परः-
  • अग्र स्वर
  • मध्य स्वर
  • पश्च स्वर आदि का प्रयोग किया जाता है।
मुख द्वार (मुख -विवर) के ख्ुलने के आधार परः-
  •  विवृत(open)
  • अर्ध विवृत(Half-open)
  • अर्ध संवृत(Half- Closed
  • संवृत(Closed)आदि का प्रयोग किया जाता है
ओंठों की स्थिति के आाधार परः-
  • अवृतमुखी
  • वृतमुखी
हवा के नाक मुॅह से निकलने के आधार पर :-
  • निरनासिक /मौखिक स्वर
  • अनुनासिक स्वर आदि का प्रयोग किया जाता है।

हिन्दी में वर्णों की संख्या को लेकर विद्वानों में बहुत विवाद है।

  • हिन्दी में वर्णों की संख्या किशोरी दास बाजपेयी के अनुसार 43 है
  • कामता   गुरू के अनुसार 46 वर्ण है।
  • उदय नारायण तिवारी के अनुसार 46 वर्ण है।
  • धीरेन्द्र वर्मा के अनुसार 53 है। जिसमें (13स्वर ,40 व्यंजन) है।

स्वरों की मात्राएँ ( Signs of Vowel )

स्वरों के लिए निर्धारित चिह्न मात्राा कहलाते है। अ स्वर की कोई मात्रा नहीं होती है। शेष स्वरों के लिए मात्रा चिह्न निर्धारित है।इन्हें व्यजनों के साथ मिलाकर लिखा जाता है। जैसे — कि,कु,कू आदि
स्वरों का प्रयोग व्यजनों के साथ दो प्रकार से किया जाता है।

1). स्वतंत्र रूप से – जब स्वरों का प्रयोग व्यजनों के साथ अपने मूल रूप में होता है। तो वह स्वतंत्र रूप कहलाता है। जैसे – आज, अब, कल, चाल, आदि

2). मात्रा रूप में-– जब स्वरों को व्यजनो के साथ जोडा जाता है। तो उनका रूप बदल जाता है। स्वरों के इस बदले रूप को मात्रा कहते है।

स्वर मात्रा— मात्रा सहित व्यंजन  उदहारण शब्द

स्वरमात्रामात्रा सहित व्यंजनउदहारणशब्द
-क्कलबल
काममान
िथ्ककिसदिन
क्ीकीलदीन
क्ुकुलसुन
क्ूकूडाभूल
कृकृषिपृष्ठ
क्ेकेलासेब
कैकैसापैसा
केकोनासोना
कौकौनैमौन

याद रखने योग्य बातेंः-

  •  ‘अ‘ स्वर की कोई मात्रा नहीं होती है। क्योंकि यह प्रत्येक व्यंजन में लगा होता है। ‘अ‘ सहित व्यंजन इस प्रकार लिखे जाते हैं-क, ख, च ,ज, त, थ, आदि।
  • किसी व्यंजन को ‘अ‘ रहित लिखने के लिए उसके नीचे हलंत लगाते है,-क् ख् च् ज् त् थ् आदि ।
  • र‘ के मध्य भाग में ‘उ‘ तथा ‘उ‘ की मात्राएॅं इस प्रकार लगाई जाती है। जैसे र् ़ उ- रू= रूई, रूद्राक्ष, रूदन आदि
  • ऱ् -उ( रू)= रूट, रूढ, रूप आदि

2 व्यंजन (Consonant):-

स्वर की सहायता से बोले जाने वाले वर्ण व्यंजन कहलाते है। प्रत्येक व्यंजन के उच्चारण में ‘अ‘ स्वर मिला होता है अ के बिना व्यंजन का उच्चारण संभव नही है। परम्परागत रूप से व्यजनों की सख्या 33 मानी जाती है। द्विगुण व्ंयजन ड़ ढ़ को जोड देने पर इनकी संख्या 35 हो जाती है।

अन्य शब्दों में जिन वर्णों के उच्चारण में स्वरों की सहायता ली जाती है और उनके उच्चारण में वायु कंठ से निकलकर, मुख से स्वतंत्रतापूर्वक बाहर न आकर थोड़ा रूककर बाहर आती है ,उन्हें ‘व्यंजन‘ कहते है जैसे क,ख, ग, घ, ड़, च,छ,ज आदि ।

दूसरे शब्दों कह सकते है। जिन ध्वनियों के उच्चारण में मुख से बाहर वायु ें मार्ग में उच्चारण अवयवों द्वारा मुख में किसी न किसी स्थान पर रूकावट या अवरोध उत्पन्न किया जाता है। व्यंजन ध्वनियॉ कहलाती है।

व्यंजन के प्रकार

 

व्यजन वे ध्वनियॉ है। जिनके उच्चारण में मुख से निकलने वाली वायु के मार्ग में अवरोध उत्पन्न किया जाता है।

व्यंजन वर्णों के भेद मुख्य दो आधार हैं

  • उच्चारण -स्थान तथा
  • उच्चारण -प्रयत्न


उच्चारण -स्थान :
– उच्चारण -स्थान से तात्पर्य है मुख के उपरी जबड़े रूकावट पैदा करते है। ये स्थान हैं-उपर का ओठ, उपर के दॉत, वर्त्स तालु, मूर्धा कंठ आदि। इन स्थानों पर अवरोध होने के कारण जो वयंजन उच्चारित होते है।

वे क्रमशः ओष्ठय, दंत्य, तालव्य, मूर्धनय, कंठय आदि कहे जाते है।

उच्चारण प्रयत्न के आधार पर व्यंजन वर्णों के तीन भेद है

  • स्पर्श व्यंजन (Mutes)
  • अन्तःस्थ व्यंजन(Semivowels)
  • उष्म या संघर्षी व्यंजन(Sibilants)

1 स्पर्श व्यंजन (Mutes)

जिन वर्णो के उच्चारण मे जिहा मुख के विभिन्न भागों जैसे -कंठ, तालु , दंत, मूर्धा , आदि को स्पर्श करती हुई बाहर निकलती है, उन्हे स्पर्श व्यंजन कहते क् से म् तक के सभी 25वर्ण स्पर्श व्यंजन होते है।

इनको पॉच वर्गो में बांटा गया है। प्रत्येक वर्ण का नाम पहले वर्ण के आधर पर रखा गया है।

दूसरे शब्दों में कह सकते है। कि जिन व्यंजन वर्णो के उच्चारण में उच्चारण अवयव (जीभ या निचला ओठ) उपर उठकर उच्चारण स्थान को स्पर्श करके वायु के मार्ग में अवरोध या रूकावट पैदा करते है। वे स्पर्शी व्यंजन कहलाते है

वर्गव्यंजनस्पर्श-
क वर्ग- क, ख, ग, घ, ङये कण्ठ का स्पर्श करते है
च वर्ग-च ,छ, ज, झ, ञये तालु का स्पर्श करते है।
ट वर्ग-ट, ठ, ड, ढ, ण, ड़, ए, ढ़ ये मूर्धा का स्पर्श करते है।
तवर्ग- त ,थ, द ,ध, नये दाँतो का स्पर्श करते है
पवर्ग- प, फ, ब, भ ,मये होठों का स्पर्श करते है।

 

2) अन्तःस्थ व्यंजन (Semivowels)

जिन वर्णों के उच्चारण में जिहा मुख के किसी भी भाग को पूरी तरह स्पर्श नहीं करती उन्हें अन्तःस्थ व्यंजन कहते है। इनके उच्चारण में वायु बहुत कम समय के लिए रूकती है।

साधारण शब्दों में कह सकते है कि – अ`न्तःस्थ व्यंजन  का ‘अन्तः’ होता है. भीतर। उच्चारण के समय जो व्यंजन मुँह के भीतर ही रहे उन्हें अन्तःस्थ व्यंजन कहते है।

 

दूसरे शब्दों में कह सकते है। कि स्वरों और व्यंजन के बीच स्थित होने के कारण भी इन्हें अन्तःस्थ व्यंजन कहते है।
अन्तः = मध्य \बीच    तथा स्थ = स्थित। इन व्यंजनों का उच्चारण स्वर तथा व्यंजन के मध्य कासा होता है। उच्चारण के समय जिह्वा मुख के किसी भाग को स्पर्श नहीं करती।

ये व्यंजन संख्या में चार होते है. य, र,ल, व।

  • इनका उच्चारण जीभ, तालु, दाँत और ओठों के परस्पर सटाने से होता है ।
  • कहीं भी पूर्ण स्पर्श नहीं होता। अतः ये चारों अन्तःस्थ व्यंजन  अर्द्धस्वर कहलाते हैं।
  • य ,व अ़र्द्धस्वर ध्वनि जो कभी स्वर हो कभी व्यंजन
  • र- लुंठित जिसके उच्चारण में जीभ तालु से लुढकर स्पर्श करें
  • ल-पार्श्विक जिसके उच्चारण में हवा जीभ पार्श्व/ बगल से निकल जाए्।

उष्म या संघर्षी व्यंजन (Sibilants)

उष्म का अर्थ होता है— गर्म। कुछ व्यंजन वर्णों का उच्चारण में उच्चारण अवयव जीभ या निचला ओठ उच्चारण स्थान का स्पर्श नहीं करते बल्कि उनके बहुत निकट आ जाते हैं जिससे दोनों के बीच इतनी कम जगह रह जाती है कि वायु घर्षण करती हुई मुख से बाहर निकलती है। इस प्रयत्न के द्वारा जो व्यंजन उच्चारित होते है। वे संघर्षी व्यंजन कहलाते है।

जैसे –स् , श्, ज् , फ्, ह् आदि

दूसरे शब्दो में.—- जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय वायु किसी स्थान- विशेष पर घर्षण करती हुई रगड़ खाने के कारण उष्मा उत्पन्न होती है। उन्हें उष्म व्यंजन कहते है।

ये संख्या में चार है।—- श, ष,स,,ह आदि ।

 

संयुक्त व्यंजनः-. दो भिन्न व्यंजनों का परस्पर संयोग ही संयुक्त व्यंजन कहलाता है। अर्थात जो व्यंजन दो या दो से अधिक व्यंजनों के मेल से जो शब्द या वाक्य बनते हैं वे संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं।

दूसरे शब्दों में– वर्णमाला मे जो व्यंजन दो अक्षरों को मिलाकर बनाए जाते है संयुक्त व्यंजन कहलाते है।

ये संख्या में चार हैं :- क्ष , त्र, ज्ञ, श्र आदि ।

1) क्ष = क् + ष + अ = क्ष -कक्षा ,दीक्षा , परीक्षा , क्षमा, क्षणिक रक्षक, भक्षक, क्षोभ, क्षय
2)  त्र=  त् + र् + अ = त्र – त्रिनेत्र, त्रिफला,त्रिशुल,पात्र, पत्रिका, त्राण, सर्वत्र, त्रिकोण
3) ज्ञ = ज् + ञ + अ = ज्ञ -यज्ञ, ज्ञाता, ज्ञानी, अवज्ञा ,सर्वज्ञ, ज्ञाता, विज्ञान, विज्ञापन
4) श्र = श् + र् + अ = श्र – आश्रय ,विश्राम ,श्रमिक, परिश्रम श्रीमती, श्रम, परिश्रम, श्रवण

विशेष

ये व्ंयजन एक से अधिक व्यजनों के मेल से बने हैं इनका प्रयोग संस्कृत शब्दों में ही होता है। दो व्यंजनों को मिलाकर संयुक्त व्यंजन बनाए जाते है, जैसे क्क पक्का। इनको बनाने के तीन नियम है,
1 खडी पाई को हटाकरः-
  • ख + ख् – ख्याति
  • ग + ग् – अग्नि
  • ज + ज् – सज्जा
  • म + म् – म्यान
2 घुंडी हटाकर :-
‘क‘ और फ का जो घुंडीवाला भाग होता है उसे हटाकर‘अ‘ रहित किया जाता है।
  • क + क् -क्यारी
  • फ + फ -दफतर
3 हलंत लगाकर :
शेष वर्णों का ड ,छ ,ट,ठ,ढ,द, ह को संयुक्त करने के लिए उनके नीचे हलंत का चिह्न लगाया जाता है। जैसे :-
  • ट + ठ् – छुट्टी
  • ठ + ठ् – पाठयपुस्तक
  • ह + ह् –   चिह्न
इन संयुक्त व्यंजनों के अतिरिक्त दो भिन्न व्यंजनों से बने कुछ अन्य संयुक्त व्यंजनों के उदहारण भी देखने को लिखते को मिलते है, जैसे –
  • क् + ल – क्ल= क्लेश ,अक्ल ।
  • त् + य – त्य=   सत्य, नृत्य
  • ग् + य- ग्य=   भाग्य दुर्भाग्य
  • च़्+ छ –  च्छ=  कच्छ, अच्छा
  • ध् + य -ध्य=   ध्यान , साध्य
  • स्+ त – स्त= अस्त , ग्रत्स
  • न्+ म – न्म= जन्म, आजन्म
  • न्+ य =न्य =अन्य , कन्या
द्वित्व व्यंजन= दो समान व्यंजनों से बने संयुक्त व्यंजनों को दित्व व्यंजन कहते है।
  • क़्+ क – क्क – चक्की , मक्का
  • च् + च -च्च – बच्चा ,सच्चा
  • ट़्+ ट – ट्ट – खट्टा, पट्टा
  • त् + त – त्त – कुत्ता , गत्ता

उत्क्षिप्त व्यंजन :- जिन व्यंजनो का उच्चारण करते समय जिहा उपर उठकर मूर्धा को स्पर्श करती हुई तुंरत नीचे गिरती है। उन्हें ‘‘ उक्षिप्त व्यंजन कहते है। ड़ , ढ उक्षिप्त व्यंजन है। इन्हें अतिरिक्त  व्यंजन कहते है।

इन व्यंजनों से कोई शब्द आरम्भ नहीं होता है। इनका प्रयोग शब्द के अंत अथवा मध्य में होता है। जैसेः-
  • ड़ – भेंड, कड़क ,पकड़, लकड़ी आदि ।
  • ढ़– मूढा, बूढा, आषाढ़ , बाढ आदि ।

संयुक्ताक्षर-. जब एक स्वर रहित व्यंजन अन्य स्वर सहित व्यंजन से मिलता हैए नया व्यंजन नहीं बनाते। जैसे.

  •  क् + त =  क्त  –  संयुक्त
  •  स् + थ =  स्थ –    स्थान
  • स् + व =  स्व –     स्वाद
  • द् + ध = द्ध –       शुद्

स्वरतंत्रियों में उत्पन्न कंपन के आधार पर

 

हम सबके गले में एक ‘स्वर यंत्र‘ होता है। जिसमें मॉसपेशियों की बनी दो झिल्लियों होती हैं। इन झिल्लियों स्वरतंत्रियों (vocal cords) कहते है। फेफडो़ से निकलकर मुख तक आने वाली वायु इन स्वरतंत्रियों से टकराती है। और इनमें कंपन पैदा हो जाता है। कंपन के कारण कभी ये परस्पर निकट आ जाती हैं और कभी दूर -दूर हो जाती हैं। इनकी निकट अवस्था में जब वायु इनके बीच से होकर मुख तक पहुचॅती है तो उस वायु में स्वरतंत्रियों की गूॅज शामिल नहीं होती ।
घोष और अघोष व्यंजन
घोष का अर्थ है- स्वरतंत्रियों में ध्वनि का कंपन
जिन व्यंजनों या ध्वनियों के उच्चारण में स्वरतंत्रियों नाद घोष शामिल रहता है। उन्हें सघोष कहते है। वर्णों के उच्चारण में होने वाली ध्वनि की गूँज के आधार पर वर्णों के दो भेद हैं.

1 घोष या सघोष व्यंजन.—- जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वरतंत्रियों में कंपन हो ,हर वर्ग का 3रा 4थाऔर 5वा व्यंजन, घोष या सघोष व्यंजन कहलाता है। जैसे. ग, घ, ड़, ज, झ, ञ, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म, य, र, ल, व वर्गों के अंतिम तीन वर्ण और अंतस्थ व्यंजन  तथा सभी सघोष स्वर हैं।

2 अघोष व्यंजन—. जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वरतंत्रियों में कंपन न हो ;हर वर्ग का 1ला और रा व्यंजन अघोष व्यंजन कहलाता है। जैसे.. क, ख, च, छ, ट, ठ, त,थ, प, फ ,वर्गों के पहले दो वर्ण तथा श, ष, स अघोष हैं। अघोष वर्णों के उच्चारण में स्वर.तंत्रियाँ परस्पर नहीं मिलतीं। वायु आसानी से निकल जाती है।
1) अघोष व्यंजन2) घोष व्यंजन
क् ख्ग् घ् ड्
च् छ्ज् झ् ज्
ट् ठ्ड् ढ् ण् ड़  ढ़
त् थ्द् ध् न्
प् फ् .फ्ब् म्
श् ष् स्य् र् ल् व् ह्
श्वास (प्राण-वायु)  की मात्रा के आधार पर वर्ण- भेद
प्राण शब्द का अर्थ है ‘वायु‘। कुछ व्यंजनों के उच्चारण में मुख से कम मात्रा में वायु बाहर निकलती है। तथा कुछ में अधिक मात्रा में निकलती है। व्यंजनों का उच्चारण करते समय बाहर आने वाली श्वास.वायु की मात्रा के आधार पर व्यंजनों के दो भेद हैं —
  •  अल्पप्राण
  •  महाप्राण
1 अल्पप्राण व्यंजन- . जिन व्यंजनों के उच्चारण में कम ;अल्प मात्रा में वायु बाहर निकलती है अर्थात अल्पप्राण व्यंजन वह व्यंजन होते हैं जिन्हें बहुत कम वायु प्रवाह से बोला जाता है जैसेः- क, ग, ज, च, ट ,ड, ण, त, द, न, प, ब, म आदि । जब अल्प प्राण ध्वनियॉ महाप्राण ध्वनियों में परिवर्तित हो जाती है। तो उसे महाप्रणिकरण कहते है।

अल्प प्राण व्यजनों को बोलने में कम समय लगता है और बोलते समय से कम वायु निकलती है तथा जिन व्यजनों के उच्चारण में श्वास-वायु की मात्रा कम होती है। उन्हें अल्पप्राण व्यंजन (Alppran) कहते है।

  • इनकी संख्या 30 होती है।
  • प्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा और पाँचवाँ वर्ण अल्पप्राण व्यंजन हैं।
  • जैसे. क, ग, ङ,य, ज, ञ, ट, ड, ण, त, द, न, प, ब, म। अन्तःस्थ –य, र, ल, व  भी अल्पप्राण ही हैं।

2 महाप्राण व्यंजन –  जिन व्यंजनों के उच्चारण में अधिक ;महा मात्रा में वायु बाहर निकलती है अर्थात महाप्राण व्यंजन वह व्यंजन होते हैं जिन्हें अधिक वायु प्रवाह से बोला जाता है अर्थात महा प्राण व्यजनों को बोलने में अधिक समय और प्रत्यन लगता है और बोलते समय अधिक वायु निकलती है।

  • जैसेः- ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ और श, ष, स, ह।
समान्य शब्दों में कह सकते है कि– जिन व्यजनों के उच्चारण में श्वास-वायु की अधिक मात्रा होती है। उन्हें महाप्राण व्यंजन (Mahapran) कहते है।
  • इनकी संख्या 14 होती है।
जिन व्यंजनों के उच्चारण में श्वास.वायु अल्पप्राण की तुलना में अधिक निकलती है और” ह” जैसी ध्वनि होती है, उन्हें महाप्राण(Mahapran) कहते हैं।
  • प्रत्येक वर्ग का दूसरा और चौथा वर्ण तथा समस्त ऊष्म वर्ण महाप्राण हैं
  • -जैसे. ख, घ, छ, झ, ठ, ढय, थ, ध, फ, भ और श, ष, स, ह।
विशेष:- अल्पप्राण वर्णों की अपेक्षा महाप्राणों में प्राणवायु का उपयोग अधिक श्रमपूर्वक करना पड़ता हैं।
1 अल्पप्राण व्यंजन-2 महाप्राण व्यंजन
क् ग् ड्ख् घ्
च् ज्छ् झ्
ट् ड् णठ् ढ्
त् द् न्थ् ध्
प् ब् म्फ् भ्
य् र् ल् व्

आगत ध्वनियॉ तथा उनके वर्ण :-

कुछ विदेशी शब्दों का हिंदी भाषा में उनके मूल रूप में प्रयोग किया जाता है जैसेः- डाक्टर, कालेज , बालॅ, सजा, जरूर, आदि। ऑ ’ अग्रेंजी आई स्वर ध्वनि है तथा ज़ फ़ अरबी फारसी तथा अग्रेंजी के शब्दों में मिलने वाली व्यंजन ध्वनियॉ है। अतएव यह कहना उचित होगा –

जो ध्वनियॉ विदेशी शब्दों से आकर हिंदी भाषा में रूप में प्रयोग होती है, उन्हें आगत ध्वनियॉ कहते हैं।

 

ध्यान रहे :-“ऑ ध्वनि ” का प्रयोग अग्रेंजी शब्दों के ठीक उच्चारण के लिए किया जाता है। इसके लिए ‘अ‘ की मात्रा के उपर यह चिह्न ‘ॅ‘ लगाया जाता है। जैसे :-
  • बाल- बालॅ
  • हाल- हालॅ

इन शब्दों में‘ ॅ‘ का चिह्न लगाने से अर्थ अलग अलग जाते हैं।यहॉ ‘

  • ’बाल‘ का अर्थ —केश‘ है। जबकि
  • ’बालॅ’ का अर्थ —’गेंद’ है। इसी प्रकार
  • ’हाल’’ का अर्थ —दशा या अवस्था’ जबकि
  • ’हॉल’ का अर्थ —-बडा कमरा’ इसी प्रकार
  • ’डाल’ का अर्थ —-टहनी’ जबकि
  • डॉल’ का अर्थ —–गुडिया’ है।

2).आगत स्वर :’आ’ उदहारणः ऑफिस, आर्डर, डॉक्टर , कॉफी, हॉल आदि।

3).आगत व्यंजनः- ज़् , फ़् जैसे – ज़मानत, ज़नाजा, ज़रूर, ज़हर, सज़ा, ज़रा, ज़ेबरा, ज़िदगी, सफ़र, फ़र्क, फरमाइश, फकीर, फन, सफ़ाई फ़ायदा, आदि।

नोट़ – जहॉ तक हो सके, आगत ध्वनियों बनने वाले शब्दों का लेखन उनके लिए निर्धारित वर्णों से ही करना चाहिए।

वर्णों के उच्चारण स्थानः (Pronunciation-Place  of Letter)

 

वर्णों का उच्चारण करते समय जिहवा मुख के जिस भाग को स्पर्श करती है। उसे वर्णों का उच्चारण स्थान कहते है।
दूसरे शब्दों में. वर्णों का उच्चारण करते समय मुख के जिस भाग पर विशेष बल पड़ता है, उसे उस वर्ण का उच्चारण.स्थान कहते हैं।
जैसे. च्, छ्, ज् के उच्चारण में तालु पर अधिक बल पड़ता है,अतः ये वर्ण तालव्य कहलाते हैं।विशेष :-
  • मुख के छह भाग हैं- कण्ठ, तालु, मूर्द्धा., दाँत, ओठ और नाक।
  • हिन्दी के सभी वर्ण इन्हीं से अनुशासित और उच्चरित होते हैं।
उच्चारण स्थानों के आधार पर वर्णों के नौ भेद या वर्ग किए गए है।

1 कंठ्यः– कंठ गले से उच्चारित होने के कारण इन्हें कठ्य वर्ण कहते है। जैसे- अ, आ, ऑ, अः, क, ख,ग, घ,ड, ह आदि । कण्ठ और निचली जीभ के स्पर्श से बोले जानेवाले वर्ण. अ, आ, कवर्ग, ह और विसर्ग।

2 तालव्य :-तालु से उच्चारित होने के कारण इन्हें तालव्य वर्ण कहते है। जैसे इ, ई, च, छ,ज, झ, य , श । आदि। तालु और जीभ के स्पर्श से बोले जानेवाले वर्ण. इ- ई- चवर्ग- य और श।

3 मूर्धन्य :- मूर्धा मुख की छत से उच्चारित होने के कारण इन्हें मूर्धन्य वर्ण कहते है। जैसे – ऋ , ट, ठ, ड, ढ, ण, र, ष आदि। मूर्द्धा और जीभ के स्पर्शवाले वर्ण. टवर्ग, र, ष।
4 दंत्य :- दातों का उच्चारित होने के कारण इन्हें दंत्य वर्ण कहते है। जैसे – त , थ, द, ध, न, ल, भ आदि। दाँत और जीभ के स्पर्श से बोले जाने वाले वर्ण. तवर्ग= ल, स।
5 ओष्ठ्य :- ओंठो से उच्चारित होने के कारण इन्हें ओष्ठ्य वर्ण कहते हैं। जैसे :-उ,उ, प, फ, ब, भ, म आदि।
6 नासिक्य :- मुख और नासिक से उच्चारित होने के कारण इन्हें नासिक्य वर्ण कहते है, जैसे – अं, ड़, ण न, म, आदि।
7 कंठोष्ठ्य :- कंठ और ओठों से उच्चारित होने के कारण इन्हें नासिक्य वर्ण कहते है। जैसे :- ओ, औ।

वर्ण कहते है।

8 कंठ- तालव्य :-कंठ और तालु से उच्चारित होने के कारण इन्हें कंठ तालव्य कहते है। जैसे :- व
9 अलीजिह्न. ह।
व्यजनों के साथ मिलाकर लिखे जाने वाले स्वरों मात्राओं के चिह्न
संसार  की हर भाषा में व्यंजन वर्णों के साथ मिलाकर किया जाता है। परन्तु जहॉ लिखने का सवाल आता है, हिन्दी भाषा के अलावा सभी भाषाओं में स्वर तथा व्यंजन वर्णों को अलग अलग लिखा जाता है।
उदहारण के लिए
  • अग्रेंजी में ‘पिन‘(pin) शब्द के ‘पि‘ का उच्चारण ‘प‘ तथा ‘इ‘ को मिलाकर किया जाता है और लिखने समय व्यंजन  (p)और स्वर (i) को अलग अलग लिखा जाता है।

हिंदी में ऐसा नहीं होता। हिंदी में व्यंजन और स्वर को मिलाकर बोला और लिखा जाता है। जैसे – ‘दिन‘ के ‘दि‘ द, इ को लिखा भी जाता है। यही कारण है। कि देवनागरी लिपि में स्वर वर्णों के लिए दो तरह के चिह्न बनाए गए है। स्वतंत्र रूप से उच्चारित स्वर वर्णों के लिए अलग चिह्न तथा व्यंजन वर्णों के साथ मिलाकर लिखे जाने वाले स्वर वर्णों को ‘मात्रा चिह्न कहा जाता है।

स्वंतत्र रूप से उच्चारित स्वर तथा उनके मात्रा चिह्नों के बारे में हम सम्पूर्ण रूप से परिचित है। इसलिए स्वरों और व्यंजन की मात्राओं का उच्चारण इस प्रकार से बता सकते है।

स्वर-वर्णो का उच्चारण करते है- या फिर उस व्यंजन या स्वर को बोलते है। तो ‘अ‘ ध्वनि का उच्चारण सुनाई पडता है। जैसे हम यदि ‘क‘ लिखते है तो क , अ लिखा जाता

व्यंजनों का उच्चारण :-

 

हिंदी के वर्णों में व्यंजनों का उच्चारण स्थान अलग अलग रूप में किया जाता है। जैसे –
  •  क से म तक 25 स्पर्श व्यंजन होते है।
  • य ,र ,ल, व ये चारों अतंस्थ व्यंजन होते है।
  • श,ष , स ,ह ये चारों उष्म व्यंजन होते है।
  • इसके अलावा सयुक्त व्यंजन, द्वित्व व्यंजन, सयुक्ताक्षर व्यंजन आदि को सम्मिलित किया जाता है।

ड़ और ढ़ का प्रयोग या उच्चारण

 

  •  हिंदी वर्णमाला में अब इन दोनों वर्णों को भी सम्मिलित किया गया है ताकि इनका प्रयोग किया जा सके
  • हिंदी वर्णमाला में ये दोनो वर्ण नए है क्योकि इन दोनों वर्णों लगाने से इनकी रचना हुई हैं।
  • वैसे ये ड और ढ के विकसित रूप है।
  • वास्तव में ये वैदिक वर्णों क और क्ह के विकसित रूप हैं। जिनका संस्कृत में अभाव हैं।
  • इन शब्दों का प्रयोग शब्द के मध्य /बीच में या अन्त में किया जाता हैं।
  • इनका उच्चारण करते समय जीभ झटके से ऊपर जाती है, इन्हें उश्रिप्प , ऊपर फेंका जैसे- लड़का, कपड़ , पढा, चना सड़क, हाड़, गाड़ी, पकड़ना, चढ़ाना, गढ़।

ड और ढ का प्रयोग या उच्चारण

 

  •  इसका उच्चारण शब्द के आरम्भ मेंए द्वित्व में और हस्व स्वर के बाद अनुनासिक व्यंजन के संयोग से होता है।
  • द्वित्व व्यंजन में प्रयोग किया जाता है जैसे. बच्चा , पत्ता, अन्न भिन्न चक्की गड्ढा, खड्ढा. ।
  • शब्द के आरम्भ में उच्चारण किया जा सकता है जैसे. डाका, डमरू, ढाका, ढकना, ढोल.
  • हस्व स्वर के पश्रातए अनुनासिक व्यंजन के संयोग के द्वारा प्रयोग किया जाता है रू.. जैसे. डंड, पिंड, चंडू, मंडप

 र का प्रयोग/उच्चारण व उसके विभिन्न रूप

जब: र” वर्ण किसी वर्ण के पहले आता है इसका “अ” रहित उच्चारण होता है। तब हम इसे अगले वर्ण के उपर रेफ लगाते है।

 

दूसरे शब्दों में कह सकते है कि र व्यंजन का उच्चारण या संयोग निम्नलिखित नियमों के आधार पर होता है।

क). – जब स्वर रहित र व्यंजन से मिलता है तब र दूसरे व्यंजन के उपर लगाया जाता है। इसे रेफ कहते है जैसे :-ंर, म- र्म – कर्म, चर्म, आचार्य, आर्य, कार्य आदि ।

ख)-. जब स्वर रहित व्यंजन को र के साथ मिलाते है तो र को इस प्रंकार लिखते है, जैसे :- भ्, र भ्र -भ्रम ,क्रम , श्रम, चक्र आदि ।

ग). जिन व्यंजनों में खडी पाई नहीं होती, उनके साथ र को इस प्रकार लिखते है जैसे :-ट् र ट-टक ,टेन । ड् र – ड …. डम , टाम आदि ।

घ) ’स’ तथा ’त’ के साथ ’र’ को इस प्रकार लिखते है
जैसे—- स् र -स्त्र- सहस्त्र, स्त्रोत्र ।
त ् र -त्र त्रिभुज, त्रिगुण नेत्र ।
ड). ’श’ को ’र’ के साथ इस प्रकार मिलाकर लिखते है,
जैसे श, र -श्र श्रेष्ठ, श्रमदान, श्रमजीवी, श्रीमान, श्रद्धा आदि ।


य ,ल,का प्रयोग या उच्चारण

 

य के उच्चारण में अन्य व्यंजनों की तुलना में अवरोध की मात्रा कम होती है। तथा ल के उच्चारण में जीभ की नोंक मुख के उपरी अगले भाग में स्पर्श कर एक ओर या दोंनो ओर पार्श्व बनाती है। इस आधार पर ‘ल‘ पार्श्विक व्यंजन कहलाते है।

व  और ब   का उच्चारण

 

व का उच्चारणस्थान दन्तोष्ठ हैं, अर्थात दाँत और ओठ के संयोग से व का उच्चारण होता है और  ब का उच्चारण दो ओठों के मेल से होता हैं । संस्कृत में ब  का प्रयोग बहुत कम होता हैं, हिन्दी में बहुत अधिक।

यही कारण है कि संस्कृत के तत्सम शब्दों में प्रयुक्त व वर्ण को हिन्दी में ब लिख दिया जाता हैं। बात यह है कि हिन्दी भाषी बोलचाल में भी” व और ब” का उच्चारण एक ही तरह करते हैं ।

व का उच्चारण ब का उच्चारण
वास-  रहने का स्थान(निवास।)बास-----सुगन्ध,  गुजर।
वंशी--- मुरली।बंशी---मछली फँसाने का यन्त्र।
वेग--- गति।बेग---थैला
अँगरेजी-- कपड़ा ।अरबी-- तुर्की की एक पदवी।
वाद---- मत।बाद--- उपरान्त/पश्रात।
वाह्य---- वहन करने /ढोय/योग्य।बाह्य--  बाहरी।

श.ष.स का उच्चारण

ये तीनों उष्म व्यंजन हैं, क्योंकि इन्हें बोलने से साँस की ऊष्मा चलती हैं। ये संघर्षी व्यंजन हैं।|
|श और श्स के उच्चारण में भेद स्पष्ट हैं। जहाँ श के उच्चारण में जिह्ना तालु को स्पर्श करती है, वहाँ  के उच्चारण में जिह्ना दाँत को स्पर्श करती है। श् वर्ण सामान्यतया संस्कृत, फारसी, अरबी और अँगरेजी के शब्दों में पाया जाता है|
जैसे.
  • पशु, अंश, शराब, शीशा, लाश, स्टेशन, कमीशन इत्यादि
विशेष
  • श, ष, स अघोष हैं।
  • अघोष वर्णों के उच्चारण में स्वर.तंत्रियाँ परस्पर नहीं मिलतीं।
  • वायु, आसानी से निकल जाती।
  • हिन्दी की बोलियों में श, ष का स्थान  स ने ले लिया है।
  • श और .स के अशुद्ध उच्चारण से गलत शब्द बन जाते है और उनका अर्थ ही बदल जाता है।

अर्थ और उच्चारण के अन्तर को दिखलानेवाले कुछ उदाहरण इस प्रकार है.

उच्चारणअर्थउच्चारणअर्थ
1).अंशभागअंसकन्धा
2). शकलखण्डसकलसारा
3). शरबाणसरतालाब
4).शंकरमहादेव.संकरमिश्रित
5). श्र्वकुत्ता स्वअपना
6). शान्तधैर्ययुक्तसान्तअन्तसहित

वर्ण -संयोग (combination of Letter)

 

जब दो अलग अलग वर्ण परस्पर मिलते है। तो, उनके मेल को वर्ण संयोग कहते है।
जैसे :-
  • घ्+ अ- घ ,
  • झ् +अ- झ,
  • ल्+ अ -ल
  • क्+ त – क्त
यह दो प्रकार के होते है।
  •  व्यंजन का -स्वर से सयोंग
  • व्यंजन का- व्यंजन से सयोंग
1. व्यंजन का स्वर से सयोंगः– व्यंजनों के उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता ली जाती है। जब कोई व्यंजन स्वर रहित होता है तब उसके नीचे हलंत लगा देते है। जैसे च्, छ्, ज्, झ्, ट्,व् त् ई – ती , च् ऐ चै आदि।
2. व्यंजन का. व्यंजन से सयोंगः- जब एक रहित व्यंजन रहित किसी दूसरे स्वरयुक्त व्यंजन से मिलता है, तब कुछ नियमों के आधार पर वर्ण सयोंग होता है।

 

वर्ण विच्छेद (Disjoin) 

किसी शब्द में प्रयुक्त सभी वर्णों को पृथक -पृथक करना वर्ण विच्छेद कहलाता है।

अर्थात हम कह सकते है-कि शब्द की रचना को समझने के लिए उस शब्द के वर्णों को अलग-अलग करके दिखाने की प्रकिया ही वर्ण विच्छेद कहलाती है।

हिंदी भाषा में शब्दकोश के ज्ञान आवश्यक है। वर्ण-विच्छेद की सहायता से उच्चारण शुद्ध होता है। जैसे
  •  प्रकृति- प+ र+ अ +क+ ऋ+ त+ इ
  • सुपुत्र-स+ उ+ प+ उ+ त+ र

वर्ण विच्छेद करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें

 

1). वर्ण विच्छेद करने से पहले दिए गए शब्दों का उच्चारण करकें देखें और ध्यान दें उस शब्द की रचना किन किन ध्वनियों के मेल से हुई है। उन ध्वनियों के लिए जो वर्ण निर्धारित करते समय उन्हीं वर्णों को इस प्रकार लिखें

  • प्रश्न —प्+ र्+ अ्+ श्+ न् +अ्
  • दिव्य— द्+ इ् +व् +य् +अ्

2). ध्यान रखें– मात्रा चिह्नों का प्रयोग शब्द को लिखते समय ही किया जाए्गाा वर्ण विच्छेद करते समय नहीं। वर्ण विच्छेद के समय शब्द में आने वाली मात्राओं को स्वतंत्र स्वर वर्णों से ही लिखा जाएगा   जैसे —

  • अनुचित ——अ्+ +न् +उ् +च् +इ् +त् +अ् आदि।
  • विकसित —व्+ इ्+ क्+ अ्+ स्+ इ्+ त+अ् आदि।

3). वर्ण विच्छेद करते समय व्यजंन वर्णों को स्वर रहित दिखाया जाता है। अत:व्यजंन वर्ण के नीचें हलंत का चिह्न लगाएॅ जैसे —

  • प — प्+अ
  • त—त् +अ
  • स—स्+अ
  • र—र्+अ आदि

4). संयुक्त वर्ण युक्त शब्दों का वर्ण—विच्छेद करते समय सभी संयुक्त वर्णों को अपने पूरे रूप में हंलत लगाकर ही लिखें जैसे –

  • गुप्त — ग् +उ् + प् +त् +अ
  • ध्वनि— ध्+व् +अ् + न्+इ्
  • मिटटी— म्+इ+ट्+ट्+ई आदि।।

5).हिंदी में ‘र्’ व्यजंन के लिए तीन चिहन हैं—’र्'( ्+ र्) जो स्वर रहित र् की तीन अलग अलग उच्चारण स्थितियों के लिए हैं— राम् सर्प क्रम आदि। वर्ण—विच्छेद करते समय इन्हें ‘र्’ वर्ण से ​ही लिखें

जैसे —

  • रात –र्+अ+त्+अ
  • प्रेम —प्+र्+ए+म्+अ
  • धर्म— ध्+अ+र्+अ

6). ‘अनुस्वार’ के लिए बिंदु( ं) चिह्न है। लेकिन वर्ण—विच्छेद करते समय इसे बिंदु से न लिखकर ‘अनुस्वार’शब्द ही लिखें जैसे—

  • गंदा— ग्+अ+अनुस्वार+द+आ
  • संगीत —स्+अ +अनुस्वार+ग+ई+त+अ

7).अनुनासिक एक नासिक्यीकृत स्वर है।इसके लिए दो चिह्न हैं— बिंदु तथा चंद्रबिदु। अनुनासिक स्वर युक्त शब्दों का वर्ण—विच्छेद करते समय स्वर वर्ण के उपर इनके चिहन लगाकर ही लिखें

जैसे-

  • आॅसू —आॅ+स्+उ
  • गॉव — ग्+ आॅ+व्+व
  • चोंच— च+ओं+च्+अ

8).’क्ष’ ‘त्र’ और ज्ञ संयुक्त व्यंजन वर्णों की रचना निम्नलिखित वर्णों से हुई है—

  • क्ष — क्+ष््+अ
  • त्र— त्+र्+अ
  • ज्ञ— ज्+ +अ

अत: इन वर्णों से बने शब्दों के वर्ण विच्छेद इन्ही वर्णों के रूप में करें जैसे:

  • दीक्षा — द+ई+क्+ ष्+आ
  • पुत्र— प्+उ+त्+र्+अ
  • आज्ञा — ज्+ + आ

9).जहॉ तक विसर्ग युक्त शब्दों में वर्ण—विच्छेद की बात है वर्ण विच्छेद करते समय विसर्ग को भी अनुस्वार की तरह स्वर के बाद ‘विसर्ग’ शब्द से लिखें जैसे—

  • अत: अ+त् +अ+विसर्ग
  • मति:म्+अ+त्+इ+विसर्ग

उच्चारण व वर्तनी

किसी भी भाषा के वर्णों को मुख से बोलना उच्चारण कहलाता है।

  • विश्व में हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसे जैसा बोला जाता है वैसे ही लिखा जाता है
  •  हिंदी भाषा को शुद्ध रूप में लिखने के लिए शुद्ध उच्चारण करना आवश्यक है।

भाषा को शुद्व बोलने अथवा लिखने के लिए भाषा की वर्तनी संबंधी अशुद्वियों का ज्ञान आवश्यक है। भाषा की वर्तनी संबंधी अशुद्वियों को मानक वर्तनी द्वारा दूर किया जा सकता है।

अत: वर्तनी संबंधी अशुद्वियों को दूर करने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्याान रखना चाहिए।

1. कुछ वर्ण दो रूपों में लिखें जाते है इनमें एक रूप को मानक तथा दूसरे रूप को अमानक कहा जाता है।हमें सदा वर्णों के मानक रूप का ही प्रयोग करना चाहिए। असके लिए हमें पूर्ण ज्ञान होना चाहिए—

मानक रूप — अ ल भ श त्र
अमानक रूप
2. कारक चिहनों को सज्ञांओं से अलग और सर्वनाम के साथ जोडकर लिखते है। जैसे:–

  • लडके ने, लडकी को, उसको ,उन्होनें ,सबको, सबने आदि।

3. सम्मान व्यक्त करने वाले ‘श्री और जी’ शब्दों को अलग अलग लिखा जाता है—

  • श्री राम, माता जी ,श्री राजकुमार जी, दादा जी, मामा जी आदि।

पिताजी शब्द अपवाद के रूप में विकसित है। इसमें जी को संज्ञा के साथ मिलाकर लिखा जाता है।

4. ‘य और व’ श्रुतिमूलक ध्वनियों का प्रयोग विकल्प से होता है। इनका प्रयोग स्वर के रूप में किया जाता है।

  • मानक रूप — आए ,किए, नए ,दिए, गए, नई
  • अमानक रूप — आये ,किये ,नये, दिये, गये, नयी

5.” तवर्ग और पवर्ग” के पंचमाक्षरों के स्थान पर सदैव अनुचस्वार का प्रयोग करते है।

  • मानक रूप —सितंबर, कंचन, हिंदी, सुंदर, संपादक ,अंबर
  • अमानक रूप — सितम्बर ,कच्चन ,हिन्दी ,सुन्दर, सम्पादक , अम्बर

6 अकारांत शब्दों का बहुवचन बनाते समय मानक रूप का प्रयोग करते है।

  • मानक रूप —माताएॅ, लताएॅ,, शाखाएॅ ,,कक्षाएॅ
  • अमानक रूप — मातायें,, लतायें ,शाखायें ,कक्षायें

उच्चारण संबंधी अशुद्धियॉ

 

भाषा कोई भी हो उसमें उच्चारण का बहुत महत्व है— क्योंकि हम जो बोलते और कानों से सुनते है। वही लिखते है।

अत: भाषा का अध्ययन करने के लिए हमें शुद्ध उच्चारण करना चाहिए और सावधानी से सुनना चाहिए क्योंकि कई बार अशुद्ध उच्चारण के कारण वर्तनी भी अशुद्ध हो जाती है जिससे शब्दों के अर्थ भी बदल जाते है।

उच्चारण संबंधी अशुद्धियों के प्रकार

  •  स्वरों के उच्चारण संबंधी अशुद्धियॉ
  • 2 व्यजंनों  के उच्चारण संबंधी अशुद्धियॉ

1). स्वरों के उच्चारण संबंधी अशुद्धियॉ चार प्रकार की होती हैं

  •  हस्व संबंधी अशुद्धियॉ
  •  दीर्घ संबंधी अशुद्धियॉ
  •  विसर्ग संबंधी अशुद्धियॉ
  •  प्लुत संबंधी अशुद्धियॉ

2 व्यजंन के उच्चारण संबंधी अशुद्धियॉ

  • अल्प प्राण —महाप्राण व्यंजन संबंधी अशुद्धियॉ
  •  सयंुक्त व्यंजनों संबंधी अशुद्धियॉ

बलाघात  (Stress)

 

किसी शब्द का उच्चारण करते समय उसके प्रत्येक अक्षर पर समान बल दिया जाता। किसी पर अधिक बल दिया जाता है। तो किसी पर कम।

अतएवः- बोलते समय किसी अक्षर या शब्द पर जो बल दिया है। उसे बलाघात कहते है। जैसेः-
  •  पिता शब्द में ’ता’ पर
  • ’सुहाना’ शब्द में ’हा’ पर
  •  माधूरी शब्द में ’मा’ पर बलाघात
बलाघात दो प्रकार का होता है
  • शब्द बलाघात
  • – वाक्य बलाघात।
1. शब्द बलाघात:–– प्रत्येक शब्द का उच्चारण करते समय किसी एक अक्षर पर अधिक बल दिया जाता है।

जैसे ’सुहाना’ शब्द में ’हा’ पर

हिन्दी भाषा में किसी भी अक्षर पर यदि बल दिया जाए तो इससे अर्थ भेद नहीं होता तथा अर्थ अपने मूल रूप जैसा बना रहता है।

2. वाक्य बलाघात:-

 

 हिन्दी में वाक्य बलाघात सार्थक है। एक ही वाक्य मेँ शब्द विशेष पर बल देने से अर्थ में परिवर्तन आ जाता है। जिस शब्द पर बल दिया जाता है वह शब्द विशेषण शब्दों के समान दूसरों का निवारण करता है। जैसे-
  • श्रोहित ने बाजार से आकर खाना खाया।

उपर्युक्त वाक्य मेँ जिस शब्द पर भी जोर दिया जाएगाए उसी प्रकार का अर्थ निकलेगा। जैसे- श्रोहित शब्द पर जोर देते ही अर्थ निकलता है कि रोहित ने ही बाजार से आकर खाना खाया।  बाजार पर जोर देने से अर्थ निकलता है कि रोहित ने बाजार से ही वापस आकर खाना खाया। इसी प्रकार प्रत्येक शब्द पर बल देने से उसका अलग अर्थ निकल आता है। शब्द विशेष के बलाघात से वाक्य के अर्थ में परिवर्तन आ जाता है। शब्द बलाघात का स्थान निश्चित है किन्तु वाक्य बलाघात का स्थान वक्ता पर निर्भर करता है, वह अपनी जिस बात पर बल देना चाहता है,  उसे उसी रूप मेँ प्रस्तुत कर सकता है।

संगम (Meeting)
दो पदो ंके उच्चारण के समय उचित विराम देना संगम कहलाता है।
उच्चारण करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि किन शब्दों को प्रवाह में पढा जाना है और किनके मध्य में हल्का -सा विराम देना है। जैसे—
  •  मैदान में घास उग आई है। —(उग +आई।)
  • मैनें मैदान में घास उगाई है। —(उगाई)।
  • उसने पानी पी लिया ।—( पी +लिया) ।
  • उसको पीलिया हो गया है।—पीलिया —(एक रोग )

Shabd Vichar (शब्द विचार)

शब्द विचार(Morphology-Word)

आपसी  बातचीत अथवा विचारों के आदान प्रदान के समय हमारे मुख से अनेक प्रकार की ध्वनियॉ निकलती है। इन ध्चनियों के मेल से बने सार्थक ध्वनि समूह को शब्द कहते है। किंतु व्याकरण में केवल उन शब्दों पर विचार किया जाता है। जिनका सार्थक अर्थ होता है। जैसे :-

1 पारूल :-   प्+ आ+ र्+ उ+ ल्+ अ

2 राहुल :-   र् +आ +ह् +उ +ल् +अ

3 नाटक :-  न् +आ+ ट्+ अ+ क्+ अ

4 शुभांगी :- श् +उ +भ् +आ +ग्  +ई

 

शब्द ​विचार का अर्थ:- 

सरल शब्दों में कह सकते है कि— वर्णों के क्रमबद्ध और सार्थक समूह के मेल को शब्द कहते  है।

दूसरे शब्दों में    ध्वनियों के मेल से बने सार्थक वर्ण समुदाय को शब्द कहते है। इसे हम ऐसे भी कह सकते है. वर्णों या ध्वनियों के सार्थक मेल को शब्द कहते है।

अन्य शब्दों में  कह सकते हैदो या दो से अधिक वर्णो से बने ऐसे समूह को शब्द कहते है  जिसका  कोई न कोई अर्थ अवश्य हो।

शब्द ​विचार की परिभाषाएं:-

शब्द ​विचार की निम्नलिखित परिभाषाएं है।

1).शब्द की रचना विभिन्न ध्वनियों के मेल से होती है।

हर  भाषा की स्वर और व्यंजन ध्वनियॉ होती है। जिनके मेल से तरह तरह के शब्द बनते है। वर्ण विच्छेद के माध्यम से हम पता लगा सकते है कि किसी शब्द की रचना किन किन ध्वनियों के मेल से हुई है। प्रश्न यह उठता है। कि क्या कोई भी अन्य ध्वनि के साथ मिलकर किसी भी अनुक्रम में शब्द बना सकती है? नही, ’किताब’ शब्द में आई ध्वनि के यदि क्रम बदल दिए जाएॅ तो इस तरह से बनी रचनाएॅ हिंदी के शब्द नहीं होगेंजैसे :-

1 क् +आ+ त् +इ +ब्+ अ- कातिब इनको

2 त् +इ +क् +आ+ ब् +अ -तिकाब

3 ब्+ इ +त् +आ+ क् +अ – बिताक आदि ।

अर्थात ’किताब’ ’तिकाब’ और बिताक रचनाएॅ विभिन्न ध्वनियों से मिलकर बनी है।पर ये निरर्थक रचनाएॅ है। इनका कोई अर्थ नही है अतः ’शब्द’ नहीं कह सकते शब्द के लिए उसका सार्थक या अर्थवान होना अनिवार्य शर्त है। जो निरर्थक है उसे शब्द नहीं कह सकते

2). शब्द भाषा की अर्थवान या सार्थक ईकाई :-

शब्द के बारे में एक बात और ध्यान रखनी चाहिए कि वाक्यसे बाहर की इकाई होने के कारण शब्द एक स्वतंत्र इकाई है। वाक्य में प्रयुक्त होने पर शब्द वाकय के नियमों में बॅध जाता है। वाक्य से बाहर की इकाई होने के कारण शब्द का प्रयोग भाषा में स्वतंत्र रूप से किया जा सकता है। शब्द कोश में शब्दों को इसीलिए स्थान दिया जाता हैकि , वे स्वतंत्र इकाई है।

3).शब्द भाषा की स्वतंत्र इकाई है।:-

विभिन्न ध्वनियों के मेल  से बनी अर्थवान एंव स्वंतत्र रचना शब्द कहलाती है। उपर्युक्त ध्वनि समूहों के मेल का एक सार्थक अर्थ है। अतः इस मेल से बने सभी शब्द ’सार्थक शब्द’ कहते है।

शब्द की प्रमुख विशेषताएॅ इस प्रकार है।

ऽ सभी शब्दों के वर्णों का एक निश्चित क्रम होता है।

ऽ शब्द भाषा की स्वतंत्र इकाई है।

ऽ  शब्द की रचना ध्वनियों के मेल से होती है।

ऽ  व्याकरण में हर या प्रत्येक शब्द का कोई ना कोई अर्थ अवश्य होता है।

ऽ  जो निरर्थक है उसे शब्द नहीं कह सकते।

ऽ  व्याकरण में केवल सार्थक शब्दों पर ही विचार किया जाता है निरर्थक शब्दों पर नहीं

ऽ शब्दों का वाक्यों में प्रयोग किया जा सकता है।

शब्द एवम् पद

शब्द की सत्ता वाक्य से बाहर है। अतः शब्द स्वतंत्र होता है। लेकिन शब्द जब वाक्य में प्रयुक्त होता है। तब वह शब्द नही कहलाता पद कहलाता पद कहलाता है। पद बनने की प्रकिया के अंर्तगत शब्द के साथ के साथ निम्नलिखित कार्य होते है-

 1). शब्द वाक्य के नियमों में बॅध जाता है उसकी स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है।

हर भाषा की सरचंना के अपने कुछ नियम होते हैं जो शब्द को ’पद’ में बदलने के लिए निम्नलिखित कार्य करते है।वाक्य में शब्द का स्थान वाक्य सरंचना के नियम तय करते हैवाक्य में कौन-सा शब्द किस स्थान पर आएगा।इसका निर्धारण उस भाषा की संरचना के नियमों द्वारा तय किया जाता है। उदहारण के लिए , हिंदी ं  की संरचना के अनुसार वाकय में पहले कर्ता फिर कर्म और अंत में क्रिया आते है जबकि अग्रेंजी में वाक्य में पहले कता फिर क्रिया और अंत में कर्म आते है।

हिंदी में   – लडकी खाना बना रही है।

अग्रेजी में –  the girl is cooking food

2).शब्द के रूप में परिवर्तन होता है

वाक्य में प्रयुक्त होने पर शब्द कोई  न कोई ऐसा प्रत्यय अवश्य लगता हैजो उसके रूप को परिवर्तित कर देता है। ऐसे प्रत्यय को रूप परिवर्तक या रूप साधक प्रत्यय कह सकते हैं रूप साधक प्रत्यय लगने के लगने से शब्द  के रूप में परिवर्तन मात्र होता है। उसकी कोटि नहीं बदलती है।  उदहारण के लिए

  • बच्चे ने किताब पढी । —- बच्चा  ए – (तिर्यटक) एकवचन सुचक प्रत्यय
  • हे बच्चों अपना अपना काम करो। — बच्चा ओ – सबोधन एकवचन सुचक प्रत्यय
  • बच्चो ने खाना नहीं खाया। —–बच्चा  ओ – (तिर्यक)  बहुवचन सुचक प्रत्यय

लेकिन हिंदी में निम्नलिखित प्रकार के वाक्य भी मिलते हैं जिनमें प्रयुक्त शब्दों में प्रत्यय नहीं देता, जैसे –

ऽ             बच्चा गिर गया।     —0        बच्चा शून्य प्रत्यय -सामान्य एकवचन सूचक प्रत्यय

ऽ             बच्चा काम कर रहा है।—-0बच्चा शून्य प्रत्यय-सामान्य एकवचन सूचक प्रत्यय

 

ऐसी स्थितियों के लिए आधुनिक भाषा विज्ञान ने ’शून्य प्रत्यय’ की संकल्पना की है। इसके अनुसार, यदि वाक्य में किसी शब्द में प्रत्यय दिखाई नहीं देता है। तो यह मानकर चलना चाहिए कि वहॉ ’शून्य प्रत्यय’ लगा हुआ है। ’शून्य प्रत्यय’ भी वही प्रकार्य होने करता है जो अन्य ’रूप परिवर्तन’ प्रत्यय करते है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि वाक्य में प्रयुक्त होने वाले शब्द में कोई न कोई ’रूप परिवर्तक प्रत्यय’ अवश्य लगेगा। भले ही वह शून्य प्रत्यय ही क्यों न हो। किस शब्द में कौन सा प्रत्यय लगेगा। यह उस के नियमों द्वारा तय किया जाता है

3).शब्द कोई ना कोई प्रकार्य अवश्य होता है।

जब कोई शब्द वाक्य में प्रयुक्त होता है। तो वह कोई न कोई प्रकार्य अवश्य करता है। अर्थात वाक्य में प्रयुक्त सभी शब्द कर्ता, कर्म, विशेषण  क्रियाविशेषण ,अथवा क्रिया का प्रकार्य करते है। प्रकार्य के आधार पर ही शब्द की व्याकरणिक कोटि तय की जाती है। उदहारण के लिए

वाक्य 1. मेरे पिताजी बहुत बिमार है।

वाक्य 2. बच्चों के लिए खेलना जरूरी है।

वाक्य -1 में प्रयुक्त मेरे पद मूलतः सर्वनाम है। पर यहॉ ’मेरे’ पद ’पिताजी’ पद की विशेषता बताने का कार्य कर रहा है अतः सर्वनाम न होकर विशेषता का प्रकार्य कर रहा है। ऐसे विशेषण को इसीलिए ’सार्वनामिक  विशेषण कहा जाता है। इसी तरह वाक्य-2 में प्रयुक्त खेलना शब्द मूलतः क्रिया शब्द है, लेकिन वाक्य में संज्ञा का प्रकार्य करने के कारण ’संज्ञा पद’ बन गया है। ऐसे संज्ञा पदों को जो क्रिया से बने हैं, ऐसे संज्ञा पदों को जो क्रिया से बने है, क्रियात्मक संज्ञा कहते है।

शब्द और पद में अंतर

शब्द  और पद  दोनों को एक नहीं माना जाता है। इन दोनों में पर्याप्त अंतर होता है।

शब्द.

1.स्वतंत्र एवं सार्थक वर्ण समूह ’शब्द’ कहलाता है।

2 .शब्द स्वतंत्र होते है।

3.लडकी, रस्सा, कूदना , आदि शब्द है।

पद.

1.लेकिन शब्दों को जब वाक्य में प्रयुक्त किया जाता है, तो वह पद कहलाता है।

  1. पद वाक्य में व्याकरण के नियमों में बधें रहते है।
  2. वाक्य में प्रयुक्त करने पर इनका रूप इस प्रकार हो जाता है, लडकी रस्सा कुदती है। ’’

शब्द भण्डार

प्रत्येक भाषा  में शब्दों की सख्ंया असीमित होती है। हिंदी में भी अनेक प्रकार के असख्ंय शब्द है। इनमें में से बहुत से शब्द सस्ंकृत से , विभिन्न विदेशी भाषाओं से तथा हिंदी की बोलियों से आए है। इनके अलावा बहुत से  नए शब्दों का विकास किया है। कहने का तात्पर्य यही है। कि भाषा में तरह तरह शब्दों का भण्डार होता है। जिनका वर्गीकरण निम्न आधारों पर किया गया है।

शब्दों का वर्गीकरण :-

.शब्दों को पाचॅ आधारों पर वर्गीकृत किया गया है।

1).स्त्रोत या उत्पति के आधार पर(Based on source)

2).रचना के आधार पर (Based on construction)3

3).अर्थ के आधार पर(Based on meaning)

4).प्रयोग के आधार पर (Based on user)

5)..शब्द विकार के आधार पर(Based on words)

 

1).स्त्रोत या उत्पति के आधार पर

स्त्रोत’ शब्द की स्त्रोत अग्रेंजी के(Source)शब्द का तात्पर्य है जिसका अर्थ है-’उदगम स्थान’ शब्दों का स्त्रोत उस भाषा को  माना जाता है जिससे किसी शब्द की उत्पति हुई है। हिंदी के अनेक शब्दों का उदगम स्त्रोत संस्कृत है जो या तो  अपने मूल रूप में अथवा कुछ परिवर्तित होकर हिंदी में प्रयोग किए जाते है।

शब्द की उत्पति जिस भाषा से होती है वह भाषा उस ’’स्तोत्र-भाषा’कहलाती है।

  • तत्सम शब्द  ।
  • तद्भव शब्द ।
  • देशज शब्द  
  • विदेशी शब्द।
  • संकर शब्द ।

 

  तत्सम शब्द : जिन शब्दों की स्त्रोतभाषा ’संस्कतृ’ है, वे ’तत्सम शब्द ‘ कहलाते हैं तत्सम शब्द की रचना दो शब्दों से मिलकर हुई है-’’तत तथा सम ’’तत् का अर्थ है- उसके ‘तथा ’’सम’का अर्थ है-’समान’

अतः तत्सम शब्द का अर्थ होगा “उसकें समान” यहॉ उसके सर्वनाम का प्रयोग सस्ंकृत के लिए किया जाता है। अतः तत्सम शब्द का अर्थ है वह शब्द जो ’ संस्कृत के समान  है। वस्तुतः तत्सम शब्द वे शब्द होते हैं जो बिना किसी परिवर्तन के संस्कृत से हिंदी में आ गए हैं और आज भी उसी रूप में प्रयुक्त किए जाते है।

सरल शब्दों में कह सकते है- संस्कृत भाषा के वे शब्द जो हिन्दी में अपने वास्तविक रूप में प्रयुक्त होते है, उन्हें तत्समशब्द कहते है।  अग्नि, क्षेत्र, वायु, रात्रि, सूर्य आदि।

दूसरे शब्दों में.  सस्ंकृत के जो शब्द अपने मूल रूप में हिंदी में प्रयोग किए जाते है। उन्हें तत्समशब्द कहते है।जैसे -सर्प, मयूर, ग्राम, अग्नि, नृत्य, जिहा,  माता, विद्या, नदी, फल, पुष्प, पुस्तक, पृथ्वी, क्षेत्र, कार्य, मृत्यु  आदि ।

तत्समहिंदीतत्समहिंदी
आम्रआमगोमल ,गोमयगोबर
उष्ट्रऊॅंटघोटकघोड़ा
चंचुचोंचपर्यकपलंग
त्वरिततुरंतभक्त्तभात
शलाकासलाईहरिद्राहल्दी, हरदी
चतुष्पदिकाचौकीसपत्रीसौत
उद्वर्तनउबटनसूचिसुई
खर्परखपरा, खप्परसक्तुसत्तू
तिक्ततीताक्षीरखीर

 तद्भव शब्द :- तदभव शब्द -’तत तथा ’भव’ शब्दों के मेल से बना है। जिसका अर्थ है’–उससे हुए’ या उससे विकसित हुए’ अर्थात वे शब्द जो सस्ंकृत शब्दों से थोडे -बहुत परिवर्तन हुए हैं या उनके परिवर्तित रूप है। इन शब्दों को देखकर मूल रूप का पता लगाया जा सकता है।

दूसरे शब्दों में. :-संस्कृत भाषा के ऐसे शब्द, जो बिगड़कर अपने रूप को बदलकर हिन्दी में मिल गये है  तद्भव शब्द कहलाते है। जैसे.आग –अग्नि, , खेत-क्षेत्र , रात –रात्रि  सूरज –सूर्य  आदि।

संस्कृततदभवसंस्कृततदभव
दुग्धदूधउच्च ऊँचा
हस्तहाथदिवसदिन
कुब्जकुबड़ाधैर्यधीरज
कर्पूरकपूरपंचपाँच
अंधकारअँधेरापक्षीपंछी
अक्षिआँखपत्रपत्ता
अग्निआगपुत्र बेटा
मयूर मोरशतसौ
आश्चर्यअचरजअश्रुआँसू
उच्चऊँचामिथ्याझूठ
ज्येष्ठजेठमूढ़ मूर्ख
कार्य काममृत्यु मौत
क्षेत्रखेतरात्रिरात
जिह्वा जीभप्रस्तर पत्थर
कर्ण कणशून्यसूना
तृणतिनकाश्रावण सावन
दंतदाँतसत्यसच
स्वप्न सपनास्वर्ण सोना

3).देशज या देशी शब्दः   देशज शब्द का अर्थ है- देश में जन्मा हुआ। देशज शब्द वे शब्द हैं जिनका स्तोत्र हिंदी की बोलियों तथा ग्रामीण अंचल है। अर्थात वे शब्द है।जो ग्रामीण क्षेंत्रों तथा बोली क्षेत्रों से हिंदी में आए हैं,देशज शब्द कहलाते है  ।जैसे अटकल,झकझक, भोंदू , झाडू, गडबड, ,झझट, भोंपु, लोटा, पगडी, खिडकी, थैला, डिबिया , ठोकर, थप्पड ,पेट, छोरा, बेटा पैसा, जूता, ढेर, रोटी आदि।

अर्थात हम कह सकते है कि–  जो शब्द क्षेत्रीय प्रभाव के कारण परिस्थिति व आवश्यकतानुसार बनकर प्रचलित हो गए हैं वे देशज कहलाते हैं। जैसे.पगड़ी ,गाड़ी,, थैला,, पेट,,,खटखटाना आदि।

दूसरे शब्दों में. जो शब्द देश की विभिन्न भाषाओं से हिन्दी में अपना लिये गये हैए उन्हें देशज शब्द कहते है।जैसे. चिड़िया, कटरा, कटोरा, खिरकी,जूता, खिचड़ी, पगड़ी, लोटा,डिबिया, तेंदुआ, कटरा, अण्टा, ठेठ, ठुमरी, खखरा, चसक, फुनगी, डोंगा आदि।

 

4 आगत, विदेशी या विदेशज. आगत शब्द का अर्थ है– आया हुआ। वे शब्द जो अरबी फारसी, तुर्की, अग्रेंजी, पुर्तगाली आदि विदेशी भाषाओं से हिंदी में आ गए हैं आगत या विदेशी शब्द कहलाते है।

अर्थात हम कह सकते हैकि- विदेशी जातियों के संपर्क से उनकी भाषा के बहुत से शब्द हिन्दी में प्रयुक्त होने लगे हैं। ऐसे शब्द विदेशी अथवा विदेशज कहलाते हैं। जैसे.स्कूल, अनार, आम, कैंची,अचार, पुलिस, टेलीफोन, रिक्शा आदि। ऐसे कुछ विदेशी शब्दों की सूची नीचे दी जा रही है।

 

अंग्रेजी. कॉलेज, पैंसिल, रेडियो, टेलीविजन,  डॉक्टर,, लैटरबक्स, पैन, टिकट, मशीन, सिगरेट, साइकिल, बोतल, बुक, स्टेशन, कार,  स्कूल, कंप्यूटर, ट्रेन, सर्कस, ट्रक, टेलीफोन, टिकट, टेबुल इत्यादि।

फारसी. अनार, चश्मा,  जमींदार,    दुकान, दरबार,  नमक, नमूना, बीमार,,  बरफ, रूमाल, आदमी,  चुगलखोर, गंदगी ,चापलूसी आदि।

अरबी. —-औलाद,  अमीर, कत्ल, कलम, कानून, खत, फकीर, रिश्वत, औरत, कैदी, मालिक, गरीब , असर, किस्मत, खयाल, दुकान, औरत, जहाज, मतलब, तारीख, कीमत, अमीर, औरतए, इज्जत,  इलाज,  वकील,  किताब,  कालीन,  मालिक, गरीब, मदद इत्यादि आदि।

तुर्की— . कैंची, चाकू, तोप, बारूद, लाश, दारोगा, बहादुर,  काबू, तलाश, चाकू, बेगम इत्यादि।

पुर्तगाली. —अचार, आलपीन, कारतूस, गमला, चाबी, तिजोरी, तौलिया, फीता, साबुन, तंबाकू, कॉफी, कमीज, अलमारी, बाल्टी, फालतू,  तौलिया इत्यादि।

 फ्रांसीसी. —पुलिस, कार्टून,  इंजीनियर, कर्फ्यू, बिगुल आदि।

चीनी—. तूफान,  लीची , चाय,  पटाखा आदि।

यूनानी. टेलीफोन, टेलीग्राफ, ऐटम डेल्टा

जापानी. रिक्शा आदि।

इनमें फारसी, अरबी,  तुर्की, अँगरेजी, पुर्तगाली और फ्रांसीसी भाषाएँ मुख्य है। अरबी, फारसी और तुर्की के शब्दों को हिन्दी ने अपने उच्चारण के अनुरूप या अपभ्रंश रूप में ढाल लिया है

फारसी शब्द

पैदावार, ,पलक, पुल, पारा, पेशा, पैमाना, बेवा, बहरा, बेहूदा, बीमार, बेरहम, मादा माशा, मलाई, मुर्दा मजा,,मुफ्त मोर्चा, मीना, मुर्गा मरहम, याद, यार, रंग, रोगन, राह, लश्कर, लगाम, लेकिन, वर्ना, वापिस, शादी, शोर, सितारा, सितार, सरासर, सुर्ख, सरदार, सरकार, सूद,सौदागर, हफ्ता, हजार, अफसोस, आबदार, आबरू, आतिशबाजी, अदा, आराम, आमदनी, आवारा, आफत, आवाज, आइना, उम्मीद, कबूतर, कमीना, कुश्ती, कुश्ता, किशमिश, कमरबन्द, किनारा, कूचा, खाल, खुद, खामोश, खरगोश, ,खुश, खुराक, खूब, गर्द, गज, गुम, गल्ला, गवाह, गिरफ्तार, गरम, गिरह, गुलूबन्द, गुलाब गुल,  चाबुक, चादर, चिराग, चश्मा, चरखा, चूँकि, चेहरा, चाशनी, जंग, जहर, जीन, जोर, जबर, जिन्दगी, जादू, जागीर, जान, जुरमाना, जिगर, जोश, तरकश, तमाशा, तेज, तीर, ताक तबाह, तनख्वाह, ताजा, दीवार, देहात, दस्तूर, दुकान, दरबार, दंगल, दिलेर, दिल, दवा, नामर्द, नाव, नापसन्द, पलंग,  इत्यादि।

अरबी शब्द

दुनिया, दौलत, दान, दीन, नतीजा, नशा, नाल, नकद, नकल, नहर, फकीर, फायदा, फैसला, बाज, बहस ,बाकी, मुहावरा, मदद,मरजी, माल, मिसाल, मजबूर, मालूम, मामूली, मुकदमा, मुल्क, मल्लाह, मौसम, मौका, मौलवी, मुसाफिर, मशहूर, मजमून, मतलब, मानी, मान, राय, लिहाज, लफ्ज, लहजा, लिफाफा, लायक, वारिस, वहम. वकील. शराब. हिम्मत. हैजा. हिसाब. हरामी. हद. हज्जाम. हक, हुक्म, हाजिर, हाल, हाशिया, हाकिम, हमला, हवालात, हौसला, अदा, अजब, अमीर, अजीब, अजायब, अदावत, अक्ल, असर, अहमक ,अल्ला, आसार, आखिर आदमी, आदत, इनाम, इजलास, इज्जत, इमारत, इस्तीफा, इलाज, ईमान, उम्र, एहसान, औरत, औसत, औलाद, कसूर, कदम, कब्र, कसर, कमाल, कर्ज, क़िस्त, किस्मत, किस्सा, किला, कसम, कीमत, कसरत, कुर्सी, किताब, कायदा, कातिल, खबर, खत्म, खत, खिदमत, खराब, खयाल, गरीब, गैर, जिस्म, जलसा, जनाब, जवाब,जहाज, जालिम, जिक्र, तमाम, तकदीर, तारीफ, तकिया, तमाशा, तरफ, तै, तादाद, तरक्की, तजुरबा, दाखिल, दिमाग, दवा, दाबा, दावत, दफ्तर, दगा, दुआ, दफा, दल्लाल, दुकान, दिक इत्यादि।

ऽतुर्की शब्द

आगा आका, उजबक, उर्दू, कालीन, काबू, कैंची, कुली, कुर्की, चिक, चेचक, चमचा, चुगुल, चकमक, जाजिम तमगा, तोप, तलाश, बेगम, बहादुर, मुगल, लफंगा, लाश, सौगात,   सुराग ,,तुर्क, कुरता, कलगी ,गलीचा, मुचलका, चाकू, तमगा, ताश, तोपची, दारोगा, बावर्ची, , चम्मच, बारूद, नागा, कुर्ता ,कूच, गनीमत, चोगा  , खच्चर  इत्यादि।

अंग्रेजी शब्द  तथा ऐशियाई एवम् यूरोपीय भाषाओं से आए शब्द   :- लाइसेंस दीगर आॅटों ग्लास मास्टर शूज तोप बूट हॉस्पीटल इन्सपेक्टर प्रिंसिपल टीचर स्लेट    डायरी  पेस्ट पार्टी डिग्री कैसेट माउस डॉक्टर टेलीफोन स्कूल कॉलेज टाई चॉकलेट बिस्किट रेडियो कैमरा कार कंप्यूटर लाइ रेल पेस्ट्री टे्रन स्वेटर सिगरेट बैंक इत्यादि

 

इनके अतिरिक्तए हिन्दी में अँगरेजी के कुछ तत्सम शब्द ज्यों.के.त्यों प्रयुक्त होते है। इनके उच्चारण में प्रायः कोई भेद नहीं रह गया है। जैसे. अपील, आर्डर, इंच, इण्टर, इयरिंग, एजेन्सी, कम्पनी, कमीशन, कमिश्रर, कैम्प, क्लास, क्वार्टर, क्रिकेट, काउन्सिल, गार्ड, गजट, जेल, चेयरमैन, ट्यूशन, डायरी, डिप्टी, डिस्ट्रिक्ट, बोर्ड, ड्राइवर, पेन्सिल, फाउण्टेन, पेन, नम्बर, नोटिस, नर्स, थर्मामीटर, दिसम्बर, पार्टी, प्लेट, पार्सल, पेट्रोल, पाउडर, प्रेस, फ्रेम, मीटिंग, कोर्ट, होल्डर, कॉलर इत्यादि।

अंग्रेजी (तत्सम)तद्भवअंग्रेजी (तत्सम)तद्भव
ऑफीसरअफसर थियेटर थेटरए,ठेठर
एंजिन इंजनटरपेण्टाइनतारपीन
डॉक्टरडाक्टर माइलमील
लैनटर्नलालटेन बॉटलबोतल
स्लेटसिलेट कैप्टेन कप्तान
हास्पिटलअस्पताल टिकटटिकस

पुर्तगाली शब्द

अन्नास ,अलमारी, आलपिन, आया ,इस्त्री, इस्पात, कमीज,  कमरा, कर्नल, काज, काफी,काजू ,गमला, गोभी, गोदाम, चाबी, तैलिया, पपीता, नीलाम, पादरी, फीता, बाल्टी ,बोतल, ​िमस्त्री, संतरा आदि।

हिन्दी पुर्तगाली
अलकतराAlcatrao
अनत्रासAnnanas
आलपीनAlfinete
आलमारीAlmario
बाल्टीBalde
किरानी Carrane
चाबी Chave
फीताFita
तम्बाकूTabacco

संकर शब्द :-जो शब्द दो विभिन्न भाषाओं के शब्दों के मेल से बनते हैं, संकर शब्द कहलाते हैं।

सरल शब्दों में कह सकते है- दो भिन्न स्त्रोतों से  आए शब्दों के मेल से बने नए  शब्दों को संकर शब्द कहते है। हिंदी में संकर शब्दों के कुछ ही उदहारण देखने को मिलते हैं इनकी रचना प्रायः सस्ंकृत तथा हिंदी , हिंदी तथा अग्रेंजी, अग्रेंजी तथा अरबी-फारसी, अरबी तथा फारसी, अग्रेंजी तथा हिंदी आदि के मेल से हुई है

हिंदी +अग्रेंजी:कपडा+मिल=कपडामिल,लाठ़ी+ चार्ज— लाठ़ीचार्ज
अग्रेंजी+ हिंदीरेल+ गाडी = रेलगाडीटिकट+घर — टिकटघर
हिंदी +फारसीछाया+दार = छायादारपान+दान —पानदान
अग्रेंजी + फारसीजेल+खाना= जेलखानासील+बंद— सीलबंद
फारसी+ हिंदी बे +डौल = बेडौलखून+पसीना— खूनपसीना
अरबी-फारसीतहसील+दार= तहसीलदारफिजूल+खर्च -फिजूलखर्च

रचना/बनावट के आधार पर शब्द- भेदः-

यदि शब्दों की रचना पर ध्यान दिया जाए तो हर भाषा में दो तरह के शब्द मिलते हैं। कुछ मूल शब्द होते है और कुछ दो मूल शब्दों के मेल से बनते हैं। इस आधार पर शब्दों े प्रमुख भेद सामने आते हैं। 1 मूल शब्द   2. यौगिक शब्द

1).मूल शब्द

वे सरल शब्द जिनके और छोटे अर्थवान नहीं किए जा सकते मूल शब्द कहलाते है। जैसेः-चावल, सब्जी, फल, रूपया, पैसा मकान, कलम,  पुस्तक, ऑख , कान, नाक, पेट नाक, दाल, आदि

यों तो हर मूल शब्द का अपना एक अर्थ होता है। जिसे मुख्य अर्थ कहते है। कभी कभी कुछ मूल शब्द का प्रयोग अपने मुख्य अर्थ से हटकर किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति के लिए होने लगता है। वह शब्द उस वस्तु या व्यक्ति के लिए रूढ हो जाता है।उदहारण के लिए :- हिंदी में गधा शब्द का समान्य अर्थहै-विशेष नए पशु’ में यह श्ब्द मूर्ख के अर्थ में रूढ हो गया है। यदि किसी लडके के लिए कहा जाए कि ’वह लडका गधा है।’ इसका अर्थ यही लिया जाएगा कि ’वह लडका मूर्ख है’ अतः मूल शब्द दो तरह के हो जाते है।

1.सामान्य मूल शब्द    2. रूढ मूल शब्द   

क .सामान्य मूल शब्द :- इस वर्ग में सभी  मूल शब्द आते है।  जैसे रात ,दिन,  साल, महीना, बरस, घोडा, बकरा, शेर, चिता, लोमडी, बिल्ली, दाल, चावल, मेज, कुरसी, चादर, तकिया, रजाई, कंबल, गद्दा, केला, संतरा, स्कूल, इमारत, मकान, पहाड, घाटी, नौकरी, व्यापार आदि।

ख.  रूढ मूल शब्द :- जो शब्द प्रयोग होते होते किसी विशेष अर्थ में, किसी वस्तु विशेष के लिए निश्चित हो गए हों, उन्हें रूढ शब्द कहते है। जैसे घर, फल, दूध, पुस्तक आदि। अर्थात इस वर्ग में वे मूल शब्द आते हैं जो अपने अनेक अर्थों में से किसी एक अर्थ में रूढ हो जाते है।

दूसरे शब्दों में कह सकते है-किसी विशेष अर्थ में प्रयोग होने वाले ऐसे शब्द जिनके  सार्थक खंड या टुकड़े न किए जा सकते हों, रूढ शब्द कहलाते है।   जैसे →

 

जिन शब्दों के सार्थक खंड न हो सके और जो अन्य शब्दों के मेल से न बने हों उन्हें रूढ शब्द कहते है। इसे मैलिक या अयौगिक शब्द भी कहा जाता है। जैसे चावल, शब्द का यदि हम खंड करेंगें तो चाव,ल तो  ये निरर्थक खंड होगें। अतः चावल शब्द रूढ शब्द कहते है। अन्य उदहारण – दिन, घर , मुॅह, घोडा आदि ।

2).यौगिक शब्दः-

यौगिक शब्द का अर्थ है-मेल से बना हुआ।

जो शब्द दो या दो से अधिक शब्दों से मेल शब्दों से मिल कर बनता है, उसे यौगिक शब्द कहते है, जैसे –

  1. विज्ञान- वि+ ज्ञान
  2. सामाजिक- समाज +इक
  3. विद्यालय – विद्या का आलय
  4. राजपुत्र- राजा का पुत्र आदि।

अन्य शब्दों में कह सकते है कि– जिन शब्दों के सार्थक खंड या टुकड़े किये जा सकते है उन्हें योगिक शब्द कहते हैं द्य  योगिक शब्दों का निर्माण दो या दो से अधिक शब्दों या शब्दांशों के योग से होता है द्जैसे  →

 

जिस तरह  कुछ मूल शब्द किसी विशिष्ट अर्थ हो जाते हैं उसी तरह कुछ ’’यौगिक शब्द’ भी किसी विशिष्ट अर्थ में रूढ हो जाते हैं जैसे ’घरवाली’ एक यौगिक शब्द है, जो ’घर’तथा ’वाली’ दो शब्दों के मेल से बना है। इस शब्द का समान्य अर्थ है ’’गृहस्वामिनी’ लेकिन हिंदी में यह ’पत्नी’के अर्थ के लिए रूढ हो गया है। अतः जो ’यौगिक शब्द ’’किसी विशिष्ट अर्थ के लिए रूढ हो जाते हैं, योगरूढ कहलाते है।

योगरूढ़ →दो या दो से अधिक शब्दों या शब्दांशों के मेल से बने ऐसे शब्द जो अपने समान्य अर्थ को छोडकर किसी विशेष अर्थ का बोध कराते है, ’योगरूढ शब्द’ कहलाते है। जैसे –

रूढ़ यौगिक शब्द—— समान्य अर्थ ——–रूढ अर्थ
जलज —जल+ल ——-कमल,मछली,शंख —-कमल
जलद —जल+द——– बादल कपूर———–बादल
घरवाला -घर+वाला——– गृहस्वामी ————-पति
अक्षर — अ+क्षर ———- शिव,ब्रहमा,सत्——–,वर्ण
रंगभूमि—रंग +भूमि———अखाडा,नाटक का स्थान ,रगंभूमि——- नाटक का स्थान

 

नोट →    योगरूढ़ शब्द में केवल बहुव्रीहि समास के उदाहरण ही आते हैं

 

1).सार्थक शब्द

2).निरर्थक शब्द

1).  सार्थक शब्द

जिन शब्दों का कुछ अर्थ होता है, अर्थात  जिन शब्दों का कुछ.न.कुछ अर्थ हो वे शब्द सार्थक शब्द कहलाते हैं। जैसे.रोटी, पानी, ममता, डंडा , पुस्तक, कमल, पर्वत, आदि।

दूसरें शब्दों में कह सकते है कि– जिन शब्दों का कोई निश्चित अर्थ होता है उन्हें सार्थक शब्द कहते हैं एजैसे → कलम, कोयल,  घर,  एरोटी, पानी, ममता, डंडाआदि

2). निरर्थक शब्द …..

जिन शब्दों का कोई नहीं अर्थ होता हैए उन्हें निरर्थक शब्द कहते हैं ।

जैसे → वाय – वोटी,  रोटी—वोटी, पानी—वानी, डंड-.वंडा इनमें वोटी, वानी, वंडा आदि निरर्थक शब्दआदि ।

3).अर्थ के आधार पर :-

अर्थ के आधार पर शब्दों को निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किया गया है।

एकार्थी शब्द,,अनेकार्थी शब्द,पर्यायवाची शब्द,विलोम शब्द,समरूप भिन्नार्थक शब्द आदि

एकार्थी शब्द

जिन शब्दों से केवल एक ही अर्थ का बोध होता है,वे शब्द जिनका एक ही अर्थ होता है एकार्थी शब्द कहलाते है। उन्हें एकार्थी शब्द कहते हैं द्य

जैसे →मोहन, सोहन,आगरा,कानपूर आदि

अनेकार्थी शब्द

जिन शब्दों से एक से अधिक अर्थों का बोध होता है ,वे शब्द जिनके एक से अधिक अर्थ होते है।उन्हें अनेकार्थी शब्द कहते हैं जैसे →

  • कुल——— वंश,सब,गोत्र
  • जलधर——— बादल,समुद्र
  • वर——— वरदान,दूल्हा,श्रेष्ठ
  • चपला— लक्ष्मी, बिजली,
  • नग—— नगीना, पर्वत आदि।

पर्यायवाची शब्द 

जिन शब्दों के अर्थ समान होते हैंए उन्हें पर्यायवाची शब्द कहते हैं  ।

जैसे →

  • रावण— दशानन,दशकंठ,लंकापति
  • हिरण— मृग,सारंग,कुरंग
  • लहू— रक्त,रूधिर,खून,शेणित

 

विलोम शब्द

विपरीत अर्थ बताने वाले शब्दों को विलोम शब्द या विपरीतार्थक शब्द कहते है ।

यश— अपयश
दूषित—स्वच्छ
जाग्रत— सुप्त
ज्ञानी —अज्ञानी

समानभासी शब्द युग्म या श्रुतिसम भिन्नार्थक या समरूप भिन्नार्थक

जो शब्द सुनने में एक जैसे,एक समान ,लगते/ प्रतीक होते हैं परंतु उनके अर्थ में अधिक अन्तर आता पाया जाता है।उन्ही को ’समश्रुतिभिन्नार्थक शब्द’ कहते है

 शब्दअर्थ
1गिरिपर्वत
गिरीगिरना
2गुरउपाय
गुरूशिक्षक
3अवधिसमय सीमा
अवधी एक भाषा
4मद्यशराब
मदमस्ती, नशा
5कूलकिनारा
कुलवंश
6निधनमृत्यु
निर्धनगरीब

वाक्यांश के लिए एक शब्द

अनेक शब्दों के स्थान पर आने वाले एक शब्द को ’’ वाक्यांश के लिए एक शब्द कहते है जैसे

  • जिसमें कोई सन्देंह ना हो— असदिग्ध
  • जो भूमि अधिक उपजाउ हो— उर्वरा
  • पराए दोष ढूढॅंने वाली —छिद्रानवेशी
  • जिसका इलाज न हो सके— असाध्य

4).प्रयोग के आधार पर शब्द के भेद

1 विकारी

2अविकारी

;विकारी शब्द →वे शब्द होते है जिनमें विकार उत्पन्न होता है। अर्थात लिंग,वचन से परिवर्तन होता है।
वे शब्द  विकारी शब्द कहलाते हैं  जैसे

  • लडका खेलता है। लडकी खेलती है।

विकारी शब्द चार होते हैं ।

1 संज्ञा

2 सर्वनाम

3 विशेषण

4 क्रिया

संज्ञा   

1   सब्जी — सब्जियाँ,, सब्जियों

2  लकड़ी — लड़कियाँ,, लड़कियों

3  पुस्तकत्— पुस्तकें , पुस्तकों

सर्वनाम →

1.तुम – तुम्हें ( तुम्हारा)

2.मेरा- – हमारा

3.उससे — उनसे

विशेषण →

विशेषणशब्द →
कालाकाली, काले
मोटामोटी, मोट
मीठामिठास
चतुर.चातुर्य,, चतुराई
मधुरमाधुर्य
सुंदरसौंदर्य, सुंदरता
निर्बलनिर्बलता
सफेद…सफेदी
हराहरियाली
सफल…सफलता
प्रवीणप्रवीणता
मैलामैला
निपुणनिपुणता
खट्टाखटास

 

 क्रिया →

क्रिया → शब्द →

पढ़ायापढ़ाई-पढ़ाए
पीता है पीती है- पीते है
लिखतालिखती- लिखते
खेलनाखेल
थकनाथकावट
लिखनालेख- लिखाई
हॅसना…हँसी
लेना.देनालेन-देन
पढ़नापढ़ाई
मिलना…मेल
चढ़नाचढ़ाई
मुसकानामुसकान
कमानाकमाई
उतरनाउतराई
उड़नाउड़ान
रहना.सहनारहन-सहन
देखना-भालनादेख.भाल

अविकारी शब्द

जिन शब्दों का लिंग,वचन में भी कोई परिवर्तन नहीं होता है। और बदलते नहीं है।

  • हिमालय,आकाश,पृथ्वी,चन्द्रमा आदि। उन्हें  अविकारी शब्द कहते हैं ।

अविकारी शब्दों को चार भागों में बाँटा गया हैं

1)  क्रियाविशेषण

2)  संबंधबोधक

3)  समुच्चयबोधक)  विस्मयादिबोधक

क्रियाविशेषण →             

1) भीतर, उचित, वैसे, वहॉ, निकट, अचानक, निरंतर, प्रतिदिन आदि।

2) राधा बाहर बैठी हैं  ।

3) मोहन बाहर बैठा है ।

संबंधबोधक

1)तक, बिना,समेत, के उपर, के खातिर, के आगे आदि।

2) रेखा के साथ कमला आएगी ।

समुच्चयबोधक→

1) क्योंकि  या, अथवा, लेकिन, अतएव, ताकि, किंतु , परंतु , अन्यथा आदि ।;

2)  गीता और सीता पढ़ाई कर रही हैं ।

3)  राम और मोहन पढ़ाई कर रहे हैं ।

विस्मयादिबोधक →

1) धन्य, शाबाश, ओहो , क्या, जी, हॉ, अवश्य,  अरे, जीते रहे , वाह आदि ।

2)  अरे! राधा गा रही हैं द्य

3) ओहो! क्या बात है।                                                             ;

4) वाह !देखो कितना सुदर फूल है।

5) अरे! मोहन गा रहा है

अत: इस प्रकार हमने शब्द विचार को बहुत ही सुक्ष्म अध्ययन द्वारा आपको बताने का प्रयास किया है। हमारी कोशिश यही है कि आपको शब्द विचार के बारे में सुक्ष्म से सुक्ष्म जानकारी प्राप्त करा सकें
हमने इस लेख में शब्द से सम्बधित सभी तथ्यों तथा जानकारियों को पूर्ण रूप आपके समक्ष प्रस्तुत किया है। जैसे
शब्द का अर्थ
शब्द की परिभाषाएं
शब्द के प्रकार
शब्द के भेद तथा शब्द से जुडी अन्य जानकारी।

इसमें हम शब्द निर्माण के बारे में आगे पढेगें

 

Hindi Vyakaran-हिंदी व्याकरण

व्याकरण (GRAMMAR)की परिभाषा

जिस शास्त्र के द्वारा हमें शब्दों की रचना तथा उनकी बनावट के शुद्व व अशुद्ध रूप का ज्ञान होता है। उसे व्याकरण कहते है  भाषा के नियम सीमित होते है। जिसमें भाषा की अभिव्यक्तियों का रूप असीमित होता है। लेकिन व्याकरण में भाषा के नियम , अभिव्यक्तियों और संरचना भिन्न तथा नियंत्रित होती है। भाषा के सभी नियमों का अध्ययन करना व्याकरण शास्त्र के अर्न्तगत आता है। इसी शास्त्र में भाषा के नियमों को जोडना, संचालन करना, नियमित रूप प्रदान करना ही व्याकरण शास्त्र कहलाता है।

व्याकरण का निर्माण

व्याकरण का निर्माण – व्याकरण का निर्माण 110 साल पहले आया। व्याकरण इससे पहले सस्कृंत में होती थी। जिस साधन के द्वारा प्रत्येक शब्द की व्याख्या कर सकते है।  उसे व्याकरण कहते है। इसे “शब्दानुसाशन और शब्दयोनी” भी कहते है। व्याकरण ग्रन्थ को बिना पढे हुए किसी भी भाषा में निपूर्ण नहीं हुआ जा सकता है।

व्याकरण या( ग्रामर) की निम्नलिखित परिभाषाऐं हैं ।

 

  • डॉ स्वीट के अनुसार:—- “व्याकरण भाषा का व्यवहारिक विश्लेषण अथवा उसका शरीर विज्ञान है”।
  • जैगर के अनुसार:——- “प्रचलित भाषा संबंधी नियमों की व्याख्या ही व्याकरण है”।
  • हैजालिट के अनुसार:—-“व्याकरण भाषा की विशेष प्रकार की रचना का वर्णन है”।

व्याकरण का अर्थ (Meaning of Grammar)

व्याकरण शब्द (वि+ आ+कृ –धातु +ल्युट +प्नत्यय) के योग से बना है। जिसका अर्थ है ““व्याक्रियन्ते व्युत्पाद्यन्त शब्द अनेनेति व्याकरणम्”    अर्थात जिस के द्वारा अर्थ स्वरूप से शब्दों की सिद्धि होती है व्याकरण कहलाता है।व्याकरण शब्दों के प्रयोग का अनुशासक है।

  • महर्षि पणिनि ने इसे ‘शब्दानुशासन’ कहा है। व्याकरण का अध्ययन भाषा के शुद्ध प्रयोग के लिए किया जाता है।
  • महर्षि पंतजलि ने भी अपने महाभाष्य में इसे “शब्दानुशासन “ही कहा है। अर्थात
  • “महाभाष्य में व्याकरण शब्दानुशासन” कहा है।
  • आचार्य हेमचन्द ने भी इसी मत का समर्थन किया है।
  • किसी भी भाषा के अंग प्रत्यंग का विश्लेषण तथा विवेचन व्याकरण कहलाता है।

अर्थात व्याकरण वह शास्त्र है जिसके द्वारा हम किसी शषा के शुद्व रूप को बोला, पढा और लिखा जाता है। किसी भी भाषा के बोलने, पढने और लिखने के निश्चित नियम होते है। व्याकरण भाषा के इन सभी नियमों का विश्रलेषण तथा सकंलन करता है। व्याकरण भाषा के सभी नियमों को स्थिरता प्रदान करता है। व्याकरण के सभी नियम भाषा को मानक बनाते है। एक बहुभासावादी समाज के नागरिक भाषा के जिस रूप को आधार मानकर नियमों का पालन किया जाता है।

  • सर्वप्रथम हिन्दी व्याकरण ‘श्री कामता प्रसाद‘ गुरू ने लिखी है।
  • विश्व का पहला व्याकरण रचना कार ‘पाणिनि‘ को माना जाता है। जिनकी रचना ‘अष्टाध्यायी‘ है।
  •  वह शास्त्र है जिसके द्वारा हमें किसी भाषा के शुद्व बोलने,लिखने व पढने के नियमों का ज्ञान होता है।

व्याकरणकुछ उदाहरण इस प्रकार है।

  • गीता गाना गा रहा। —————- (अशुद्व रूप)
  • कल जाना है मुझे कलकता ——— -(अशुद्व रूप)
  • तेरे को मैनें देना है।—————- -(अशुद्व रूप)
  • परिक्षा ,डीब्बा, प्रमात्मा ————– (अशुद्व रूप)
  • मार दिया को ने राम श्याम———— (अशुद्व रूप)

इन पाचों उदाहरणों में कुछ न कुछ अशुद्वि है।

  • पहले वाक्य में लिंग संबंधी अशुद्वि है स्त्रीलिंग के साथ क्रिया का रूप ‘रही‘ होना चाहिए।
  • (शुद्व वाक्य)——- गीता गाना गा रही है।
  • दुसरे वाक्य में शब्दों का क्रम सही नहीं है।
  • (शुद्व वाक्य)———- मुझे कल कोलकता जाना है।
  • तीसरे वाक्य में शब्दों का अशुद्व प्रयोग है।
  • (शुद्व वाक्य) ———–तुम को मुझे देना है।
  • चौथे उदाहरण में शब्दों की वर्तनी (Spelling)
  • (शुद्व वाक्य)——- परीक्षा,डिब्बा,परमात्मा
  • पाचवें उदाहरण में शब्दों का अर्थ स्पष्ट नहीं है क्योंकि कर्म,कर्ता तथा कारक निश्चित स्थान पर नहीं है।
  • (शुद्व वाक्य)- ———-राम ने श्याम को मार दिया

व्याकरण की अनिवार्यता या आवश्यकता (Grammar Imperative)

 

  • भाषा को शुद्व रूप प्रदान करने के लिए व्याकरण की अनिवार्यता होती है। अर्थात जो शास्त्र शब्दों की रचना करता है। वह व्याकरण (Vayakaran) कहलाता है।
  • व्याकरण के नियमों का ज्ञान छात्रों में मौलिक वाक्य संरचना की योग्यता का विकास करता है। भाषा की मितण्ययिता के आधार हेतु व्याकरण के नियमों का ज्ञान आावश्यक है। छात्रों में भाषा शुद्ध लिखने बोलने के कौशल का विकास करती है।
  • व्याकरण:- शिक्षा से मातृभाषा के प्रयोग से लिखने, बोलने में शुद्धता आती है। मातृभाषा में व्याकरण के उपयोग से शुद्ध एवं स्पषट व्यवहार आता है। शुद्ध सम्प्रेषण व्याकरण के उपयोग पर निर्भर होता है।

व्याकरण का महत्व (Importance of Hindi Grammar)

  • हिन्दी Vyakarna का भाषा में बहुत अधिक महत्व है।

किसी भाषा के अध्ययन के लिए उस भाषा के व्याकरण का ज्ञान होना आवश्यक है। वस्तुतः व्याकरण का ज्ञान भाषा का उचित प्रयोग करना सिखाता है। जिस प्रकार गुरू के ज्ञान के बिना मानव जीवन अधूरा है व्याकरण के ज्ञान के बिना शुद्ध व मानक भाषा का ज्ञान भी अधूरा है।

  • Grammar (व्याकरण) के द्वारा भाषा के शुद्व एंव स्थाई रूप को निश्चित किया जा सकता है ।
  • हिन्दी ग्रामर (व्याकरण) के द्वारा मनुष्य द्वारा भाषा में आए दिन होने वाले परिवर्तनों से बचाकर उसे स्थायी रूप प्रदान करता है।
  • व्याकरण के नियमों का पालन करके भाषा जीवंत सतत विकास कर सकती है तथा भाषा रूप के आधार पर व्याकरण नियम बनाता है।
  • व्याकरण भाषा के नियमों को स्वीकार करता है।
  • व्याकरण वह(part) या हिस्सा है। जो शब्दों के बदलाव के साथ उनके अर्थ को बदलने के लिए व्यवहार करता है।
  • व्याकरण की महता सर्व विदित है।
  • व्याकरण के द्वारा भाषा के स्वरूप की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। इसी से भाषा के शुद्व व अशुद्व रूप की पहचान कर सकते है।
  • व्याकरण की महत्वता के बारे में संस्कृत भाषा में एक श्लोक है।

 

व्याकरण की उपयोगिता (Utility of Grammar)

व्याकरण की उपयोगिताः-व्याकरण की उपयोगिता यह है कि – किसी भी भाषा को अच्छे तरीके से जानने के लिए सबसे शुरू (starting) में उस भाषा के व्याकरण का ज्ञान होना अति अनिवार्य है।

  • बिना व्याकरण के ज्ञान के किसी भाषा के शुद्व रूप को ठीक ढंग से न तो बोल सकते है,न ही लिख सकते है।
  • व्याकरण से भाषा का मानक प्रयोग सीखते है।
  • व्याकरण सीखने के बाद मनुष्य भाषा की प्रकृति को समझकर शुद्व रूप में बोलने,लिखने,पढने, और समझने लगता है।
  • इस प्रकार भाषा में शुद्वता और एकरूपता बनाए रखने में व्याकरण बहुत उपयोगी होता है।
  • व्याकरण किसी भी भाषा के नियमों को स्पष्ट करता है अर्थात परिभाषित करता है।
  • व्याकरण किसी भाषा के शुद्व और स्थायी रूप को निश्चित करने के लिए नियमबद्व योजना है।
  • इसके द्वारा हमें शुद्वियों व अशुद्वियों का ज्ञान होता है तथा व्याकरण किसी भी भाषा के नियमों को स्पष्ट करता है अर्थात परिभाषित करता वह व्याकरण कहलाता है।

 

 

व्याकरण की विशेषताएँ (Grammatical features)

 

सस्ंकृत भाषा से हिन्दी व्याकरण के नियमों का विकास हुआ है। हिन्दी व्याकरण ने सस्ंकृत के क्रलिष्ठ कठिन रूप को सरलतम रूप में परिवर्तित कर दिया है

पं0 किशोरी दास वाजपेयी ने लिखा है कि– “हिंदी व्याकरण प्रायः संस्कृत व्याकरण के आधार पर लिखा गया है। हिन्दी व्याकरण का कार्य या क्रियाप्रवाह संस्कृत व्याकरण के आधार पर है, पर कहींकहीं मार्ग भेद भी है। मार्ग भेद वहीं हुआ है, जहॉ हिन्दी ने संस्कृत की अपेक्षा सरलतम मार्ग ग्रहण किया है।

व्याकरण की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं है।

 

  • हिन्दी व्याकरण का उद्वभव विकास है, सस्ंकृत भाषा
  • व्याकरण के सहयोग से शुद्ध लिखना,बोलना, पढना आ जाता है।
  • वयाकरण के द्वारा शुद्ध रूप का ज्ञान होता है।
  • व्याकरण के द्वारा वाक्य की संरचना तथा उसकी शुद्वता का ज्ञान होता है।
  • भाषा में होने वाले वाले परिवर्तनों को व्याकरण द्वारा ही नियोजित किया है।
  • भाषा के नवीनतम रूप को सरलता और सुगमता पूर्वक पढने में व्याकरण का बहुत अधिक योगदान या महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • व्याकरण द्वारा भाषा के व्यवहारिक रूप का विश्लेषण किया जाता है और भाषा में व्याकरण के नियमों का पालन करके भाषा को स्पष्ट और सरल बनाता है।
  • भाषा में व्याकरण के सभी नियमों का पालन करके मनुष्य के द्वारा पढना, लिखना, बोलना और सुनना आदि सभी कौशलों का विकास करती है।
  • व्याकरण के द्वारा शुद्ध सम्प्रेषण किया जा सकता है। जिसमें स्पष्ट रूप से अपनें शब्दों की व्याख्या कर सकते है।
  • व्याकरण भाषा के स्वरूप को सार्थक बनाता है।
  • व्याकरण गद्य साहित्य की आधार शिला है।

व्याकरण के समानार्थक शब्द तथा अन्यनाम

  • शब्द शास्त्र
  • शब्द योनि
  • शब्दानुशासन
  • योनि विदया

व्याकरण के अंग – (Grammar parts)

भाषा के शुद्व व अशुद्व रूप का बोध कराने वाले शास्त्र को व्याकरण कहा जाता है।

भाषा के मुख्य चार अंग है वर्ण, शब्द,पद,और वाक्य । इसलिए व्याकरण के मुख्यतः चार भाग (Part) है-

  1. वर्ण-विचार
  2. शब्द-विचार
  3. पद-विचार
  4. वाक्य-विचार

1).वर्ण-विचार या अक्षरः– भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि वर्ण ध्वनि है। ध्वनि को वर्ण कहते है। जिसके टुकडे नहीं किये सकते है। अर्थात भाषा की सबसे छोटी इकाई या ध्वनि जिसके टुकडे नहीं किये जा सकते उसे वर्ण या अक्षर कहते है। जैसे

क ल ट म आदि।

2).शब्द -विचार :-व्याकरण में जिस रचना के द्वारा शब्दों के स्वरूप, भेद, लिंग आदि का अध्ययन किया जाता है। उसे शब्द कहते है। इसनें शब्दों के भेद,स्तोत्र,रूप और रचना आती है।

उदाहरणः-राजा,पानी,सोना,पुस्तक आदि।

3).पद-विचारः– कोई भी शब्द जब वाक्य में प्रयुक्त या प्रयोग होता है तो वह पद कहलाता है या पद बन जातें हैं। इसमें पद-भेद, पद-रूपान्तर,तथा उनके प्रयोग आदि शामिल किये गए है।

4).वाक्य-विचारः– अक्षरों और वर्णों के मेल से जो शब्द बनते हैं वह वाक्य कहलाते है। व्याकरण की दृष्टि से वाक्य रचना, वाक्य के भेद,और विराम चिह्रन आदि का अध्ययन किया जाता है।

ध्वनि  व  लिपि 

 

ध्वनि :-वर्ण या भाषा की लघुतम ईकाई को ध्वनि कहते है। ध्वनि को बांटा नहीं जा सकता क्योंकि उसके और टुकडे नहीं हो सकते है

भाषा के सदंर्भ में-ध्वनि भाषा की स्वत्रंत व लघुत्तम ईकाई है।जिसका स्वय स्वत्रंत अस्तित्व होता है तथा भाषा में प्रयुक्त लघुत्तम ईकाई जिसका उच्चारण एंवम श्रव्यता की दृष्टि से स्वत्रंत अस्तित्व हो वह भाषा ध्वनि कहलाती है।

ध्वनि की महत्वता

  • ध्वनि भाषा की प्रथम और लघुत्तम ईकाई है। जिसके द्वारा ध्वनियॉं मानव मुख से निःसृत होती है।ध्वनि भाषा
    का मुख्य आधार है
  • मनुष्य के शरीर में ध्वनि को उत्पन्न करने और ग्रहण करने वाले दोनों ही प्रकार के अवयव होते है। जो मनुष्य के किसी कार्य विशेष से निकलती है जैसे -चलना-फिरना,दौडना-भागना, आदि।
  • ध्वनि और भाषा का अटूट संबंध है जिसूमें ध्वनिसमूह को भाषा कहा जाता है जिसके अंर्तगत वर्ण शब्द, पद, वाक्य आदि सम्मिलित है।
  • भाषा विज्ञान में ध्वनियों का अध्ययन ध्वनि विज्ञान के द्वारा होता है तथा ध्वनि विज्ञान के अंर्तगत उच्चारण से संबंधित अध्ययन किया जाता है।

 

 लिपि (script)

 

मौखिक या उच्चारित भाषा को स्थायी रूप प्रदान करने के लिए लिखित भाषा का विकास हुआ ।प्रत्येक सार्थक ध्वनि के लिए लिखित चिह्न या वर्ण बनाए गए। शब्दों को लिखने के लिए विभिन्न वर्णां को मिलाकर लिखे जाने की पूरी व्यवस्था को विकसित किया गया। लेखन की इसी व्यवस्था को लिपि कहा गया है।वस्तुतः लिपि विभिन्न भाषिक ध्वनियों को लिखकर प्रस्तुत करने का तरीका है। अतः कहा जा सकता है कि

“उच्चारित भाषा को लिखकर व्यक्त करने के लिए विभिन्न लिखित चिह्नों या वर्णों की व्यवस्था लिपि कहलाती है।”

मानव विचारों ने भाषा को जन्म दिया और भाषा को स्थायी व मानक रूप प्रदान करने की आवश्यता ने लिपि का  विकास किया। इसी आवश्यकता को देखते हुए लिपि के विकास चार अवस्थाएं है।

  • प्रतीक लिपि
  • चित्र लिपि
  •  भाव लिपि
  •  ध्वनि लिपि

 

लिपि (Sound) :- भाषा की ध्वनियों को अंकित करने के लिए निश्चित किए गए चिह्रनों की व्यवस्था को लिपि कहते है।अतः हम कह सकते प्रत्येक भाषा के वर्ण अलग अलग होते है। जिस रूप में वर्णों को अंकित किया जाता है। वही रूप लिपि कहलाता है।

भाषा को लिखने के लिए निर्धारित किये गए चिह्रनों को लिपि कहते है। लिपि का शाब्दिक अर्थ होता हैः-“लिखित या चित्रित करना।”

किसी भी भाषा को लिखने के लिए हम जिन चिन्हों को निर्धारित करते है उन चिन्हों को लिपि कहते है। भाषा के लिखित रूप लिपि कहते है। और निश्चित लिपि होती है।

  • भारत की अनेक भाषाएं -हिंदी,संस्कृत मराठी,,कोंकणी नेपाली,आदि ’देवनागरी लिपि’में लिखी जाती है। तथा अग्रेंजी,फ्रेंच,जर्मन,इटेलियन स्पेनिश,पोलिश, आदि भाषाएं रोमन लिपि में लिखी जाती है।

प्रत्येक भाषा की लिपि अलग अलग होती है जिस तरह लिपि एक होने पर भाषाएं एक नहीं हो जाती उसी तरह किसी एक भाषा को अलग अलग लिपियों में लिख देने पर वह अलग भाषा नहीं हो जाती।

उदाहरण के लिए  हिंदी भाषा को देवनागरी तथा रोमन लिपि में लिख देने पर वह अलग भाषा नहीं होगी।

जैसे:-

देवनागरी लिपि मेंः-  (मोहन घर जाता है।)
रोमन लिपि 🙁 Mohan ghar jata hai|)

  • हिंदी ,गुजराती,मराठी की लिपि देवनागरी होती है
  • अंग्रेजी भाषा की लिपि रोमन है
  • उर्दू की लिपि फारसी है
  • पंजाबी की लिपि गुरुमुखी है
  • बांगला की लिपि बांगला है।

देवनागरी का विकास

 

भाषा को लिपियों में लिखने का प्रचलन सबसे पहले भारत में शुरू हुआ । भारत में इसे सुमेरियन बेबोलियन और यूनानी लोगों ने किया है हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। देवनागरी लिपि का जन्म या विकास भारत की सबसे प्राचीन लिपि ‘ब्राही लिपि‘ से हुआ है तथा ‘ब्राही लिपि‘ का अविष्कार वैदिक आर्यों के द्वारा शुरू किया इसमें राजा अशोक के द्वारा निर्मित शिला लेखो के संदेशों को लिखने में ब्राही लिपि का प्रयोग किया गया है। इस लिपि से शारदा लिपि, कुटील लिपि, प्राचीन लिपि और गुप्त लिपि आदि लिपियां निकली है । भारत की सभी लिपियां ब्रीहमी लिपि से निकली है।देवनागरी लिपि को लोक नागरी लिपि और हिन्दी लिपि भी कहा जाता है।

देवनागरी लिपि का नामकरण

 

देवनागरी लिपि के विषय में नामकरण की दृष्टि से अलग अलग मत पाए जाते है। किन्तु अनेक विद्ववाने के शोध का निष्कर्ष यही है। कि इसका नामकरण तत्कालीन बनारस के प्रसिद्ध न्यायधीश ‘श्री शारदा चरण मित्र‘के द्वारा किया है। उनका कहना है कि इस लिपि का प्रयोग सबसे ‘देवनागर‘ जाति ब्राहमणों के द्वारा किया गया था। इसके विकास का इतिहास ब्राहमणी लिपि से माना जाता है।

देवनागरी लिपि का स्वरूप

 

देवनागरी लिपि का स्वरूप अत्यंत प्राचीन है। यह लिपि ब्राही लिपि का ही विकसित रूप है जिसमें हिंदी,संस्कृत मराठी,,कोंकणी, नेपाली आदि भाषाओं को इसी लिपि में लिखा जाता है।

  • यह लिपि बांयी ओर से दायीं ओर लिखि जाती है। जबकि फारसी लिपि उर्दू अरबी,फारसी,भाषा की लिपि दायीं ओर से बायीं लिखी जाती है।
  • यह अक्षरात्मक लिपि (syllabic script) रोमन लिपि (अंग्रेजी भाषा )की लिपिद्ध वर्णात्मक लिपि(Alphabetic script) है।

देवनागरी लिपि की विशेषता/ सीमाएं

 

देवनागरी लिपि की लोकप्रियता का कारण उसकी कुछ महत्वपूर्ण विशेषता है।

  • इस लिपि में जो शब्द जैसे बोले जाते हे वैसे ही लिखे जा सकते है।
  • देवनागरी लिपि में सभी स्वरों व व्यजनों को उनके शुद्ध रूप में लिखने की व्यवस्था हैं
  • देवनागरी लिपि में जो ध्वनि का नाम है वही वर्ण का नाम है।
  • इस लिपि में कुछ वर्ण दो प्रकार से लिखे जाने का प्रावधान है।
  • इस लिपि में अनुस्वार , अर्धचंद्र बिंदु आदि के प्रयोग की व्यवस्था है।
  • देवनागरी लिपि में शब्दों पर शिरो रेखा लगाने की व्यवस्था है।
  • यह लिपि भारत की अनेंक लिपियों के निकट है।
  • देवनागरी लिपि का प्रयोग और क्षेत्र बहुत ही व्यापक और विस्तृत है जों हिंदी,संस्कृत मराठी,,कोंकणी नेपाली,आदि की एकमात्र लिपि है।

देवनागरी लिपि के दोष व सुधार के प्रयत्न

 

यदपि देवनागरी लिपि में अनेक विशेषताएं है तथापि कुछ दोष भी है। जिनके सुधार के प्रयत्न किए जा रहे है।

  • मुख्य रूप से इसमें ‘श और ष‘ के उच्चारण में अन्तर पडता है। इसी प्रकार ‘थ और य‘ तथा ‘घ और ध‘ में भ्रम हो जाता है। इस देवनागरी लिपि में कुछ अक्षर ऐसे भी है। जो दो प्रकार से लिखे जाते है। जैसे – झ और ल ।
  • अनुस्वार एवम् अनुनासिक के प्रयोग में एकरूपता का अभाव देखने को मिलता है।
  • शिरो रेखा का अनावश्यक प्रयोग अलंकार के लिए किया जाता है।
  • इस लिपि में वर्णां को संयुक्त करने के लिए कोई निश्चित व्यवस्था नहीं की गई है।
  • इसमें द्विरूप वर्ण तथा समरूप वर्ण की निश्चित व्यवस्था नहीं है। जिसके कारण भ्रम उत्पन हो जाता है।
  • इस प्रकार के दोषों को सुधारने के लिए कई सस्थाएं प्रयत्न कर रही है। जिसमें हिंदी साहित्य सम्मेलन “प्रयाग काशी नागरी प्रचारणी सभा काशी “केद्रिय हिंदी निदेशालय प्रमुख है।
  • श्याम सुन्दर दास का पंचमाक्षर के बदले अनुस्वार के प्रयोग का सुझाव दिया है

जिन विद्ववानों ने देवनागरी लिपि को सुधारने के लिए प्रयत्न किए है।

  • पण्डित किशोरी दास वाजपेयी
  • डा0 धीरेंद्र वर्मा
  • बाबू रामचंद्र वर्मा
  • आचार्य नरेंन्द्र देव प्रमुख है।

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वैयाकरण

वैयाकरण :-  को पढने वाला तथा पढाने वाला वैयाकरण कहलाता है।

धातु ,उपसर्ग, निपात, वर्ण, व्यंजन, शब्द, पद, पदबंध, व्युत्पति, निरूपत, निर्वचन, अव्यय, गुण, लोभ, आगम, मूर्तिपद, अमूर्त,पद, विकारी पद, अविकारी पद, उपधा, तत्सम, तदभव, यौगिक, योगरूढ, देशज-विदेशज, पाई- पाई रहित वर्ण/ स्वर व्यंजन, पाई-पाई सहित वर्ण/ स्वर व्यंजन, सवर्ण, मात्रा ,वर्णविनाश, प्रत्याहार, स्त्रोतभाषा ,लक्ष्य भाषा, राजभाषा , सघं भाषा, आदर्श भाषा, औद्वान्तिक भाषा , विक्षिप्त भाषा  मानक भाषा संध्या भाषा , टकसाली भाषा आदि व्याकरण को पढने के लिए इसमें सम्मिलित किए गए है ताकि भाषा के कठिन रूप को व्याकरण के नियमों के द्वारा सरल रूप में बताया जा सकता है।

धातु जैसेः- सोना,चॉदी,आदि धातु से आभूषण बनते है।वैसे ही भाषा के सभी शब्दों का निर्माण धातु से होता है।

उपसर्ग :- शब्दों के वे छोटे छोटे जो धातु के पहले नई रचना बनाते हैं वे उपसर्ग कहलाते है। जैसेः-

  • अ, अन, अनु ,री आदि 20 उपसर्ग है। अनु़़क्रिया

प्रत्ययः- धातु के बाद लगते है। जैसेः- गन्त़ तव्य गन्त तव्य तथा शब्द की रचना करते है।

निपातः- जिनका अर्थ हल नहीं हो लेकिन बीच में आकर वाक्य को रूप प्रदान करते है। जैसेः-

  • जो, ही भी, ते,ज्यों त्यों आदि ।

वर्ण :-भाषा का प्रारम्भ वर्ण से होता है। वर्ण वह छोटी सी ध्वनि है। जिसके टुकडे नहीं हो सकते इन्हें स्वर भी कहते है

जैसे अ, इ,उ,

भाषा विज्ञान और व्याकरण में स्वर तथा व्यजनों को ध्वनि कहते है।

व्यंजन :– जो स्वर तथा व्यंजन कहलाते है।वे व्यंजन कहलाते है। जैसे :-

  • स्पर्श व्यंजन 25, क वर्ग , च वर्ग,ट वर्ग, प वर्ग क से म तक स्पर्श व्यंजन है
  • य,र,ल,व अन्तस्थ व्यंजन
  • श,स,ष उष्म व्यंजन वर्ण माला भी कहते है।

शब्दः स्वर या वर्णो को मिलाने से जो सार्थक ध्वनि निकलती है।उसे शब्द कहते है।

ये दो प्रकार के होते है।

  • सार्थक:-रोटी- पानी
  • निरर्थक:- वोटी-वाणी

पद :- कोई भी शब्द जब वाक्य में प्रयोग होता है। तो वह पद बन जाता है।

पद बंद्धः कोई पद या शब्द जब वाक्य में अन्य शब्द के साथ जुडता है। उसे पदंबद्ध कहते है।
जैसे  :-राम दशरथ का बेटा था भेद,सज्ञां विश्लेषण,क्रिया पदंबद्ध है।

पद परिचय :– वाक्य में पद का आपस में परिचय देना उसे पद परिचय कहते है।

व्युत्पति,–कवि को कविता पढने के लिए जिस शास्त्र को पढना होता है। उसे व्युत्पति कहते है।

व्युत्पति शब्द की मूल निर्माण रचना को व्युत्पति कहते है।

निर्वचन :- किसी भी कठिन शब्द के अर्थ बताने की विधि को निर्वचन कहते है।

अव्यय :- (व्यय/खर्च) जिनका हिंदी भाषा में कभी भी स्त्रीलिंग या पुलि्र्लंग या वचन नहीं बदलते उसे अव्यय कहते है। जैसे :-

  • यथाशक्ति, तथा ,प्रति, अनु,जैसे- तैसे

गुणः- व्याकरण मूल धातु जब शब्द में बदलती है। उसे शब्द कहते है। जैसे

  •   पठ् से पाठ  (गुण
  •   मृत से मृत्यु
  •   भज से भजन
  •  जन से जनम

अर्थात क्रिया जब संज्ञा या कर्म के रूप में सामने आती है।उसे गुण कहते है।

लोपः-  ( छिपना) जब दो शब्दों के मिलन से कोई अक्षर छुप जाता है।उसे लोप कहते है
जैसे:- सु +आगतमत् = स्वागतम

आगमः- जब सन्धि करने पर कोई नया अक्षर या वर्ण आ जाता है। तोउसे आगम कहते है।
जैसे  :- सु़ +आगतम = स्वागतम
अर्थात जब सन्धि करने पर कोई पुराना अक्षर,वर्ण या शब्द चला जाए तो लोप होता है। तथा नया शब्द आ जाए तो आगम होता है।

मूर्त पद-जिन शब्दां के अर्थ लोकप्रचलित है,प्रत्यक्ष है उन्हें पद कहते है।
जैसे

  • दिल्ली,ताज महल,दूध, दही आदि ।

अमूर्त,पद  -जिन शब्दां को प्रत्यक्ष देख नहीं सकते उन्हें अमूर्तपद कहते है। जैसे

  • स्वर्ग, अपसरा,चन्दन ,वृक्ष आत्मा आदि

विकारी पदः- वे शब्द होते है।जिनमें विकार उत्पन्न होता है। अर्थात लिंग वचन से परिवर्तन होता है।वे विकारी पद कहलाते है।

अविकारी पदः-जिन शब्दांका लिंग वचन में भी परिवर्तन नहीं होता है। वे अविकारी पद कहलाते है।

 

उपधाः- किसी शब्द के अंतिम वर्ग में आने वाले पहले वर्ण को उपधा कहते है। जैसे लडका का से पहले वर्ण ड है।

 

तत्सम– तत्सम उन शब्दों को कहते है जो संस्कृत में थे संस्कृत में प्रयोग किए जातें है। लेकिन हम हिंदी में ज्यों को त्यों प्रयुक्त करते है।

तदभवः- तदभव,वे शब्द है संस्कृत से बिगडकर हिंदी में आ गए वे तदभव कहलाते है।

 

यौगिक :-जोडना जो शब्द दो शब्दों से मिलकर बना हो।

  • जैसे पाठ शाला
  • मुसाफिर खाना
  • रसोई घर
  • विघालय

योगरूढः– जो शब्द अर्थ के लिए प्रयुक्त ना होकर किसी अन्य अर्थ के लिए प्रयुक्त होते है।

  • जैसे पात्र ,नीरज

अर्थात जो अर्थानुसार अपने अर्थ को छोडकर किसी दूसरे शब्द के लिए प्रयुक्त होते है।

जैसे

  • नीरजः- कमल जो शब्द अपने विशेष के लिए प्रसिद्ध है।

देशजः- जो क्षेत्र अपनी सुविधानुसार स्ंवय भाषा का निर्माण कर लेता है।तथा व्याकरण की दृष्टि से कोई महत्व नहीं होता है। जैसे

  • ठॉय ठॉय ,ढम ढम, फॉएं फॉए जुगाड आदि ।

अर्थात देश में पैदा होने वाले शब्द देज कहलाते है

विदेशजः- जो शब्द विदेषी भाषा सेआए हुए है और हमारी भाषा में मिल गए है। उसे विदेशज भाषा कहते है।
जैसे स्कूल, स्टेशन

  • औरत –अरबी भाषा का शब्द है।
  • लालटेन –तुर्की भाषा का शब्द है।
  • तम्बाकू– पुर्तगाली भाषा का शब्द है।

पाईः-जिन स्वर व्यंजन शब्दों के पीछे चिह्न या निशान तथा डण्डा खींचा होता है या डण्डे के साथ पूर्ण होते है।

 

पाई सहित वर्णः- जिन व्यंजन के पीछे डण्डा खींचा होता है वह पाई सहित वर्ण होते है।
उदाहरणः-

  • त,घ,न,ख,ग,घ, ण,ज,झ,प,ब,म,श,ष,स,भ,च य,र,ल,व,आदि ।

पाई रहित वर्णः- जिन व्यंजन/स्वर के पीछे डण्डा खींचा नहीं होता है वह पाई रहित वर्ण होते है।

सवर्ण :-एक ही वर्ण वाले अक्षर जिन का रंग रूप उच्चारण स्थान एक सा होता है। जैसे क के साथ वाले सभी वर्ण सवर्ण है।
मात्रा :– वर्ण के पलटे हुए रूप को मात्रा कहते है।
जैसे अ ,इ ई उ
ा, ि , ी ु

वर्ण विनाश:- शुरू में बीच में वर्ण छुट जाए या लिखना भूल जाए या नहीं लिखा जाए उसे वर्ण विनाश कहते है।

जैसे

  •   वर्ण — वर्ण विनाश
  •   विघायल — विघाल

प्रत्याहारः– संक्षिप्त कथन को प्रत्यहार कहते है।जैसे

  • तुम कहां जा रहे हो।

स्त्रोतभाषा -जिस भाषा का अनुवाद किसी अन्य भाषा में किया जाता है। जैसे

  • हिन्दी का अनुवाद -अग्रेंजी में करना

लक्ष्य भाषा – जिस भाषा में अनुवाद कर रहे है।वह लक्ष्य भाषाहै। जैसे

  • हिन्दी का अनुवाद -अग्रेंजी में कर रहे है। — अग्रेंजी भाषा

राज भाषा :-जिस भाषा में सरकारी काम या आदेश लिखे जाते है। उसे राज मपिि कहते है। लगभग दस 10 प्रान्तों में राज भाषा बोली जाती है। जैसे

  • हरियाणा ,दिल्ली बिहार ,उतरप्रदेश, उतराखण्ड आदि।

 संघ भाषा : – राज भाषा का दूसरा नाम संघ भाषा है। संघ शब्द का अर्थ राज्य या प्रांत है।

 

आदर्श भाषा :-भाषा  का वह रूप जिसका प्रयोग गद्य, पद्य ,महाकाव्य तथा में प्रयोग किया जाता है तथा शब्दकोष में इनका प्रयोग किया जाता है। यह विद्ववानों द्वारा साहित्य में प्रयोग किया जाता है।

 

औद्वान्तिक भाषा – जिसका अर्थ समझाने के लिए उद्यान बाग बगीचे फूल पत्तियों पेड आदि के उदाहरण देकर बताया जाता है। उसे औद्वान्तिक भाषा  कहते है।

उदाहरण:-

  • माली आवत देख कर कलियां करे पुकार।
    फुली फुली चुन लिए काल हमारा आत।।
  • ज्यों तोको काटें बोए।
    तोको फूल की फूल।।
    वाको है त्रिशुल।।।

विक्षिप्त भाषा – बडबडाना, पागल, रोगियों ,शराबी लोगों की भाषा को विक्षिप्त भाषा कहते है।

 

मानक भाषा – भाषा के जो रूप पूरे देश काल वातावरण में प्रचलित रहता है। उसे मानक भाषा  कहते है।
जैसे

  • मीटर,किलोमीटर, लीटर , किलोग्राम ,यह मानक भाषा के गुण है।

टकसाली भाषा  :- जिन शब्दों का प्रयोग कम हुआ है या अनुप्रास, यमक, श्लेष, शब्दों से मिलकर बना है। उसे टकसालीभाषा कहते है।
जैसे :-

  • तत्सम— तदभव
  • चवरधरी –चौधरी

संध्याभाषा :-सिद्धों व नाथों की भाषा संध्याभाषा कहते है। 9नाथ ,84 सि़द्धों आदिकाल के कवि है।

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