प्रत्यय की परिभाषा, अर्थ,भेद,पहचान,एंवम् उदाहरण(Pratyay in Hindi)

प्रत्यय की परिभाषा ( Definition of Suffix)

उपसर्गों की तरह प्रत्यय भी भाषा के लघुत्तम,अर्थवान तथा बद्ध रूप में होते है, जिसमें उपसर्ग तथा प्रत्यय दोनों का प्रकार्य भी एक समान होता है। और दोनों ही नए—नए शब्दों का निर्माण में अपनी—अपनी प्रमुख भूमिका निभाते है। दोनों में अतंर केवल इस बात को लेकर है कि उपसर्ग शब्दों के प्रारम्भ में लगते हैं, तथा प्रत्यय शब्दों के अंत में लगते है। नए शब्दों की रचना में प्रत्यय अहम भूमिका निभाते है। ये शब्दों के पीछे लगते है।
उदहारण के लिए :—

  • मुख + डा—— मुखडा
  • सोना + आर——सुनार
  • + वान— धनवान
  • गरीब + ई —— गरीबी
  • सॉंप + एरा— सपेरा
  • तॉंगा + वाला— तॉंगेवाला

अत: कहने का तात्पर्य है कि- प्रत्यय भाषा के वे लघुत्तम, अर्थवान तथा  बद्ध रूप हैं -जो किसी शब्द के अंत में लगकर नए—नए शब्दों की रचना करतें है,वे प्रत्यय कहलाते है।

प्रत्यय का अर्थ(Meaning of suffix)

ऐसे शब्दांश जो किसी शब्द के अंत मेें लगकर उसके अर्थ में नया रूप देते हैं,वह प्रतयय कहलाते है।

सरल शब्दों में—): प्रत्यय उन शब्दों को कहते हैं जो शब्दांश किसी शब्द के अन्त में जुड़कर उसके अर्थ तथा भाव में परिवर्तन या विशेषता ला देते है। उन्हें प्रत्यय कहते है।

दूसरे शब्दों में —): प्रत्यय दो शब्दों से मिलकर बना होता है – प्रति +अय। प्रति का अर्थ होता है ‘ साथ में ,पर बाद में और अय का अर्थ होता है ‘ चलने वाला ‘
अत: प्रत्यय का अर्थ होता है– “साथ में पर बाद में चलने वाला।” जिन शब्दों का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता वे किसी शब्द के पीछे लगकर उसके अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं।
अर्थात “शब्द निर्माण के लिए शब्दों के अंत में जो शब्दांश जोड़े जाते हैं वही प्रत्यय कहलाते हैं”।

जैसे——

  • तैर + आक—— तैराक
  • + आर———लुहार
  • लकड़ +हारा———लकडहारा
  • थाल + ई————— थाली

इन शब्दों में” तैर,लोहा,लकड,और थाल” मूल शब्द है। इनके अंत में क्रमश:” आक,आर,हारा,और ई “शब्दांश जोडे गए हैं। मूल शब्दों के अंत में शब्दांश जोडने से क्रमश: “तैराक,लुहार,लकडहारा,थाली” शब्दों की रचना हुई है।

“आक,आर,हारा,और ई” ऐसे शब्दांश हैं- जो मूल शब्दों के अंत में जुडकर उनके अर्थ में परिवर्तन ला देते है। व्याकरण में ये शब्दांश प्रत्यय कहलाते है। अत: जो शब्दांश शब्दों के अंत में विशेषता या परिवर्तन ला देते हैं, वे प्रत्यय कहलाते हैं।

विशेष/ ध्यान देने योग्य बातें

प्रत्यय सदैव रूढ शब्दों अथवा धातु के अतं में जोडे जाते है। जैसे-

  • पठ + अक= पाठक
  • शक + ति= शक्ति
  • पाठक, शक्ति, ——’पठ’ और ‘शक’ धातुओं से क्रमशः ‘अक’ एवं ‘ति’ प्रत्यय लगाने पर नए शब्दों का निर्माण हुआ हैं।
  • प्रत्यय का अपना अर्थ नहीं होता और न ही इनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व होता है। जिनकेकारण स्वतंत्र रूप में इनका प्रयोग किया जा सकता है।
  • प्रत्यय अविकारी शब्दांश होते हैं जो शब्दों के बाद में जोड़े जाते है। और उसमें परिवतन किया जा सकता है।

प्रत्यय के जुडने से शब्द के अर्थ में परिवर्तन या विशेषता उत्पन्न होती है। जैसे—

  • बड़ा +आई = बडाई
  • टिक +आऊ = टिकाऊ
  • बिक +आऊ = बिकाऊ
  • होन +हार = होनहार
  • लेन +दार = लेनदार
  • घट + इया = घटिया
  • गाडी +वाला = गाड़ीवाला
  • कभी कभी प्रत्यय लगाने से अर्थ में कोई बदलाव नहीं होता है। तथा प्रत्यय लगने पर शब्द में संधि नहीं होती बल्कि अंतिम वर्ण में मिलने वाले प्रत्यय में स्वर की मात्रा लग जाएगी लेकिन व्यंजन होने पर वह यथावत रहता है

प्रत्ययों के भेद/प्रकार

प्रत्यय विभिन्न् शब्दों के अंत में जुडकर नए शब्दों का निर्माण करते है। लेकिन प्रत्यय किस प्रकार के शब्दों के साथ लग कर आते है, इस आधार पर प्रत्ययों के तीन भेद किए गए है।

  •  संस्कृत के प्रत्यय
  •  हिंदी के प्रत्यय
    विदेशी भाषा के प्रत्यय

संस्कृत के प्रत्यय:— जो प्रत्यय व्याकरण में मूल शब्दों और मूल धातुओं से जोड़े जाते हैं वे संस्कृत के प्रत्यय कहलाते हैं।
जैसे :–

  • – आगत,विगत,कृत ।
  • ति – प्रीति, शक्ति, भक्ति आदि
  • या- मृगया, विद्या

संस्कृत प्रत्यय के प्रकार :-

  1. कृत् प्रत्यय (कृदन्त) (Agentive)
  2.  तद्धित प्रत्यय (Nominal)

(1) कृत् प्रत्यय(Agentive):- क्रिया शब्दों के साथ जो प्रत्यय जुडतें हैं वे कृत प्रत्यय कहलाते है।

सरल शब्दों में— वे प्रत्यय जो क्रिया के मूल रूप धातु  के साथ जुडकर संज्ञा,विशेषण आदि नए शब्दों का निर्माण करते है। वे कृत प्रत्यय कहलाते हैं।

अर्थात कहने का तात्पर्य है कि——क्रिया या धातु के अन्त में प्रयुक्त होने वाले प्रत्ययों को ‘कृत्’ प्रत्यय कहते है और उनके मेल से बने शब्द को ‘कृदन्त’ कहते है।

दूसरे शब्दो में- वे प्रत्यय जो क्रिया के मूल रूप यानी धातु (root word) में जोड़े जाते है, कृत् प्रत्यय कहलाते है।

जैसे-

  • लिख् + अक =लेखक।
  • बिछ+ औना — बिछौना
  • पढ+ आकू — पढ़ाकू
  • चु + आव— चुनाव
  • पालन + हारा—— पालनहारा

यहाँ अक,औना,आकू,आव, हारा कृत् प्रत्यय है तथा लेखक,बिछ,पढ,चु, पालन कृदंत शब्द है।टेबल बनानी है

कृत् प्रत्यय के उदहारण

  • अक —— गायक,लेखक, पाठक, नायक, गायक
  • ता———  नेता,अभिनेता,विक्रेता
  • उक ——इच्छुक, भिक्षुक, भावुक इच्छ्, भिक्ष

कृत प्रत्यय क्रिया शब्दों में लगकर अलग—अलग प्रकार्य करने वाले संज्ञा/ विशेषण शब्द बनाते है। इस आधार पर कृत प्रत्ययों के निम्नलिखित प्रकार्य है।

  • क्रिया को करने वाला
  • क्रिया का कर्म
  • क्रिया का परिणाम
  • क्रिया करने का साधन
  • क्रिया करने के योग्य होना

 

संस्कृत के कृत प्रत्यय

मूल शब्द प्रत्ययउदाहरण
मोह, झाड़, पठ, भक्षअनमोहन, झाड़न, पठन, भक्षण
सुन, लड़, चढ़ ,सिल, पढ़,आईसुनाई, लड़ाई, चढ़ाई,सिलाई, पढ़ाई,
लेख्, पाठ्, कृ, गै , धाव,सहाय,पालअकलेखक, पाठक, कारक, गायक,धावक, सहायक, पालक
पाल्, सह्, ने, चर्अनपालन, सहन, नयन, चरण
घट्, तुल्, वंद्, विद्अनाघटना, तुलना, वन्दना, वेदना
मान्, रम्, दृश्, पूज्, श्रु अनीयमाननीय, रमणीय, दर्शनीय, पूजनीय, श्रवणीय
थक, चढ़, पठआनथकान, चढ़ान, पठान
सज, लिख, मिल थक बुनआवटबुनावट सजावट, लिखावट, मिलावट,थकावट
बह, , खिंच, बच,छल, दिख, चढ़आव खिंचाव, बचाव, बहाव, छलावा, दिखावा, चढ़ावा
सूख, भूल, जाग, पूज, इष्, भिक्ष्सूखा, भूला, जागा, पूजा, इच्छा, भिक्षा
उड़, मिल, दौड़आनउड़ान, मिलान, दौड़ान
हर, गिर, दशरथ, मालाहरि, गिरि, दाशरथि, माली
हँस, बोल, घुड़, रेत, फाँस, त्यज्हँसी, बोली, घुड़की, रेती, फाँसी,त्यागी
झूल, ठेल, घेर, भूलझूला, ठेला, घेरा, भूला
छल, जड़, बढ़, घट , जड़इयाछलिया, जड़िया, बढ़िया, घटिया
पठ, व्यथा, फल, पुष्पइतपठित, व्यथित, फलित, पुष्पित
चर्, पो, खन्इत्रचरित्र, पवित्र, खनित्र
झाड़, आड़, उतार
झाड़ू, आड़ू, उतारू
बंध, बेल, झाड़ बंधन, बेलन, झाड़न,
अड़, मर, सड़ इयलअड़ियल, मरियल, सड़ियल
औटीकसकसौटी
इच्छ्, भिक्ष्उक इच्छुक, भिक्षुक
चढ़, रख, लूट, खेवऐया चढ़ैया, रखैया, लुटैया, खेवैया
रख, बच, डाँट\गा, खावैयारखैया, बचैया, डटैया, गवैया, खवैया
आ, जा, बह, मर, गा ताआता, जाता, बहता, मरता, गाता
चट, धौंक, मथनी चटनी, धौंकनी, मथनी
चिल्ला, गुर्रा, घबराआहटचिल्लाहट, गुर्राहट, घबराहट

संस्कृत से बने कृत्- प्रत्यय  के भिन्न -भिन्न शब्द है।

कृत्- प्रत्ययधातुउदहारण
तव्य (संस्कृत)कृ
कर्तव्य
यत्(संस्कृत)दादेय
वैया (हिंदी)खेना-खेखेवैया
अना (संस्कृत) विद्
वेदना
आ (संस्कृत) इश्इच्छ्
यत् (संस्कृत) दा देय
य (संस्कृत)दा देय
अनीय (संस्कृत) दृश्दर्शनीय
य (संस्कृत)पूज् पूज्य

कृत्-प्रत्यय में क्रिया को करने वाले  भिन्न -भिन्न शब्द है।

मूल शब्द/क्रियाप्रत्ययउदहारण
देना, आना,पढ़नावाला देनेवाला, आनेवाला, पढ़नेवाला
होना, रखना, खेवनाहारहोनहार, रखनहार, खेवनहार
छलनाइयाछलिया

कृत्-प्रत्यय में धातु रूप से बने  भिन्न -भिन्न शब्द है।

कृत्-प्रत्यय/मूल शब्दधातु रूपउदहारण
पढ़, लिख, बेल, गा ना पढ़ना, लिखना, बेलना, गाना,छलना
अ, प्री, शक्, भजतिअति, प्रीति, शक्ति, भक्ति
जा, खातेजाते, खाते
अन्य, सर्व, अस्त्रअन्यत्र, सर्वत्र, अस्त्र
क्रंद, वंद, मंद, खिद्, बेल, ले क्रंदन, वंदन, मंदन, खिन्न, बेलन, लेन
गद्, पद्, कृ, गद्य, पद्य, कृत्य, पाण्डित्य, पाश्चात्य, दंत्य, ओष्ठ्य पंडित, (पश्चात्, दंत्, ओष्ठ्)
मृग, विद्यामृगया, विद्या
दा, धादाम, धाम
गेरू गेरू
अक
कृ कारक
अननीनयन

कृत्-प्रत्यय में धातु के साथ विशेषण शब्दों का प्रयोग

कृत्-प्रत्यय /मूल शब्दधातु रूपविशेषण/उदहारण
क्त
भूभूत
मान विद्विद्यमान
आकू
पढ़, लड़,पढ़ाकू, लड़ाकू
क्त(ण) जृ
जीर्ण
क्त मद्मत्त
क्त(न) खिद् खित्र
एरा
लूट, कामलुटेरा, कमेरा
इयल
सड़, अड़, मर सड़ियल, अड़ियल, मरियल
डाका, खा, चाल डाकू, खाऊ, चालू
अनीय (संस्कृत)
दृश्दर्शनीय
य (संस्कृत)दा
देय
य (संस्कृत) पूज् पूज्य
आड़ी (हिंदी)खेल, कब, आगे, पीछेखिलाड़ी, कबाड़ी, अगाड़ी, पिछाड़ी
आलू/आलुझगड़ा, दया, कृपाझगड़ालू, दयालु, कृपालु
आऊ (हिंदी) चल, बिक, टिकचलाऊ, बिकाऊ, टिकाऊ
आका (हिंदी)लड़, धम, कड़ लड़ाका, धमाका, कड़ाका
अनीयपठ, पूज,शोचपठनीय ,पूजनीय ,शोचनीय ।

हिंदी रूप/रचना के आधार पर ‘कृत् प्रत्यय’ के दो भेद है-

  1. विकारी कृत् प्रत्यय
  2. अविकारी कृत् प्रत्यय

(1)विकारी कृत् प्रत्यय:)- वे कृत् प्रत्यय जिसमें संज्ञा या विशेषण के शुद्ध रूप बनते है। तो वह विकारी कृत प्रत्यय कहलाते हैं ।
अर्थात कहने का तात्पर्य है कि— कृत प्रत्यय में शुद्ध संज्ञा तथा विशेषण बने होते हैं इसलिए इसे विकारी कृत प्रत्यय कहते हैं ।

विकारी कृत् प्रत्यय केचार भेद होते है-

  1. क्रियार्थक संज्ञा
  2. कर्तृवाचक संज्ञा
  3. वर्तमानकालिक कृदन्त
  4. भूतकालिक कृदन्त

क्रियार्थक संज्ञा-

जो संज्ञा क्रिया के मूल रूप में होती है तथा क्रिया को अर्थ प्रदान करती है वह  क्रियार्थक संज्ञा होती है।अर्थात संज्ञा की क्रिया में ‘को का ‘अर्थ बताने वाला वह शब्द जो क्रिया के रूप में उपस्थित होते हुए भी संज्ञा का अर्थ देता है वह  क्रियार्थक संज्ञा कहलाती है।

कर्तृवाचक संज्ञा-

-ऐसे प्रत्यय जिनके जुड़ने पर क्रिया के कार्य करने वाले का बोध हो उसे कर्तृवाचक संज्ञा कहते हैं।

वर्तमानकालिक कृदन्त-

कोई भी व्यक्ति जब पहले एक कार्य को करते को हुए दूसरे कार्य को भी साथ में करता है, तो उस समय में पहले वाली की गई क्रिया को वर्तमानकालिक कृदन्त कहते हैं।

भूतकालिक कृदन्त-

सामान्य भूतकालिक क्रिया को हुआ, हुए, हुई आदि शब्दों को जोड़ने से भूतकालिक कृदन्त बनता है।

(2) अविकारी कृत् प्रत्यय-

ऐसे अविकारी कृत्-प्रत्यय जिनसे क्रियामूलक विशेषण या अव्यय के रूप बनते हैं। उन्हें अविकारी कृत प्रत्यय कहते हैं । हिन्दी क्रियापदों के अन्त में कृत्-प्रत्ययों के योग से निम्नलिखित कृदन्त प्रत्यय है।

कृत प्रत्यय के भेद :-

  • कर्तृवाचक कृत प्रत्यय
  • कर्मवाचक कृत प्रत्यय
  • करणवाचक कृत प्रत्यय
  • भाववाचक कृत प्रत्यय
  • विशेषणवाचक कृत प्रत्यय
  • क्रियावाचक कृत प्रत्यय

1. कर्तृवाचक कृत प्रत्यय :)-

जो शब्द कार्य को करने वाले का अर्थात कर्ता का बोध कराते है।उन्हे कर्तृवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।

सरल शब्दों में:)- जिन प्रत्ययों को लगााने पर बने शब्द से कर्ता का बोध होता है। उसे कर्तृवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।जैसे-

  • रखवाला, रक्षक, लुटेरा, पालनहार,कृपालु , दयालु इत्यादि।

कर्तृवाचक कृत प्रत्यय के अन्य उदहारण

  •  अक = लेखक , नायक , गायक , पाठक
  •  एरा = लुटेरा , बसेरा
  •  ऐया = गवैया , नचैया
  •  ओडा = भगोड़ा
  •  वाला = पढनेवाला , लिखनेवाला , रखवाला
  • अक्कड = भुलक्कड , घुमक्कड़ , पियक्कड़
  • आक = तैराक , लडाक
  •  आलू = झगड़ालू
  •  आकू = लड़ाकू , ,कृपालु , दयालु
  •  आड़ी = खिलाडी , अगाड़ी , अनाड़ी
  • इअल = अडियल , मरियल , सडियल
  • हार = होनहार , राखनहार , पालनहार
  •  ता = दाता , गाता , कर्ता , नेता , भ्राता , पिता , ज्ञाता ।

कर्मवाचक कृत प्रत्यय :-

जो प्रत्यय शब्द किसी के कर्म का बोध कराते है। उन्हें कर्मवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं । अर्थात कर्म का बोध कराने वाले।

सरल शब्दों में —जिस प्रत्यय को लगााने पर कर्म का बोध होता है। वे प्रत्यय कर्मवाचक कृत प्रत्यय कहलाते हैं

जैसे-

  • ओढ़ना, पढ़ना, छलनी, खिलौना, बिछौना इत्यादि।

कर्मवाचक कृत प्रत्यय के अन्य उदहारण

  • औना = बिछौना , खिलौना
  • ना = गाना,बचाना चलना, सूँघना , पढना , खाना
  • नी = सुँघनी ,भरनी करनी सुननी, छलनी
  • गा = गाना गात, गाम, ।

करणवाचक कृत प्रत्यय:-
जिन प्रत्ययों को लगााने पर क्रिया के साधन का बोध होता है। उन्हें करणवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।जैसे :-

  • रेती, फाँसी, झाड़ू, बंधन, मथनी, झाड़न इत्यादि।

करणवाचक कृत प्रत्यय के अन्य उदहारण

  •  आ = भटका , भूला , झूला
  •  ऊ = झाड़ू
  •  ई = रेती , फांसी , भारी , धुलाई
  •  न = बेलन , झाडन , बंधन
  • नी = धौंकनी , करतनी , सुमिरनी , छलनी , फूंकनी , चलनी

भाववाचक कृत प्रत्यय :-
जिन कृत प्रत्ययों के योग से भाववावक संज्ञाओं की रचना होती है। उन्हें भाववाचक कृत प्रत्यय कहते है।

सरल शब्दों में—जो शब्द क्रिया के भाव का बोध कराते है,अर्थात ​ क्रिया से भाववाचक संज्ञा का निर्माण करते है। ऐसे प्रत्यय भाववाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।
जैसे-

  • लड़ाई, लिखाई, मिलावट, सजावट, बनावट, बहाव, चढ़ाव इत्यादि।

भाववाचक कृत प्रत्यय के अन्य उदहारण:

  •  अन = लेखन , पठन , गमन , मनन , मिलन
  •  ति = गति , रति , मति
  •  अ = जय , लेख , विचार , मार , लूट , तोल
  • आवा = भुलावा , छलावा , दिखावा , बुलावा , चढावा
  • आई = कमाई , चढाई , लड़ाई , सिलाई , कटाई , लिखाई
  •  आहट = घबराहट , चिल्लाहट
  •  औती = मनौती , फिरौती , चुनौती , कटौती
  • अंत = भिडंत , गढंत
  •  आवट = सजावट , बनावट , रुकावट , मिलावट
  •  ना = लिखना , पढना
  •  आन = उड़ान , मिलान , उठान , चढ़ान
  • आव = चढ़ाव , घुमाव , कटाव
  • आवट = सजावट , लिखावट , मिलावट

विशेषण वाचक कृत प्रत्यय :-
जिन प्रत्ययों से क्रियापदों में विशेषण शब्द की रचना होती है उसे विशेषण वाचक कृत प्रत्यय कहते है ।
जैसे :-

  •  त = आगत ,विगत ,कृत
  •  तव्य = कर्तव्य ,गन्तव्य
  •  य = नृत्य ,पूज्य , खाघ
  •  अनीय =पठनीय ,पूजनीय ,शोचनीय ।

.
 क्रिया वाचक कृत प्रत्यय:—
जिन प्रत्ययों से क्रियापरक संज्ञा,विशेषण,तथा अव्ययबोधक रखनेवाली क्रिया बनती है,तथा क्रियाओं का निर्माण होता है, उन्हें क्रिया वाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।

अर्थात कहने का तात्पर्य है कि- क्रियावाचक कृत् प्रत्यय में बीते हुए या गुजर रहे समय के बोधक होते हैं।

पहचान

  • ‘आ’ अथवा ‘या’ प्रत्यय को मूल धातु के आगे लगाने से भूतकालिक कृत् प्रत्यय बनते है
  • ता’ प्रत्यय को मूल धातु के आगे लगाने से वर्तमानकालिक कृत् प्रत्यय बनते है। जैसे-

भूतकालिक कृत् प्रत्यय-

  • खा + या= खाया
  • सो+ या— सोया
  • लिख + आ= लिखा
  • पढ़ + आ= पढ़ा

वर्तमानकालिक कृत् प्रत्यय-

  • लिख + ता= लिखता
  • जा + ता= जाता
  • खा + ता= खाता
  • डूब+ता =डूबता
  • बह + ता=बहता
  • चल+ता= चलता
  • जा +कर =,जाकर
  • देख+कर=देखकर

हिंदी के कृत्-प्रत्यय (Primary suffixes)

हिंदी के कृत् या कृदन्त प्रत्यय का वर्णन विभिन्न् प्रकार के शब्दों के द्वारा किया गया है। जिनकी संख्या अगिनत है। जिसमें हिन्दी के कृत—प्रत्ययों को विभिन्न शब्दों के के आधार पर बताया गया है। वर्णन इस प्रकार है

  • अ, अन्त, अक्कड़, आ, आई, आड़ी, आलू, आऊ, अंकू, आक, आका, आकू, आन, आनी, आप, आपा, आव, आवट, आवना, आवा, आस, आहट, इयल, ई, इया, ऊ, एरा, ऐया, ऐत, ओड़ा, औता, औती, औना, औनी, आवनी, औवल, क, का, की, गी, त, ता, ती, न, नी, वन, वाँ, वाला, वैया, सार, हारा, हार, हा इत्यादि।

संस्कृत के प्रत्ययों की तरह हिंदी के प्रत्ययों का भी महत्वपूर्ण योगदान है। हिंदी के कृत्-प्रत्ययों से विभिन्न प्रकार के प्रत्ययों का उल्लेख किया गया है। जिसमें सभी प्रत्ययों के नाम,उनसे सम्बधित उदाहरण तथा प्रत्यय-चिह्नों के साथ उनका वर्णन किया गया है।

  • कर्तृवाचक कृत्-प्रत्यय,
  • कर्मवाचक कृत् प्रत्यय,
  • करणवाचक कृत्-प्रत्यय,
  • भाववाचक कृत्-प्रत्यय
  • विशेषण कृत्–प्रत्यय
  • गुणवाचक कृत्–प्रत्यय

(i)कर्तृवाचक कृत्-प्रत्यय
र्तृवाचक कृत्-प्रत्ययों को बनाने के लिए धातु के अन्त में प्रत्यय शब्दों को लगाकर प्रयोग किया जाता है।

विशेष

  • कर्तृवाचक कृत्-प्रत्यय में आका, आड़ी, आलू, इया, इयल, एरा, ऐत, आकू, अक्कड़,अंकू, आऊ, आक वन, वाला, वैया, सार,हार, हारा आदि प्रत्ययों को लगाकर शब्द बनाए जाते है।

कर्तृवाचक कृत्-प्रत्यय के उदहारण  

प्रत्यय धातु /मूल शब्दउदहारण /कृदंत-रूप
अक्कड़ भूलभूलक्क्ड़
वन
उपउपवन
वाला
सुन
सुननेवाला
सारमिलमिलनसार
वैया खा खवैया
आऊ
बिक बिकाऊ
आक
तैरतैराक
आका
उडउड़ाका
आड़ी
खेल खिलाड़ी
आलू
चाल चालू
इयाघटघटिया
इयल
अड़अड़ियल
इयल
सड स​डियल
ऐत
लड़लड़ैत
ऐया
काटकटैया
ओड़
हँस हँसोड़
ओड़ाभागभगोड़ा
हार
रखराखनहार
हारा रोरोवनहारा

कर्मवाचक कृत्-प्रत्यय

हिंदी में कर्मवाचक कृत्-प्रत्यय बनाने के लिए धातु के अन्त में प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है। इसमें कर्ता के कर्म को प्रधानता दी जाती ​है।

विशेष

कर्मवाचक कृत्-प्रत्यय में ना, नी औना आदि प्रत्ययों को लगाकर शब्द बनाए जाते है।

कर्मवाचक कृत्-प्रत्यय के उदहारण 

प्रत्ययधातु/ मूल शब्द उदहारण/कृदंत-रूप
ना
खेल,चल, पढ़खेलना ,पढना,चलना
नीकाट,छल,चाट ओढकटनी,छलनी, चटनी,ओढ़नी,
औना घिन,खेला, बिछघिनौना,खिलौना,बिछौना

करणवाचक कृत्-प्रत्यय

हिंदी में करणवाचक कृत्-प्रत्यय में धातु के अंत प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है। इसमें कर्ता के कार्य के साधन का बोध होता है। तथा कार्य का रूप साधन माना जाता है।

विशेष

  • करणवाचक कृत्-प्रत्यय बनाने के लिए धातु के साथ में अन्त में आ, आनी, ई, ऊ, औटी, न, ना, नी इत्यादि प्रत्यय लगाए जाते हैं।

करणवाचक कृत्-प्रत्यय के उदाहरण –

प्रत्ययधातु/मूल शब्द उदहारण/कृदंत-रूप

झूल झूला
आनी
मथमथानी

रेत रेती

झाड़ झाड़ू
औटी
कसकसौटी

बेल ,चल
बेलन,चलन
ना
बेल,चल
बेलना,चलना
नीबेल,चल बेलनी, चलनी

भाववाचक कृत्-प्रत्यय

भाववाचक कृत्-प्रत्ययों को बनाने हेतू धातु के अन्त में विभिन्न प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है।

विशेष —

  • जिसमेअन्त,आ,आई,आन,आप,आपा,आव,आवा,आस,आवना,आवनी,आवट,आहट,ई,औता,औती,औवल,औनी,क,की, गी,त,ती,न,नी इत्यादि प्रत्ययों का प्रयोग करके शब्दों का निर्माण किया जाताहै

भाववाचक कृत्-प्रत्यय के उदाहरण –

प्रत्यय
धातु/मूल शब्दउदहारण/कृदंत-रूप
अन्त रट,गढ, भिड
रंटत,गढंत,भिड़न्त आदि।
चल,जल,फेरचला,जला,फेरा आदि।
आईखिल,सुन,लड़खिलाई,सुनाई,लड़ाई आदि।
आनउड,मिल,पहउडान,मिलान,पहचान आदि।
आवसुझ,हिस,खिंचसुझाव,हिसाब,खिंचाव आदि।
आवाबुल,बढ,भूलबुलावा,बढावा,भुलावा आदि।
आसछपस,भडस,निकसछपास,भडास,निकास आदि।
आवनाभय,लुभ,सुह,पा
लुभावना,भयावना,सुहावना पावना आदि।
आवनीभा,पा,चेताव
भा,पा,चेताव चेतावनी, भावनी,पावनी आदि।
आवटसज, लिख,बुन,थकालिखावट,बुनावट,थकावट,सजावट आदि।
आहटचिल्ल,घब,मुस्करा,कुलबुलघबराहट,मुस्कुराहट,कुलबुलाहट,चिल्लाहट आदि।
बोल रोल,थप,खोल,टोलरोली,थपकी,खोली, टोली बोली आदि।
औता समझ इकइकलौता,समझौता आदि।
औती मान,चुन,लिखमनौती,चुनौती,लिखौती आदि।
औनी पहर,ठहर,पीसपहरौनी,ठहरौनी,पिसौनी आदि।
पठ,लेख ,बैठपाठक,लेखक,बैठक आदि।
कीबैठ,डूब,फिर बैठकी डूबकी,फिरकी आदि।
त/ती खप, बच,चढ़,घट,बढखपत,बचत/,चढ़ती,घटती,बढती आदि।
औवलभूल फोड,बुझ,मनभुलौवल,फडौवल,बुझौवल,मनौवल आदि।
न/नी
दे,चाट देन,चटनी आदि।
आप/आपा मिल, पूजमिलाप,पुजापा
भर,सर,भार,सार आदि।

संस्कृत के कृत्-प्रत्यय और भाववाचक संज्ञाएँ

कृत्-प्रत्ययधातु /मूल शब्दभाववाचकसंज्ञाएँ/ उदहारण

कम्काम
अना विद्
वेदना
अना वन्द्
वन्दना

इष्इच्छा
पूज्पूजा
तिशक्
शक्ति
या
मृगमृगया
तृभुज्
भोक्तृ (भोक्ता)
तन्तनु
त्यज् त्यागी

कृत्-प्रत्यय धातु कर्तृवाचक संज्ञाएँ

प्रत्यय धातु/मूल शब्द उदहारण/ संज्ञाएँ
अक
गै , पौगायक,पावक

सृप्सर्प
दिव्
देव
तृदा
दातृ (दाता)

कृकृत्य
प्रह् प्रहार

क्रियावाचक कृत्-प्रत्यय

क्रियाद्योतक कृदन्त-विशेषण बनाने में आ, ता आदि प्रत्ययों का प्रयोग होता है जिसमें संज्ञा के विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते है।

पहचान

  • आ’ अथवा ‘या’ प्रत्यय को मूल धातु के आगे लगाने से भूतकालिक कृत् प्रत्यय बनते है
  • ता’ प्रत्यय को मूल धातु के आगे लगाने से वर्तमानकालिक कृत् प्रत्यय बनते है। जैसे-

क्रियावाचक कृत्-प्रत्यय के दो भेद है-

  • वर्तमानकाल क्रियावाचक कृदन्त-विशेषण
  • भूतकालिक क्रियावाचक कृदन्त-विशेषण।

वर्तमानकालिक विशेषण-

  • प्रत्यय- धातु- ——वर्तमानकालिक विशेषण
  • ता—- बह——– बहता
  • ता—- मर——— मरता
  • ता— गा ———–गाता

भूतकालिक विशेषण-

  • प्रत्यय —-धातु——- भूतकालिक विशेषण
  • आ——- पढ़ ——–पढ़ा
  • आ——- धो———- धोया
  • आ——- गा ———–गाया

2. तद्धित प्रत्यय :-

संज्ञा , सर्वनाम , विशेषण आदि शब्दों के पीछे लगकर जो प्रत्यय शब्द बनाते है। उन शब्दों को तद्धित प्रत्यय कहते हैं तद्धित प्रत्यय से मिलाकर जो शब्द बनते हैं उन्हें तद्धितांत प्रत्यय कहते हैं ।
दूसरे शब्दों में- जो प्रत्यय धातुओं को छोड़कर अन्य शब्दों में लगते है। उन्हें तद्धित प्रत्यय कहते हैं।
जैसे :–

  • देव+त्व— देवत्य
  • लेखक+ईय—लेखकीय
  • सेठ+आनी = सेठानी

देव ,लेखक, सेठ संज्ञा शब्द है। इनके पीछे त्व,कीय,आनी प्रत्यय लगने से नए शब्द देवत्य,लेखकीयऔर सेठानी बने है।
तद्धित प्रत्यय के अन्य उदहारण

  • मूर्ख+ता —मूर्खता​ —(विशेषण +प्रत्यय)
  • मानव+ ता— मानवता —(संज्ञा+ प्रत्यय)
  • अपना + पन = अपनापन —संज्ञा+ प्रत्यय
  • बाल+ पन— बालपन —(संज्ञा+ प्रत्यय)
  • अच्छा + आई = अच्छाई (भाववाचक संज्ञा)
  • एक + ता = एकता  (संज्ञा+ प्रत्यय)
  • लड़का + पन = लडकपन (विशेषण +प्रत्यय)
  • मम + ता = ममता (विशेषण +प्रत्यय)
  • अपना + पन = अपनत्व (भाववाचक संज्ञा)

तद्धित-प्रत्यय के द्वारा निम्नलिखित संज्ञाओं का आपस में रूपांतरण हुआ है।

  • जातिवाचक संज्ञा से भाववाचक संज्ञा बनाना
  • व्यक्ति् वाचक संज्ञा से अन्य संज्ञा बनाना
  • विशेषण से भाववाचक संज्ञा बनाना
  • संज्ञा से विशेषण बनाना

उपसर्ग की तरह तद्धित-प्रत्ययों को भी तीन भागों में बॉंटा गया है।

  • हिंदी के तद्धित-प्रत्यय
  • संस्कृत के तद्धित-प्रत्यय
  • उर्दू-—फारसी के तद्धित-प्रत्यय

ये सभी प्रत्यय हिन्दी शब्दों की रचना में सहायकार हुए है। जिनके द्वारा नए —नए शब्दों का निर्माण हुआ है।इनके उदाहरण नीचे दिये गए है।

हिंदी के तद्धित-प्रत्यय (Nominal suffixes)

हिंदी के तद्धित-प्रत्यय निम्न प्रकार के है। जिसमें संज्ञा ,भाव,संबंध, विशेषणऔरलघुत्तम आदि शब्दों का वर्णन किया गया है।

पहचान

जिनकी पहचान निम्न शब्दों के के द्वारा ​की जा सकती है।

  • आ, आई, ताई, आऊ, आका, आटा, आन, आनी, आयत आर, आरी आरा, आलू, आस आह, इन, ई, ऊ, ए, ऐला एला, ओ, ओट, ओटा औटी, औती, ओला, क, की, जा, टा, टी, त, ता, ती, नी, पन, री, ला, ली, ल, वंत, वाल, वा, स, सरा, सा, हरा, हला, इत्यादि।

हिंदी में तद्धित-प्रत्यय के उदहारण

प्रत्ययमूल शब्दउदहारण
गंद मंद चचंलगंदा,मंदा,चचलाआदि।
आई भला मीठा बडा अनपा पराया पण्डित, ठाकुर, लड़, चतुर, चौड़ा भलाई मिठाई बडाई अनपाई पराई पण्डिताई, ठकुराई, लड़ाई, चतुराई, चौड़ाई आदि।
आकचट,भड़,तड़ सडचटाक,भड़ाक,तड़ाक,सड़ाक आदि।
आइपछताना, जगना ,पछताइ,जगाइ,आदि ।
आनीसेठ, नौकर, मथसेठानी, नौकरानी, मथानीआदि ।
आयतबहुत, पंच, अपनाबहुतायत, पंचायत, अपनायत आदि ।
आर/आरालोहा, सोना, दूध, गाँवलोहार, सुनार, दूधार, गँवार आदि।
आहटचिकना, घबरा, चिल्ल, कड़वा +चिकनाहट, घबराहट, चिल्लाहट, कड़वाहट आदि
इलफेन, कूट, तन्द्र, जटा, पंक, स्वप्न, धूमफेनिल, कुटिल, तन्द्रिल, जटिल, पंकिल, स्वप्निल, धूमिल आदि।
इष्ठकन्, वर्, गुरु, बलकनिष्ठ, वरिष्ठ, गरिष्ठ, बलिष्ठ आदि।
सुन्दर, बोल, पक्ष, खेत, ढोलक, तेल, देहातसुन्दरी, बोली, पक्षी, खेती, ढोलकी, तेली, देहाती आदि।
ईनग्राम, कुलग्रामीण, कुलीन आदि।
इनजोगी, तेली,मालीजोगिन,तेलिन, मालिन आदि।
आइनपण्डित, ठाकुरपण्डिताइन, ठकुराइन आदि ।
ईयभवत्, भारत, पाणिनी, राष्ट्रभवदीय, भारतीय, पाणिनीय, आदि।
धीरा,पीछा,बदला,लेखा,सामना बच्चा, लेखा, लड़का धरे पीछे बदले सामने बच्चे, लेखे, लड़के आदि।
एयअतिथि, अत्रि, कुंती, पुरुष, राधाआतिथेय, आत्रेय, कौंतेय, पौरुषेय, राधेय आदि।
एरा/ऐराअंध,घन,चाचा,फूफा,मच्छ साँप, बहुत, मामा, काँसा, लुटअँधेरा, घनेरा,चचेरा,फूफेरा,मच्छेरा सँपेरा, बहुतेरा, ममेरा, कसेरा, लुटेरा आदि।
ऐल/ऐलाखपरा,गुस्सा,दूध,मूॅछ,विष,फुल, नाक फुलेल, नकेल खपेरा खपरैल,दूधैल,विषैला, आदि।
ऐतडाका, लाठी ,बरछा,भलालाठी डकैत, बरछैत,भालैत लठैत आदि।
ओला आम,खाट, मॉंझ पाट, साँपअमोला,खटोला,मॅंझोटा पटोला, सँपोला आदि।
औतीबाप, ठाकुर, मानबपौती, ठकरौती, मनौती आदि।
धम, चम, बैठ, बाल, दर्श, ढोलधमक, चमक, बैठक, बालक, दर्शक, ढोलक आदि।
का/कीएक,चार,छोटा,बडा ,खट, झटइक्का,चौका,छुब्का,बडका,कनकी,लुटकी,खटका, झटका आदि।
करविशेष, ख़ास
विशेषकर, ख़ासकर आदि।
रंग, संग, खपरंगत, संगत, खपतआदि।
टा काला,चोर,नंगा,रोम,कलूटा,चोटटा,लंगटा,रोंगटा आदि।
जाभ्राता, दो
भतीजा, दूजा आदि।
ड़ा,\ड़ीचाम, बाछा, पंख, टाँगचमड़ा, बछड़ा, पंखड़ी, टँगड़ी आदि।
औटाबिल्ला, काजरबिलौटा, कजरौटा आदि।
पाअपना,बहिन,बूढा,रॉंडअपनापा,बहिनापा,बुढापा,रॅंडापा आदि।
तन
अद्यअद्यतन आदि।
तःअंश, स्वअंशतः, स्वतः आदि।
तीकम, बढ़, चढ़कमती, बढ़ती, चढ़ती आदि।
तर
गुरु, श्रेष्ठगुरुतर, श्रेष्ठतर आदि।
वाल/वालाकेजरी,धारी,प्रयाग,गाडी,धन,पढना,बाजाधारीवाल,केजरीवाल,प्रयागवाल,धनवाला,गाडीवाला,पढनेवाला,बाजावाला आदि।
वॉंपॉंच,सात,आठ,नवपॉंचवा,सातवॉं,आठवॉं,नवॉं आदि।
ला/लीधुंध,नीचे,पीछे,लाड,खाज,टीका,डफ,सूपधुंधला,नीचला,पीछला,लाडली,खुजली,डफली,सुपली आदि।
वन्त/ वन्तीगुण,धन,बल,रूप,शील,फूलगुणवन्त,धनवन्त,बलवन्त रूपवन्ती,शीलवन्ती
,फूलवन्ती आदि।

हिंदी में तद्धित-प्रत्यय के निम्न प्रकार हैं-

  • कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय
  • भाववाचक तद्धित प्रत्यय
  • संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय
  • गणनावाचक तद्धित प्रत्यय
  • गुणवाचक तद्धित प्रत्यय
  • स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय
  • ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय
  • सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय
  • स्त्रीबोधक तद्धित प्रत्यय
  • तारतम्यवाचक तद्धित प्रत्यय
  • पूर्णतावाचक तद्धित प्रत्यय

कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय —

जिन प्रत्ययों के द्वार संज्ञा के कार्य का बोध हों वह प्रत्यय कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते है।

पहचान

कृर्तवाचक संज्ञा बनाने वाले शब्दों की पहचान निम्नलिखित शब्दों से होती है।

  • आर, इया, ई, एरा, हारा, इत्यादि तद्धित-प्रत्यय संज्ञा के अन्त में लगाकर कर्तृवाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-

कृर्तवाचक संज्ञा बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय

तद्धित प्रत्ययसंज्ञाकर्तृवाचक संज्ञाएँ
आरसोना,लोहालुहार सुनार

तमोल,तेलतेली,तमोली
इयामुख,दुख,रसोईमुखिया,दुखिया,रसोईया
हारालकड़ी,पानी,मनिलकरहारा,पनिहारा,मनिहारा
एरा
साँप ,काँसाकसेरा, सँपेरा
वालागाडी,धन,पढना,बाजाधनवाला,गाडीवाला,पढनेवाला,बाजावाला आदि।

भाववाचक तद्धित प्रत्यय-

जिन प्रत्ययों से भाव का बोध हो वह प्रत्यय भाववाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

पहचान

भाववाचक तद्धित प्रत्यय की पहचान निम्न शब्दों के द्वारा की जाती है।

  • आ, आयँध, आई, आन, आयत, आरा, आवट, आस, आहट, ई, एरा, औती, त, ती, पन, पा, स इत्यादि तद्धित-प्रत्ययों को संज्ञा के अन्त में लगाकर भाववाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-

भाववाचक संज्ञा बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणभाववाचक संज्ञाएँ
आईचतुर,बुरा,भला,चतुराई,बुराई,चनुराई आदि।
आनचौड़ा,उडा,सुना,,चौड़ान उडान,सुनान आदि
आयतअपनाअपनायत,
खेत,गरम,नरमगरमी,नरमी,खेती
पनकाला,लड़का,बच्चाबचपन ,लड़कपन,कालापन, अपनापन
त्वदेवता ,मनुष्य , पशु , महा , गुरु , लघु देवत्व , मनुष्यत्व , पशुत्व , महत्व , गुरुत्व , लघुत्व आदि
आसखट , मीठा , भडा +खटास , मिठास , भडास आदि ।
तासुंदर , मूर्ख , मनुष्य , लघु , गुरु , सम , कवि , एक , बन्धु +सुन्दरता , मूर्खता , मनुष्यता , लघुता , गुरुता , समता , कविता , एकता , बन्धुता आदि
हटकड़वा,चिकना चिकनाहट कड़वाहट
इमालाली , महा , अरुण , गरीलालिमा , महिमा , अरुणिमा , गरिमा आदि ।
वट सज्जासजावट आदि ।

रंग रंगत आदि ।
आस
मीठा मिठास आदि
बुलाव , सराफ , चूर बुलावा , सराफा , चूरा आदि ।

संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय-

जिन प्रत्ययों से संबंध का बोध हो वे प्रत्यय संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

पहचान

संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय की पहचान भिन्न भिन्न् प्रकार के शब्दों से की जाती है।

  • आल, हाल, ए, एरा, एल, औती, जा इत्यादि तद्धित-प्रत्ययों को संज्ञा के अन्त में लगाकर सम्बन्धवाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
संबंधवाचक  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणसम्बन्धवाचक संज्ञाएँ
इमस्वर्ण , अंत , रक्तिस्वर्णिम , अंतिम , रक्तिम आदि ।
इल जट , फेन , बोझ , पंकजटिल , फेनिल , बोझिल , पंकिल आदि ।
ग्राम , काम , हास् , भव ग्राम्य , काम्य , हास्य , भव्य आदि ।
ओईनन्दननदोई आदि
आल
ससुरससुराल
हालनाना
ननिहाल
औती
बापबपौती
जा
भाई भतीजा
एरा
मामा ममेरा
एलनाक नकेल
हराइकइकहरा आदि ।
वतपुत्र , मातृपुत्रवत , मातृवत आदि
तर

कठिनकठिनतर आदि ।
मान बुद्धिबुद्धिमान आदि
ईयभारत , प्रान्त , नाटक , भवद भारतीय , प्रांतीय , नाटकीय , भवदीय आदि ।
ऐला विषविषैला आदि ।
इत
फल , पीड़ा , प्रचल , दुःख , मोहफलित , पीड़ित , प्रचलित , दुखित , मोहित आदि ।
ईला रस , रंग , जहररसीला , रंगीला , जहरीला आदि
इकशरीर , नीति , धर्म , अर्थ , लोक , वर्ष , एतिहास शारीरिक , नैतिक , धार्मिक , आर्थिक , लौकिक , वार्षिक , ऐतिहासिक आदि ।
आलु दया , श्रद्धादयालु , श्रद्धालु आदि ।
इया पटना , कलकता , जबलपुर , अमृतसर +पटनिया कलकतिया , जबलपुरिया , अमृतसरिया आदि
लखनऊ , पंजाब , गुजरात , बंगाल , सिंधुलखनवी , पंजाबी , गुजराती , बंगाली , सिंधी आदि ।

गणनावाचक तद्धित प्रत्यय-

जिन प्रत्ययों से संख्या का बोध हो वह प्रत्यय गणनावाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते है।

पहचान

गणनावाचक तद्धित प्रत्यय की पहचान विभिन्न् प्रकार के शब्दों के द्वारा की जाती है।

  • ला, रा, था, वाँ, हरा इत्यादि प्रत्ययों के साथ संज्ञा-पदों के अंत में लगाकर गणनावाचक तद्धितान्त संज्ञाए बनती है।
गणनावाचक  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययमूल शब्द गणनावाचक संज्ञाएँ
ला
पह पहला
रादुस , तीनदूसरा, तीसरा
था
चौ चौथा
वाँ
पांच , सात , दससातवाँ, आठवाँ, दसवाँ,
हरा इक , दु , तिइकहरा,दुहरा, तिहरा
गुनादोदोगुना

विशेषण/गुणवाचक तद्धित प्रत्यय-

जिन प्रत्ययों से गुण का बोध हो वह प्रत्यय गुणवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

पहचान

गुणवाचक तद्धित प्रत्यय की पहचान निम्न प्रकार से की जा सकती है।

  • आ, इत, ई, ईय, ईला, वान इन प्रत्ययों को संज्ञा के अन्त में लगाकर गुणवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
विशेषण वाचक  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययसंज्ञा-विशेषण/ मूल शब्दविशेषण संज्ञाएँ
ठंड, प्यास, भूख
ठंडा, प्यासा, भूखा
इतपुष्प, आनंद, क्रोधपुष्पित, आनंदित, क्रोधित
क्रोध, जंगल, भार क्रोधी, जंगली, भारी
ईयभारत, अनुकरण, रमणभारतीय, अनुकरणीय, रमणीय
ईला चमक, भड़क, रंग
चमकीला, भड़कीला, रंगीला
वानगुण, धन, रूप गुणवान, धनवान, रूपवान

स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय-

जिन प्रत्ययों से स्थान का बोध हों वह प्रत्यय स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

पहचान

स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय की पहचान निम्नलिखित शब्दों के द्वारा की जा सकती है।

  • ई, वाला, इया, तिया इन प्रत्ययों को संज्ञा के अन्त में लगाकर स्थानवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
स्थानवाचक  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्यय मूल शब्द /संज्ञा-विशेषणउदहारण /स्थानवाचक संज्ञाएँ

जर्मन, गुजरात, बंगालजर्मनी, गुजराती, बंगाली
वालादिल्ली, बनारस, सूरतदिल्लीवाला, बनारसवाला, सूरतवाला
इया मुंबई, जयपुर, नागपुरमुंबइया, जयपुरिया, नागपुरिया
तियाकलकत्ता, तिरहुतकलकतिया, तिरहुतिया

ऊनवाचक तद्धित-प्रत्यय-

जिन प्रत्ययों से ऊनवाचक संज्ञाओं से वस्तु की लघुता, प्रियता, हीनता आदि के भाव का पता चलता हैं। ऊनवाचक तद्धित-प्रत्यय कहलाते है।

पहचान

  • ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय की पहचान निम्न शब्दों के द्वारा की जाती है।
  • आ, इया, ई, ओला, क, की, टा, टी, ड़ा, ड़ी, री, ली, वा, सा इन प्रत्ययों के अन्त में संज्ञा को लगाकर ऊनवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
ऊनवाचक बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्यय मूल शब्द /
संज्ञा-विशेषण
ऊनवाचक संज्ञाएँ/उदहारण

ठाकुरठकुरा
इया खाट खटिया
ढोलकढोलकी
ओला
साँपसँपोला
ढोलढोलक
कीकन
कनकी
टा
चोरचोट्टा
टी
बहूबहुटी
ड़ाबाछाबछड़ा
ड़ी टाँग

टँगड़ी
सामरा मरा-सा
रीकोठा कोठरी
ली
टीकाटिकली
वाबच्चाबचवा

सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय-

जिन प्रत्ययों से समता/समानता का बोध हो वह सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

पहचान

  • संज्ञा के अन्त में सा हरा इत्यादि इन प्रत्ययों को लगाकर सादृश्यवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
सादृश्यवाचक  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययसंज्ञा-विशेषण/मूल शब्द
सादृश्यवाचक संज्ञाएँ/उदहारण
सा
लाल, हरालाल-सा, हरा-सा
हरासोनासुनहरा

तद्धितीय विशेषण

  • संज्ञा के अन्त में आ, आना, आर, आल, ई, ईला, उआ, ऊ, एरा, एड़ी, ऐल, ओं, वाला, वी, वाँ, वंत, हर, हरा, हला, हा इत्यादि तद्धित-प्रत्यय लगाकर विशेषण बनते हैं। उदाहरण निम्नलिखित हैं-
तद्धितीय विशेषण  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययसंज्ञा/मूल शब्द
विशेषण/उदहारण

भूखभूखा
आनाहिन्दू
हिन्दुआना
आर

दूधदुधार
देहात
देहाती
आलदयादयाल

बाजार बाजारू
एरा चाचा
चचेरा
एरा मामा
ममेरा
हाभूत भुतहाहरा

स्त्रीवाचक तद्धित प्रत्यय :–

जिन प्रत्ययों को लगाने से स्त्री जाति का बोध हो उसे स्त्रीबोधक तद्धित प्रत्यय कहते हैं

पहचान

संज्ञा,सर्वनाम और विशेषण के साथ लगकर उनके स्त्रीलिंग होने का बोध उत्पन्न हो उन्हें स्त्रीबोधक तद्धित प्रत्यय कहते हैं

 स्त्रीवाचक बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्यय मूल शब्दस्त्रीवाचक/उदहारण
आनी

देवा , जेठ , नौकर + देवरानी , जेठानी , नौकरानी आदि ।
आणी रूद्र , इंद्ररुद्राणी , इन्द्राणी आदि ।
देव , लड़कादेवी , लडकी आदि ।
सुत , प्रिय ,छात्र , अनुजसुता , प्रिया , छात्रा , अनुजा आदि ।
इनधोबी , बाघ , माली धोबिन , बाघिन , मालिन आदि ।
नी
शेर , मोरशेरनी , मोरनी आदि ।
आइन
ठाकुर , मुंशीठकुराइन , मुंशियाइन आदि ।

तारतम्यवाचक तद्धित प्रत्यय :

जो प्रत्यय दो या दो से ज्यादा वस्तुओं की श्रेष्ठता बताने के लिए प्रयोग किए जाते है। उन्हें तारतम्यवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाता है।

तारतम्यवाचक बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय

प्रत्यय मूल शब्द उदहारण
तरअधिक , गुरु , लघुअधिकतर , गुरुतर , लघुतर आदि ।
तमसुंदर , अधिक,, लघुसुन्दरतम , अधिकतम , लघुतम आदि ।
ईय
गर , वर गरिय , वरीय आदि ।
इष्ठ गर , वर , कनगरिष्ठ , वरिष्ठ , कनिष्ठ आदि

पूर्णतावाचक तद्धित प्रत्यय :-

जिन प्रत्ययों से संख्या की पूर्णता का बोध होता है उन्हें पूर्णता वाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं।

पूर्णता वाचक बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय

प्रत्यय मूल शब्दउदहारण
प्रथ , पंच , सप्त , नव , दश प्रथम , पंचम , सप्तम , नवम , दशम आदि ।

चतुर चतुर्थ आदि ।

पष पष्ठ आदि ।
तीय द्वि , तृद्वितीय , तृतीय आदि ।

संस्कृत के तद्धित-प्रत्यय

हिंदी की तरह संस्कृत के तद्धित-प्रत्ययों को भी विभिन्न भागों में व्यक्त किया गया है। जिसमें विभिन्न् शब्दों को मिलाकर उनकी रचना की गई है। ​

पहचान

संस्कृत के तद्धित-प्रत्यय की पहचान निम्न लिखित शब्दों के द्वारा की गई है।

  • अ, अक आयन, इक, इत, ई, ईन, क, अंश, म, तन, त, ता, त्य, त्र, त्व, था, दा, धा, निष्ठ, मान्, मय, मी, य, र, ल, लु, वान्, वी, श, सात् इत्यादि।

जो शब्दांश तद्धित-प्रत्ययों के रूप में प्रयुक्त होते हैं। वे शब्दांश समास के पद रूप में मिलते है। जैसे-

  • अर्थ, अर्थी, आतुर,शाली, हीन आकुल, आढ़य,अतीत, अनुरूप, अनुसार, जन्य, इत्यादि।

अ शब्द रूप में संस्कृत तद्धित-प्रत्यय के उदहारण

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषण तद्धितान्त वाचकउसका संबंध/अर्थ व वाचक
कुरु

कौरवअपत्य
निशानैशगुण, सम्बन्ध
मुनिमौनभाव
अंश
तःअंशतः रीति
आयनरामरामायणस्थान
अंश जन
जनतासमाहर
शिवशौवसंबंध

इ/ई शब्द रूप में संस्कृत तद्धित-प्रत्यय के उदहारण

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणतद्धितान्त वाचकउसका संबंध/अर्थ व ,वाचक

पक्ष पक्षी गुण
इकतर्क
तार्किक जानेवाला
इत पुष्पपुष्पितगुण
ईनकुल
कुलीन गुण

त शब्द रूप में  संस्कृत तद्धित-प्रत्यय के उदहारण

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणतद्धितान्त वाचकउसका संबंध/अर्थ और वाचक
तन
अद्यअद्यतनकाल-सम्बन्ध
त्य

पश्र्चा पाश्र्चात्यसम्बन्ध
त्रअन्यअन्यत्रस्थान
त्व गुरु गुरुत्वभाव
ता जनजनतासमाहार
तः

अंशअंशतः रीति
तालघु
लघुता भाव

म शब्द रूप में  संस्कृत तद्धित-प्रत्यय के उदहारण निम्न है।

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणतद्धितान्त वाचकउसका संबंध/अर्थ और वाचक
मी वाक्वाग्मीकर्तृ
मय काष्ठकाष्ठमय विकार
मान्बुद्धिबुद्धिमान् गुण
मध्यमध्यम गुण
मयजलजलमयव्याप्ति

य,र,ल,व शब्द रूप में  संस्कृत तद्धित-प्रत्यय के उदहारण

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणतद्धितान्त वाचकउसका संबंध/अर्थ / गुण और वाचक
मधुर
माधुर्यभाव

दिति दैत्यअपत्य

ग्रामग्राम्यसम्बन्ध

मधुमधुरगुण
वत्स
वत्सल गुण
लुनिद्रा निद्रालुगुण
वान्
धनधनवान् गुण
वीमाया मायावी गुण

अन्य व्यंजन के साथ संस्कृत तद्धित-प्रत्यय के उदहारण

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणतद्धितान्त वाचकउसका संबंध/अर्थ /गुण और वाचक

रोमरोमेशगुण

कर्क कर्कशस्वभाव
धा
शतशतधाप्रकार
बाल बालक उन 
था
अन्यअन्यथा रीति
निष्ठ कर्म
कर्मनिष्ठ कर्तृ,सम्बन्ध
सात्भस्मभस्मसात्विकार
दासर्वसर्वदाकाल
हिंदी में संस्कृत की तत्सम संज्ञाओं के अन्त में तद्धित-प्रत्यय लगाने से प्रमुख प्रत्ययों का निर्माण होता है।
  • भाव वाचक संज्ञा बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
  • कृर्तवाचक संज्ञा बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
  • पुल्लिग से स्त्रीलिंग  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
  • विशेषण बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
  • क्रिया विशेषण बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
भाव वाचक संज्ञा बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
तद्धित-प्रत्ययमूलशब्द भाव वाचक संज्ञा/उदहारण
इमा –लघु,गुरू,महालालिमा, गरिमा, लघिमा, पूर्णिमा, हरितिमा, मधुरिमा, अणिमा, नीलिमा, महिमा।
त्व –नारी,पुरूष,गुरू,बंधु महत्त्व, लघुत्व, स्त्रीत्व, नेतृत्व, बंधुत्व, व्यक्तित्व, पुरुषत्व, सतीत्व, राजत्व, देवत्व, अपनत्व, नारीत्व, पत्नीत्व, स्वामित्व, निजत्व।
ता –नम्र,आवश्यक,,सुदंर,मानव,शत्रु,मधुर,मित्र,
,
श्रोता, वक्ता, दाता, ज्ञाता, सुंदरता, मधुरता, मानवता, महत्ता, बंधुता,
कृर्तवाचक संज्ञा बनाने वाले शब्द
प्रत्ययमूलशब्दकृर्तवाचक/उदहारण
सुख शास्त्र,अनुभवसुखी शास्त्री अनुभवी
लेख् लिपि पाठलेखिक लिपिक,पाठक
पुल्लिग से स्त्रीलिंग  बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययपुल्लिग /मूलशब्दस्त्रीलिंग/उदहारण

प्रिय,बाल,सुत,अनुजप्रिया,बाला,सुता,अनुजा आदि।
पुत्र,बाहम्ण्   
पुत्री,बाहम्णी आदि ।
आनीदेवर , जेठ , नौकर देवरानी , जेठानी , नौकरानी
आदि ।
आइनठाकुर , मुंशीठकुराइन , मुंशियाइन आदि ।
नी शेर , मोरशेरनी , मोरनी आदि ।
इनधोबी , बाघ , मालीधोबिन , बाघिन , मालिन आदि ।
विशेषण बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
तद्धित-प्रत्ययमूलशब्द/संज्ञा विशेषणविशेषण/ उदहारण
इक – धर्म,नगर,परिवार,समाज,सामाजिक, पारिवारिक, धार्मिक,नागरिक,
इत –लिख,कथ,चिंत,खंड, फललिखित, कथित, चिँतित, याचित, खंडित,फलित
इन –सुनार,चमार,माली,मालिक,मालिन, कठिन, बाघिन, मालकिन, मलिन, अधीन, सुनारिन, चमारिन, पुजारिन, कहारिन।
ईय –भारती,जाती,मानवी,राष्ट्रीभारतीय, जातीय, मानवीय, राष्ट्रीय, स्थानीय, भवदीय, पठनीय, पाणिनीय
कर—सुख,दुख,लाभ,हानिचलकर, सुनकर, पीकर, खाकर, उठकर, सोकर, धोकर, जाकर, आकर
तर –अधिक,, कम, कठिन] गुरु]ज्यादाअधिकतर, कमतर, कठिनतर, गुरुतर, ज्यादातर
मान –बुद्धि,मूर्ति,शक्ति,शोभाय,चलायबुद्धिमान, मूर्तिमान, शक्तिमान, शोभायमान, चलायमान
मती – श्री, बुद्धि,ज्ञान,वीर,रूप श्रीमती, बुद्धिमती, ज्ञानमती, वीरमती, रूपमती।
वान – गुण,, कोच,गाड़ी प्रतिभाबाग गुणवान, कोचवान, गाड़ीवान, प्रतिभावान, बागवान, धनवान, पहलवान

क्रिया विशेषण बनाने वाले तद्धित-प्रत्यय
तद्धित-प्रत्ययमूलशब्दक्रिया विशेष
तः –सामान्य,विशेष,मूल, अंश,, अंत,स्व,, प्रा, असामान्यतः, विशेषतः, मूलतः, अंशतः, अंततः, स्वतः, प्रातः, अतः।
पूर्वक – विधि, दृढ़ता,निश्चय, सम्मान,श्रद्धा विधिपूर्वक, दृढ़तापूर्वक, निश्चयपूर्वक, सम्मानपूर्वक, श्रद्धापूर्वक
था –सर्व, अन्यसर्वथा, अन्यथा, चौथा, प्रथा, पृथा, वृथा, कथा, व्यथा।
तया –सामान्यत,, विशेषत,मूलतसामान्यतया, विशेषतया, मूलतया,

संज्ञाओं का रूपांतरण

  • जातिवाचक से भाववाचक
  • व्यक्तिवाचक से अपत्यवाचक
  • विशेषण से भाववाचक संज्ञा
  • संज्ञा से विशेषण-
जातिवाचक से भाववाचक  संज्ञाओं का रूपांतरण– संस्कृत की तत्सम जातिवाचक संज्ञाओं के अन्त में तद्धित प्रत्यय लगाकर भाववाचक संज्ञाएँ बनती हैं।
इसके उदाहरण इस प्रकार है-
तद्धित प्रत्ययसंज्ञा/ मूलशब्दभाववाचक संज्ञा/उदहारण
ताशत्रु
शत्रुता
तावीर वीरता
त्वगुरुगुरुत्व
पण्डित पाण्डित्य
त्वमनुष्य
मनुष्यत्व

मुनिमौन
इमारक्तरक्तिमा

व्यक्तिवाचक से अपत्यवाचक संज्ञाओं का रूपांतरण- अपत्यवाचक संज्ञाएँ किसी नाम के अन्त में तद्धित-प्रत्यय जोड़ने से बनती हैं। अपत्यवाचक संज्ञाओं के कुछ उदाहरण ये हैं-

 

तद्धित-प्रत्यय व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ अपत्यवाचक संज्ञाएँ
तद्धित-प्रत्यय मूलशब्द /व्यक्तिवाचक संज्ञाएँअपत्यवाचक संज्ञाएँ/उदहारण

वसुदेव वासुदेव

कुरु कौरव
पृथा
पार्थ
मनु मानव

पाण्डु
पाण्डव
आयन बदर
बादरायण
एयराधाराधेय
एयकुन्तीकौन्तेय
दितिदैत्य
विशेषण से भाववाचक संज्ञाओं का रूपांतरण-  संस्कृत के तद्धित-प्रत्ययों के मेल से  विशेषण के अन्त में
 लगाकर निम्नलिखित भाववाचक संज्ञाएँ बनाई जाती है।
तद्धित-प्रत्ययमूलशब्द/ विशेषण/उदहारणभाववाचक संज्ञाएँ
ता
बुद्धिमान् ,मूर्ख
बुद्धिमत्ता,मूर्खता
इमा
रक्त ,शुक्लरक्तिमा ,,शुक्लिमा
त्व

लघु ,वीरलघुत्व, वीरत्व

गुरु लघु लाघव,गौरव
ताशिष्टशिष्टता
संज्ञा से विशेषण संज्ञाओं का रूपांतरण- संस्कृत में  संज्ञाओं के अन्त में गुण, भाव या सम्बन्ध के वाचक तद्धित-प्रत्ययों को जोड़कर विशेषण बनाए जाते  हैं। उदाहरणार्थ-
प्रत्ययमूलशब्द /संज्ञा विशेषण/उदहारण

निशानैश


तालु ग्राम,तालव्य, ग्राम्य
इक
मुख , लोकमौखिक,लौकिक
मय, आनन्द ,दया
आनन्दमय, दयामय
इतआनन्द , फलआनन्दित,फलित
इष्ठबल
बलिष्ठ

मुख ,मधुमुखर,मधुर
इम
रक्त रक्तिम
ईनकुल कुलीन
मांसमांसल
निष्ठ कर्मकर्मनिष्ठ
वी मेधामेधावी
इल
तन्द्रा तन्द्रिल
लुतन्द्रा तन्द्रालु

अरबी—फारसी (उर्दू )के तद्धित-प्रत्यय

उर्दू के तद्धित-प्रत्यय जो हिंदी में प्रयुक्त होते है। वे शब्द फारसी, अरबी, और तुर्की भाषा से आए है। जिनका प्रयोग हिंदी के विभिन्न शब्दों में किया जा सकता है।
फारसी तद्धित-प्रत्यय के तीन प्रकार होते है-
  • फारसी तद्धित-प्रत्यय —संज्ञात्मक
  • फारसी तद्धित-प्रत्यय—विशेषणात्मक
  • अरबी तद्धित-प्रत्यय
फारसी तद्धित-प्रत्यय—(संज्ञात्मक)
फारसी तद्धित-प्रत्यय—मूलशब्दसंज्ञात्मक /उदहारण /अर्थ/संबंध/वाचक

सफेद,खराबसफेदा,खराबा भाववाचक
गारमददमददगार, परहेजगार ,
कतृवाचक
ईचा बाग बगीचा स्थितिवाचक
फारसी तद्धित-प्रत्यय—(विशेषणात्मक)
प्रत्ययमूलशब्दउदहारण   अर्थ/संबंध/शब्द
आना मर्द
मर्दानास्वभाव
इन्दाशर्म
शर्मिन्दा संज्ञा
नाक दर्द
दर्दनाक गुण
आसमानआसमानी
विशेषण
ईनाकम
कमीन उनार्थ
ईना माह
महीनासंज्ञा
जादाहरामहरामजादाअपत्य
अरबी फारसी तद्धित-प्रत्यय
प्रत्यय मूलशब्दउदहारण अर्थ/संबंध/वाचक
आनी रूह,मुगल,जिस्म,रूहानी,मुगलानी,जिस्मानी,– जिस्मानी , मर्दानी , बर्फानी , आदि ।विशेषण,—( संबंधवाचक प्रत्यय )
इयतइंसान,हैवान
हैवानियत,इंसानियत आदि । भाव-वाचक
बेग
बेगमआदि । स्त्री-वाचक
दान कलमकलमदानआदि । स्थितिवाचक
आनाजुर्म,दस्त,मस्त,जुर्माना , दस्ताना , मर्दाना ,मस्ताना , आदि ।( भाववाचक , विशेषण वाचक प्रत्यय )
कार – काश्त,शिल्प,दस्त,पेश,सलाह काश्तकार , शिल्पकार , दस्तकार , पेशकार , सलाहकार आदिकरनेवाला –वाचक प्रत्यय )
खोर –
गम, घूस,रिश्वत, हरामगमखोर , घूसखोर , रिश्वतखोर , हरामखोर आदि ।खाने वाला -वाचक प्रत्यय )
मंदअक्ल, जरुरतअक्लमंद , जरुरतमन्द आदि वाला -वाचक प्रत्यय )
गार –मदद,, प,रहेज,याद, , रोज,बेरोजमददगार,गार , मददगार , यादगार , रोजगार , बेरोजगार आदि करनेवाला -विशेषणवाचक प्रत्यय )
गी –जिन्द,, गंद,,, बन्दजिन्दगी , गंदगी , बन्दगी आदि भाववाचक संज्ञा प्रत्यय )
चा – दग, बाग देगचा , बगीचा आदि ।वाला - संज्ञा प्रत्यय)
ची –बगी,इलाय,, , डोल,संदुक बगीची , इलायची , डोलची , संदुकची आदि ।( वाला )वाला -वाचक प्रत्यय )
दान – इत्र,, कलम, पीक इत्रदान , कलमदान , पीकदान आदि ।–
स्थिति वाचक)
दार – ईमान,, कर्ज,,दुकान ईमानदार , कर्जदार दुकानदार , मालदार आदि
वाला -( भाववाचक संज्ञा प्रत्यय )
नाक – खतर, खौफ,दर्द,,शर्म खतरनाक , खौफनाक , दर्दनाक ,शर्मनाक आदि
वाला -भाववाचक)
बान –दर,, बाग, , मेज,दरबान , बागबान , मेजबान आदि
वाला - संज्ञा प्रत्यय)

हिंदी व संस्कृत के प्रत्यय में अंत

  • हिंदी के प्रत्ययों को भी संस्कृत के प्रत्ययों की तरह ही जोड़ा जाता है लेकि
  • इन दोनों में अंतर  है की -संस्कृत में “कृत प्रत्यय और तद्धित प्रत्यय होते हैंलेकिन
  • हिंदी में” तद्भव और देशज प्रत्यय “होते हैं । हिंदी के भी अनेक प्रत्ययों को प्रयोग किया जाता है ।
इतिहास या स्रोत के आधार पर हिन्दी प्रत्ययों को चार वर्गो में विभाजित किया जाता है
  •  तत्सम प्रत्यय
  • तद्भव प्रत्यय
  • देशज प्रत्यय
  • विदेशज प्रत्यय
1).तत्सम प्रत्यय
प्रत्यय उदाहरणअर्थ/संबंध /वाचक
आदरणीया, प्रिया, माननीया, सुता, इच्छा, पूजाभाववाचक संज्ञा-स्त्री प्रत्यय
आनीदेवरानी, भवानी, मेहतरानीस्त्री वाचक
कारपत्रकार, जानकरलिखने या बनाने वाला; वाला
इतयुक्त पल्लवित, पुष्पित, फलित, हर्षितविशेषण वाचक
इकदैनिक, वैज्ञानिक, वैदिक, लौकिक विशेषण व संज्ञा
आलु वाला कृपालु, दयालु, निद्रालु, श्रद्धालु विशेषण वाचक ,
इमागरिमा, नीलिमा, मधुरिमा, महिमाभाववाचक संज्ञा प्रत्यय
स्वार्थ, समूह घटक, ठंडक, शतक, सप्तक वाचक प्रत्यय
अंडज, जलज, पंकज, पिंडज,देशज, विदेशजजन्मा हुआ -संबंध वाचक
जीवी परजीवी, बुद्धिजीवी, लघुजीवी, दीर्घजीवी जीनेवाला--संबंध वाचक
ज्ञ अज्ञ, मर्मज्ञ, विज्ञ, सर्वज्ञ जाननेवाला-जिज्ञासा वाचक
तःमुख्यतया, विशेषतया, सामान्ततयाक्रिया विशेषण प्रत्यय
तरउच्चतर, निम्नतर, सुन्दरतर, श्रेष्ठतरतुलना बोधक प्रत्यय
तम
उच्चतम, निकृष्टतम, महत्तम लघुतमसर्वाधिकता बोधक प्रत्यय
तानवीनता, मधुरता, सुन्दरताभाववाचक संज्ञा प्रत्यय
त्वकृतित्व, ममत्व, महत्व, सतीत्वभाववाचक संज्ञा प्रत्यय
मानउच्चतम, निकृष्टतम, महत्तम, लघुतमविशेषण वाचक प्रत्यय
वान गुणवान, धनवान, बलवान, रूपवानवाला-वाचक प्रत्यय
2).तद्भव प्रत्यय
   
-आजोड़ा, फोड़ा, झगड़ा, रगड़ा
भाववाचक
-आलू झगड़ालू, दयालु
करनेवाला
-आवट कसावट, बनावट, बिनावट, लिखावट, सजावटभाववाचक प्रत्यय
-आस छपास, प्यास, लिखा, निकासइच्छावाचक प्रत्यय
-आहट/-आहतगड़गड़ाहट, घबराहट, चिल्लाहट, भलमनसाहतभाववाचक प्रत्यय
-इनजुलाहिन, ठकुराइन, तेलिन, पुजारिन स्त्री प्रत्यय
-इया चुटिया, चुहिया, डिबिया, कनौजिया, भोजपुरियावाला; लघुत्व, बोधक; स्त्री प्रत्यय
-एराचचेरा, फुफेरा, बहुतेरा, ममेरावाला -संबंध वाचक
-इलाचमकीला, पथरीला, शर्मीलावाला -विशेषण वाचक
-औड़ा/-औड़ी पकौड़ी, सेवड़ा, रेवड़ी लिंगवाचक
-त/-ता चाहत, मिल्लत, आता, खाता, जाता, सोता भाववाचक, कर्मवाचक
-पनछुटपन, बचपन, बड़प्पन, पागलपन भाववाचक प्रत्यय
वालाअपनेवाला, ऊपरवाला, खानेवाला, जानेवाला, लालवाला कर्तृवाचक, विशेषण
आप/आपाअपनापा, पुजापा, बुढ़ापा मिलापभाववाचक प्रत्यय
आर/आरा/आरीकुम्हार, लुहार, चमार, घसियारा, पुजारी, भिखारीकरनेवाला
-अंगड़बतंगड़वाला
-अंतूरटंतू, घुमंतूवाला
-अत
खपत, पढ़त, रंगत, लिखतसंज्ञा प्रत्यय
-आँधबिषांध, सराँधसंज्ञा प्रत्यय
आई कठिनाई, बुराई, सफाई
-
भाववाचक प्रत्यय
-आऊखाऊ, टिकाऊ, पंडिताऊ, -बिकाऊ वाला
3).देशज प्रत्यय
प्रत्ययउदाहरण बोधक/अर्थ
अड़ अंधड़, भुक्खड़स्वार्थिक
-आक खर्राटा, फर्राटा भाववाचक
-इयल अड़ियल, दढ़ियल, सड़ियल वाला
-अक्कड़घुमक्कड़, पियक्कड़, भुलक्कड़वाला
 4).विदेशज प्रत्यय
  •  अरबी-फारसी प्रत्यय
प्रत्यय उदाहरणबोधक/अर्थ
-गार परहेजगार, मददगार, यादगार, रोजगारकरनेवाला
-गी गन्दगी, जिन्दगी, बंदगी भाववाचकसंज्ञा प्रत्यय
-चा/चीदेगचा, बगीचा, इलायची, डोलची, संदूकचीवाला
-दानइत्रदान, कलमदान, पीकदानस्थिति वाचक
-दारईमानदार, कर्जदार, दूकानदार, मालदार वाला
-नाकखतरनाक, खौफनाक, दर्दनाक, शर्मनाकवाला
-बानदरबान, बागबान, मेजबान अज्ञ, मर्मज्ञ, विज्ञ, सर्वज्ञवाला
-मंद अक्लमंद, जरूरतमंदवाला
-आना जुर्माना, दस्ताना, मर्दाना, मस्तानाभाववाचक विशेषण वाचक
-खोर
गमखोर, घूसखोर, रिश्वतखोर, हरामखोरखानेवाला
-कारकाश्तकार, दस्तकार, सलाहकार, पेशकारकरनेवाला
-आनी जिस्मानी, बर्फ़ानी, रूहानीसंबंधवाचक
  • अंग्रेजी प्रत्यय
प्रत्ययउदाहरणबोधक/अर्थ
-इज्म कम्युनिज्म, बुद्धिज्म, सोशलिज्मवाद/मत
-इस्टकम्युनिस्ट, बुद्धिस्ट, सोशलिष्टवादी/व्यक्ति

Hindi Bhasha(Language)(हिंदी भाषा)

भाषा (Language)

भाषा का सम्प्रत्य या भूमिका:-

प्रत्येक प्राणी अपनी भाषा में बात करता है। फिर चाहे वो मनुष्य हो या पशु पक्षी हो। हम जिस प्रकार के वातावरण  या समाज में रहते है उसी प्रकार की भाषा सिखते हैं। एक सभ्य समाज में रहकर मनुष्य भाषा के शुद्ध मानक रूप को विकसित करता है। भारत विविधता में एकता का देश है। जिसमें भिन्न भिन्न प्रकार की भाषाएं बोली जाती है। सभी  भाषाओं  का अपना अपना महत्व;पउचवतजंदबमद्ध होता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।  समस्त प्राणियों में भाषा जैसी नियामत ईश्वर ने केवल मनुष्य को दी है।अगर मनुष्य के पास भाषा न होती तो उसकी स्थिति भी पशु के समान ही होती । लोग एक दूसरे के साथ आज जिस तरह  से अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैै। या एक दूसरे से बातचीत करते है। वह  हमारी भाषा कहलाती है।

भाषा  का अर्थ (Meaning of Language)

प्रत्येक प्राणी किसी ना किसी रूप या स्थिति में अपनें भावों की अभिव्यक्ति करता है। इन अभिव्यक्तियों तथा ध्वनि सकेंतों के रूढ व यादृच्छिक प्रणाली को भाषा कहते है।

सभी मानव मुख से उच्चरित बालक, बुढे ध्वनि प्रतीकों की ऐसी व्यवस्था है।जिसके माध्यम से समाज के लोग एक दूसरे के साथ अपने विचारों का आदान प्रदान करते है।

भाषा अध्ययन में  भाषा का अर्थ अत्यंत व्यापक और संक्षिप्त है। जिसके द्वारा मनुष्य बहुत ही सहज,सरल,शुद्ध व व्यापक रूप से भाषा सिखता है।

भाषा का संक्षिप्त अर्थ यह है किः-भाषा उस शास्त्र को कहते है जिसमें भाषा मात्र के भिन्न भिन्न अंग और स्वरूपों का विवेचन तथा निरूपण किया  जाता है।

भाषा का व्यापक अर्थ यह है कि:- भाषा के अन्र्तगत मनुष्य द्वारा भावों और विचारों को सूचित करने वाले सभी संकेत जो देखे, सुने पढे,और लिखे जा सकते है। जिसमें मनुष्य अपनी स्वेच्छा अनुसार उन्हें उत्पन्न कर सकता है। तथा दोहरा सकता है। वह भाषा कहलाती है।

सरल या अन्य शब्दों में कह सकते है कि भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने मन के विचारों को दूसरों तक पहुचातें है और दूसरों के विचारों को स्ंवय ग्रहण करते है।

भाषा की परिभाषा (Definition of language)

भाषा मानव जीवन की वह प्रकिया है। जिसमें मनुष्य अपने विचारों को दूसरे के सामने प्रकट करता है। तथा दूसरों के भावों को समझ सकता है। अर्थात  मनुष्य द्वारा अपने भावों और विचारों को आदान प्रदान करने  की प्रक्रिया भाषा कहलाती  है।

डाॅ श्यामसुन्दरदास जी के अनुसार :-‘‘मनुष्य तथा उसके बीच की वस्तुओं के विषय में अपनी इच्छाओं और मतियों की अभिव्यक्तियों का आदान प्रदान करने के लिए व्यक्त किए गए ध्वनि संकेतों के व्यवहार को भाषा कहते है।‘‘

कामता प्रसाद जी के अनुसारः– ‘‘भाषा वह साधन या माध्यम  है। जिसके द्वारा मनुष्य  अपने भावों और विचारों को दूसरों के सामने शुद्ध रूप से प्रकट कर सके  तथा दूसरों के भावों या विचारों को  स्पष्ट रूप से ग्रहण  करने में सक्षम हो या  समझ सके।‘‘

सरल शब्दों में हम कह सकतें हैकिः-भाषा शब्द संस्कृत की ‘भाष‘धातु से बना है। जिसका शाब्दिक अर्थ होता है। ‘बोलना या कहना‘ मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।  समाज मे रहने के लिए उसे अपने भावों और विचारों का आदान प्रदान करना पडता है। कुछ उदाहरण है जिनके द्वारा हम भाषा को समझते है जब  अध्यापिका कक्षा में किसी भी विषय का प्रकरण या टाॅपिक (topic) बोलकर पढाती है। और कक्षा के सभी बच्चें या छात्र अध्यापिका की बात ध्यानपूर्वक सुनकर  समझते है। उसके बाद  अध्यापिका ने  सभी छात्रों को प्रकरण का सार लिखने के लिए बोला  और छात्रों ने अध्यापिका द्वारा दिए गए सार का उत्त्र दिया  और अध्यापिका ने बच्चों दवारा लिखे उत्तर पढे और उनकी मूल्यांकन या जाॅच की|

1). कालेज प्रधानाचार्य ने प्रबंधक महोदय को पत्र लिखकर कालेज में जेनरेटर की आवश्यकता से अवगत कराया । उन्होने प़़त्र पढकर अपनी संस्तुति के हस्ताक्षर कर पुनः प्रधानाचार्य जी को भेज दिया । प्रधानाचार्य जी ने संस्तुति पाकर एक जेनरेटर कंपनी को आदेश दिया है।
2). सुमन ने अपने पापा को पत्र लिखा पापा जी ने पत्र पढकर जाना कि सुमन को अपना त्रैमासिक शुल्क जमा कराने के लिए दो हजार पॉच सौ पचास रू0 चाहिए।
3). आशा भोसलें ने एक विवाह समारोह में गीत गाया। श्रोताओं ने गीत सुनकर तालियॉ बजाई
4). जब अध्यापिका कक्षा में किसी भी विषय का प्रकरण या टॉपिक(Topic)को बोलकर पढाती है। तो कक्षा के सभी बच्चें या छात्र अध्यापिका की बात ध्यानपूर्वक सुनकर समझते है। उसके बाद अध्यापिका ने भ्कहा‘ सभी छात्रों ने लिखकर अध्यापिका द्वारा दिए गए सार का उत्त्र दिया और अध्यापिका ने बच्चों दवारा लिखे उत्तर पढे , पढकर उनकी मूल्यांकन या जॉच की
इस प्रकार कह सकते है कि ‘‘बोलकर,सुनकर,लिखकर,व पढकर अपने मन के भावों और विचारो के अदान प्रदान की प्रक्रिया भाषा कहलाती है। हमारे आस पास के वातावरण में प्रदान करने के लिए भाषा का प्रयोग करते है। मनुष्य ही नहीं पशु पक्षी भी अपने भावों को प्रकट करते है। उनकी भाषा को बोली कहते है। वे विभिन्न आवाजों और सकेंतो से अपनी भावनाओं को व्यक्त करतें है।

इस प्रकार कह सकते है कि ‘‘बोलकर,सुनकर,लिखकर,व पढकर अपने मन के भावों और विचारो के अदान प्रदान की प्रक्रिया भाषा कहलाती है। हमारे आस पास के वातावरण में प्रदान करने के लिए भाषा का प्रयोग करते है। मनुष्य ही नहीं  पशु पक्षी भी अपने भावों को प्रकट करते है। उनकी भाषा को बोली कहते है। वे विभिन्न आवाजों और सकंतो से  अपनी भावनाओं को व्यक्त करतें है। है।

 

भाषा का प्रयोगः-

भाषा का प्रयोग व्यक्ति उस समय करता हैं। जब किसी से कुछ कहना हो उदाहरण के लिए ‘‘जब आप किसी दुकानदार से कुछ सामान खरीदते है,अपने घरवालों से किसी वस्तु की फरमाइश करते है या खेल के मैदान में अपने दोस्तों को कुछ निर्देश देते है आदि। अर्थात हमारे मन में कोई विचार आता है या हमें किसी से कुछ कहना होता तब अपने मन की बात दूसरों तक पंहुचाने के लिए भाषा का प्रयोग करतें है। भाषा के उपोग की योग्यता मनुष्य को दूसरे प्राणियों से अलग करती है। भाषा के जरिये हम स्वयं से और दूसर लोगों के साथ बातचीत करते हैं। जिसका उपयोग हम एक.दूसरे के साथ संचार के समय करते हैं।भाषा का प्रयोग हम  अपने दैनिक जीवन में दोनो ही रूपों में करते है। -कथित और लिखित  लिखित रूप में होने के कारण हम अपने दस्तावेज और पुस्तकें काफी लम्बें समय तक सुरक्षित रख सकते है।

भाषा  के प्रकारः-

आप इस बात से भली भॅाति परिचित हैं कि  दूसरों तक दो तरह से संप्रेषित कर सकते है-‘‘बोलकर या लिखकर‘‘ इसी आधार पर भाषा के दो रूप किए गए है- मौखिक और लिखित

लेकिन भाषा का एक अन्य रूप है। जिसके द्वारा हम सभी अपने भावों और विचारों का सप्रेंषण या अभिव्यक्ति करते है। उसे सांकेतिक भाषा कहते है।

  1. मौखिक भाषा
  2. लिखित भाषा
  3. सांकेतिक भाषा

 मौखिक (language) भाषा 

बोलना अर्थात मौखिक रूप यह भाषा का पहला रूप है इसमें बोलकर अपनी बात दूसरों तक पहुचाई जाती है और दूसरा उसे सुनकर समझता है।अतः भाषा के बोलचाल रूप को ही मौखिक भाषा कहा जाता  है। इस रूप का संबंध उच्चारण के साथ है अतः इसे ‘उच्चारित रूप‘ भी कहते है। भाषा  के आधारभूत की ईकाइ ध्वनि हैं। विभिन्न ध्वनि के मेल से शब्द बनते है। शब्दों के मेल से वाक्य जिनका प्रयोग बातचीत में किया जाता है। भाषा का मौखिक रूप अस्थायी होता है।क्यांेकि यह उच्चरित होते ही  समाप्त हो जाते है मौखिक भाषा द्वारा संप्रेषण तभी संभव है जब वक्ता और श्रोता एक दूसरें के निकट हों लेकिन आधुनिक युग में संचार के अनेक ऐसे साधन विकसित हो गए हैं जिनके  माध्यम से दूर बैठे वक्ता श्रोता के बीच मौखिक संप्रेषण संभव हो गया है।  उदाहरणः-   टेलीफ़ोन दूरदर्शन, भाषण ,वार्तालापए, नाटक, रेडियो आदि।

अतः सरल शब्दों में कह सकते है कि भाषा के जिस रूप से हम अपने विचारों एंव भावों बोलकर प्रकट करते है। तथा दूसरों के विचारों या भावों को सुनकर ग्रहण करते है। वह मौखिक भाषा है। यह भाषा का प्राचीनतम रूप है। क्यांेकि । मनुष्य ने पहले बोलना सीखा  ।

 

मौखिक भाषा(अभिव्यक्ति) का अर्थः-

जब व्यक्ति ध्वनियों के माध्यम से मुख के अवयवों की सहायता से उच्चारित भाषा का प्रयोग करते हुए विचारों को प्रकट करता है।उसे मौखिक अभिव्यक्ति कहते है।

मौखिक भाषा(अभिव्यक्ति)  की आवश्यकताः-

मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है।क्योंकि उसके पास भाषा है इसी कारण वह सामाजिक प्राणी माना जाता है। दूसरों से विचारों का आदान प्रदान करने के लिए शब्द समूहों का प्रयोग करना आवश्यक है इन्ही शब्द समूह को भाषा कहते है। प्रत्येक समाज के लिए सर्व सम्मत भाषा का होना  आवश्यक है क्योंकि

1 बिना भाषा के विचारों का आपसी आदान प्रदान  सम्भव नहीे है।

2 मौखिक  भाषा या अभिव्यक्ति द्वारा समाज में एक ही समय में असख्य व्यक्तियों को सम्बोधित किया जा सकता है।

3 अनपढ लोगों के लिए विचारों का आदान प्रदान का एकमात्र साधन मौखिक भाषा याअभिव्यक्ति है।

4 मौखिक भाषा से अभिव्यक्ति में जितनीसरलता,सरसता,स्पष्टता, सार्थकता,सहजता सम्भव है। उतनी लिखित भाषा में नहीे है।

मौखिक भाषा(अभिव्यक्ति) का महत्व

जिस प्रकार मनुष्य के लिए भोजन,बल,व वायु की आवश्यकता है उसी प्रकार बोलचाल भी आवश्यक है।अतः भावों व विचारों को व्यक्त करने के लिए मौखिक भाषा महत्वपूर्ण स्थान है।

1). मौखिक भाषा द्वारा सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित कर सकते है।

2). दैनिक जीवन के सभी कार्यों में मौखिक भाषा का प्रयोग होता है।

3). विद्यालय पाठयक्रम के सभी विषयों की शिक्षा में मौखिक भाषा ही प्रमुख माध्यम है।

4). बच्चा  जिस प्रकार उच्चारण करता है उसी प्रकरा लिखता है   अतः लेखन का विकास करने के लिए मौखिक भाषा या अभिव्यक्ति  महत्व है।

5). भाषण देना एक कला है जिसे सीखा जाता है  और अभ्यास करने से इसमें  निखार आता है। अतः भाषण कला के विकास के लिए मौखिक भाषा या अभिव्यक्ति   महत्व है।

मौखिक भाषा(अभिव्यक्ति) के उददेश्य

 

कोई भी सामाजिक प्राणी जिसका मौखिक वाक् कौशल,शुद्ध,प्रवाहपूर्ण व मधुर नहीं है वह कदापि सफल वक्ता नहीं बन सकता और श्रोताओं पर अपना प्रभाव नहीे डाल सकता अत मौखिक  वाक् ,भाषा या अभिव्यक्ति को विकसित ने के लिए निम्नलिखित उद्देश्य है।

1  सरल स्पष्ट  भाषा में वार्तालाप  करने की आदत का विकास करना

2 शब्दों व वाक्यों को सही ढंग से समझा कर आवश्यकता व समयानुसार प्रयोग करना सीखना।

3 बालकों को  इस योग्य बनाना की वे प्रश्न के उतर सही ढंग से दे सकें

4 उच्चारित ध्वनियों के उच्चारण का प्रयोग उचित प्रकार से करना ।

 

मौखिक भाषा(अभिव्यक्ति) के गुण:-

1). मौखिक भाषा सदैव स्वाभिक ढंग से होनी चाहिए। जिससे उसमें विश्वसनीयता आ जाती है।भाषा में बनावटीपन अविश्वसनीयता का कारण बनता है।

2 ).मौखिक भाषा मेंमाधुर्य का होना आवश्य है क्योंकि इससे भाषा में स्वतः आकर्षण आ जाता है।

3). मौखिक अभिव्यक्ति में उच्चारण की शुद्धि का ध्यान रखा जाना चाहिए। बात सीधे व स्पष्ट शब्दों में गतिशीलता के साथ विराम् चिह्नों का ध्यान ररखते हुए व्यक्त करना चाहिए।जिससे कहीे बात स्पष्ट रूप से समझ आ सके।

4). भाषा में सरलता से तात्पर्य यह नहीं है। कि साहित्यिक शब्दों का प्रयोग ही ना किया जाये। भाषा इस प्रकार की होनी चाहिए जो आसानी से समझ आ जाए तथा बोधगम्य होनी चाहिए।

5). किसी भी व्यक्ति के साथ वार्तालाप करते समय शिष्टता के नियम का पालन करते समय शिष्टता के नियम का पालन करना चाहिए । अशिष्टता अभिव्यक्ति सम्बधों को बिगाड देती है।

6 ).जीवन में हर्ष,दुख,उल्लास,शोक,प्यार आदि अनेक अवसर आते है। इन भावों के अनुकूल उचित हाव-भाव के साथ मौखिक अभिव्यक्ति करनी चाहिए।

7). जिस स्तर के व्यक्तियों से बात की जाये उसी प्रकार की भाषा का प्रयोग करना चाहिए जैसेः-ग्रामीण व्यक्ति के साथ बातचीत में क्लिष्ट भाषा का प्रयोग अनुचित है।

8).मौखिक अभिव्यक्ति करते समय विराम चिह्नों, उतार-चढाव, गति आदि का ध्यान रखना चाहिए ताकि भाषा में प्रभावोत्पादक आ सके।

9). मौखिक अभिव्यक्ति करते समय भाषा का ध्यान रखना चाहिए।

इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करना चाहिए जो समाज स्वीकृत सर्वमान्य हो अशिष्ट और अप्रचलित शब्दों का प्रयोग वार्तालाप को नीरस बना देता है।

लिखित (language)भाषाः

लिखित भाषा  :—लिखना अर्थात लिखित रूप। — यह भाषा का दूसरा रूप है। इसमें लिखकर अपनी बात दूसरों तक पहुॅचाई जाती है तथा दूसरा उसे  पढकर समझता है।  भाषा का लिखित रूप मौखिक रूप की तुलना में अधिक पुराना नहीे है। लिखित रूप में अपने विचारों का संप्रेषण कर सके। इन आवश्कताओं को पूरा करने के लिए जिन चिह्न ,अक्षरों व ध्वनि सकेतों का लिखित रूप में सहारा लेकर अपने भावों और विचारों को लिखकर प्रकट करना ही लिखित भाषा कहलाती है। उदाहरण कंप्यूटर, पुस्तक,समाचार-पत्र, लेख —पत्रिका ,कहानी ,जीवनी संस्मरण, तार आदि।

अतः सरल शब्दों में कह सकते है कि भाषा के जिस रूप से हम अपने विचारों एंव भावों लिखकर प्रकट करते है। तथा दूसरों के विचारों या भावों को पढकर ग्रहण करते है।वह लिखित भाषा है।

लिखित (language)भाषा का अर्थः-

लिखित भाषा अभिव्यक्ति का ऐसा साधन है जिसके द्वारा  कोई भी पढा लिखा व्यक्ति अपनी भावनाओं और सदेशों को दूसरों के समक्ष लिखकर प्रकट कर सकता है।  जैसे पुराने समय में  डाक तार द्वारा मनुष्य चिळिया द्वारा मनुष्य सदेश भेजते थे। मौखिक भाषा को स्थायित्व रूप प्रदान करने तथा  उच्चरितध्वनि प्रतीकों के लिए लिखित चिह्नों का विकास हुआ होगा।

लिखित भाषा का महत्व या आवश्यकताः-

जिस प्रकार मनुष्य के जीवन दैनिक कार्य जरूरी है। जिसमें वह अपने पूरे दिन की दिनचर्या बनाकर अपने कार्य सम्पन्न करता है। उसी प्रकार  एक पीढी के ज्ञान को दूसरी पीढी तक पहुचाने के लिए लिखित भाषा आवश्यकता है। क्योंकि

1). लिखित भाषा से ज्ञान में वृद्धि होती है।

2). शब्दों के शुद्ध उच्चारण करने के साथ  शुद्ध लिखने का ज्ञान होता है।

3 ).विद्यालयों में छात्रों के पढने के लिए पाठ्यक्रम लिखित शब्दावली के द्वारा तैयार किया जाता है।

4). लिखित भाषा के द्वारा लेखन कौशल का विकास होता है।

5). लिखित भाषा के द्वारा  हमें अशुद्धियों का पता चलता है।

लिखित भाषा का उददेश्य:-

लिखित भाषा का उददेश्य  विभिन्न तथ्यों ,लिपि चिह्नों,घटनाओं तथा मनुष्य के ज्ञान भण्डार को एक पीढी से दूसरी पीढी तक  सुरक्षित रखने के लिए लिखित भाषा का उददेश्य है। हमारे सभी सरकारी काम काज  लिखित रूप में ही किए जाते है। सरकारी दस्तावेज में हमारा सविधांन भी लिखित रूप में मिलता है।

मौखिक भाषा और लिखित भाषा में अंतर या विशेषताएं

 

मौखिक भाषा

1 यह भाषा का प्रधान रूप है।

2 इस रूप का संबंध मानव मुख  से उच्चारित होने वाली ध्वनियों के साथ है।

3 यह उच्चारित होते ही समाप्त हो जाता है। अतः यह भाषा स्थायी रूप है।

4 इस रूप का विकास मनुष्य के जन्म के साथ हुआ

5 इससे बच्चा अपने परिवेश में स्वतः सीख लेता है।

6 इस रूप की आधारभूत इकाइ ‘‘ध्वनि‘‘ है।

लिखित भाषा

1 यह भाषा का गौण रूप है।

2 इस रूप का संबंध उच्चारित ध्वनियों के लिए बनाए गए ‘‘लिपि चिह्नों या वर्णों‘‘ के साथ है।

3 यह दीर्घकाल तक बना रह सकता है। अतः यह भाषा स्थायी रूप है।

4 इस रूप का विकास बहुत बाद में हुआ ।

5 इसे औपचारिक शिक्षा के द्वारा ही सीखा जा सकता है।

6 इस रूप की आधारभूत इकाइ ‘‘वर्ण‘‘ है।

सांकेतिक(language) भाषा

 

संकेत का अर्थ है-ः इशारा करना कहने का तात्पर्य यह है कि बिना बोले कुछ विशेष प्रकार के हाव-भाव के  द्वारा किसी भी व्यक्ति को अपनी बात समझाना जिसमें मनुष्य के द्वारा  मुख से बिना ध्वनि उच्चारित करें भिन्न भिन्न  इशारों से अपने मन के भावों व विचारों का आदान प्रदान करना ही सांकेतिक भाषा कहलाती है। सांकेतिक भाषा में हम अपने शरीर के सभी अगों का सहारा लेते है जिसमें हाथों का सहारा, उंगलियों का सहारा और चेहरे का हाव-भाव  शामिल है। जिसके द्वारा हम अपने भाव और विचार दूसरों के समक्ष संकेत द्वारा प्रकट करते है। तथा दूसरों के भाव और विचार संकेत द्वारा ग्रहण करते है। उसे साकेंतिक भाषा कहते है। यह भाषा श्रवण बाधिर,मूक बाधिर ,गूंगे या बहरे  बच्चे को लिए प्रयोग की जाती है।

उदाहारण के तौर पर:

1) (green light ) की बत्ती का हरा होना , गार्ड द्वारा हरी झंडी दिखाना और सीटी का बजना ये सभी संकते है। इन सभी संकेतों का कुछ ना कुछ अर्थ है अर्थात ये सभी रेलगाडी क चलने की तैयारी की सूचना देते है।

2).हाथ दिखाकर किसी को रूकने के लिए संकेत देना ।

3). चौराहा पर खडा यातायात सिपाही अपने हाथों के सकेतों से यातायात को नियंत्रित करतें हुए सुचारू रूप से चलाता है।

4).. मूक बधिर व्यक्तियों का वार्तालाप आदि।

जिसमें भाषा का व्यवहारिक रूप स्पष्ट ,नैतिक मूल्यों की शिक्षा होनी आवश्यक है। इसके लिए भाषा से सम्बन्धित कुछ बातों का ख्याल रखना चाहिए

1 भाषा का शुद्ध व स्पष्ट उच्चारण करना चाहिए ताकि दूसरो को समझ आ जाए ।

2भाषा  में प्रयोग हो रहे व्याकरण के नियमों पर ध्यान देना चाहिए।

3 भाषा के शब्दों को बोलने के लिए  क्रमानुसार प्रयोग करना चाहिए

4  हमें स्ंवय और बच्चों को नैतिकता, धार्मिकता तथा कर्तव्यों से सम्बन्धित शिक्षाप्रद कहानियों की पुस्तकों को पढाना चाहिए

4  हमें ऐसी पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए जो ज्ञानवर्धक एवम् जानकारी प्रदान करने वाली हो।

5  हमें अपने घर परिवार व समाज में भाषा पर विशेष ध्यान देना चाहिए खासतौर पर बच्चों पर क्योंकि बच्चे हमारे  अच्छे समाज की नींव है।

6 यदि आरम्भ से ही उनके शुद्ध उच्चारण व शब्दों पर ध्यान देगें तो उसे भाषा का व्यवस्थित रूप प्रदान करने में सफल हो पाएगें और निश्चिता के साथ भाषा का अच्छा वातावरण तैयार हो जाएगा।

7  हमें भाषा में मौखिक रूप को सही नही करना बल्कि लिखित रूप को भी सही दिशा प्रदान करनी चाहिए

8  हमें मुख से सही ध्वनि उच्चारण  तथा उपयुक्त शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।

9  हमेें  भाषा के दोनों रूपों पर विशेष ध्यान देना है फिर चाहे हम शब्द बोल रहे हो या लिख रहे हो उन्हें भाषा में व्याकरण के नियमों द्वारा स्पष्टीकरण करके पूर्ण  रूप से शब्दों,वाक्यों में प्रयोग करना चाहिए।

10 हमें लगातार पुस्तकों का अध्ययन करते रहना चाहिए क्योंकि पुस्तकें पढने से नये शब्द, वर्ण, अर्थ मिलते है।जिससे हमारा ज्ञान बढता है।

11  भाषा से व्याकरण का ज्ञान होता है।जिसमें  शब्द,पद,वाक्य,संज्ञा,सर्वनाम,विशेषण, क्रिया-विशेषण,कारक , संधि,समास आदि के प्रयोग का पता चलता है।

भाषा की प्रकृति / प्रवृति

भाषा की प्रकृति का जन्म समाज से हुआ है। क्यांेकि समाज में रहकर ही वह भाषा का विकास करता  भाषा मनुष्य की सामाजिक सम्पति है। जिसके द्वारा समाज में रहकर ही बोलना ,सुनना सीखता है। भाषा उस सागर की तरह है। जिसकी गहराई को मापा  नहीे जा सकता। भाषा की प्रकृति के द्वारा हमें उसके गुण अवगुण का ज्ञान होता है। भाषा सामाजिक और पैतिृक  पूर्वजद्ध सम्पति होती है। जो समाज के द्वारा शैशवास्था से ही प्रारम्भ हो जाती है।जिससे वह  भाषा का विकास करता है  भाषा अर्जित एवम परम्परागत सम्पति है। जिससे वह समाज में अपने व्यवहार और अनुकरण द्वारा ग्रहण करता है। भाषा सर्वव्यापक होती है। जो सामाजिक स्तर पर आधारित होती है जैसा हमारा समाज होगा वैसी ही हमारी भाषा होगी । भाषा सतत व प्रभावमयी प्रकिया होती है।जो एक दूसरे के लिए मौखिक और लिखित दोनों रूपों व्यक्त की जाती है। यह जीवन पर्यन्त प्रवाहित ;बहती, चलती रहती है।  जिसका आरम्भ उच्चारित ध्वनियों,शब्दों,और वाक्यों से हुआ है। भाषा को शुद्ध व मानक रूप प्रदान करने के लिए व्याकरण का निर्माण किया गया । जिसमें भाषा  और व्याकरण एक दूसरे के  बिना अधूरे है। इनका आपस में गहरा संबंध है।

 

भाषा का उद्देश्य

आप सभी को पता हैं कि मनुष्य भाषा का प्रयोग अपने विचारों का आदान प्रदान या विचारों  के संप्रेषण के लिए करता है।अतः भाषा का उद्देश्य  है- विचारों का आदान-प्रदान या संप्रेषण।

भाषा :—,मानव से उच्चारित ध्वनि प्रतीकों की ऐसी  व्यवस्था है जिसके माध्यम से समाज के लोग एक- दूसरे के साथ अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैं।

इस तरह भाषा की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित है-

1 भाषा मानव मुख से उच्चारित होती है।

2 विभिन्न स्वर और व्यंजन ध्वनियों के मेल से शब्दों की रचना होती है।

3भाषा के शब्द स्वयं में वस्तु नहीं होते बल्कि वस्तुओं के लिए बनाए गए  ध्वनि-प्रतीक होते है। अतः भाषा ध्वनि प्रतीकों की व्यवस्था कहलाता है।

4 भाषा का सम्प्रेषण मूलतः वाचिक होता है।

5भाषा जटिलता से सरलता की ओर उनमुख होती है।

6भाषा व्यवहार के लिए अपने  आप में पूर्ण होती है  क्योंकि भाषा के द्वारा हम समाजमें रहकर एक दूसरे को समझ सकते है।

7 भाषा सृजनात्मक क्रिया होती है जिसमें मनुष्य नित नए शब्दों और वाक्यों की खोज अपनी आवश्यकता अनुसार करता हैअर्थात भाषा से बौद्धिक व मानसिक विकास का स्तर जुडा हुआ है।

8 भाषा जन्मजात नहीं होती है बच्चा उसे समाज केद्वारा धीरे धीरे अनुकरण या ग्रहण करता है।मनुष्य समाज में अपनी अनुकरण क्रिया के द्वारा ही एक से अधिक भाषा सीख लेता है।

9भाषा सामाजिक प्रकिया है। सामाजिक परिवेश में ही उसका जन्म और,विकास अर्जन और प्रयोग होता है। अतः वह समाज सापेक्ष मनुष्य स्वतंत्र सामजिक प्राणी है। भाषा उसकी ही  कृति है। भाषा कोई वैधिक , सास्कृतिक और प्राकृतिक  सम्पति या सम्प्रदा नहीं है।

10 प्रत्येक भाषा का मानक रूप होता है। यद्पि भाषा सतत परिवर्तित होती रहती है।बडे स्तर पर भाषा का प्रयोग में परिवर्तन या भिन्नता आ जाना स्वाभिक होता है। इसी वजह से उसके ध्वनियों के उच्चारण,शब्द एवम् रूप रचना में अन्तर नही बल्कि वाक्य सरचंना में भी अन्तर पाया जाता है।

11 भाषा की सबसे विशेषता यह कि उसके द्वारा मानव को अपनी सभ्यता व संस्कृति के बारे में जाकारी प्रदान होती है।

12 भाषा सतत परिवर्तन शील प्रकिया है। इसमें शनै-शनै समयानुसार परिवर्तन होते रहतें है। मनुष्य अपनी भाषा को समद्ध बनाने के लिए उसमें नए नए (innovation) या परिवर्तन  करता है। मनुष्य एक ऐसा प्राणी है। जो अपनी भाषा में (Changes) मे बदलाव  ला सकता है।

14 भाषा का कोई अन्तिम रूप नहीं है। समाज सापेक्ष होने के कारण वह सदैव विकास की ओर अग्रसर होती रहती है। जो भाषा बोल चल में नही हे उनका तो अंत निश्चित है। लेकिन जो  भाषा जीवंत होती है। उनका विकास तथा उसमें परिवर्तन होना स्वाभिक और सम्भव है।

15भाषा परम्परागत है। व्यक्ति उसका अर्जन कर सकता है लेकिन उसको उत्पन्न नहीं कर सकता है।भाषा परम्पराओं से चली आ रही है व्यक्ति उस परम्परा का ही समाज में अर्जन करता है

16 प्रत्येक भाषा की सरंचना दूसरी भाषा से भिन्न या अलग होती है ध्वनि,शब्द वाक्य,रूप,अर्थ आदि दृष्टियों से किसी एक या एक से अधिक स्तरों से एक भाषा का ढांचा दूसरी भाषा के ढाचें सक  भिन्न होता है। इसलिए यही भिन्नता एक भाषा को दूसरी भाषा से पृथक या अलग करती हैं।

17भाषा सहज व नैसर्गिक प्रक्रिया है।  जिसको प्रयत्न और अभ्यास के द्वारा कोई भी मनुष्य सीख सकता है।

18 भाषा का स्तर समाज पर निर्भर करता है।

19).यह सामाजिक परिवेश में मानव मस्तिष्क की उपज है।

उदहारण के तौर पर:-

अध्यापक की भाषा का स्तर(Lavel) अलग होगा।

सब्जी बेचने वाले की भाषा अलग होगी

 

भाषा प्रतीकों की व्यवस्था के रूप में संचालन है।

प्रतीक शब्द का अर्थ होता हैः- चिह्ननों,पद, या सकेंत । जिसमें किसी ना किसी  वस्तु को दर्शाने के लिए कुछ  चिह्नो की जरूरत पडती है।

 

भाषा एक व्यवस्थित या नियमबद्ध रूप में

‘‘भाषा एक व्यवस्था है‘‘। इसका अर्थ यही है कि हर भाषा में कुछ नियम होते है।जो उस भाषा को नियत्रित करते हैं। ये नियम ही तय करते है। कि  भाषा में कब कहां पर कौन से नियम लागू होगें कौन से नहीं होगें   किसी भी शब्द रचना  ध्वनि, वर्ण,शब्द वाक्य ,पद में कौन सी ध्वनियों का मेंल होगा अथवा नहीं होगा या वाक्य में प्रयुक्त होते समय शब्द में कौन सा प्रत्यय लगेगा, कौन सा नहीं लगेगा आदि। भाषा के किसी भी स्तर पर ध्वनि, शब्, पद, पदबंध, वाक्य आदि देखें तो सभी जगह आपको यह व्यवस्था दिखाई देगी। कौन.कौन सी ध्वनियाँ किस अनुक्रम (combination) में मिलाकर शब्द बनाएँगी और किस अनुक्रम से बनी रचना शब्द नहीं कहलाएगी यह बात उस भाषा की ध्वनि संरचना के नियमों पर निर्भर करती है।

समान्य शब्दों में कह सकते हैकि:-भाषा नियमों द्वारा संचालित व्यवस्था है।  जिसको नियमों के द्वारा सयोंजित किया जाता है। तथा इसे नियम बद्ध योजना भी कहते है।  जैसें  कि कमल शब्द को ही ले तों हम कह सकते हैं कि इसकी रचना      क् + अ + म् + अ + ल् + अ ध्वनियों के मेल से हुई है।

1 ).क् + अ + म् + अ + ल् + अ= कमल ………सही

2). क् + अ + ल् + अ + म् + अ = कलम………सही

3). म् + अ + क् + अ + ल् + अ  =मकल ………..गलत

4). ल् + अ + क् + अ + म् + अ = लकम …………गलत

 

समान्य अर्थ -सूचना या सदेंश को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पॅहुचाना या सम्प्रेषित करना है। शब्दिक अर्थ के आधार पर हम कह सकतेहैं कि  सम्प्रेषण  अग्रेंजी के  शब्द-व्युत्पति लैटिन भाषा से  हुई है। जिसको अग्रेंजी में (communication) कहते है।

भाषा और लिपि

लिपि का शाब्दिक अर्थ होता हैः-लिखित या चित्रित करना। किसी भी  भाषा को लिखने के लिए हम जिन चिन्हों को निर्धारित करते  है उन चिन्हों को लिपि कहते है।

1).हिंदी और संस्कृत भाषा की लिपि देवनागरी है।

2).अंग्रेजी भाषा की लिपि रोमन

3).पंजाबी भाषा की लिपि गुरुमुखी

4).और उर्दू भाषा की लिपि फारसी है।

भारत की अनेक भाषाएं -हिंदी,संस्कृत मराठी,,कोंकणी नेपाली,आदि ’देवनागरी लिपि’में लिखी जाती है।तथा अग्रेंजी,फ्रेंच,जर्मन,इटेलियन स्पेनिश,पोलिश, आदि भाषाएं रोमन लिपि में लिखी जाती है।

प्रत्येक भाषा की लिपि अलग अलग होती है जिस तरह लिपि एक होने पर भाषाएं एक नहीं हो जाती उसी तरह किसी एक भाषा को अलग अलग लिपियों में लिख देने पर वह अलग भाषा नहीं  हो जाती। उदाहरण के लिए  हिंदी भाषा को देवनागरी तथा रोमन लिपि में लिख देने पर वह अलग भाषा नहीं होगी। जैसे

देवनागरी लिपि मेंः-मोहन घर जाता है।

रोमन लिपि:-Mohan ghar jata hai.

हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। देवनागरी लिपि का जन्म  या विकास भारत की सबसे प्राचीन लिपि ‘ब्राही लिपि‘ से हुआ है तथा ‘ब्राही लिपि‘ का अविष्कार वैदिक  आर्यों के द्वारा शुरू  किया इसमें राजा अशोक के द्वारा निर्मित  शिला लेखो के संदेशों  को  लिखने में ब्राही लिपि का प्रयोग किया गया है। । ब्राह्मी लिपि   की दो शैलियाॅ थी – उत्तरी शैली   और    दक्षिणी शैली

उत्तरी शैली  से पाॅच लिपियां विकसित हुई-   शारदा लिपि, कुटील लिपि, प्राचीन लिपि और गुप्त लिपि । प्राचीन नागरी के दो रूप विकसित हुए. पश्चिमी तथा पूर्वी। इन दोनों रूपों से विभिन्न लिपियों का विकास इस प्रकार हुआ.

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हिन्दी में लिपि चिह्न

देवनागरी के वर्णो में ग्यारह स्वर और इकतालीस व्यंजन हैं। व्यंजन के साथ स्वर का संयोग होने पर स्वर का जो रूप होता हैए उसे मात्रा कहते हैं —जैसे.

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ

ा ि ी ु ू ृ े ै ो ौ

क का कि की कु कू के कै को कौ

 

देवनागरी लिपि की विशेषताएं

1देवनागरी लिपि की लोकप्रियता का कारण उसकी कुछ महत्वपूर्ण विशेषता है।

इस  लिपि में जो शब्द जैसे बोले जाते हे वैसे ही लिखा  जा सकता है लेकिन इसके  उच्चारण एवं प्रयोग में समानता है।

2देवनागरी लिपि में सभी स्वरों व व्यजनों को उनके शुद्ध रूप में लिखने की व्यवस्था  हैंऔर ह्रस्व एवं दीर्घ में स्वर  बँटे हुए  हैं।

3जब एक व्यंजन अपने समान अन्य व्यंजन से मिलता हैए तब उसे श्द्वित्व व्यंजनश् कहते हैं।

जैसे. क्क चक्का त्त पत्ता त्र ;गत्रा म्म ;सम्मान आदि।

4 देवनागरी लिपि में जो ध्वनि का नाम है वही वर्ण का नाम है।

5 इस लिपि में कुछ वर्ण दो प्रकार से लिखे जाने का प्रावधान है तथा  छपाई एवं लिखाई दोनों समान हैं।

6 इस लिपि में अनुस्वार , अर्धचंद्र बिंदु आदि के प्रयोग की व्यवस्था है।                                          7 देवनागरी लिपि मेंशब्दों पर शिरो रेखा लगाने कीव्यवस्था है।यह लिपि भारत की अनेंक लिपियों के निकट है।

8 स्वरों की मात्राओं तथा अनुस्वार एवं विसर्गसहित एक व्यंजन वर्ण में बारह रूप होते हैं। इन्हें परम्परा के रूप से श्बारहखड़ीश् कहते हैं।

जैसे. क का कि की कु कू के कै को कौ कं कः।

9 व्यंजन दो तरह से लिखे जाते हैं. खड़ी पाई के साथ और बिना खड़ी पाई के।

10 देवनागरी लिपि का प्रयोग और क्षेत्र  बहुत ही व्यापक और विस्तृत है जों हिंदी,संस्कृत मराठी,,कोंकणी नेपाली,आदि की एकमात्र लिपि है।

11 देवनागरी लिपि में बायीं ओर से दायीं ओर लिखा जाता है। जबकि फारसी लिपि उर्दू,अरबी,फारसी भाषा की लिपिद्ध दायी ओर से बायी ओर लिखी जाती

भाषा के विविध रूप:-

प्रत्येक देश की भाषा अलग अलग रूप होते है।

 

1राष्ट् भाषा (National language) किसी देश की ‘‘राष्ट‘‘ भाषा वह भाषा होती है। जो राष्ट के अधिकतर लोगो के द्वारा बोली, समझी व प्रयुक्त की जाती है। राष्ट भाषा कहलाती है। जिस भाषा के साथ पूरे देश का सम्मान जुडा होता है। उस राष्ट का सविधान उस भाषा को मान्यता देता है। राष्ट भाषा का प्रयोग पूरे राष्ट में किया जाता है।

उदहारण के लिए

1 भारत की ‘‘राष्ट भाषा हिंदी‘‘ है।  अधिकांश देशवासी हिंदी का प्रयोग करतें है।  लगभग 75.80 प्रतिशत लोगों के  द्वारा हिंदी भाषा प्रयोग में लाई जाती है।

2सभी देशों की अपनी.अपनी राष्ट्रभाषा होती है

जैसे

  • अमरीका………..   अंग्रेजी
  • चीन…………….    चीनी
  • जापान……………..जापानी
  • रूस……………….रूसी आदि।

सरल शब्दोे में कह सकते है। कि जो भाषा अधिकतर देश  के नागरिकों के द्वारा बोली या प्रयुक्त की जाती है।वह राष्ट भाषा कहलाती है।

 

2). राज भाषा(Official language):-   राजभाषा ‘वस्तुतः राज काज की भाषा होती है अर्थात वह भाषा  जिसमें उस देश का प्रशासनिक कार्य किया जाता है।  वह राज भाषा कहलाती है।भारत में आज हिंदी और अग्रेजी दोनों को ही राज भाषा का दर्जा प्राप्त है।  अमेरिका की राज भाषा अग्रेंजी है।

दूसरे शब्दो में कह सकते है किः-जिस भाषा में सरकारी काम या आदेश लिखे जाते है।  उसे राज भाषा कहते है। लगभग दस 10 प्रान्तों में राज भाषा बोली जाती है। जैसे हरियाणा ,दिल्ली बिहार ,उतरप्रदेश, उतराखण्ड आदि

3).  मातृ भाषा(Mother Tongue): प्रायः ऐसा माना जाता है।कि बच्चा जिस भाषा को अपनी माता से सीखता है। वह उसकी भाषा मातृभाषा होती है। समान्यतः व्यक्ति जिस भाषा को शैशवाकाल शिशुअवस्था में अपनी माता परिवार समाज व उनके  सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों को अनुसरण करके सीखता है अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि

दूसरे शब्दों मे कह सकते है मातृभाषा वहभाषा होती है। जिसमें व्यक्ति के अस्मिता की पहचान होती है उदहारण के लिए, भोजपुरी या गढवाली बच्चा बचपन में अपनी माता से भोजपुरी या गढवाली सीखता है।  इसका अर्थ यह  नहीं है कि भोजपुरी या गढवाली उनकी मातृभाषा होगी वस्तुतः ये दोनो लोग विदेश गए और वहां के लोगों ने उनकी मातृभाषा के बारे में पूछे तो वे अपनी मातृभाषा ‘हिंदी‘ ही बताएगें न कि भोजपुरी या गढवाली  क्योंकि उनकी अस्मिता  पहचान भोजपुरी या गढवाली से नहीं बल्कि हिंदी से होगी अतः मातृभाषा वह भाषा होती है। जो व्यकित की  अस्मिता की पहचान  कराती है।

 

4).संपर्क भाषा(Link Language):- संपर्क भाषा वह भाषा होती है जिस के माध्यम से देश के अन्य भाषा भाषी लोग परस्पर संर्पक करते है।आज पूरे देश में हिंदी ही संपर्क भाषा है। भारत के किसी भी कोने में हिंदी बोलने वाले  और समझने वाले मिल जाएगें  उदहारण के लिए मिडिया इसमें प्रमुख भूमिका निभाना रही हैं

दूसरे शब्दों मे कह सकते है अन्य लोगों के साथ संपर्क को स्थापित करने वाली भाषा  को सम्पर्क भाषा कहते है।

5). अंतराष्टीय भाषाः– जिस भाषा के साथ विदेशी लोगों के साथ संपर्क स्थापित किया जाता है।  उसे अंतराष्टीय भाषा कहते है

सरल शब्दो में कह सकते है कि:-अंतराष्टीय भाषा को विदेशी भाषा भी कहते है। अंतराष्टीय भाषा के द्वारा एक राष्ट दूसरे राष्ट के द्वारा संबंध स्थापित करता है।जिसके द्वारा राष्टीय स्तर पर विचारों का आदान  प्रदान किया जाता है। उसे अंतराष्टीय भाषा कहते है।

अंतराष्टीय भाषा में निम्नलिखित स्तर सम्मिलित है। जैसे

1). राजनैतिक स्तर

2). औद्योगिक स्तर

3). वैज्ञानिक स्तर

4). अविष्कार एंवम् संचार तंत्र आदि शामिल है।

6).  प्रादेशिक भाषाः– जो भाषा अपने सीमित प्रदेश या क्षेत्र में बोली या समझी जाती है।

7). मानक भाषाः- एक दम शुद्ध व सर्वत्र रूप से प्रचलित भाषा को मानक भाषा कहते है।  अतः भाषा का जो रूप पूरे देश काल वातावरण में प्रचलित रहता है। वही मानक भाषा होती है।

सरल  शब्दों में कह सकते है कि जो भाषा बडे बडे विद्ववानों तथा शिक्षाशास्त्रियों के द्वारा  भाषा में शुद्धता व एकरूपता लाने के  लिए प्रयोग की जाती है। या बोली जाती है। उसे मानक भाषा कहते है। मानक भाषा राष्ट निर्माण में सहायक होती है।क्योंकि भाषा की एकता विचारों और भावों एकता में सहायक होती है।

 

भाषा और उसकी शैलियाॅ

शब्दावली ,संरचना,प्रयोग की विविधता के कारण भाषा की विभिन शैलियाॅ होती है।  उदहारण के लिए ‘हिंदी‘ ‘उर्दू‘ ‘हिन्दुस्तानी‘ तीनों एक ही भाषा की तीन शैलियाॅ है। हिंदी तथा उर्दू की एक ही शैली है क्योकि हिंदी और उर्दू की वाक्य सरचना में कोई अतर नही है।  हिंदी और उर्दू बल्कि एक ही भाषा की दो शैलियाॅं;ेजल समद्ध है।

दो भिन्न भाषाओं में परस्पर अनुवाद किया जा सकता है

जैसे

हिंदी के वाक्य  ‘‘मै घर जाता हॅू। का -अंग्रेजी और गुजराती में अनुवाद होगा

हिंदी  ——————‘मै घर जाता हॅू।‘‘

अंग्रेजी  —————I will go to home..

गुजराती  —————हॅू घेर जाॅउ छूॅ।

लेकिन हिंदी और उर्दू में दो स्तरों पर अंतर है।

1पहला ,लेखन के स्तर पर  –        दूसरा, शब्दावली के स्तर पर।

2हिंदी को ‘देवनागरी लिपि‘ में लिखा जाता है।   उर्दू को ‘फारसी लिपि‘ में लिखा जाता है।

3हिंदी में तत्सम शब्दों का प्रयोग अधिक होता है तथा    उर्दू में अरबी फारसी के शब्दों का प्रयोग अधिक होता है

4 इन दोनो शैलियों के अतिरिक्त एक अन्य शैली‘ हिन्दुस्तानी‘ भी विकसित हुई वस्तुतः ‘‘हिन्दुस्तानी‘‘ आम बोल चाल का रूप है।

1 तत्सम शब्दावली युक्त शैली या‘हिंदी‘ः-आप यहां विराजिए।

2  अरबी -फारसी युक्त शैली या‘उर्दू‘ः- आप यहां तश्रीफ रखिए।

3 आम बोल चाल की शैली या ‘हिन्दुस्तानी‘ः-आप यहां बैठिए।

 

बोली और उपभाषा

भाषा  का वह रूप जो किसी क्षेत्र-विशेष में वहाॅ के रहने वाले लोगों के द्वारा व्यवहार में लाया जाता है।‘बोली‘ कहलाता है। किसी भाषा की एक से अधिक बोलियों में कुछ ऐसे समान तत्व  होते है। जिनके आधार पर समस्त बोलियों को उसी भाषा के वर्ग में रखा जाता है।उदहारण के लिए हिंदी भाषा का क्षेत्र बहुत व्यापक है। हरियाणा, कुमायूॅ, गढवाल आदि क्षेत्रों में बोली जाने वाली हिन्दी हरियाणवी, कुमाउनी, गढवाली आदि बोलियांे के रूप में बोली जाती है या जानी जाती है तथा छोटे क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा बोली कहलाती है। बोली में साहित्य रचना नही की जाती है।

भाषा के बोलचाल विभिन्न अल्पविकसित रूप बोली कहलाते हंै।

दूसरें शब्दों में किसी  क्षेत्र की बोलचाल की भाषा बोली कहलाती है। जैसे:-दिल्ली, हरियाण, बिहार ,उतरप्रदेश, उतराखण्ड,हिमाचलप्रदेश,गढवाल,मध्यप्रदेश,राजस्थान दिल्ली,कुमायूॅ आदि।

 

उपभाषा:-

जिस तरह बोलियाॅ किसी एक  भाषा के वर्ग में आती है।उसी तरह आस-पास के क्षेत्रों की बोली जाने वाली कुछ बोलियों में अधिक समानता पाई जाती है।उदहारण के लिए बिहार प्रदेश हिंदी  की तीन बोलियाॅ बोली जाती हैं-भोजपुरी, मगही,मैथिली।

किसी क्षेत्र-विशेष की ऐसी बोलियाॅ जिनमें परस्पर काफी समानता होती है। एक उपभाषा क्षेत्र के अंर्तगत आती है। जैसे भोजपुरी, मगही तथा मैथिली ‘बिहार हिंदी‘ उपभाषा वर्ग में तथा कुल्ल्ई,गढवाली,तथा कुमाउनी ‘पहाडी हिंदी‘  और उपभाषा क्षेत्र में आती  हैं इस तरह बोलियों की तुलना में ‘उपभाषा‘ का क्षेत्र अधिक व्यापक होता है। एक ‘उपभाषा‘ के अंतर्गत अनेक बोलियों हो सकती है।

समान्य शब्दों म कह सकते है कि अगर किसी बोली में साहित्य रचना होने लगती है और क्षेत्र विस्तार हो जाता है तो वह बोली न रहकर उपभाषा बन जाती है।

हिन्दी की भाषा, उपभाषा,और बोलीः-हिन्दी भाषा का उदभव व विकास अत्यत ही पुराना है।विभिन्न जननी कहा जाता है। लेकिन यह कथन पुर्ण रूप से सत्य नहीं पहॅुचती है। इसलिए हिन्दी की उत्पति अपभ्रंश से हुई है अर्थात अपभ्रंश, अवहट्ट से गुजरती हुई प्राचीन/ प्रारम्भिक हिन्दी का रूप लेती है।समान्यतः कहा जा सकता है कि हिन्दी भाषा का प्रारम्भ अपभंश से हुआ है।  हिन्दी भाषा विश्व की लगभग 3000 भाषाओं में से एक है। जो अपनी आकृति या रूप के आधार पर वियोगात्मक या विश्लिष्ट भाषा है। हिन्दी का तात्पर्य है -खडी बोली व नगरी लिपि में लिखी जाने वाली वह भाषा जो भारत की राष्ट भाषा या सम्पर्क भाषा कही जाती है।    हिन्दी वस्तुत: फारसी भाषा का शब्द है,जिसका अर्थ है — हिन्दी का या हिंद से सम्बन्धित। हिन्दी शब्द की उत्पति सिन्धु से हुई है -क्योंकि ईरानी भाषा में  ‘स’  को ‘ ह’ बोला जाता है। इसलिए हिन्दु से हिन्द फारसी भाषा के संबंध कारक प्रत्यय ‘ई‘लगने से हिन्दी बन गया। शब्द।

 

हिन्दी भाषा का  विकास क्रम:-

संस्कृत-पालि-प्राकृत-अपभ्रंश-अवहळ-प्राचीन/आरंम्भिक हिंदी।

 

हिन्दी भाषा के विभिन्न अर्थः-

भाषा शास्त्रीय अर्थः- नागरी लिपि में लिखित संस्कृत बहुल खडी बोली ।

संवैधानिक/कानूनी अर्थ:- सविधान के अनुसार,हिंदी भारत संघ की राजभाषा या अधिकृत भाषा तथा अनेक राज्यों की राज भाषा है

समान्य अर्थ:- समस्त हिन्दी भाषी क्षेत्र की  परिनिष्ठत भाषा अर्थात शासन ,शिक्षा ,साहित्य व्यापार की भाषा ।

व्यापक अर्थ:-  आधुनिक युग में हिंदी को केवल खडी बोली में ही सीमित नहीं किया जा सकता बल्कि हिन्दी की सभी उपभाषाएं और बोलियाॅ हिंदी के व्यापक अर्थ में आ जाती है।

हिन्दी का महत्वः-  हिन्दी भाषा  शिक्षा, प्रशासन, समाचार पत्र, कला ,संस्कृति व सभ्यता, राजनिति,कम्प्यूटर,सम्पूर्ण हिंदी साहित्य  की विभिन्न विधाओं का माध्यम है। इसलिए सांस्कृतिक तथा सामाजिक दृष्टि से इसका विशेष महत्व है। े

हिन्दी क्षेत्रः- हिंदी क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। विभिन्न सामाजिक  धार्मिक, संास्कृतिक और व्यापारिक कारणों से हिंदी प्राचीन काल से ही हिंदी सभी प्रदेशों में प्रचलित रही है हिंदी शब्द की उत्पति हिंद से हुई । सामाजिक कारणों से भी हिंदी का प्रचार प्रसार हिंदीतर भाषा भाषी क्षेत्र में हुआ है।

ऐसी भाषाएं जो एक ही वंश या मूल भाषा से निकलकर विकसित हुई है। भाषा परिवार का निर्माण करती है। भाषा परिवार के आधार पर हिंदी भारोपीय परिवार की भाषा है।  भारत में चार भाषा परिवार भारोपीय,द्रविड, चीनी-तब्बती,आस्टिक भाषा आदि मिलते है।भारत में बोलने के प्रतिशत के आधार पर भारोपीय परिवार सबसे बडा भाषा परिवार है।

1). भारत-यूरोपीय:- भारोपीय भाषा भारत में बोलने वाले 7.3%   यह भाषाओं का सबसे बड़ा परिवार है और सबसे महत्वपूर्ण भी है क्योंकि अंग्रेज़ी, रूस, प्राचीन फारसी,हिन्दी,पंजाबी, जर्मन . ये तमाम भाषाएँ इसी समूह से संबंध रखती हैं। इसे श्भारोपीय भाषा.परिवारश् भी कहते हैं। विश्व जनसंख्या के लगभग आधे लोग4.5% भारोपीय भाषा बोलते हैं।

 

2). द्रविड भाषा:- दक्षिणी भारत और श्रीलंका में द्रविड़ी समूह की क 26 भाषाएँ बोली जाती हैं लेकिन उनमें ज़्यादा मशहूर तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ हैं। ये अन्त.अश्लिष्ट.योगात्मक भाषाएँ हैं।द्रविड भाषा भारत में बोलने वाले2.5% है।

3). चीनी तिब्बती:- ये भाषाएँ कश्मीर,हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल, नेपाल, सिक्किम, पश्चिम बंगाल,भूटान, अरूणाचल प्रदेश ,आसाम, नागालैंड, मेघालय. मणिपुर,त्रिपुरा और मिजोरम में बोली जाती हैं। चीनी तिब्बती भारत में बोलने वाले 1.3% है।

4). आस्टिक भाषा:- आस्टिक भाषा भारत में बोलने वाले 0.7% है।

हिन्दी भाषा का विकास अभी भारोपीय भाषाओं पर नही रूका बल्कि समान्य शब्दों में कहा जाए तो हिंदी आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है। आर्य भाषा का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत हैएजो साहित्य की परिनिष्ठित भाषा थी। वैदिक भाषा में वेद संहिता एवं उपनिषदों ,  वेदांत का सृजन हुआ है। वैदिक भाषा के साथ.साथ ही बोलचाल की भाषा संस्कृत थीएजिसे लौकिक संस्कृत भी कहा जाता है। संस्कृत का विकास उत्तरी भारत में बोली जाने वाली वैदिककालीन भाषाओं से माना जाताहै  संस्कृत कई प्रकार की प्राकृत भाषाएँ पैदा हुई। हमारी विशुद्ध संस्कृत किसी पुरानी प्राकृत से ही परिमार्जित हुई है। प्राकृत भाषाओं के बाद अपभ्रशों और शौरसेनी अपभ्रंश से निकली है।

भाषाः- साहित्यकार किसी भी उपभाषा को अपने साहित्य के द्वारा परिनिष्ठत सर्वमान्य  रूप प्रदान कर देते है। उसका और  क्षेत्र विस्तार हो जाता है तो वह भाषा कहलाने लगती है।हिन्दी एक भाषा है।  जिसके अंर्तगत पॅाच उपभाषा क्षेत्र आते हैं। प्रत्येक उपभाषा के क्षेत्र में अनेक 17 बोलियॅा आती है।

1 अपभ्रंश     2  उपभाषाएं     3   बोलियाॅ

अपभ्रंश में आधुनिक आर्य भाषाओं का उद्भ

एक भाषा विद्वान के अनुसार शुद्ध भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से हिन्दी की दो मुख्य उपभाषाएं है-पश्चिमी हिंदी  व  पूर्वी हिंदी ।

1 पश्चिमी (राजस्थानी) हिंदीः-  यह भाषा शैरसेनी भाषा के अंतर्गत आती है  तथा शैरसेनी से ही पशिचमी हिंदी का विकास हुआ है। जिसका संबंध राजस्थानी, गुजराती और पंजाबी से होता है। इस भाषा के कई भेद हैं जिसमें निम्न बोलियों को शामिल  किया गया है। हिन्दुस्तानी ब्रज कनौजी बुँदेली,बाँगरू और दक्षिणी।

क्षेत्र:  – उतरप्रदेश, हरियााा, बुदेलखंड, कन्नौज ।

कौरवी या खडी बोली:-  इसका मूल नाम कौरवी था लेकिन साहित्यिक भाषा बनने के बाद इसका नाम खडी बोली पड गया।इस भाषा को अन्य नामों से भी जाना जाता हैजिसमें  1-बोलचाल की हिन्दुस्तानी  2 सरहिन्दी  3 वर्नाक्यूलर खडी बोली आदि नाम सम्मिलित है। इसके बोलने वालों की संख्या 15 से 2 करोड तक है। इस भाषा मूल कौरवी में लोक साहित्य  है। जिसमें गीत , गीत-नाटक, लोक-कथा गप्प पहेली आदि है।

ब्रज भाषाः–  इस प्रकार का क्षेत्र मथुरा से लेकर आगरा तथा राजस्थान के धौलपुर तक फैला हुआ हैतथा एटा, बदायूं बरेली, और आस पासके क्षेत्र में भी है। भक्ति काल साहित्य इसी भाषा में लिखा है।  जिसमें सूरदास और नंनदास आदि कवियों का नाम उल्लेखनीय है यह कृष्णभक्ति  काव्य की एकमात्र भाषा और लगभग सारा रीतिकालीन  साहित्य इसी भाषा में लिखा गया है।  इसमें रीतिकालीन कवि बिहारी, मतिराम, भूषण, देव आदि कवियों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है।   इसके ततपश्चात आधुनिक कवियों में भारतेंदु हरिशचंद्र जगन्नाथ दास , रत्नाकर आदि संबंध रखते है।

बुंदेली-    इस भाषा का क्षेत्र पूरा बुंदेल है। उज्जैन व भोपाल तक फैला हुआ है। इस भाषा में लोकसाहित्य मिलता  है।। झाँसी, जालौन, हमीरपुर और ग्वालियर के पूर्वी प्रान्तए मध्य प्रदेश के दमोह छत्तीसगढ़ के रायपुर, सिउनी,नरसिंहपुर आदि स्थानों की बोली बुँदेली है। छिंदवाड़ा और हुशंगाबाद के कुछ हिस्सों में भी इसका प्रचार है।

कन्नौज:-    इटावा से इलाहाबाद तक इसके बोलनेवाले हैं। अवध के हरदोई और उन्नाव में यही भाषा बोली जाती है। कन्नौजीए ब्रजभाषा से बहुत कुछ मिलती.जुलती है

बागरू या हरियाणवीः-  हिसार, झींद, रोहतक, करनाल आदि जिलों में बाँगरू भाषा बोली जाती है। दिल्ली के आसपास की भी यही भाषा है।

राजस्थानी हिन्दी:-राजस्थानी का विकास अपभं्रश से हुआ है।  जिसमें निम्न बोलियाॅ है-  जैसे मारवाडी, जयपुरी,मेवाती मालवी आदि के अंर्तगत आती है।

मेवाती:-  यह भाषा  केवल हरियाणा के मेवात नामक जिले में बोली जाती है। इसमें भी केवल लोक साहित्य मिलता है। इस भाषा का क्षेत्र पुन्हाना, फिरोजपुर , झिरका, तथा राजस्थान का सीमावर्ती क्षेत्र है।  उत्तरी राजस्थानी में महत्वपूर्ण बोलियां है।

मारवाडीः- यह भाषा राजस्थान के अजमेर बाढमेर जयसरमेर बिकानेर में बोली जाती है ंइसमें लोकसाहित्य  नहीं लिखा जाता है। है। यह पश्चिमी  व पूर्वी राजस्थानी में महत्वपूर्ण बोलिया है।

जयपुरी:- यह भाषा कोटा बुंदी से लेकर जयपुर तक बोली जाती है। इसको दूसरी भाषा में ढूढंानी भी कहते है। है ंइसमें लोकसाहित्य  मिलता है। यह पश्चिमी  व पूर्वी राजस्थानी में महत्वपूर्ण बोलिया है।

2). पूर्वी हिंदी:- अर्द्धमागधी प्राकृत के अप्रभ्रंश से पूर्वी हिन्दी निकली है।  है। पूर्वी हिन्दी का विकास अ़र्द्धमागधी से हुआ है। जिसके अंर्तगत इस भाषा के कई भेद है।    जिसमें निम्न बोलियों को शामिल  किया गया है। जैसे अवधी ,बघेली,छतीसगढी।  इस भाषा में “श्री रामचरित मानस” जैसे महाकाव्य की रचना हुई है। “मलिक मोहम्मद जायसी” ने अपनी प्रसिद्ध रचनाएँ इसी भाषा में लिखी हैं।

क्षे़त्र:- उत्तरप्रदेश, हरियाणा, छतीसगढ ।

अवधी:—-इस भाषा का प्रयोग अलीगढ, ऐटा-मैनपुरी ,फेजावाद तक होता है। इस भाषा में जायसी की   ‘‘पदमावत‘‘ रामभक्त कवि तुलसी दास द्वारा   ‘‘रामचरित मानस‘‘ लिखा गया है इसे बोलने वालों की सख्यी 2 करोड है।

बघेली:—यह भाषा मध्यप्रदेश में रतलाम , सागर और झाॅसी तक बोली जाती है। इस भाषा में कोई विशेष साहित्य उपलब्ध नहीं है। केवल लोक साहित्य मिलता है। यह पूर्वी हिंदी क्षेत्र में सम्मिलित हैं

3 मागधी ,बिहारी हिंदी:- मगधी भाषा से  बिहारी हिन्दी  का विकास का हुआ है।इसे पूर्वी शाखा के अंर्तगत दर्शाया गया है। जिसमें बांग्ला , उडिया,  असमिया तथा बिहारी भाषा को शामिल किया गया है  इन्ही भाषाओं के  अंर्तगत बिहारी भाषा की तीन प्रकार की बोलिया उभर कर सामने आई । मैथली, मगही, भोजपुरी, पूर्वी आदि। मैथली के प्रसिद्ध कवि विद्यापति ठाकुर और भोजपुरी के बहुत बड़े प्रचारक भिखारी ठाकुर हुए।

मैथिली भाषाः–बिहारी  भाषा में सर्वमान्य मैथली भाषा का विकसित रूप सामने आया है इस भाषा का क्षेत्र बिहार का दरभ्ंागा जिला है। इसका प्रयोग मैथिली  ब्राहमणों के द्वारा अधिक किया जाता है। विद्यापति इस भाषा के प्रमुख कवि है। उन्होनें राधा कृष्ण सम्बधी प्रमुख रचना इसी भाषा में की है। यह भाषा ‘‘कोमलकांत पदावली‘‘ और मधुरता के लिए प्रसिद्ध है।

भोजपुरी भाषाः-यह भाषा उतरप्रदेश और बिहार के सीमावर्ती जिले भोजपुर में बोली जाती है। इस भाषा में अब कुछ-कुछ साहित्य लिखा जाने लगा है। इस भाषा को बोलने वालों की ;संख्या 35 करोड की दृष्टि से हिंदी प्रदेश की बोलियों में सबसे अधिक बोली जाने वाली बोली है।

शिौरसेनी से प्रभावित है। जिसमें दो प्रकार की बोलियों को सम्मिलित किया गया है। पहाडी बोली भारतीय.आर्य परिवार से जुड़ी भाषाओं का एक समूह हैए जो  मुख्यतरू   निचले क्षेत्रों में हिमाचल प्रदेश में बोली जाती हैं।पहाड़ी का हिन्दी  में शब्दार्थ ष्पहाड़ काष् है इस समूह को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया है.

1 पूर्वी पहाड़ी में नेपाली मुख्य भाषा हैए जो प्रारंभिक रूप से नेपाल में बोली जाती है।

2 मध्य पहाड़ी भाषाएं उतंराचल राज्य में  बोली जाती है।

3 पश्चिमी पहाड़ी भाषाएं हिमाचल में शिमला  के आसपास बोली जाती हैं।इस समूह की सबसे प्रमुख भाषा नेपाली-नैपाली है, जिसे ख़ा–.खुरा और गोरख़ाली —–गुरख़ाली भी कहते हैं। क्योंकि नेपाल के कई निवासी तिब्बती.बर्मी भाषाएं बोलते हैं, इसलिए नेपाली में तिब्ब्ती.बर्मी बोली के शब्द और मुहावरे शामिल हो गए हैं।मध्य पहाड़ी वर्ग में कई बोलियां हैं, जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण सिरमौनी, क्योंठाली, चमेयाली, चुराही, मंडियाली, गादी और कुलूई शामिल हैं।

कुमाउनीः – यह भाषा हिमाचल प्रदेश में बोली जाती है। गढवाली:-यह भाषा उत्तराखण्ड में बोली जाती है।

ब्राचंड ,पंजाबी:—  यह भाषा शौरसेनी से प्रभावित है।

 

मानव संप्रेषण तथा मानवेतर संप्रेषण :—

भाषा का संबंध मानव मुख से उच्चरित ध्वनियों के साथ है या दूसरे शब्दों में कहें तो कह सकते हैं कि ‘भाषा’ मानव मुख से  उच्चरित होती है। भाषा का उददेश्य भी विचारों का आदान—प्रदान या सम्प्रेषण से है। जहॉ संप्रेषण का प्रश्न है वह अन्य प्राणियों में भी होता है पर मानेवतर संप्रेषण को भाषा नहीं कहते।भले ही पशु-पक्षी तरह-तरह की ध्वनियाँ उच्चरित कर संप्रेषण करते हैं।—गाय, कुत्ता, बिल्ली ,घोडा, मोर, कबूतर, चिडिया कौआ आदि तरह -तरह की आवाजें निकालकर दूसरे —गाय, कुत्ता, बिल्ली ,घोडा, मोर, कबूतर, चिडिया कौआ आदि  तक अपनी बात संप्रेषित करते हैं। वस्तुतः भाषा का संबंध केवल मनुष्य से ही है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भाषा का अर्थ

भाषा अध्ययन में  भाषा का अर्थ  अत्यंत व्यापक और संक्षिप्त है। जिसके द्वारा मनुष्य बहुत ही सहज , सरल, शुद्ध व व्यापक रूप से भाषा सिखता है।

भाषा का संक्षिप्त अर्थ यह है किः-भाषा उस शास्त्र को कहते है जिसमें भाषा मात्र के भिन्न भिन्न अंग और स्वरूपों का विवेचन तथा निरूपण किया  जाता है।

भाषा का व्यापक अर्थ यह है कि:- भाषा के अन्र्तगत मनुष्य द्वारा भावों और विचारों को सूचित करने वाले सभी संकेत जो देखे, सुने पढे,और लिखे जा सकते है। जिसमें मनुष्य अपनी स्वेच्छा अनुसार उन्हें उत्पन्न कर सकता है। तथा दोहरा सकता है। वह भाषा कहलाती है।

सरल या अन्य शब्दों में कह सकते है कि भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने मन के विचारांे को दूसरांे तक पहुचातें है और दूसरांे के विचारों को स्ंवय ग्रहण करते है।