उपसर्ग की परिभाषा,अर्थ, प्रकार/भेद,एंवम् उदाहरण (Upsarg in Hindi)

उपसर्ग की भूमिका(Introduction of Prefixes)

ब्दों की रचना उसी भाषा को बोलने वाले लोग करते है। जो उस भाषा का प्रयोग करते है। बताया जाता है कि— किसी व्यक्ति ने सबसे पहले किसी वस्तु को देखा और उसका कोई नाम तय कर दिया।
धीरे धीरे उस नाम को सारे समाज ने स्वीकार कर लिया और सभी उस वस्तु को उसी नाम से पुकारने लगे। नई-नई खोजों और शोध के परिणामस्वरूप भाषा में नई- नई संकल्पनाएॅं नए -नए विचार आते रहते हैं ,जिनके लिए हमें नए-नए शब्द बनाने की आवश्यकता होती है।

भारत सरकार की एक संस्था जिसका नाम “तकनीकी शब्दावली आयोग‘ है, जिसका कार्य नई नई संकल्पनाओं के लिए नए- नए शब्दों का निर्माण करना है।
भाषा में एक शब्द से दूसरा शब्द बनाए जाने की प्रक्रिया ही शब्द रचना या शब्द निर्माण कहलाती है।
उदहारण के लिए,

  • योग्य शब्द के प्रारंभ में” वि” जोडकर—-वियोग,
  • अंत में जोडकर—– —————वियोगी तथा
  • आसन शब्द जोडकर —————–योगासन शब्द बना सकते है।

भाषा में शब्द— रचना की प्रकिया तीन प्रकार से हो सकती है—

  • मूल शब्द के” प्रारंभ” में कोई अंश जोडकर,
  • मूल शब्द के “अंत” में कोई अंश जोडकर,
  • दो शब्दों” को जोडकर । इस तरह भाषा में शब्द रचना तीन तरह से हो सकती है।

इनको कुछ उदहारण के द्वारा समझते है।
जैसे—

  • नि+कुंज—— निकुंज
  • सु+ पुत्र—— सुपुत्र
  • सर+पंच—— सरपंच
  • अभि+नेता—— अभिनेता

इन उदहारणों में कुंज,पुत्र,पंच, और अभि शब्दों से पहले कुछ शब्दांश जोडकर नए शब्द बनाए है। जैसे—”नि,सु,सर और अभि” ऐसे शब्दांश है। जिन्होने मूल शब्दों से पहले जुडकर उनके अर्थ में परिवर्तन ला दिया है। इन शब्दांश को उपसर्ग कहते है।

उपसर्ग की परिभाषा ( Definition of Prefixes)

भाषा के वे लघुत्तम अर्थवान खंड है। जो शब्दों के आरम्भ में लगकर नए नए शब्दों की रचना करते है। इसका तात्पर्य है कि उपसर्ग भाषा की सबसे छोटी इकाई है। जिसके और अधिक अर्थवान खंड नहीं किए जा सकते है। शब्दों की तरह ये भी अर्थवान होते है। परंतु जहॉं शब्द भाषा में स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त हो सकते है। वही उपसर्ग हमेशा किसी ना किसी शब्द के साथ आबद्ध होकर ही प्रयुक्त होते है। इसलिए ये बद्ध रूप कहलाते है।
जैसे

  • पर+दादा— परदादा
  • चौ+राहा —चौराहा
  • अध+मरा—अधमरा

दूसरे शब्दों में——वह शब्दांश जो किसी शब्द के पूर्व अथवा पहले लगकर उस शब्द का अर्थ बदल देते हैं अथवा उसमें नई विशेषता उत्पन्न कर देते हैं ऐसे शब्दांश उपसर्ग कहलाते हैं.

अर्थात कहने का तात्पर्य है कि— लघुत्तम सार्थक शब्द खंड जो अन्य शब्दों के आदि में जुड़ कर उनका अर्थ बदल देते हैं ,उपसर्ग कहलाते हैं.

जो अक्षर या अक्षर समूह शब्द से पूर्व में लगाया जाता है वह उपसर्ग कहलाता हैं जैसे सु + पुत्र =
सुपुत्र .

यहाँ “सु” शब्दांश “पुत्र” शब्द के साथ जुड़कर नए शब्द का निर्माण हुआ हैं. यहाँ ‘सु’ शब्दांश हैं शब्द नहीं हैं. शब्द वाक्य में स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त हो सकता हैं, शब्दांश नहीं. शब्दांश तो केवल किसी शब्द से जुड़कर ही नए अर्थ की रचना में सहायक होते हैं.

उपसर्ग का अर्थ(Meaning of prefixes)

भाषा के वे लघुत्तम अर्थवान,बद्ध—रूप जो शब्दों के प्रारंभ में लगकर नए नए शब्दों की रचना करते है। वे उपसर्ग कहलाते है।
अन्य शब्दों में—— जो शब्दांश किसी शब्द के आरंम्भ में जुडकर उसके अर्थ में परिवर्तन ला देते है। उन्हें उपसर्ग कहते है।
दूसरे शब्दों में ——उपसर्ग उस शब्दांश या अव्यय को कहते है, जो किसी शब्द के पहले आकर उसका विशेष अर्थ प्रकट करता है। वह उपसर्ग होता है।

उपसर्ग दो शब्दों से मिलकर बना है ——उप+सर्ग | उप का अर्थ है – समीप, निकट’ या ‘पास में’ है। और सर्ग का अर्थ – सृष्टि करना|

उपसर्ग का अर्थ हुआ—— किसी शब्द के समीप आ कर नया शब्द बनाना/निर्माण करना।, या पास में बैठाकर दूसरा नया अर्थवाला शब्द बनाना। हार’ के पहले ‘प्र’ उपसर्ग लगा दिया गया, तो एक नया शब्द ‘प्रहार’ बन गया, जिसका नया अर्थ हुआ ‘मारना’ । उपसर्गो का स्वतन्त्र अस्तित्व न होते हुए भी वे अन्य शब्दों के साथ मिलाकर उनके एक विशेष अर्थ का बोध कराते हैं।पसर्ग शब्द के पहले आते है। जैसे– ‘अन’ उपसर्ग ‘बन’ शब्द के पहले रख देने से एक शब्द ‘अनबन ‘बनता है, जिसका विशेष अर्थ ‘मनमुटाव’ है। कुछ उपसर्गो के योग से शब्दों के मूल अर्थ में परिवर्तन नहीं होता, बल्कि तेजी आती है। जैसे- ‘भ्रमण’ शब्द के पहले ‘परि’ उपसर्ग लगाने से अर्थ में अन्तर न होकर तेजी आयी। कभी-कभी उपसर्ग के प्रयोग से शब्द का बिलकुल उल्टा अर्थ निकलता है।

उपसर्ग के भेद(Types of prefixes)

हिंदी में प्रचलित उपसर्गो को निम्नलिखित भागो में विभाजित किया जा सकता है।

उपसर्ग के भेद/ संख्या
हिंदी में प्रचलित उपसर्गो को निम्नलिखित भागो में विभाजित किया जा सकता है-

  • तत्सम उपसर्ग — संस्कृत के उपसर्ग—( संख्या—22)
  • तद्भव उपसर्ग— हिंदी के उपसर्ग——(संख्या—13)
  • आगत उपसर्ग — अरबी—फारसी (उर्दू के) उपसर्ग—— (संख्या —19)
  • अंग्रेजी के उपसर्ग(गणना में नहीं है। )
  •  उपसर्गवत् — उपसर्ग के समान प्रयुक्त होने वाले सस्ंकृत के अव्यय—— (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण)

(1) तत्सम उपसर्ग — संस्कृत के उपसर्ग—

इनकी संख्या—22 होती है। हिंदी में जब अनेक तत्सम शब्द आए तो उनके साथ अनेक उपसर्ग भी आए हिंदी में इनका प्रयोग तत्सम शब्दों के साथ लगकर भी किया जाता है। ये तत्सम उपसर्ग है। इनका प्रयोग हिंदी में संस्कृत से आए उपसर्गों के साथ किया जाता है। इन उपसर्गों से बने अनेक शब्द में हिंदी में मिलते हैं हिंदी में प्रयुक्त संस्कृत उपसर्ग निम्नलिखित है।ये नीचे दिए गए हैं:
“प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आ (आं), नि, अधि, अपि, अति, सु, उत् /उद्, अभि, प्रति, परि तथा उप।

इन सभी उपसर्गों का अर्थ तथा वाक्य में प्रयोग नीचे तालिका में दी गई है।

उपसर्गअर्थउपसर्ग से बने शब्द
अतिअधिक, ऊपर, उस पारअतिरिक्त, अत्यंत, अतिक्रमण, अत्युत्तम, अत्याचार, अतिकोमल, अतिशय,अत्याधिक, अत्याधुनिक, अत्यल्प, अतिवृष्टि,अतिकाल,अतिकर्मण, , अतिशय, अत्युक्ति, अतिक्रमण, इत्यादि
अधि
श्रेष्ठ ऊपरअधिनायक, अधिकार, अध्यादेश, अधिपति, अधिकृत, अधिकरण, अधिवास, अधिक, अधिशुल्क, अध्ययन,अधिराज, अध्यात्म, अध्यक्ष, अधिपति इत्यादि।।
अभावअज्ञान, अधर्म, अस्वीकार इत्यादि।
अनुपीछे, समानता, क्रम, पश्र्चातअनुज, अनुचर, अनुगामी, अनुराग, अनुकूल, अनुसार, अनुभूति, अनुगमन, अनुसंधान, अनुकरण, अनुभव, अनुरोध, अनुशासन, अनुवाद, अनुरूप, अनुकंपा, अनुग्रह, अनुपात, अनुवाद, अनुचर, अनुकरण,, अनुस्वार, अनुशीलन इत्यादि।
ओर, सीमा, समेत, कमी, विपरीत,तक,आरक्षण, आमरण, आदान, आगमन, आहार, आक्रमण, आजीवन, आजन्म, आकर्षण, आचरण, आसेतु, आकंठ आकाश, आदान, आजीवन, आगमन, आरम्भ, आचरण, आमुख, आकर्षण, आरोहण इत्यादि।
अवहीनता, अनादर, पतनअवकाश, अवमूल्यन, अवसान, अवसर, अवज्ञा, अवसाद अवगत, अवलोकन, अवनत, अवस्था, अवसान, अवज्ञा, अवरोहण, अवतार, अवनति,अवशेष,अवनति, अवगुण, अवचेतन, अवशेष,अवतरण,इत्यादि।
उपनिकटता, सदृश, गौण, सहायक,हीनता,समानउपनगर, उपकरण, उपग्रह, उपनाम, उपमंत्री, उप प्रधानमंत्री, उप मुख्यमंत्री, उपकृत, उपसचिव, उपदेश, उपसर्ग, उपमेय, उपमान, उपकार, उपस्थित, उपचार, उपसंहार, उपहार, उपयोग,उपवन,उपकार, उपकूल, उपनिवेश, उपदेश, उपस्थिति, उपवन, उपनाम, उपासना, उपभेद इत्यादि।
निभीतर, नीचे, अतिरिक्तनिरोध, निवास, नियोग, निवारण, निषेध, निबंध, नियम, निपात, निकृष्ट, नियुक्त, निरूपण, निगमन, निहार, निडर, निगम, निवास, निदान, निहत्थ, निबन्ध, निदेशक, निकर, निवारण निदर्शन, निपात, नियुक्त, निवास, निरूपण, निवारण, निम्र, निषेध, निरोध, निदान, निबन्ध इत्यादि।
निर्बाहर, निषेध, रहित निर्वास,निरपराध, निर्जीव ,निराकरण, निर्भय, निरपराध, निर्वाह, निर्दोष, निर्जीव, निरोग, निर्मल,निर्जन, निर्णय, निर्मल, निर्वाह, निर्भय, निर्धन, नियति, निष्काम, निष्कपट,निश्छल, निस्तेज, निश्चय, निश्चल, निसंदेह, निर्माणी, निराशा, निष्कलंक, निरहुआ, निर्गुण, निर्विघ्न, निरोग, इत्यादि।
पराउलटा, अनादर, नाशपराजय, पराभव, पराक्रम, परामर्श, पराधीन, पराभूत, परास्त, पराकाष्ठा, पराशर, परावर्तन इत्यादि।
परिआसपास, चारों ओर, पूर्णपरिक्रमा, परिजन, परिणाम, परिधि, परिपूर्ण परीक्षा, परिचालक, परिष्कार, परिकल्पना, परिचायक, परिपक्व, परिपूर्ण, परीक्षा, परिणाम, परिवर्तन, पर्यटन, परिधि, परिवार इत्यादि।
प्रअधिक, आगे, ऊपर, यशप्रकार, प्रकृति, प्रसार, प्रस्थान,परिणाम,प्रक्रिया, प्रवाह, प्रमाण, प्रहार, प्रताप, प्रभाव, प्रसिद्धि, प्रयत्न, प्रबल, प्रस्ताव, प्राध्यापक, प्राचार्य, प्रदर्शनी,प्रयोग, प्रलय,प्रख्यात, प्रचार,, प्रभु, प्रयोग, प्रगति, प्रसार, प्रयास , प्रकाश इत्यादि।
प्रति विरुद्ध, सामने ,विरोध, बराबरी,
प्रतिकार, प्रतिकूल, प्रतिध्वनी, प्रतिनिधि, अध्यक्ष, प्रतिरोध, प्रतिरोध, प्रतिवादी, प्रतिदिन, प्रतिहिंसा, प्रतिष्ठा, प्रतिदान, प्रत्यागम, प्रतिवाद,प्रत्येक, परिवर्तन प्रतिक्षण, प्रतिनिधि, प्रतिकार, प्रत्येक, प्रतिदान, प्रतिकूल, प्रत्यक्ष इत्यादि।
वि विशिष्ट, भिन्न,भित्रता, हीनता, असमानता, विशेषताविकार, विवाद, विदेश, विनाश, सुयोग, विशिष्ट, विरोध, विकास, विभाग, विश्वयुद्ध, विराम, विपक्ष, विनय, विजय, विज्ञान, विश्व, विख्यात, विज्ञप्ति, विजय, विलक्षण, विज्ञान, विधवा, विवाद, विशेष, विस्मरण, विराम, वियोग, विभाग, विकार, विमुख, विनय, विनाश इत्यादि।
सम्पूर्णता, साथ, अच्छा, संयोगसंकल्प, संग्रह, सन्तोष, संन्यास, संयोग, संस्कार, संरक्षण, संहार, सम्मेलन, संस्कृत, सम्मुख, संग्राम संयम, संशय, संभव, संकल्प, संगति, संजय, संग्राम, संतुलन, सन्यासी, सम्मेलन, संरक्षण, संसाधन, संशोधन, संहार, सम्मुख, संगम, संचय, संतोष, संताप, संपूर्ण, सम्मान, संयोग, संघात इत्यादि।
सुअच्छा,सुखी, अच्छा भाव, सहज, सुन्दरसुकृत, सुगम, सुलभ, सुदूर, स्वागत, सुयश, सुभाषित, सुवास, सुजन सुबह, सुलभ, सुराग, सुपुत्र, सुराज, सुकर, सुदूर, सुपौल, सुजन, सुशील, सुयोग, सुव्यवस्थित, सकर्मक, सुनयन, सुपुत्र, सुबोध, सुमनोहर, सुपात्र, सुशिक्षित, स्वच्छ, स्वागत
उछ् (उत् )
उन्नति, उद्धार, उत्थान, उद्देश्य, उन्नयन, उत्पत्ति, उच्चारण, उत्कर्ष, उद्घाटन, उद्योग, उल्लंघन, उन्नायक, उद्गम
दुस् / दूरबुरा कठिनदुश्चिन्त, दुश्शासन, दुष्कर, दुष्कर्म, दुस्साहस, दुस्साध्य, दुष्कृत्य, दुष्प्राप्य, दु:सह, दुराशा, दुरुह, दुरुक्ति, दुर्जन, दुर्गम, दुर्बल, दुर्लभ, दुखद, दुरावस्था, दुर्दमनीय, दुर्भाग्य, दुराग्रह, दुराचार, दुरवस्था, दुरुपयोग, दुरभिसंधि, दुर्गुण, दुर्दशा, दुर्घटना, दुर्भावना इत्यादि।
कु
बुरा, हीनताकुपुत्र , कुरूम , कुकर्म , कुमति ,कुयोग , कुकृत्य ,कुख्यात , कुखेत , कुपात्र , कुकाठ , कपूत , कुढंग आदि।
अधआधे के अर्थ मेंअधजला, अधपका, अधखिला, अधमरा, अधसेरा इत्यादि।
अ-अननिषेध के अर्थ मेंअमोल, अपढ़, अजान, अथाह, अलग, अनमोल, अनजान इत्यादि।
उनएक कमउत्रीस, उनतीस, उनचास, उनसठ, उनहत्तर इत्यादि।
हीनता, निषेधऔगुन, औघट, औसर, औढर इत्यादि।
दुबुरा, हीनदुकाल, दुबला इत्यादि।
बिननिषेधबिनजाना, बिनब्याहा, बिनबोया, बिनदेखा, बिनखाया, बिनचखा, बिनकाम इत्यादि।
निनिषेध, अभाव, विशेषनिकम्मा, निखरा, निडर, निहत्था, निगोड़ा इत्यादि।

तद्भव उपसर्ग— हिंदी के उपसर्ग–

इनकी संख्या—13 है। जो उपसर्ग तत्सम उपसर्गों से विकसित हुए है। उन्हें तद्भव उपसर्ग
कहते है। उपसर्ग मूलतः संस्कृत के ही तत्सम उपसर्गों से ही विकसित हुए है,वे मुख्यतः अभाव,निषेध,संख्या,अच्छाई-बुराई, पूर्णता आदि का अर्थ लिए हैं. इन्ही को उपसर्ग कहा जाता हैं. कुछ प्रमुख तद्भव उपसर्ग इस प्रकार हैं। जैसे
“अ, अध,अन,उन,औ—अव, क—कु,चौ,दु,नि,पर,बिन,भर,स—सु”आदि।

इन सभी उपसर्गों का अर्थ तथा वाक्य में प्रयोग नीचे तालिका में दी गई है।

उपसर्गअर्थउपसर्ग से बने शब्द
अननिषेध अर्थ मेंअनमोल, अनकहा, अनदेखा, अनजान , अनकहा , अनदेखा , अनमोल , अनबन , अनपढ़ , अनहोनी , अछूत , अचेत , अनचाहा , अनसुना , अलग , अनदेखी आदि।
अभाव, निषेधअछूता, अथाह, अटल ,अलग,इत्यादि।
अध्आधा अधपका , अधमरा , अधक्च्चा , अधकचरा , अधजला , अधखिला , अधगला , अधनंगा, अधजला, अधखिला, अधपका, अधकचरा, अधकच्चा, अधमरा इत्यादि।
दुबुरा, हीन, विशेषदुबला, दुर्जन, दुर्बल, दुकाल , दुलारा , दुधारू , दुसाध्य , दुरंगा , दुलत्ती , दुनाली , दुराहा , दुपहरी , दुगुना , दुकाल इत्यादि।

निआभाव, विशेष रहित,कमी निडर, निपूता, निहत्था, निकम्मा,निहाल,निगोड़ा, निडर, निकम्मा इत्यादि।
उनएक कमउनतीस, उनचास, उनसठ,उनतीस , उनचास , उनसठ , उनहत्तर , उनतालीस , उन्नीस , उन्नासी इत्यादि।
भरपूरा ,ठीकभरपेट, भरपूर, भरदिन इत्यादि।
कुबुरा कुचालकुचैला, कुचक्र, कुढंग ,कुसंगति , कुकर्म , कुरूप , कुपुत्र , कुमार्ग ,कुरीति , कुख्यात , कुमति आदि।
अव/औहीन, निषेधऔसान,औगुन , औघर औसर ,औसान , औघट , औतार , औगढ़ , औढर आदि।
स / सुअच्छासुफल , सुनामी , सुकाल , सपूत, सुडौल , सुजान , सुघड़,सुफल आदि।
बिनबिना, निषेधबिनब्याहा, बिनबादल, बिनपाए, बिनजाने आदि।
परदूसरा, बाद का,दूसरी पीढ़ी ,परलोक, परोपकार, परसर्ग, परहित परदादा , परपोता , परनाना , परदेशी , परजीवी , परकोटा , परलोक , परकाज परलोक आदि।
बुरा, हीनकपूत, कचोटआदि।

(3) आगत उपसर्ग — अरबी—फारसी (उर्दू )के उपसर्ग

इनकी संख्या —19 है। जो उपसर्ग अरबी फारसी व उर्दू भाषा से आए है।इन सभी उपसर्गों का अर्थ तथा वाक्य में प्रयोग नीचे तालिका में दी गई है। अरबी फारसी एवम् उर्दू के निम्न शब्द है  जैसे   “अल,कम,खुश,गैर,ना,ब,बद,बा,ला,सर,हम,हर,”आदिं

उपसर्गअर्थउपसर्ग से बने शब्द
अल – निश्र्चित, अन्तिम
अलविदा,अलबत्ता,अलगरज आदि।
कमथोड़ा, हीनकामखयाल, कमज़ोर, कमदिमाग, कमजात,कमसिन, कमअक्ल, कमज़ोर इत्यादि।
खुशश्रेष्ठता के अर्थ मेंखुशनुमा, खुशगवार, खुशमिज़ाज, खुशदिल, खुशहाल खुशबू, खुशनसीब, खुशकिस्मत, इत्यादि।
ग़ैरनिषेधग़ैरहाज़िर, ग़ैरकानूनी, ग़ैरवाजिब, ग़ैरमुमकिन, ग़ैरसरकारी,ग़ैरमुनासिब इत्यादि।
दरमध्य मेंदरम्यान, दरअसल, दरहकीकत इत्यादि।
नाअभावनामुमकिन, नामुराद, नाकामयाब, नापसन्द, नासमझ, नालायक, नाचीज़, नापाक, नाकाम इत्यादि।
फिल/फीमें प्रतिफिलहाल, फीआदमी इत्यादि।
और, अनुसारबनाम, बदौलत, बदस्तूर, बगैर, बमुश्किल, बतकल्लुफ़ आदि।
बासहितबाकायदा, बाइज्जत, बाअदब,बामौक़ा,बाइन्साफ,बामुलाहिज़ा,बाकलम आदि।
बदबुरा
बदनाम, बदमाश, बदकिस्मत, बदबू, बदहज़मी, बददिमाग, बदमज़ा, बदहवास, बददुआ, बदनीयत, बदकार,बदसूरत, बदनाम, इत्यादि।
बेबिनाबेबुनियाद, बेईमान, बेवक्त, बेरहम, बेतरह, बेइज्जत, बेअक्ल, बेकसूर, बेमानी, बेशक आदि
बिला
बिनाबिलावज़ह, बिलालिहाज़, बिलाशक, बिलानागा आदि।
बिलाबिनाबिलावजह, बिलाशक बिलआखिर, बिलकुल, आदि।
लाबिना, नहींलापता, लाजबाब, लावारिस, लापरवाह, लाइलाज, लामानी, लाइल्म, लाज़वाल,लाचार, लाजवाब, लापरवाह, लापता इत्यादि।
सर मुख्यसरहद, सरताज, सरकार, सरगना,सरंपच आदि।
हमबराबर, समानहमउम्र, हमदर्दी, हमपेशा इत्यादि।
हरप्रत्येकहरदिन हरसाल हरएक हरबार इत्यादि।

अंग्रेजी के उपसर्ग

इसमें सब, डिप्टी, वाइस, जनरल प्रधान,हैड,चीफ,एक्स हाफ,सब आदि शब्द अग्रेंजी के उपसर्ग में आते है।

इन सभी उपसर्गों का अर्थ तथा वाक्य में प्रयोग नीचे तालिका में दी गई है।

उपसर्गअर्थउपसर्ग से बने शब्द
हैड –मुख्य
हेडमास्टर, हेड क्लर्क, हेड ऑफिस, हेड कांस्टेबल, हैड मुंशी, हैड पंडित आदि
जनरल –प्रधान, सामान्य
जनरल मैनेजर, जनरल सेक्रेटरी, जनरल इंश्योरेंस आदि|
डिप्टी –
सहायकडिप्टी कलेक्टर, डिप्टी रजिस्टर, डिप्टी मिनिस्टर,डिप्टी-रजिस्ट्रार, आदि
वाइस –सहायकउपवाइसराय, वाइस चांसलर, वाइस प्रेजिडेंट, वाइस प्रिंसिपल आदि।
एक्स –
मुक्तएक्सप्रेस , एक्स कमिश्नर , एक्स स्टूडेंट , एक्स प्रिंसिपल आदि।
चीफ – प्रमुख
चीफ मिनिस्टर, चीफ इंजीनियर, चीफ सेक्रेटरी आदि।
हाफ –
आधाहाफटिकट, हाफरेट, हाफकमीज, हाफ पेंट, हाफ बाड़ी आदि।
सब –
अधीन , नीचेसबजज, सबकमेटी, सबरजिस्टर, सब पोस्टर, सब इंस्पेक्टर,सब-जज,आदि।
(5) उपसर्गवत् — उपसर्ग के समान प्रयुक्त होने वाले सस्ंकृत के अव्यय—( संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण)

सभी उपसर्गों का अर्थ तथा वाक्य में प्रयोग नीचे तालिका में दी गई है।

उपसर्गअर्थउपसर्ग से बने शब्द
अभावअशोक, अकाल, अनीति, अधर्म, अज्ञान, अनीति
अनअभाव/निषेधअनर्थ, अनंत
अलम्शोभा, बेकारअलंकार
अंतःभीतरीअंतःकरण, अंतःपुर, अंतर्मन, अंतर्देशीय
अधःनीचेअधःपतन, अधोगति, अधोमुखी, अधोलिखित
अन्तरभीतरअन्तर्नाद, अन्तर्राष्ट्रीय
आविसप्रकट/बाहर होनाआविष्कार, आविर्भाव
चिरबहुत देरचिरंजीवी, चिरकुमार, चिरकाल, चिरायु
पुनरफिरपुनर्जन्म, पुनर्लेखन, पुनर्जीवन, पुननिर्माण, पुनरागमन
पुरस्सामनेपुरस्कार
प्रादुर्प्रकट होना,सामने आना,प्रादुर्भाव, प्रादुर्भूत
पुरापहलेपुरातत्व, पुरावृत्त,पुरातन
पुरापहलेपुरातन, पुरातत्त्व
सहितसपरिवार, सदेह, सचेत
सहसाथसहकार, सहपाठी, सहयोगी, सहचर
समसमानसमकालीन, समदर्शी, समकोण, समकालिक
सतसच्चासज्जन, सत्कर्म, सदाचार, सत्कार्य
बहिरबाहरबहिर्गमन, बहिर्जगत, बहिष्कार, बहिर्द्वार
का/कुबुरा
कापुरुष, कुपुत्र
अभावनगण्य, नपुंसक
तिरस्तिरछा, टेढ़ा, अदृश्यतिरस्कार, तिरोभाव

उपसर्गवत् अव्यय—- संज्ञा, सर्वनाम तथा विशेषण से बने संस्कृत के अन्य उपसर्ग व उनके उदहारण

अभाव

  • अशोक ,अकाल, अनीति

चिरबहुत देर

  • चिरंजीवी, चिरकुमार, चिरकाल, चिरायु

पुनर्फिर

  • पुनर्जन्म, पुनर्लेखन, पुनर्जीवन

बहिर्बाहर

  • बहिर्गमन, बहिष्कार

सत्सच्चा

  • सज्जन, सत्कर्म, सदाचार, सत्कार्य

पुरापुरातन

  • पुरातत्त्व, पुरावृत्त

समसमान

  • समकालीन, समदर्शी, समकोण, समकालिक

सहसाथ

  • सहकार, सहपाठी, सहयोगी, सहचर

अधःनीचे

  • अधःपतन, अधोगति, अधोमुखी, अधोलिखित

अंतःभीतरी

  • अंतःकरण, अंतःपुर, अंतर्मन, अंतर्देशीय

एक से अधिक उपसर्गों का एक साथ प्रयोग:—

प्राय: संस्कृत के शब्दों में एक साथ एक से अधिक उपसर्गों का प्रयोग करके शब्दों की रचना होती है।

जैसे——

उपसर्ग+ उपसर्ग+शब्द — नया शब्द

  • सु+ आ+ गत =  स्वागत
  • अन+ आ+ चार = अनाचार
  • सु+ प्र+  स्थान = सुप्रस्थान
  • अन+ आ+ गत = अनागत
  • वि +आ+ करण = व्याकरण
  • अ +परा+ जय = अपराजय
  • अ+ नि+ यंत्रित = अनियंत्रित
  • परी+ आ+ वरण = पर्यावरण
  • अति +आ+चार =   अत्याचार
  • निर् + आ + करण = निराकरण
  • प्रति + उप + कार = प्रत्युपकार
  • सु + सम् + कृत = सुसंस्कृत
  • अन् + आ + हार = अनाहार
  • सम् + आ + चार = समाचार
  • अन् + आ + सक्ति = अनासक्ति
  • अ + सु + रक्षित = असुरक्षित
  • सम् + आ + लोचना= समालोचना
  • सु + सम् + गठित = सुसंगठित
  • अ  + प्रति + अक्ष = अप्रत्यक्ष
  • सत्  +आ  +चार = सदाचार
  • अन्+  आ+ चार = अनाचार
  • अ+  परा+  जय = अपराजय
  • सु+  प्र+  स्थान = सुप्रस्थान

विशेष तथा ध्यान देने योग्य बातें

उपसर्ग में निम्न बातों का होना आवश्यक है।

  • उपसर्ग लगने के बाद शब्द का अर्थ बदल जाता है
  • उपसर्ग शब्द की रूप रचना को नया रूप प्रदान करते है
  • उपसर्ग भाषा के वे लघुत्तम अर्थवान खंड होते हैं।
  • यह शब्दों के आरंभ में लगकर नए शब्दों की रचना करते है।
  • शब्द खंड अपने आप में अपूर्ण होते हैं अतः उनका स्वतंत्र प्रयोग नहीं हो सकता, किसी अन्य के साथ जुड़ने पर ही वाक्य में उनका प्रयोग करता हैं
  • भाषा के वह सार्थक एवं छोटे खंड जो किसी शब्द के आरम्भ में लग जाते हैं एवं उससे मिलकर किसी दुसरे शब्द का निर्माण कर देते हैं।
  • पसर्ग शब्द का अर्थ होता है –” समीप आकर नया शब्द बनाना”। अर्थात यह किसी शब्द साथ लगकर नया शब्द बनाता है।
  • ‘उपसर्ग’ के अन्य अर्थ-“-बुरा लक्षण या अपशगुन”
  • वह पदार्थ जो कोई पदार्थ बनाते समय बीच में संयोगवश बन जाता या निकल आता है (बाई प्राडक्ट)। जैसे-गुड़ बनाते समय जो शीरा निकलता है, वह गुड़ का उपसर्ग है।

उपसर्ग की विशेषता

उपसर्ग की  विशेषताएँ निम्नलिखित होती हैं-

उपसर्गों के द्वारा शब्दों के अर्थ बदल जाते है।

  • जैसे- अ + सत्य= असत्य
  • अप + यश= अपयश

शब्द के अर्थ में, कोई खास परिवर्तन न करके मूलार्थ के इर्द-गिर्द अर्थ प्रदान करना।

  • जैसे- वि + शुद्ध= विशुद्ध
  • परि + भ्रमण= परिभ्रमण

उपसर्गों के द्वारा शब्दों के अर्थ में नई विशेषता को प्रकट किया जा सकता है।

  • जैसे- प्र + बल= प्रबल
  • अनु + शासन= अनुशासन

 उपसर्ग के द्वारा किसी प्रकार का उत्पात, उपद्रव या विघ्न दूर किया जा सकता है।

  • योगियों की योगसाधना के बीच होनेवाले विघ्न उपसर्ग हैं। जिसमें निम्न प्रकार के होते हैं :
  • प्रतिभा,  श्रावण, दैव,मुनि

मुनियों पर होनेवाले उक्त उपसर्गों के विस्तृत विवरण मिलते हैं। जैन साहित्य में विशेष रूप से इनका उल्लेख रहता है क्योंकि जैन धर्म के अनुसार साधना करते समय उपसर्गो का होना अनिवार्य है