Hindi Bhasha(Language)(हिंदी भाषा)

भाषा (Language)

भाषा का सम्प्रत्य या भूमिका:-

प्रत्येक प्राणी अपनी भाषा में बात करता है। फिर चाहे वो मनुष्य हो या पशु पक्षी हो। हम जिस प्रकार के वातावरण  या समाज में रहते है उसी प्रकार की भाषा सिखते हैं। एक सभ्य समाज में रहकर मनुष्य भाषा के शुद्ध मानक रूप को विकसित करता है। भारत विविधता में एकता का देश है। जिसमें भिन्न भिन्न प्रकार की भाषाएं बोली जाती है। सभी  भाषाओं  का अपना अपना महत्व;पउचवतजंदबमद्ध होता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।  समस्त प्राणियों में भाषा जैसी नियामत ईश्वर ने केवल मनुष्य को दी है।अगर मनुष्य के पास भाषा न होती तो उसकी स्थिति भी पशु के समान ही होती । लोग एक दूसरे के साथ आज जिस तरह  से अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैै। या एक दूसरे से बातचीत करते है। वह  हमारी भाषा कहलाती है।

भाषा  का अर्थ (Meaning of Language)

प्रत्येक प्राणी किसी ना किसी रूप या स्थिति में अपनें भावों की अभिव्यक्ति करता है। इन अभिव्यक्तियों तथा ध्वनि सकेंतों के रूढ व यादृच्छिक प्रणाली को भाषा कहते है।

सभी मानव मुख से उच्चरित बालक, बुढे ध्वनि प्रतीकों की ऐसी व्यवस्था है।जिसके माध्यम से समाज के लोग एक दूसरे के साथ अपने विचारों का आदान प्रदान करते है।

भाषा अध्ययन में  भाषा का अर्थ अत्यंत व्यापक और संक्षिप्त है। जिसके द्वारा मनुष्य बहुत ही सहज,सरल,शुद्ध व व्यापक रूप से भाषा सिखता है।

भाषा का संक्षिप्त अर्थ यह है किः-भाषा उस शास्त्र को कहते है जिसमें भाषा मात्र के भिन्न भिन्न अंग और स्वरूपों का विवेचन तथा निरूपण किया  जाता है।

भाषा का व्यापक अर्थ यह है कि:- भाषा के अन्र्तगत मनुष्य द्वारा भावों और विचारों को सूचित करने वाले सभी संकेत जो देखे, सुने पढे,और लिखे जा सकते है। जिसमें मनुष्य अपनी स्वेच्छा अनुसार उन्हें उत्पन्न कर सकता है। तथा दोहरा सकता है। वह भाषा कहलाती है।

सरल या अन्य शब्दों में कह सकते है कि भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने मन के विचारों को दूसरों तक पहुचातें है और दूसरों के विचारों को स्ंवय ग्रहण करते है।

भाषा की परिभाषा (Definition of language)

भाषा मानव जीवन की वह प्रकिया है। जिसमें मनुष्य अपने विचारों को दूसरे के सामने प्रकट करता है। तथा दूसरों के भावों को समझ सकता है। अर्थात  मनुष्य द्वारा अपने भावों और विचारों को आदान प्रदान करने  की प्रक्रिया भाषा कहलाती  है।

डाॅ श्यामसुन्दरदास जी के अनुसार :-‘‘मनुष्य तथा उसके बीच की वस्तुओं के विषय में अपनी इच्छाओं और मतियों की अभिव्यक्तियों का आदान प्रदान करने के लिए व्यक्त किए गए ध्वनि संकेतों के व्यवहार को भाषा कहते है।‘‘

कामता प्रसाद जी के अनुसारः– ‘‘भाषा वह साधन या माध्यम  है। जिसके द्वारा मनुष्य  अपने भावों और विचारों को दूसरों के सामने शुद्ध रूप से प्रकट कर सके  तथा दूसरों के भावों या विचारों को  स्पष्ट रूप से ग्रहण  करने में सक्षम हो या  समझ सके।‘‘

सरल शब्दों में हम कह सकतें हैकिः-भाषा शब्द संस्कृत की ‘भाष‘धातु से बना है। जिसका शाब्दिक अर्थ होता है। ‘बोलना या कहना‘ मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।  समाज मे रहने के लिए उसे अपने भावों और विचारों का आदान प्रदान करना पडता है। कुछ उदाहरण है जिनके द्वारा हम भाषा को समझते है जब  अध्यापिका कक्षा में किसी भी विषय का प्रकरण या टाॅपिक (topic) बोलकर पढाती है। और कक्षा के सभी बच्चें या छात्र अध्यापिका की बात ध्यानपूर्वक सुनकर  समझते है। उसके बाद  अध्यापिका ने  सभी छात्रों को प्रकरण का सार लिखने के लिए बोला  और छात्रों ने अध्यापिका द्वारा दिए गए सार का उत्त्र दिया  और अध्यापिका ने बच्चों दवारा लिखे उत्तर पढे और उनकी मूल्यांकन या जाॅच की|

1). कालेज प्रधानाचार्य ने प्रबंधक महोदय को पत्र लिखकर कालेज में जेनरेटर की आवश्यकता से अवगत कराया । उन्होने प़़त्र पढकर अपनी संस्तुति के हस्ताक्षर कर पुनः प्रधानाचार्य जी को भेज दिया । प्रधानाचार्य जी ने संस्तुति पाकर एक जेनरेटर कंपनी को आदेश दिया है।
2). सुमन ने अपने पापा को पत्र लिखा पापा जी ने पत्र पढकर जाना कि सुमन को अपना त्रैमासिक शुल्क जमा कराने के लिए दो हजार पॉच सौ पचास रू0 चाहिए।
3). आशा भोसलें ने एक विवाह समारोह में गीत गाया। श्रोताओं ने गीत सुनकर तालियॉ बजाई
4). जब अध्यापिका कक्षा में किसी भी विषय का प्रकरण या टॉपिक(Topic)को बोलकर पढाती है। तो कक्षा के सभी बच्चें या छात्र अध्यापिका की बात ध्यानपूर्वक सुनकर समझते है। उसके बाद अध्यापिका ने भ्कहा‘ सभी छात्रों ने लिखकर अध्यापिका द्वारा दिए गए सार का उत्त्र दिया और अध्यापिका ने बच्चों दवारा लिखे उत्तर पढे , पढकर उनकी मूल्यांकन या जॉच की
इस प्रकार कह सकते है कि ‘‘बोलकर,सुनकर,लिखकर,व पढकर अपने मन के भावों और विचारो के अदान प्रदान की प्रक्रिया भाषा कहलाती है। हमारे आस पास के वातावरण में प्रदान करने के लिए भाषा का प्रयोग करते है। मनुष्य ही नहीं पशु पक्षी भी अपने भावों को प्रकट करते है। उनकी भाषा को बोली कहते है। वे विभिन्न आवाजों और सकेंतो से अपनी भावनाओं को व्यक्त करतें है।

इस प्रकार कह सकते है कि ‘‘बोलकर,सुनकर,लिखकर,व पढकर अपने मन के भावों और विचारो के अदान प्रदान की प्रक्रिया भाषा कहलाती है। हमारे आस पास के वातावरण में प्रदान करने के लिए भाषा का प्रयोग करते है। मनुष्य ही नहीं  पशु पक्षी भी अपने भावों को प्रकट करते है। उनकी भाषा को बोली कहते है। वे विभिन्न आवाजों और सकंतो से  अपनी भावनाओं को व्यक्त करतें है। है।

 

भाषा का प्रयोगः-

भाषा का प्रयोग व्यक्ति उस समय करता हैं। जब किसी से कुछ कहना हो उदाहरण के लिए ‘‘जब आप किसी दुकानदार से कुछ सामान खरीदते है,अपने घरवालों से किसी वस्तु की फरमाइश करते है या खेल के मैदान में अपने दोस्तों को कुछ निर्देश देते है आदि। अर्थात हमारे मन में कोई विचार आता है या हमें किसी से कुछ कहना होता तब अपने मन की बात दूसरों तक पंहुचाने के लिए भाषा का प्रयोग करतें है। भाषा के उपोग की योग्यता मनुष्य को दूसरे प्राणियों से अलग करती है। भाषा के जरिये हम स्वयं से और दूसर लोगों के साथ बातचीत करते हैं। जिसका उपयोग हम एक.दूसरे के साथ संचार के समय करते हैं।भाषा का प्रयोग हम  अपने दैनिक जीवन में दोनो ही रूपों में करते है। -कथित और लिखित  लिखित रूप में होने के कारण हम अपने दस्तावेज और पुस्तकें काफी लम्बें समय तक सुरक्षित रख सकते है।

भाषा  के प्रकारः-

आप इस बात से भली भॅाति परिचित हैं कि  दूसरों तक दो तरह से संप्रेषित कर सकते है-‘‘बोलकर या लिखकर‘‘ इसी आधार पर भाषा के दो रूप किए गए है- मौखिक और लिखित

लेकिन भाषा का एक अन्य रूप है। जिसके द्वारा हम सभी अपने भावों और विचारों का सप्रेंषण या अभिव्यक्ति करते है। उसे सांकेतिक भाषा कहते है।

  1. मौखिक भाषा
  2. लिखित भाषा
  3. सांकेतिक भाषा

 मौखिक (language) भाषा 

बोलना अर्थात मौखिक रूप यह भाषा का पहला रूप है इसमें बोलकर अपनी बात दूसरों तक पहुचाई जाती है और दूसरा उसे सुनकर समझता है।अतः भाषा के बोलचाल रूप को ही मौखिक भाषा कहा जाता  है। इस रूप का संबंध उच्चारण के साथ है अतः इसे ‘उच्चारित रूप‘ भी कहते है। भाषा  के आधारभूत की ईकाइ ध्वनि हैं। विभिन्न ध्वनि के मेल से शब्द बनते है। शब्दों के मेल से वाक्य जिनका प्रयोग बातचीत में किया जाता है। भाषा का मौखिक रूप अस्थायी होता है।क्यांेकि यह उच्चरित होते ही  समाप्त हो जाते है मौखिक भाषा द्वारा संप्रेषण तभी संभव है जब वक्ता और श्रोता एक दूसरें के निकट हों लेकिन आधुनिक युग में संचार के अनेक ऐसे साधन विकसित हो गए हैं जिनके  माध्यम से दूर बैठे वक्ता श्रोता के बीच मौखिक संप्रेषण संभव हो गया है।  उदाहरणः-   टेलीफ़ोन दूरदर्शन, भाषण ,वार्तालापए, नाटक, रेडियो आदि।

अतः सरल शब्दों में कह सकते है कि भाषा के जिस रूप से हम अपने विचारों एंव भावों बोलकर प्रकट करते है। तथा दूसरों के विचारों या भावों को सुनकर ग्रहण करते है। वह मौखिक भाषा है। यह भाषा का प्राचीनतम रूप है। क्यांेकि । मनुष्य ने पहले बोलना सीखा  ।

 

मौखिक भाषा(अभिव्यक्ति) का अर्थः-

जब व्यक्ति ध्वनियों के माध्यम से मुख के अवयवों की सहायता से उच्चारित भाषा का प्रयोग करते हुए विचारों को प्रकट करता है।उसे मौखिक अभिव्यक्ति कहते है।

मौखिक भाषा(अभिव्यक्ति)  की आवश्यकताः-

मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है।क्योंकि उसके पास भाषा है इसी कारण वह सामाजिक प्राणी माना जाता है। दूसरों से विचारों का आदान प्रदान करने के लिए शब्द समूहों का प्रयोग करना आवश्यक है इन्ही शब्द समूह को भाषा कहते है। प्रत्येक समाज के लिए सर्व सम्मत भाषा का होना  आवश्यक है क्योंकि

1 बिना भाषा के विचारों का आपसी आदान प्रदान  सम्भव नहीे है।

2 मौखिक  भाषा या अभिव्यक्ति द्वारा समाज में एक ही समय में असख्य व्यक्तियों को सम्बोधित किया जा सकता है।

3 अनपढ लोगों के लिए विचारों का आदान प्रदान का एकमात्र साधन मौखिक भाषा याअभिव्यक्ति है।

4 मौखिक भाषा से अभिव्यक्ति में जितनीसरलता,सरसता,स्पष्टता, सार्थकता,सहजता सम्भव है। उतनी लिखित भाषा में नहीे है।

मौखिक भाषा(अभिव्यक्ति) का महत्व

जिस प्रकार मनुष्य के लिए भोजन,बल,व वायु की आवश्यकता है उसी प्रकार बोलचाल भी आवश्यक है।अतः भावों व विचारों को व्यक्त करने के लिए मौखिक भाषा महत्वपूर्ण स्थान है।

1). मौखिक भाषा द्वारा सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित कर सकते है।

2). दैनिक जीवन के सभी कार्यों में मौखिक भाषा का प्रयोग होता है।

3). विद्यालय पाठयक्रम के सभी विषयों की शिक्षा में मौखिक भाषा ही प्रमुख माध्यम है।

4). बच्चा  जिस प्रकार उच्चारण करता है उसी प्रकरा लिखता है   अतः लेखन का विकास करने के लिए मौखिक भाषा या अभिव्यक्ति  महत्व है।

5). भाषण देना एक कला है जिसे सीखा जाता है  और अभ्यास करने से इसमें  निखार आता है। अतः भाषण कला के विकास के लिए मौखिक भाषा या अभिव्यक्ति   महत्व है।

मौखिक भाषा(अभिव्यक्ति) के उददेश्य

 

कोई भी सामाजिक प्राणी जिसका मौखिक वाक् कौशल,शुद्ध,प्रवाहपूर्ण व मधुर नहीं है वह कदापि सफल वक्ता नहीं बन सकता और श्रोताओं पर अपना प्रभाव नहीे डाल सकता अत मौखिक  वाक् ,भाषा या अभिव्यक्ति को विकसित ने के लिए निम्नलिखित उद्देश्य है।

1  सरल स्पष्ट  भाषा में वार्तालाप  करने की आदत का विकास करना

2 शब्दों व वाक्यों को सही ढंग से समझा कर आवश्यकता व समयानुसार प्रयोग करना सीखना।

3 बालकों को  इस योग्य बनाना की वे प्रश्न के उतर सही ढंग से दे सकें

4 उच्चारित ध्वनियों के उच्चारण का प्रयोग उचित प्रकार से करना ।

 

मौखिक भाषा(अभिव्यक्ति) के गुण:-

1). मौखिक भाषा सदैव स्वाभिक ढंग से होनी चाहिए। जिससे उसमें विश्वसनीयता आ जाती है।भाषा में बनावटीपन अविश्वसनीयता का कारण बनता है।

2 ).मौखिक भाषा मेंमाधुर्य का होना आवश्य है क्योंकि इससे भाषा में स्वतः आकर्षण आ जाता है।

3). मौखिक अभिव्यक्ति में उच्चारण की शुद्धि का ध्यान रखा जाना चाहिए। बात सीधे व स्पष्ट शब्दों में गतिशीलता के साथ विराम् चिह्नों का ध्यान ररखते हुए व्यक्त करना चाहिए।जिससे कहीे बात स्पष्ट रूप से समझ आ सके।

4). भाषा में सरलता से तात्पर्य यह नहीं है। कि साहित्यिक शब्दों का प्रयोग ही ना किया जाये। भाषा इस प्रकार की होनी चाहिए जो आसानी से समझ आ जाए तथा बोधगम्य होनी चाहिए।

5). किसी भी व्यक्ति के साथ वार्तालाप करते समय शिष्टता के नियम का पालन करते समय शिष्टता के नियम का पालन करना चाहिए । अशिष्टता अभिव्यक्ति सम्बधों को बिगाड देती है।

6 ).जीवन में हर्ष,दुख,उल्लास,शोक,प्यार आदि अनेक अवसर आते है। इन भावों के अनुकूल उचित हाव-भाव के साथ मौखिक अभिव्यक्ति करनी चाहिए।

7). जिस स्तर के व्यक्तियों से बात की जाये उसी प्रकार की भाषा का प्रयोग करना चाहिए जैसेः-ग्रामीण व्यक्ति के साथ बातचीत में क्लिष्ट भाषा का प्रयोग अनुचित है।

8).मौखिक अभिव्यक्ति करते समय विराम चिह्नों, उतार-चढाव, गति आदि का ध्यान रखना चाहिए ताकि भाषा में प्रभावोत्पादक आ सके।

9). मौखिक अभिव्यक्ति करते समय भाषा का ध्यान रखना चाहिए।

इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करना चाहिए जो समाज स्वीकृत सर्वमान्य हो अशिष्ट और अप्रचलित शब्दों का प्रयोग वार्तालाप को नीरस बना देता है।

लिखित (language)भाषाः

लिखित भाषा  :—लिखना अर्थात लिखित रूप। — यह भाषा का दूसरा रूप है। इसमें लिखकर अपनी बात दूसरों तक पहुॅचाई जाती है तथा दूसरा उसे  पढकर समझता है।  भाषा का लिखित रूप मौखिक रूप की तुलना में अधिक पुराना नहीे है। लिखित रूप में अपने विचारों का संप्रेषण कर सके। इन आवश्कताओं को पूरा करने के लिए जिन चिह्न ,अक्षरों व ध्वनि सकेतों का लिखित रूप में सहारा लेकर अपने भावों और विचारों को लिखकर प्रकट करना ही लिखित भाषा कहलाती है। उदाहरण कंप्यूटर, पुस्तक,समाचार-पत्र, लेख —पत्रिका ,कहानी ,जीवनी संस्मरण, तार आदि।

अतः सरल शब्दों में कह सकते है कि भाषा के जिस रूप से हम अपने विचारों एंव भावों लिखकर प्रकट करते है। तथा दूसरों के विचारों या भावों को पढकर ग्रहण करते है।वह लिखित भाषा है।

लिखित (language)भाषा का अर्थः-

लिखित भाषा अभिव्यक्ति का ऐसा साधन है जिसके द्वारा  कोई भी पढा लिखा व्यक्ति अपनी भावनाओं और सदेशों को दूसरों के समक्ष लिखकर प्रकट कर सकता है।  जैसे पुराने समय में  डाक तार द्वारा मनुष्य चिळिया द्वारा मनुष्य सदेश भेजते थे। मौखिक भाषा को स्थायित्व रूप प्रदान करने तथा  उच्चरितध्वनि प्रतीकों के लिए लिखित चिह्नों का विकास हुआ होगा।

लिखित भाषा का महत्व या आवश्यकताः-

जिस प्रकार मनुष्य के जीवन दैनिक कार्य जरूरी है। जिसमें वह अपने पूरे दिन की दिनचर्या बनाकर अपने कार्य सम्पन्न करता है। उसी प्रकार  एक पीढी के ज्ञान को दूसरी पीढी तक पहुचाने के लिए लिखित भाषा आवश्यकता है। क्योंकि

1). लिखित भाषा से ज्ञान में वृद्धि होती है।

2). शब्दों के शुद्ध उच्चारण करने के साथ  शुद्ध लिखने का ज्ञान होता है।

3 ).विद्यालयों में छात्रों के पढने के लिए पाठ्यक्रम लिखित शब्दावली के द्वारा तैयार किया जाता है।

4). लिखित भाषा के द्वारा लेखन कौशल का विकास होता है।

5). लिखित भाषा के द्वारा  हमें अशुद्धियों का पता चलता है।

लिखित भाषा का उददेश्य:-

लिखित भाषा का उददेश्य  विभिन्न तथ्यों ,लिपि चिह्नों,घटनाओं तथा मनुष्य के ज्ञान भण्डार को एक पीढी से दूसरी पीढी तक  सुरक्षित रखने के लिए लिखित भाषा का उददेश्य है। हमारे सभी सरकारी काम काज  लिखित रूप में ही किए जाते है। सरकारी दस्तावेज में हमारा सविधांन भी लिखित रूप में मिलता है।

मौखिक भाषा और लिखित भाषा में अंतर या विशेषताएं

 

मौखिक भाषा

1 यह भाषा का प्रधान रूप है।

2 इस रूप का संबंध मानव मुख  से उच्चारित होने वाली ध्वनियों के साथ है।

3 यह उच्चारित होते ही समाप्त हो जाता है। अतः यह भाषा स्थायी रूप है।

4 इस रूप का विकास मनुष्य के जन्म के साथ हुआ

5 इससे बच्चा अपने परिवेश में स्वतः सीख लेता है।

6 इस रूप की आधारभूत इकाइ ‘‘ध्वनि‘‘ है।

लिखित भाषा

1 यह भाषा का गौण रूप है।

2 इस रूप का संबंध उच्चारित ध्वनियों के लिए बनाए गए ‘‘लिपि चिह्नों या वर्णों‘‘ के साथ है।

3 यह दीर्घकाल तक बना रह सकता है। अतः यह भाषा स्थायी रूप है।

4 इस रूप का विकास बहुत बाद में हुआ ।

5 इसे औपचारिक शिक्षा के द्वारा ही सीखा जा सकता है।

6 इस रूप की आधारभूत इकाइ ‘‘वर्ण‘‘ है।

सांकेतिक(language) भाषा

 

संकेत का अर्थ है-ः इशारा करना कहने का तात्पर्य यह है कि बिना बोले कुछ विशेष प्रकार के हाव-भाव के  द्वारा किसी भी व्यक्ति को अपनी बात समझाना जिसमें मनुष्य के द्वारा  मुख से बिना ध्वनि उच्चारित करें भिन्न भिन्न  इशारों से अपने मन के भावों व विचारों का आदान प्रदान करना ही सांकेतिक भाषा कहलाती है। सांकेतिक भाषा में हम अपने शरीर के सभी अगों का सहारा लेते है जिसमें हाथों का सहारा, उंगलियों का सहारा और चेहरे का हाव-भाव  शामिल है। जिसके द्वारा हम अपने भाव और विचार दूसरों के समक्ष संकेत द्वारा प्रकट करते है। तथा दूसरों के भाव और विचार संकेत द्वारा ग्रहण करते है। उसे साकेंतिक भाषा कहते है। यह भाषा श्रवण बाधिर,मूक बाधिर ,गूंगे या बहरे  बच्चे को लिए प्रयोग की जाती है।

उदाहारण के तौर पर:

1) (green light ) की बत्ती का हरा होना , गार्ड द्वारा हरी झंडी दिखाना और सीटी का बजना ये सभी संकते है। इन सभी संकेतों का कुछ ना कुछ अर्थ है अर्थात ये सभी रेलगाडी क चलने की तैयारी की सूचना देते है।

2).हाथ दिखाकर किसी को रूकने के लिए संकेत देना ।

3). चौराहा पर खडा यातायात सिपाही अपने हाथों के सकेतों से यातायात को नियंत्रित करतें हुए सुचारू रूप से चलाता है।

4).. मूक बधिर व्यक्तियों का वार्तालाप आदि।

जिसमें भाषा का व्यवहारिक रूप स्पष्ट ,नैतिक मूल्यों की शिक्षा होनी आवश्यक है। इसके लिए भाषा से सम्बन्धित कुछ बातों का ख्याल रखना चाहिए

1 भाषा का शुद्ध व स्पष्ट उच्चारण करना चाहिए ताकि दूसरो को समझ आ जाए ।

2भाषा  में प्रयोग हो रहे व्याकरण के नियमों पर ध्यान देना चाहिए।

3 भाषा के शब्दों को बोलने के लिए  क्रमानुसार प्रयोग करना चाहिए

4  हमें स्ंवय और बच्चों को नैतिकता, धार्मिकता तथा कर्तव्यों से सम्बन्धित शिक्षाप्रद कहानियों की पुस्तकों को पढाना चाहिए

4  हमें ऐसी पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए जो ज्ञानवर्धक एवम् जानकारी प्रदान करने वाली हो।

5  हमें अपने घर परिवार व समाज में भाषा पर विशेष ध्यान देना चाहिए खासतौर पर बच्चों पर क्योंकि बच्चे हमारे  अच्छे समाज की नींव है।

6 यदि आरम्भ से ही उनके शुद्ध उच्चारण व शब्दों पर ध्यान देगें तो उसे भाषा का व्यवस्थित रूप प्रदान करने में सफल हो पाएगें और निश्चिता के साथ भाषा का अच्छा वातावरण तैयार हो जाएगा।

7  हमें भाषा में मौखिक रूप को सही नही करना बल्कि लिखित रूप को भी सही दिशा प्रदान करनी चाहिए

8  हमें मुख से सही ध्वनि उच्चारण  तथा उपयुक्त शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।

9  हमेें  भाषा के दोनों रूपों पर विशेष ध्यान देना है फिर चाहे हम शब्द बोल रहे हो या लिख रहे हो उन्हें भाषा में व्याकरण के नियमों द्वारा स्पष्टीकरण करके पूर्ण  रूप से शब्दों,वाक्यों में प्रयोग करना चाहिए।

10 हमें लगातार पुस्तकों का अध्ययन करते रहना चाहिए क्योंकि पुस्तकें पढने से नये शब्द, वर्ण, अर्थ मिलते है।जिससे हमारा ज्ञान बढता है।

11  भाषा से व्याकरण का ज्ञान होता है।जिसमें  शब्द,पद,वाक्य,संज्ञा,सर्वनाम,विशेषण, क्रिया-विशेषण,कारक , संधि,समास आदि के प्रयोग का पता चलता है।

भाषा की प्रकृति / प्रवृति

भाषा की प्रकृति का जन्म समाज से हुआ है। क्यांेकि समाज में रहकर ही वह भाषा का विकास करता  भाषा मनुष्य की सामाजिक सम्पति है। जिसके द्वारा समाज में रहकर ही बोलना ,सुनना सीखता है। भाषा उस सागर की तरह है। जिसकी गहराई को मापा  नहीे जा सकता। भाषा की प्रकृति के द्वारा हमें उसके गुण अवगुण का ज्ञान होता है। भाषा सामाजिक और पैतिृक  पूर्वजद्ध सम्पति होती है। जो समाज के द्वारा शैशवास्था से ही प्रारम्भ हो जाती है।जिससे वह  भाषा का विकास करता है  भाषा अर्जित एवम परम्परागत सम्पति है। जिससे वह समाज में अपने व्यवहार और अनुकरण द्वारा ग्रहण करता है। भाषा सर्वव्यापक होती है। जो सामाजिक स्तर पर आधारित होती है जैसा हमारा समाज होगा वैसी ही हमारी भाषा होगी । भाषा सतत व प्रभावमयी प्रकिया होती है।जो एक दूसरे के लिए मौखिक और लिखित दोनों रूपों व्यक्त की जाती है। यह जीवन पर्यन्त प्रवाहित ;बहती, चलती रहती है।  जिसका आरम्भ उच्चारित ध्वनियों,शब्दों,और वाक्यों से हुआ है। भाषा को शुद्ध व मानक रूप प्रदान करने के लिए व्याकरण का निर्माण किया गया । जिसमें भाषा  और व्याकरण एक दूसरे के  बिना अधूरे है। इनका आपस में गहरा संबंध है।

 

भाषा का उद्देश्य

आप सभी को पता हैं कि मनुष्य भाषा का प्रयोग अपने विचारों का आदान प्रदान या विचारों  के संप्रेषण के लिए करता है।अतः भाषा का उद्देश्य  है- विचारों का आदान-प्रदान या संप्रेषण।

भाषा :—,मानव से उच्चारित ध्वनि प्रतीकों की ऐसी  व्यवस्था है जिसके माध्यम से समाज के लोग एक- दूसरे के साथ अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैं।

इस तरह भाषा की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित है-

1 भाषा मानव मुख से उच्चारित होती है।

2 विभिन्न स्वर और व्यंजन ध्वनियों के मेल से शब्दों की रचना होती है।

3भाषा के शब्द स्वयं में वस्तु नहीं होते बल्कि वस्तुओं के लिए बनाए गए  ध्वनि-प्रतीक होते है। अतः भाषा ध्वनि प्रतीकों की व्यवस्था कहलाता है।

4 भाषा का सम्प्रेषण मूलतः वाचिक होता है।

5भाषा जटिलता से सरलता की ओर उनमुख होती है।

6भाषा व्यवहार के लिए अपने  आप में पूर्ण होती है  क्योंकि भाषा के द्वारा हम समाजमें रहकर एक दूसरे को समझ सकते है।

7 भाषा सृजनात्मक क्रिया होती है जिसमें मनुष्य नित नए शब्दों और वाक्यों की खोज अपनी आवश्यकता अनुसार करता हैअर्थात भाषा से बौद्धिक व मानसिक विकास का स्तर जुडा हुआ है।

8 भाषा जन्मजात नहीं होती है बच्चा उसे समाज केद्वारा धीरे धीरे अनुकरण या ग्रहण करता है।मनुष्य समाज में अपनी अनुकरण क्रिया के द्वारा ही एक से अधिक भाषा सीख लेता है।

9भाषा सामाजिक प्रकिया है। सामाजिक परिवेश में ही उसका जन्म और,विकास अर्जन और प्रयोग होता है। अतः वह समाज सापेक्ष मनुष्य स्वतंत्र सामजिक प्राणी है। भाषा उसकी ही  कृति है। भाषा कोई वैधिक , सास्कृतिक और प्राकृतिक  सम्पति या सम्प्रदा नहीं है।

10 प्रत्येक भाषा का मानक रूप होता है। यद्पि भाषा सतत परिवर्तित होती रहती है।बडे स्तर पर भाषा का प्रयोग में परिवर्तन या भिन्नता आ जाना स्वाभिक होता है। इसी वजह से उसके ध्वनियों के उच्चारण,शब्द एवम् रूप रचना में अन्तर नही बल्कि वाक्य सरचंना में भी अन्तर पाया जाता है।

11 भाषा की सबसे विशेषता यह कि उसके द्वारा मानव को अपनी सभ्यता व संस्कृति के बारे में जाकारी प्रदान होती है।

12 भाषा सतत परिवर्तन शील प्रकिया है। इसमें शनै-शनै समयानुसार परिवर्तन होते रहतें है। मनुष्य अपनी भाषा को समद्ध बनाने के लिए उसमें नए नए (innovation) या परिवर्तन  करता है। मनुष्य एक ऐसा प्राणी है। जो अपनी भाषा में (Changes) मे बदलाव  ला सकता है।

14 भाषा का कोई अन्तिम रूप नहीं है। समाज सापेक्ष होने के कारण वह सदैव विकास की ओर अग्रसर होती रहती है। जो भाषा बोल चल में नही हे उनका तो अंत निश्चित है। लेकिन जो  भाषा जीवंत होती है। उनका विकास तथा उसमें परिवर्तन होना स्वाभिक और सम्भव है।

15भाषा परम्परागत है। व्यक्ति उसका अर्जन कर सकता है लेकिन उसको उत्पन्न नहीं कर सकता है।भाषा परम्पराओं से चली आ रही है व्यक्ति उस परम्परा का ही समाज में अर्जन करता है

16 प्रत्येक भाषा की सरंचना दूसरी भाषा से भिन्न या अलग होती है ध्वनि,शब्द वाक्य,रूप,अर्थ आदि दृष्टियों से किसी एक या एक से अधिक स्तरों से एक भाषा का ढांचा दूसरी भाषा के ढाचें सक  भिन्न होता है। इसलिए यही भिन्नता एक भाषा को दूसरी भाषा से पृथक या अलग करती हैं।

17भाषा सहज व नैसर्गिक प्रक्रिया है।  जिसको प्रयत्न और अभ्यास के द्वारा कोई भी मनुष्य सीख सकता है।

18 भाषा का स्तर समाज पर निर्भर करता है।

19).यह सामाजिक परिवेश में मानव मस्तिष्क की उपज है।

उदहारण के तौर पर:-

अध्यापक की भाषा का स्तर(Lavel) अलग होगा।

सब्जी बेचने वाले की भाषा अलग होगी

 

भाषा प्रतीकों की व्यवस्था के रूप में संचालन है।

प्रतीक शब्द का अर्थ होता हैः- चिह्ननों,पद, या सकेंत । जिसमें किसी ना किसी  वस्तु को दर्शाने के लिए कुछ  चिह्नो की जरूरत पडती है।

 

भाषा एक व्यवस्थित या नियमबद्ध रूप में

‘‘भाषा एक व्यवस्था है‘‘। इसका अर्थ यही है कि हर भाषा में कुछ नियम होते है।जो उस भाषा को नियत्रित करते हैं। ये नियम ही तय करते है। कि  भाषा में कब कहां पर कौन से नियम लागू होगें कौन से नहीं होगें   किसी भी शब्द रचना  ध्वनि, वर्ण,शब्द वाक्य ,पद में कौन सी ध्वनियों का मेंल होगा अथवा नहीं होगा या वाक्य में प्रयुक्त होते समय शब्द में कौन सा प्रत्यय लगेगा, कौन सा नहीं लगेगा आदि। भाषा के किसी भी स्तर पर ध्वनि, शब्, पद, पदबंध, वाक्य आदि देखें तो सभी जगह आपको यह व्यवस्था दिखाई देगी। कौन.कौन सी ध्वनियाँ किस अनुक्रम (combination) में मिलाकर शब्द बनाएँगी और किस अनुक्रम से बनी रचना शब्द नहीं कहलाएगी यह बात उस भाषा की ध्वनि संरचना के नियमों पर निर्भर करती है।

समान्य शब्दों में कह सकते हैकि:-भाषा नियमों द्वारा संचालित व्यवस्था है।  जिसको नियमों के द्वारा सयोंजित किया जाता है। तथा इसे नियम बद्ध योजना भी कहते है।  जैसें  कि कमल शब्द को ही ले तों हम कह सकते हैं कि इसकी रचना      क् + अ + म् + अ + ल् + अ ध्वनियों के मेल से हुई है।

1 ).क् + अ + म् + अ + ल् + अ= कमल ………सही

2). क् + अ + ल् + अ + म् + अ = कलम………सही

3). म् + अ + क् + अ + ल् + अ  =मकल ………..गलत

4). ल् + अ + क् + अ + म् + अ = लकम …………गलत

 

समान्य अर्थ -सूचना या सदेंश को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पॅहुचाना या सम्प्रेषित करना है। शब्दिक अर्थ के आधार पर हम कह सकतेहैं कि  सम्प्रेषण  अग्रेंजी के  शब्द-व्युत्पति लैटिन भाषा से  हुई है। जिसको अग्रेंजी में (communication) कहते है।

भाषा और लिपि

लिपि का शाब्दिक अर्थ होता हैः-लिखित या चित्रित करना। किसी भी  भाषा को लिखने के लिए हम जिन चिन्हों को निर्धारित करते  है उन चिन्हों को लिपि कहते है।

1).हिंदी और संस्कृत भाषा की लिपि देवनागरी है।

2).अंग्रेजी भाषा की लिपि रोमन

3).पंजाबी भाषा की लिपि गुरुमुखी

4).और उर्दू भाषा की लिपि फारसी है।

भारत की अनेक भाषाएं -हिंदी,संस्कृत मराठी,,कोंकणी नेपाली,आदि ’देवनागरी लिपि’में लिखी जाती है।तथा अग्रेंजी,फ्रेंच,जर्मन,इटेलियन स्पेनिश,पोलिश, आदि भाषाएं रोमन लिपि में लिखी जाती है।

प्रत्येक भाषा की लिपि अलग अलग होती है जिस तरह लिपि एक होने पर भाषाएं एक नहीं हो जाती उसी तरह किसी एक भाषा को अलग अलग लिपियों में लिख देने पर वह अलग भाषा नहीं  हो जाती। उदाहरण के लिए  हिंदी भाषा को देवनागरी तथा रोमन लिपि में लिख देने पर वह अलग भाषा नहीं होगी। जैसे

देवनागरी लिपि मेंः-मोहन घर जाता है।

रोमन लिपि:-Mohan ghar jata hai.

हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। देवनागरी लिपि का जन्म  या विकास भारत की सबसे प्राचीन लिपि ‘ब्राही लिपि‘ से हुआ है तथा ‘ब्राही लिपि‘ का अविष्कार वैदिक  आर्यों के द्वारा शुरू  किया इसमें राजा अशोक के द्वारा निर्मित  शिला लेखो के संदेशों  को  लिखने में ब्राही लिपि का प्रयोग किया गया है। । ब्राह्मी लिपि   की दो शैलियाॅ थी – उत्तरी शैली   और    दक्षिणी शैली

उत्तरी शैली  से पाॅच लिपियां विकसित हुई-   शारदा लिपि, कुटील लिपि, प्राचीन लिपि और गुप्त लिपि । प्राचीन नागरी के दो रूप विकसित हुए. पश्चिमी तथा पूर्वी। इन दोनों रूपों से विभिन्न लिपियों का विकास इस प्रकार हुआ.

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हिन्दी में लिपि चिह्न

देवनागरी के वर्णो में ग्यारह स्वर और इकतालीस व्यंजन हैं। व्यंजन के साथ स्वर का संयोग होने पर स्वर का जो रूप होता हैए उसे मात्रा कहते हैं —जैसे.

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ

ा ि ी ु ू ृ े ै ो ौ

क का कि की कु कू के कै को कौ

 

देवनागरी लिपि की विशेषताएं

1देवनागरी लिपि की लोकप्रियता का कारण उसकी कुछ महत्वपूर्ण विशेषता है।

इस  लिपि में जो शब्द जैसे बोले जाते हे वैसे ही लिखा  जा सकता है लेकिन इसके  उच्चारण एवं प्रयोग में समानता है।

2देवनागरी लिपि में सभी स्वरों व व्यजनों को उनके शुद्ध रूप में लिखने की व्यवस्था  हैंऔर ह्रस्व एवं दीर्घ में स्वर  बँटे हुए  हैं।

3जब एक व्यंजन अपने समान अन्य व्यंजन से मिलता हैए तब उसे श्द्वित्व व्यंजनश् कहते हैं।

जैसे. क्क चक्का त्त पत्ता त्र ;गत्रा म्म ;सम्मान आदि।

4 देवनागरी लिपि में जो ध्वनि का नाम है वही वर्ण का नाम है।

5 इस लिपि में कुछ वर्ण दो प्रकार से लिखे जाने का प्रावधान है तथा  छपाई एवं लिखाई दोनों समान हैं।

6 इस लिपि में अनुस्वार , अर्धचंद्र बिंदु आदि के प्रयोग की व्यवस्था है।                                          7 देवनागरी लिपि मेंशब्दों पर शिरो रेखा लगाने कीव्यवस्था है।यह लिपि भारत की अनेंक लिपियों के निकट है।

8 स्वरों की मात्राओं तथा अनुस्वार एवं विसर्गसहित एक व्यंजन वर्ण में बारह रूप होते हैं। इन्हें परम्परा के रूप से श्बारहखड़ीश् कहते हैं।

जैसे. क का कि की कु कू के कै को कौ कं कः।

9 व्यंजन दो तरह से लिखे जाते हैं. खड़ी पाई के साथ और बिना खड़ी पाई के।

10 देवनागरी लिपि का प्रयोग और क्षेत्र  बहुत ही व्यापक और विस्तृत है जों हिंदी,संस्कृत मराठी,,कोंकणी नेपाली,आदि की एकमात्र लिपि है।

11 देवनागरी लिपि में बायीं ओर से दायीं ओर लिखा जाता है। जबकि फारसी लिपि उर्दू,अरबी,फारसी भाषा की लिपिद्ध दायी ओर से बायी ओर लिखी जाती

भाषा के विविध रूप:-

प्रत्येक देश की भाषा अलग अलग रूप होते है।

 

1राष्ट् भाषा (National language) किसी देश की ‘‘राष्ट‘‘ भाषा वह भाषा होती है। जो राष्ट के अधिकतर लोगो के द्वारा बोली, समझी व प्रयुक्त की जाती है। राष्ट भाषा कहलाती है। जिस भाषा के साथ पूरे देश का सम्मान जुडा होता है। उस राष्ट का सविधान उस भाषा को मान्यता देता है। राष्ट भाषा का प्रयोग पूरे राष्ट में किया जाता है।

उदहारण के लिए

1 भारत की ‘‘राष्ट भाषा हिंदी‘‘ है।  अधिकांश देशवासी हिंदी का प्रयोग करतें है।  लगभग 75.80 प्रतिशत लोगों के  द्वारा हिंदी भाषा प्रयोग में लाई जाती है।

2सभी देशों की अपनी.अपनी राष्ट्रभाषा होती है

जैसे

  • अमरीका………..   अंग्रेजी
  • चीन…………….    चीनी
  • जापान……………..जापानी
  • रूस……………….रूसी आदि।

सरल शब्दोे में कह सकते है। कि जो भाषा अधिकतर देश  के नागरिकों के द्वारा बोली या प्रयुक्त की जाती है।वह राष्ट भाषा कहलाती है।

 

2). राज भाषा(Official language):-   राजभाषा ‘वस्तुतः राज काज की भाषा होती है अर्थात वह भाषा  जिसमें उस देश का प्रशासनिक कार्य किया जाता है।  वह राज भाषा कहलाती है।भारत में आज हिंदी और अग्रेजी दोनों को ही राज भाषा का दर्जा प्राप्त है।  अमेरिका की राज भाषा अग्रेंजी है।

दूसरे शब्दो में कह सकते है किः-जिस भाषा में सरकारी काम या आदेश लिखे जाते है।  उसे राज भाषा कहते है। लगभग दस 10 प्रान्तों में राज भाषा बोली जाती है। जैसे हरियाणा ,दिल्ली बिहार ,उतरप्रदेश, उतराखण्ड आदि

3).  मातृ भाषा(Mother Tongue): प्रायः ऐसा माना जाता है।कि बच्चा जिस भाषा को अपनी माता से सीखता है। वह उसकी भाषा मातृभाषा होती है। समान्यतः व्यक्ति जिस भाषा को शैशवाकाल शिशुअवस्था में अपनी माता परिवार समाज व उनके  सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों को अनुसरण करके सीखता है अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि

दूसरे शब्दों मे कह सकते है मातृभाषा वहभाषा होती है। जिसमें व्यक्ति के अस्मिता की पहचान होती है उदहारण के लिए, भोजपुरी या गढवाली बच्चा बचपन में अपनी माता से भोजपुरी या गढवाली सीखता है।  इसका अर्थ यह  नहीं है कि भोजपुरी या गढवाली उनकी मातृभाषा होगी वस्तुतः ये दोनो लोग विदेश गए और वहां के लोगों ने उनकी मातृभाषा के बारे में पूछे तो वे अपनी मातृभाषा ‘हिंदी‘ ही बताएगें न कि भोजपुरी या गढवाली  क्योंकि उनकी अस्मिता  पहचान भोजपुरी या गढवाली से नहीं बल्कि हिंदी से होगी अतः मातृभाषा वह भाषा होती है। जो व्यकित की  अस्मिता की पहचान  कराती है।

 

4).संपर्क भाषा(Link Language):- संपर्क भाषा वह भाषा होती है जिस के माध्यम से देश के अन्य भाषा भाषी लोग परस्पर संर्पक करते है।आज पूरे देश में हिंदी ही संपर्क भाषा है। भारत के किसी भी कोने में हिंदी बोलने वाले  और समझने वाले मिल जाएगें  उदहारण के लिए मिडिया इसमें प्रमुख भूमिका निभाना रही हैं

दूसरे शब्दों मे कह सकते है अन्य लोगों के साथ संपर्क को स्थापित करने वाली भाषा  को सम्पर्क भाषा कहते है।

5). अंतराष्टीय भाषाः– जिस भाषा के साथ विदेशी लोगों के साथ संपर्क स्थापित किया जाता है।  उसे अंतराष्टीय भाषा कहते है

सरल शब्दो में कह सकते है कि:-अंतराष्टीय भाषा को विदेशी भाषा भी कहते है। अंतराष्टीय भाषा के द्वारा एक राष्ट दूसरे राष्ट के द्वारा संबंध स्थापित करता है।जिसके द्वारा राष्टीय स्तर पर विचारों का आदान  प्रदान किया जाता है। उसे अंतराष्टीय भाषा कहते है।

अंतराष्टीय भाषा में निम्नलिखित स्तर सम्मिलित है। जैसे

1). राजनैतिक स्तर

2). औद्योगिक स्तर

3). वैज्ञानिक स्तर

4). अविष्कार एंवम् संचार तंत्र आदि शामिल है।

6).  प्रादेशिक भाषाः– जो भाषा अपने सीमित प्रदेश या क्षेत्र में बोली या समझी जाती है।

7). मानक भाषाः- एक दम शुद्ध व सर्वत्र रूप से प्रचलित भाषा को मानक भाषा कहते है।  अतः भाषा का जो रूप पूरे देश काल वातावरण में प्रचलित रहता है। वही मानक भाषा होती है।

सरल  शब्दों में कह सकते है कि जो भाषा बडे बडे विद्ववानों तथा शिक्षाशास्त्रियों के द्वारा  भाषा में शुद्धता व एकरूपता लाने के  लिए प्रयोग की जाती है। या बोली जाती है। उसे मानक भाषा कहते है। मानक भाषा राष्ट निर्माण में सहायक होती है।क्योंकि भाषा की एकता विचारों और भावों एकता में सहायक होती है।

 

भाषा और उसकी शैलियाॅ

शब्दावली ,संरचना,प्रयोग की विविधता के कारण भाषा की विभिन शैलियाॅ होती है।  उदहारण के लिए ‘हिंदी‘ ‘उर्दू‘ ‘हिन्दुस्तानी‘ तीनों एक ही भाषा की तीन शैलियाॅ है। हिंदी तथा उर्दू की एक ही शैली है क्योकि हिंदी और उर्दू की वाक्य सरचना में कोई अतर नही है।  हिंदी और उर्दू बल्कि एक ही भाषा की दो शैलियाॅं;ेजल समद्ध है।

दो भिन्न भाषाओं में परस्पर अनुवाद किया जा सकता है

जैसे

हिंदी के वाक्य  ‘‘मै घर जाता हॅू। का -अंग्रेजी और गुजराती में अनुवाद होगा

हिंदी  ——————‘मै घर जाता हॅू।‘‘

अंग्रेजी  —————I will go to home..

गुजराती  —————हॅू घेर जाॅउ छूॅ।

लेकिन हिंदी और उर्दू में दो स्तरों पर अंतर है।

1पहला ,लेखन के स्तर पर  –        दूसरा, शब्दावली के स्तर पर।

2हिंदी को ‘देवनागरी लिपि‘ में लिखा जाता है।   उर्दू को ‘फारसी लिपि‘ में लिखा जाता है।

3हिंदी में तत्सम शब्दों का प्रयोग अधिक होता है तथा    उर्दू में अरबी फारसी के शब्दों का प्रयोग अधिक होता है

4 इन दोनो शैलियों के अतिरिक्त एक अन्य शैली‘ हिन्दुस्तानी‘ भी विकसित हुई वस्तुतः ‘‘हिन्दुस्तानी‘‘ आम बोल चाल का रूप है।

1 तत्सम शब्दावली युक्त शैली या‘हिंदी‘ः-आप यहां विराजिए।

2  अरबी -फारसी युक्त शैली या‘उर्दू‘ः- आप यहां तश्रीफ रखिए।

3 आम बोल चाल की शैली या ‘हिन्दुस्तानी‘ः-आप यहां बैठिए।

 

बोली और उपभाषा

भाषा  का वह रूप जो किसी क्षेत्र-विशेष में वहाॅ के रहने वाले लोगों के द्वारा व्यवहार में लाया जाता है।‘बोली‘ कहलाता है। किसी भाषा की एक से अधिक बोलियों में कुछ ऐसे समान तत्व  होते है। जिनके आधार पर समस्त बोलियों को उसी भाषा के वर्ग में रखा जाता है।उदहारण के लिए हिंदी भाषा का क्षेत्र बहुत व्यापक है। हरियाणा, कुमायूॅ, गढवाल आदि क्षेत्रों में बोली जाने वाली हिन्दी हरियाणवी, कुमाउनी, गढवाली आदि बोलियांे के रूप में बोली जाती है या जानी जाती है तथा छोटे क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा बोली कहलाती है। बोली में साहित्य रचना नही की जाती है।

भाषा के बोलचाल विभिन्न अल्पविकसित रूप बोली कहलाते हंै।

दूसरें शब्दों में किसी  क्षेत्र की बोलचाल की भाषा बोली कहलाती है। जैसे:-दिल्ली, हरियाण, बिहार ,उतरप्रदेश, उतराखण्ड,हिमाचलप्रदेश,गढवाल,मध्यप्रदेश,राजस्थान दिल्ली,कुमायूॅ आदि।

 

उपभाषा:-

जिस तरह बोलियाॅ किसी एक  भाषा के वर्ग में आती है।उसी तरह आस-पास के क्षेत्रों की बोली जाने वाली कुछ बोलियों में अधिक समानता पाई जाती है।उदहारण के लिए बिहार प्रदेश हिंदी  की तीन बोलियाॅ बोली जाती हैं-भोजपुरी, मगही,मैथिली।

किसी क्षेत्र-विशेष की ऐसी बोलियाॅ जिनमें परस्पर काफी समानता होती है। एक उपभाषा क्षेत्र के अंर्तगत आती है। जैसे भोजपुरी, मगही तथा मैथिली ‘बिहार हिंदी‘ उपभाषा वर्ग में तथा कुल्ल्ई,गढवाली,तथा कुमाउनी ‘पहाडी हिंदी‘  और उपभाषा क्षेत्र में आती  हैं इस तरह बोलियों की तुलना में ‘उपभाषा‘ का क्षेत्र अधिक व्यापक होता है। एक ‘उपभाषा‘ के अंतर्गत अनेक बोलियों हो सकती है।

समान्य शब्दों म कह सकते है कि अगर किसी बोली में साहित्य रचना होने लगती है और क्षेत्र विस्तार हो जाता है तो वह बोली न रहकर उपभाषा बन जाती है।

हिन्दी की भाषा, उपभाषा,और बोलीः-हिन्दी भाषा का उदभव व विकास अत्यत ही पुराना है।विभिन्न जननी कहा जाता है। लेकिन यह कथन पुर्ण रूप से सत्य नहीं पहॅुचती है। इसलिए हिन्दी की उत्पति अपभ्रंश से हुई है अर्थात अपभ्रंश, अवहट्ट से गुजरती हुई प्राचीन/ प्रारम्भिक हिन्दी का रूप लेती है।समान्यतः कहा जा सकता है कि हिन्दी भाषा का प्रारम्भ अपभंश से हुआ है।  हिन्दी भाषा विश्व की लगभग 3000 भाषाओं में से एक है। जो अपनी आकृति या रूप के आधार पर वियोगात्मक या विश्लिष्ट भाषा है। हिन्दी का तात्पर्य है -खडी बोली व नगरी लिपि में लिखी जाने वाली वह भाषा जो भारत की राष्ट भाषा या सम्पर्क भाषा कही जाती है।    हिन्दी वस्तुत: फारसी भाषा का शब्द है,जिसका अर्थ है — हिन्दी का या हिंद से सम्बन्धित। हिन्दी शब्द की उत्पति सिन्धु से हुई है -क्योंकि ईरानी भाषा में  ‘स’  को ‘ ह’ बोला जाता है। इसलिए हिन्दु से हिन्द फारसी भाषा के संबंध कारक प्रत्यय ‘ई‘लगने से हिन्दी बन गया। शब्द।

 

हिन्दी भाषा का  विकास क्रम:-

संस्कृत-पालि-प्राकृत-अपभ्रंश-अवहळ-प्राचीन/आरंम्भिक हिंदी।

 

हिन्दी भाषा के विभिन्न अर्थः-

भाषा शास्त्रीय अर्थः- नागरी लिपि में लिखित संस्कृत बहुल खडी बोली ।

संवैधानिक/कानूनी अर्थ:- सविधान के अनुसार,हिंदी भारत संघ की राजभाषा या अधिकृत भाषा तथा अनेक राज्यों की राज भाषा है

समान्य अर्थ:- समस्त हिन्दी भाषी क्षेत्र की  परिनिष्ठत भाषा अर्थात शासन ,शिक्षा ,साहित्य व्यापार की भाषा ।

व्यापक अर्थ:-  आधुनिक युग में हिंदी को केवल खडी बोली में ही सीमित नहीं किया जा सकता बल्कि हिन्दी की सभी उपभाषाएं और बोलियाॅ हिंदी के व्यापक अर्थ में आ जाती है।

हिन्दी का महत्वः-  हिन्दी भाषा  शिक्षा, प्रशासन, समाचार पत्र, कला ,संस्कृति व सभ्यता, राजनिति,कम्प्यूटर,सम्पूर्ण हिंदी साहित्य  की विभिन्न विधाओं का माध्यम है। इसलिए सांस्कृतिक तथा सामाजिक दृष्टि से इसका विशेष महत्व है। े

हिन्दी क्षेत्रः- हिंदी क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। विभिन्न सामाजिक  धार्मिक, संास्कृतिक और व्यापारिक कारणों से हिंदी प्राचीन काल से ही हिंदी सभी प्रदेशों में प्रचलित रही है हिंदी शब्द की उत्पति हिंद से हुई । सामाजिक कारणों से भी हिंदी का प्रचार प्रसार हिंदीतर भाषा भाषी क्षेत्र में हुआ है।

ऐसी भाषाएं जो एक ही वंश या मूल भाषा से निकलकर विकसित हुई है। भाषा परिवार का निर्माण करती है। भाषा परिवार के आधार पर हिंदी भारोपीय परिवार की भाषा है।  भारत में चार भाषा परिवार भारोपीय,द्रविड, चीनी-तब्बती,आस्टिक भाषा आदि मिलते है।भारत में बोलने के प्रतिशत के आधार पर भारोपीय परिवार सबसे बडा भाषा परिवार है।

1). भारत-यूरोपीय:- भारोपीय भाषा भारत में बोलने वाले 7.3%   यह भाषाओं का सबसे बड़ा परिवार है और सबसे महत्वपूर्ण भी है क्योंकि अंग्रेज़ी, रूस, प्राचीन फारसी,हिन्दी,पंजाबी, जर्मन . ये तमाम भाषाएँ इसी समूह से संबंध रखती हैं। इसे श्भारोपीय भाषा.परिवारश् भी कहते हैं। विश्व जनसंख्या के लगभग आधे लोग4.5% भारोपीय भाषा बोलते हैं।

 

2). द्रविड भाषा:- दक्षिणी भारत और श्रीलंका में द्रविड़ी समूह की क 26 भाषाएँ बोली जाती हैं लेकिन उनमें ज़्यादा मशहूर तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ हैं। ये अन्त.अश्लिष्ट.योगात्मक भाषाएँ हैं।द्रविड भाषा भारत में बोलने वाले2.5% है।

3). चीनी तिब्बती:- ये भाषाएँ कश्मीर,हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल, नेपाल, सिक्किम, पश्चिम बंगाल,भूटान, अरूणाचल प्रदेश ,आसाम, नागालैंड, मेघालय. मणिपुर,त्रिपुरा और मिजोरम में बोली जाती हैं। चीनी तिब्बती भारत में बोलने वाले 1.3% है।

4). आस्टिक भाषा:- आस्टिक भाषा भारत में बोलने वाले 0.7% है।

हिन्दी भाषा का विकास अभी भारोपीय भाषाओं पर नही रूका बल्कि समान्य शब्दों में कहा जाए तो हिंदी आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है। आर्य भाषा का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत हैएजो साहित्य की परिनिष्ठित भाषा थी। वैदिक भाषा में वेद संहिता एवं उपनिषदों ,  वेदांत का सृजन हुआ है। वैदिक भाषा के साथ.साथ ही बोलचाल की भाषा संस्कृत थीएजिसे लौकिक संस्कृत भी कहा जाता है। संस्कृत का विकास उत्तरी भारत में बोली जाने वाली वैदिककालीन भाषाओं से माना जाताहै  संस्कृत कई प्रकार की प्राकृत भाषाएँ पैदा हुई। हमारी विशुद्ध संस्कृत किसी पुरानी प्राकृत से ही परिमार्जित हुई है। प्राकृत भाषाओं के बाद अपभ्रशों और शौरसेनी अपभ्रंश से निकली है।

भाषाः- साहित्यकार किसी भी उपभाषा को अपने साहित्य के द्वारा परिनिष्ठत सर्वमान्य  रूप प्रदान कर देते है। उसका और  क्षेत्र विस्तार हो जाता है तो वह भाषा कहलाने लगती है।हिन्दी एक भाषा है।  जिसके अंर्तगत पॅाच उपभाषा क्षेत्र आते हैं। प्रत्येक उपभाषा के क्षेत्र में अनेक 17 बोलियॅा आती है।

1 अपभ्रंश     2  उपभाषाएं     3   बोलियाॅ

अपभ्रंश में आधुनिक आर्य भाषाओं का उद्भ

एक भाषा विद्वान के अनुसार शुद्ध भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से हिन्दी की दो मुख्य उपभाषाएं है-पश्चिमी हिंदी  व  पूर्वी हिंदी ।

1 पश्चिमी (राजस्थानी) हिंदीः-  यह भाषा शैरसेनी भाषा के अंतर्गत आती है  तथा शैरसेनी से ही पशिचमी हिंदी का विकास हुआ है। जिसका संबंध राजस्थानी, गुजराती और पंजाबी से होता है। इस भाषा के कई भेद हैं जिसमें निम्न बोलियों को शामिल  किया गया है। हिन्दुस्तानी ब्रज कनौजी बुँदेली,बाँगरू और दक्षिणी।

क्षेत्र:  – उतरप्रदेश, हरियााा, बुदेलखंड, कन्नौज ।

कौरवी या खडी बोली:-  इसका मूल नाम कौरवी था लेकिन साहित्यिक भाषा बनने के बाद इसका नाम खडी बोली पड गया।इस भाषा को अन्य नामों से भी जाना जाता हैजिसमें  1-बोलचाल की हिन्दुस्तानी  2 सरहिन्दी  3 वर्नाक्यूलर खडी बोली आदि नाम सम्मिलित है। इसके बोलने वालों की संख्या 15 से 2 करोड तक है। इस भाषा मूल कौरवी में लोक साहित्य  है। जिसमें गीत , गीत-नाटक, लोक-कथा गप्प पहेली आदि है।

ब्रज भाषाः–  इस प्रकार का क्षेत्र मथुरा से लेकर आगरा तथा राजस्थान के धौलपुर तक फैला हुआ हैतथा एटा, बदायूं बरेली, और आस पासके क्षेत्र में भी है। भक्ति काल साहित्य इसी भाषा में लिखा है।  जिसमें सूरदास और नंनदास आदि कवियों का नाम उल्लेखनीय है यह कृष्णभक्ति  काव्य की एकमात्र भाषा और लगभग सारा रीतिकालीन  साहित्य इसी भाषा में लिखा गया है।  इसमें रीतिकालीन कवि बिहारी, मतिराम, भूषण, देव आदि कवियों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है।   इसके ततपश्चात आधुनिक कवियों में भारतेंदु हरिशचंद्र जगन्नाथ दास , रत्नाकर आदि संबंध रखते है।

बुंदेली-    इस भाषा का क्षेत्र पूरा बुंदेल है। उज्जैन व भोपाल तक फैला हुआ है। इस भाषा में लोकसाहित्य मिलता  है।। झाँसी, जालौन, हमीरपुर और ग्वालियर के पूर्वी प्रान्तए मध्य प्रदेश के दमोह छत्तीसगढ़ के रायपुर, सिउनी,नरसिंहपुर आदि स्थानों की बोली बुँदेली है। छिंदवाड़ा और हुशंगाबाद के कुछ हिस्सों में भी इसका प्रचार है।

कन्नौज:-    इटावा से इलाहाबाद तक इसके बोलनेवाले हैं। अवध के हरदोई और उन्नाव में यही भाषा बोली जाती है। कन्नौजीए ब्रजभाषा से बहुत कुछ मिलती.जुलती है

बागरू या हरियाणवीः-  हिसार, झींद, रोहतक, करनाल आदि जिलों में बाँगरू भाषा बोली जाती है। दिल्ली के आसपास की भी यही भाषा है।

राजस्थानी हिन्दी:-राजस्थानी का विकास अपभं्रश से हुआ है।  जिसमें निम्न बोलियाॅ है-  जैसे मारवाडी, जयपुरी,मेवाती मालवी आदि के अंर्तगत आती है।

मेवाती:-  यह भाषा  केवल हरियाणा के मेवात नामक जिले में बोली जाती है। इसमें भी केवल लोक साहित्य मिलता है। इस भाषा का क्षेत्र पुन्हाना, फिरोजपुर , झिरका, तथा राजस्थान का सीमावर्ती क्षेत्र है।  उत्तरी राजस्थानी में महत्वपूर्ण बोलियां है।

मारवाडीः- यह भाषा राजस्थान के अजमेर बाढमेर जयसरमेर बिकानेर में बोली जाती है ंइसमें लोकसाहित्य  नहीं लिखा जाता है। है। यह पश्चिमी  व पूर्वी राजस्थानी में महत्वपूर्ण बोलिया है।

जयपुरी:- यह भाषा कोटा बुंदी से लेकर जयपुर तक बोली जाती है। इसको दूसरी भाषा में ढूढंानी भी कहते है। है ंइसमें लोकसाहित्य  मिलता है। यह पश्चिमी  व पूर्वी राजस्थानी में महत्वपूर्ण बोलिया है।

2). पूर्वी हिंदी:- अर्द्धमागधी प्राकृत के अप्रभ्रंश से पूर्वी हिन्दी निकली है।  है। पूर्वी हिन्दी का विकास अ़र्द्धमागधी से हुआ है। जिसके अंर्तगत इस भाषा के कई भेद है।    जिसमें निम्न बोलियों को शामिल  किया गया है। जैसे अवधी ,बघेली,छतीसगढी।  इस भाषा में “श्री रामचरित मानस” जैसे महाकाव्य की रचना हुई है। “मलिक मोहम्मद जायसी” ने अपनी प्रसिद्ध रचनाएँ इसी भाषा में लिखी हैं।

क्षे़त्र:- उत्तरप्रदेश, हरियाणा, छतीसगढ ।

अवधी:—-इस भाषा का प्रयोग अलीगढ, ऐटा-मैनपुरी ,फेजावाद तक होता है। इस भाषा में जायसी की   ‘‘पदमावत‘‘ रामभक्त कवि तुलसी दास द्वारा   ‘‘रामचरित मानस‘‘ लिखा गया है इसे बोलने वालों की सख्यी 2 करोड है।

बघेली:—यह भाषा मध्यप्रदेश में रतलाम , सागर और झाॅसी तक बोली जाती है। इस भाषा में कोई विशेष साहित्य उपलब्ध नहीं है। केवल लोक साहित्य मिलता है। यह पूर्वी हिंदी क्षेत्र में सम्मिलित हैं

3 मागधी ,बिहारी हिंदी:- मगधी भाषा से  बिहारी हिन्दी  का विकास का हुआ है।इसे पूर्वी शाखा के अंर्तगत दर्शाया गया है। जिसमें बांग्ला , उडिया,  असमिया तथा बिहारी भाषा को शामिल किया गया है  इन्ही भाषाओं के  अंर्तगत बिहारी भाषा की तीन प्रकार की बोलिया उभर कर सामने आई । मैथली, मगही, भोजपुरी, पूर्वी आदि। मैथली के प्रसिद्ध कवि विद्यापति ठाकुर और भोजपुरी के बहुत बड़े प्रचारक भिखारी ठाकुर हुए।

मैथिली भाषाः–बिहारी  भाषा में सर्वमान्य मैथली भाषा का विकसित रूप सामने आया है इस भाषा का क्षेत्र बिहार का दरभ्ंागा जिला है। इसका प्रयोग मैथिली  ब्राहमणों के द्वारा अधिक किया जाता है। विद्यापति इस भाषा के प्रमुख कवि है। उन्होनें राधा कृष्ण सम्बधी प्रमुख रचना इसी भाषा में की है। यह भाषा ‘‘कोमलकांत पदावली‘‘ और मधुरता के लिए प्रसिद्ध है।

भोजपुरी भाषाः-यह भाषा उतरप्रदेश और बिहार के सीमावर्ती जिले भोजपुर में बोली जाती है। इस भाषा में अब कुछ-कुछ साहित्य लिखा जाने लगा है। इस भाषा को बोलने वालों की ;संख्या 35 करोड की दृष्टि से हिंदी प्रदेश की बोलियों में सबसे अधिक बोली जाने वाली बोली है।

शिौरसेनी से प्रभावित है। जिसमें दो प्रकार की बोलियों को सम्मिलित किया गया है। पहाडी बोली भारतीय.आर्य परिवार से जुड़ी भाषाओं का एक समूह हैए जो  मुख्यतरू   निचले क्षेत्रों में हिमाचल प्रदेश में बोली जाती हैं।पहाड़ी का हिन्दी  में शब्दार्थ ष्पहाड़ काष् है इस समूह को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया है.

1 पूर्वी पहाड़ी में नेपाली मुख्य भाषा हैए जो प्रारंभिक रूप से नेपाल में बोली जाती है।

2 मध्य पहाड़ी भाषाएं उतंराचल राज्य में  बोली जाती है।

3 पश्चिमी पहाड़ी भाषाएं हिमाचल में शिमला  के आसपास बोली जाती हैं।इस समूह की सबसे प्रमुख भाषा नेपाली-नैपाली है, जिसे ख़ा–.खुरा और गोरख़ाली —–गुरख़ाली भी कहते हैं। क्योंकि नेपाल के कई निवासी तिब्बती.बर्मी भाषाएं बोलते हैं, इसलिए नेपाली में तिब्ब्ती.बर्मी बोली के शब्द और मुहावरे शामिल हो गए हैं।मध्य पहाड़ी वर्ग में कई बोलियां हैं, जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण सिरमौनी, क्योंठाली, चमेयाली, चुराही, मंडियाली, गादी और कुलूई शामिल हैं।

कुमाउनीः – यह भाषा हिमाचल प्रदेश में बोली जाती है। गढवाली:-यह भाषा उत्तराखण्ड में बोली जाती है।

ब्राचंड ,पंजाबी:—  यह भाषा शौरसेनी से प्रभावित है।

 

मानव संप्रेषण तथा मानवेतर संप्रेषण :—

भाषा का संबंध मानव मुख से उच्चरित ध्वनियों के साथ है या दूसरे शब्दों में कहें तो कह सकते हैं कि ‘भाषा’ मानव मुख से  उच्चरित होती है। भाषा का उददेश्य भी विचारों का आदान—प्रदान या सम्प्रेषण से है। जहॉ संप्रेषण का प्रश्न है वह अन्य प्राणियों में भी होता है पर मानेवतर संप्रेषण को भाषा नहीं कहते।भले ही पशु-पक्षी तरह-तरह की ध्वनियाँ उच्चरित कर संप्रेषण करते हैं।—गाय, कुत्ता, बिल्ली ,घोडा, मोर, कबूतर, चिडिया कौआ आदि तरह -तरह की आवाजें निकालकर दूसरे —गाय, कुत्ता, बिल्ली ,घोडा, मोर, कबूतर, चिडिया कौआ आदि  तक अपनी बात संप्रेषित करते हैं। वस्तुतः भाषा का संबंध केवल मनुष्य से ही है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भाषा का अर्थ

भाषा अध्ययन में  भाषा का अर्थ  अत्यंत व्यापक और संक्षिप्त है। जिसके द्वारा मनुष्य बहुत ही सहज , सरल, शुद्ध व व्यापक रूप से भाषा सिखता है।

भाषा का संक्षिप्त अर्थ यह है किः-भाषा उस शास्त्र को कहते है जिसमें भाषा मात्र के भिन्न भिन्न अंग और स्वरूपों का विवेचन तथा निरूपण किया  जाता है।

भाषा का व्यापक अर्थ यह है कि:- भाषा के अन्र्तगत मनुष्य द्वारा भावों और विचारों को सूचित करने वाले सभी संकेत जो देखे, सुने पढे,और लिखे जा सकते है। जिसमें मनुष्य अपनी स्वेच्छा अनुसार उन्हें उत्पन्न कर सकता है। तथा दोहरा सकता है। वह भाषा कहलाती है।

सरल या अन्य शब्दों में कह सकते है कि भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने मन के विचारांे को दूसरांे तक पहुचातें है और दूसरांे के विचारों को स्ंवय ग्रहण करते है।