कारक की परिभाषाअर्थ, प्रकार/भेद,नियम/पहचान(Karak in Hindi)

कारक की परिभाषा(Definition of Case)

कारक के बारे में बहुत सी भ्रातियॉं है। अधिकतर लोगों के लिए कारक का अर्थ है— कि” ने, से ,को, में, पर” आदि परसर्ग चिह्न है, परंतु ध्याान रखिए –परसर्ग या कारक चिह्न स्वंय में कारक नहीं है। बल्कि कारकों को सूचित करने वाले चिह्न है।

अर्थात हम जानते है कि– वाक्य की रचना क्रिया पद तथा एक या एक से अधिक संज्ञा पदों के योग से होती है। वाक्य में आने वाली प्रत्येक उस वाक्य की क्रिया को सम्पन्न कराने में कुछ ना कुछ सहयोग अवश्य देती है। अत: इन सभी संज्ञा पदों का वाक्य की क्रिया के साथ कोई न कोई संबंध जुड जाता है। इस तरह हर संज्ञा का क्रिया के साथ अलग अलग संबंध होता है।
उदहारण के लिए —

  • वाक्य -1 कुली ने रेलगाडी में सूटकेस चढाया।
  • वक्य-2  बच्चे ने पेसिंल से चित्र बनाया।
  • वाक्य-3 मॉं ने नौकर को मिठाई दी।

उपर्युक्त वाक्यों में किसी ना किसी का संबंध एक दूसरे से अवश्य है।

दूसरे शब्दों में – संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) सम्बन्ध सूचित हो, उसे (उस रूप को) ‘कारक’ कहते हैं।

इन दो ‘परिभाषाओं’ का अर्थ- यह हुआ कि संज्ञा या सर्वनाम के आगे जब ‘ने’, ‘को’, ‘से’ आदि विभक्तियाँ लगती हैं, तब उनका रूप ही ‘कारक’ कहलाता है।

तभी वे वाक्य के अन्य शब्दों से सम्बन्ध रखने योग्य ‘पद’ होते है और ‘पद’ की अवस्था में ही वे वाक्य के दूसरे शब्दों से या क्रिया से कोई लगाव रख पाते हैं। ‘ने’, ‘को’, ‘से’ आदि विभित्र विभक्तियाँ विभित्र कारकों की है। इनके लगने पर ही कोई शब्द ‘कारकपद’ बन पाता है और वाक्य में आने योग्य होता है। ‘कारकपद’ या ‘क्रियापद‘ बने बिना कोई शब्द वाक्य में बैठने योग्य नहीं होता।

अन्य शब्दों में- संज्ञा अथवा सर्वनाम को क्रिया से जोड़ने वाले चिह्न अथवा परसर्ग ही कारक कहलाते हैं।इन चिह्नों को कारक चिह्न या परसर्ग कहते है। इन्हें विभक्ति चिह्न भी कहा जाता है।
जैसे-

  • ”रामचन्द्रजी ने खारे जल के समुद्र पर बन्दरों से पुल बँधवा दिया।”

इस वाक्य में ‘रामचन्द्रजी ने’, ‘समुद्र पर’, ‘बन्दरों से’ और ‘पुल’ संज्ञाओं के रूपान्तर है, जिनके द्वारा इन संज्ञाओं का सम्बन्ध ‘बँधवा दिया’ क्रिया के साथ सूचित होता है।
दूसरा उदाहरण-

  • श्रीराम ने रावण को बाण से मारा

इस वाक्य में प्रत्येक शब्द एक-दूसरे से बँधा है और प्रत्येक शब्द का सम्बन्ध किसी न किसी रूप में क्रिया के साथ है।
यहाँ ‘ने’ ‘को’ ‘से’ शब्दों ने वाक्य में आये अनेक शब्दों का सम्बन्ध क्रिया से जोड़ दिया है। यदि ये शब्द न हो तो शब्दों का क्रिया के साथ तथा आपस में कोई सम्बन्ध नहीं होगा। संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया के साथ सम्बन्ध स्थापित करने वाला रूप कारक होता है।

विभक्ति या परसर्ग –

जिन प्रत्ययों की वजह से कारक की स्थिति का बोध होता है, उसे विभक्ति या परसर्ग कहते हैं।–
जैसे

  • पेङ पर फल लगते हैं।

इस वाक्य में पेङ कारकीय पद हैं और ’पर’ कारक सूचक चिन्ह अथवा विभक्ति

अर्थात हम कह सकते है। कि जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम का संबंध क्रिया के साथ स्थापित करते है। उन्हें कारक चिह्न या परसर्ग कहते है। जैसे

  • लडका किताब पढ रहा है।
  • राम ने किताब पढी।
  • राम ने नौकर को बुलाया।
  • राम कलम से लिखता है।
  • राम भाई के लिए कपडे लाया।
  • उसने भाई को पैसे दिए।
  • पत्ता पेड से गिरा।
  • ह कमरे में सो रहा है।

इन वाक्यों में संज्ञाओं का क्रिया से संबंध बताने के लिए कुछ चिह्नों का प्रयोग किया गया है जैसे

  • ने ,को ,से ,के लिए, में आदि।

कारक का अर्थ (Meaning of Case)

किसी वाक्य में प्रयुक्त संज्ञा या सर्वनाम पदों का उस वाक्य की क्रिया से जो संबंध होता है। उसे कारक कहते है।

सरल शब्दों में — वाक्य में जिस शब्द का सम्बंध क्रिया से होता है। उसे कारक कहते है। इन्हे विभक्ति या परसर्ग बाद में जुडने वाले भी कहा जाता है।

दूसरे शब्दों में —कारक का अर्थ होता है –किसी कार्य को करने वाला।

अर्थात जो भी क्रिया को करने में अहम भूमिका निभाता है, वह कारक कहलाता है। ये समान्यत: स्वतंत्र होते है, और संज्ञा या सर्वनाम के साथ प्रयुक्त होते है। हिंदी में परसर्ग प्रत्ययों का विकसित रूप है।

कारक के उदाहरण (Example of case)

  • वह रोज़ सुबह गंगा किनारे जाता है।
  • वह पहाड़ों के बीच में है।
  • नरेश खाना खाता है।
  • सूरज किताब पढता है।

कारक के भेद-(Type of Case)

हिन्दी में कारको की संख्या आठ है-

  1. कर्ता कारक (Nominative case)
  2. कर्म कारक (Accusative case)
  3. करण कारक (Instrument case)
  4. सम्प्रदान कारक(Dative case)
  5. अपादान कारक(Ablative case)
  6. सम्बन्ध कारक (Gentive case)
  7. अधिकरण कारक (Locative case)
  8. संबोधन कारक(Vocative case)

कारक के लक्षण, चिन्ह, और विभक्ति 

क्रमकारक का नाम चिह्न तथा विभक्ति -लक्षण,पहचान/परिभाषाप्रयोग/उदहारण
1कर्ता कारक (Nominative case)ने चिह्न- प्रथमा विभक्तिक्रिया को पूरा करने वालापारूल ने नृत्य किया
पारूल चली गई
2कर्म कारक (Accusative case)को चिह्न-द्वितीया विभक्तिक्रिया को प्रभावित करने वालापारूल ने राधा को पढ़ाया।
पारूल चली गई।
3करण कारक (Instrument case)
से, के द्वारा चिह्न-- तृतीया विभक्ति

क्रिया का साधनपारूल ने चाकू से सब्जी काटी।
उसे पत्र द्वारा सूचना भेजो
4सम्प्रदान कारक(Dative case)
को, के लिए चिह्न--चतुर्थी विभक्तिजिसके लिए काम होगरीबों को वस्त्र दो।
पारूल राधा के लिए गेंद लाई।
5अपादान कारक(Ablative case)
से चिह्न--पंचमी विभक्तिजहाँ पर अलगाव होपारूल कुरसी से उठी।
6सम्बन्ध कारक (Gentive case)
हो का, की, के, रा, री, रे चिह्न--षष्ठी विभक्ति
जहाँ पर पदों में संबंधपारूल की दादी आई।
7अधिकरण कारक (Locative case)
में, पर चिह्न-- सप्तमी विभक्ति
का आधार होनापारूल कार में गई।
पुस्तक मेंज पर है।

8संबोधन कारक(Vocative case) हे, अरे!, हो!चिह्न-- सम्बोधन विभक्ति किसी को पुकारनाहे! भगवान रक्षा करो।
अरे! पारूल तु गाती भी है।

कर्ता कारक

वाक्य की वह संज्ञा या सर्वनाम जो क्रिया को सम्पन्न करने का कार्य करती है या उसकी भोक्ता होती ​है। वह कर्ता कारक में कही जाती है।

दूसरे शब्दों में ——संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया (कार्य) के करने वाले का बोध होता है वह कर्ता’ कारक कहलाता है।

सरल शब्दों में —जो वाक्य में कार्य करता है, उसे कर्ता कहा जाता है। अथार्त वाक्य के जिस रूप से क्रिया को करने वाले का पता चले, उसे कर्ता कहते हैं।

अर्थात  क्रिया का करने वाला ‘कर्ता’ कहलाता है। कर्ता कारक की विभक्ति ‘ने’ होती है।

जैसे-

  • लवकुश खाता है।” इस वाक्य में खाने का काम लवकुश करता है अतः कर्ता लवकुश है ।
  • मनु ने पत्र लिखा।” इस वाक्य क्रिया का करने वाला ‘मनु’ कर्ता है।

कर्ता कारक के अन्य उदाहरण :

  • रामू ने अपने बच्चों को पीटा।
  • समीर जयपुर जा रहा है।
  • नरेश खाना खाता है।
  • विकास ने एक सुन्दर पत्र लिखा।

विशेष-

-कभी-कभी कर्ता कारक में ‘ने’ चिह्न नहीं भी लगता है। जैसे-

  • घोड़ा’ दौड़ता है।
  • नम्रता नहाती है।
  • राधा नाचती है।

–विभक्ति  ने का प्रयोग भूतकाल की क्रिया में किया जाता है। कर्ता स्वतंत्र होता है। कर्ता कारक में ने विभक्ति का लोप भी होता है।

–इस ‘ने’ चिह्न का वर्तमानकाल और भविष्यकाल में प्रयोग नहीं होता है। इसका सकर्मक धातुओं के साथ भूतकाल में प्रयोग होता है।जैसे

  • राम ने रावण को मारा।
  • लड़की स्कूल जाती है।
  • अध्यापक ने विद्यार्थियों को पढ़ाया।

-इसका हिन्दी पर्याय ‘ने’ है। इस ‘ने’ चिह्न का वर्तमानकाल और भविष्यकाल में प्रयोगनहीं होता है। इसका सकर्मक धातुओं के साथ भूतकाल में प्रयोग होता है।

हले वाक्य में– क्रिया का कर्ता राम है। इसमें ‘ने’ कर्ता जताता है। इस वाक्य में मारा’ भूतकाल की क्रिया है। ‘ने’ का प्रयोग प्रायः भूतकाल में होता है।

–दूसरे वाक्य में– वर्तमानकाल की क्रिया का कर्ता लड़की है। इसमें ‘ने’ का प्रयोग नहीं हुआ है।

–तीसरे वाक्य  में– ‘अध्यापक’ कर्ता है, क्योंकि काम करने वाला अध्यापक है

अन्य ध्यान रखने योगय बातें

भूतकाल में अकर्मक क्रिया के कर्ता के साथ भी ने परसर्ग नहीं लगता है। जैसे-

  • वह हँसा।
  • तुम रोये।
  • वो चला आदि।

वर्तमानकाल व भविष्यतकाल की सकर्मक क्रिया के कर्ता के साथ ने परसर्ग का प्रयोग नहीं होता है। जैसे-

  • वह फल खाता है।
  • वह फल खाएगा।

कर्मवाच्य और भाव वाच्य कर्ता के साथ  ‘से’ का प्रयोग भी किया जाता है। जैसे-

  • सीता से पुस्तक पढ़ी गई।
  • रोगी से चला भी नहीं जाता।
  • उससे शब्द लिखा नहीं गया।

 

जो क्रिया अकर्मक होती है। तो उसके साथ विभक्ति चिह्न नहीं लगता ने विभक्ति चिहृन सकर्मक क्रिया के भूतकाल में लगता है।

  • दानिश ने चाकलेट ली।
  • गर्वित ने गुब्बारे खरीदे।
  • राधा ने खाना बनाया।

कर्मवाच्य और भाव वाच्य कर्ता के साथ ‘को’ का प्रयोग- भी किया जाता है। जैसे-

  • बालक को सो जाना चाहिए।
  • राधा को पढ लेना चाहिए।
  • विकास को चले जाना था।

विधि-क्रिया (‘चाहिए’ आदि) और संभाव्य भूत (‘जाना था’, ‘करना चाहिए था’ आदि) में कर्ता ‘को’ के साथ आता है।जैसे

  • राम को जाना चाहिए।
  • राम को जाना था,
  • जाना चाहिए था।

 

विभक्ति-चिह्न  ‘ने’ का प्रयोग कर्ता के साथ निम्न रूपों में करना चाहिए

विभक्ति’ने’ का प्रयोग निम्नलिखित नियमों  में होता है।

अकर्मक क्रिया में सामान्य रूप से ‘ने’ विभक्ति नहीं लगती, लेकिन थूकना,नहाना, छींकना, खाँसना कुछ ऐसी अकर्मक क्रियाएँ है। जिनमें ‘ने’ चिह्न या विभक्ति का प्रयोग अपवादस्वरूप होता है। इन क्रियाओं के बाद कर्म नहीं आता।जैसे-

  • इसने थूका।
  • लता ने छींका।
  • तुमने खाँसा।
  • उसने नहाया।

जब अकर्मक क्रिया सकर्मक क्रिया का रूप धारण कर लेती है।  तब ‘ने’ का प्रयोग होता है, अन्यथा नहीं।जैसे-

  • उसने  चाल सीधी चली।
  • उसने लडाई लड़ी।

जब संयुक्त क्रिया के दोनों खण्ड सकर्मक हों तब अपूर्णभूत को छोड़कर  शेष सभी भूतकालों में कर्ता के आगे ‘ने’ चिह्न का प्रयोग होता है।जैसे-

  • श्याम ने सीधा कह दिया।
  • किशोर ने देख लिया।

प्रेरणार्थक क्रियाओं के साथ सदैव अपूर्णभूत काल  को छोड़कर शेष सभी भूतकालों में ‘ने’ का प्रयोग होता है।जैसे-

  • तुमने उसे पढ़ाया।
  • उसने एक रुपया दिलवाया।

 

कर्ता के साथ ‘ने’ का प्रयोग तब होता है जब संयुक्त क्रिया सकर्मक भूतकालिक होती है।  लेकिनसामान्य भूत, आसन्न भूत, पूर्ण भूत, संदिग्ध भूत, हेतुहेतुमद् भूत कालों में ‘ने’ विभक्ति लगती है। जैसे-

  1. सामान्य भूत- राम ने रोटी खायी।
  2. आसन्न भूत राम ने रोटी खायी है।
  3. पूर्ण भूत- रा ने रोटी खायी थी।
  4. संदिग्ध भूतराम ने रोटी खायी होगी।
  5. हेतुहेतुमद् भूत- राम ने पुस्तक पढ़ी होती, तो उत्तर ठीक होता।

तात्पर्य यह है कि –केवल अपूर्ण भूत को छोड़ शेष पाँच भूतकालों में ‘ने’ का प्रयोग होता है।

विभक्ति-चिह्न  ‘ने’ का प्रयोग कर्ता के निम्न स्थानों और नियमों में नहीं होता

विभक्ति  ‘ने’ का प्रयोग निम्नलिखित स्थितियों में नहीं होता है।

वर्तमान और भविष्यत् कालों की क्रिया में कर्ता के साथ ‘ने’ का प्रयोग नहीं होता।जैसे-

  • राम जाता है। राम जायेगा।

सकर्मक क्रिया में जैसे — “बकना, बोलना, भूलना” आदि  क्रियाओं में ने का प्रयोग हो सकता है।  लेकिन अपवादस्वरूप सामान्य, आसत्र, पूर्ण और सन्दिग्ध भूतकालों में कर्ता के ‘ने’ चिह्न का व्यवहार नहीं होता।जैसे-

  • वह गाली बका।
  • वह बोला।
  • वह मुझे भूला।

क्रिया हाँ और बोलना” में कहीं-कहीं ‘ने’ विभक्ति का प्रयोग हो जाता है। जैसे-

  • उसने बोलियाँ बोलीं।
  • ‘वह बोलियाँ बोला’- ऐसा भी लिखा या कहा जा सकता है।

यदि संयुक्त क्रिया का अन्तिम खण्ड अकर्मक होता है।  तो उसमें ‘ने’ का प्रयोग नहीं होता है।।जैसे-

  • मैं चल चुका।
  • वह पुस्तक ले आया।
  • उसे सामान  ले जाना है।

जिन वाक्यों में लगना, जाना, सकना तथा चुकना आदि  सहायक क्रियाएँ होती हैं उनमे ‘ने’ का प्रयोग नहीं होता।जैसे-

  • वह देख चुका।
  • मैं खाना खाने लगा।
  • उसे कल जाना हैं।

(2)कर्म कारक (Accusative/objective case)

वाक्य में जब क्रिया का फल कर्ता पर न पडकर किसी अन्य संज्ञा या सर्वनाम पर पडता है। तो उसे कर्म कारक कहतेहै

अर्थात कहने का तात्पर्य है कि—जिस संज्ञा या सर्वनाम पर क्रिया का प्रभाव पड़े उसे कर्म कारक कहते है।

अन्य शब्दों में —वह वस्तु या व्यक्ति जिस पर वाक्य में की गयी क्रिया का प्रभाव पड़ता है वह कर्म कहलाता है।कर्म कारक का विभक्ति चिन्ह ‘को’ होता है।

  • गोपाल ने राधा को बुलाया।
  • रामू ने घोड़े को पानी पिलाया।
  • माँ ने बच्चे को खाना खिलाया।
  • मेरे दोस्त ने कुत्तों को भगाया।उदाहरण :

दूसरे शब्दों में– वाक्य में क्रिया का फल जिस शब्द पर पड़ता है, उसे कर्म कारक कहते है।इसकी विभक्ति ‘को’ है।जैसे

  • राधा बच्चे को सुला रही है।

इस वाक्य में सुलाने की क्रिया का प्रभाव बच्चे पर पड़ रहा है। इसलिए ‘बच्चे को’ कर्म कारक है।

कर्म कारक के वाक्य में अन्य उदहारण

  • उसने श्याम को पढ़ाया।
  • राहुल ने चोर को पकङा।
  • लङकी ने लङके को देखा।
  • राम पुस्तक पढ़ रहा है।
  • मजदूरो ने मकान को गिरा दिया।

मुख्य बिन्दु

कर्म कारक की पहचान करने के लिए मुख्य क्रिया के सा​थ क्या लगाकर प्रश्न किया जाता है। जैसे

  • वह क्या पढता है?
  • उत्तर —पुस्तक
  • यह उत्तर कर्म है।

विशेष-

कर्म के साथ ’को’ विभक्ति आती है। इसकी यही मुख्य पहचान होती है। कभी-कभी को विभक्ति का लोप भी हो जाता है। जैसे

  • वह पुस्तक पढ़ता है।—( परसर्ग् नहीे)
  • उसने पुस्तक को पढ़ा—( परसर्ग को का प्रयोग)

कभी-कभी ‘को’ चिह्न का प्रयोग नहीं भी होता है। जैसे-

  • मोहन पुस्तक पढता है।
  • राधा नाचती है।
  • लता खाना खाती है।

कर्मकारक का प्रत्यय चिह्न ‘को’ है। बिना प्रत्यय के या अप्रत्यय कर्म के कारक का भी प्रयोग होता है।

समान्य रूप से —”बुलाना, सुलाना, कोसना, पुकारना, जगाना, भगाना” आदि क्रियाओं के कर्मों के साथ ‘को’ विभक्ति लगती है।जैसे-

  • मैंने राकेश को बुलाया।
  • सीता ने बच्चे को सुलाया।
  • शीला ने सावित्री को जी भर कोसा।
  • माता ने पुत्र को पुकारा।
  • हमने उसे खूब सबेरे जगाया।
  • लोगों ने शेरगुल करके डाकुओं को भगाया।

क्रिया ‘मारना’ का अर्थ जब ‘पीटना’ होता है तो तब कर्म के साथ को विभक्ति लगती है, जैसे-

  • लोगों ने चोर को मारा।
  • राम ने बैल को मारा।

लेकिन जब क्रिया मारना का अर्थ ‘शिकार करना‘ होता है तब वाक्य के साथ को विभक्ति नहीं लगती, अर्थात कर्म अप्रत्यय रहता है।
जैसे

  • पर- शिकारी ने बाघ मारा।
  • पर- मछुए ने मछली मारी।

बहुधा कर्ता में विशेष कर्तृत्वशक्ति जताने के लिए कर्म सप्रत्यय रखा जाता है।
जैसे-

  • मैंने यह कुआ खुदवाया है,
  • मैंने इस कुआ को खुदवाया है।
  • दोनों वाक्यों में अर्थ का अन्तर ध्यान देने योग्य है।

पहले वाक्य के कर्म से कर्ता में साधारण कर्तृत्वशक्ति का और
दूसरे वाक्य में कर्म से कर्ता में विशेष कर्तृत्वशक्ति का बोध होता है।

इस तरह के अन्य वाक्य के प्रयोग में भी को विभक्ति का पयोग किया जाता है-

  • शेर बकरी को खा गया,
  • मनीष ने ही पेड़ को काटा है,
  • लड़के ने फलों को तोड़ लिया इत्यादि।

जहाँ कर्ता में विशेष कर्तृत्वशक्ति का बोध कराने की आवश्यकता न हो, वहाँ सभी स्थानों पर कर्म को सप्रत्यय नहीं रखना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, जब कर्म निर्जीव वस्तु हो, तब ‘को’ का प्रयोग नहीं होना चाहिए। जैसे- ‘

  • राम ने रोटी को खाया’ की अपेक्षा ‘राम ने रोटी खायी ज्यादा अच्छा है।
  • मैं कॉंलेज को जा रहा हूँ
  • मैं आम को खा रहा हूँ
  • मैं कोट को पहन रहा हूँ

इन उदाहरणों में ‘को’ का प्रयोग बहुत ही भद्दा लग रहा है। प्रायः चेतन पदार्थों के साथ ‘को’ चिह्न का प्रयोग होता है और अचेतन के साथ नहीं। पर यह अन्तर वाक्य-प्रयोग पर निर्भर करता है।

कर्म सप्रत्यय रहने पर क्रिया सदा पुंलिंग होगी, किन्तु अप्रत्यय रहने पर कर्म के अनुसार होती है। ।
जैसे-

  • तुम्हारे बेटे ने किताब को फाडा——-(सप्रत्यय)
  • तुम्हारे बेटे ने किताब को फाड दिया— (अप्रत्यय)
  • राम ने रोटी को खाया ————–(सप्रत्यय)
  • राम ने रोटी खायी—————— (अप्रत्यय)।

यदि विशेषण संज्ञा के रूप में प्रयुक्त होंते है तो कर्म में ‘को’ अवश्य लगता है।
जैसे-

  • अपनो से बड़ों का पहले आदर करो ।
  • अपनों से छोटों को प्यार करना चाहिए।

को विभक्ति चिह्न भी बहुत-से स्थानों पर नहीं लगता। कार्य का फल अर्थात प्रभाव जिस पर पड़ता है, उसे कर्म कारक कहते हैं
जैसे –

  • राम ने आम को खाया।

इस वाक्य में ‘आम’ कर्म है, क्योंकि राम के कार्य (खाने) का प्रभाव आम पर पड़ा है।जैसे-

  1. मोहन ने साँप को मारा।
  2. लड़की ने पत्र लिखा।

पहले वाक्य में— ‘मारने’ की क्रिया का फल साँप पर पड़ा है। अतः साँप, कर्म कारक है। इसके साथ परसर्ग ‘को’ लगा है।
दूसरे वाक्य में —‘लिखने’ की क्रिया का फल पत्र पर पड़ा। अतः पत्र, कर्म है। इसमें कर्म कारक का हिंदी पर्याय ‘को’ नहीं लगा।

(3)करण कारक (Instrument case)

करण का अर्थ —साधन होता है।
कर्ता जिस साधन से क्रिया करता है। उसे करण कारक कहते है।

सरल शब्दों में— संज्ञा या सर्वनाम के जो रूप क्रिया होने के साधन या माध्यम होते है।उन्हें करण कारका कहते है।

अर्थात कहने का तात्पर्य करण कारक— ऐसे साधन को कहते है जिसमें क्रिया होती है और उसकी सहायता से किसी काम को अंजाम दिया जाता है। वह करण कहलाता है। करण कारक के दो विभक्ति चिन्ह होते है -“ से और के द्वारा”।उदाहरण :

  • मैने चाकू से सेब काटा। —इसमें चाकू सेब को काटने का साधन है।
  • वह बस द्वारा बगलौर जाता है। —यहॉं बस स्कूल जाने का साधन है।

अन्य शब्दों में— जिस वस्तु की सहायता से या जिसके द्वारा कोई काम किया जाता है, उसे करण कारक कहते है।

दूसरे शब्दों में- वाक्य में जिस शब्द से क्रिया के सम्बन्ध का बोध हो, उसे करण कारक कहते है।
इसकी विभक्ति ‘से’ है।
जैसे-

  • बच्चे गाड़ियों से खेल रहे हैं।
  • पत्र को कलम से लिखा गया है।
  • राम ने रावण को बाण से मारा।
    अमित सारी जानकारी पुस्तकों से लेता है।

मुख्य बिन्दु

हिन्दी में करणकारक के अन्य चिह्न है- से, द्वारा, के द्वारा, के जरिए, के साथ, के बिना इत्यादि।

इन चिह्नों में अधिकतर प्रचलित शब्द —से’, ‘द्वारा’, ‘के द्वारा’ ‘के जरिए’ इत्यादि ही है। के साथ’, के बिना’ आदि
साधनात्मक योग-वियोग जतानेवाले अव्ययों के कारण, साधनात्मक योग बतानेवाले ‘के द्वारा’ की ही तरह के करणकारक के चिह्न हैं।

करन’ का अर्थ है ‘साधन’। अतः ‘से’ चिह्न वहीं करणकारक का चिह्न है जहाँ यह साधन’ के अर्थ में प्रयुक्त हो।
जैसे-

  • मुझसे यह काम न सधेगा। यहाँ ‘मुझसे’ का अर्थ है ‘मेरे द्वारा’,

मुझ साधनभूत के द्वारा’ या ‘मुझ-जैसे साधन के द्वारा। अतः ‘साधन’ को इंगित करने के कारण यहाँ ‘मुझसे’ का ‘से’ करण का विभक्तिचिह्न है।

करणकारक का क्षेत्र अन्य सभी कारकों से विस्तृत है। इस कारण में अन्य समस्त कारकों से छूटे हुए प्रत्यय या वे पद जो अन्य किसी कारक में आने से बच गए हों, आ जाते है।

करण कारक के सबसे अधिक प्रत्ययचिह्न हैं। जिनमें ‘ने’ भी करण कारक का ऐसा चिह्न है जो करणकारक के रूप में संस्कृत में आये कर्ता के लिए ‘एन’ के रूप में कर्मवाच्य और भाववाच्य में आता है। लेकिन हिन्दी की प्रकृति ‘ने’ को सप्रत्यय कर्ताकारक का ही चिह्न मानती है।

करण कारक की पहचान और नियम

करन कारक और अपादान कारक दोनों विभक्तियों का चिह्न ‘से’ है, लेकित साधनभूत का प्रत्यय होने पर करण कारक माना जाता है, जबकि अलगाव का प्रत्यय होने पर अपादान।
जैसे-

  • दुकानदार तराजु से सामान तोलता है।
  • वह बस से घर पहुचॉं
  • वह कुल्हाड़ी से वृक्ष काटता है।
  • मुझे अपनी कमाई से खाना मिलता है।
  • साधुओं की संगति से बुद्धि सुधरती है।

यह पाचों वाक्य करण कारक के है।

  • तराजु से सामान तोला
  • बस से घर पहुचॉ।
  • पेड़ से फल गिरा।
  • घर से लौटा हुआ लड़का।
  • छत से उतरी हुई लता।

यह पाचों वाक्य अपादान के है।

यहॉं सप्रत्यय कर्ता कारक का चिह्न ‘ने’ है। लेकिन ‘से’, ‘के द्वारा’ और ‘के जरिये’ हिन्दी में प्रधानत करणकारक के ही प्रत्यय माने जाते है; क्योंकि ये सारे प्रत्यय ‘साधन’ अर्थ की ओर इंगित करते हैं।
जैसे-

  • मुझसे यह काम न सधेगा।
  • उसके द्वारा यह कथा सुनी थी।
  • आपके जरिये ही घर का पता चला।
  • तीर से बाघ मार दिया या।
  • मेरे द्वारा मकान ढहाया गया था।

यदि एकवचन करणकारक में भूख, प्यास, जाड़ा, आँख, कान, पाँव इत्यादि शब्द सप्रत्यय में होते है। तो वह एकवचन होते है ,और अप्रत्यय में रहते है वह तो बहुवचन।

जैसे-

  • वह भूख से बेचैन है;………… वह भूखों बेचैन है;
  • लड़का प्यास से मर रहा है;………… लड़का प्यासों मर रहा है।
  • स्त्री जाड़े से काँप रही है;…………. स्त्री जाड़ों काँप रही है।
  • मैंने अपनी आँख से यह घटना देखी;…….. मैंने अपनी आँखों यह घटना देखी।
  • कान से सुनी बात पर विश्र्वास नहीं करना चाहिए;………. कानों सुनी बात पर विश्र्वास नहीं करना चाहिए
  • लड़का अब अपने पाँव से चलता है;…………. लड़का अब अपने पाँवों पर चलता है।

अपादान का भी विभक्तिचिह्न ‘से’ है। जिसमें अपादान’ का अर्थ है ‘अलगाव की प्राप्ति’ को सम्बोधित करता है।अतः अपादान का ‘से’ चिह्न अलगाव के संकेत का प्रतीक है, जबकि करन का, अपादान के विपरीत, साधना का, साधनभूत लगाव का।

जैसे-

  • पेड़ से फल गिरा’,
  • मैं घर से चला’ आदि

वाक्यों में ‘से’ प्रत्यय ‘पेड़’ को या घर को ‘साधन’ नहीं सिद्ध करता, बल्कि इन दोनों से अलगाव सिद्ध करता है।

अतः इन दोनों वाक्यों में ‘घर’ और ‘पेड़’ के आगे प्रयुक्त ‘से’ विभक्तिचिह्न अपादानकारक का है और इन दोनों शब्दों में लगाकर इन्हे अपादानकारक का ‘पद’ बनाता है।

(4)सम्प्रदान कारक (Dative case)

– सम्प्रदान का अर्थ है— देना होता है।—वाक्य में कुछ दिया जाए या किसी के लिए कुछ किया जाए, इसका बोध कराने वाले शब्द के रूप को सम्प्रदान कारक कहते है।

दूसरे शब्दों में- संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से किसी को देने या किसी के लिए कुछ कार्य करने का पता चलता है। उसे सम्प्रदान कारक कहते है।

अर्थात कहने का मतलब है कि—जिसके लिए कोई क्रिया (काम )की जाती है,उसे सम्प्रदान कारक कहते है।इसकी विभक्ति ‘को’ और ‘के लिए’ है।
जैसे-

  • श्याम मीरा के लिए खिलौने लाया।
  • राकेश शीला के लिए रोता है।
  • शिष्य ने अपने गुरु के लिए सब कुछ किया।
  • गरीब को धन दीजिए।
  • वह अरुण के लिए मिठाई लाया।’

इन वाक्यों में लाना और रोना क्रियाएँ क्रमशः मीरा और शीला के लिए सम्पादित की जा रही हैं। इसलिए मीरा और शीला केलिए शब्द रूप सम्प्रदान कारक है।  अन्य वाक्य में लाने का काम ‘अरुण के लिए’ हुआ। इसलिए ‘अरुण के लिए’ सम्प्रदान कारक है।

अन्य उदहारणों

  • माँ अपने बच्चे के लिए दूध लेकर आई।
  • विकास ने तुषार को गाडी दी।
  • मैं हिमालय को जा रहा हूँ।
  • रमेश मेरे लिए कोई उपहार लाया है।

विशेष

साधारणतः जिसे कुछ दिया जाता है या जिसके लिए कोई काम किया जाता है, वह पद सम्प्रदानकारक का होता है।जैसे-

  • भूखों को अत्र देना चाहिए और प्यासों को जल।
  • गुरु ही शिष्य को ज्ञान देता है।

प्रत्ययवाले अव्यय भी सम्प्रदानकारक के प्रत्यय है। जैसे-‘के हित’, ‘के वास्ते’, ‘के निर्मित’ आदि

  • राम के हित लक्ष्मण वन गये थे।
  • तुलसी के वास्ते ही जैसे राम ने अवतार लिया।
  • मेरे निर्मित ही ईश्र्वर की कोई कृपा नहीं।

कर्म और सम्प्रदान का एक ही विभक्ति के प्रत्यय है इन दोनों में को के अर्थो में अन्तर है

सम्प्रदान का ‘को’, ‘के लिए’ अव्यय के स्थान पर या उसके अर्थ में प्रयुक्त होता है, जबकि कर्म के ‘को’ का ‘के लिए’ अर्थ से कोई सम्बन्ध नहीं है।
नीचे लिखे वाक्यों के द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है

  • कर्म- हरि मोहन को मारता है।……… (सम्प्रदान)– हरि मोहन को रुपये देता है।
  • कर्म- उसके लड़के को बुलाया।…….... (सम्प्रदान)– उसने लड़के को मिठाइयाँ दी।
  • कर्म- माँ ने बच्चे को खेलते देखा।……. (सम्प्रदान)– माँ ने बच्चे को खिलौने खरीदे।

 

(5)अपादान कारक(Ablative case)

जिससे किसी वस्तु का अलग होना पाया जाता है,उसे अपादान कारक कहते है।

दूसरे शब्दों में- संज्ञा के जिस रूप से किसी वस्तु के अलग होने का भाव प्रकट होता है, उसे अपादान कारक कहते है। इसकी विभक्ति ‘से’ है।

सरल शब्दों में—अपादान का अर्थ है— अलग होना। जिस संज्ञा अथवा सर्वनाम से किसी वस्तु का अलग होना ज्ञात हो, उसे अपादान कारक कहते हैं।

करण कारक की भाँति अपादान कारक का चिन्ह भी ’से’ है, परन्तु करण कारक में इसका अर्थ सहायता के लिए होता है और अपादान में अलग होने के लिए होता है।
उदाहरणार्थ –

  • हिमालय से गंगा निकलती है।
  • पेड़ से पत्ते गिरते हैं।
  • घुङसवार घोङे से गिरता है।

इन वाक्यों में ’हिमालय से’, ’वृक्ष से’, ’घोङे से’ अपादान कारक है।

अन्य उदहारण

  • शारदा नहर गंगा नदी से निकली है।
  • पक्षी आकाश से नीचे गिरा।

इन वाक्यों में निकलना और गिरना क्रियाओं के अलग होने का भाव क्रमशः गंगा नदी और पक्षी से स्पष्ट हो रहा है। अतएव इन दोनों शब्दों की स्थिति अपादान कारक में है।

मुख्य बिन्दु तथा महत्वपूर्ण तथ्य

इसके अलावा भय या भय जैसे अन्य भावों डरने,लज्जित होने आदि का बोध होता है। जैसे

  • वृक्ष से टहनी गिरी।
  • पत्ता पेड से गिर पडा।
  • तुम दरवाजे से बहार मत निकलना।
  • सुरेश छत से गिर गया।
  • सांप बिल से बाहर निकला।
  • आसमान से बिजली गिरती है।

अपादान कारक में दुरी का बोध होता है। जैसे

  • मो​हन मथुरा से आज ही आया है।
  • राधा विद्यालय से घर चली गई है।
  • पृथ्वी सूर्य से बहुत दूर है।

जिस शब्द में अपादान की विभक्ति लगती है, उससे किसी दूसरी वस्तु के पृथक होने का बोध होता है। जैसे-

  • अचानक पेढ से एक आम नीचे गिरा।
  • अध्यापक ने मुरारी को कक्षा से बहार निकाल दिया।
  • आप बस से नीचे उतर आइए।
  • वह छत से गिर पडा।
  • गंगा हिमालय से निकलती है।
  • मोहन ने घड़े से पानी ढाला।
  • बिल्ली छत से कूद पड़ी
  • चूहा बिल से बाहर निकला।

करण और अपादान के ‘से’ प्रत्यय में अर्थ का अन्तर करणवाचक के प्रसंग में बताया जा चुका है।

(6)सम्बन्ध कारक(Genitive Case)

जहॉं दो संज्ञा एक सर्वनाम और संज्ञा के बीच संबंध दिखाया जाता है। व​हॉं वे संज्ञा और सर्वनाम संबंध कारक में होते है।

सरल शब्दों में —शब्द के जिस रूप से संज्ञा या सर्वनाम के संबध का ज्ञान हो, उसे सम्बन्ध कारक कहते है।

दूसरे शब्दों में— संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से किसी अन्य शब्द के साथ सम्बन्ध प्रकट होता है, उसे सम्बन्धकारक कहते है।

अन्य शब्दों में—संज्ञा या सर्वनाम शब्द के जिस रूप से किसी एक व्यक्ति/वस्तु या पदार्थ का दूसरे व्यक्ति/वस्तु या पदार्थ से संबंध का पता चले उसे संबंध कारक कहते हैं। इसके विभक्ति चिन्ह “का, के, की, रा, रे, री “आदि होते हैं। इसकी विभक्तियाँ संज्ञा, लिंग, वचन के अनुसार बदल जाती हैं।
जैसे-

  • पूर्वा का भाई।
  • राम की बहन।
  • निखिल के पिता जी।

इस वाक्य में पूर्वा तथा भाई दोनों शब्द संज्ञा है। भाई से पूर्वा का संबध दिखाया गया है। वह किसका भाई है ? पूर्वा का। इसलिए पूर्वा का संबध कारक है ।

संबंध का लिंग-वचन संबद्ध वस्तु के अनुसार होता है। प्रत्यय का रूप ‘रा’, ‘री’, ‘रे’ या ‘ना’, ‘नी’, ‘ने’ भी होता है।

रा’, ‘री’, ‘रे’ के उदहारण इस प्रकार है।
जैसे-

  • मेरा घर ,
  • मेरी पुस्तक,
  • मेरे कपडें

ना’, ‘नी’, ‘ने’ के उदहारण इस प्रकार है।
जैसे-

  • अपना लड़का,
  • अपनी लड़की,
  • अपने लड़के। आदि

सम्बन्धकारक का विभक्तिचिह्न ‘का’ है। वचन और लिंग के अनुसार इसकी विकृति ‘के’ और ‘की‘ है। इस कारक से अधिकतर कर्तृत्व, कार्य-कारण, मोल-भाव, परिमाण इत्यादि का बोध होता है।
जैसे-

  • अधिकतर- राम की किताब, श्याम का घर।
  • कर्तृत्व- प्रेमचन्द्र के उपन्यास, भारतेन्दु के नाटक।
  • कार्य-करण- चाँदी की थाली, सोने का गहना।
  • मोल-भाव- एक रुपए का चावल, पाँच रुपए का घी।
  • परिमाण- चार भर का हार, सौ मील की दूरी, पाँच हाथ की लाठी।

सर्वनाम की स्थिति में सम्बन्धकारक का प्रत्यय रा-रे-री और ना-ने-नी हो जाता है। जैसे

  • मेरा लड़का,
  • मेरी लड़की,
  • तुम्हारा घर,
  • तुम्हारी पगड़ी,
  • अपना काम,
  • अपने लोग
  • अपनी रोजी।

विशेष

बहुधा सम्बन्धकारक की विभक्ति के स्थान में ‘वाला’ प्रत्यय भी लगता है। जैसे-

  • राधा वाली किताब,
  • कुवंर वाला घर,
  • मुंशी प्रेमचन्द वाले उपन्यास,
  • चाँदीवाली थाली इत्यादि।

सम्बन्धकारक विभक्तियों का प्रयोग कुछ मुहावरों में भी किया जाता है।

अ —-शब्द के रूप में मुहावरों का प्रयोग
जैसे-

  • दिन के दिन,
  • महीने के महीने
  • दीवाली की दीवाली
  • होली की होली,
  • रात की रात
  • दोपहर के दोपहर इत्यादि।

आ—— शब्द के रूप में मुहावरों का प्रयोग

  • कान का कच्चा,
  • बात का पक्का,
  • आँख का अन्धा,
  • गाँठ का पूरा,
  • बात का धनी,
  • दिल का सच्चा इत्यादि।

इ—— शब्द के रूप में मुहावरों का प्रयोग

  • वह अब आने का नहीं,
  • मैं अब जाने का नहीं,
  • वह टिकने का नहीं इत्यादि।

दूसरे कारकों के अर्थ में भी सम्बन्धकारक की विभक्ति लगती है। जैसे-

  • जन्म का भिखारी= जन्म से भिखारी (करण),
  • हिमालय का चढ़ना= हिमालय पर चढ़ना (अधिकरण)।

सम्बन्ध, अधिकार और देने के अर्थ में बहुधा सम्बन्धकारक की विभक्ति का प्रयोग होता है। जैसे

  • गोविंद को बाल-बच्चा नहीं हैं।
  • श्याम के घर बहन हुई है।
  • राजा के आँखें नहीं होती, केवल कान होते हैं।
  • रावण ने विभीषण के लात मारी।
    ब्राह्मण को दक्षिणा दो।

 

(7)अधिकरण कारक (Locative case)

 अधिकरण का अर्थ है——क्रिया के घटित होने का आधार।

क्रिया जिस स्थान या समय पर घटित होती है वह स्थान या समय संबंधी आधार अधिकरण कहा जाता है।आधार या समय को बताने वाली संज्ञा अधिकरण कारक में होती ​है।

सरल शब्दों में—— संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया के समय,स्थान,आधार आदि का बोध होता है। अर्थात शब्द के जिस रूप से क्रिया के आधार का ज्ञान होता है,उसे अधिकरण कारक कहते है।

दूसरे शब्दों में- क्रिया या आधार को सूचित करनेवाली संज्ञा या सर्वनाम के स्वरूप को अधिकरण कारक कहते है।इसकी विभक्ति ‘में’ और ‘पर’ हैं।
जैसे-

  • बच्चे छत पर खेल रहे है।
  • दीवार पर एक पुरानी घडी टंगी है।

इस वाक्य में ‘खेलने’ की क्रिया किस स्थान पर हो रही है ?छत पर। इसलिए मैदान पर अधिकरण कारक है।

दूसरा उदाहरण-

  • घर पर माँ है।
  • घोंसले में चिङिया है।
  • सङक पर गाङी खङी है।
    कागज घर पर रखे हैं।

यहाँ ’घर पर’, ’घोंसले में’, और ’सङक पर’ घर पर अधिकरण है।

तीसरा उदहारण

  • मनमोहन मैदान में खेल रहा है।”

इस वाक्य में ‘खेलने’ की क्रिया किस स्थान पर हो रही है? —–‘मैदान मे’ । इसलिए ‘मैदान मे’ अधिकरण कारक है।

विशेष या मुख्य बिन्दु

समय के संदर्भ में अधिकरण कारक में, को आदि परसर्ग लगते है। जैसे

  • वे आज शाम को आएॅंगे।
  • वे लोग रात को चलेंगे।
  • वह एक सप्ताह में आ जाएगी।
  • हम अक्टुबर में मुंबई गए थे।

कभी-कभी में के अर्थ में ——पर’ और ‘पर’ के अर्थ में ——’में’ का प्रयोग होता है। अर्थात में और पर आपय में संबंध स्थापित करते है।जैसे-

  • आपके घर पर चार आदमी हैं=घर में।
  • दूकान पर कोई नहीं था =दूकान में।
  • नाव जल में तैरती है =जल पर।

इसके अलावा अधिकरण कारक में —से परसर्ग का प्रयोग पाया जाता है।

  • बच्चा घबराकर मॉं के सीने से लग गया।
  • दोनों दोस्त गले से लग गए

कभी-कभी अधिकरणकारक की विभक्तियों का लोप भी हो जाता है। जैसे-

  • इन दिनों वह पटने है।
  • वह सन्ध्या समय गंगा-किनारे जाता है।
  • वह द्वार-द्वार भीख माँगता चलता है।
  • लड़के दरवाजे-दरवाजे घूम रहे हैं।
  • जिस समय वह आया था, उस समय मैं नहीं था।
  • उस जगह एक सभा होने जा रही है।

सप्रत्यय अधिकरणकारक में पद स्वयं जैसे —”किनारे, आसरे और दिनों” आदि का प्रयोग होता है। लेकिन “यहाँ, वहाँ, समय” आदि पदों का अर्थ सप्रत्यय अधिकरणकारक का है।

अतः इन पदों की स्थिति में अधिकरणकारक का प्रत्यय नहीं लगता।

(8)संबोधन कारक(Vocative case)

वक्ता द्वारा जिस संज्ञा को सम्बोधित किया जाता है। वह संबोधन कारक में होती है। कहने का अर्थ है कि——जिस संज्ञा या सर्वनाम का प्रयोग सबोंधन के रूप में किया जाता है, उसे संबोधन कारक कहते है।

दूसरे शब्दों में-संज्ञा के जिस रूप से किसी के पुकारने या संकेत करने का भाव पाया जाता है, उसे संबोधन कारक कहते है

अन्य शब्दों में–जिन शब्दों का प्रयोग किसी को बुलाने या पुकारने में किया जाता है, इसमें संज्ञा या सर्वनाम को प्रकट करने से पहले अरे,अरा,रे,हे आदि शब्द लगते है।
जैसे-

  • हे !भगवान’मेरी मदद करो।
  • रे! भैया सडक परा तो करा दो।
  • रमा! देखो कैसा सुन्दर दृश्य है।
  • लङके! जरा इधर आ।

विशेष

इनके आगे विस्मयादिबोधक चिह्न! का प्रयोग किया जाता है। जैसे-

  • बाप रे!कितना तेज भूकंप था।

इनमें कोई सम्बोधनकारक की विभक्ति नहीं होती है —जैसे

  • रीना को मत मारो।
  • राधा अपना काम करो।

कारकों में आपस में अंतर

1).कर्म और सम्प्रदान कारक में अन्तर

  • कर्म कारक में क्रिया का फल कर्म पर पडता है।
  • सम्प्रदान कारक में कर्ता देने का कार्य करता है।

कर्म और सम्प्रदान कारक दोनों कारकों में ‘को’विभक्ति का प्रयोग होता है तथापि दोनों के प्रयोग में भी अन्तर होता है तथा को विभक्ति के कारण भूल होने की सम्भावना बनी रहती ​है।

कर्म कारक वाक्य के उस पद प्रयुक्त में होता है जिसमें कर्ता द्वारा की गयी क्रिया का फल पड़ता है।
जैसे-

  • मैंने महेश को पढ़ाया। वाक्य में क्रिया का कर्ता ‘मैं’ है और क्रिया‘पढ़ाना’ । पढ़ाना क्रिया के कर्ता का फल ‘महेश’ पर पड़ रहा है। इसलिए ‘महेश’ कर्म कारक है

सम्प्रदान कारक में कर्ता जिसके लिए क्रिया का सम्पादन करता है अथवा जिसको कुछ देता है, उसे प्रकट करने वाले शब्द को सम्प्रदान कारक की स्थिति में माना जाता है। जैसे-

  • यशोदा ने कृष्ण को बॉंसूरी दी। इस वाक्य में देना क्रिया को ‘कृष्ण’ के लिए पूरा किया गया। अतः ‘कृष्ण’ सम्प्रदान कारक है।

विशेष

  • कर्म कारक में देने का काम नहीं होता सम्प्रदान कारक में होता है।
  • कर्म कारक में किसी के लिए काम नहीं किया जाता । सम्प्रदान कारक में किया जाता है।

निम्नलिखित उदहारणों के द्वारा अतंर स्पष्ट किया गया है।

  • यशोदा ने कृष्ण को पुकारा।——(कर्म कारक)
  • यशोदा ने कृष्ण को बॉंसुरी दी।—-(सम्प्रदान कारक)
  • दादाजी ने ललित को कंम्यूटर सिखाया।—–(कर्म कारक)
  • दादाजी ने ललित को कंम्यूटर खरीद कर दिया।—-(सम्प्रदान कारक)
  • राम ने तार को हिलाया।——–(कर्म कारक)
  • राम ने सोहन को तार पकडाई।—-(सम्प्रदान कारक)

करण कारक और अपादान कारक में अन्तर

करण कारक और अपादान कारक दोनों ही कारकों की विभक्ति ‘से है। किन्तु दोनों में पर्याप्ति अन्तर परिलक्षित होता है।

करण कारक में कर्ता के कार्य का बोध होता है। लेकिन अपादान में ऐसा नहीं होता है।जैसे—

  • अनीता धागे से कढाई कर रही है।—(करण कारक )
  • अनीता ने सूई से धागा निकाला।—–(अपादान कारक)
  • सुषमा ने घी से पुरी तली।——-(करण कारक )
  • सुषमा ने कडाही से पूरी निकाली—-(अपादान कारक)

करण कारक से अलग होने की तुलना का बोध नहीं होता ।,अपादान कारक के साथ अलग होने का बोध होता है।  जैसे—

  • राधा रिंकु से अधिक शरारती है।—–(अपादान कारक)
  • राधा रसोई से निकली।—--(करण कारक )
  • कमल सुमन से समझदार है।——(अपादान कारक)
  • कमल कुरसी से गिर गया—–-(करण कारक )

करण कारक का प्रयोग उस पद या वाक्य में किया जाता है जो क्रिया को सम्पादित करने में साधन के रूप में कर्ता का सहायकार होकर वाक्य में प्रयुक्त होता है।
जैसे-

  • राम ने बाण से रावण को मारा।
  • राधा ने श्याम से पुस्तक पढने में मदद ली।
  • मोहन मथुरा से अभी आया है।

इस वाक्य में ‘बाण’ करण कारक की अवस्था में है, क्योंकि बाण की सहायता से राम ने रावण के मारने के कार्य को पूर्णता प्रदान की।

दूसरी ओर अपादान कारक का प्रयोग उस पद में होता। है जो वाक्य में पार्थक्य सूचित करता है।
जैसे-

  • गंगा हिमालय से निकलती है।
  • पेड से कई आम गिरते है।

यहाँ गंगा के निकलने का काम हिमालय से हो रहा है, अतः हिमालय अपादान कारक के रूप में वाक्य में प्रयुक्त हुआ है।